बुधवार, दिसंबर 31, 2008

जिया मोहिनुद्दीन की आवाज में सुनिये "लाहौर"

जिया मोहिनुद्दीन की आवाज में पिछली कुछ प्रविष्टियों को आपकी सराहना मिली, इसी के चलते एक और नगीना पेश कर रहा हूँ । इस बार उनकी आवाज में लाहौर के बारे में सुनिये ।



इसी के साथ आप सभी को नये साल की हार्दिक शुभकामनायें ।

मंगलवार, दिसंबर 30, 2008

जावेद अख्तर की आवाज में कुछ अशार और एक नज्म !!!



अब इसी नज्म को खुद जावेद अख्तर की आवाज में सुनिये।


ये तसल्ली है कि हैं नाशाद सब,


सोमवार, दिसंबर 29, 2008

शेयर बाजार में निवेश: आपबीती और सीखे हुये सबक

आज ज्ञानदत्त पाण्डेयजी के चिट्ठे पर "हैप्योनेर निवेशक बनें" पढा । पहले तो हैप्योनेर का अर्थ ही समझ में नहीं आया, फ़िर लगा कि ज्ञानदत्तजी हमारे जैसे हिन्दी माध्यम में पढाई करने वालों की टांग तो नहीं खींच रहे हैं । अगर स्पेलिंग ही लिख देते तो कुछ समझने की कोशिश करते । फ़िर आगे पढा तो पता चला कि हैप्योनेर (Happionaire) बोले तो "आनन्द से तृप्त" ।

आब्जेक्शन माई लार्ड: शेयर बाजार और आनन्द से तृप्त, कैसी लीला है विरोधाभास की ।

कुछ महीनों पहले जब अमेरिका के शेयर बाजार की वाट लगी हुयी थी तो एक पार्टी में इस बात पर चर्चा होने लगी । एक बुजुर्ग (जिनका पोर्टफ़ोलियो काफ़ी सिकुड चुका था) ने हमसे कहा कि तुम तो जवान हो, ये बडा माकूल समय है शेयर बाजार में पैसा लगाने का । सब कुछ गाजर मूली के दाम पर बिक रहा है, कोई कम्पनी देखो जिसकी नींव (Fundamentals) मजबूत हो, पैसा निवेश करो और फ़िर इसे भूल जाओ । कुछ सालों के बाद हमको दुआयें दोगे । हमने उस समय तो हंसी में टाल दिया कि गरीब विद्यार्थियों के पास कैसा पैसा लेकिन जिस प्रकार कलयुग राजा परीक्षित के सोने के मुकुट में समा चुका था, कुछ कुछ वैसा ही हमारे साथ हुआ ।

पहली बार finance.google.com खोल कर देखा, पता चला दुनिया में बहुत कुछ चल रहा है । फ़िर देखा कि माउस के क्लिक से ही शेयर खरीदे/बेचे जा सकते हैं । मन को समझाया कि केवल देख लो, बाकी पैसा वैसा कहाँ है डालने के लिये । फ़िर कहा कि चला खाता खुलवा लो, कोई जबरदस्ती तो है नहीं कि खरीदना ही पडेगा । वैसे भी खाता तो मुफ़्त खुल रहा है, नो सर्विस चार्ज :-)

२ हफ़्ते निवेश से सम्बन्धित खबरे पढने में गुजारे । मन तो तसल्ली दी कि ये ठीक कर रहे हो, कुछ भी करने से पहले ज्ञान जुटाना बहुत जरूरी है । तुम उन लोगों में से नहीं हो कि किसी ने कुछ कहा और कूद पडे । भले ही लोग न माने लेकिन तुम खुद तो काफ़ी समझदार और औसत बुद्दि तो समझते ही हो । फ़िर कहा कि चलो अपने बैंक से ट्रेडिंग अकाउंट में पैसा तो भिजवा ही दो, मान लो कल कोई अच्छा मौका आया खरीदने का और तुम मुंह देखते रह जाओगे । चलो ये भी करवा लिया, अपनी कठिन मेहनत से बचाये हुये कुछ पैसे (पिताजी न पढ लें, इसलिये बतायेंगे नहीं :-) ) डालकर पहला निवेश किया । Wachovia Coroporation डूब चुकी थी और उसका शेयर अर्श से फ़र्श पर आ चुका था । Wells Fargo ने जब Wachovia को खरीदने की बात की तो उसका मरे हुये शेयर ने फ़र्श से जरा सा लडखडाकर ऊपर की ओर देखा, ठीक इसी समय हमने उसे थाम लिया । अगले हफ़्ते में Wells Fargo से डील पक्की हुयी और हमारा पोर्टफ़ोलियो ३३% के लाभ में हरा-हरा दिख रहा था ।

हमने खुद को शाबाशी दी और कुछ अन्य निवेश किये जो औंधे मुंह गिर पडे । ध्यान रहे कि हमारे हिसाब से ये सारे निवेश So Called दिमाग और Analysis के बाद किये गये थे । लेकिन अब चलते है कुछ महत्वपूर्ण सबक पर जो इन ५-६ महीने में हमने सीखे :

१) कहना आसान है कि पैसा लगाओ कि और Long Term भूल जाओ । जब आप अपनी गाढी कमाई को लाल होते देखते हैं तो बडा दुख होता है ।

२) कहा जाता है कि Buy Low, Sell High । लेकिन अक्सर होता उलटा है ।

३) शेयर खरीदते ही दाम गिरने पर पहला रिऐक्शन होता है "Cost Averaging" | अर्थात अगर आपने १०० शेयर २० के दाम खरीदे और अब दाम १५ है तो अगर आप १०० शेयर और खरीदें तो आपके निवेश की औसत खरीद १७.५ होगी । ये एक खतरनाक Slippery Slope है, इसमें मैने अच्छे अच्छों को फ़िसलते देखा है । हम भी एक बार इसके चक्कर में फ़ंसे लेकिन समय चलते बच निकले ।

४) जब बाजार बूम पर होता है तो पनवाडी की सलाह भी ५०% से ज्यादा सही होती है । लेकिन Recession के समय बाजार सारे सूत्र (Logic, Fundamental, Expectation) भूल जाता है । इस समय यहाँ अमेरिका में तो कम से कम Panic-Driven बाजार है । किसी भी कम्पनी के Fundamentals कितने भी मजबूत हों सब उठापटक में फ़ंसे हुये हैं ।

५) हमने कुछ निवेश Solar Companies में भी किया था । सोचा था कि बराक ओबामा Non-Conventional Energy के बहुत पक्ष में हैं और उनके जीतने की संभावना के चलते ये एक अच्छा निवेश होगा । अफ़सोस गलत जवाब....इस समय अमेरिका में पेट्रोल ६५ रूपये ($१.३५) में ३.७८ लीटर (१ गैलन) मिल रहा है, ऐसे में सोलर का क्या हश्र होगा आप खुद ही सोच लीजिये । लेकिन इस Panic-driven/Manupulative बाजार का कोई भरोसा नहीं । आज जब सब कुछ डाउन है, एक सोलर कम्पनी के शेयर लगभग १२% ऊपर हैं बिना किसी ठोस/सकारात्मक खबर के (इसे आप चित्र में देख सकते हैं) ।

६) इस समय निवेश करने के लिये Nerves और Balls दोनों स्टील की चाहियें, अगर दम हो तो निवेश करो वरना अभी और इन्तजार करो । क्योंकि अगर विशेषज्ञों की माने तो यहाँ अमेरिका के बाजार के होश बजा होने में कम से कम दो साल या और अधिक समय लगेगा । तब तक यूँ ही खटपट चलती रहेगी ।

७) Temptation के मामले में शेयर बाजार बहुत खतरनाक है । हम खुद ही कई बार Tempt हुये लेकिन निवेश के लिये खुद के लिये बनाये गये नियमों को पालन करने की बाध्यता के चलते कई बार इस Temptation से बचे तो अन्त में सही साबित हुआ ।


इसीलिये, चाहे बूम (Boom) हो या Recession अगर निवेश आपका Profession नहीं है तो आप नौसिखिये (Ameteur) ही हैं । निवेश से पहले कुछ नियम बनाईये और इनका पालन कीजिये । कभी भी उधार लेकर पैसा मत लगाईये, और जिस पैसे की आपको निकट भविष्य (१-२ साल) में जरूरत पडने की सम्भावना हो उसे बाजार में निवेश मत कीजिये ।

गुरुवार, दिसंबर 25, 2008

चेस्ट बीटिंग नेशनलिज्म और देशभक्ति का भद्दा प्रदर्शन !!!

आज ही इस वीडियो पर नजर गयी और इसके बाद अन्नु कपूर की जितनी इज्जत मेरे जेहन में थी वो एक झटके में काफ़ी कम हो गयी है । वैसे भी झटके लगने का सिलसिला कल आमिर खान की "बी ग्रेड" फ़िल्म "गजनी" देखकर शुरू हुआ है, देखते हैं कब तक चलता है । 

कल ही दिनेशजी ने अपने चिट्ठे पर लिखा था कि एक टिप्पणी जिसमें गुनाहगार के वकील के वकील को भी सजा देने की बात की गयी थी पर उन्हे दुख हुआ था । उस टिप्पणी से दुख मुझे भी हुआ था, दुख मुझे हर उस समय होता है जब हम देशभक्ति, नेशनलिज्म और कभी कबीलाई इंसाफ़ के नाम पर भावनाओं के अंबार में बहकर तर्क का साथ छोड देते हैं । 

फ़िलहाल तो आप इस वीडियो का आनन्द उठायें । हाँ, इस वीडियो में तो देशभक्ति के नाम पर एक भद्दा मजाक किया गया है जिसे देखकर क्या पता हंसी आ जाये तो भी पैसे वसूल ।




मेरे रूममेट अंकुर की टिप्पणी: अंकुर कहते हैं कि भारत का रियेलटी टी.वी. जल्द ही अमेरिका के रियलटी टी.वी. को मात देगा । उनकी भविष्यवाणी है कि अब केवल रियेलटी शो के जजों में जूतम-पैजार होने की कसर बाकी है ।

मंगलवार, दिसंबर 23, 2008

पुस्तकालय की महिमा: छुट्टी का जुगाड !!!

हमारे विश्वविद्यालय का फ़ाण्ड्रन पुस्तकालय अमेरिका के चुने हुये विशाल पुस्तकालयों में से एक है । अपने शोधकार्य के अलावा अन्य विषयों पर जानकारी लेने के लिये इंटरनेट की अपेक्षा कभी कभी पुस्तकालय में जाना बहुत सुखद होता है । भारत के पुरातन इतिहास (Ancient History of India) में मेरी विशेष रूचि है | इसके परिपेक्ष्य में पिछले कई वर्षों में Indo-Aryan Controversy पर काफ़ी कुछ पढा लेकिन नोट्स बनाकर लिखने का हमेशा आलस रहा ।

अभी कुछ दिन पहले पुस्तकालय में भारतीय इतिहास वाले सेक्शन में भटकते हुये एक पुस्तक पर नजर पडी । The Indo-Aryan Controversy: Evidence and inference in Indian History | सबसे पहले प्रकाशक पर नजर डाली, "Routledge, Taylor & Francis Group" | हम्म, प्रकाशक तो बढिया है सोचकर शेल्फ़ से उठा ली । मेरे मित्र अंकुर वर्मा ने लगभग आठ साल पहले सलाह दी थी कि किसी भी पुस्तक के प्रस्तावना अथवा Preface से मजमून के बारे में अच्छी जानकारी मिलती है और Preface कोशिश करके एक बार में पूरा पढना चाहिये । तुरन्त उनकी सलाह पर अमल किया और ये पढने को मिला ।
(चित्र को क्लिक करके पढने में आसानी होगी )
(चित्र को क्लिक करके पढने में आसानी होगी )

Preface पढते ही दिल बाग बाग हो गया और लगा कि चलो कोई राईट/लेफ़्ट विंग प्रोपागेंडा तो नहीं है । ठोस इतिहास की बात हो रही है । अब इसके बाद आगे पन्ने पलटे तो पता चला कि इस पुस्तक में माइकेल विट्जल, बी. बी. लाल, सत्य स्वरूप मिश्रा, सुभाष काक, श्रीकांत तलगेरी, माधव देशपांडे, कोइनार्ड एस्ट जैसे दिग्गजों के लेख हैं । तुरन्त इस पुस्तक को उठाया गया और निश्चित किया कि क्रिसमस की छुट्टियों में इसे दबाकर पढेंगे और यदि संभव हुआ तो कुछ नोट्स भी तैयार किये जायेंगे ।

हिन्दी ब्लागजगत में भी निश्चित ही बहुत से लोगों के इस Indo-Aryan Controversy के बारे में कुछ विचार होंगे । मसलन क्या आर्य (Race) और द्रविण भिन्न हैं? सिन्धु घाटी सभ्यता में रहने वाले कौन थे ? वैदिक सभ्यता और सिन्धु घाटी सभ्यता का आपस में क्या सम्बन्ध है ? क्या ये दोनों एक ही हैं ? इत्यादि इत्यादि ।

देर किस बात की है, लिख भेजिये इस विषय पर अपनी राय ।


P.S.: मैक्स मूलर और मैकाले को गरियाने/जुतियाने में अपना समय व्यर्थ न करें , :-)

सोमवार, दिसंबर 22, 2008

ज़िया मोहिनुद्दीन की आवाज में सुनिये "चचा छक्कन"

हमने पिछली बार आपको जिया मोहिनुद्दीन की आवाज में एक कहानी "धोबी" सुनवायी थी, जिसके बाद पारूलजी ने जिया मोहिनुद्दीन की आवाज में और अफ़साने भी सुनने की इच्छा जताई थी । लीजिये इसी कडी में पेश है, चचा छक्कन ।



इस पूरे मजमून को सुनने के बाद बतायें कि अगर कहानी के किरदार अपने ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, उनकी पत्नी श्रीमती रीता पाण्डेय और उनके भृत्य भरतलाल होते तो कहानी कैसी बनती । इसे हमारा ज्ञानदत्तजी की मौज लेने का प्रयास बिल्कुल न समझा जाये, :-)

रविवार, दिसंबर 21, 2008

दीवार से टकराना और टकरा के आगे बढने की कला !!!

सावधान: ये एक लम्बी और बडे कष्ट (३६ किमी दौडने) के बाद लिखी गयी पोस्ट है ।

लम्बी दौडों, साईकलिंग और लम्बी तैराकी में एक प्रक्रिया होती है जिसे "दीवार से टकराना कहते हैं" (Hitting the Wall) | दीवार से टकराने का वैज्ञानिक कारण है । आपका शरीर ग्लूकोज को ग्लाईकोजन के रूप में सहेज कर रखता है, इसके अलावा आपके शरीर में वसा भी एकत्रित रहती है जो भी ऊर्जा का एक स्रोत है । जब आप कोई शारीरिक श्रम करते हैं तो उस श्रम को करने के लिये ऊर्जा ग्लाईकोजन अथवा वसा से प्राप्त होती है । वसा को ऊर्जा में बदलने की क्रिया बहुत धीमी और क्लिष्ट (Complex) होती है । इसके विपरीत ग्लाईकोजन बडी आसानी से ग्लूकोज में परिवर्तित होता है और तुरन्त ऊर्जा में बदला जा सकता है । इसका सीधा अर्थ हुआ की दौडने की अवस्था में जब शरीर के ऊतकों को तेजी से ऊर्जा की आवश्यकता होती है, आप ग्लाईकोजन पर निर्भर रहते हैं ।

ये सब तो ठीक हुआ लेकिन इसका दीवार से टकराने का क्या सम्बन्ध ? समस्या है कि हमारा शरीर केवल २००० किलो कैलोरी ही ग्लाईकोजन के रूप में संचित कर पाता है । दौडते समय इस २००० किलो कैलोरी को आप (वजन के हिसाब से) १७ मील से २० मील की दूरी में खर्च कर देते हैं । उसके बाद आपके शरीर में अचानक बदलाव आता है । जहाँ आप १८ मील तक बडे आराम से दौड रहे होते हैं, ग्लाईकोजन का टैंक खत्म होते ही शरीर को वसा पर निर्भर होना पडता है और उस समय ऐसा महसूस होता है कि जैसे अचानक चलती कार पर किसी ने ब्रेक लगा दिये हों । कुछ स्थितियों में केवल २०-५० मीटर की दूरी में ही आप दौडने से रूककर पैदल चलने पर मजबूर हो जाते हैं । इस स्थिति को Hitting The Wall कहते हैं ।

अब चूँकि मैराथन २६.२ मील की होती है, आखिरी ६-९ मील सबसे दूरूह होते हैं । कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि मैराथन में २० मील वार्म अप करने के लिये होते हैं और असली दौड आखिरी ६.२ मील की होती है । पिछले तीन हफ़्तों में मैने इस दीवार को स्वयं अनुभव किया । हमने २५ किमी (१५.६ मील) की एक दौड दौडी और हंसते हंसते इसे पूरा किया और लगा कि हम अब मैराथन के लिये पूरी तरह तैयार हैं । लेकिन उसके बाद २५ से ३६ किमी की दौडों में इस दीवार ने खूब छकाया । आज इस पोस्ट को लिखने से पहले सुबह ३६ किमी दौडकर आये हैं और ३० किमी के बाद ऐसा लगा कि अचानक पैरों पर कोई डंडे से जोर जोर से पिटाई करने लगा हो ।

चलिये ये सब तो ठीक है लेकिन इस दुष्ट दीवार से बचा कैसे जाये ? इसका इलाज है कार्बो लोडिंग (Carb Loading) | आप ३० किमी से लम्बी दौड वाले हफ़्ते में वसा को कम करके Carbohydrate ज्यादा खायें और जमकर खायें । दौड शुरु होने से पहले Liquid Carbohydrate Drinks का सेवन करें क्योंकि दौड से तुरन्त पहले ठोस पदार्थ खाने का मतलब है दौड के दौरान पेट में हिमेश रेशमिया का संगीत :-)

इसके अलावा हर ५ वें मील के दौरान Gu Gel का सेवन करें जिससे पूरी दौड में आपको अतिरिक्त ५००-६०० किलो कैलोरी ग्लाईकोजन की आपूर्ति हो सके । और फ़िर आखिरी ३-४ मील अल्लाह/राम/जीजस जिसको भी आप मानते हों कि भरोसे छोड दें ।

सागर भाईजी ने पूछा था कि मैं इस दौड को जीतूँगा तो मुझे क्या ईनाम मिलेगा, तो इसके चलते मैराथन से सम्बन्धित कुछ मजेदार बाते बतायी जायें ।

१) मैं अपनी जिन्दगी में कभी भी मैराथन नहीं जीत सकता । जो धावक मैराथन जीतते हैं उनमें कुछ जन्मजात गुण होते हैं और वो इसकी ट्रेनिंग एक Profession समझ कर करते हैं । इसके विपरीत मैराथन दौडना मेरी रूचि है ।

२) हर मैराथन दौडने वाले के मन में तीन समय होते हैं । पहला समय जो वो सबको बताता है, मेरे लिये ये ३ घंटा ४० मिनट होगा । ये समय वो होता है कि अगर दौड के दौरान थोडी गडबड भी हो जाये तो भी निकल पाये । दूसरा समय होता है जिससे वो सन्तुष्ट होगा लेकिन खुश नहीं, मसलन अगर सब कुछ गडबड हो जाये फ़िर भी कम से कम इस समय में दौड पूरी हो जाये । मेरे लिये ये ४ घंटे का समय होगा । तीसरा समय उसके खुद के लिये होता है, ये वो समय होता है कि अगर सारे सितारे साथ में हो और कोई चोट, खिंचाव, दर्द न उठे तो इस समय में दौड पूरी हो । आमतौर पर ये सीक्रेट होता है क्योंकि जरा सी भी गडबड होने पर ये तुरन्त हाथ से रेत की तरह फ़िसलता जाता है । मेरे लिये ये समय ३ घंटा २८ मिनट से ३ घंटा ३० मिनट के बीच होगा ।

३) अब आपके समय के हिसाब से मैराथन में आपकी श्रेणी इस प्रकार की होती है । अब आप खुद ही देख लें हम कहाँ खडे हैं ।

2:30 or under = Elite runner
2:30-3:00 = Still very fast, would win most smaller marathon
3:00-3:30 = Strong time, top 10-15% of most marathons
3:30-4:00 = Top २0-40% of field
4:00-4:30 = Middle of the pack
4:30-5:00 = Bottom third
5:00 + = Back of the pack

जो भी मैराथन दौडने का संकल्प लेते हैं उनको मैं बहुत इज्जत की नजर से देखता हूँ । जो भी इसको समाप्त करते हैं भले ही इसमें कितना भी समय लगे, उनको मेरा सलाम । कारण है कि अगर आप ३:३० से कम समय में इसको पूरा करते हैं तो आपमें क्षमता है और दौड आपको मुबारक । लेकिन अगर आप इसको ५-६ घंटे में पूरा कर रहे हैं, इसका अर्थ है कि आप केवल अपनी ट्रेनिंग और इच्छाशक्ति के बल पर इस पूरा कर रहे हैं जो बहुत मुश्किल है । क्योंकि किसी भी मैराथन को सिर्फ़ पूरा करने के लिये कम से कम ५ महीने की सम्पूर्ण निष्ठावान ट्रेनिंग चाहिये । जिसमें आप हर हफ़्ते २५-४० मील दौडें और जब आप धीमा दौड रहे हों तो इसको जारी रखना बहुत मुश्किल है जब लोग आसानी से आपसे आगे निकले जा रहे हों ।

लेकिन लोग कहते हैं किसी भी लम्बी दौड को पूरा करने के बाद की स्थिति जिसे Runners High कहते हैं, वो किसी भी नशे से हासिल नहीं की जा सकती है । इसके लिये तो कष्ट करना ही पडेगा, :-)

अन्त में कुछ रोचक तथ्य:

१) मैराथन की उत्पत्ति ग्रीक सभ्यता से जुडी हुयी है जब एक धावक मैराथन के युद्ध में विजय की सूचना लेकर बिना रूके दौडते हुये गया था और सूचना देते ही गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुआ था ।
२) माडर्न मैराथन १८९६ से प्रारम्भ हुयी हैं जिसमे काफ़ी समय तक दूरी निश्चित नहीं थी ।
३) १९०८ लंदन ओलम्पिक में २६.२ मील की दूरी तय हुयी थी । इस अजीब सी २६.२ मील का दूरी इसलिये जिससे दौड शाही महल के सामने खत्म हो सके ।
४) १९१२ के बाद से हम मैराथन २६.२ मील अथवा ४२.१९५ किमी की होती है । लेकिन भीड और दांये/बांये चलने के कारण आप एक सीधी रेखा में नहीं दौड पाते और लगभग २६.४ मील तक दौडते हैं ।
५) एक मैराथन में आप लगभग 65,000-70,000 कदम दौडते हैं ।
६) Elite Marathoners को छोडकर लगभग बाकी लोग अपनी ट्रेनिंग में अधिकतम २२-२४ मील ही दौडते हैं और २६.२ लगातार पूरी ट्रेनिंग में एक ही बार यानि दौड वाले दिन दौडते हैं । इस लिहाज से दौड आपकी ट्रेनिंग का कठिनतम दिन होता है ।
७) मैराथन में अगर आप ठीक ढंग से पानी न पियें अथवा बहुत अधिक पानी पियें तो Under-hydration/Over-hydration से किसी किसी स्थिति में मृत्यु तक हो सकती है । इसके अलावा अगर आपका हृदय कमजोर है तो भी ये आपके लिये खतरनाक हो सकती है, लेकिन मैराथन में मृत्यु होने की प्रायिकता घर के बाहर बिजली गिरने से होनी वाली प्रायिकता अथवा सडक दुर्घटना में मृत्यु होने की प्रायिकता से भी कम है अगर आप ठीक प्रकार से दौडें ।

अन्त में पिछले हफ़्ते ३० किमी वाली दौड के कुछ फ़ोटो, और उसके बाद आराम से पैर की मसाज करवाते समय के फ़ोटो :-)

गुरुवार, दिसंबर 18, 2008

अमर सिंह का अमरीका को दिया चंदा और भांग एट गंगा तट . काम

बराक ओबामा की हिलेरी क्लिंटन को सेकेट्री आफ़ स्टेट (Secretary of State) बनाने की शर्त थी कि बिल क्लिंटन अपनी फ़ाउंडेशन को चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक करेंगे । आज न्य़ूयार्क टाईम्स की खबर ने इन चंदा देने वालों के नाम बताये हैं, मेरी नजर खबर के इन खास हिस्सों पर गयी ।

The potential for foreign donors to the Clinton foundation to create the appearance of conflicts of interest for Mrs. Clinton as she handles foreign policy matters was illustrated by Amar Singh, listed as giving between $1 million and $5 million. Mr. Singh is apparently a prominent Indian politician of that same name.

In September, Mr. Singh visited Washington to lobby Congress to support a deal allowing India to obtain civilian nuclear fuel and technology from the United States. The deal was controversial because India has developed nuclear weapons but is not a party to the Nuclear Non-Proliferation Treaty.

Mr. Singh met and posed for photographs with Mrs. Clinton, afterwards telling Indian reporters that Mrs. Clinton had assured him that Democrats would not block the deal. Congress approved the nuclear cooperation deal with India a few days later.

अब तो अमरसिंह जी को लोग गाली देना बन्द करें । वे तो महान ग्लोबल जनसेवक हैं जो पूरी दुनिया में धर्म के काम में लगे हुये हैं ।

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दूसरी खबर:

अंकुर श्रीवास्तव मेरे मित्र हैं और मेरे अपार्टमेंट में ही रहते हैं । अंकुर इलाहाबाद के मूल निवासी हैं । भविष्य में अंकुर और हम मिल कर एक प्रोजेक्ट शुरु करने का भी सोच रहे हैं । प्रोजेक्ट का नाम है भांग एट गंगा तट . काम । ये प्रोजेक्ट व्यस्त प्रोफ़ेशनल्स के लिये डी-स्ट्रेसिंग रिट्रीट (De-Stressing retreat) जैसा होगा । जिसमें वो इलाहाबाद के गंगा तट पर हमारी कम्पनी के गेस्ट हाऊस में आराम से बैठकर भांग का मजा ले सकते हैं (मैने कभी भांग का सेवन नहीं किया लेकिन अंकुर की बात पर भरोसा करके इस बार भारत यात्रा पर इसका पूरा लुत्फ़ उठाने का इरादा है ) । भांग के साथ, आध्यात्मिक सेमिनार, काशी के अस्सी का पाठ आदि भी आयोजित कराया जायेगा । आप केवल $२,००० डालर देकर हमारी संस्था के जीवन पर्यन्त सदस्य बन सकते हैं । सदस्यता के लिये हमसे सम्पर्क करें ।

शनिवार, दिसंबर 13, 2008

शिवोहम शिवोहम...आदि शंकराचार्य द्वारा रचित पद पं जसराज की आवाज में

इस पोस्ट को लिखने में बडी अडचन है । जहाँ १५-२० सेकेंड्स में पढने में पोस्ट निपट जाती है वहाँ किसी से २८ मिनट मांगना कहाँ उचित है । लेकिन क्या करें, भारतीय शास्त्रीय संगीत के समुन्दर में डूब कर आनन्द लेने के लिये इतना समय तो देना ही होगा । वरना लोग तो वो भी हैं जो ७ मिनट की द्रुत बंदिश में भी आलाप को फ़ास्ट फ़ारवर्ड कर देते हैं :-)

लेकिन जो सुन न सकें वो पढकर ही आनन्द ले लें । इस "पद" को आदि शंकराचार्य ने अपने "अद्वैत/Non-duality" के दर्शन के अनुरूप रचा था । इसको पंडित जसराज की आवाज में सुने और अनुभव करें । इस "पद" को पंडित जसराज ने रागों के राजा राग दरबारी में गाया है ।

जिनके पास समय इफ़रात में है वो यहाँ क्लिक करें और डायमंड पैकेज का आनन्द लें,



अच्छा चलिये, जिनके पास समय की कमी है वो यहाँ क्लिक करें सिल्वर पैकेज,



जो बहुत ही व्यस्त हैं, वो केवल पढकर काम चला लें लेकिन हमसे नरक में मुलाकात हो तो हमें दोष न दीजियेगा :-)

Mano budhya ahankara chithaa ninaham,
Na cha srothra jihwe na cha graana nethrer,
Na cha vyoma bhoomir na thejo na vayu,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.

Neither am I mind, nor intelligence,
Nor ego, nor thought,
Nor am I ears or the tongue or the nose or the eyes,
Nor am I earth or sky or air or the light,
But I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva.

Na cha praana samgno na vai pancha vaayur,
Na vaa saptha dhathur na va pancha kosa,
Na vak pani padam na chopa stha payu,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.

Neither am I the movement due to life,
Nor am I the five airs, nor am I the seven elements,
Nor am I the five internal organs,
Nor am I voice or hands or feet or other organs,
But I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva

Na me dwesha raghou na me lobha mohou,
Madho naiva me naiva matsarya bhava,
Na dharmo na cha artha na kamo na moksha,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.

I never do have enmity or friendship,
Neither do I have vigor nor feeling of competition,
Neither do I have assets, or money or passion or salvation,
But I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva

Na punyam na paapam na soukhyam na dukham,
Na manthro na theertham na veda na yagna,
Aham bhojanam naiva bhojyam na bhoktha,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.

Never do I have good deeds or sins or pleasure or sorrow,
Neither do I have holy chants or holy water or holy books or fire sacrifice,
I am neither food nor the consumer who consumes food,
As I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva

Na mruthyur na sankha na me jathi bhedha,
Pitha naiva me naiva matha na janma,
Na bhandhur na mithram gurur naiva sishya,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.

I do not have death or doubts or distinction of caste,
I do not have either father or mother or even birth,
And I do not have relations or friends or teacher or students,
As I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva

Aham nirvi kalpi nirakara roopi,
Vibhuthwascha sarvathra sarvendriyanaam,
Na cha sangatham naiva mukthir na meya
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.

I am one without doubts, I am without form,
Due to knowledge I do not have any relation with my organs,
And I am always redeemed,
And I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva

पं रविशंकरजी का बजाया हुआ एक टुकडा

आज पूरा दिन संगीत सुनने में बिताया कितने ही गीत और बंदिश जो महीनों से नहीं सुने थे अपनी हार्ड डिस्क पर खोज खोज कर सुने और मन भरकर आनन्द लिया । आपको आनन्दमय करने के लिये पेश-ए-खिदमत है पं रविशंकर जी का बजाया हुया द्रुत गत पर राग अडारिनि (ये बहुत कुछ राग खमज जैसा है), बाकी जिनके कान की तैयारी हो चुकी है वो फ़र्क बता पायेंगे । हम तो वही कह रहे हैं जो सीडी के कवर पर लिखा है ।




कान की तैयारी: कहा जाता है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखने में बहुत से घरानों में पहले आपको संगीत सुनाया जाता है जिसमें आप उसकी बारीकियों को पकडते हैं, इसके बाद जब आपका कान तैयार हो जाता है उसके बाद गाना/बजाना सिखाया जाता है । मैं अभी कुछ रागों को ही सुनकर पकड पाता हूँ बाकी के लिये सीडी का कवर देखना पडता है :-)

गुरुवार, दिसंबर 11, 2008

ह्यूस्टन के जलील मौसम का हसीन तोहफ़ा !

ह्यूस्टन के मौसम को जलील कहने के कई कारण हैं । पहला कि यहाँ गर्मी और आद्रता दोनो बहुत रहती है जो हमारे जैसे दौडने वालों की पहली नाराजगी है । दूसरा ये कि यहाँ मौसम ३ दिनों में पूरी पलटी खा लेता है । मसलन सोमवार को टी-शर्ट पहनने वाला दिन था, मंगलवार को हल्की सी ठंड हुयी और बुधवार की सुबह का तापमान शून्य डिग्री । बुधवार को हल्की हल्की बारिश और जबरदस्त हवा चल रही है इसके चलते शून्य डिग्री तापमान -४ जैसा महसूस हो रहा था । मैं नहीं कह रहा ऐसा weather.com वाले कह रहे थे ।

शाम को लैब से निकले और पार्किंग लाट जाने के लिये बस के इन्तजार में थे । अचानक सडक पर कुछ सफ़ेद सा गिरता दिखा । पहले लगा कि मन का भ्रम है लेकिन नजदीक जाकर देखा तो रूई के फ़ोहे सा था जो हाथ लगते ही पिघल गया । ह्यूस्टन में हर ३-४ साल में एक दिन के लिये २५ दिसम्बर के आस पास बर्फ़ गिरती है लेकिन बहुत ही मामूली सी जिसका पता अगले दिन अखबार में चलता है । लिहाजा हमने अपने छाता खोलकर उल्टा किया और बर्फ़ सहेजने लगे, दस मिनट के इन्तजार के बाद जो चित्र बना वो आपके सामने है, :-)
हमने सोचा बस अभी अगले ही मिनट ये बन्द हो जायेगी और ऐसा सोचकर हम व्यायामशाला में Treadmill पर दौडने चले गये । १ घंटा दौडने के बाद, स्नान करके जब बाहर निकले तो देखा कि अभी भी बर्फ़ गिर रही है और अधिक तेजी से गिर रही है । तुरन्त सिर झुका कर ईश्वर को नमस्कार किया । मेरे जीवन में बर्फ़बारी देखने का ये पहला मौका था, इसलिये मेरी हालत एक ७-८ साल के बच्चे जैसी हो गयी थी । मैं बेतहाशा गिरती बर्फ़ में दौडने लगा । छाते को सिर पर रखने की बजाय राज कपूर जी के "प्यार हुआ इकरार हुआ" जैसे स्टाईल में घुमाने लगा और गाना भी गाने लगा । आस पास वाले लोग देखकर हंसने लगे और ताली भी बजाने लगे :-)

इसके बाद दौडते हुये अपनी कार तक पंहुचे तो वो बर्फ़ की चादर में ढक चुकी थी और किसी अनजाने ने उस पर X-Mas 2008, Houston भी अपनी उंगली से उकेर दिया था जिसे आप इस चित्र में देखें । इसके तुरन्त बाद धावक क्लब के अपने मित्रों से मिलने "वलहाला" पंहुचे तो वहाँ भी मस्ती का आलम था । हम लोगों ने थोडी बर्फ़ इकट्ठी करके बर्फ़ का गोल बनाया और "गोला-गोला" खेलने लगे । जिसे आप अगले कुछ चित्रों में देख सकते हैं ।


























अभी तक के सारे फ़ोटो सेलफ़ोन से लिये गये थे और अचानक मुझे ख्याल आया कि मेरा कैमरा लैब में रखा हुआ है । तुरन्त आधे मील की दौड लगाकर लैब से कैमरा उठाकर वापिस "वलहाला" आया गया और फ़िर अपने कैमरे से कुछ फ़ोटो और वीडियो बनाये गये जो आप नीचे देख सकते हैं ।









मंगलवार, दिसंबर 09, 2008

जिया मोइनुद्दीन की आवाज में सुनिये "धोबी"

पिछली पोस्ट पर आप सभी की टिप्पणियों का धन्यवाद । मेरा मन्तव्य किसी का भी सिगरेट/शराब पीने की तरफ़दारी करना नहीं लेकिन इसके पीछे की एक मानसिकता के पहलू को दिखाना था । बहरहाल अपने ज्ञानजी ने कहा है कि फ़िलहाल नारी वर्ग पर पोस्टों को विराम दिया जाये इसलिये पेश है एक हल्की फ़ुल्की पोस्ट :-)

इस पोस्ट में आप जिया मोइनुद्दीन की आवाज में सुनिये "धोबी", आशा है आपको पसन्द आयेगी ।

सोमवार, दिसंबर 08, 2008

अरे महिला/लडकी होकर सिगरेट पीती हो !!!

आज आदर्श की एक ईमानदार पोस्ट देखी मन खुश हो गया । इससे पहले कुछ दिन पहले आदर्श के ब्लाग पर जैसे ही क्लिक किया पूरा कमरा हिल गया था, "प्याला प्याला मय का प्याला" उनका ब्लाग खोलते ही अपने आप ही बजने लगता है । आदर्श की पोस्ट बडी सामयिक होती हैं और उनकी साफ़गोई का मैं कायल हूँ । ये पोस्ट मैं आदर्श की पोस्ट के जवाब में नहीं लिख रहा हूँ बल्कि इसको लिखने की तैयारी बहुत दिनों से थी ।

अक्सर बहुत से लोगों को किसी महिला को सिगरेट पीते देखते ही उनके स्वास्थय की चिन्ता होने लगती है । इसका तर्क/कुतर्क भी होता है कि सिगरेट बहुत हानिकारक होती है । माना सिगरेट हानिकारक होती है लेकिन ये हानि महिला और पुरूष में भेद नहीं करती । सिगरेट पीना एक व्यक्तिगत निर्णय है जिसकी कीमत हर सिगरेट पीने वाला समझता है, ठीक उसी तरह जिस तरह हर शराब पीने वाला, Rash Driving करने वाला या फ़िर किसी अन्य जोखिम वाले जीवन पद्यति को जीने वाले उनके जोखिम को समझते हैं । फ़िर किसी महिला को सिगरेट पीते देखकर ही हमारा ज्ञान क्यों जागृत हो जाता है ? यहाँ अमेरिका में भी बहुत से लोग किसी लडकी का बीयर पीना तो पसन्द कर लेंगे लेकिन सिगरेट पर कभी कभी उनकी भी भावनायें जाग जाती हैं । हम तो कहते हैं असली बराबरी है कि कैंसर हो तो लडकी को भी हो, इसकी चिंता करने की आपको कोई आवश्यकता नहीं है । क्या आप चिन्ता करते हैं जब मजदूरी करती किसी महिला को पुरूषों के साथ बैठकर बीडी फ़ूँकते देखते हैं । आपका दर्शन/चिन्तन उस समय जगता है क्या ?

यहाँ कालेज की एक मैगजीन में एक लडकी ने लिखा था कि एक बार वो सिगरेट पी रही थी और एक अन्य व्यक्ति बाजू से गुजरा और उसने कहा "You know, this is harmful for your lungs" | इस पर लडकी ने कहा, "Thank you Sherlock Homes, I didn't know that"

कुछ लोग इस मुद्दे पर अन्य प्रकार से भी चुटकी लेते हैं और कहते हैं कि केवल आधुनिक कपडे पहनने से, सिगरेट और शराब पीने से कोई लडकी/महिला आधुनिक और स्वतंत्र नहीं हो जाती । वो कहते हैं कि उन्होने बहुत सी So called आधुनिक लडकियों को आधुनिक कपडों में असहज होते देखा है । लेकिन उन्होने कभी जून की गर्मी की शादी में Double Breasted Suit और टाई लगाये दूल्हों और रिश्तेदारों को असहज होते नहीं देखा होगा । इसका अर्थ है कि स्वतंत्रता भी वही है जिसे उनकी स्वीकृति हो, क्या किसी और को कोई विरोधाभास नहीं दिख रहा ?

स्वतंत्रता वो है कि महिला अपने फ़ैसले खुद करे और सारे फ़ैसले खुद कर सके । उसे कैसी नौकरी करनी है, कहाँ पढाई करनी है, किसके साथ विवाह करना है, किसी रिश्तेदार को नमस्ते करनी है कि नहीं और जो भी आपके मन में आये । अगर उसे लगे कि सिगरेट पीना है तो पिये, शराब पीनी है तो पिये, शादी से पहले ब्याय फ़्रेंड बनाना है तो बनाये उसके साथ संबन्ध बनाने हैं तो बनाये । हम कौन होते हैं इसके बीच में बोलने वाले ?

ये ठीक उस प्रकार वाली बात है जो मेरे एक पुराने रूममेट ने कही थी कि लोग चाहते हैं कि शादी के लिये लडकी सुन्दर भी हो, सुशील भी हो, घर वालों की इज्जत भी करे, इंटलेक्चुअल हो कि मेरी फ़िलासिफ़कल बातों में बोर न हो लेकिन इतनी भी नहीं कि मुझे पलट कर जवाब दे, कमा कर भी लाये लेकिन काम में इतना मन न लगाये कि पति और घर पर ध्यान न दे पाये, खान बनाना और घर के काम तो उसे संभालने चाहिये ही ।

You Know What? There are no free lunches in this world. Everything has consequences. एक जान पहचान के व्यक्ति हैं, उनकी पत्नी से सम्बन्ध विच्छेद होने पर उन्होने कहा कि आजकल भारत में ९०% तलाक के मामलों में लडकी दोषी है । और उनकी नजर में लडकी इसलिये दोषी है कि वो ससुराल की जायज और नाजायज बातों को नहीं मानती, पति ने अगर हाथ उठाने कि कोशिश की तो बोल देती है "Don't even think about that". चिन्ता मत कीजिये, नारी जागृत हो रही है और इसका सामाजिक बदलाव खूब देखने में आ रहा है । हो सकता है कि इसके पूरे परिणाम मैं अपनी जिन्दगी में भी न देख पाऊँ तो क्या, कम से कम आज तो जी भरकर चिल्लाकर कहने को मन कर रहा है कि:

नारी तुम सबला हो, अपनी शक्ति पर भरोसा रखो और जिस बात पर तुम्हारा मन राजी हो वो करो । सही और गलत के फ़ेर में तो इन्सान हजारों सालों से पडा है उससे पार पाना मुश्किल है । लेकिन सुनो सबकी और करो अपने मन की ।

शुक्रवार, दिसंबर 05, 2008

समवन हैड ए टफ़ डे, टैल मी अबाउट इट !!!



पिछले हफ़्ते स्कूल से घर आते समय सोचा कि चलो कुछ खरीददारी (दूध, कार्नफ़्लेक्स, केले आदि) की जाये । सामान चूँकि कम था तो पैसे भरने के लिये Express Lane (१५ सामान या कम) में खडे हो गये । एक मिनट के बाद नजर घुमायी तो देखा कि एक बेहद क्यूट सी बाला हमारे पीछे खडी थी । नजर मिली तो "Hi" कह दिया और देखा कि वो कन्या सिर्फ़ एक चाकलेट का पैक लेकर खडी है ।
मैने चाकलेट की तरफ़ इशारा किया और पूछा,

Thats it?

कन्या ने कन्धे उचका दिये और कहा कि "Yea, I guess"

हम: You can go ahead and pay before me.

कन्या: Thanks. Are you sure?

हम: Yea, its okay.

अब कन्या हमारे आगे खडी हो गयी तब हमने ध्यान दिया कि कन्या के कन्धे पर एक छोटा सा पर्स लटक रहा था । कन्या ने एक हाथ से चाकलेट (असल में डार्क चाकलेट) और दूसरे हाथ से स्टारबक्स की काफ़ी थाम रखी थी । पैसे निकालने के लिये उसने पर्स में हाथ डाला तो काफ़ी का गिलास छलकने लगा । मैं मुस्कुराया और कहा कि


Let me hold this for you.

कन्या: Thanks.

इसके बाद पैसे चुकाने के बाद जब कन्या को उसकी काफ़ी का गिलास थमाया तो मैने धीरे से मुस्कुराकर कहा ।

Hot coffee and dark chocolate. Looks like someone had a tough day.

कन्या: फ़िर मुस्कुरायी और बोली । टफ़ डे (Sigh...), टैल मी अबाउट इट !!!

और इसके बाद बाय बाय करके वो अपने रास्ते और मैं अपने रास्ते ।


डिस्क्लेमर: इस कन्या का चित्र इंटरनेट से उठाया है लेकिन उस कन्या ने भी कुछ कुछ ऐसा ही कोट (असल में Pea coat) पहना हुआ था | रचना जी ने चिट्ठा चर्चा पर कन्या के चित्र पर आपत्ति जताई थी । जब मैने चित्र खोजा था तो इस चित्र को इसलिये लिया था कि ये एक विज्ञापन का चित्र था । लेकिन इतना काफ़ी नहीं है, रचना जी की बात से सहमति है और इसके लिये चित्र के स्थान पर उस चित्र का कार्टून प्रयोग कर रहा हूँ ।

अजीज मियाँ की आवाज में खूबसूरत गजल !!!

पाकिस्तानी कव्वाली गायिकी में एक नाम अज़ीज मियाँ का भी आता है । अज़ीज मियाँ की कव्वालियाँ बहुत देर से सुनना शुरू किया लेकिन एक बार सुना तो बस डूबकर रह गये । जैसे उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान अपनी कव्वालियों में शास्त्रीय संगीत के उस्ताद के तौर पर जाने जाते हैं, अज़ीज मियाँ की आवाज में एक अजीब सी मस्ती और खाँटीपन है । अन्दाजे बयाँ की बात करें तो बस समझिये कि दिल निकाल के रख दिया है ।

लीजिये पेश-ए-खिदमत है अज़ीज मियाँ की आवाज में एक गजल (गजल थोडी लम्बी जरूर है लेकिन सुनने वालों के पैसे वसूल होने की गारंटी) । अगर ये पेशकश आपको पसन्द आयी तो आगे भी अज़ीज मियाँ की कव्वालियाँ सुनवायी जायेंगी :-)

फ़ुटकर शेर:

मजा बरसात का चाहो मेरी आंखो में आ बैठो ।
सुफ़ेदी है सियाही है शफ़क है अब्र-ए-बारम है ।

मजा बरसात का चाहो मेरी आंखो में आ बैठो ।
वो बरसों में कहीं बरसे ये बरसों से बरसती हैं ।

गजल:

उनकी आंखों से मस्ती बरसती रहे,
होश उडता रहे दौर चलता रहे ।

रक्से तौबा करे जामे बिल्लौर में,
रिंद पीते रहें शैख जलता रहे ।

वो उधर अपनी जुल्फ़ें संवारा करें,
और इधर दम हमारा निकलता रहे ।

तुम मेरे सामने आओ तो इस तरह,
तेरा पर्दा रहे मुझको दीदार हो ।

आप बन के चिलमन में बैठा करें
हुस्न छन छन के बाहर निकलता रहे ।

मयकदा तेरा साकी सलामत रहे,
आज तो जाम पर जाम चलता रहे ।

बुधवार, दिसंबर 03, 2008

एक और हल्की फ़ुल्की पोस्ट !!!

बचपन में हमारे खेल आंगन और मोहल्ले/कालोनी की गलियों पर ही खेले जाते थे । और घरवालों की न-न के बावजूद इसे सबकी रजामंदी प्राप्त थी । शाम होते ही सब बच्चे अपने अपने घर से निकलकर और आस पडौस से बुलाकर टीम तैयार कर लेते थे । कुछ बच्चों के पापा खडूस थे तो किसी किसी बच्चे की मम्मी, ऐसे में पढने लिखने वाले सीधे शरीफ़ (अर्थात मैं) बच्चों को दूसरों के घर भेजा जाता था ।

हमारे प्रिय खेल थे, खो-खो, चोर सिपाही और अंधेरा हो जाने के बाद "आईस-पाईस" । सब इसे आईस-पाईस भी कहते थे तो हमने भी आईस-पाईस कहना शुरू कर दिया । इसमें एक बन्दे को बाकी छुपे अन्य बच्चों को खोजना होता था ।

पिछले महीने एक मीटिंग में गया तो वहाँ "आईस ब्रेकर अथवा परिचय" के दौरान एक चिट पर अपना नाम और अपना पसंदीदा टी.वी. शो लिखना था । लोगों से दुआ सलाम होते होते एक बुजुर्ग से सामना हुआ तो उनका पसंदीदा शो था "I Spy". मुझे थोडी हैरत हुयी तो उनसे बातचीत होने लगी । उन्होने बताया कि वो अब टी.वी. नहीं देखते लेकिन उनके बचपन (1970's) में टी.वी. पर बच्चों के लिये "I Spy" नाम का कार्यक्रम आता था । कार्यक्रम के बारे में पूछने पर पता चला कि ये तो हमारा खेल "आईस पाईस" ही था :-)

अभी मुम्बई हमलों के दौरान टी.वी. पर देखा कि "Black Clad" कमांडोज आपरेशन में लगे हुये हैं । तुरन्त दिमाग की घंटी बजी कि बचपन में इन्हे हम "Black Cat" कमांडोज कहते थे ।

क्या आपके साथ भी ऐसी कुछ यादें जुडी हुयी हैं ? अगर हाँ तो जरूर बतायें ।

रविवार, नवंबर 30, 2008

एक और खिचडी पोस्ट !!!

ह्यूस्टन मैराथन अब केवल ७ हफ़्ते दूर है । आखिरी के तीन हफ़्ते टेपर ट्रेनिंग (Taper training) के होंगे । टेपर ट्रेनिंग का मतलब है कि आप आखिरी तीन हफ़्तों में अपनी ट्रेनिंग को धीरे धीरे कम करते हैं जिससे आपका शरीर पिछले ५ महीने की ट्रेनिंग के कष्ट (Stress) से उबर कर मैराथन दौड के लिये बिल्कुल तैयार रहे । इसका एक मतलब और ये है कि अब केवल ४ हफ़्तों की कष्ट दायक (हफ़्ते में ६५-७० किमी दौडना) ट्रेनिंग बाकी है ।

आज सुबह १८ मील (~२९ किमी) की लम्बी दौड के दौरान मेरे एक मित्र ने कहा ।

Neeraj, so now India must be really pissed and guess Pakistan is gonna have a real tough situation.

एक अन्य मित्र मे टिप्पणी की ।

Pakistan could be in deep s***.

ह्यूस्टन के प्रमुख अखबारी वेबसाईटों पर भी लोगों की टिप्पणियों से अनुमान लगा कि वे लोग सोच रहे हैं कि अब भारत इसका बदला पाकिस्तान से जरूर लेगा ।

और इधर मैं हूँ जिसे खुद भरोसा नहीं है कि भारत कुछ करेगा भी कि नहीं और यदि कुछ करेगा तो क्या ?

खैर....

आज दौड के दौरान इत्तेफ़ाक से एक भी महिला हमारे साथ नहीं दौड रही थी और इसका नतीजा हुआ कि बातों का सिलसिला Slippery Slope पर फ़िसलता चला गया, ऐसा नहीं है कि जब महिलायें साथ में होती हैं तो बडी सलीकेदार बाते होती हैं :-) बस समझ लीजिये कि दौडने के दर्द को कम करने के लिये बातों का ही तो सहारा होता है :-) सबने मजेदार चुटकुले/किस्से सुनाये, उम्र में सब मुझसे बडे थे लेकिन लगभग सभी से व्यक्तिगत जान पहचान बन गयी है तो कोई असुविधा नहीं थी । इसी सिलसिले में बात फ़िटनेस, भोजन पर आयी और पैट्रिक ने सटीक टिप्पणी की ।

We should treat our bodies as a temple for us but rather we treat it as amusement park.

मैने चुटकी ली,

And runners treat it as a free pass to amusement park, :-)

अन्यथा कौन बेवकूफ़ रविवार के दिन सुबह पाँच बजे उठकर छ: बजे पार्क में आकर २.५-३ घंटे दौडेगा ।

क्लेटन ने कहा:

At least we will not die of heart attack sitting on a couch.

इस पर स्टीव बोले,

But, we may die of a failed liver due to all that beer we drink after the run.

पैट्रिक:

By the way, Simon is buying beer this Wednesday to celebrate his engagement.

इस पर सब हंसे और एक मत से स्वीकार किया गया कि खराब लीवर से मिली मौत दिल के रूकने वाली मौत से श्रेष्ठ है और सभी बुधवार की दौड के बाद मिलने वाली मुफ़्त बीयर के सपनों में खो गये :-)

शुक्रवार, नवंबर 28, 2008

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नजर नहीं आती

डिस्क्लेमर: आप भले ही विश्वास न करें लेकिन नीचे लिखी घटना अक्षरश: सत्य है । और सम्भवत: ये एक लम्बी पोस्ट भी हो और बिल्कुल बेमतलब जिसका यथार्थ से कोई वास्ता न हो ।

बात सन ९२ के आस पास की है । जम्मू और कश्मीर में उस समय लगभग रोज ही बम विस्फ़ोट होते थे । दूरदर्शन पर सुनना कि "स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियन्त्रण में है" आम बात होती थी । उस समय हम शाहजहाँपुर में रहते थे । हम कक्षा ६-७ में पढा करते थे और घर से स्कूल का लगभग ५-६ किमी का सफ़र रिक्शे पर तय किया करते थे । रास्ते में खन्नौत नदी पडती थी जिस पर दो पुल बने हुये थे । एक दिन रिक्शे पर बैठे बैठे विचार आया कि आतंकवादी जम्मूकश्मीर में बम फ़ोडते हैं जहाँ इतनी पुलिस है, एक बम से खन्नौत का पुल उडा दें तो कम से कम २ महीने के लिये स्कूल की छुट्टी । और खन्नौत का पुल उडाना भी आसान है क्योंकि दूर दूर तक कोई पुलिस वाला नहीं रहता है । रिक्शे पर बाकी बच्चों ने भी इस चर्चा में भाग लिया और कुछ ने कहा कि शायद ३-४ महीने की छुट्टी हो जाये तो कुछ ने कहा कि पापा दूसरे स्कूल में नाम लिखा देंगे ।

उसी दिन शाम को स्कूल से घर लौट कर पिताजी का इन्तजार करते रहे । पिताजी घर आये तो उनसे भी यही सवाल पूछा कि वो ऐसी जगह बम क्यों नहीं रखते जहाँ कोई न पकडे और उनका काम भी हो जाये । पिताजी ने कहा कि शाहजहाँपुर में बम फ़टेगा कि कोई खास ध्यान नहीं देगा लेकिन जम्मू-कश्मीर का बडा नाम है इसीलिये ऐसा करते हैं । तभी टी.वी. पर एक कार्यक्रम आने लगा और सारी बातचीत खत्म ...

याद दिला दें कि ये वही शाहजहाँपुर है जहाँ काफ़ी बडी मुस्लिम आबादी होने के बाद भी ९२ के बाद हिन्दू और मुस्लिमों में एक भी मुढभेड नहीं हुयी थी और न ही एक भी दिन के लिये कर्फ़्य़ू लगा था ।

लेकिन आज मुझे खन्नौत के पुल की सच में बहुत चिन्ता हो रही है । ब्रेकिंग न्यूज, टेली कम्यूनिकेशन की क्रान्ति के बाद कोई भी जगह ५ मिनट में आम से खास हो सकती है । क्या आतंकी भी इसी योजना के सहारे चल रहे हैं ?
विस्फ़ोट की जिम्मेवारी लेने सरीखा काम भी केवल सनसनी फ़ैलाने वाला है । जब ब्रेकिंग न्यूज से सनसनी फ़ैल ही रही है तो अपना नाम भी क्यों बतायें । आज डेक्कन मुजाहिदीन तो कल शाहजहाँपुर मुजाहिदीन तो परसों औरैया मुजाहिदीन । कर लो जो करना है, हम नहीं बतायेंगे कि हमने किया है । आतंक सबसे भयावह होता है जब वो आपकी आंखो में हो, आप दिल में हो कि कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है । क्या करेंगे ऐसे में आप ?

आप अपने शहर का उदाहरण उठा कर देख लीजिये जहाँ भी आप रहते हों, क्या आप सुरक्षित हैं ? आपके आस पडौस कि रिक्शे/टैम्पों में चार आतंकवादी बैठ कर जा रहें हो तो क्या आप उन्हें पहचान लेंगे ? उनके सिर पर सींग तो नहीं होते ? पिछले कुछ सालों से देखें तो ऐसी ऐसी जगह आतंकी हमले हुये हैं जिनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता, छोटे छोटे शहर, एकदम आम ... और इसके बाद ये दिल दहला देने वाली मुम्बई की घटना । हर आँख में आतंक का साया और देश की खूफ़िया एजेंसियाँ पूरी तरह से बेखबर ।

इसका हल क्या है ? कुछ ने कहा कि पीओके पर हमला बोल दो । उससे क्या होगा ? पोटा के बारे में दिनेशजी पहले ही एक पोस्ट लिख चुके हैं । हम हताशा में बस अगले दिन उठकर काम पर ही चल सकते हैं कि देख लो नहीं डरा मुम्बई, मुम्बई के जज्बे को सलाम और फ़िर इन्तजार में कटते दिन और रात ।

केवल एजेन्सियाँ बना देने से काम नहीं होगा । जो हवलदार ५०० रूपये लेकर ट्रक को बिना चैक कर जाने दे रहा है कि कागज पर सेब लिखा है लेकिन असल में टैक्स बचाने के लिये मसाले भरे हैं, उससे आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि अगली बार वो गोलियों से भरा ट्रक रोक लेगा । २०० रूपये लेकर ड्राइविंग लाईसेंस और राशन कार्ड बनाने वाला अनजाने में एक आतंकवादी को भारत का नागरिक नहीं बना देगा इसकी क्या गारण्टी है ? जब तक जनता ईमानदार नहीं होगी अगर फ़रिश्ते भी हमारी सेवा में लग जायें तो सुरक्षा की कोई गारण्टी नहीं दे सकता ।


आज मैं अपने पाठक गणों को गृहमंत्री बना रहा हूँ, अपनी प्रतिक्रिया दीजिये कि आप क्या करेंगे ? केवल भावनाओं में बहकर नहीं ठंडे दिमाग से सोचकर जवाब दीजिये क्योंकि मेरे पास केवल सवाल हैं ।

तुम आज कुछ भी न पूछो कि दिल उदास बहुत है !!!

अक्सर मैं भावनाओं के प्रवाह में कुछ भी लिखने से बहुत गुरेज करता हूँ लेकिन,

तुम आज कुछ भी न पूछो कि दिल उदास बहुत है :-( :-( :-(

बुधवार, नवंबर 19, 2008

एक नैनो पोस्ट !!!!

आज का सबक:
ईमेल/ब्लाग पोस्ट/महत्वपूर्ण पत्र लिखने के बाद प्रूफ़रीड अवश्य करें । आज एक ईमेल का जवाब देते समय उठकर कहीं जाना हुआ और वापस लौटते ही जल्दबाजी में भेजने के चक्कर में ऐसा कुछ लिख गये कि पढने वाले ने भी सोचा होगा कि क्या दारू पीकर लिखा है :-)

लिखना चाहते थे,

Few folks in my dept. have complained that CHBE is not listed in
the department lists. Is it possible to add it to the list?

जल्दबाजी में लिखा,

Few folks in my dept. complained that there is CHBE is not listed in
the department. Is it possible to add it to the list?

अब बहाना बनाना पडेगा कि हिन्दी ब्लाग पढ पढ के अंग्रेजी कमजोर हो गयी :-)

नीरज,

P.S: कम से कम २५ पोस्ट लिखने का इन्तजार कर रही हैं, जल्दी ही लिखना शुरू करना पडेगा । सागरभाईजी, जल्द ही महफ़िल पर आपका हाथ बंटाने हाजिर होऊँगा, आप आजकल जो नायाब हीरे सुनवा रहे हैं उसके लिये बधाई और महफ़िल का नया लुक भी बडा शानदार लग रहा है ।

रविवार, नवंबर 09, 2008

२५ किमी: २ घंटा १ मिनट और ४४ सेकेंड्स !!!

अब ह्यूस्टन मैराथन लगभग २ महीना और १ हफ़्ता दूर है । तैयारियाँ जोर पकड रही हैं, ट्रेनिंग रन लम्बे और ज्यादा लम्बे होते जा रहे हैं । हफ़्ते का कोटा ४८ किमी से बढकर ५५-६० किमी तक पंहुच रहा है । इसी सिलसिले में आज मैने एक २५ किमी की दौड दौडी । इस दौड में ८.३३३ किमी के रास्ते के तीन चक्कर लगाने थे । ये मेरी अब तक की सबसे लम्बी बिना रूके दौड थी और अब ये सिलसिला बढते बढते ४२.२ किमी तक जाकर रूकेगा ।

सबसे पहले कुछ तैयारियाँ और सबक जो मैने इस दौड के लिये तैयार किये । मैने अक्सर महसूस किया है कि मैं शुरूआत में काफ़ी तेजी से दौडना शुरू करता हूँ जिसके कारण कभी कभी बीच में मुझे अपनी रफ़्तार धीमी करनी पडती है । मैने फ़ैसला किया था कि आज पहला ८.३३३ किमी मैं धीमे दौडूँगा और उसके बाद रफ़्तार पकडी जायेगी । इसके अलावा मुझे बहुत ज्यादा खाने का शौक नहीं है जिसके चलते लम्बी दौडों में अक्सर अन्त में ऐसा लगता है कि अपने पेट/खून के टैक में पेट्रोल (ग्लाईकोजन -> ग्लूकोज) खत्म सा हो रहा है । इसके लिये पिछले पूरा हफ़्ता मैने जमकर खाना खाया । कल दोपहर में भारतीय रेस्तराँ में मन और पेट को दबा दबा कर भरा फ़िर रात में एक बडा सा सैंडविच खाया ।

आज सुबह सुबह मैं ६:३० पर नियत स्थान पर पंहुच गया था । हमेशा की तरह आज भी John Phillips और साथियों अपने धावक क्लब का तम्बू खडा कर रखा था । हम सब अपना बाकी सामान टैंट में छोडकर ६:४५ पर आरम्भ पंक्ति पर आ गये । अमेरिका के राष्ट्रगान के पश्चात अफ़गानिस्तान और ईराक में लड रहे उनके सैनिकों को याद करके ठीक सात बजे बन्दूक की आवाज पर दौड प्रारम्भ हो गयी ।



( हमारे धावक क्लब का तम्बू )

पहले दो किमी पलक झपकते ही पूरे हो गये, अब दौडने वाली मांशपेशियाँ धीरे धीरे अपने सुर/ताल में आ रही थीं । पाँच किमी पूरे हुये और मुझे अपने आप को धीरे दौडने के लिये याद दिलाना पड रहा है क्योंकि जब लोग दौड में आपसे आगे निकलते हैं तो बहुत अच्छा नहीं लगता वो भी तब जब आप चाहें तो तेज दौडकर उनको पीछे छोड सकते हैं । कुछ हफ़्ते पहले मेरे एक धावक मित्र ने मुझे एक मंत्र दिया था । उन्होने कहा था कि २५ किमी की दौड में तुम पहले १० किमी में २ मिनट बचाकर बाकी १५ किमी में ५ मिनट गंवाना पसन्द करोगे कि पहले १० किमी में ३ मिनट गंवाकर बाकी १५ किमी में ६ मिनट बचाना । इसी को मन में याद रखते हुये मैं धीरे धीरे दौडता रहा । पहला लूप समाप्त हुया और ८.३३३ किमी दौडने में ठीक ४३ मिनट का समय लगा ।

दूसरे लूप में मैने अपनी रफ़्तार थोडी तेज की लेकिन अभी भी डर लग रहा था कि बहुत तेज नहीं दौडना है । दूसरे लूप को दौडने में सबसे अधिक आनन्द आया । जो लोग पहले लूप में तेजी से दौड रहे थे वो अब रफ़्तार कम कर रहे थे और इसले उलट मैं धीरे धीरे रफ़्तार बढा रहा था । दूसरे लूप को पूरा करने में ४० मिनट और १८ सेकेंड्स लगे ।


अब एक आखिरी लूप बाकी था । मैने निश्चय किया कि आखिरी लूप को पूरी जी जान लगाकर दौडना है । इसी लूप में एक महत्वपूर्ण मार्क हाफ़ मैराथन यानि २१.१ किमी का था ।  पिछले साल हाफ़ मैराथन दौडने मैं मुझे १ घंटा ५३ मिनट लगे थे । आज की दौड में हाफ़ मैराथन तक आने में मुझे १ घंटा और ४३ मिनट लगे । इसका मतलब १ साल में इतना दौडने से कुछ तो रफ़्तार बढी है । आखिर के पाँच किमी में मैं काफ़ी तेज दौड रहा था और लगभग हर १५ सेकेंड्स में एक धावक से आगे निकल रहा था । मैने घडी पर नजर डाली तो ठीक दो घंटा और समाप्ति की रेखा दिखायी दे रही है । आखिरी ०.४ किमी मैं पूरी तेजी से दौडा और इस लूप को ३८ मिनट और २६ सेकेंड्स में पूरा कर लिया ।


पहले लूप (८.३३३ किमी) में १ किमी दौडने का औसत समय: ५ मिनट ९.६ सेकेंड्स

दूसरे लूप (८.३३३ किमी) में १ किमी दौडने का औसत समय: ४ मिनट ५०.२ सेकेंड्स

तीसरे लूप (८.३३३ किमी) में १ किमी दौडने का औसत समय: ४ मिनट ३६.७ सेकेंड्स

पूरी २५ किमी की दौड का समय : २ घंटा १ मिनट ४४ सेकेंड्स

पूरी २५ किमी की दौड में १ किमी दौडने का औसत समय: ४ मिनट ५२ सेकेंड्स




                                           (दौड पूरी होने के बाद अपने मित्रों के साथ एक फ़ोटो हो जाये )


दौड के बाद एक जर्मन थीम पार्टी भी थी जहाँ पर हमने भी हरी टोपी में एक फ़ोटो खिंचवाया :-)




                                                              (अरे, साला मैं तो साहब बन गया :-) )

बुधवार, अक्तूबर 29, 2008

जिन्दगी का उत्सव मनायें, कल न जाने क्या हो !!!

बुधवार को ६.६ मील दौडने के बाद हमारे धावक समूह के सभी लोग वलहाला पर एकत्रित होते हैं । अगर धावक समूह में से किसी का जन्मदिन/शादी की सालगिरह होती है तो वो व्यक्ति वलहाला पर पूरे समूह के लिये बीयर खरीदता है । आज दौड समाप्त होने के बाद पता चला कि "मिट (Mit)" सभी के लिये बीयर खरीद रहे हैं । सभी लोगों ने सोचा कि शायद "मिट" का जन्मदिन होगा और इस तरफ़ ध्यान न देकर सभी बीयर पीने में मस्त रहे । उसके करीब १ घंटे बाद "ईडी (Eddie)" ने कहा कि "मिट" कुछ बोलना चाहते हैं तो सभी ने सोचा कि शायद "मिट" कहेंगे कि आज उनका जन्मदिन है अथवा उनकी शादी की सालगिरह है ।


लेकिन "मिट" ने जो कुछ भी कहा उसने मुझे और बाकी सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया । इसी ४ अक्टूबर को एक कार दुर्घटना में "मिट" ने अपनी २१ वर्षीय पुत्री को खो दिया । आज "मिट" ने अपनी पुत्री की याद में सभी के लिये बीयर खरीदी और कहा कि हमें "जिन्दगी" को मनाना चाहिये क्योंकि पता नहीं कि जीवन कब क्या दिखा दे । सब लोग ये सुनकर स्तब्ध थे क्योंकि किसी ने ऐसा सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई व्यक्ति अपनी २१ वर्षीय पुत्री के शोक में ऐसा भी कर सकता है । कुछ देर के लिये पूरे माहौल में शान्ति छा गयी और इसके बाद खुद "मिट" ने माहौल को हल्का करने की कोशिश की ।

इसके बाद मैं "मिट" से मिला और उन्हे अपनी संवेदनायें अर्पित की । लेकिन उसके बाद पूरे समय मैं सोचता रहा कि वास्तव में हम जीवन को कितना Taken for granted लेकर चलते हैं । अगर कल को मेरे साथ कुछ ऐसा घटित हो जाये तो मेरे माता-पिता का क्या होगा ये सोचकर ही मन विह्वल हो उठा । लेकिन जीवन है तो उसकी अपनी विशिष्टतायें हैं और आज मैं मिट की तरह जीवन को सलाम करता हूँ ।

ये मिट को दो फ़ोटो हैं जो मैने कुछ समय पहले अपने कैमरे में कैद किये थे ।



                                                  (आज से कई हफ़्ते पहले मैं और मिट साथ में )

                                                      (अपनी दौड में ईनाम जीतने के बाद मिट और ईडी सथ में )

मंगलवार, सितंबर 30, 2008

हारा (Harra) क्रास कंट्री रेस: ज्ञानजी से प्रेरित होकर हमारी माइक्रो पोस्ट !!!

इस शनिवार को हमने एक ८ मील की दौड में भाग लिया । ये एक रिले रेस थी जिसमें टीम के चारों प्रतिभागियों को २ मील (३.२ किमी) दौडना था । हमारी टीम का नाम था Cone of Uncertainty | मेरी टीम में मेरे अलावा हरदीप, साईमन और ब्रायन थे । दौडने के क्रम के हिसाब से हरदीप, ब्रायन, नीरज और अन्त में साईमन दौडे । इस दौड के २ मील के सफ़र में रास्ता समतल न होकर ऊँचा नीचा था । एक छोटा सा हिस्सा इतना स्टीप (Steep) था कि लगभग २५-३० मीटर पैदल चलना पडा । मैने अपने हिस्से के २ मील १४ मिनट और २८ सेकेंड्स में पूरे किये और हमारी टीम ने इस दौड (८ मील) को ५६ मिनट और ५३ सेकेंड्स में पूरा किया ।

मैने इस दौड को पिछले साल भी दौडा था और तब मुझे इसे दौडने में १६ मिनट लगे थे । इस लिहाज से देखा जाये तो १ साल में १.५ मिनट का सुधार हुआ है । इसके अलावा कल ही मैने अपनी मैराथन दौड की ट्रेनिंग दौड में अपना व्यक्तिगत रेकार्ड तोडा । मैने ४.१ मील (६.५६ किमी) की दौड २९ मिनट में समाप्त की, इसी दौड के लिये मेरा पिछला रेकार्ड ३० मिनट और ११ सेकेंड्स का था । इस लिहाज से देखा जाये तो एक मील दौडने में केवल ७ मिनट और ५ सेकेंड्स लगे जो काफ़ी सुधार है ।

असली प्रतियोगिता १८ जनवरी में है (ह्यूस्टन मैराथन) जिसमें बिना रूके २६.२ मील (४२.२ किमी) दौडना होगा । अभी के हिसाब से लग रहा है कि इसको पूरा करने में ३ घंटे ४५ मिनट से ४ घंटे का समय लगेगा । लेकिन मैराथन दौड बडी लम्बी और दुरूह होती है इसलिये अगर आप अन्त के ३ मील में भी चोटिल हो जायें तो पूरे छ: महीने की तैयारी का कूडा । इस दौड के लिये अब तक ट्रेनिंग में मैं लगभग ३०० मील दौड चुका हूँ (३ महीने में) और अगले चार महीने में अगले ५०० मील दौडने का इरादा है । फ़िलहाल एक हफ़्ते में लगभग ३० मील तक दौड पा रहा हूँ जिसे नवम्बर और दिसम्बर में ४० मील प्रति हफ़्ता तक करने का इरादा है ।

मैराथन ट्रेनिंग के बाकी किस्से बाद में तब तक आप उन फ़ोटो का लुत्फ़ लें जो मैने शनिवार को दौड के दौरान खीचें :-)

शनिवार, सितंबर 13, 2008

आइक से मुलाक़ात का विवरण और कुछ तस्वीरें !!!

आइक महोदय रात को हमारे घर तशरीफ़ लाये लेकिन आने से थोडी देर पहले उन्होंने हमारी बत्ती गुल कर दी | लिहाजा आइक और हमने मोमबत्ती में गुफ्तगू की, हमने आइक को हिन्दी में एक ब्लॉग खोलने को कहा जिस पर वो विचार कर रहे हैं :-)

रात को बारह बजे बत्ती गुल हो गयी थी जो अभी तक गुल है, शायद अगले कुछ घंटों में सब ठीक हो जाए | सुबह उठकर अपना रेनकोट पहनकर हम जब आस पड़ोस के हाल का जायजा लेने निकले तो पता चला की काफ़ी नुक्सान हुआ है | हमारी कार के बिल्कुल बगल में पेड़ का एक बड़ा हिस्सा टूट कर गिरा लेकिन हमारी कार बाल बाल बच गयी | हमारे अपार्टमेन्ट के सामने एक पेड़ जमीन पर लगभग समतल पडा था | और पेट्रोल पम्प की छत उड़ गयी थी और बाकी का हाल आप इन तस्वीरों से देख लें :-)

इस पोस्ट को मैं अपने मित्र के घर से लिख रहा हूँ जहाँ पता नहीं कैसे अभी तक बत्ती आ रही है :-) टेक्सास में लगभग ४० लाख लोगों के पास फिलहाल बिजली नहीं है लेकिन कल तक शायद सब ठीक हो जायेगा |

शुक्रवार, सितंबर 12, 2008

आशा भोंसले की आवाज में मदन मोहन के तीन अमर गीत !!!

जब जब मदन मोहन के संगीत का जिक्र होता है साथ में हमेशा लता मंगेशकरजी की बात होती है । ठीक उसी तरह ओ. पी. नैय्यर साहब के संगीत के साथ आशा भोसले का नाम अपने आप जुबां पर आ जाता है । लेकिन ये भी सत्य है कि आशा भोंसले ने भी मदन मोहन और गीता दत्त ने ओ. पी. नैय्यर के साथ अनेकों अनमोल नग्में गाये हैं ।

मदन मोहन जी के २० साल के संगीत के सफ़र में उनके साथ आशा भोंसले ने १९० और लता मंगेशकर ने २१० फ़िल्मी गीत गाये । कुछ दिन पहले आशा भोसले का जन्मदिन था लेकिन अपनी व्यस्तता के चलते मैं कुछ पोस्ट नहीं कर पाया । आशाजी और मदन मोहन के अनमोल नग्मों में से मेरे कुछ पसंदीदा गीत हैं ।

१) सबा से ये कह दो कि कलिया बिछायें (बैंक मैनेजर)
२) जमीं से हमें आसमा पर (अदालत)
३) अश्कों से तेरी हमने तस्वीर बनाई है (देख कबीरा रोया)
४) जाने क्या हाल हो कल शीशे का पैमाने का (मां का आंचल)
५) हमसफ़र साथ अपना छोड चले
६) कोई शिकवा भी नहीं, कोई शिकायत भी नहीं (नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे)

फ़िल्म "नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे" में तो मदनजी के सारे गीत आशाजी ने गाये और इस फ़िल्म का एक एक गीत अनमोल है । पहला नग्मा असल में एक गजल है, जाने क्या हाल हो कल शीशे का पैमाने का । इस गीत को सुनें और बस डूब के रह जायें ।



दूसरा गीत है, "सबा से ये कह दो कि कलियाँ बिछायें"



और तीसरा अनमोल नग्मा है, "कोई शिकवा भी नहीं"



आईक की हवायें बढती जा रही हैं और थोडी देर में शायद बिजली गुल हो जाये, इससे पहले इस पोस्ट को छाप देते हैं ।

आईक, ह्य़ूस्टन में बिन बुलाये मेहमान !!!

अब लगभग निश्चित हो गया है कि आईक नामक बिना बुलाये मेहमान हमारे घर पर आने वाले हैं । लगभग ४ दिन पहले सी.एन.एन. ने घोषणा की थी कि आईक महाशय जो उस समय हैती (Haiti) और क्यूबा में डेरा डाले हुये थे, गैलवेस्टन और ह्यूस्टन पधार सकते हैं । उसके अगले ही दिन आईक के कार्यक्रम में बदलाव दिखा और वो दक्षिणी टेक्सास के शहर ब्राउन्सवेल/कार्पस की ओर जाते दिखे । लेकिन कल फ़िर आईक ने अपना मूड बदल लिया और शनिवार की सुबह १-२ बजे के आस पास आईक गैलवेस्टन के रास्ते टेक्सास में दाखिल होंगे । आईक का इरादा १२५-१३० मील प्रति घंटा (२००-२१० किमी प्रति घंटा) की हवाओं और काली घटाओं के गाजे बाजे के साथ टेक्सास में घुसने का है । गैलवेस्टन के निवासी तो आईक को मुँह चिढाते हुये घर बार छोडकर भाग गये हैं लेकिन ह्यूस्टन निवासी (समुद्र से लगभग ४० मील दूर) अर्थात मेरे जैसे लोग जो वीर और धीर हैं, आईक का स्वागत खुली बाहों से कर रहे हैं ।

अगर आप अब तक संशय में हैं कि ये आईक महोदय कौन हैं तो नीचे दिये हुये तीन चित्र देखें ।



                            (सोमवार को सी.एन.एन. का आईक के रास्ते का खुलासा करना, हमारा आशियाना ह्य़ूस्टन में है )  



          (गल्फ़ आफ़ मैक्सिको में आईक गोल गोल घूमकर कह रहे हैं, आओ ट्विस्ट करें ...)



                                      (अब से कुछ घंटों बाद आईक हमारे मेहमान होंगे )


२००५ में रीटा नाम की आंटी भी बिना बुलाये ह्यूस्टन आने का विचार कर रहीं थी । रीटा आंटी से कुछ दिन पहले न्यू आर्लियन्स में कटरीना आंटी ने खूब तबाही मचायी थी । लोगों का बुरा हाल हो गया था और इससे डरकर वीर ह्य़ूस्टन वालों ने भी शहर से खिसकने की सोची थी । हम भी लोगों की बातों में आ गये और शहर से भागने लगे । लेकिन ४० लाख की आबादी वाले शहर के सब लोग भागने लगें तो सडके तो छोटी पड ही जायेंगी, वही हुआ । सब सडकों पर फ़ंसे रहे ।
हमने वीरता से १३ घंटे नान स्टाप अपने कार में केवल ५० किमी की दूरी तय की और सोचा इससे बेहतर है कि वापिस चलें । ५० किमी का वापिसी का सफ़र हमने केवल ३५ मिनट में पूरा कर लिया था क्योंकि वापिस जाने वाले पूरी सडक पर हम ही थे । उस समय लगा कि "जाने वाले जरा होशियार, यहाँ के हम हैं राजकुमार" :-)

आईक के आने पर कुछ चीजें निश्चित तौर पर होंगी । पहली की "ठंडी हवायें लहरा के आयें", फ़िर खिडकियों के शीशे जवानी के कच्चे दिल की तरह छन से टूट सकते हैं, तीसरी "उमड उमड के आयी रे घटा" और उसके साथ ही जोरदार बरसात ।

ये किसने अपनी जुल्फ़ से झटका पानी,
झूम के आया बादल टूट के बरसा पानी ।

इसके साथ ही आस पास के इलाकों के कुछ पेड उखडकर बिजली के तारों पर गिर जायेंगे और बत्ती गुल हो जायेगी । बत्ती गुल होने के साथ ही थोडी देर में पानी भी गुल जो जायेगा और उसके बाद खुदा खैर करे :-)

इस बार ह्य़ूस्टन के अधिकतर लोग शहर से भाग नहीं रहे हैं लेकिन थोडा अफ़रातफ़री का माहौल है । मैने ३-४ दिनों के लिये पानी खरीद कर रख लिया है, अपकी कार की टंकी पूरी भर ली है और थोडा बहुत खाने का सामान रख लिया है । मुझे पूरा विश्वास है कुछ खास नहीं होगा, आईक और हम बैठकर बालकनी में साथ में चाय पीयेंगे और उन्हें विदा कर देंगे । आईक को एक हिन्दी ब्लाग खोलने की सलाह भी दी जायेगी और विश्वास दिलाया जायेगा कि समीरजी उनको टिप्पणी अवश्य देंगे ।

इस बीच में आज स्कूल से छुट्टी हो गयी है और ब्लागिंग करने का मौका मिल गया है । एक ब्लागर को आईक से भला क्या शिकायत हो सकती है :-)


मौसम विभाग ने सैटेलाइट से ऊपर वाली तस्वीर उतारी है । जिस प्रकार से तस्वीर दिख रही है गैलवेस्टन की हालत अच्छी नहीं लग रही है । गैलवेस्टन के ९०% से अधिक लोग शहर छोड चुके हैं और जो लोग वहाँ रूके हुये हैं, ईश्वर उनकी सहायता करे ।

ताजा जानकारी के अनुसार लगभग १५०,००० घरों में बिजली जा चुकी है । ह्यूस्टन का पडौसी नगर गैलवेस्टन बडी गम्भीर समस्या से जूझ रहा है । वहाँ के काफ़ी घरों में पहले ही पानी घुस चुका है और अगले तीन-चार घंटो में वहाँ १५-२० ऊँची समुद्री लहरें शहर में घुस सकती हैं । मेरे शहर ह्यूस्टन में पानी मुख्य समस्या नहीं होगी लेकिन तेज हवायें काफ़ी नुकसान कर सकती हैं ।

मंगलवार, अगस्त 19, 2008

सहजता,कहीं मोल मिलती है क्या?

कभी ट्रेन के डिब्बे में अंग्रेजी किताब पढ़ने वाला इसलिए असहज कि लोग सोच रहे होंगे कि ये टशन मारने के लिए अंग्रेजी की किताब पढ़ रहा है जबकि मैं तो रोज ही अंग्रेजी की किताब पढता हूँ। कभी वो ये सोचकर असहज कि ये आम लोग कभी समझ नहीं पायेंगे कि इस अंग्रेजी की किताब में ऐसा क्या है जो में इसे पढ़ रहा हूँ। ट्रेन में हिन्दी कि किताब पढ़ने वाला इसलिए असहज कि कहीं लोग ये न सोच रहे हो कि मैं गंवार हूँ जबकि मेरी अंग्रेजी उतनी ही अच्छी है जितनी हिन्दी । कभी वो ये सोचकर असहज कि आजकल मेरे जैसे लोग हैं ही कहाँ जो हिन्दी कि किताबे पढ़ते हैं, सब मैकाले की औलादें हैं। मेरा बस चले तो सबकी अंग्रेजियत एक बार में निकाल दूं ।
कभी इस बात का दंभ कि मैं तो हिन्दी पढ़ रह हूँ डंके की चोट पर, जिसे गंवार कहना हो कह ले मुझे परवाह नहीं।

कहाँ मेरे स्कूल में चीनी विद्यार्थी की कमजोर अंग्रेजी के कारण एक साधारण सी बात को जरा तकलीफ़ से समझाने के बाद उसके चेहरे पर आयी सहज मुस्कान और कहाँ किसी अंग्रेजीदां नौजवान की दिल्ली के कैफ़े काफ़ी डे में अमेरिकन एक्सेंट में बातचीत के दौरान असहजता से "डैम इट" और "होली शिट" ।


कहाँ है इसके बीच में मेरा नायक जो सहजता से अपनी अंगरेजी कि किताब बंद करके स्टेशन पर उतरकर वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास खरीदकर उतनी ही सहजता से पढता है । न तो वो बात बात में काले फिरंगियों को गरियाता है और न ही उन्ही की भाषा में बात करता है ? आपने मेरे नायक को कहीं देखा है ?

मंगलवार, अगस्त 12, 2008

मेरे वालिद कहा करते थे कि बेटा इश्क करो !!!

आज "बज्म-ए-मीर" अल्बम से रूप कुमार राठौड की आवाज में एक नाजुक सी गजल पेश करता हूँ । गजल से पहले मीर की आत्मकथा "जिक्र-ए-मीर" के कुछ अंश सलीम आरिफ़ की आवाज में हैं जो मुझे बेहद पसन्द हैं ।

मेरे वालिद रोजो शब खुदा की याद में रहते थे,
कभी मौज में आते तो फ़रमाते थे कि बेटा इश्क करो,
इश्क ही इस कारखाने में मुतस्सर्रिफ़ है,
अगर इश्क न होता तो नज्म-ए-गुल कायम नहीं रह सकता था ।

बेइश्क जिंदगी बवाल है,
इश्क में जी की बाजी लगा देना कमाल है,
इश्क बनाता है इश्क ही कुंदन कर देता है
दुनिया में जो कुछ है इश्क का जरूर है,
आग इश्क की सोजिश है पानी इश्क की रफ़्तार है,
खाक इश्क का करार है हवा उसका इस्तेरार है,
मौत इश्क की मस्ती और जिन्दगी उसकी हुश्यारी है,
रात इश्क का ख्वाब और दिन इश्क की बेदारी है,
नेकी इश्क का कुर्ब है गुनाह इश्क की दूरी है,
जन्नत इश्क का शौक है दोजख इश्क का जौक है ।

कौन मकसद को इश्क बिन पँहुचा,
आरजू इश्क, मुद्दआ है इश्क, सारे आलम में भर रहा है इश्क ।

- मीर तकी मीर


 

शुक्रवार, अगस्त 08, 2008

यूट्यूबीय विशुद्ध मौज वाली पोस्ट !!!!

ये वीडियो कुछ दिन पहले देखा लेकिन परम मस्त लगा ।
स्लो इंटरनेट कनेक्शन वालों से क्षमायाचना सहित, केवल आडियो लगाने से मजा नहीं आयेगा :-)

मंगलवार, जुलाई 29, 2008

वारिस शाह की हीर: एक सुनहरा अंदाज !

पिछली बार जब वारिस शाह को वडाली बंधुओं की आवाज में सुनवाया था तो काफ़ी लोगों ने "हीर" सुनने में भी दिलचस्पी दिखाई थी | वारिस शाह की हीर को लगभग हर पंजाबी गायक ने गाया है लेकिन कुछ ख़ास गायकी ही हीर की आत्मा और उसके दर्द को जिंदा कर पाती है |

आबिदा परवीन ने बड़े अच्छे अंदाज़ में हीर गाया है लेकिन पाकिस्तानी गायक "इनायत हुसैन भट्टी" साहब की आवाज में हीर सुनकर लगता है कि हीर की कहानी सिर्फ़ एक किस्सा ही नहीं हकीकत में सामने घट रही है |



लेकिन आज हम आपको एक नए अंदाज़ में हीर सुनवायेंगे | इन साहब के बारे में सिर्फ़ इतना पता है कि ये वारिस शाह के दरबार में बैठकर अपनी मौज में हीर गाते हैं | न नाम का पता है और न कोई और ठिकाना | लेकिन हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में ऐसे कलाकार हर शहर/कस्बे/गाँव में बिखरे पड़े हैं जो प्रसिद्धि नहीं पा पाते | आज हम सलाम करते हैं ऐसे ही कलाकारों को और उनकी याद में समर्पित है आज की ये पोस्ट !!!

जो यूट्यूब पर इन्टरनेट की धीमी रफ़्तार के कारण वीडियो न देख सकें उनके लिए आडियो और गायक की तस्वीर भी पेश है |

इस फ़कीर की गायिकी और हीर की आत्मा को महसूस करने के लिए पंजाबी भाषा का आना कोई जरूरी नहीं है | इस आडियो की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है लेकिन अगर आप हैड फोन लगाकर सुनेंगे अथवा वाल्यूम को बीच बीच में माडरेट करते रहेंगे तो बहुत आनंद आयेगा | सुनते समय आंख बंद कर सकें तो कहने ही क्या :-)










इस दूसरे वीडियो को भी देखने का कष्ट करें, मेरा दावा है कि आप निराश नहीं होंगे |

रविवार, जुलाई 27, 2008

एक दिन की मजदूरी का मजा !!!

आज हमारे स्कूल के १४ विद्यार्थियों ने मिलकर "हैबिटेट फ़ॉर ह्यूमैनिटी" नामक एक संस्था के लिये एक दिन मजदूरी करने का बीडा उठाया । "हैबिटेट फ़ॉर ह्यूमैनिटी" अमेरिका के अनेक स्थानों पर कम भाग्यशाली और अपेक्षाकृत कम पैसे वाले परिवारों के लिये मकानों का निर्माण करती है । मकानों को बनाने का कच्चा सामान और औजार "हैबिटेट फ़ॉर ह्यूमैनिटी" खरीदती है और मकानों का निर्माण/रंगायी पुतायी आदि का काम स्वयंसेवक (Volunteers) करते हैं । हम सब लोग सुबह ७ बजे निश्चित स्थान पर पंहुच गये और वहाँ अपने समूह का पंजीकरण करवाने के बाद हमको १० मिनट की सुरक्षा सम्बन्धी सलाह दी गयी और उसके बाद काम चालू हो गया । हमारी टीम जिस मकान पर काम कर रही थी वो अपने निर्माण के पहले चरण में था । यहाँ पर मकानों के निर्माण में ईट/गारे/सीमेंट के स्थान पर लकडी का अधिकाधिक प्रयोग होता है । हमारा पहला काम था कि मकान की दीवारों के लिये लकडी के ढांचे खडे करना ।





इसके लिये जमीन पर पूरा ब्लू प्रिंट सरीखा बना हुआ था और लकडी के हर ढांचे पर उसका नंबर अंकित था । बस E1 को E1 के स्थान पर रखकर E2 और E3 से जोड मिलाते हुये कीलें ठोंककर अपने स्थान पर जमा दो । कील ठोंकने के तीन इन्तजाम थे । बडी कीलों (तकरीबन २.५ इंच लम्बी) के लिये Nail Gun थी । इस Nail Gun को आप एक स्टेपलर की तरह समझ लें जो लकडी में लम्बी लम्बी कीलों को एक झटके में लगा देती थी । दूसरी Nail Gun इससे भी खतरनाक थी, इसका काम लम्बी (तकरीबन ३.५ इंच लम्बी) कील को लकडी से होते हुये कंक्रीट के चबूतरे में फ़िक्स करना था । इसके क्रियाविधी एकदम बन्दूक के जैसी थी, इसमें बन्दूक की मैगजीन की तरह बारूद की एक मैगजीन लगती है । ट्रिगर दबाने से बारूद में विस्फ़ोट होता है और इससे उत्पन्न हुआ दवाब कील को लकडी से होती हुये कंक्रीट में पैबस्त कर देता है । इसके बाद वाला काम सबसे मेहनत का था जिसमें छोटी छोटी कीलों (१.५ इंच) को हाथ के हथौडे से नियत स्थान पर बैठाना था । जैसा कि आप ऊपर वाले चित्र में देख सकते हैं । आज मैने कम से कम १२०-१५० कीलों को अपने मजबूत हाथों से उनके स्थान पर लगाया :-)

आज ह्यूस्टन की गर्मी अपने चरम पर थी और तापमान लगभग ४० डिग्री और आद्रता (Humidity) ६० प्रतिशत थी । हम लोगों के लिये ठंडे पानी का बंदोबस्त था । आज ४ अलग अलग मकानों पर काम चल रहा था और विभिन्न समूहों के लगभग ८० लोग काम पर लगे हुये थे । कुछ लोग सपरिवार आये हुये थे जिनसे मिलकर बडा अच्छा लगा । ह्यूस्टन की एक बडी दुकान (Mattress Firm) के लगभग २५ लोग साथ में आये हुये थे जिसमें काफ़ी लडकियाँ भी थी जो कन्धे से कन्धे मिलाकर लकडी उठा रही थीं और कील पर बेरहमी से हथौडा पटक रही थीं :-)

हम लोगों ने खुली धूप में सुबह ७ बजे से दोपहर १२ बजे तक काम किया और फ़िर "हैबिटेट फ़ॉर ह्यूमैनिटी" वालों ने गर्मी के चलते काम बन्द करवा दिया । इसके बाद हम सब लोगों ने साथ बैठकर अपने सैंडविच खाये और फ़िर घर वापिस लौट गये । हमारे स्कूल के साथियों ने अगस्त में फ़िर से एक बार यहाँ आकर काम करने का फ़ैसला लिया और सभी ने इसे ध्वनिमत से स्वीकार किया । बाकी आप फ़ोटो देखकर खुद ही समझ जायेंगे ।






                     जब ये मकान बनकर पूरी तरह तैयार हो जायेगा तो कुछ ऐसा दिखेगा ।

गुरुवार, जुलाई 17, 2008

दिल के लिये मुफ़ीद है दौडना !!!

किसी भी तरह का हल्का व्यायाम सेहत के लिये लाभदायक होता है । आज मैं अपने पसंदीदा व्यायाम अर्थात दौडने की बात करूंगा । दौडना का भिन्न भिन्न लोगों के लिये अर्थ भिन्न हो सकता है । लेकिन आज के लेख में दौडने से मेरा तात्पर्य किसी दौड का जीतने के उद्देश्य से दौडना नहीं बल्कि हल्के फ़ुल्के व्यायाम के रूप में दौडने से है । मान लीजिये आपने पिछले १० वर्षों में कभी दौड नहीं लगायी है (पत्नी के बेलन से बचने और ट्रेन को पकडने को छोडकर) तो भी आप इसको आसानी से नियमित रूप से अपना सकते हैं ।

दौडना दिल के लिये बडा मुफ़ीद होता है । दौडने से हृदय की मांसपेशियाँ विकसित होती हैं, हृदय के चैम्बर का आकार बडा होता है और हर स्ट्रोक में हृदय की रक्त भेजने की क्षमता बढती है । चूँकि आप हर स्ट्रोक में पहले से अधिक रक्त भेज सकते हैं इसलिये नियमित दौडने से सामान्य परिस्थितियों (जब आप दौड नहीं रहे हों) में आपके हृदय की प्रति मिनट धडकन कम हो जाती हैं । प्रति मिनट धडकन कम होने से आपके हृदय को आराम मिलता है और वो आपको दुआयें देता है । इससे आपके रक्तचाप में भी गिरावट आती है । पिछले १.५ वर्षों से नियमित दौडने के कारण सामान्य स्थिति में मेरा रक्तचाप ८०/१२० के स्थान पर ७०/११० तक आ गया है ।

दौडते समय शरीर की मांसपेशियों में आक्सीजन की नियमित खुराक पंहुचती रहे, इसके लिये आपका शरीर अपने आप ही ऊतकों में नयी शिराओं का निर्माण प्रारम्भ कर देता है । इससे हॄदय के अलावा अन्य मांसपेशियाँ भी स्वस्थ रहती हैं । तीसरा सबसे बडा फ़ायदा होता है कि आपके रक्त के हीमोग्लोबिन की आक्सीजन को ऊतकों तक पंहुचाने की क्षमता का भी क्रमश: विकास होता है ।

इसके अलावा बढा हुआ वजन पूर्व स्थान पर आ जाता है, आस पडौसी इज्जत की नजर से देखते हैं, चोर पर्स चुरा कर भागे तो आप उसे पकड सकते हैं । यदि आप युवा हैं तो अक्षय कुमार स्टाईल में किसी युवा लडकी का पर्स वापिस लाकर दे सकते हैं, और युवा नहीं हैं तो ऐसा करके पास खडे युवाओं को शर्मिन्दा कर सकते हैं :-)

ये सब तो आप सभी जानते हैं लेकिन न दौडने वालों की दो प्रमुख समस्यायें होती हैं । पहली कि जोश में आकर दो दिन दौडे और तीसरे दिन हाथ, पैर, कमर और हर जगह होने वाले दर्द के कारण फ़िर से न दौडने का निश्चय कर लेते हैं । दूसरी समस्या ज्यादा जोश के कारण होती है के वो एक हफ़्ते में ही अगली मैराथन दौड लेना चाहते हैं और इसके चलते चोटिल हो जाते हैं ।

इसलिये इसको थोडा वैज्ञानिक तरीके से समझते हैं ।




आपका आज का फ़िटनेस कुछ भी हो, अगर आप छ: सप्ताह तक किसी भी नये व्यायाम को करेंगे तो वो ही आपका नया फ़िटनेस बन जायेगा बर्शते कि आप अपने आप को बहुत ज्यादा फ़ंतासी की दुनिया में न ले जाये । मान लीजिये कि आप आज दौडना प्रारम्भ करते हैं तो आज २ किमी ही दौडिये और १० मिनट प्रति किमी की रफ़्तार से दौडिये । आपको बीस मिनट लगेंगे २ किमी दौडने में और सम्भव है कि ४ दिनों के बाद आपको लगे कि ये तो बहुत आसान है और आज में ३ किमी दौड लेता हूँ । ऐसे विचारों से बचे और कम से कम छः सप्ताह तक इस रूटीन को जारी रखें । छ: सप्ताह के बाद आप आगे प्रयोग कर सकते हैं जैसे कि रफ़्तार बढाना अथवा दूरी बढाना । नये लोगों के लिये रफ़्तार कम मायने रखती है और उन्हें दूरी बढाने का प्रयास करना चाहिये ।




इसके अलावा किसी साथी के साथ दौडना प्रारम्भ करना बहुत फ़ायदेमन्द होता है क्योंकि आप दोनों एक दूसरे को दिशानिर्देश देते हुये ट्रैक पर रखते हैं ।
इसके अलावा दो अन्य नियमों का पालन करना न भूलें ।

१) हाईड्रेट, हाईड्रेट, हाईड्रेट: अर्थात पानी पियें, पानी पियें और पानी पिंयें ।
२) जरूरत से ज्यादा अपने को कष्ट न दें, दौडने को जीवन का अंग बनायें न कि जीवन को दौडने का ।

इतनी सब जानकारी के बावजूद मैं एक सामान्य सा नियम भूल गया और एक ही महीने में अपनी मैराथन ट्रेनिंग को बहुत आगे ले जाने की चाहत में चोटिल हो बैठा । आज लगभग बीस दिनों के बाद ११ किमी दौडा हूँ और बहुत अच्छा अहसास हुआ है । ऐसा लग रहा है कि चोट से उबर चुका हूँ और अपनी आगे की ट्रेनिंग जारी रख सकता हूँ । मेरी ट्रेनिंग के बारे में जानकारी इस लिंक को क्लिक करके प्राप्त की जा सकती है । लाल रंग से लिखे हुये आंकडे मेरे चोटिल होने के बारे में जानकारी देते हैं ।




नीरज रोहिल्ला ।

सोमवार, जुलाई 14, 2008

सीटी पर मदन मोहन का गीत यूँ हसरतों के दाग

आज ही संजय पटेलजी ने अपने चिट्ठे पर मदन मोहन की बरसी पर बांसुरी पर उनके कुछ गीत प्रस्तुत किये हैं । मदन मोहन जी को याद करते हुये "अदालत" फ़िल्म के गीत "यूँ हसरतों के दाग" को राजेश कोप्पिकर के अंदाज में पेश कर रहा हूँ । राजेश जी के गीत मैने केवल यूट्यूब पर ही सुने हैं लेकिन उनकी कलाकारी काबिल ए तारीफ़ है । इस गाने के उतार चढावों को उन्होने जिस बारीकी से अपनी सीटी में संजोया है उसे सुनकर मन वाह वाह कह उठता है । लीजिये, पेश-ए-खिदमत है "यूँ हसरतों के दाग" :


इसी के साथ मेरी पसन्द का एक और गीत "पूछो न कैसे मैने रैन बिताई" भी राजेश जी की सीटी के माध्यम से सुनिये ।





इसके अलावा यू-ट्यूब पर राजेश जी के २५० अन्य गीतों को इस पेज पर देख सकते हैं ।





रविवार, जुलाई 13, 2008

एक महबूबा की याद और फ़िर उसका मर्सिया !!!

जब मैं भारत में था (जुलाई २००४ तक) तो कभी मोबाईल फ़ोन का इस्तेमाल नहीं किया था । कभी इसकी जरूरत ही महसूस नहीं हुयी और न ही जेब में इतने पैसे थे कि इसका खर्चा उठा सकते । उसके बाद अगस्त में ह्यूस्टन के राईस विश्वविद्यालय में आये तो भी घर में एक लैंड लाईन लगवाने के बाद काम चल ही रहा था लेकिन थोडी असुविधा जरूर थी । शुरू शुरू में एक दो फ़ोन कम्पनियों से कहा कि भैया एक ठो मोबाईल दे दो तो बोले तुम इस देश में नये नये आये हो और तुमने कभी यहाँ पर उधार नहीं लिया है इससे तुम्हारी नीयत का कोई भरोसा नहीं है । लिहाजा हम तुम्हे पोस्ट पेड फ़ोन तो तब ही देंगे जब ५०० डालर नकद जमा करोगे । प्रीपेड लेने से हमने इंकार कर दिया, चूँकि खुद इनकी सरकार ने हमपे भरोसा करके अपने शोध का जिम्मा हमें सौंपा और इन नालायकों को हमारी नीयत पर ही भरोसा नहीं ।

खैर दिन कटते रहे और एक दिन स्कूल में एक मोबाईल कम्पनी वालों ने अपना तम्बू लगाया और कहा कि हम १२५ डालर जमा करने पर फ़ोन दे देंगे । उन्होने ये भी कहा कि हमारी नीयत पर पूरा भरोसा है लेकिन ससुरे पेपर वर्क के चक्कर में १२५ ले रहे हैं और वो भी सूद समेत ६ महीने के बाद लौटा देंगे । हमारे दोस्त ने कहा अब सब्र भी करो और दे दो १२५ डालर । तो प्यारे साथियों जनवरी २००५ में पहली बार हमने भी मोबाईल ले लिया । इसी के साथ अमेरिका के मोबाईल के कुछ अलग ढंग भी पता चले । ध्वनि संदेश (व्याईस मेल) से पहली बार वास्ता पडा, फ़ोन मिलाओ और अगर बन्दा फ़ोन न उठाये तो उसके ध्वनि संदेश के बाद अपना संदेश रेकार्ड कर दो । हमने भी पहली बार अपनी आवाज में संदेश रेकार्ड किया (Hi, This is Neeraj. I am unable to take your call right now but if you will leave your name, number and a brief message I will get back to you as soon as possible). ये भी पता चला कि मोबाईल शिष्टाचार के मुताबिक अगर कोई आपको ध्वनि संदेश छोडे तो उसको वापिस काल करने की जिम्मेवारी आपकी होती है ।

मेरे पिताजी एक बार बडे नाराज हुये, उन्होने मेरी आवाज सुनी और सोचा फ़ोन लग गया है और मुझे डांटना शुरू कर दिया :-) बाद में पता चला तो खूब हंसे । ये भी पता चला कि यहाँ हर महीने एक नियत मिनट (मेरे वाले प्लान में ४०० मिनट) मिलते हैं । फ़ोन मिलाने और उठाने दोनो में मिनट कटते हैं लेकिन शाम को ७ बजे के बाद से सुबह ७ बजे तक और शनिवार और रविवार को मिनट नहीं कटते हैं । मेरे तो बमुश्किल १५० मिनट खर्च हो पाते थे और हर महीने २५० मिनट बेकार चले जाते थे । मेरे पास जो मोबाईल फ़ोन था वो बडा सी सादा सा था और पाषाणकालीन लगता था, उसमें फ़ोटो, इंटरनेट आदि की रंगबाजी भी नहीं थी । ये रहा उसका फ़ोटो:


अब जल्दी से तीन साल आगे बढाते हैं और अचानक से हमने एक धांसू और चांपू सा फ़ोन लेने का निश्चय कर लिया । हमने नया फ़ोन लिया मोटोरोला Q9C, इसका फ़ोटो भी हाजिर है । ये फ़ोन तो एकदम जादू का पिटारा था, फ़ोन के साथ साथ इंटरनेट का तेज रफ़्तार कनेक्शन, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS), लाईव सर्च, टाईप करने के लिये बढिया की बोर्ड । ये नहीं कि "S" टाईप करना हो तो एक ही बटन को ४ बार दबाओ । खाने खाने जाना हो, तो फ़ोन को आदेश करो कि मैक्सिकन रेस्तरां खोजो और ३ मील के अन्दर के सभी रेस्तरां हाजिर । फ़िर बोलो कि हम जहाँ खडे हैं वहाँ से इस जगह जाने का रास्ता बताओ तो GPS की मदद से टर्न बाई टर्न निर्देश मिल जाते थे । सबसे मस्त लगता था कि पार्किंग लाट से अपनी लैब तक आते आते मैं १५-२० चिट्ठे पढ डालता था । आऊटलुक से मेरी ईमेल पलक झपकते मिल जाती थी । कुल मिला कर ये फ़ोन मेरी महबूबा बन गया था ।

लेकिन हर खुशी की उम्र छोटी ही होती है । ९ जुलाई की रात को हमारे युनिवर्सिटी के स्टूडेंट पब में मित्र लोगों के साथ बैठकर बीयर की चुस्कियों के साथ शतरंज खेलते हुये अचानक फ़ोन पर बात करने के बाद मैने फ़ोन को जेब में रखने की बजाय मेज पर रख दिया और दस मिनट बाद उसकी सुध ली तो वो वहाँ से गायब था । बडा दुख हुआ, फ़ोन खोने से बडा दुख इस बात का हुआ कि स्टूडेंट पब से फ़ोन चोरी हुआ हांलाकि उसमें कभी कभी स्कूल से बाहर के लोग भी आते हैं । इससे हमने सोचा कि घोर कलयुग आ गया है । अब बताईये शराबियों का भरोसा नहीं कर सकते तो आप आम लोगों की बात तो छोड ही दीजिये ।

हमने २ दिन तक इन्तजार किया कि शायद कोई तरस खाकर फ़ोन वापिस कर दे लेकिन ऐसा नहीं हुआ । मन मसोसकर अपने कमरे के एक कोने के कबाडे में उपेक्षित से पडे पुराने नोकिया वाले फ़ोन को झाड पोंछकर चमकाया और चालू किया । जब तक नया फ़ोन खरीदने के पैसे इकट्ठे न हों जाये, पुराने फ़ोन को ही कलेजे से लगाये रखना पडेगा ।