शुक्रवार, नवंबर 28, 2008

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नजर नहीं आती

डिस्क्लेमर: आप भले ही विश्वास न करें लेकिन नीचे लिखी घटना अक्षरश: सत्य है । और सम्भवत: ये एक लम्बी पोस्ट भी हो और बिल्कुल बेमतलब जिसका यथार्थ से कोई वास्ता न हो ।

बात सन ९२ के आस पास की है । जम्मू और कश्मीर में उस समय लगभग रोज ही बम विस्फ़ोट होते थे । दूरदर्शन पर सुनना कि "स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियन्त्रण में है" आम बात होती थी । उस समय हम शाहजहाँपुर में रहते थे । हम कक्षा ६-७ में पढा करते थे और घर से स्कूल का लगभग ५-६ किमी का सफ़र रिक्शे पर तय किया करते थे । रास्ते में खन्नौत नदी पडती थी जिस पर दो पुल बने हुये थे । एक दिन रिक्शे पर बैठे बैठे विचार आया कि आतंकवादी जम्मूकश्मीर में बम फ़ोडते हैं जहाँ इतनी पुलिस है, एक बम से खन्नौत का पुल उडा दें तो कम से कम २ महीने के लिये स्कूल की छुट्टी । और खन्नौत का पुल उडाना भी आसान है क्योंकि दूर दूर तक कोई पुलिस वाला नहीं रहता है । रिक्शे पर बाकी बच्चों ने भी इस चर्चा में भाग लिया और कुछ ने कहा कि शायद ३-४ महीने की छुट्टी हो जाये तो कुछ ने कहा कि पापा दूसरे स्कूल में नाम लिखा देंगे ।

उसी दिन शाम को स्कूल से घर लौट कर पिताजी का इन्तजार करते रहे । पिताजी घर आये तो उनसे भी यही सवाल पूछा कि वो ऐसी जगह बम क्यों नहीं रखते जहाँ कोई न पकडे और उनका काम भी हो जाये । पिताजी ने कहा कि शाहजहाँपुर में बम फ़टेगा कि कोई खास ध्यान नहीं देगा लेकिन जम्मू-कश्मीर का बडा नाम है इसीलिये ऐसा करते हैं । तभी टी.वी. पर एक कार्यक्रम आने लगा और सारी बातचीत खत्म ...

याद दिला दें कि ये वही शाहजहाँपुर है जहाँ काफ़ी बडी मुस्लिम आबादी होने के बाद भी ९२ के बाद हिन्दू और मुस्लिमों में एक भी मुढभेड नहीं हुयी थी और न ही एक भी दिन के लिये कर्फ़्य़ू लगा था ।

लेकिन आज मुझे खन्नौत के पुल की सच में बहुत चिन्ता हो रही है । ब्रेकिंग न्यूज, टेली कम्यूनिकेशन की क्रान्ति के बाद कोई भी जगह ५ मिनट में आम से खास हो सकती है । क्या आतंकी भी इसी योजना के सहारे चल रहे हैं ?
विस्फ़ोट की जिम्मेवारी लेने सरीखा काम भी केवल सनसनी फ़ैलाने वाला है । जब ब्रेकिंग न्यूज से सनसनी फ़ैल ही रही है तो अपना नाम भी क्यों बतायें । आज डेक्कन मुजाहिदीन तो कल शाहजहाँपुर मुजाहिदीन तो परसों औरैया मुजाहिदीन । कर लो जो करना है, हम नहीं बतायेंगे कि हमने किया है । आतंक सबसे भयावह होता है जब वो आपकी आंखो में हो, आप दिल में हो कि कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है । क्या करेंगे ऐसे में आप ?

आप अपने शहर का उदाहरण उठा कर देख लीजिये जहाँ भी आप रहते हों, क्या आप सुरक्षित हैं ? आपके आस पडौस कि रिक्शे/टैम्पों में चार आतंकवादी बैठ कर जा रहें हो तो क्या आप उन्हें पहचान लेंगे ? उनके सिर पर सींग तो नहीं होते ? पिछले कुछ सालों से देखें तो ऐसी ऐसी जगह आतंकी हमले हुये हैं जिनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता, छोटे छोटे शहर, एकदम आम ... और इसके बाद ये दिल दहला देने वाली मुम्बई की घटना । हर आँख में आतंक का साया और देश की खूफ़िया एजेंसियाँ पूरी तरह से बेखबर ।

इसका हल क्या है ? कुछ ने कहा कि पीओके पर हमला बोल दो । उससे क्या होगा ? पोटा के बारे में दिनेशजी पहले ही एक पोस्ट लिख चुके हैं । हम हताशा में बस अगले दिन उठकर काम पर ही चल सकते हैं कि देख लो नहीं डरा मुम्बई, मुम्बई के जज्बे को सलाम और फ़िर इन्तजार में कटते दिन और रात ।

केवल एजेन्सियाँ बना देने से काम नहीं होगा । जो हवलदार ५०० रूपये लेकर ट्रक को बिना चैक कर जाने दे रहा है कि कागज पर सेब लिखा है लेकिन असल में टैक्स बचाने के लिये मसाले भरे हैं, उससे आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि अगली बार वो गोलियों से भरा ट्रक रोक लेगा । २०० रूपये लेकर ड्राइविंग लाईसेंस और राशन कार्ड बनाने वाला अनजाने में एक आतंकवादी को भारत का नागरिक नहीं बना देगा इसकी क्या गारण्टी है ? जब तक जनता ईमानदार नहीं होगी अगर फ़रिश्ते भी हमारी सेवा में लग जायें तो सुरक्षा की कोई गारण्टी नहीं दे सकता ।


आज मैं अपने पाठक गणों को गृहमंत्री बना रहा हूँ, अपनी प्रतिक्रिया दीजिये कि आप क्या करेंगे ? केवल भावनाओं में बहकर नहीं ठंडे दिमाग से सोचकर जवाब दीजिये क्योंकि मेरे पास केवल सवाल हैं ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आज डेक्कन मुजाहिदीन तो कल शाहजहाँपुर मुजाहिदीन तो परसों औरैया मुजाहिदीन ।
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    नाम ही रख सकते हैं हम, नया और रोचक। बजरंग मुजाहिदीन बढ़िया रहेगा। नया भी और ऐसा भी कि आदमी कयास लगाता रहे।
    बाकी टफ होने की जरूरत है। जिसकी सूरत नजर नहीं आती।

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  2. kalpana se kuvhh nahi hota, aaj hakikat kee jarurat hai. narayan narayan

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  3. jab tak rishwat ka kida mar nahi jata insaan ke dil se shayad tab tak kuch thik na ho.lalsa aur jyada pane ki chah desh ko nuksaan karti hai,lekin kahihumbhi shamil nahi usmein,rishwat dena bhi gunah hai,ab agar koi jyada thode jyada paise lekar mera kaam municipal corporation mein 10 din ke bajaye 1 din mein kare,humbhi to de dee hai na paise,humbhi galat hai.magar tab hum nahi sochte ye sab.

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  4. sahi kahaa.. har naagarik jimmedaar nahi hoga tab tak isaka saamanaa muskil he.

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