सोमवार, दिसंबर 08, 2008

अरे महिला/लडकी होकर सिगरेट पीती हो !!!

आज आदर्श की एक ईमानदार पोस्ट देखी मन खुश हो गया । इससे पहले कुछ दिन पहले आदर्श के ब्लाग पर जैसे ही क्लिक किया पूरा कमरा हिल गया था, "प्याला प्याला मय का प्याला" उनका ब्लाग खोलते ही अपने आप ही बजने लगता है । आदर्श की पोस्ट बडी सामयिक होती हैं और उनकी साफ़गोई का मैं कायल हूँ । ये पोस्ट मैं आदर्श की पोस्ट के जवाब में नहीं लिख रहा हूँ बल्कि इसको लिखने की तैयारी बहुत दिनों से थी ।

अक्सर बहुत से लोगों को किसी महिला को सिगरेट पीते देखते ही उनके स्वास्थय की चिन्ता होने लगती है । इसका तर्क/कुतर्क भी होता है कि सिगरेट बहुत हानिकारक होती है । माना सिगरेट हानिकारक होती है लेकिन ये हानि महिला और पुरूष में भेद नहीं करती । सिगरेट पीना एक व्यक्तिगत निर्णय है जिसकी कीमत हर सिगरेट पीने वाला समझता है, ठीक उसी तरह जिस तरह हर शराब पीने वाला, Rash Driving करने वाला या फ़िर किसी अन्य जोखिम वाले जीवन पद्यति को जीने वाले उनके जोखिम को समझते हैं । फ़िर किसी महिला को सिगरेट पीते देखकर ही हमारा ज्ञान क्यों जागृत हो जाता है ? यहाँ अमेरिका में भी बहुत से लोग किसी लडकी का बीयर पीना तो पसन्द कर लेंगे लेकिन सिगरेट पर कभी कभी उनकी भी भावनायें जाग जाती हैं । हम तो कहते हैं असली बराबरी है कि कैंसर हो तो लडकी को भी हो, इसकी चिंता करने की आपको कोई आवश्यकता नहीं है । क्या आप चिन्ता करते हैं जब मजदूरी करती किसी महिला को पुरूषों के साथ बैठकर बीडी फ़ूँकते देखते हैं । आपका दर्शन/चिन्तन उस समय जगता है क्या ?

यहाँ कालेज की एक मैगजीन में एक लडकी ने लिखा था कि एक बार वो सिगरेट पी रही थी और एक अन्य व्यक्ति बाजू से गुजरा और उसने कहा "You know, this is harmful for your lungs" | इस पर लडकी ने कहा, "Thank you Sherlock Homes, I didn't know that"

कुछ लोग इस मुद्दे पर अन्य प्रकार से भी चुटकी लेते हैं और कहते हैं कि केवल आधुनिक कपडे पहनने से, सिगरेट और शराब पीने से कोई लडकी/महिला आधुनिक और स्वतंत्र नहीं हो जाती । वो कहते हैं कि उन्होने बहुत सी So called आधुनिक लडकियों को आधुनिक कपडों में असहज होते देखा है । लेकिन उन्होने कभी जून की गर्मी की शादी में Double Breasted Suit और टाई लगाये दूल्हों और रिश्तेदारों को असहज होते नहीं देखा होगा । इसका अर्थ है कि स्वतंत्रता भी वही है जिसे उनकी स्वीकृति हो, क्या किसी और को कोई विरोधाभास नहीं दिख रहा ?

स्वतंत्रता वो है कि महिला अपने फ़ैसले खुद करे और सारे फ़ैसले खुद कर सके । उसे कैसी नौकरी करनी है, कहाँ पढाई करनी है, किसके साथ विवाह करना है, किसी रिश्तेदार को नमस्ते करनी है कि नहीं और जो भी आपके मन में आये । अगर उसे लगे कि सिगरेट पीना है तो पिये, शराब पीनी है तो पिये, शादी से पहले ब्याय फ़्रेंड बनाना है तो बनाये उसके साथ संबन्ध बनाने हैं तो बनाये । हम कौन होते हैं इसके बीच में बोलने वाले ?

ये ठीक उस प्रकार वाली बात है जो मेरे एक पुराने रूममेट ने कही थी कि लोग चाहते हैं कि शादी के लिये लडकी सुन्दर भी हो, सुशील भी हो, घर वालों की इज्जत भी करे, इंटलेक्चुअल हो कि मेरी फ़िलासिफ़कल बातों में बोर न हो लेकिन इतनी भी नहीं कि मुझे पलट कर जवाब दे, कमा कर भी लाये लेकिन काम में इतना मन न लगाये कि पति और घर पर ध्यान न दे पाये, खान बनाना और घर के काम तो उसे संभालने चाहिये ही ।

You Know What? There are no free lunches in this world. Everything has consequences. एक जान पहचान के व्यक्ति हैं, उनकी पत्नी से सम्बन्ध विच्छेद होने पर उन्होने कहा कि आजकल भारत में ९०% तलाक के मामलों में लडकी दोषी है । और उनकी नजर में लडकी इसलिये दोषी है कि वो ससुराल की जायज और नाजायज बातों को नहीं मानती, पति ने अगर हाथ उठाने कि कोशिश की तो बोल देती है "Don't even think about that". चिन्ता मत कीजिये, नारी जागृत हो रही है और इसका सामाजिक बदलाव खूब देखने में आ रहा है । हो सकता है कि इसके पूरे परिणाम मैं अपनी जिन्दगी में भी न देख पाऊँ तो क्या, कम से कम आज तो जी भरकर चिल्लाकर कहने को मन कर रहा है कि:

नारी तुम सबला हो, अपनी शक्ति पर भरोसा रखो और जिस बात पर तुम्हारा मन राजी हो वो करो । सही और गलत के फ़ेर में तो इन्सान हजारों सालों से पडा है उससे पार पाना मुश्किल है । लेकिन सुनो सबकी और करो अपने मन की ।

15 टिप्‍पणियां:

  1. - सुनो सबकी और करो अपने मन की -

    -यह भी सभी के लिए बात है-क्या महिला/ क्या पुरुष.

    वैसे, Just for Record, कभी अमिताभ बच्चन के ब्लॉग से पंक्तियां उड़ाई थीं:

    दूसरों की गलतियों से सीखें। आप इतने दिन नहीं जी सकते कि आप खुद इतनी गलतियां कर सके।

    -अमिताभ बच्चन के ब्लॉग से.


    -इसी से मैने विचारा था कि अगर कोई अपने अनुभव से आपको कुछ सार्थक ज्ञान देता है तो ’सुनो सबकी और करो अपने मन की’ वाली ठसक को कुछ किनारा देने में कोई बुराई नहीं है.

    :)

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  2. सत्य वचन! सुनो सबकी करो मन की!!

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  3. neeraj
    If you have been vocally supporting woman empowerment {which really means being able to do what we want to do }
    thanks

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  4. bilkul sahi likha hai aapne. vyaktigat cheezon mein baaki logon ki dakhalanaaji nahin honi chahiye. hamare yahan waise bhi adhiktar niyam aur adjustments mahilaon se hi karne ki apeksha ki jaati hai. aapka likhna sarahneeya hai. meri haardik badhai.

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  5. भैया, दो पोस्ट नारी वर्ग पर ठेल चुके हो। कमेण्ट करने में अब सतर्क रहना पड़ेगा। राम राम।

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  6. इसका अर्थ है कि स्वतंत्रता भी वही है जिसे उनकी स्वीकृति हो, क्या किसी और को कोई विरोधाभास नहीं दिख रहा ?

    bahut umda lekh
    regards

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  7. आदमी अगर किसी से डरता है तो वो बुद्धिमान औरत से ...खैर चलिए अलोकोहल के साथ हम डॉ एक शब्द जोड़ देते है.....अल्कोहल abuse यानी उसका दुरूपयोग ...... नियम का भी ऐसा है...बनाए समाज के लिए थे .....पर उन पर चलना एक को ही है ....कभी बचपन में एक निबंध पढ़ा था जिसमे एक आदमी छड़ी घुमाता है तो दूसरा आदमी उसे टोकता है .वो कहता है की छड़ी घुमाना मेंरा अधिकार है मेरी छड़ी है....तो दूसरा कहता है की तुम्हारी स्वतंत्रता वहां खत्म हो जाती है जहाँ से मेरी शुरू हो जाती है .......

    भाई हमने भी लड़कियों के साथ सिगरेट भांजी है ...लेकिन न हमारी स्थिति पर कोई फर्क पड़ा न उनकी.....इसमे कोई गर्व की बात भी नही है......पर तुम्हारा शीर्षक ऐसा था इसलिए कहा.....असली मुद्दा है निर्णय की प्रक्रिया में स्त्री की भागीदारी जब तक नही होगी .भले ही उसे सिगरेट पीने की आज़ादी दो या बियर पीने की....वो आजाद नही हो पायेगी ....

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  8. समीर जी से सहमत हूँ ..पर एक बात और कहना चाहूंगी ..जो भी करो अगर वह ग़लत हो तब जिम्मेदारी लेने और गलती सुधारने को तैयार रहो .क्योंकि गलती किसी से भी हो सकती है

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  9. - सुनो सबकी और करो अपने मन की -
    सही बात है।सभी अपने मालिक आप हैं। जो चाहे करो।लेकिन फिर शिकायत भी किसी से ना करो।

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  10. अरे पीने में कैसा भेदभाव लड़का हो या लड़की :-) जम के (पियो-) पिलाओ ! मैं पिलाने वालों में से आता हूँ :D

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  11. सही है, पर अगर आगे बात बिगड़ जाती है या आपकी आज की स्वच्छंदता के कारण भविष्य में कोई समस्या या मुसीबत खड़ी हो जाती है, तो वह भी अकेले ही झेलने की कोशिश करें, किसी और को दोष देने से बचें. आप जो करना चाहें करें पर आगे अच्छे या बुरे परिणाम की ज़िम्मेदारी भी आपकी ही है.

    मुझे आपत्ति तब होती है जब वक़्त सही होता है, तब एटीट्यूड रहता है की 'यह मेरी ज़िन्दगी है, मैं चाहे जैसे जियूँ!', पर आगे ज़िन्दगी की सच्चाइयों से सामना होता है तो, कभी परिवार पर, कभी पीयर्स पर, कभी बॉयफ्रेंड्स पर, कभी सहकर्मी या बॉस पर, या समाज और दुनिया पर दोष डालने का सिलसिला शुरू हो जाता है. ख़ुद परिणामों की ज़िम्मेदारी कोई नहीं लेता. यानी चिंता छोड़ कर मौज मस्ती तो पूरी कर लो पर अगर कुछ गड़बड़ हो जाए तो सब कुछ किसी और पर मढ़ दो. यह दोगलापन परेशान करने वाला है.

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  12. सही कह रहे हैं ।
    ab inconvenienti से पूछना चाहूँगी कि जब पुरुष सिगरेट पीकर अपने फेफड़े व रक्त वाहिनियाँ व हृदय खराब करते हें तो क्या केवल वे अकेले झेलते हैं या परिवार उनकी सेवा में जुट जाता है ? कभी कभार हमारे गलत निर्णयों से होने वाली कठिनाई या रोग में वे भी यदि सेवा, देखभाल कर दें तो क्या बुरा है ?
    घुघूती बासूती

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  13. vah bhai vah..

    abhi haal ka ek kissa sunata hun.. yahan chennai me abhi bhi ladkiyan bharat ke anya metro ki tulna me bahut reserve rahti hai.. ek din main office ke baahar apne doston ke saath tha.. lagbhag sabhi smoking kar rahe the.. tabhi ek ladki ko vahan smoking karte dekh kar sabhi aise dekhne lage jaise koi ajuba dekh rahe hon.. maine unhe kuchh kaha to nahi kyonki bahas nahi chahta tha, lekin socha jaroor ki aap bhi to pi rahe hain to unhe aise kyon dekh rahe hain??

    man me yahi aaya ki, ye to had hai bhai.. pahle khud to sudhro phir dusaro ko sudharna..

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  14. भाई बिना बिगडे कौन सुधरा है ? मा बच्चे को समझाती है कि ये आग है -- जल जायेगा,,,पर बिना जले आग का मजा किस बेटे ने जाना है ! अत: रामदेव बाबा के अनुसार करो और पाओ !:)

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