शनिवार, दिसंबर 05, 2009

तस्वीरें कुछ बोलती हैं।

जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में बताया था कि आज हमें एक दस किमी की दौड में भाग लेना था। सुबह उठकर देखा तो कार के सभी शीशों पर बर्फ़ की मोटी परत जमी हुयी थी। जब खुरचने से नहीं उतरी और देर हो रही थी तो उस पर पानी डालने का सोचा। पानी डालने से खतरा था कि शीशा चटक सकता था लेकिन जल्दबाजी में इस खतरे को उठाया और धीरे धीरे बर्फ़ को खुरचकर शीशे को साफ़ किया। इतने में ठंड के मारे हाथ दर्द करने लगे थे...मेरी दर्द में आऊ आऊ करने की आदत है, बचपन में भी चोट लगने पर आंसू नहीं निकलते थे बस हाथों को झटकते हुये आऊ आऊ करता रहता था।

आज जब हाथों में जबरदस्त ठंड लगी तो आऊ आऊ अपने आप मुंह से निकल गया। खैर २० मील दूर जाकर देखा तो इक्का दुक्का लोग ही आये हुये थे। लेकिन आयोजकों ने कहा कि दौड जरूर होगी। थोडी देर में बाकी लोग भी आ गये।

ठीक सुबह ७:३० बजे -४ डिग्री तापमान में दौड शुरू हुयी। हमने एक टीशर्ट के ऊपर ट्रेकिंग जैकेट पहनी हुयी थी। लेकिन अपने दौडने वाली निक्कर पहनने के चलते अब घुटने आऊ आऊ कर रहे थे। प्रारम्भ पंक्ति के पास एक हीटर रखा था, जिससे दौड से पहले सब हाथ-पैर सेंक रहे थे। गोली की आवाज के साथ दौड शुरू हुयी और आधे मिनट में ही हीटर की गर्मी रफ़ूचक्कर हो गयी। आधे मील तक आते आते महसूस हुआ कि पैर के अंगूठे और उंगलियाँ एकदम पत्थर जैसे लग रहे हैं। खैर हम कदम आगे बढाते रहे।

पहला मील: ६:३० मिनट (आशा से थोडा तेज)

ये चूंकि छोटी दौड(~३०० धावक) थी इसलिये पहले मील में ही सबका स्थान तय सा हो गया था। हमने गिना तो हम दसवें नम्बर पर दौड रहे थे। हमने २ धावकों को मार्क किया जिन्हें पछाडने का अगले ५.२ मील मे प्रयास किया जायेगा। उनमें से एक को हमने चौथे और दूसरे को पाँचवे मील पर पीछे छोडा। अब हम आंठवे नम्बर पर थे और हमारे आगे वाला धावक अपने हाथ झटक रहा था और बार बार पीछे देख रहा था। हमने सोचा कि मौका अच्छा है देखते हैं किसमें कितना दम है, हमने थोडी रफ़्तार बढाई और उसके बराबर आ गये। अब सब कुछ उसे करना था। इसे हमारी भाषा में Shaking a runner कहते हैं। थोडी सी रफ़्तार बढाकर दूसरे धावक को उत्तेजित करना होता है। इसमें कभी आप सफ़ल होते हैं और कभी असफ़ल...

नये खिलाडी तुरन्त अपनी रफ़्तार बढाकर आपसे आगे निकल जाने की कोशिश करता है और ऐसे में कभी कभी वो अपने को ज्यादा थका लेता है। जिसका फ़ायदा आपको अगले मील में मिलता है। घाघ टाईप के धावक आपकी तरफ़ मुस्कुराते हैं और अपनी गति पर दौडते रहते हैं। अब चूंकि उसके बराबर आने में आपने अपनी गति बढाई होती है, अगर दूसरा बन्दा आपकी चाल में न फ़ंसे तो आप खुद अपने आप को हांफ़ते हुये पाते हैं और पासा उल्टा पड जाता है।

खैर, वो हमारी चाल में आ गया और छठे मील से थोडा पहले हमने उसे पीछे छोड दिया।

कुल समय: १० किमी ४१ मिनट में
पिछला बेस्ट समय: ४१ मिनट १८ सेकेंड्स
इस लिहाज से १८ सेकेंड्स का सुधार।

Overall: 7th position
Age Group (Male 25-29): 2nd position (मतलब ईनाम मिला)

अब आप फ़ोटो भी बांच लो....


(दौड की समाप्ति के बाद भी बर्फ़ पिघली नहीं थी)



(दौडने के बाद काफ़ी पीते हुये, और ईनाम लेते हुये)



(ईनाम का क्लोजअप)

शुक्रवार, दिसंबर 04, 2009

ह्यूस्टन में बर्फ़बारी के नजारे!!!

हमने अपनी कल की पोस्ट में ह्यूस्टन के जलील मौसम के बारे में बताया था। वैसे तो आज दोपहर में बर्फ़ गिरनी चाहिये थी लेकिन आज सुबह ७ बजे से ही बर्फ़ गिरनी शुरू हो गयी। आज के दिन ह्यूस्टन ने १९४४ का रेकार्ड तोडकर सर्दी के मौसम में सबसे पहले बर्फ़ गिरने की घटना दर्ज की।

हम जब तक स्कूल पंहुचे तो अच्छी खासी बर्फ़ गिर रही थी, लिहाजा हमने कुछ फ़ोटो और वीडियो भी बनाये। जिन्हे आप यहाँ देखिये...



इसके बाद, कुछ काम किया फ़िर बार बार बाहर जाकर बर्फ़बारी का मजा लिया। उसके बाद फ़ैसला लिया कि इस बर्फ़ में ३ मील दौडा जायेगा। लोगों ने वायदा तो किया लेकिन जब दौडने की बारी आयी तो केवल हम और एक कन्या मोनिका ही पंहुची। खैर ५ मिनट इन्तजार के बाद हम दोनो ने ही दौड लगानी शुरू कर दी। लोग अपनी कार से हमे ऐसे देख रहे थे जैसे दो पागल दौडे चले जा रहे हों। एक-दो लोगों ने अपनी कार का शीशा नीचे करके हमको घर जाने की सलाह भी दी तो कुछ लोगों ने थम्स अप भी दिया। दस्तानों के बावजूद -५ डिग्री की चुभती ठंड में दौडने में लुत्फ़ तो आया लेकिन ठंड भी लगी। ये रहे फ़ोटो जिससे सनद रहे।




इसके अलावा हम कल सुबह ७ बजे एक १० किमी की दौड में भी भाग ले रहे हैं, जहाँ तापमान शून्य के नीचे रहने की सम्भावना है। देखते हैं कल कितने शहसवार इस ठंड में दौडने आते हैं। हम तो जा ही रहे हैं। ये रहा आज अभी का और कल सुबह तक के मौसम की भविष्यवाणी।

कल अगर दौड में हमें कोई स्थान प्राप्त हुआ तो ईनाम के साथ अपनी तस्वीर जरूर चस्पा करेंगे। तब तक आप भी प्रकॄति के इस अद्भुत कारनामे का मजा लीजिये।






























गुरुवार, दिसंबर 03, 2009

जैकेट, घर की सफ़ाई, स्वेटर, बर्फ़ और कुछ यादें....

ग्लोबल वार्मिंग: माई फ़ुट...

पिछले तीन दिन से ह्यूस्टन का जलील मौसम अपने चरम पर है। पिछले रविवार को अच्छी खासी गर्मी कि सुबह की दौड में लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे। अगले दिन सुबह स्कूल जाने के लिये एक पतली सी टी-शर्ट पहनकर घर से निकले और स्कूल तक आते आते हाथ रगडने कि नौबत आ गयी, इतनी ठंड वो भी इतनी जल्दी। फ़िर मंगलवार और बुधवार को ठंड बरकरार रही।

इसमें हमारे जैसे गरीब विद्यार्थियों (जिनके कपडों में सूती टी-शर्ट के अलावा और कुछ शायद ही मिले) को बडा कष्ट होता है। अब २ हफ़्ते के लिये नये कपडे, नहीं नहीं तौबा...

अरे, जब पहली बार भारत से आये थे तो मम्मी ने एक स्वेटर दिया तो था कि कभी कभी गर्मी में भी सर्दी हो जाती है। लेकिन उसको तो पिछले साल के सालाना घर की सफ़ाई अभियान में फ़ेंक दिया था। और उस नीली जैकेट का क्या हुआ? अरे भूल गये पिछली सर्दी में दोस्तों के साथ जब एक बार (bar) में मित्र के डाक्टर बनने की खुशी मनाने गये थे, तो टल्ली होकर जब सुबह बिस्तर पर नींद खुली थी तो टोपी और जैकेट नदारद थी। शायद बार में ही छूट गयी होगी।

अच्छा पुराना ब्रीफ़केस खोलकर देखो, शायद कुछ पडा हो। अरे ये एक जैकेट जैसी चीज तो है, लेकिन इतनी गन्दी है, इसे पहनोगे क्या? ड्राई क्लीनिंग, नहीं यार बहुत दूर जाना पडेगा और फ़िर वहाँ जाने के लिये क्या पहनोगे?

ह्म्म, कुछ लोग गरीबों को कपडें बाँट रहे हैं, शायद वहाँ से....हे राम, नरक में भी जगह न मिलेगी। घर पे वैसे भी शादी के रिश्ते नहीं आ रहे हैं और किसी ने ब्लाग पर पढ लिया तो फ़िर फ़ुल स्टाप। अरे, मैं तो ऐसे ही ब्रेन स्टार्मिंग कर रहा था। तुमने कैसे सोच लिया कि मैं इतना भी गिर सकता हूँ। ऐसा इसलिये सोचा कि पिछले साल एक बार जब घर में रात को खाने को घर में कुछ नहीं भी नहीं था, तो तुम....अरे, छोडो। ये ही गलत आदत है तुम्हारी, पुरानी बातें याद बहुत रखते हो। और, पडौस वाली आंटी ने कहा था कि कभी भी अच्छा खाना का मन कर तो...। लेकिन शाम को ८:३० बजे बिना बताये?
अच्छा छोडो उसे, वो पुरानी बात है। मैं सुधर गया हूँ।

अंकुर से पूछ के देखो उसके पतले दिनों के टाईम का शायद कोई स्वेटर पडा हो। नहीं नहीं, इससे उसे याद आ जायेगा कि अब वो मोटा हो गया है, वैसे भी उसके लिये भी मोटापे के चलते शादी के रिश्ते नहीं आ रहे हैं। नहीं नहीं, ये बिलो द बेल्ट होगा...

अरे, ये क्या है? सचमुच अद्भुत!!! ये कहाँ से आया? पता नहीं, तुमने कब खरीदा? याद नहीं, नहीं नहीं मैने इसे कभी नहीं खरीदा। कहीं ये उसका तो नहीं? किसका? अरे, उसी का, समझो...अरे नहीं, ये तो लडकों वाला रंग है, कहीं गुलाबी या लाल दिख रहा है तुम्हे? तुम्हे भी बहाना चाहिये पुरानी बातें छेडकर याद मुझे कष्ट देने में। नहीं, नहीं मैं तो ऐसे ही...हे हे हे...खामोश, आगे कुछ भी कहा तो अच्छा नहीं होगा।


लेकिन ये स्वेटर यहाँ आया कहाँ से....ह्म्म....हम्म...अच्छा जरा नजदीक से देखने दो। कुछ तो याद आ रहा है लेकिन कुछ पक्का नहीं है। किसी ने गिफ़्ट तो नहीं दिया? हमें कौन गिफ़्ट देगा? हाँ, वो भी है।

फ़िर देखने में नया भी लग रहा है। अरे याद आया....क्या? कुछ महीनों पहले तुमने घर की सफ़ाई कब की थी। लेकिन तब तो ये यहाँ नहीं था? हाँ, लेकिन सफ़ाई क्यों की थी?
क्योंकि समीरलाल जी सपत्नीक ह्यूस्टन आ रहे थेसमीरलाल जी, लाल शर्ट और ब्लैक फ़ुल पैंट वाले...

अरे, कसम से....भगवान भी बडा कारसाज है। उसने हमारी सर्दी का इन्तजाम अगस्त में ही कर दिया था। हमारे गरीबखाने से विदा होते समय उन्होने हमको उनकी पुस्तक "बिखरे मोती" और एक गर्म स्वेटर भेंट की थी। जय हो...चलो अब सब ठीक ही होगा।

कट जायेगा कल का दिन भी जब ह्यूस्टन में २-४ इंच बर्फ़ गिरने की उम्मीद है और हमारा धावक क्लब इस बर्फ़बारी को यादगार बनाने के लिये इसमें दौडने का कार्यक्रम बना रहे हैं।

बर्फ़ से याद आया कि हमने अपने जीवन में पहली बार बर्फ़ पिछले साल देखी थी जब ह्यूस्टन में ११ दिसम्बर को बर्फ़ गिरी थी। उसके फ़ोटो भी लिये थे जो लगा रहे हैं जिससे सनद रहे। अगर कल बर्फ़ गिरी तो उसके भी लगायेंगे। :-)



गुरुवार, नवंबर 05, 2009

घट घट में पंछी बोलता: अनुराग हर्ष की आवाज में !

कुछ दिन पहले पारूलजी ने अपने चिट्ठे पर वीणा सहस्रबुधे की आवाज में कबीर की रचना "घट घट में पंछी बोलता" सुनवायी थी। इत्तेफ़ाक की बात है कि कुछ दिनों पहले मैं भी इसी रचना को अपने चिट्ठे पर पोस्ट करने की फ़िराक में था लेकिन अनुराग हर्ष की आवाज में,


तो लीजिये पेश-ए-खिदमत है:


घट घट में पंछी बोलता

आप ही दंडी, आप तराज़ू
आप ही बैठा तोलता
आप ही माली, आप बगीचा
आप ही कलियाँ तोड़ता

सब बन में सब आप बिराजे
जड़ चेतना में डोलता
कहत कबीरा सुनो भाई साधो
मन की घुंडी खोलता

अनुराग हर्ष की आवाज में:



वीणा सहस्रबुधे की आवाज में:

मंगलवार, अक्तूबर 27, 2009

हिन्दी ब्लागिंग का प्रसार दीप्ति के माध्यम से भी हो सकता है !!!

आज अपने चिट्ठे पर किसी और की पुरानी पोस्ट प्रकाशित कर रहा हूँ। दीप्ति ध्यानी कालेज में हमसे दो वर्ष कनिष्ठ थीं और कम्प्यूटर साईंस की छात्रा थीं। कालेज में शायद ही कभी उनसे बात हुयी हो लेकिन कालेज से निकलने के बाद बातचीत शुरू हो गयी। दीप्ती भी आज की उस युवा पीढी से ताल्लुख रखती हैं जिन्हे बात बात पर पथभ्रष्ट और संस्कृतिविहीन मान लिया जाता है अगर हम अपने व्यवहार से उसको गलत साबित न करें तो। यानि की संस्कृति सम्पन्न सिद्ध करने की जिम्मेदारी हमारी बनती है। खैर ये विषयान्तर हो जायेगा...दीप्ति के चिट्ठे का नाम है Forgot to grow up!!!

एक और महत्वपूर्ण बात ये कि कुछ ही दिनों पहले दीप्ति और अंशुल पुनेथा का विवाह होना पक्का हुआ है और ये दोनो ६ फ़रवरी को अपने दाम्पत्य जीवन का प्रारम्भ करेंगे। दीप्ति और अंशुल को मेरी ओर से ढेर सारी शुभकामनायें।


दीप्ति ने अभी कुछ दिन पहले बडी मेहनत करके हिन्दी में एक पोस्ट लिखी और उस पोस्ट के भावों को संक्षेप में लिखने के स्थान पर मैं उसकी इज़ाजत से पूरी पोस्ट ही यहाँ छाप रहा हूँ। आशा है आगे भी दीप्ति हिन्दी अथवा हिन्दी/अंग्रेजी मिश्रित पोस्ट लिखती रहेंगी।
अगर आपको टिप्पणी देने की इच्छा हो तो दीप्ति की पोस्ट पर ही दें। दीप्ति को इस पोस्ट को लिखने में कई घंटे लग गये और वो सुबह के ४:३० बजे तक लिखती रही। बहुत मेहनती लडकी है, ;-)

आज शुक्रवार की शाम है.....ऑफिस में विशेष काम था नहीं, तो हमारे दिमाग में भांति भांति के विचार आने लगे; जब से नौकरी करना शुरू किये हैं, शुक्रवार नामक इस दिवस ने ज़िन्दगी में एक अलग ही स्थान प्राप्त कर लिया है; शुक्रवार की शाम आते ही मन प्रफुल्लित हो उठता है, आगे दो दिन की छुट्टी है....ऐसे लगता है मानो बस इन्ही दो दिन का इंतज़ार था..अब हम विश्व विजय कर लेंगे....वो सारे काम, जिनका चिटठा लिए हम हफ्तों से घूम रहे हैं; इसी सप्ताहंत में सभी का निर्वाह करके, आनंद और कर्त्तव्य परायणता की चरम सीमा को छू लेंगे...:) अगर पिछले दो सालों पर नज़र डालें तो विरले ही ऐसे सप्ताहंत रहे हैं जहाँ हमने खुद से किये गए कुछ वायेदों को निभाया है; अमूमन शनिवार और रविवार घर पे ही आराम फरमाते हुए, बचे हुए कुछ कामों को थोडा सा अंजाम के और करीब पहुंचाते हुए निकल जाते हैं; किन्तु शुक्रवार की शाम को जो मन मयूर में माहौल होता है..उसमे कोई विशेष अंतर नहीं आया है ..:)...आज ऐसे ही मन में विचार आ रहा था...कि क्या शुक्रवार सचमुच इतना मत्वपूर्ण होता है??? ....सांख्यिकी को अगर ध्यान में रखा जाए तो ९०% लोग ऐसे होंगे जो सप्ताह में इतना काम करते हैं, जिसे की सामान्य ऊर्जा स्तर से इति की ओर पहुँचाया जा सकता है ..और जिसके बाद २ दिन के अविघ्नकारी अवकाश की आवश्यकता नहीं होती....किन्तु हमारा मन मस्तिष्क इस तरह से यंत्रस्थ किया जा चुका है कि अगर ऊपर से निर्देश आ गए की इस शनिवार/ रविवार आपको ऑफिस आना पड़ सकता है, तो हम मानसिक रूप से ही इतने थक जाते हैं कि काम क्या ही हो पाता है....

Ok, as I write this post i realise, that I have lost all my grip over Hindi..:(...framing one sentence is taking more than 2 minutes, which by all standards is too too much, needless to mention the help from some random site and kind souls like N. I remember, there use to be a time when I was more of a Hindi person. Writing in our mother tongue came all very naturally. In addition to scoring highest marks in Hindi literature and grammar ..I use to be an active member of Hindi debate and writing club..:( .English was something which needed efforts, I still remember my first essay in English in class IV....I was disqualified from participating in a district level essay competetion as I committed some gross mistakes in my writing on "The Gulf War"-1991 (mistakes are too embarrassing to be mentioned here..:))....the remainder of this post has to be in Hindi...no matter how much time it takes.... "Shukra hai Shukravaar hai" can take a back seat...I guess I am more tempted to go down the "Hindi" memory lane :)

हमारी पीढी के अधिकाँश उत्तर भारतीय बच्चों की तरह हमारे घर में भी हिंदी का ही वर्चस्व था; हमारी मातृभाषा गढ़वाली है, और अक्सर माँ एवं पिताजी गढ़वाली में वार्तालाप करते पाए जाते हैं; किन्तु रोजमर्रह कि ज़िन्दगी में, और आसपास के वातावरण में भी हिंदी ही सबसे प्राभाव पूर्ण भाषा थी; हमारी माताजी संस्कृत/ हिंदी कि अध्यापिका हैं, दोनों ही भाषाओं में निपुण हैं, एवं पिताजी अलाहबाद विश्वविद्यालय से स्नातक तो हिंदी या यूँ कहिये काफी शुद्ध हिंदी में घर में वार्तालाप हो जाया करता था... मुझे याद आता है जब मेरे भाई बहिन का कक्षा १० का परिणाम आया...और वो अपेक्षा के अनुसार नहीं था; हमेशा की भाँती दोनों समझदार बच्चे सो गए...:) सोये रहेंगे तो पिताजी के प्रवचन कम सुनने मिलेंगे.....पिताजी ने शुध्ध हिंदी में कटाक्ष किया....

" ये पलायनवादी दृष्टिकोण कोई विशेष मदद नहीं करता है जीवन में"..:D
उनके मुह से ऐसे वाक्य अक्सर सुनने मिल जाया करते थे...
" दीप्ति, तुम में व्यवहारिक ज्ञान और विवेक कि कमी है "......
" मेरी बातें तुम्हे अभी कटु लगेंगी, पर बेटा, सत्य यही है कि देर से उठने वाले जीवन में बहुत आगे नहीं जाया करते"
"समय समय पे आत्म विश्लेषण अति आवश्यक है"

ऊपर लिखीं बातों को हमने जीवन में कितना अपनाया, इस पे तो टिपण्णी नहीं करुँगी ....पर घर में शुध्ध हिंदी कोई बहुत दूर कि चीज़ नहीं थी....माताजी अक्सर हमारे गलत उच्चारण को सही कर देतीं थीं.....फूल (phool) ओर फूल (fool) में अंतर करना उन्होने ही सिखाया.....मौसियों और चाचियों ने जब अपने बच्चों के कठिन नामों (जैसे: कनिष्क) को गलत हिंदी में लिखा तो माताजी ने आगे बढ़के "श" और "ष" में अंतर बताया...कक्षा ६ से १० तक, नवीन भारती, पराग, स्वाति (हमारी हिंदी पुस्तकें) के सभी गद्य और कविताओं का भावार्थ, प्रसंग और भी न जाने क्या क्या, को अत्यंत भावपूर्ण तरीके से लिखवाने में माताजी ने कोई कसर न रख छोड़ी ; हमने भी हिंदी में उच्चतम अंक पाके, उनको गौरवान्वित किया....और १ हिंदी अध्यापिका कि सुपुत्री होने का कर्त्तव्य पूर्ण रूप से निभाया..:) खैर, कहने का तात्पर्य ये है कि आसपास अच्छी हिंदी का माहौल था.....कक्षा ११ तक हम हिंदी वाद विवाद प्रतियोगिताओं में न केवल भाग लिया करते थे..बल्कि प्रथम या द्वितीय स्थान प्राप्त करके विद्यालय के गौरव को बढाते थे... (इन प्रतियोगिताओं में शीर्षक कुछ ऐसे होते थे: भारतीय राजनीति में धर्मं का हस्तक्षेप-कितना उचित/ अनुचित) ऐसे विषयों का ६वीं कक्षा में न तो सिर समझ आता था न पैर ..:) ८-१० पन्नों का १ झुंड हमें पकडा दिया जाता था......"बेटा, ये बोलना है...."...हम ख़ुशी ख़ुशी कर्तव्यपरायणता से उसे याद कर लेते थे....और किसी भी प्रतियोगिता में जाके.....मंडल/ जिले के हिंदी विद्वानों के सामने पूरे आत्मविश्वास एवं भावनाओं के साथ उगल दिया करते थे.....(Dias के पीछे hearbeats कितनी तीव्र गति से दौड़ रही होती थीं; इसका अनुमान शुक्र है किसी को कभी नहीं हुआ:) )

आज जब पीछे देखती हूँ तो याद पड़ता है...घर में १ रामायण हुआ करती थी....किसी हिंदी गाइड कि तरह दिखने वाली वो पुस्तक, २-३ भागों में थी.....हमने कक्षा २-३ में....पूरी रामायण (उत्तर रामायण सहित) ऐसे ही यहाँ वहां डोलते हुए पढ़ डाली थी (कहने कि आवश्यकता नहीं है..कि पुस्तक अत्यंत सरल हिंदी में थी)..... थोडा और बड़े हुए तो घर में रखे सभी शिवानी के उपन्यास (शिवानी हिंदी कि १ बहुचर्चित लेखिका हैं- उनकी सुपुत्री मृणाल पाण्डेय कुछ समय पहले तक हिंदी समाचार वाचिका थीं) पढ़ डाले; रुचि का १ कारण ये भी था कि सभी कहानियां/ उपन्यास गढ़वाल/ कुमाऊं का बड़ा ही रोचक वर्णन करते थे;

जब तक हम कक्षा १० में थे, घर में हिंदी अखबार नवभारत टाईम्स आया करता था; अखबार के मुख्य उपभोग्कता हमारे पिताजी थे, जो कि किसी भी दिन हिंदी भाषा से ज्यादा प्रेम/ तालुक रखते थे; स्कूल से आते ही, हम बिना change किये पहले पूरा अखबार पढ़ते....लोकल से ले कर विदेशी ख़बरों तक में सामान रुचि हुआ करती थी....फिर कक्षा ११वीं में ये अहसास हुआ, कि reading an English newspaper would any day be more beneficial:))..तो घर में टाईम्स ऑफ़ इंडिया भी आने लगा.....उसमे भी हमारी रुचि बस सन्डे टाईम्स में ही रहती थी....बाकी का अखबार अक्सर खाना खाते हुए बिछाने के काम आता था या अपनी अलमारी में किताबों के नीचे बिछाने के..:) इसी बीच हमने कहीं Readers' Digest और CSR देख लीं..:)..तो घर में वो भी आने लगीं.....ये दोनों ही बड़े मन से पढ़े जाते थे.... (Readers' Digest deserves a complete post in itself-its one of the most captivating reads I have ever come across).
खैर, हिंदी भाषा से ताल्लुक शायद वहीँ तक था; इधर हम घर से बाहर निकले जीवन में कुछ कर दिखाने के लिए..:P...उधर मातृभाषा से तार टूटने से लगे....इंजीनियरिंग कॉलेज में आके पहले दो साल तो "कुछ भी नहीं पढ़ा"..:D..उसके बाद जब लगा कि अब आगे क्या.......तो MBA रुपी जीव सामने दिखाई पड़ा........बस....तब से जो अंग्रेजी भाषा से नाता जुडा है..आज आलम ये है कि......इस पोस्ट को लिखने में इस साईट से लेके श्री N का सहारा लेना पड़ा......फाइनल इयर में The Hindu , आसपास पायी जाने वालीं सभी अंग्रेजी magazines पढ़ी जाने लगीं.....हर वो लेख जो कि कठिन हो, जिसका सिर, पैर ना समझ आ रहा हो....उसपे शोध होने लगा... TOI का एडिटोरिअल जो मैं पूरे होशो हवास में मुश्किल ही पढ़ती हूँ कभी, पूरी शिद्दत एवं तल्लीन्त्ता से रुचि लेके पढ़ा जाने लगा...

जीवन तो इन सब में पता नहीं कितना सुधरा है....पर इतना ज़रूर है कि....हिंदी से कहीं नाता टूट गया लगता है इस बार घर गए, तो प्रेमचंद की गोदान रखी मिली १ शेल्फ में पूरे जोश से उसे तुंरत बैग में डाला. ..ये पढ़नी है....आज ६ महीने हो गए हैं किताब लाये हुए घर से......मुश्किल से ५० पन्ने पढ़ पाए हैं...:( रुचि पूरी है...पर पढने की गति इतनी चरमरा गयी है कि अब उठाने का मन ही नहीं करता....:( भाषा कोई भी हो..अपने आप में बहुत आदरणीय होती है .....किन्तु मातृभाषा में जब लिखने/ पढने में कठिनाई होने लगे तो कहीं ये बात दिल को अखरती ज़रूर है;
PS:
१. Thanks to N, for being the शब्द kosh for writing this post :)
२. गोदान शीघ्रातिशीघ्र ख़तम कर ली जायेगी.....कितना भी समय क्यूँ न लगे...:)
३. शीर्षक का लेख से कोई सम्बन्ध नहीं है....शीर्षक twitter से उठाये गए कुछ वार्तालापों का मिश्रण है:)
४. पूरे लेख में पूर्णविराम की जगह ";" लगाना पड़ा है...:( ब्लॉग पूर्णविराम दिखा नहीं रहा है पोस्ट :(
ये लेख लिखते हुए सुबह के ४:३० हो गए.....निम्न वर्णित गीत ने काफी साथ दिया tempo बनाये रखने में.....इसे अवश्य सुने.....:)
http://www.youtube.com/watch?v=XJJv83-5EyQ
cheers :)

दीप्ति ध्यानी

सोमवार, अक्तूबर 26, 2009

अक्टूबर का गीला दिन, किशोरी और हमारी वापिसी !!!

आज सुबह नींद खुली तो देखा कि झमाझम बरसात हो रही है। ११ बजे तक पडे ऊँघते रहे और तर्क दिया कि जब घडी का आविष्कार नहीं हुआ होगा तो लोग रोशनी देखकर ही उठते होंगे और अभी रोशनी से लग रहा है कि सुबह का ५ बजा है। 

जब आत्मा पर बोझ बढने लगा और भूख से पेट सिकुडने लगा तो उठे, तैयार हुये और देखा कि घर में खाने का एक दाना भी नहीं है। खुश हुये कि चलो अब पका पकाया खायेंगे, बरसात में भीगते एक रेस्तराँ से खाना खाकर भीगते हुये अपने गरीब-रथ तक पंहुचे। आप सोच रहे होंगे कि हमने साथ में छाता क्यों नहीं लिया । हमने भी यही सोचा और अपने अजायबखाने रूपी घर में ५ मिनट तक छाता खोजा भी, लेकिन उसके बाद निष्कर्ष निकाला कि या तो रूममेट उठाकर ले गया होगा, अथवा किसी को उधार देकर भूल गये होंगे अथवा लैब में पडा हमारी डेस्क की शोभा बढा रहा होगा।

खैर झमाझम बारिश के बीच में अपने गरीब-रथ का बाजा चालू किया तो मानो बादलों के बीच बैठी श्रीमती किशोरी अमोनकर इसी क्षण का इन्तजार कर रही थीं। उनके स्वर से जब "मेहा झर झर बरसत रे" सुना तो तुरन्त पोस्ट लिखने का मन भी बना लिया। अपने रथ को एक कोने में रोककर बरसात के बीच में "मेहा झर झर बरसत रे" का आनन्द लिया और उसके बाद अपनी लैब में नमूदार हुये। आप भी इस गीत को सुनिये।



अब पोस्ट लिखने के बहाने पिछले कुछ महीनों का लेखा जोखा भी दे दें। ८ सितम्बर को जब हम भारत आये थे तो सोचा था कि ये करेंगे वो करेंगे, इससे मिलेंगे, उससे मिलेंगे आदि आदि इत्यादि। लेकिन ये सभी चुनावी वादे/विचार साबित हुये। और समझ भी आया कि हर काम को भारत यात्रा पर टाल देना अच्छी बात नहीं है क्योंकि घर वाले भी ऐसे ही चुनावी वादे कर चुके होते हैं।

जाहिर है घर वालों के वादे वादे होते हैं और हमारे वादे भांग के नशे में कहे गये शब्द अथवा ब्लागर मीट में लिये गये संकल्प, ;-) इसके चलते हमारे कई वादे कत्ल हो लिये। दिल्ली में रचना से मिलने का कार्यक्रम था जो सिर्फ़ फ़ोन पर बातचीत पर सीमित रह गया। गाहे बगाहे (ताना-बाना) वाले विनीत से बात करके मन खुश हुया और उनके शोधकार्य के बारे में सुनकर बहुत अच्छा लगा। पी.डी. तो भरे बैठे थे, हमने फ़ोन पर पहले ही माफ़ी मांग ली और उनके तलवार उठाने के पहले ही उनकी शादी की बात करके मामले को नया मोड दे दिया। मुम्बई वासी अभय तिवारी जी से बात हुयी और पता लगा कि वो असल में फ़रूखाबादी हैं और चूंकि हम एक बार फ़रूखाबाद गंगा नहाने जा चुके हैं तो उन पर अपनी करीबी जाहिर कर दी। उनसे नियमित लिखने का वायदा भी लिया गया। ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के फ़ोन की घंटी बजाने के प्रयास कई बार असफ़ल रहे, सम्भवत: वो व्यस्त रहे हों अथवा अनूप जी ने हमें गलत नम्बर दे दिया हो अथवा ये BSNL वालों का हमारी उनसे बात न होने देने का षणयन्त्र (षणयंत्र ?) रहा हो।

खैर इस बार भी घर वालों ने ध्यान नहीं दिया और हम कुंवारे ही रह गये, ;-)
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फ़िर भी कम निकले।

इस छुट्टियों में हिमालय यात्रा की गयी लेकिन उसकी रिपोर्ट अंकुर वर्मा के जिम्मे...

ह्य़ूस्टन वापिसी के बाद:

भारत में जब तक रहे दौडने से रिश्ता टूट चुका था, फ़िर से रिश्ता जोडने की कोशिश अभी भी चल रही है। ९ अक्टूबर की रात को ह्य़ूस्टन लौटते ही हमने ११ अक्टूबर की सुबह १० मील (१६ किमी) वाली दौड दौडने का निश्चय किया। जैट लैग के चलते न तो ठीक से सो पाये और १ दिन में न ही थकान उतर पायी। खैर सुबह दौडना शुरू किया तो ३ मील तक तो ठीक था लेकिन उसके बाद टांगो ने विद्रोह कर दिया। बडे कष्ट में अगले ७ मील गुजरे और जिस दौड को ७० मिनट में समाप्त करने की इच्छा थी वो ७१ मिनट और २१ सेकेंड्स में समाप्त हुयी। ये फ़ोटो गवाह है कि हमने आखिरी ७ मील किस दर्द में पूरे किये।

(आऊच, बहुत दर्द हो रहा है)


इसके बाद हमने अगले दो हफ़्ते धीरे धीरे दौडने से अपना टूटे रिश्ते के तार धीरे धीरे जोडे और कल एक हाफ़-मैराथन (२१.१ किमी) दौडी। ये दौड अच्छी रही क्योंकि इसमें हमने अब तक का अपने सर्वोत्तम समय दर्ज किया। हमने इसे १ घंटा ३२ मिनट और ५६ सेकेंड्स में पूरा किया। हाफ़-मैराथन के लिये हमारा पिछला सबसे अच्छा समय १ घंटा ३४ मिनट और ४१ सेकेंड्स था। इस दौड के अंतिम ३ मील कष्टप्रद रहे लेकिन हमने अपने मित्र और ट्रेनिंग पार्टनर डेविड पाईपर को ४० सेकेंड्स से पीछे छोडा। ध्यान रहे पिछली २ दौडों में डेविड ने हमारी वाट लगा रखी थी, ;-) अब मामला बराबरी पर है।
अगली दौड २५ किमी की है जो २ हफ़्ते बाद है, जैसा कि हम आपस में कहते हैं The bet is ON David...

कल की दौड के सबक हैं कि हमें अपनी रनिंग फ़ार्म को सुधारना है। कन्धे सीधे रहने चाहिये और कदम एकदम मशीनी एकुरेसी के साथ पडने चाहिये। हम तीन फ़ोटो दिखाते हैं। एक हमारा है, एक डेविड का है और एक ट्वांग का है जो हमारे स्तर से बहुत ऊँचे धावक हैं तेज रफ़्तार पर भी उनकी रनिंग फ़ार्म देखिये, देखकर ही मन खुश हो जाता है।


चलिये, अब विदा दीजिये...अब नियमित पोस्ट छापते रहेंगे, अगर कोई पढने वाला है तो, ;-)


                   (७१९ नंबरी नीरज)


                  (२२३४ नंबरी डेविड)

          (और ३८ नंबरी ट्वांग, क्या बात है)


 

शनिवार, सितंबर 05, 2009

माइक्रो पोस्ट मैक्रो खबर, अब दिल्ली दूर नहीं !!!

प्रिय मित्रों/साथियों,
बड़े दिनों से व्यस्तता के चलते कुछ लिखना नहीं हो पाया लेकिन खबर है कि नीरज रोहिल्ला ८ सितम्बर को लगभग ४ हफ्तों के लिए अपने देश भारत आ रहे हैं, ;-)

फिलहाल अंदाजा है कि दिल्ली/नोयडा क्षेत्र में कुछ दिन ठहरने का कार्यक्रम बनेगा | बाकी समय माताजी/पिताजी के आदेश पर बुशर्ट पैंट पहन कर घर में राजा बबुआ बन कर बैठे रहेंगे कि इसी से माताजी पिताजी को अहसास हो कि लड़का जवान हो गया है और शायद वो शादी के लिए कोई लडकी देखना शुरू कर दें, वरना जैसी ईश-इच्छा, ;-)

८ सितम्बर: दिल्ली से मथुरा
१० सितम्बर-१४ सितम्बर: दिल्ली/नोयडा
१५ सितम्बर-२२ सितम्बर: निंदा पुराण/ वाले अंकुर वर्मा और हमारे एक अन्य मित्र टोड गिल्बर्थ के साथ हरिद्वार/ऋषिकेश/चोपटा/.../ वैली आफ फ्लावर्स होते हुए वापिस दिल्ली
२३ सितम्बर से २ अक्टूबर तक: मथुरा में राजा बबुआ बनकर बैठे रहना ;-)

हमारे मित्र टोड गिल्बर्थ बड़े दिलचस्प इंसान हैं और वो ५ हफ्ते के लिए भारत आ रहे हैं | हम उनके साथ ७ दिन घूमेंगे लेकिन टोड झोला लटकाए भारतीय रेल के माध्यम से भारत घूमेंगे |
फिलहाल उन्हें वाराणसी में एक मित्र की तलाश है जो उन्हें बनारस दर्शन करा सके, अगर कोई बनारस वासी टोड को गंगा मैया के दर्शन कराने का पुण्य लेना चाहे तो उनकी मुश्किल हल हो जायेगी और वो इसके लिए बड़े कृतज्ञ रहेंगे, आप अपने पुण्य कार्य को कन्फर्म करने के लिए हमें nrohilla@gmail.com ईमेल कर सकते हैं....

मुंबई और गोवा निवासी भी इस पुण्य को प्राप्त कर सकते हैं, बिना हिचकिचाहट के हमसे संपर्क करें, nrohilla@gmail.com ;-)


इस बीच में अन्य हिन्दी ब्लागर्स से संपर्क स्थापित करने का यत्न किया जाएगा, और टेलीफोन डायरेक्टरी के स्थान पर अनूप जी की सहायता ली जाएगा...

मथुरा में हमें इन फ़ोन नंबर पर पकडा/जकडा जा सकता है:
५६५-२४२४७८८
९७१९६१८२७९

बाकी, अगर आप सभी जिनकी इस हलके वजन वाले नाचीज़ से मुक्कालात अथवा बातचीत करने की इच्छा हो हमें अपना फ़ोन नंबर हमें nrohilla@gmail.com ईमेल कर सकते हैं, ;-)

अगली पोस्ट अब भारत से ही लिखेंगे...

रविवार, अगस्त 02, 2009

जुलाई के महीने की दौड़ का लेखा जोखा


जुलाई के महीने की दौड़ का लेखा जोखा:

इस बार की ह्यूस्टन मैराथन ने दौड़ से पहले ही कई रेकार्ड बनाये | दौड़ तो १७ जनवरी २०१० को दौडी जायेगी लेकिन इसको दौड़ने के लिए पंजीकरण जुलाई १८ को शुरू हुआ | पिछली बार की दौड़ में हाफ और फुल मैराथन के लिए कुल २२००० स्थान थे लेकिन फुल मैराथन के लिए स्थान निश्चित न होने के कारण देखते ही देखते हाफ दौड़ने वालों ने फुल मैराथन दौड़ने वालों के लिए स्थान की तंगी कर दी | इस साल आयोजकों ने फुल और हाफ दोनों के लिए ११००० -११००० स्थान निश्चित कर दिये |

ताज्जुब हुआ कि मात्र २४ घंटे में ही हाफ मैराथन के ११००० स्थान भर गए और इन्ही २४ घंटों में फुल मैराथन भी ७०% भर गयी | हमने तो रात को २ बजे जागकर अपना पंजीकरण करवाया था लेकिन अगले दिन उनके डेटाबेस में अपना नाम खोजा तो नहीं मिला | हमारे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी क्योंकि अब केवल १००० स्थान बाकी थे और हमें समझ नहीं आ रहा था कि क्या हमें दुबारा पंजीकरण कराना पड़ेगा | हमने तुंरत उन्हें फ़ोन मिलाया और इमेल पर प्राप्त हुयी पंजीकरण की रसीद उन्हें भेजी | उसके बाद रेस डायरेक्टर ने हमको फ़ोन करके भरोसा दिलाया कि हम चिंता न करें और चाहे जो हो जाए वो हमें इस दौड़ में स्थान अवश्य दिलायेंगी | हमको भरोसा देने के लिए उन्होंने आन-द-रेकार्ड ये ईमेल भी भेजी|

Neeraj,

I’m looking into this for you.  I am terribly sorry for the inconvenience. 
No matter what has happened, I promise that you will have a spot in our race.  We will get this taken care of for you.
I hope to be calling you soon with a response.

Best regards,
Carly Caulfield
Operations Director
Chevron Houston Marathon
713.957.3453 voice

खैर, अगले ३ दिनों में हमारी समस्या सुलझ गयी और हम आधिकारिक रूप से ह्यूस्टन मैराथन दौड़ने वालों की सूची में आ गये | अब पंजीकरण के पश्चात हमारी ट्रेनिंग जोर-शोर से शुरू हो गयी है (जो पिछले दो महीनो से धीमी चल रही थी) | इस साल की दौड़ में हमारी कोशिश इस मैराथन को ३ घंटा और १० मिनट में समाप्त करने की है जिससे कि हम बोस्टन मैराथन जो अमेरिका की सबसे पुरानी मैराथन दौड़ है में हिस्सा ले सकें | ये ध्यान दिला दें कि कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू खैरा बोस्टन मैराथन में दौड़ नहीं सकता और इसके लिए बाकायदा क्वालीफाई करना होता है जो आसान नहीं है | विभिन्न आयु-वर्गों के लिए क्वालीफाइंग समय इस प्रकार हैं:


Age GroupMenWomen
18 - 343:10:593:40:59
35 - 393:15:593:45:59
40 - 443:20:593:50:59
45 - 493:30:594:00:59
50 - 543:35:594:05:59
55 - 593:45:594:15:59
60 - 644:00:594:30:59
65 - 694:15:594:45:59
70 - 744:30:595:00:59
75 - 794:45:595:15:59
80 and over5:00:595:30:59

नोट करें कि अगर हमारा नाम नीरजा रोहिल्ला होता तो हमें केवल ३ घंटा ४० मिनट में ही दौड़ पूरी करनी होती जो हम पिछले साल ही दौड़ने में सक्षम थे, बड़ी नाइंसाफी है, ;-)

हमको अपने पिछली मैराथन के समय ३:३८ से ३:१० पर लाने के लिए कड़ी मेहनत और ह्यूस्टन के जलील मौसम (अभी ३८ डिग्री और ९५% आद्रता) में खूब पसीना बहाना होगा | ३:१० मैराथन का अर्थ है कि हम किलोमीटर को ४ मिनट और ३२ सेकेंड्स में दौडें और एक-दो नहीं बल्कि ४२.२ किलोमीटर तक दौड़ते रहें | देखते हैं, हमारी ट्रेनिंग क्या रंग लाती है, ;-)



हम हर महीने पर अपनी ट्रेनिंग रिपोर्ट आपको देते रहेंगे, फिलहाल अगले तीन हफ्तों का उद्देश्य है कि हर हफ्ते लगभग १० प्रतिशत की दूरी का इजाफा करते करते लगभग ४० मील प्रति हफ्ता (६४ किलोमीटर प्रति हफ्ता) तक लाया जाए | उसके बाद अगले २ महीने में इसे ५०-५५ (८०-८५ किमी/हफ्ता) तक ले जाकर उसके अगले २ महीनों तक स्थिर रखा जाए | ये रहा हमारे जुलाई की दौड़ का लेखा जोखा, ;-)

Week Starting
Easy Miles
Marathon Pace Miles
Threshold Pace Miles
VO2 Max Miles
Total Distance
June 29 -  July 5
18.5
0
5.0
0
23.5
July 6 -
July 12
9.5
0
5.0
0
14.5
July 13 - July 19
19.3
0
5.0
0
24.3
July 20 - July 2625.1
0
5.0
0
30.1
July 27 -  Aug 2
27.5
0
5.0
0
32.5
Total
99.9
0
25.0
0
124.9




मंगलवार, जून 30, 2009

पतरस बुखारी का मजमून "होस्टल" जिया मोहेयेद्दीन साहब की आवाज में!!!

जिया साहब की आवाज में हमने पहले भी कुछ किस्से सुनवायें हैं, इसी कडी में आज पतरस बुखारी साहब का किस्सा "होस्टल" पेश है। इस किस्से में जिया साहब पढाई के लिये घर से दूर जाने पर "होस्टल" की अहमियत बतायी गयी है :-)
उम्मीद है जो लोग घर से दूर होस्टल में रहे हैं, उन्हें उनके पुराने दिन जरूर याद आ जायेंगे।

रविवार, जून 28, 2009

अनामी मित्र का स्वागत और कुछ खिचडी पोस्ट !!!

हम तो मारे शर्म के गडे जा रहे हैं। अनामी भाई/बहन की टिप्पणियों पर हिन्दी ब्लाग जगत में आतंक मचा हुआ है। जो भी उसकी पैरवी करे, उसे तुरन्त काजमी साहब की तर्ज पर ब्गागद्रोही साबित कर दिया जाता है। और एक हमारा चिट्ठा है जो हमने खुल्ला छोड रखा है जिसके चलते भी कभी अनामी साहब नहीं फ़टकते। बहुत पहले जब लिखना शुरू किया तो बस ऐसा इन्तजाम किया कि टिप्पणी पोस्ट होते ही ईमेल से खबर मिल जाये जिससे कि अगर कभी कुछ सेंसर करना पडे तो तुरन्त कर सकें, वरना तुरन्त टिप्पणी छप जाये। लगभग तीन वर्षों में एक बार भी स्थिति नहीं आयी की मामला सेंसर करना पडा हो। एक-आध बार लगा की हटा दें लेकिन टिप्पणी पडी रहने दी और अगली पोस्ट तक याद भी नहीं रहा।

और भी गम हैं जमाने में अनामी के सिवा,
राहतें और भी हैं १५ मील की दौड के सिवा।

खैर, अनामी टिप्पणी हमारे ब्लाग पर जारी रहेगी क्योंकि हम चर्चा में इसके स्थान का महत्व मानते हैं। ये वैसा ही है, जब हम और आप अपनी कहानी सुनाते समय कहते हैं कि "एक बार मेरे दोस्त के साथ ऐसा हुआ"। इससे आगे अगर कोई गाली लिखे तो एक बटन से टिप्पणी डिलीट हो जाती है। उसका लिखा एक पैराग्राफ़ और आपका सिर्फ़ एक क्लिक, हम तो ये खेल रोज खेलने को तैयार हैं लेकिन हमें कोई भाव ही नहीं देता।


क्यों एक टिप्पणी से ही हमारा आपा खो जाता है और फ़िर हम जवाबी टिप्पणी लिखकर उसे द्वन्द युद्ध के लिये आमंत्रित कर लेते हैं। चिट्ठे से इतना मोह ठीक नहीं, साईबर जगत में टहल रहे इलेक्ट्रानों से इतनी नजदीकी का भ्रम पालें तो अपनी रिस्क पर :-) खैर, जो इसको अपनी प्रतिष्ठा का सामान बनाकर आईटी के औजार तरकशों में सजाये बैठे हैं, उनको इस एक तरफ़ी लडाई में जीत के लिये पहले से बधाई।

एक और प्रश्न है जो काफ़ी समय से सोचने पर मजबूर कर रहा है। कई चिट्ठाकार हैं जो नियमित लिख रहे हैं और बहुत अच्छा लिख रहे हैं। अचानक किसी एक विषय पर विचार न मिलने पर इतना हंगामा? कहाँ गयी सहिष्णुता कि हम असहमति पर सहमत हैं? क्या हर बहस का अन्त किसी एक की जीत से होना चाहिये। निर्मल आनन्द पर कभी पढा था कि विचार व्यक्ति/व्यक्तित्व का एक बहुत छोटा सा हिस्सा होता है जो अमूर्त है और बदलता रहता है, लेकिन यहाँ पर केवल वैचारिक असहमति पर इतना प्रलाप? इसे प्रतिष्ठा का चिन्ह बना लेना कहाँ तक ठीक है।

चलते चलते, हमारे मित्र अंकुर भारत से वापिस लौटकर आये हैं और बहुत सारी नयी खबरे, मिठाई, घर की बनी पूरियाँ, मठरी, और मुकेश की आवाज में हमारे लिये पाँच सीडी का "रामचरित मानस" का सेट लाये हैं और हम सुने जा रहे हैं, मुग्ध होकर, अहा आनन्दम आनन्दम!!!

शुक्रवार, जून 26, 2009

आज सिर्फ एक फोटो, और एक उम्मीद!!!

आज सिर्फ एक फोटो, और उम्मीद कि ये दिन जल्दी आये और मेरी बहन, मित्र, पडौसन को अपने मन की बात करने से पहले सौ दफा सोचना न पड़े...


चित्र को बड़ा करके देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें...
Photo: Courtesy of http://blog.blanknoise.org

गुरुवार, जून 18, 2009

एक दिन का किस्सा और मजाज़ की याद में!!!

कल के दिन की शुरूआत और अन्त दोनो कष्टप्रद रहे ।

शुरूआत सुबह ४:३० बजे के अलार्म से हुयी और ३-४ मिनट बिस्तर में पडे पडे खुद को गालियाँ दी कि किस पागल कुत्ते ने काटा था जो सुबह ५:३० बजे वाले हिल रनिंग ग्रुप (www.willshills.net) के साथ दौडना शुरू कर दिया। फ़िर उठे, दाढी बनाकर ५:२५ पर हिल्स रनिंग के लिये जा पंहुचे। आज के वर्क आऊट का नाम Mark Fraser Workout था। मार्क फ़्रेजर को मैं जानता हूँ और वो खुद को कष्ट देने के लिये प्रसिद्ध हैं। आखिर और कौन अपने जन्मदिन पर अकेले २५ मील दौडने का कार्यक्रम बनाता है। इस वर्क आऊट के बारे में एक दिन पहले अपने एक मित्र से ईमेल से पूछा तो उनके शब्द ये थे (बिना किसी फ़ेरबदल के)।

प्रश्न: I have never done Fraser workout. What exactly is this? The schedule
says that it’s a combination of Fraser and LP sort of run. What does that
mean?

उत्तर: It means everyone is gonna be curled up in the fetal position, crying
for their mommy after the workout -- that's what it means Neeraj.


खैर जैसा सुना था वैसा ही निकला, २५ मिनट पहाडों की चढाई और उतराई पर दौडते दौडते अन्त में सभी कुत्तों की तरफ़ बेतहाशा हांफ़ रहे थे। उसके स्कूल के जिम में स्नान करने के बाद हम ८ बजे अपनी मेज पर आ चुके थे। सोचा था कि आज शाम को दौडेंगे नहीं केवल मुफ़्त(आज एक मित्र अपने जन्मदिन की खुशी में मुफ़्त बीयर बांट रहे थे) बीयर पीने मित्रों के साथ वलहाला जायेंगे। लेकिन दोपहर में एक ईमेल मिली की एक नयी मेम्बर हमारे रनिंग ग्रुप के साथ दौडना चाहती हैं, लेकिन उन्हें रास्ता नहीं पता है और साथ में एक दौडने वाला/वाली चाहिये जिससे वो रास्ते में खो न जाये। हमारी Member At Large की कुर्सी की जिम्मेवारी है कि नये मेम्बर्स का ध्यान रखें जिससे उन्हे क्लब में कोई असुविधा न हो।

लम्बी कहानी छोटी करके लब्बोलुआब ये कि हमको शाम को ३८ डिग्री की धूप में और ८०% आद्रता में १० किमी उस नये मेम्बर के साथ दौडना पडा। वैसे वो नयी मेम्बर भी हमारी तरह स्टूडेंट निकली, और Baylor College of Medicine में कैंसर पर अपनी पीएचडी कर रही हैं।

उसके बाद थोडी से मुफ़्त बीयर चांपी गयी और दोस्तों से बातचीत की गयी। थोडी देर के बाद (१०:३० pm) जब सब घर जाने की तैयारी करने लगे तो देखा गया कि मुफ़्त की बीयर पीकर एक दोस्त काफ़ी टल्ली हो गये हैं। ये एक नयी समस्या आ खडी हुयी, जब किसी टल्ली से पूछो कि "Can you drive back home?" और उत्तर मिले, "May be, I am not sure" तो इसका अर्थ है कि मामला सीरियस है वरना सभी का जवाब होता कि "हाँ, क्यों नहीं, हम एकदम ठीक हैं" :-)

हमने उनसे पूछा कि घर कितनी दूर है तो बोले २ ब्लाक मतलब लगभग ४०० मीटर दूर। हमने कहा कि चलो हम तुम्हारे साथ पार्किंग लाट तक चलते हैं और अगर तुम्हे कोई दिक्कत हुयी तो हम तुम्हारी कार से तुम्हे घर छोड देंगे और दो ब्लाक दौडते हुये वापिस अपनी कार तक आयेंगे और उसके बाद अपने घर जायेंगे।

उनकी कार तक पंहुचे तो वो दरवाजा खोलने की हालत में भी नहीं थे। उनसे कार की चाबी लेकर उनके घर का रास्ता पूछते पूछते कार चलानी शुरू की और उनका घर दो ब्लाक के स्थान पर लगभग ४ किमी दूर निकला।

लगभग ११ बजे उन्हे घर छोडने के बाद हमने वापिस स्कूल की तरफ़ दौडना शुरू किया। ४ किमी कोई खास दूरी नहीं है लेकिन पूरे दिन मेहनत के बाद वो चार किमी बहुत कठिन लगे। दूसरा जीन्स और Non-running shoes में दौडना इतना आसान नहीं। उस पर सारी सडक सूनसान और लुट जाने का डर, पैर इतने थके हुये कि इतना भी भरोसा नहीं कि अगर कोई पीछे पडा तो उससे दौडकर पीछा छुडा लेंगे। उस पर मजे की बात ये कि रात की अंधेरी सडकों पर दौडते दौडते हमें मजाज़ की ये नज़्म याद आ गयी।

शहर की रात और मैं नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ
गैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ ?
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

खैर थोडा दौडकर और थोडा चलकर ३० मिनट में अपनी कार तक पंहुचे और उसके बाद रात को १२ बजे अपने घर जाकर बिना कुछ खाये पिये अपने बिस्तर पर ढेर हो गये। सुबह नींद खुली तो उन्हीं सज्जन का संदेश मिला:

Oh my. It took me a few minutes this morning to figure out how I got here and who I needed to to thank for making it happen. I'm pretty sure you're responsible. THANK YOU. And next time, just convince me overnight parking at Rice is free. When I'm drunk I believe anything.

Shit - man do I ever owe you. Not that I'll ever figure out what all happened last night, but I'm really confused about how my car ended up in my garage because I didn't think I had the gate card. Did you park it in the garage? I went to go move it in this morning and discovered it was already there!


चलिये हमारा दिन तो गुजर गया कि आप मजाज़ साहब की आवारा नज्म की इन पंक्तियों को सुनिये जिसका आडियो इतनी आसानी से उपलब्ध नहीं है।

इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

मुफलिसी और ये मजाहिर हैं नजर के सामने
सैकड़ों चंगेज-ओ-नादिर हैं नजर के सामने
सैकड़ों सुल्तान जाबिर हैं नजर के सामने
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

ले के चंगेज के हाथों से खंजर तोड़ दूँ
ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या ना तोड़े मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ
ऐ गम-ए-दिल क्या करूँ ? ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ ?

सोमवार, जून 15, 2009

अभी व्यस्त हूँ बाद में फ़ोन करना!!!

मैं अक्सर घर से स्कूल के रास्ते में घरवालों को फ़ोन करता हूँ। कभी कभी जब लम्बी बात होती है मैं लैब तक आ जाता हूँ तो कभी कभी फ़ोन पर कहना होता है कि "अच्छा, अब लैब में आ गया हूँ, बाकी बातें बाद में"। इसका ये अर्थ न लगाया जाये कि हम लैब में बहुत काम करते हैं :-)

लेकिन आज उल्टा हुआ। पिताजी का इस महीने मथुरा से आगरा स्थानान्तरण (ट्रांसफ़र) हो गया है। कभी कभी घर पर फ़ोन करो तो केवल माताजी से बात हो पाती है क्योंकि पिताजी या तो दफ़्तर के लिये निकल चुके होते हैं अथवा घर में नहीं पंहुचे होते हैं।
आज सुबह (पिताजी की शाम का ७ बजे) हमने पिताजी के मोबाईल पर फ़ोन किया। काफ़ी देर के बाद फ़ोन उठा और ये संवाद रहा (बोल्ड वाले अंश पिताजी के हैं):

हां, बोलो
कुछ नहीं पापा, बस ऐसे ही हाल चाल के लिये फ़ोन किया था। सब बढिया,
हाँ, सब बढिया। अभी थोडा व्यस्त हूँ कोई जरूरी काम?
क्या अभी आफ़िस में हैं?
नहीं, आफ़िस से बाहर लेकिन आफ़िस के काम से ही। कोई खास बात?
नहीं, बस राजी-खुशी।
अच्छा बेटा ठीक है, बाद में बात करेंगे।
डिस्कनेक्ट!!!

इसके तुरन्त बाद ही कुछ और पुरानी यादें ताजा हो गयीं। कई बार पिताजी को किसी काम के लिये बोलो तो कम से कम २-३ दिन का डिले मानकर चलो क्योंकि आफ़िस जाते ही पिताजी हम सबसे अनजान हो जाते हैं। एक-दो बार जब स्थिति बिगडती तो बोलते कि अच्छा आफ़िस आ जाना, लंच में ५ मिनट का समय निकालकर तुम्हारा काम करवा देंगे। हमें पता होता था ये केवल बहाना है इसलिये हर बार अगले १-२ दिन की बाट देखते :-)

एक बार हम और मेरी बडी बहन उनके आफ़िस जा पंहुचे, दफ़्तर में घुसे तो देखा पिताजी व्यस्त हैं हमेशा की तरह।

अच्छा आ गये तुम लोग, बैठो अभी ५ मिनट में चलते हैं।
दो कुर्सियों पर हम दोनो बैठ गये।
१५ मिनट के बाद: अरे, पानी/चाय पियोगे तुम लोग।
नहीं, अच्छा पानी ठीक है। पानी भी पी लिया। इतने में १५ मिनट और बीत गये।
इतने में पापा के सहयोगी बाजू से गुजरे, अरे बेटा आप लोग। क्या हाल चाल हैं? पढाई कैसी चल रही है। सब बढिया,
अच्छा ठंडा पियोगे? नहीं, बस अभी पाँच मिनट में निकलना है।
ये सुनकर पिताजी को कुछ याद आया, अरे मैं भूल गया। बस अभी निकलते हैं।
१५ मिनट और बीते, अब मैं बहन को और वो हमें देख रही है।
अच्छा तुम लोग उस दुकान पर जाओ, हम यहीं से फ़ोन कर देते हैं।
फ़िर हम दोनों अपने हिसाब से अपना सामान खरीदकर घर चले गये, पिताजी फ़ोन करना भी भूल गये :-)

घर पर माताजी ने हमें देखते ही पूछा, बडी देर लगा दी। पापा गये थे साथ में? बस हम और मेरी बहन मुस्कुरा दिये।
देखा, मैने पहले ही कहा था कि कोई फ़ायदा नहीं है।

कुछ आदतें कभी नहीं सुधरती। उन्हे कभी दफ़्तर के लिये लेट और समय से पहले घर आते नहीं देखा। अक्सर लेट ही घर आते देखा है। एक दिन बता रहे थे, बहुत से लोगों ने VRS (Voluntary Retirement Scheme) ले लिया है और इसके बदले भर्ती बिल्कुल नहीं हुयी हैं। इस पर भी जो लोग काम करते थे, उन्होने ही VRS लिया है और बाकी कम काम पर ऐश करने वाले अभी भी लगे हुये हैं, इससे सन्तुलन बिगड गया है।

काम के लिये समय की पाबन्दी शायद पिताजी से ही सीखी है।

शुक्रवार, मई 29, 2009

धावक क्लब का वार्षिक सम्मेलन, राजनीति, चुनाव और हमारा ईनाम !!!

कल शाम को हमारे रनिंग क्लब का वार्षिक सम्मेलन था। इसमें पूरे साल में होने वाली विभिन्न दौडों के आधार पर ईनाम दिये जाते हैं, पूरे साल के लिये हुये कुछ चुनिंदा फ़ोटो का स्लाईडशो चलाया जाता है और सबसे महत्वपूर्ण कि नये कमेटी का चयन किया जाता है।

हमारे रनिंग क्लब में लगभग ४०० लोग हैं और ये ह्यूस्टन का काफ़ी सम्मानित रनिंग क्लब है। हम पिछले साल की कमेटी में Member At Large थे। हमारी जिम्मेदारी थी कि इस बूढे होते क्लब में फ़िर से जवान लोगों की भर्ती की जाये और एक नये खून का संचार किया जाये। मेरे ख्याल से इस काम में मुझे सफ़लता मिली लेकिन मंजिल अभी दूर है। इस बार फ़िर से चुनाव के समय लोगो ने हमें Member At Large के लिये उम्मीदवार नामित किया जिसे हमने नम्रता से स्वीकार कर लिया। इस साल तीन मेम्बर एट लार्ज के पद के लिये चार उम्मीदवार थे तो हमें थोडी इलेक्शन कैम्पेनिंग भी करनी पडी :-)

प्रेसीडेंट के लिये इस बार का चुनाव महत्वपूर्ण था। पिछले दो वर्षों से प्रेसीडेंट रहे एडी (Eddie) के मुकाबले हमारे चहेती कैथी (Kathi) मैदान में थी। आप कैथी की इलेक्शन कैम्पेन का ये वीडियो देखिये,


प्रेसीडेंट के लिये मतों का अन्तर इतना कम था कि गिनने वालों को अलग शान्त कमरे में जाकर ३ बार गिनती करनी पडी। मतों की गिनती के बाद कैथी विजयी घोषित हुयी और हम भी मेंबर एट लार्ज फिर से चुन लिए गए :-)

कुल दिए जाने वाले ईनाम इस प्रकार थे,

1) Best Runner of the Year (Male, 10 prizes total)
2) Best Runner of the Year (Female, 10 prizes total)
3) Most Improved Runner of the year (2 prizes)
4) Best Newcomer of the year (1 prize)
5) Top Gun (Fastest runner 2 each for male and female)

इस बार के इनामों में एक इनाम हमें भी मिला, और ये रहा हमारा कच्चा चिट्ठा जिसके चलते हमें ईनाम मिला :-)

दौड़                        समय (२००८)    समय (२००९)     % Improvement
Half-Marathon (21.1 km)   1:53:54        1:34:41           16.8 %
10 Kilometers              0:48:12        0:41:09           16 %








(चुनाव जीतने के बाद हम और एना खुशी मनाते हुए, :-) )

सोमवार, मई 25, 2009

फ़िल्म तुम्हारा कल्लू की एक सुन्दर कव्वाली ...

अभी कुछ महीनो पहले एक मंदिर की वीडियो लाईब्रेरी में कुछ डीवीडी देखते देखते बासु भट्टाचार्य की १९७५ की फ़िल्म "तुम्हारा कल्लू" पर नजर पडी। ऐसे ही बिना सोचे खरीद ली और देखी तो अच्छी फ़िल्म लगी। सबसे खास लगी इस फ़िल्म की एक कव्वाली जिसे आज आपकी खिदमत में पेश कर रहे हैं।
कव्वाल शंकर शंभू हैं जो पहले दिल्ली में रहते थे, अब भी शायद दिल्ली में ही हों। फ़िलहाल आप इस कव्वाली का आनन्द लें:

आप ही ने बनायी ये हालत मेरी,
आप ही पूछते हैं ये क्या हो गया।

आप से तुम हुये तुम से फ़िर तू हुये,
देखते देखते क्या से क्या हो गया।

कुछ परेंशा परेंशा सा है कारवां,
क्या कोई राहजन रहनुमा हो गया।

उड रही हैं फ़जाओं में चिन्गारियाँ,
क्या चमन में कोई हादसा हो गया।

एक सजदे की मोहलत अजल से मिली,
मुंह दिखाने का कुछ सिलसिला हो गया।

दिल पे ऐ दिल नजर उनकी ऐसी पडी,
एक ही वार में फ़ैसला हो गया।




रविवार, मई 24, 2009

संगीता पुरी जी के वैज्ञानिक प्रयोग पर मेरी राय !!!

संगीता पुरीजी अपने चिट्ठे पर गत्यात्मक ज्योतिष से सम्बन्धित लेख लिखती हैं। वो अक्सर प्रयास भी करती हैं कि कैसे गत्यात्मक ज्योतिष को विज्ञान सम्मत सिद्ध किया जा सके। मुझे उनके विचारों से सहमति नहीं है लेकिन उनके प्रयासों के प्रति निश्चित रूप से सम्मान का भाव है। अगर वास्तव में इस विज्ञान साबित किया जा सके तो यकीन मानिये मुझसे ज्यादा खुशी किसी को नहीं होगी। इसके विपरीत अगर आधे अधूरे तर्कों के माध्यम से इसे विज्ञान सम्मत बनाया गया तो इसमें गत्यात्मक ज्योतिष और स्वयं संगीताजी की हानि है।

इसी के चलते मैं उनकी मौसम सम्बन्धी भविष्यवाणी वाली पोस्ट और ब्लाग जगत से सम्बन्धित १०००० लोगों का डेटा इकट्ठा करने वाली पोस्ट के सम्बन्ध में अपनी राय रख रहा हूँ।

१) मौसम सम्बन्धी पोस्ट पर उनसे टिप्पणी के रूप में बातचीत के बाद लगा कि उन्होने ग्रहों की स्थिति से समूचे भारत के मौसम के बारे में पूर्वानुमान किया कि... उन्ही के शब्दों में (मेरे प्रश्न पर उनकी जवाबी टिप्पणी में):

"१ मई से ४ मई के बीच में अधिकांश जगह बारिश का योग है और लगभग पूरे भारतवर्ष में मौसम गडबड रहेगा"

इस भविष्यवाणी को जाँचने का सही तरीका है कि आप आंकडे देखें कि भारत वर्ष के लगभग ६०० जिलों में से कितनों में बरसात हुयी अथवा मौसम गडबड रहा। अगर आप ४-६-१० स्थानों पर बारिश देखकर अपनी भविष्यवाणी को सच मानती हैं तो ये वही बात हुयी जो मेरी बडी बहन कहा करती थी जब वो कक्षा ७ में थी। मेरी बहन कहती थी कि उसकी क्लास में उसकी तीन सहेलियों के मामा दिल्ली में रहते हैं इसका मतलब कि अधिकांश बच्चों के मामा दिल्ली में रहते हैं।

असल में अगर ६०० में से ५०० में भी बरसात हुयी हो तो भी ये फ़ूल-प्रूफ़ विज्ञान नहीं बन जाता लेकिन मुझे लगता नहीं कि इससे आगे जाने की नौबत आयेगी।

२) इसके अलावा आपने अपनी दूसरी पोस्ट में लिखा कि:

"इसके बावजूद 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' का दावा है कि 25 अगस्‍त से 5 सितंबर 1967 तक या उसके आसपास जन्‍म लेनेवाले सभी स्‍त्री पुरूष 2003 के बाद से ही बहुत परेशान खुद को समस्‍याओं से घिरा हुआ पा रहे होंगे .. उसी समय से परिस्थितियों पर अपना नियंत्रण खोते जा रहे होंगे .. और खासकर इस वर्ष जनवरी से उनकी स्थिति बहुत ही बिगडी हुई हैं .. परेशानी किसी भी संदर्भ की हो सकती है .. जिसके कारण अभी भी वे लोग काफी तनाव में जी रहे हैं .. वैसे ये किसी भी बडे या छोटे पद पर .. किसी भी बडे या छोटे व्‍यवसाय से जुडे हो सकते हैं और कितनी भी बडी या छोटी संपत्ति के मालिक हो सकते हैं .. पर परेशानी वाली कोई बात सबमें मौजूद होगी"

आप चालीस वर्ष के आस-पास के लोगों की बात कर रही हैं। जो:
A) समस्याओं से घिरा पा रहे हैं
B) परिस्थितियों से नियन्त्रण खोते जा रहे हैं
C) इस वर्ष जनवरी से स्थिति बहुत ही बिगडी हुयी है
D) वो तनाव में हैं
E) परेशानी वाली कोई बात सबमें मौजूद रहेगी

मैं कहता हूँ कि किसी भी उम्र वर्ग के लोगों से बात करके देख लीजिये, सबका जवाब हाँ में ही होगा। कौन परेशान नहीं है।
अगर आप इस प्रयोग को लेकर आगे बढती भी हैं तो आपको कई अन्य प्रयोग भी करने चाहिये। मसलन अगर अन्य उम्र वर्ग के लोग भी इसका जवाब हाँ में दें तो आप अपने डेटा की व्याख्या कैसे करेंगी?

किसी भी वैज्ञानिक प्रयोग को biased नहीं होना चाहिये। मसलन आप सर्वे करा कर देखिये:

क्या देश के युवा संस्कृतिविहीन होते जा रहे हैं। आपको मनमाफ़िक जवाब मिलेगा इसे Rhetoric के क्षेत्र में Appealing to Character कहते हैं। आप ऐसा प्रश्न बुनें जिसका जवाब वही हो जो आप सुनना चाहें।

हमने आपके सवाल को १५ लोगों से पूछा।

१) चालीस वर्ष के आसपास के लोग ६ थे। २ खुश हैं, ३ ने कहा कि पाँचो (A से E तक) में से कुछ न कुछ तो हमेशा गडबड रहेगा, और १ ने जवाब देने से इंकार कर दिया।
२) ९ लोग २५-३२ वर्ष की उम्र के थे। सभी दुखी हैं, तनाव में हैं, मन्दी चल रही है :-)

अन्त में संगीताजी से अनुरोध है कि अगर वो सच में वैज्ञानिक रुप से अपनी थ्योरी को जाँचना चाहती हैं तो इसके लिये शार्टकट से काम नहीं चलेगा। किसी भी अच्छी यूनिवर्सिटी के Statistics विभाग से सम्पर्क करें अथवा Statistics से सम्बन्धित शोधपत्रों को देखकर अपने Un-biased प्रयोग बनायें जिससे की वास्तव में आपके सिद्धान्तों की पुष्टि हो सके।

इस विषय में अधिक बातचीत के लिये कोई भी अपनी टिप्पणी (मर्यादित) दे सकते हैं अथवा मुझसे ईमेल पर सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं।

आभार,
नीरज रोहिल्ला





सोमवार, मई 18, 2009

अंकुर वर्मा की ह्यूस्टन यात्रा का विवरण: कोई ब्लागर मीट नहीं !!!

नोट: देर आये दुरूस्त आये की तर्ज पर इस पोस्ट को छाप रहे हैं।

अंकुर और हमने चार साल झांसी में इंजीनियरिंग की (पढाई ?) करते हुये बिताये। लगभग २ महीने पहले अंकुर ने खुशखबरी दी कि वो नैनोटेक्नोलोजी की एक स्तरीय कान्फ़्रेन्स में अपने शोधकार्य पर एक पोस्टर दिखाने आ रहे हैं। फ़िर धीरे धीरे इन्तजार के दिन खत्म हुये और हम अंकुर को लेने ह्यूस्टन के हवाई अड्डे पंहुचे। वहाँ देखा कि अंकुर एक सार्वजनिक फ़ोन में सिक्के डालकर किसी को फ़ोन करने का प्रयास कर रहे हैं। हमने पीछे से आवाज दी कि क्यों पैसे बर्बाद कर रहे हो, हम आ चुके हैं। बाद में पता चला कि उनके पास हमारा सही नम्बर भी नहीं था :-)

खैर उसके बाद १०-११ दिन मौज मस्ती में बीते। अब हर बात तो लिखी नहीं जा सकती तो फ़ोटो और वीडियो के बहाने बयां कर रहे हैं:
अब कुछ वीडियो भी देखिये, हमने अंकुर को ह्यूस्टन में दौडा भी दिया, ;-)



video
अंकुर का Hiking के बाद का इंटरव्यू
video
अंकुर और नीरज साथ साथ दौडते हुये
video
अंकुर और मनीष की दौड
video
मनीष और नीरज की दौड, नीरज फ़िसल पडे, मनीष बने हीरो...:-)

बुधवार, अप्रैल 22, 2009

मैराथन का मक्का: बोस्टन मैराथन २००९

आज अमेरिका के बोस्टन शहर में विश्व प्रसिद्ध बोस्टन मैराथन का आयोजन हुआ। बोस्टन मैराथन अमेरिका की सबसे पुरानी (१८९७ से) और सबसे प्रतिष्ठित मैराथन दौड है। अक्सर लोग पूछते हैं कि जब सभी मैराथन २६.२ मील की होती हैं तो इनमें अन्तर क्या है। अलग-अलग शहरों का चरित्र अलग अलग होता है, जब बोस्टन में मैराथन होती है तो पूरा शहर इसका हिस्सा होता है। सोमवार के दिन भी लोग समय निकालकर सडक के किनारे घंटो धावको का उत्साह बढाते रहते हैं। जिन्होने बोस्टन मैराथन दौडी है वो अपने जूते/Hamstring/Calf/Quads पर कसम खा के कहेंगे कि ऐसा आनन्द और कहीं नहीं । मैं कभी बोस्टन नहीं गया और बोस्टन मैराथन में दौडना एक सपना है जो शायद अगले साल पूरा हो। विशिष्ट धावक भी बोस्टन के लिए महीनो तैयारी करते हैं और बोस्टन मैराथन जीतना उनके कैरियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है|

अगर आप एलीट धावक नहीं हैं तो इसे दौडने के लिये आपको बाकायदा क्वालिफ़ाई करना पडता है। कोई भी ऐरा-गैरा जाकर प्रारम्भ पंक्ति पर खडा नहीं हो सकता।  बोस्टन मैराथन के क्वालिफ़ाईंग स्टैन्डर्ड इस प्रकार हैं:
उम्र समूह
पुरूष महिला
18-34 3hrs 10min 3hrs 40min
35-39 3hrs 15min 3hrs 45min
40-44 3hrs 20min 3hrs 50min
45-49 3hrs 30min 4hrs 00min
50-54 3hrs 35min 4hrs 05min
55-59 3hrs 45min 4hrs 15min
60-64 4hrs 00min 4hrs 30min
65-69 4hrs 15min 4hrs 45min
70-74 4hrs 30min 5hrs 00min
75-79 4hrs 45min 5hrs 15min
80 and over 5hrs 00min 5hrs 30min

इस साल की बोस्टन मैराथन को लेकर लोग ज्यादा उत्साहित थे। इस बार लोग उम्मीद कर रहे थे कि शायद महिला और पुरूष दोनों वर्गों में से किसी एक में तो कोई अमेरिकन इस दौड को जीतेगा। पुरूष वर्ग में रायन हाल (Ryan Hall) से लोगों को बडी उम्मीदें थीं लेकिन महिला वर्ग में कारा गाऊचर भी प्रबल प्रतिद्वन्दी थीं।

लोग कयास लगा रहे थे कि शायद रायन हॉल २४ वर्षों के बाद फिर से बोस्टन मैराथन जीतने वाले अमेरिकन धावक बन सकेंगे| पुरुषों के दौड़ में अन्य मुख्य प्रतिद्वंदी इथियोपिया के राबर्ट चेरिओट (Robert Cheruiyot, जो इस दौड़ को चार बार पहले जीत चुके हैं) , कीनिया के डेनिएल रोनो (Daniel Rono) और  कीनिया के ही इवांस चेरिओट (Evans Cheruiyot) थे | इथियोपिया के देरिबा मर्गा ने बीजिंग ओलंपिक में आख़िरी ४०० मीटर में अपना तीसरा स्थान खो दिया था, लेकिन जनवरी में हमारे शहर ह्यूस्टन में देरिबा में शानदार दौड लगाते हुये Houston Marathon जीती थी, इसीलिये वो भी प्रबल दावेदार थे।

महिलाओं की दौड़ की बात करें तो रायन हॉल की ही तरह अमेरिका की ही कारा गाऊचर (Kara Gaucher) से लोगों को काफी उम्मीदे थी| कीनिया निवासी पिछले वर्ष की चैम्पियन डीरे टयून (Dire Tune) और इथियोपिया की सेलिना कोस्गी (Salina Kosgei) कट्टर प्रतिद्वंदियों में से थीं | पिछले वर्ष महिलाओं की दौड़ में प्रथान और द्वितीय स्थान का अंतर दो सेकेंड्स से ही कम था और इस साल ही कुछ ऐसी ही प्रतियोगिता की आशा थी|

सबसे पहले महिलाओं की ही दौड का पिछले साल का वीडियो देखिये और आखिरी ४०० मीटर दौड की उत्तेजन महसूस कीजिये।



इस वर्ष भी महिलाओं की दौड की समाप्ति देखना अपने में एक अनुभव था। २५.२ मील के बाद आख़िरी मील की दौड़ में कारा (Kara) डीरे (Dire) और सेलिना (Salina) से लगभग २-३ कदम आगे चल रहीं थीं, लेकिन इस आख़िरी १ मील की दौड़ में जो हुआ उसे शब्दों में बता पाना संभव नहीं है और इसके लिए आपको ये वीडियो देखना पडेगा|




अगर आप केवल परिणाम पढना चाहे तो वो इस प्रकार हैं:

1.      Salina Kosgei      KEN      2:32:16
2.      Dire Tune     ETH     2:32:17
3.      Kara Goucher     USA     2:32:25
4.      Bezunesh Bekele     ETH     2:33:08
5.      Helena Kirop     KEN     2:33:24
6.      Lidiya Grigoryeva     RUS     2:34:20
7.      Atsede Habtamu     ETH     2:35:34
8.      Colleen S. De Reuck     USA     2:35:37
9.      Alice Timbilili     KEN     2:36:25
10.    Alina Ivanova     RUS     2:36:50

पुरुषों की दौड़ में १७ मील के बाद कुछ ख़ास नहीं बदला | देरिबा मर्गा ने अपनी बढ़त बनाए रखी और रायन हॉल चौथे से तीसरे स्थान पर आ गए | देरिबा मर्गा ने अपने प्रतिद्वंदी को ५० सेकेंड्स से पछाड़कर इस दौड़ को जीता, इसके साथ ही उन्होंने बोस्टन मैराथन के $१५०,००० (लगभग ७५ लाख रुपये) के ईनाम को भी जीता| पुरुषों की दौड़ के परिणाम इस प्रकार रहे |

1.      Deriba Merga      ETH      2:08:42
2.      Daniel Rono     KEN     2:09:32
3.      Ryan Hall     USA     2:09:40
4.      Tekeste Kebede     ETH     2:09:49
5.      Robert Cheruiyot     KEN     2:10:06
6.      Gashaw Asfaw     ETH     2:10:44
7.      Solomon Molia     ETH     2:12:02
8.      Evans Cheruiyot     KEN     2:12:45
9.      Stephen Kiogora     KEN     2:13:00
10.     Timothy Cherigat     KEN     2:13:04


और अन्त में इथियोपिया के धावक अपनी विजयी मुस्कान के साथ, ;-)




मंगलवार, अप्रैल 21, 2009

क्या नाईकी (Nike) का ये विज्ञापन अश्लील है

नोट: सिर्फ़ १८ वर्ष या उससे अधिक उम्र के पाठकों के लिये। वैसे इसमें ऐसा कुछ भी अश्लील नहीं है। कल एक मित्र ने यूट्यूब पर इस विज्ञापन का लिंक भेजा और इसे देखने के बाद मैं हंसता रहा, लैब में सब सोच रहे थे कि क्या नीरज पागल हो गया है। फ़िर बाकी सबको दिखाया तो सब लोग विज्ञापन देखकर मुस्कुराने लगे। इस विज्ञापन को अभी तक टेलीविजन पर नहीं देखा है, हो सकता है Nike इसे दिखाये भी नहीं। लेकिन आप देखिये और बताईये कि क्या ये अश्लील है?

ध्यान दीजियेगा कि इस विज्ञापन में दिखाये गये धावकों में से अधिकतर विश्वस्तरीय हैं। बाकी आप देखकर खुद ही निर्णय लें, ;-)

रविवार, अप्रैल 12, 2009

दो दौडों का विवरण फ़ोटुआ के साथ !!!

अपनी दाँयी टांग को चिट्ठी लिखने के बाद मामला कुछ सुधरा है और इस प्रविष्टी में हम दो दौडों का विवरण बांच रहे हैं। इसी बीच हमारी दांयी टांग ने हमारे शिकायती पत्र का जवाब हमें लिख भेजा है जिसे अगली पोस्ट में छापा जायेगा।

पहली दौड थी Bellaire Trolley Run 5k  ये ह्यूस्टन की पाँच किमी दूरी की प्रसिद्ध दौड है, इसको लगभग सभी अच्छे धावक दौडते हैं क्योंकि इसमें ईनाम में एक ट्राम मिलती है जो चाबी घुमाने पर मधुर संगीत बजाती है। हमारा उद्देश्य था कि इस दौड को २० मिनट से कम समय में पूरा किया जाये। लेकिन एक लफ़डा हो गया, दौड से एक दिन पहले हमारे प्रिय मित्र शेखर जैन का फ़ोन आया कि वो अपनी पी.एच.डी. पूरी करके नौकरी करने के लिये भारत रवाना हो रहे हैं और इसीलिये आज शाम को उनकी शान में एक आयरिश बार में मदिरासेवन का कार्यक्रम है।  अक्सर ऐसे मौके छोडे नहीं जाते लेकिन अगले दिन सुबह दौड और इधर अपने प्रिय मित्र की फ़ेयरवैल पार्टी। खैर आयरिश बार में सब लोग मिले और हम एक बीयर का गिलास उठाकर जितना धीरे पी सकते थे उतना धीरे पीने का प्रयास करते हुये चर्चा करते रहे। लेकिन फ़िर भी दो गिलास बीयर और चर्चा करके घर आते आते सुबह का १ बज गया। घडी में सुबह ५:३० का अलार्म भरकर सोने का प्रयास किया लेकिन नींद देर तक न आयी।

सुबह ५:३० बजे उठकर, नहाकर (जी हाँ नहाकर, आप बिना नहाये मन्दिर नहीं जाते, आफ़िस नहीं जाते तो हम बिना नहाये रेस कैसे दौड सकते हैं) ७ बजे तक दौड स्थल तक आ चुके थे। वहाँ पर हमारे धावक क्लब का तम्बू पहले से तैयार था वहाँ पर Rosie काफ़ी का थर्मस लेकर आयी थीं। हमने रात का सूरूर उतारने के लिये दो कप काफ़ी निपटा दी। उसके बाद दौड से १५ मिनट पहले हम वार्म अप करने निकल पडे। लगभग १ मील की धीमी दौड लगाकर मांशपेशियों को सोते से जगाकर आगे वाले काम के लिये मनुहार करके तैयार किया गया। 

हमको पता चला कि इसी दौड में ह्यूस्टन निवासी ६० वर्षीय महिला सेब्रा हार्वी (Sabra Harvey) ५ किमी की दौड का विश्व कीर्तिमान बनाने का प्रयास करेंगी।  रेस के प्रारम्भ में सेब्रा के बगल में खडे होना ही बडी बात थी, उनके आत्मविश्वास को देखते हुये लग रहा था कि वे अपने गोल में सफ़ल होंगी। सेब्रा को इस कीर्तिमान के लिये इस दौड में १९ मिनट और ३७ सेकेंड्स के समय की आवश्यकता थी लेकिन उन्होनें इस दौड को १९ मिनट और १२ सेकेंड्स मे पूरा करके विश्व कीर्तिमान अपने नाम किया।

फ़िलहाल बन्दूक की आवाज के साथ ही दौड शुरू हो गयी। हमने अपनी दौड लीड ग्रुप के साथ प्रारम्भ की लेकिन शुरूआती ४०० मीटर में ही वो हमसे दूर होते चले गये। पहला मील उत्तेजना में आवश्यकता से अधिक तेज दौडा गया।  घडी देखने पर लगा कि पहला मील ६ मिनट और १० सेकेंड्स में पूरा हुआ।  सवा मील तक आते आते हमारी सांस उखडने सी लगी और इसी पशोपेश में ७ लोग हमसे आगे बढ गये। हमने अपने आप को संभाला और दूसरे मील में अपनी सांस और हृदयगति पर नियंत्रण करने का प्रयास किया। दूसरा मील ६ मिनट और ३५ सेकेंड्स में पूरा हुआ। इसके बाद हमने अपने को सहज महसूस किया और एक-एक करके आगे निकले ७ लोगों को खदेडने का प्रयास किया। लगभग २.७५ मील पर हमने सातवें धावक को भी पीछे छोडा और आगे हमारे मित्र Simon Brabo दौड रहे थे। Simon की आदत सब जानते हैं कि अगर कोई उनसे आगे निकलने का प्रयास करे तो फ़िर Simon को गुस्सा आता है :-)

खैर हम दौडते दौडते Simon के कन्धे तक आ गये और बिना आवाज किये उनके पीछे लगे रहे, अचानक Simon ने पीछे मुडकर देखा और हमने बिना कुछ कहे अपनी रफ़्तार बढा दी। जब तक Simon कुछ समझते हमने ५-६ कदम की लीड ले ली थी। उसके बाद समाप्ति पंक्ति तक Simon और हम कडी प्रतिस्पर्धा में रहे लेकिन हमने उनको पीछे छोड ही दिया। Simon उस दिन अच्छा महसूस नहीं कर रहे थे और अगली दौड में हमारी खैर नहीं है (बिना ईस्माइली के)।

हमने इस दौड को १९ मिनट और ३७ सेकेंड्स में पूरा किया और अपने उम्र समूह (२५-२९ वर्ष) में हमें द्वितीय पुरस्कार मिला जिसका फ़ोटो हम सनद के साथ लगा रहे हैं।













(दौड की समाप्ति के बाद हरदीप और हम विजयी मुस्कान के साथ)              
(अपने धावक क्लब के लिये ईनाम जीतते हुये)

















(हमारे धावक क्लब के लिये ईनाम जीतने पर Lara की तरफ़ बधाई तो बनती ही थी )




उसके अगले हफ़्ते यानि कल (शनिवार को) हमने Flying Owls 5k में भाग लिया। मजे की बात है कि इस दौड में हमारा समय १९ मिनट और १७ सेकेंड्स रहा जो पिछली दौड (१९:३७) की अपेक्षा बेहतर रहा लेकिन फ़िर भी हमें कोई ईनाम नहीं मिला क्योंकि इस दौड में उम्र समूह ५ वर्ष के अन्तराल (२५-२९) के स्थान पर १० वर्ष (२०-२९) का था और २०-२१ साल के छोकरे लोग हमसे भी तेज दौड गये :-)

इस दौड में हमारे कुछ बेहतरीन फ़ोटो लिये गये जो हम लगा रहे हैं।




















(ये वाला फ़ोटो मेरा पसंदीदा है, दोनो पैर हवा में फ़्लोट करते हुये ऐसा लग रहा है कि जैसे Flying Owls 5k में हम सच में ही उड रहे हों)
























(इस वाले फ़ोटो का क्या कहना, आखिरी ३०० मीटर में जिस तेजी और विश्वास की जरूरत होती है, बिल्कुल वैसा ही फ़ोटो आया है)










बुधवार, अप्रैल 01, 2009

मेरी दांयी टांग के नाम एक चिट्ठी:

पहले सोचा कि तुमसे (दांयी टांग) अकेले में बात की जाये, लेकिन कल के तुम्हारे व्यवहार ने जो दिल तोडा है उसके बाद मौखिक संवाद की जगह लिखित में आन द रेकार्ड तुम्हे चिट्ठी लिख रहा हूँ।  पहले कुछ बातें याद दिलाता हूँ,

१) याद है ह्यूस्टन मैराथन? हमने फ़ैसला किया था कि इसे ३:३० में खत्म करेंगे।  दौड से पहले अपना पेट काटकर तुम्हारी मालिश भी करवायी थी।  तुम्हारे लिये अच्छे से अच्छे जूते खरीदे, उनमें स्पेशन इन-सोल भी लगवाये कि तुम्हे कोई तकलीफ़ न हो।  नतीजा क्या निकला? २२वें मील तक तुमने खूब साथ निभाया, उसके बाद जब केवल ४.२ मील बाकी थे, तुमने ऐसे नजरें फ़ेर लीं जैसे जानते भी नहीं।  भला हो बांयी टांग का जिसने तुम्हारा बोझ भी अपने ऊपर लिया और जो जिम्मेदारी तुम्हे और उसे ५०-५० बांटनी थी, ६५-३५ बांटकर मैराथन पूरी करनी पडी।

ठीक है, हमने तुम्हारी बात मानी की ये पहला मैराथन था और तुम स्ट्रैस नहीं झेल पायी। उसके बाद हमने कागज पर कैलकुलेशन की थी कि अगली मैराथन में बोस्टन के लिये क्वालीफ़ाई करना है। याद है? तुमने कहा था कि एक मौका और दे दो, इस बार मायूस नहीं करोगी।  बोस्टन कोई मजाक नहीं है, हम सब इसके लिये मेहनत कर रहे हैं। इसके लिये एक साल में ३:३८ से ३:१० पर जाना होगा। मतलब कि पूरे २८ मिनट का इम्प्रूवमेंट।

२) याद है Run Wild Half Marathon? वो तो केवल १३.१ मील की थी।  इतना तो तुम्हे भी पता है कि इस दूरी में तुम्हे कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिये।  लेकिन फ़िर १० वें मील के आस पास तुम्हारे नाटक शुरू हो गये थे।  वो तो भला हो कि जैसे तैसे तुम्हें घसीटकर १:३४:४१ में रेस पूरी हुयी थी। वरना तुम्हारी सुनते तो मिल लिया था फ़र्स्ट प्राईज।

३) इसके बाद Bayou City Classic 10K, ये तो केवल १० किमी की दौड थी।  हमने तय किया था कि इसे ४२ मिनट में पूरा करेंगे। तुमने भी काफ़ी साथ दिया लेकिन आखिरी आधे मील में जब मैने तुमसे पूछा कि थोडा तेज दौडें तो बांयी टांग तैयार थी और तुमने धोका दे दिया। सोचो अगर तुम साथ देती तो ४१:०८ की जगह ४१ मिनट में दौड पूरी हो सकती थी।

४) बोस्टन की तैयारी के लिये हम सब राजी हुये थे कि टैक वर्क बहुत जरूरी है। पहले ३ वर्क आऊट में तो तुम भी कितनी खुश थी।  लेकिन कल क्या हुया? इतनी सुन्दर कन्या आकर बोलती है कि पिछले हफ़्ते मैने तुम्हे दौडते देखा था, हम दोनो लगभग एक ही रफ़्तार पे दौडते हैं। क्या मैं आज तुम्हारे साथ दौड सकती हूँ।  हमने उस कन्या को वादा दे दिया और पहले ही वर्क आऊट में तुम्हारे ड्रामे शुरू हो गये। वो तो अच्छा था कि हर वर्क आऊट के बीच में ३ मिनट का अन्तर था और उस बीच में हमने तुम्हे समझा लिया कि इज्जत की बात है आज साथ न छोडो।  वरना कल तो तुमने इज्जत का कूडा कर दिया था।  देखा आखिरी वर्क आऊट के बाद कन्या कितनी खुश थी, अपने से अपना फ़ोन नम्बर दिया और कहा कि हमें शुक्रवार को भी साथ दौडना चाहिये।  आज सुबह सुबह ईमेल आया कि क्या शुक्रवार को शाम ४:३० का समय मेरे लिये उचित है। लेकिन तुम्हे ये सब क्यों बरदाश्त होगा, जलती जो हो तुम मुझसे।

कुछ सीखो बांयी टांग से, कितना भी कम्पटीशन हो जरा भी नहीं डरती। उसको बोलो कि थोडा तेज दौडें तो बोलती है हाँ क्यों नहीं। एक तुम हो, जरा जरा सी बात में नाटक शुरू कि आज गर्मी बहुत है, आज वार्म अप ठीक से नहीं हुआ।

अब शनिवार को एक ५ किमी की दौड है। तुम्हे भी पता है कि ये दौड कितनी जरूरी है। इस दौड में हम सब मिलकर २० मिनट का गोल तोडने की फ़िराक में हैं। २० मिनट का मतलब जानती हो? हर किमी ४ मिनट से कम समय में पूरा करना।  ये तुम भी जानती हो कि पिछले एक महीने की मेहनत के बाद ये हो जाना चाहिये।  अगर तुम राजी न हो तो मैं अपना नाम वापिस ले लूँ लेकिन अगर एक बार तैयार हो जाओ तो फ़िर ५ किमी के बीच में तुम्हारा ड्रामा नहीं चाहिये।

एक बात और, हमें पता है कि दौड से १ दिन पहले तुम्हे आराम चाहिये होता है। लेकिन ये केवल ५ किमी की दौड है और हम शुक्रवार को उस कन्या के साथ दौडने का वादा कर चुके हैं। अब नौटंकी बन्द करो और सीधे सीधे लाईन पर आ जाओ वरना हमें उंगली टेढा करना भी आता है।