मंगलवार, अगस्त 19, 2008

सहजता,कहीं मोल मिलती है क्या?

कभी ट्रेन के डिब्बे में अंग्रेजी किताब पढ़ने वाला इसलिए असहज कि लोग सोच रहे होंगे कि ये टशन मारने के लिए अंग्रेजी की किताब पढ़ रहा है जबकि मैं तो रोज ही अंग्रेजी की किताब पढता हूँ। कभी वो ये सोचकर असहज कि ये आम लोग कभी समझ नहीं पायेंगे कि इस अंग्रेजी की किताब में ऐसा क्या है जो में इसे पढ़ रहा हूँ। ट्रेन में हिन्दी कि किताब पढ़ने वाला इसलिए असहज कि कहीं लोग ये न सोच रहे हो कि मैं गंवार हूँ जबकि मेरी अंग्रेजी उतनी ही अच्छी है जितनी हिन्दी । कभी वो ये सोचकर असहज कि आजकल मेरे जैसे लोग हैं ही कहाँ जो हिन्दी कि किताबे पढ़ते हैं, सब मैकाले की औलादें हैं। मेरा बस चले तो सबकी अंग्रेजियत एक बार में निकाल दूं ।
कभी इस बात का दंभ कि मैं तो हिन्दी पढ़ रह हूँ डंके की चोट पर, जिसे गंवार कहना हो कह ले मुझे परवाह नहीं।

कहाँ मेरे स्कूल में चीनी विद्यार्थी की कमजोर अंग्रेजी के कारण एक साधारण सी बात को जरा तकलीफ़ से समझाने के बाद उसके चेहरे पर आयी सहज मुस्कान और कहाँ किसी अंग्रेजीदां नौजवान की दिल्ली के कैफ़े काफ़ी डे में अमेरिकन एक्सेंट में बातचीत के दौरान असहजता से "डैम इट" और "होली शिट" ।


कहाँ है इसके बीच में मेरा नायक जो सहजता से अपनी अंगरेजी कि किताब बंद करके स्टेशन पर उतरकर वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास खरीदकर उतनी ही सहजता से पढता है । न तो वो बात बात में काले फिरंगियों को गरियाता है और न ही उन्ही की भाषा में बात करता है ? आपने मेरे नायक को कहीं देखा है ?

11 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसे नायक को तो हमने भी नहीं देखा....

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  2. सही में सहजता विरल है। या तो मन्द मति सहज हो सकता है या अष्टावक्र जैसा पंहुचा हुआ।
    सहजता के लिये बड़ा संकल्प चाहिये!

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  3. भरा हुआ घड़ा सहज होता है.

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  4. मैं हूं ना...
    बस वेद प्रकाश शर्मा की जगह सुरेन्द्र मोहन पाठक कर दो
    :)

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  5. अजी हम भी हैं..
    खरीद तो दोनो लेते हैं मगर सुरेन्द्र मोहन या वेद प्रकाश वाला ही पहले पढते हैं.. अंग्रेजी का नंबर बाद में ही आता है.. :)

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  6. आपके नायक कनाडा जा कर बस गये हैं और आजकल गो ट्रेन में ज्ञान चतुर्वेदी की बारामासी पढ़ने में जुटे हैं. आओ न मिलने!!

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  7. कठिन तो है... इसमें कोई शक नहीं !

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  8. जगह बिखरे हैं तुम्हारे नायक।

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  9. Aaj Antardwanee me kaafee kuchh padh daala. istarah mauqa mujhe kamhee miltaa hai!
    "Sahajtaa, kaheen mol miltee hai kya", behad achha laga. Mere manki baat kiseene mano keh dee ho!
    Shama

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  10. मैं क्या कहूँ, मैं खुद ही असहज हो रहा हूँ। दरअसल मैं आपसे एक निवेदन करना चाहता हूँ - हिन्दी विकिपीडिया पर दस-बीस लेख लिखिये ना| जब बहुत सारे लोग इसमें भिड़ेंगे, तभी ये जोर पकड़ेगी| इस परियोजना से हिन्दी को सबसे अधिक लाभ मिलने वाला है और यह एक स्थायी किस्म का लाभ होगा।

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  11. सहजता कही नही मिलती... अपने अन्दर ही होती है ... बस बच्चे सा दिल चाहिये जबान कोई भी हो... चलेगा

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