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मंगलवार, जून 26, 2007

हमारे दौडने-भागने के किस्से

मित्रों आज आपको अपने पुराने दिनों की कुछ बातें बताते हैं । ये बात तब की है जब हम रासायनिक अभियांत्रिकी पढ रहे थे (अभी भी वही पढ रहे हैं) । लेकिन ये बात आज से लगभग सवा आठ साल पुरानी है, हम अपने कालेज में प्रथम वर्ष में थे और वार्षिक खेल कूद प्रतियोगिता आयोजित हो रही थी । इस प्रतियोगिता में अभियांत्रिकी की सभी शाखायें आपस में संघर्ष करती थी और उनमें से एक विजेता घोषित होती थी । जाहिर है हर साल "मैकेनिकल" वाले ही विजेता बनते थे क्योंकि वो संख्या में ज्यादा थे और हथौडा भी ढंग से चलाने में माहिर थे :-)

जब विभिन्न ट्रैक प्रतियोगिताओं के लिये नाम लिखा जा रहा था तो हम भी पँहुच गये और १०० मीटर, २०० मीटर, ११० हर्डल रेस, ४०० मीटर, ४ * १०० मीटर रिले, ४ * ४०० रिले और १५०० मीटर में अपना नाम लिखा आये । नाम लिखने वाले ने एक बार सूची की ओर देखा और फ़िर हमारी ओर एक नजर डाली । हमने कहा कि हाँ अपना ही नाम लिखा रहे हैं परेशान न हो ।

खैर वहाँ बैठे सब लोग हँस दिये और हमारे ब्राँच कैप्टन ने हमारे कन्धे पर हाथ रखकर कहा कि जीतना ही सब कुछ नहीं होता, प्रतियोगिता में भाग लेना ज्यादा जरूरी है । हमें बडा अफ़सोस हुआ कि और तो और हमारा ब्राँच कैप्टन ही हम पर भरोसा नहीं कर रहा है ।

पहले दिन सब दौडों के प्रतिभागियों की छंटनी होकर हर दौड में लगभग ६-८ प्रतिभागी बचने थे । पहली रेस १०० मीटर, समय के हिसाब से हमारा नंबर चौथा; दूसरी रेस २०० मीटर हमारा नंबर तीसरा; तीसरी रेस १०० मीटर हर्डल और उसमें भी हमारा नंबर तीसरा । उसके तुरन्त बाद हमारा ब्राँच कैप्टन दौडता हुआ आया और बोला गुरू कहाँ छुपे हुये थे अब तक । उन्होने कहा कि बस अपनी ब्राँच की इज्जत अब तुम्हारे हाथ में है पिछली बार पीछे से प्रथम आये थे इस बार कुछ करके थोडा तो आगे बढाओ ।

उसके बाद बाकी लोग भी बधाईयाँ देने आ गये और हम भी अपनी ब्राँच में थोडा सेलिब्रिटी जैसे बन गये । पहले दिन की शाम को ११० मीटर हर्डल रेस का फ़ाइनल मुकाबला था और अपनी किस्मत दगा दे गयी । रेस के बीच में एक बाधा को कूदकर जैसे ही पैर नीचे पडा हम अपना सन्तुलन खो बैठे थे और पैर में अच्छी खासी मोच आ गयी थी । ब्राँच कैप्टन ने एक बार फ़िर कन्धे पर हाथ रखा और कहा कि "बैटर लक नेक्स्ट टाइम" ।

मोच के कारण दूसरे दिन हम दौडने के बिल्कुल भी काबिल नहीं थे । सारी प्रतियोगितायें हमारी आँखो के सामने होती रहीं और हम मन मसोस के रह गये । १०० मीटर रेस का फ़ाइनल तीसरे दिन की शाम को प्रतियोगिता के समापन से ठीक पहले मुख्य अतिथि के सामने होना था । हमने अपने टूटे पैर की खूब सेवा की, गरम पानी में नमक डालकर सिंकाई की, मूव/आयोडेक्स की पूरी डिबिया पैर पर उडेल दी और रेस से तुरन्त पहले हम "दर्द निवारक गोली" खाकर ट्रैक पर खडे थे । एक बार फ़िर हमारे ब्राँच कैप्टन ने हमें "बैस्ट आफ़ लक" कहा । ६ लोगों की दौड में हमारा नंबर रहा "चौथा", अपने जख्मी पैर के बावजूद ।

कोई ईनाम भले ही न मिला हो लेकिन अपनी ब्राँच वालों ने हमारे प्रयास की खूब सराहना की और हमें भी अच्छा लगा । उसके बाद अगले तीन सालों तक हमने अपनी ब्राँच के लिये विभिन्न दौडों में कई पदक बटोरे ।

अब जब बात चली ही है तो मैं अपनी सबसे पसंदीदा दो दौडों का किस्सा सुनाता हूँ । पहली थी ४ * ४०० रिले रेस; इसमें मैं आखिरी में दौडने वाला था और जब मुझे बैटन मिला तो हम तीसरे स्थान पर थे लेकिन हमने भी वो दौड लगायी कि चक्कर पूरा होने से पहले प्रथम स्थान पर आ गये थे । इस दौड के समाप्त होने पर मेरे कई मित्रों ने (जो दूसरी ब्राँच में थे ) मुझे कन्धे पर उठाकर मैदान में खूब घुमाया ।

दूसरी दौड ४०० मीटर रेस थी, इस रेस में मैने अपने निकटतम प्रतिद्वन्दी को लगभग १५ मीटर की लीड से परास्त करके अपने कालेज का रेकार्ड (५४ सेकेण्ड्स ) सेट किया था ।


समय बीतता गया और पहले आई. आई. एस. सी., बँगलौर और फ़िर चावल विश्वविद्यालय (राइस यूनिवर्सिटी) में अध्ययन के दौरान ट्रैक से वास्ता बिल्कुल छूट गया । कभी कभी यूँ ही राइस के कैम्पस के चारों ओर (४.८ किमी) दौड लिया करते थे फ़िर वो भी छूट गया ।


अभी दो महीने पहले मैं एक ऐसे समूह के संपर्क में आया जो हर बुधवार को १० किमी दौडते हैं और फ़िर कालेज पब (वलहाला) में बैठकर बीयर पीते हैं । उनमें से अधिकतर लोग कई मैराथन (४० किमी ) दौड चुके हैं । उनमें से एक व्यक्ति के उकसाने पर मैने भी फ़िर से दौडना प्रारम्भ कर दिया है ।

अभी मैं हफ़्ते में केवल २० किमी दौड रहा हूँ (बुधवार को १० और सोमवार और शुक्रवार को ५ ) । ह्यूस्टन में मैराथन दौड जनवरी में होती है, अगर सब कुछ ठीक रहा तो इस बार कम से कम आधी मैराथन तो अवश्य दौडूँगा । फ़िलहाल तो दौडने में बहुत ही मजा आ रहा है, बस दुआ कीजिये कि सब कुछ ऐसे ही चलता रहे ।

इस बीच मेरा वजन जो १५ मिलीग्राम बढ गया था, दौडने के कारण फ़िर से बराबर हो गया है :-)

मंगलवार, मार्च 27, 2007

क्या भूलूँ क्या याद करूँ ?

मेरी शिक्षा कक्षा १२ तक हिन्दी माध्यम में हुयी थी, लेकिन समय की मार देखिये विज्ञान के बहुत सारे हिन्दी शब्दों को भूल चुका हूँ। याद करके कुछ शब्द लिख रहा हूँ, जो याद नहीं आ रहे हैं उनके स्थान रिक्त हैं, सम्भवत: आप लोग ही उनके हिन्दी अर्थ सुझा सकें । आप इस सूची में अपनी टिप्पणियों के माध्यम से वृद्धि कर सकते हैं ।

Area: क्षेत्रफ़ल
Volume: आयतन
Density: घनत्व
Mass: द्रव्यमान
Weight: भार
Energy: ऊर्जा
Pressure: दबाव
Tension: तनाव
Elasticity: प्रत्यास्थता
Plasticity: सुघट्टयता
Compact Disc: संपीडित चक्र
Laser(Light amplification by stimulated emmision of radiation): विकिरण के उद्दीपन द्वारा प्रकाशिक प्रवर्धन
Surface Tension: पृष्ठ तनाव
Relative density: सापेक्षिक घनत्व
Proportional: समानुपाती
Inversely proportional: व्युतक्रमानुपाती
Phase: कला
Mensuration: क्षेत्रमिती
Parallel: समानान्तर
Periodic table:
Molecule: अणु
Atom: परमाणु
Microscope: सूक्ष्मदर्शी
System: निकाय
Photo-Electric effect: प्रकाश-वैद्युत प्रभाव
Thermodynamics: ऊष्मागतिकी
Adiabatic Process: रूद्धोष्म प्रकम
Simple harmonic motion: सरल आवर्त गति
Time period: आवर्तकाल
Frequency: आवृत्ति
Interference:
Ionic Bond: आयनिक बन्ध (कक्षा में आयन ही पढा था, इसकी क्या हिन्दी हो सकती है?)
Covalent bond:
Periodic Table: आवर्त सारणी
Absolute Temperature: परमताप
Constant: नियतांक
Universal Constant: सार्वत्रिक नियतांक
Vaporization: वाष्पीकरण
Statics: स्थितिविज्ञान
Dynamics: गतिविज्ञान
Algebra: बीजगणित
Cell: कोशिका
Pancreas: अग्नाशय
Stomach: आमाशय



वायल का नियम:
किसी नियत तापमान पर, गैस के निश्चित द्रव्यमान का आयतन उसके दबाव के व्युत्क्रमानुपाती होता है ।


चार्ल्स का नियम:
किसी नियत दबाव पर, गैस के निश्चित द्रव्यमान का आयतन उसके परमताप के समानुपाती होता है ।


बाकी फ़िर कभी और: