आज सुरेश जी की "ताज महल" और "तेजो महालय" वाली पोस्ट पढी और अपने आपको इस पोस्ट को लिखने से रोक नहीं सका ।
सबसे पहले उस विवादित पुस्तक के लेखक के बारे में बात करते हैं । पुरूषोत्तम नारायण ओक (पी. एन. ओक) अपने आपको एक इतिहासविद कहते अवश्य हैं लेकिन वो इतिहास विषय पर अपने शोध के लिये कम और "कांस्पिरेसी थ्योरीज" के लिये ज्यादा जाने जाते हैं । ये भी बात विचारणीय है कि पी. एन. ओक ने अभी तक किसी भी "peer reviewed journal" में अपना कोई खास शोधकार्य नहीं छापा है ।
तेजो महालय थ्योरी के अलावा भी उनके कुछ निम्न विचार हैं ।
क्रिस्चिनियटी (Christianity) = कॄष्ण स्तुति
मेक्सिको = माल्यावर्त
मक्का में काबा वास्तव में एक शिव मंदिर है ।
७८६ को अगर आप अरबी में लिखें तो उल्टी तरफ़ से पढने पर कुछ विद्वान(ओक और वर्तक सरीखे) उसमें "ओम" की झलक देख सकते हैं ।
तेजोमहालय थ्योरी पर मेरे कुछ विचार इस प्रकार हैं ।
१) मान लीजिये आपने कभी "ताज महल" का नाम नहीं सुना, अब मैं आपको एक भव्य इमारत का नाम "तेजो महालय"/"तेजो महलया" बताता हूँ । क्या आप इस नाम को सुनकर ये कह सकते हैं कि ये किसी मन्दिर का नाम है ? क्या मन्दिरों के नाम ऐसे होते हैं ? क्या ऐसा कोई और उदाहरण है ? क्या इस नाम से पता चलता है कि ये एक प्राचीन शिव मंदिर है ?
क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि "तेजो महालय", "ताज महल" को अपभ्रंश करके किसी भी तरीके से एक संस्कॄतनिष्ठ शब्द बनाने का प्रयास है ?
२) यदि आपने पी. एन. ओक की पूरी किताब पढी हो तो आप पायेंगे कि खुद पी. एन. ओक अपने तथ्यों में उलझ कर रह जाते हैं । कभी वो इसे एक शिव मंदिर तो कभी एक "राजपूती महल" बताते हैं ।
३) बाबर ने "राम मंदिर" का विध्वंस करके "बाबरी मस्जिद" का निर्माण किया था । ये बात अयोध्या के आस पास की किवदंतियों में खूब प्रचलित है और ये बात तत्कालीन एतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है । ऐसा कैसे हो सकता है कि उसके सैकडों वर्षों बाद हुयी इस घटना को वहाँ (आगरा/मथुरा) की जनता और इतिहास दोनों बडी आसानी से भूल गये । आगरा/मथुरा की लोककथाओं में इस प्रकार की किसी भी घटना का उल्लेख नहीं है । इतने भव्य मंदिर का इतने भव्य मकबरें में बदलाव की एतिहासिक घटना को लोग यूँ ही नहीं भूल सकते ।
४) ताजमहल से बिल्कुल सटा हुआ "ताज संग्रहालय" है । यदि आप वहाँ जायेगें तो आपको ताज महल के निर्माण सम्बन्धी कई दस्तावेज देखने का अवसर मिलेगा जो ताज महल की जमीन से लेकर पत्थरों की खरीद और मजदूरों के वेतन सम्बन्धी बातों का उल्लेख करते हैं ।
५) अगर शाहजहाँ ने एक मंदिर को तोडकर ताज महल बनवाया भी तो क्या वो इतना बडा बेवकूफ़ होगा कि मूर्तियों को एक कमरे में बंद करके छोड देगा जिससे बाद में कभी भी वो निकाली जा सकें ? एक बादशाह के लिये मूर्तियों को किसी अन्य जगह भेजना निश्चित ही बडा मुश्किल कार्य रहा होगा ।
"कांस्पिरेसी थ्योरिस्ट" आमतौर पर इस प्रकार के तर्क ज्यादा देते हैं जिनकी सामान्यत: पुष्टि न हो सके । तर्क का एक बडा सरल सा सिद्धान्त होता है; अगर आप आम राय के खिलाफ़ तर्क कर रहे हैं तो उसकी पुष्टि की जिम्मेवारी खुद आपकी होती है । उदाहरण के तौर पर क्या मैं ऐसा कह सकता हूँ कि "चाँद मक्खन का बना हुआ है, और अगर आप नहीं मानते तो साबित करिये कि चाँद मक्खन का बना हुआ नहीं है" ।
आज के लिये बस इतना ही, अगली बार बात करेंगे "राम सेतु" की और जानेंगे कि कैसे कुछ स्वयं स्थापित इतिहासविद बनकर लोगों को इस बात पर गलत तर्क परोस रहे हैं ।
साभार,
नीरज
चलते चलते: कल सुबह मैं अपने एक मित्र के साथ १४०० मील की कार यात्रा पर निकल रहा हूँ, इसलिये शायद दो दिनों के लिये संजाल पर आना संभव न हो सके । आप सभी लोगों के चिट्ठे पढने की पढास बहुत कष्ट देगी । यात्रा के बाद उसके विवरण पर भी एक पोस्ट अवश्य लिखी जायेगी ।
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गुरुवार, जून 14, 2007
सोमवार, मई 14, 2007
पौराणिक कथाओं और इतिहास के भँवर के बीच में फ़ँसा भारत (पहली किस्त)!
डिस्कलेमर: यहाँ पर प्रचारित विचार मेरी सोच प्रदर्शित करते हैं । स्वयं को इतिहास का एक आलोचक अथवा एक इतिहासविद के रूप में प्रसारित करने की मेरी कोई आकांक्षा नहीं है। संभव है मेरे तर्क त्रुटिपूर्ण हों, यदि आपको ऐसा लगे तो आप अपनी टिप्पणी के माध्यम से अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं ।
इतिहास विषय मुझे सदा से अपनी ओर आकर्षित करता रहा है, लेकिन हमेशा से तारीखों को याद रख पाने की अक्षमता के कारण मैं कभी भी इतिहास में अच्छे अंक प्राप्त न कर सका। फ़िर कक्षा १० के बाद इतिहास से वास्ता छूटता गया। लेकिन अभी पिछले तीन सालों से इतिहास की ओर मेरा झुकाव फ़िर से बढा है। इस बार न तो तारीखें याद रखने का पचडा है और न ही आचार्यजी की छडी का दर्द। मेरी रूचि ईसा पूर्व के भारतीय इतिहास के परिपेक्ष्य में जन्मी और पोषित हुयी सभ्यताओं में है। इनमें मुख्य रूप से सिंधु/सरस्वती सभ्यता, वैदिक सभ्यता और इन सभ्यताओं के मध्य एशिया की सभ्यताओं के साथ के सम्बन्ध का विषय बडा ही रोचक है।
इस विषय का वैज्ञानिक अध्ययन काफ़ी कठिन है। कारण है कि ईसा पूर्व के भारतीय इतिहास में Mythology (पौराणिक कथायें) इस प्रकार घुली मिली हैं कि किसी पौराणिक ग्रन्थ के सत्य और कल्पना को अलग कर पाना अपने में एक भगीरथ कार्य है। कहीं कहीं पर इन दोनों के बीच का अन्तर बडा ही महीन है और भावनाओं के आवेग में कई इतिहासविद अपने स्वयं के विश्वास को बिना किसी प्रमाण के इतिहास के रूप में प्रतिपादित करने में जरा भी नहीं चूकते। इसके अलावा भी हमने इतिहासकारों को विभिन्न खेमों में बाँट रखा है। अगर आप मेरे साथ नहीं हैं तो आप मेरे विरोधी हैं की मानसिकता ने इतिहासविदों के कई खेमें बना दिये हैं। आपने कोई ऐसी बात कही जो दूसरे के विचारों से भिन्न है तो पलक झपकते ही आपको कम्युनिस्ट अथवा संघी कह दिया जाएगा।
जहाँ एक ओर विद्वान हैं जो मानते हैं कि हिन्दू धर्म लाखों करोडों वर्ष पुराना है तो वहीं दूसरी ओर के लोग सभी धार्मिक ग्रन्थों को मात्र कल्पना की उडान से अधिक नहीं समझते। मेरी समझ में सत्य इन दोनों रास्तों के कहीं बीच में है पर विडम्बना है इस बीच के रास्ते पर कोई चलना ही नहीं चाहता। यहाँ तक तो ठीक था लेकिन इस अंतर्जाल ने सब गडबड कर दिया है। अब तो हर कोई इतिहासकार बन सकता है, आपकी योग्यता भले ही कुछ भी न हो लेकिन एक वेबसाईट बनाइये और अपना सारा अधकचरा ज्ञान वहाँ पटक दीजिये। कोई न कोई आपकी वेबसाईट खोजकर विभिन्न चर्चाओं में कट/पेस्ट करना शुरू कर देगा और देखते ही देखते बन गए आप इतिहासविद। इसके लिए एक और शार्टकट भी है, आप ऐसे मुद्दों पर लिखिये जो विवादास्पद हों। गांधी को गाली दीजिये, मैकाले को कोसिये, हर बात में अंग्रेजों की चाल बताइये, और चाहें तो इसके विपरीत भगतसिंह में कमियाँ निकालिये, सावरकर को तोलिये, सुभाष/नेहरू/पटेल के तुलनात्मक अध्ययन के बाद तो आप जो चाहें वो कह सकते हैं। कोई कसर बाक़ी रहे हो छद्म धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा तो कहीं नहीं गया है। कुल मिलाकर सब कुछ ऐसा जिससे आपका प्रोपागेंडा फ़ैल सके।
यूँ तो भारत में लगभग ५०००० ईसा पूर्व तक मानवों के रहने के प्रमाण मिले हैं, परन्तु मेरी जिज्ञासा खानाबदोश मानवों में नहीं बल्कि वहाँ से शुरू होती है जब मनुष्य ने सभ्य रूप में एक सामाजिक प्राणी के रूप में रहना प्रारंभ किया। ये विषय बडा क्लिष्ट है, क्योंकि इस अध्ययन के लिये इतिहास को हमारे विश्वास और मान्यताओं से अलग करना पडता है। उदाहरणार्थ, रामायण और महाभारत का ऐतिहासिक महत्व उनके धार्मिक महत्व से पूर्णता भिन्न है। इतिहास निर्मम होता है और केवल प्रमाण स्वीकार करता है। परन्तु ये भी सत्य है कि विश्व की सभी सभ्यताओं में सदैव विजेताओं ने इतिहास लेखन किया है और इस कारणवश वास्तविकता और कल्पना में भेद करना एक दुरूह कार्य है। इतिहासविदों के विचार में "चार बाँस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चूके चौहान" पृथ्वीराज रासो में कवि रंगवरदाई की कल्पना मात्र है । इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि पृथ्वीराज चौहान ने इस प्रकार मोहम्मद गौरी का वध किया था।
एक इतिहासविद को इससे कोई कष्ट नहीँ अगर आप विश्वास करते हैं कि रामायण और महाभारत आज से हजारों लाखों वर्ष पूर्व त्रेता एवं द्वापर युग में घटित हुये थे। परन्तु यदि आप महाभारत और रामायण को इतिहास के रूप में प्रतिष्ठापित करना चाहते हैं, तो आपको ठोस प्रमाण देने होंगे। इसके अतिरिक्त ऐसे प्रमाण भी अमान्य होंगे जो तर्क के धरातल पर खडे न हो सकें। अयोध्या और मथुरा नामक नगरों की उपस्थिति रामायण और महाभारत को प्रामाणिक सिद्ध नहीं कर देती। अगर ये सत्य है तो क्या आज से हजारो साल बाद कोई भी ऐसा उपन्यास जो भौगोलिक दृष्टि से ठोस हो सत्य मान लिया जाएगा ? क्या द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में लिखे सभी उपन्यास सत्य हो जायेंगे जो तारीखों की कसौटी पर खरे उतरेंगे ? यहाँ पर ये स्पष्ट कर देना जरुरी है कि मेरी आकांक्षा महाभारत और रामायण को उपन्यास साबित करने की नहीं है, मैं तो केवल एक पक्ष रख रहा हूँ और मेरा उद्देश्य वर्तमान में भारतवासियों की तर्क न करने की प्रवत्ति को उकेरना है।
आशा करता हूँ कि इस पोस्ट के माध्यम से अपने कुछ विचारों से मैंने आपको अवगत कराने का प्रयास किया है, इस पोस्ट की अगली कड़ी में हम कुछ और मुद्दों पर विचार करेंगे।
साभार,
नीरज रोहिला
इतिहास विषय मुझे सदा से अपनी ओर आकर्षित करता रहा है, लेकिन हमेशा से तारीखों को याद रख पाने की अक्षमता के कारण मैं कभी भी इतिहास में अच्छे अंक प्राप्त न कर सका। फ़िर कक्षा १० के बाद इतिहास से वास्ता छूटता गया। लेकिन अभी पिछले तीन सालों से इतिहास की ओर मेरा झुकाव फ़िर से बढा है। इस बार न तो तारीखें याद रखने का पचडा है और न ही आचार्यजी की छडी का दर्द। मेरी रूचि ईसा पूर्व के भारतीय इतिहास के परिपेक्ष्य में जन्मी और पोषित हुयी सभ्यताओं में है। इनमें मुख्य रूप से सिंधु/सरस्वती सभ्यता, वैदिक सभ्यता और इन सभ्यताओं के मध्य एशिया की सभ्यताओं के साथ के सम्बन्ध का विषय बडा ही रोचक है।
इस विषय का वैज्ञानिक अध्ययन काफ़ी कठिन है। कारण है कि ईसा पूर्व के भारतीय इतिहास में Mythology (पौराणिक कथायें) इस प्रकार घुली मिली हैं कि किसी पौराणिक ग्रन्थ के सत्य और कल्पना को अलग कर पाना अपने में एक भगीरथ कार्य है। कहीं कहीं पर इन दोनों के बीच का अन्तर बडा ही महीन है और भावनाओं के आवेग में कई इतिहासविद अपने स्वयं के विश्वास को बिना किसी प्रमाण के इतिहास के रूप में प्रतिपादित करने में जरा भी नहीं चूकते। इसके अलावा भी हमने इतिहासकारों को विभिन्न खेमों में बाँट रखा है। अगर आप मेरे साथ नहीं हैं तो आप मेरे विरोधी हैं की मानसिकता ने इतिहासविदों के कई खेमें बना दिये हैं। आपने कोई ऐसी बात कही जो दूसरे के विचारों से भिन्न है तो पलक झपकते ही आपको कम्युनिस्ट अथवा संघी कह दिया जाएगा।
जहाँ एक ओर विद्वान हैं जो मानते हैं कि हिन्दू धर्म लाखों करोडों वर्ष पुराना है तो वहीं दूसरी ओर के लोग सभी धार्मिक ग्रन्थों को मात्र कल्पना की उडान से अधिक नहीं समझते। मेरी समझ में सत्य इन दोनों रास्तों के कहीं बीच में है पर विडम्बना है इस बीच के रास्ते पर कोई चलना ही नहीं चाहता। यहाँ तक तो ठीक था लेकिन इस अंतर्जाल ने सब गडबड कर दिया है। अब तो हर कोई इतिहासकार बन सकता है, आपकी योग्यता भले ही कुछ भी न हो लेकिन एक वेबसाईट बनाइये और अपना सारा अधकचरा ज्ञान वहाँ पटक दीजिये। कोई न कोई आपकी वेबसाईट खोजकर विभिन्न चर्चाओं में कट/पेस्ट करना शुरू कर देगा और देखते ही देखते बन गए आप इतिहासविद। इसके लिए एक और शार्टकट भी है, आप ऐसे मुद्दों पर लिखिये जो विवादास्पद हों। गांधी को गाली दीजिये, मैकाले को कोसिये, हर बात में अंग्रेजों की चाल बताइये, और चाहें तो इसके विपरीत भगतसिंह में कमियाँ निकालिये, सावरकर को तोलिये, सुभाष/नेहरू/पटेल के तुलनात्मक अध्ययन के बाद तो आप जो चाहें वो कह सकते हैं। कोई कसर बाक़ी रहे हो छद्म धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा तो कहीं नहीं गया है। कुल मिलाकर सब कुछ ऐसा जिससे आपका प्रोपागेंडा फ़ैल सके।
यूँ तो भारत में लगभग ५०००० ईसा पूर्व तक मानवों के रहने के प्रमाण मिले हैं, परन्तु मेरी जिज्ञासा खानाबदोश मानवों में नहीं बल्कि वहाँ से शुरू होती है जब मनुष्य ने सभ्य रूप में एक सामाजिक प्राणी के रूप में रहना प्रारंभ किया। ये विषय बडा क्लिष्ट है, क्योंकि इस अध्ययन के लिये इतिहास को हमारे विश्वास और मान्यताओं से अलग करना पडता है। उदाहरणार्थ, रामायण और महाभारत का ऐतिहासिक महत्व उनके धार्मिक महत्व से पूर्णता भिन्न है। इतिहास निर्मम होता है और केवल प्रमाण स्वीकार करता है। परन्तु ये भी सत्य है कि विश्व की सभी सभ्यताओं में सदैव विजेताओं ने इतिहास लेखन किया है और इस कारणवश वास्तविकता और कल्पना में भेद करना एक दुरूह कार्य है। इतिहासविदों के विचार में "चार बाँस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चूके चौहान" पृथ्वीराज रासो में कवि रंगवरदाई की कल्पना मात्र है । इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि पृथ्वीराज चौहान ने इस प्रकार मोहम्मद गौरी का वध किया था।
एक इतिहासविद को इससे कोई कष्ट नहीँ अगर आप विश्वास करते हैं कि रामायण और महाभारत आज से हजारों लाखों वर्ष पूर्व त्रेता एवं द्वापर युग में घटित हुये थे। परन्तु यदि आप महाभारत और रामायण को इतिहास के रूप में प्रतिष्ठापित करना चाहते हैं, तो आपको ठोस प्रमाण देने होंगे। इसके अतिरिक्त ऐसे प्रमाण भी अमान्य होंगे जो तर्क के धरातल पर खडे न हो सकें। अयोध्या और मथुरा नामक नगरों की उपस्थिति रामायण और महाभारत को प्रामाणिक सिद्ध नहीं कर देती। अगर ये सत्य है तो क्या आज से हजारो साल बाद कोई भी ऐसा उपन्यास जो भौगोलिक दृष्टि से ठोस हो सत्य मान लिया जाएगा ? क्या द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में लिखे सभी उपन्यास सत्य हो जायेंगे जो तारीखों की कसौटी पर खरे उतरेंगे ? यहाँ पर ये स्पष्ट कर देना जरुरी है कि मेरी आकांक्षा महाभारत और रामायण को उपन्यास साबित करने की नहीं है, मैं तो केवल एक पक्ष रख रहा हूँ और मेरा उद्देश्य वर्तमान में भारतवासियों की तर्क न करने की प्रवत्ति को उकेरना है।
आशा करता हूँ कि इस पोस्ट के माध्यम से अपने कुछ विचारों से मैंने आपको अवगत कराने का प्रयास किया है, इस पोस्ट की अगली कड़ी में हम कुछ और मुद्दों पर विचार करेंगे।
साभार,
नीरज रोहिला
गुरुवार, अप्रैल 05, 2007
मैकाले: सत्य कहीं कुछ और तो नहीं ।
आज श्री सुरेश चिपलूनकर द्वारा मैकाले पर लिखित एक पोस्ट पढी और उस पोस्ट पर लिखी टिप्पणियाँ भी पढीं ।
मैं श्री सुरेशजी के विचारों और भावनाओं का सम्मान करता हूँ, परन्तु इतिहास के मापदण्डों से सत्य कुछ और ही है । कक्षा आठ तक मेरी शिक्षा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विद्यालय में हुयी है और मैकाले के इस वक्तव्य से मैं भली भाँति परिचित हूँ । मैकाले के बहाने हमें वामपंथियों को गाली देने का सुनहरा अवसर प्राप्त हो जाता है और आधुनिक शिक्षा पद्यति के प्रति अपनी भडास निकालने का बहाना भी । इस लिहाज से देखा जाये तो मैकाले ने इस देश को उसकी नकारात्मक ऊर्जा को निकालने का एक माध्यम प्रदान किया है और इसके लिये मैं मैकाले का ॠणी हूँ ।
इस विषय पर मेरे विचार तब बदले जब मैने श्री कोइनराड एल्स्ट (Koenraad Elst) का एक शोधपत्र पढा । कोइनराड एल्स्ट के बारे में अधिक जानकारी विकीपीडिया पर इस कडी से प्राप्त करें । कोइनराड एल्स्ट हिन्दू राष्ट्रवादी इतिहासकार माने जाते हैं और भाजपा एवं विश्व हिन्दू परिषद जैसी राष्ट्रवादी संस्थाओं की पत्रिकाओं में उनके लेख छपते रहते हैं । मुझे ताज्जुब हुआ जब कोइनराड एल्स्ट ने मैकाले के प्रति फ़ैले हुये इस भ्रम को दूर करने का प्रयास किया । उन्होने उस मुद्दे को छुआ जिसके बारे में लगभग सारा भारत एक ओर खडा था । दूसरे शब्दों में कहें तो मैकाले को जुतियाने को सब तैयार खडे हैं ।
इस संदर्भ में दो प्रश्न हैं । पहला ये कि क्या वास्तव में मैकाले ने ये व्यक्तत्व दिया था ? दूसरा कि अगर दिया भी था तो इसका प्रसंग क्या था? ऐसा तो नहीं है कि मैकाले के भाषण के इस अंश को "आउट आफ़ कान्टेक्स्ट" लिया जा रहा हो ।
सबसे पहले हम उस वाक्यांश को एक बार फ़िर पढते हैं:
" मैने भारत की चारो तरफ़ यात्रा की है और मुझे इस यात्रा के दौरान एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो चोर हो अथवा भिखारी हो । मैने इस देश में इतना धन देखा है, इतने ऊँचे संस्कार देखे हैं, लोगों का ऐसा माद्दा देखा है कि मुझे नहीं लगता कि हम कभी इस देश को कभी जीत पायेगें । कम से कम तब नहीं जब तक कि हम इस देश की रीढ तो तोड दें जो कि इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कॄतिक धरोहर है । इसलिये मैं प्रस्तावित करता हूँ कि हमे इस देश की पुरानी शिक्षा पद्यति और संस्कॄति को बदलना होगा । अगर भारतीय सोचेंगे कि जो कुछ विदेशी और अंग्रेजी है वो उनकी स्वयं की चीजों से अच्छा है तो वे अपना आत्मसम्मान और अपनी संस्कॄति खो देगें और वैसा बन जायेगें जैसा हम उन्हे बनाना चाहते हैं: वास्तव में एक दबा और कुचला हुआ राष्ट्र ।"
मैकाले का जन्म सन १८०० में हुआ था और वो भारत में लगभग १८३४-१८३८ तक रहे थे । मैं मैकाले के प्रथम कथन से तो बिल्कुल ही सहमत नहीं हूँ । १८३४ के आस पास भारत ऐसा भी नहीं था कि आप पूरा भारत छान मारें और आपको एक भी भिखारी और चोर न मिले । मैकाले के बाकी के वाक्यांश संभवत: सत्य हों ।
कोइनराड एल्स्ट ने अपने शोध में पाया कि मैकाले के भाषण में से ये वाक्य किसी ने अपनी सुगमता और पूर्वाग्रह के कारण बीच में से निकाले हैं । वास्तव में मैकाले अपने भाषण में इन वाक्यों का कभी प्रयोग नहीं करते, बल्कि वो कुछ और कहते हैं जिसको भी लोगो ने काट छाँट कर अपनी इच्छा से जहाँ तहाँ प्रयोग किया है । मैकाले अपने भाषण में कहते है: (यहाँ पर में बिना अनुवाद के आंग्लभाषा में ही उद्धरित कर रहा हूँ )
"In one point I fully agree with the gentlemen to whose general views I am opposed. I feel with them, that it is impossible for us, with our limited means, to attempt to educate the body of the people. We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons, Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, in morals, and in intellect. To that class we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from the Western nomenclature, and to render them by degrees fit vehicles for conveying knowledge to the great mass of the population."
लोग मैकाले द्वारा बोले गये (इस पोस्ट में नीली स्याही में लिखे हुये) वाक्यों को तो बडे जोशोखरोश से बताते हैं लेकिन उसके बाद के वाक्यों को गायब कर देते हैं ।
मैकाले को समझने के लिये हमें उनके समय को समझना होगा । मैकाले उन्नीसवीं शताब्दी की पैदाइश थे, यूरोप उस समय वैज्ञानिक युग में तेजी से प्रवेश कर रहा था । सामाजिक मूल्य बदल रहे थे, वर्जनायें टूट रही थीं । इसके विपरीत भारत उस समय संभवत: अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था । विदेशी हम पर शासन कर रहे थे, देश के किसान का बुरा हाल था (और मैकाले को पूरे भारत में कोई चोर और भिखारी न मिला) । अंग्रेज भारत में धीरे धीरे पैर पसार रहे थे और इस कार्य को पूरा करने के लिये उन्हे मानवीय संसाधनों की जरूरत थी । भारत में अंग्रेजों के शासन को सुगम बनाने के लिये उन्हे भारत में भी मजबूरन वैज्ञानिक तौर तरीकों का इस्तेमाल करना पड रहा था । रेल, डाक और तार की सुविधायें इसी विचारधारा का परिणाम थीं ।
इससे पूर्व सन १८१३ में इंगलैण्ड की संसद ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत में शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिये एक लाख रूपये प्रति वर्ष खर्च करना अनिवार्य कर दिया था । अब इस रूपये के खर्च को लेकर दो खेमें बँट गये थे । एक खेमा कहता था कि पुराने ढर्रे की शिक्षा पद्यति अर्थात संस्कॄत, अरबी और फ़ारसी के माध्यम से शिक्षा चालू रखी जाये, और दूसरा खेमा (जिसमें मैकाले थे) का विचार था कि यूरोपीय प्रकार की आधुनिक शिक्षा पद्यति अपनायी जाये जिसमें कि आधुनिक विधाओं/विज्ञान पर मुख्य ध्यान हो । ये अच्छा ही हुआ की मैकाले वाला खेमा अपनी बात मनवानें में कामयाब हुआ । इसके फ़लस्वरूप भारत में एक नयी चेतना जाग्रत हुयी जिसके कारण गांधी, सुभाष, नेहरू, सरोजनी नायडू जैसे विद्वान और विचारकों का भारत के राजनैतिक पटल पर अवतरण हुआ ।
जो लोग मैकाले को गाली देते हैं मैं उनसे पूछता हूँ कि क्या वो अपने बच्चों को पुरानी भारतीय गुरूकुल पद्यति से शिक्षा दिलायेंगे ? जी हाँ आज भी भारत में ऐसे गुरूकुल उपलब्ध हैं । या फ़िर वो भी इस आधुनिक शिक्षा पद्यति और मैकाले को गाली देते हुये अपने बच्चों को आई. आई. टी अथवा आई. आई. एम. में प्रवेश लेने के लिये प्रेरित करेंगे ।
जो लोग कोइनराड एल्स्ट का पूरा लेख पढना चाहते हैं वो इस कडी से उनके लेख की पी. डी. एफ़. फ़ाइल पढ सकते हैं ।
मैं श्री सुरेशजी के विचारों और भावनाओं का सम्मान करता हूँ, परन्तु इतिहास के मापदण्डों से सत्य कुछ और ही है । कक्षा आठ तक मेरी शिक्षा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विद्यालय में हुयी है और मैकाले के इस वक्तव्य से मैं भली भाँति परिचित हूँ । मैकाले के बहाने हमें वामपंथियों को गाली देने का सुनहरा अवसर प्राप्त हो जाता है और आधुनिक शिक्षा पद्यति के प्रति अपनी भडास निकालने का बहाना भी । इस लिहाज से देखा जाये तो मैकाले ने इस देश को उसकी नकारात्मक ऊर्जा को निकालने का एक माध्यम प्रदान किया है और इसके लिये मैं मैकाले का ॠणी हूँ ।
इस विषय पर मेरे विचार तब बदले जब मैने श्री कोइनराड एल्स्ट (Koenraad Elst) का एक शोधपत्र पढा । कोइनराड एल्स्ट के बारे में अधिक जानकारी विकीपीडिया पर इस कडी से प्राप्त करें । कोइनराड एल्स्ट हिन्दू राष्ट्रवादी इतिहासकार माने जाते हैं और भाजपा एवं विश्व हिन्दू परिषद जैसी राष्ट्रवादी संस्थाओं की पत्रिकाओं में उनके लेख छपते रहते हैं । मुझे ताज्जुब हुआ जब कोइनराड एल्स्ट ने मैकाले के प्रति फ़ैले हुये इस भ्रम को दूर करने का प्रयास किया । उन्होने उस मुद्दे को छुआ जिसके बारे में लगभग सारा भारत एक ओर खडा था । दूसरे शब्दों में कहें तो मैकाले को जुतियाने को सब तैयार खडे हैं ।
इस संदर्भ में दो प्रश्न हैं । पहला ये कि क्या वास्तव में मैकाले ने ये व्यक्तत्व दिया था ? दूसरा कि अगर दिया भी था तो इसका प्रसंग क्या था? ऐसा तो नहीं है कि मैकाले के भाषण के इस अंश को "आउट आफ़ कान्टेक्स्ट" लिया जा रहा हो ।
सबसे पहले हम उस वाक्यांश को एक बार फ़िर पढते हैं:
" मैने भारत की चारो तरफ़ यात्रा की है और मुझे इस यात्रा के दौरान एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो चोर हो अथवा भिखारी हो । मैने इस देश में इतना धन देखा है, इतने ऊँचे संस्कार देखे हैं, लोगों का ऐसा माद्दा देखा है कि मुझे नहीं लगता कि हम कभी इस देश को कभी जीत पायेगें । कम से कम तब नहीं जब तक कि हम इस देश की रीढ तो तोड दें जो कि इस देश की आध्यात्मिक और सांस्कॄतिक धरोहर है । इसलिये मैं प्रस्तावित करता हूँ कि हमे इस देश की पुरानी शिक्षा पद्यति और संस्कॄति को बदलना होगा । अगर भारतीय सोचेंगे कि जो कुछ विदेशी और अंग्रेजी है वो उनकी स्वयं की चीजों से अच्छा है तो वे अपना आत्मसम्मान और अपनी संस्कॄति खो देगें और वैसा बन जायेगें जैसा हम उन्हे बनाना चाहते हैं: वास्तव में एक दबा और कुचला हुआ राष्ट्र ।"
मैकाले का जन्म सन १८०० में हुआ था और वो भारत में लगभग १८३४-१८३८ तक रहे थे । मैं मैकाले के प्रथम कथन से तो बिल्कुल ही सहमत नहीं हूँ । १८३४ के आस पास भारत ऐसा भी नहीं था कि आप पूरा भारत छान मारें और आपको एक भी भिखारी और चोर न मिले । मैकाले के बाकी के वाक्यांश संभवत: सत्य हों ।
कोइनराड एल्स्ट ने अपने शोध में पाया कि मैकाले के भाषण में से ये वाक्य किसी ने अपनी सुगमता और पूर्वाग्रह के कारण बीच में से निकाले हैं । वास्तव में मैकाले अपने भाषण में इन वाक्यों का कभी प्रयोग नहीं करते, बल्कि वो कुछ और कहते हैं जिसको भी लोगो ने काट छाँट कर अपनी इच्छा से जहाँ तहाँ प्रयोग किया है । मैकाले अपने भाषण में कहते है: (यहाँ पर में बिना अनुवाद के आंग्लभाषा में ही उद्धरित कर रहा हूँ )
"In one point I fully agree with the gentlemen to whose general views I am opposed. I feel with them, that it is impossible for us, with our limited means, to attempt to educate the body of the people. We must at present do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons, Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, in morals, and in intellect. To that class we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from the Western nomenclature, and to render them by degrees fit vehicles for conveying knowledge to the great mass of the population."
लोग मैकाले द्वारा बोले गये (इस पोस्ट में नीली स्याही में लिखे हुये) वाक्यों को तो बडे जोशोखरोश से बताते हैं लेकिन उसके बाद के वाक्यों को गायब कर देते हैं ।
मैकाले को समझने के लिये हमें उनके समय को समझना होगा । मैकाले उन्नीसवीं शताब्दी की पैदाइश थे, यूरोप उस समय वैज्ञानिक युग में तेजी से प्रवेश कर रहा था । सामाजिक मूल्य बदल रहे थे, वर्जनायें टूट रही थीं । इसके विपरीत भारत उस समय संभवत: अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था । विदेशी हम पर शासन कर रहे थे, देश के किसान का बुरा हाल था (और मैकाले को पूरे भारत में कोई चोर और भिखारी न मिला) । अंग्रेज भारत में धीरे धीरे पैर पसार रहे थे और इस कार्य को पूरा करने के लिये उन्हे मानवीय संसाधनों की जरूरत थी । भारत में अंग्रेजों के शासन को सुगम बनाने के लिये उन्हे भारत में भी मजबूरन वैज्ञानिक तौर तरीकों का इस्तेमाल करना पड रहा था । रेल, डाक और तार की सुविधायें इसी विचारधारा का परिणाम थीं ।
इससे पूर्व सन १८१३ में इंगलैण्ड की संसद ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत में शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिये एक लाख रूपये प्रति वर्ष खर्च करना अनिवार्य कर दिया था । अब इस रूपये के खर्च को लेकर दो खेमें बँट गये थे । एक खेमा कहता था कि पुराने ढर्रे की शिक्षा पद्यति अर्थात संस्कॄत, अरबी और फ़ारसी के माध्यम से शिक्षा चालू रखी जाये, और दूसरा खेमा (जिसमें मैकाले थे) का विचार था कि यूरोपीय प्रकार की आधुनिक शिक्षा पद्यति अपनायी जाये जिसमें कि आधुनिक विधाओं/विज्ञान पर मुख्य ध्यान हो । ये अच्छा ही हुआ की मैकाले वाला खेमा अपनी बात मनवानें में कामयाब हुआ । इसके फ़लस्वरूप भारत में एक नयी चेतना जाग्रत हुयी जिसके कारण गांधी, सुभाष, नेहरू, सरोजनी नायडू जैसे विद्वान और विचारकों का भारत के राजनैतिक पटल पर अवतरण हुआ ।
जो लोग मैकाले को गाली देते हैं मैं उनसे पूछता हूँ कि क्या वो अपने बच्चों को पुरानी भारतीय गुरूकुल पद्यति से शिक्षा दिलायेंगे ? जी हाँ आज भी भारत में ऐसे गुरूकुल उपलब्ध हैं । या फ़िर वो भी इस आधुनिक शिक्षा पद्यति और मैकाले को गाली देते हुये अपने बच्चों को आई. आई. टी अथवा आई. आई. एम. में प्रवेश लेने के लिये प्रेरित करेंगे ।
जो लोग कोइनराड एल्स्ट का पूरा लेख पढना चाहते हैं वो इस कडी से उनके लेख की पी. डी. एफ़. फ़ाइल पढ सकते हैं ।
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