सोमवार, अक्तूबर 26, 2009

अक्टूबर का गीला दिन, किशोरी और हमारी वापिसी !!!

आज सुबह नींद खुली तो देखा कि झमाझम बरसात हो रही है। ११ बजे तक पडे ऊँघते रहे और तर्क दिया कि जब घडी का आविष्कार नहीं हुआ होगा तो लोग रोशनी देखकर ही उठते होंगे और अभी रोशनी से लग रहा है कि सुबह का ५ बजा है। 

जब आत्मा पर बोझ बढने लगा और भूख से पेट सिकुडने लगा तो उठे, तैयार हुये और देखा कि घर में खाने का एक दाना भी नहीं है। खुश हुये कि चलो अब पका पकाया खायेंगे, बरसात में भीगते एक रेस्तराँ से खाना खाकर भीगते हुये अपने गरीब-रथ तक पंहुचे। आप सोच रहे होंगे कि हमने साथ में छाता क्यों नहीं लिया । हमने भी यही सोचा और अपने अजायबखाने रूपी घर में ५ मिनट तक छाता खोजा भी, लेकिन उसके बाद निष्कर्ष निकाला कि या तो रूममेट उठाकर ले गया होगा, अथवा किसी को उधार देकर भूल गये होंगे अथवा लैब में पडा हमारी डेस्क की शोभा बढा रहा होगा।

खैर झमाझम बारिश के बीच में अपने गरीब-रथ का बाजा चालू किया तो मानो बादलों के बीच बैठी श्रीमती किशोरी अमोनकर इसी क्षण का इन्तजार कर रही थीं। उनके स्वर से जब "मेहा झर झर बरसत रे" सुना तो तुरन्त पोस्ट लिखने का मन भी बना लिया। अपने रथ को एक कोने में रोककर बरसात के बीच में "मेहा झर झर बरसत रे" का आनन्द लिया और उसके बाद अपनी लैब में नमूदार हुये। आप भी इस गीत को सुनिये।



अब पोस्ट लिखने के बहाने पिछले कुछ महीनों का लेखा जोखा भी दे दें। ८ सितम्बर को जब हम भारत आये थे तो सोचा था कि ये करेंगे वो करेंगे, इससे मिलेंगे, उससे मिलेंगे आदि आदि इत्यादि। लेकिन ये सभी चुनावी वादे/विचार साबित हुये। और समझ भी आया कि हर काम को भारत यात्रा पर टाल देना अच्छी बात नहीं है क्योंकि घर वाले भी ऐसे ही चुनावी वादे कर चुके होते हैं।

जाहिर है घर वालों के वादे वादे होते हैं और हमारे वादे भांग के नशे में कहे गये शब्द अथवा ब्लागर मीट में लिये गये संकल्प, ;-) इसके चलते हमारे कई वादे कत्ल हो लिये। दिल्ली में रचना से मिलने का कार्यक्रम था जो सिर्फ़ फ़ोन पर बातचीत पर सीमित रह गया। गाहे बगाहे (ताना-बाना) वाले विनीत से बात करके मन खुश हुया और उनके शोधकार्य के बारे में सुनकर बहुत अच्छा लगा। पी.डी. तो भरे बैठे थे, हमने फ़ोन पर पहले ही माफ़ी मांग ली और उनके तलवार उठाने के पहले ही उनकी शादी की बात करके मामले को नया मोड दे दिया। मुम्बई वासी अभय तिवारी जी से बात हुयी और पता लगा कि वो असल में फ़रूखाबादी हैं और चूंकि हम एक बार फ़रूखाबाद गंगा नहाने जा चुके हैं तो उन पर अपनी करीबी जाहिर कर दी। उनसे नियमित लिखने का वायदा भी लिया गया। ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के फ़ोन की घंटी बजाने के प्रयास कई बार असफ़ल रहे, सम्भवत: वो व्यस्त रहे हों अथवा अनूप जी ने हमें गलत नम्बर दे दिया हो अथवा ये BSNL वालों का हमारी उनसे बात न होने देने का षणयन्त्र (षणयंत्र ?) रहा हो।

खैर इस बार भी घर वालों ने ध्यान नहीं दिया और हम कुंवारे ही रह गये, ;-)
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फ़िर भी कम निकले।

इस छुट्टियों में हिमालय यात्रा की गयी लेकिन उसकी रिपोर्ट अंकुर वर्मा के जिम्मे...

ह्य़ूस्टन वापिसी के बाद:

भारत में जब तक रहे दौडने से रिश्ता टूट चुका था, फ़िर से रिश्ता जोडने की कोशिश अभी भी चल रही है। ९ अक्टूबर की रात को ह्य़ूस्टन लौटते ही हमने ११ अक्टूबर की सुबह १० मील (१६ किमी) वाली दौड दौडने का निश्चय किया। जैट लैग के चलते न तो ठीक से सो पाये और १ दिन में न ही थकान उतर पायी। खैर सुबह दौडना शुरू किया तो ३ मील तक तो ठीक था लेकिन उसके बाद टांगो ने विद्रोह कर दिया। बडे कष्ट में अगले ७ मील गुजरे और जिस दौड को ७० मिनट में समाप्त करने की इच्छा थी वो ७१ मिनट और २१ सेकेंड्स में समाप्त हुयी। ये फ़ोटो गवाह है कि हमने आखिरी ७ मील किस दर्द में पूरे किये।

(आऊच, बहुत दर्द हो रहा है)


इसके बाद हमने अगले दो हफ़्ते धीरे धीरे दौडने से अपना टूटे रिश्ते के तार धीरे धीरे जोडे और कल एक हाफ़-मैराथन (२१.१ किमी) दौडी। ये दौड अच्छी रही क्योंकि इसमें हमने अब तक का अपने सर्वोत्तम समय दर्ज किया। हमने इसे १ घंटा ३२ मिनट और ५६ सेकेंड्स में पूरा किया। हाफ़-मैराथन के लिये हमारा पिछला सबसे अच्छा समय १ घंटा ३४ मिनट और ४१ सेकेंड्स था। इस दौड के अंतिम ३ मील कष्टप्रद रहे लेकिन हमने अपने मित्र और ट्रेनिंग पार्टनर डेविड पाईपर को ४० सेकेंड्स से पीछे छोडा। ध्यान रहे पिछली २ दौडों में डेविड ने हमारी वाट लगा रखी थी, ;-) अब मामला बराबरी पर है।
अगली दौड २५ किमी की है जो २ हफ़्ते बाद है, जैसा कि हम आपस में कहते हैं The bet is ON David...

कल की दौड के सबक हैं कि हमें अपनी रनिंग फ़ार्म को सुधारना है। कन्धे सीधे रहने चाहिये और कदम एकदम मशीनी एकुरेसी के साथ पडने चाहिये। हम तीन फ़ोटो दिखाते हैं। एक हमारा है, एक डेविड का है और एक ट्वांग का है जो हमारे स्तर से बहुत ऊँचे धावक हैं तेज रफ़्तार पर भी उनकी रनिंग फ़ार्म देखिये, देखकर ही मन खुश हो जाता है।


चलिये, अब विदा दीजिये...अब नियमित पोस्ट छापते रहेंगे, अगर कोई पढने वाला है तो, ;-)


                   (७१९ नंबरी नीरज)


                  (२२३४ नंबरी डेविड)

          (और ३८ नंबरी ट्वांग, क्या बात है)


 

9 टिप्‍पणियां:

  1. अब आप फरवरी में आ ही जाइये १ बार फिर से भारत ..:))...सब अरमान पूरे कर लीजियेगा...:P ...:))....बाकी, काफी उम्दा पोस्ट है.....आपने हिंदी में १ पोस्ट लिखने के लिए प्रेरित किया...:))

    उत्तर देंहटाएं
  2. वादे शायद होते ही तोड़ने के लिए हैं। अगली बार कोई वादे मत करके आइएगा, शायद फिर बिना किए सब पूरे हो जाएँ। अगली दौड़ के लिए शुभकामनाएँ।
    घुघूती बासूती

    उत्तर देंहटाएं
  3. भारत से हो आये...चलो, बढ़िया है...भईया, तुम्हें दौड़ता देखूउर प्लान सुन हम एक दो किलो तो यूँ ही झटक जाते हैं तुरंते...

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढिया गीत सुनवाया ।धन्यवाद।
    आप की पोस्ट और चित्र बढिया लगे।आप पोस्ट लिखते रहे पढने वाले तो तैयार ही रहते हैं....शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. लो असली काम तो हुआ ही नहीं, घर वालो के भरोसे कब तक बैठना पड़ेगा भाई :)

    उत्तर देंहटाएं
  6. रहे कुंआरे के कुंआरे। अब यह तो नहीं कहेंगे कि कोई मेम तलाश लो अगर परिवार वाले घास नहीं डाल रहे! पर माता पिताजी को ख्याल रखना चाहिये। वे आपका ब्लॉग पढ़ते हैं या नहीं? :)

    मेरा फोन नम्बर मुझी से ले लिया होता!

    उत्तर देंहटाएं
  7. कितना दौड़ते हो यार .वैसे अपनी बोड़ी से सलमान को कोम्प्लेक्स दे सकते हो ....लगता है इस फोटो से अपने आप घर पे रिश्ते की बात पहुँच जायेगी ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. दिल्ली में रचना से मिलने का कार्यक्रम था जो सिर्फ़ फ़ोन पर बातचीत पर सीमित रह गया।
    neeraj thank you very much for finding time to call . Meeting you would have been too good but in any case you did not disappoint me over the phone either !!!!!!!
    may be we can meet when i come there

    खैर इस बार भी घर वालों ने ध्यान नहीं दिया और हम कुंवारे ही रह गये, ;-) बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फ़िर भी कम निकले।

    ab yae to ek tarfaa picture haen dost , film abhi baaki haen

    उत्तर देंहटाएं
  9. बेनामी6:44 am

    अरे सर जी , हमे तो लगा , आप शादी करके निपट गये होंगे , तभी इंडिया मे कोई पोस्ट नही लिख रहे हैं . कोई बात नही , अगली ट्रिप मे पक्का हो जाएगी . हिम्मत रखिए :-)
    और यह क्या लिख दिया आपने "अब नियमित पोस्ट छापते रहेंगे, अगर कोई पढने वाला है तो " , हम तो आपसे बार बार गुज़ारिस करते रहे की पोस्ट लिख दीजिए , लेकिन आपने नही लिखी , बाद मे हमने कहना भी बंद कर दिया .
    आशा है , अब आप नियमित लिखेंगे .

    रीगार्ड्स-
    गौरव स्रिवास्तवा
    अल्लहाबाद

    उत्तर देंहटाएं

आप अपनी टिप्पणी के माध्यम से अपनी राय से मुझे अवगत करा सकते हैं । आप कैसी भी टिप्पणी देने के लिये स्वतन्त्र हैं ।