मंगलवार, मार्च 27, 2007

ये रात बहुत रंगीन सही॰॰॰

ये रात बहुत रंगीन सही,
ये रात बहुत रंगीन सही, इस रात में गम का जहर भी है।
नग्मो की खनक में डूबी हुई, फरियाद-ए-फुगाँ की लहर भी है।
ये रात बहुत रंगीन सही॰॰॰

तुम रक्स करो मैं शेर पढूँ, मतलब तो है कुछ खैरात मिले।
इस कौम के बच्चों की खातिर, कुछ सिक्कों कि सौगात मिले।

सिक्के तो करोडों ढल ढलाकर, टकसाल से बाहर आते हैं।
किन वारों में खो जाते हैं, किन पर्दों में छुप जाते हैं।

ये जुल्म नहीं तो फिर क्या है, पैसे से तो काले धन्धें हो।
और मुल्क की वारिस नस्लों की, तालीम की खातिर चन्दें हों।

अब काम नहीं चल सकनें का, रहम और खैरात् के नारे से।
इस देश के बच्चे अनपढ हैं, दौलत के गलत बँटवारे से।

बदले ये निज़ाम-ए-ज़ारादारी,
बदले ये निज़ाम-ए-ज़ारादारी, कह दो ये सियासत-दानों सें।
ये मसला हल होनें का नही, काग़ज पे छापे ऐलानों से।
ये मसला हल होनें का नहीं, काग़ज पे छापे ऐलानों से।

ये रात बहुत रंगीन सही, इस रात में गम का जहर भी है।
ये रात बहुत रंगीन सही॰॰॰

साहिर लुधियानवी साहिब के इस गीत को खय्याम ने गीतबद्ध किया है
और मोहम्मद रफी ने अपनी जादुई आवाज के जादू से बिखेरा है हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म "शगुन" में।

5 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा गीत है नीरज भाई
    हिंदी चिट्ठा जगत में स्वागत है.......

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  2. वाह... वाक़ई ख़ूबसूरत नगमा है।

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  3. हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका हार्दिक अभिनन्दन है। कुछ अपने विचार हिन्दी गद्य में भी लिखें तो जनसामान्य को आपके विचार-रस का आनन्द मिल सके।

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  4. bahut achha laga aapki kratiyan padhke...... vichron ki vayakhya jaari rakhna... hum aapki safalta ki kaamna karte hain... aap bulandiyon pe pahunchein aisi hamari abhilasha hai...

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