बुधवार, अप्रैल 23, 2008

दिल को छू लेने वाली कहानी !!!

इस कहानी को तकरीबन एक साल पहले कहीं पढा था, अब तो वो वेबसाईट भी याद नहीं जहाँ इसे पढा था । ये अच्छा हुआ कि इसे सहेजते समय लेखक का नाम भी लिख लिया था जिससे इसे आज पोस्ट करने की हिम्मत कर रहा हूँ । इसके लिये मैने लेखक से अनुमति नहीं ली है परन्तु यदि किसी को इससे आपत्ति हो तो मुझे सूचित करें । मैं इसे तुरन्त अपने चिट्ठे से हटा लूँगा ।

ये कहानी थोडी लम्बी अवश्य है लेकिन आपके धैर्य का आपको भरपूर फ़ल मिलेगा, ऐसी मेरी आशा है ।

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आतिथ्य
प्रीतीश आचार्य
रूपांतर : आयुष्मान गोस्वामी


रसानंद बाबू को अपने पर गुस्सा आ रहा था। मिस्त्री की बात मान ली होती तो यह दुर्दशा नहीं होती। कल जब साइकिल में हवा भरवाने गये थे तब उसने कहा थाज्ञ् `जल्द ही टायर बदलवा दीजिए।' एक ही दिन में उसकी बात सच निकली, तेज़ आवाज़ के साथ ट्यूब फट गया। कम से कम सुबह घर से निकलते समय फटा होता तो साइकिल ठीक करके निकलते या फिर निकलते ही नहीं। अब क्या करें? उनकी नज़र कलाई पर बंधी घड़ी पर पड़ी, सोचने लगे ग्यारह बज रहे हैं, यहां से पदमपुर साइकिल से जाओ तो पूरा एक घंटा। पैदल चलो तो तीन घंटे से कम नहीं लगेंगे। ऊपर से साइकिल ठेलना होगा। जब विपदा उपस्थित होती है तो जाने क्यों धूप का प्रकोप बढ़ जाता है और दूरी भी। सारी स्थिति की कल्पना करते हुए रसानंद बाबू के पांव थम से गये। प्यास के मारे गला सूखने लगा।


रसानंद बाबू ने पीछे मुड़कर देखाज्ञ् एक औरत चली आ रही है। उसकी चाल से उन्हें लगा कि मानों वह उन तक पहुंचना चाहती हो। खेत से लौट रही है, पति के लिए नाश्ता लेकर गयी थी। वहीं कुछ देर पति के साथ काम किया होगा और अब लौट रही है। पति से पहले उसे घर पहुंचना होगा। भात भी बनाना है, बच्चे इंतजार कर रहे होंगे। औरत के सिर पर एक परात थी जिस पर पलाश के कुछ पत्ते, दो-चार खजूर के दातुन, साथ में मुट्ठी भर जलावन लकड़ी जो चूल्हा जलाने के काम आयेगी। उस औरत के साथ बिना कोई बात किये रसानंद बाबू ने यह सब अनुमान लगा लिया। अनुमान लगाते हुए उनके चेहरे पर एक क्षीण मुस्कराहट दौड़ गयी। मुस्कराहट ने उनका कष्ट कुछ कम कर दिया। जासूसी उपन्यास में इसी तरह जासूस कई बातें जान लेता है, बिना कुछ पूछे, पहली मुलाकात में ही, किसी ज्योतिषी की तरह। बचपन में उन्होंने बहुत सारे जासूसी उपन्यास पढ़े थे। मन में दबी हुई इच्छा भी थी जासूस बनने की। क्या पता मौका मिलता तो शायद बन भी गए होते। फोन पर फोन करते। हुक्म तामील करने के लिए हमेशा सहायक मौजूद रहते।


लेकिन पता नहीं, क्या सोचकर वे मलेरिया विभाग में घुस गए। धेले भर की आमदनी नहीं। महीने भर तनख्वाह का इंतज़ार करो, कर्ज चुकाओ। उस पर रोज़ दस-बीस मील की साइकिल यात्रा और रास्ता भी ऐसा कि साइकिल का एक पंचर बनवाने के लिए कोई मिस्त्री न मिले। इतना सब सोच चुके थे रसानंद बाबू कि वह औरत उनके बराबर में चलते दिखाई दी। `मां, तुम्हारे गांव में कोई साइकिल की दुकान तो नहीं है?' रसानंद बाबू को पता है, आस-पास कोई साइकिल की दुकान नहीं है। कुछ दिन पहले किसी ने बताया तो था, साइकिल का बालबेरिंग किसी ने अपनी स्वदेशी बुद्धि से ग्रीस के बदले लकड़ी का गुड़ लगाकर सेट किया था। सुनकर रसानंद बाबू भी खूब हंसे थे। आज उन्हें लग रहा था साइकिल का पंचर सुधारने का ऐसा ही कुछ स्वदेशी उपाय होता तो इस प्राणांतक धूप से छुटकारा मिल जाता। `न इस गांव में तो कोई नहीं है। सीधे पदमपुर जाना पड़ेगा।' कहते हुए उस औरत ने रसानंद बाबू का सपना तोड़ा और पूछाज्ञ् `तुम्हें कहां तक जाना है, काका!' उसकी बातों से लगा वह रसानंद बाबू की विपदा से दुखी है। कोई बीस-बाईस साल की उम्र होगी उस औरत की, रसानंद बाबू की छोटी बेटी के बराबर। शादी को चार-पांच साल हो गये होंगे, उसके एक-दो बच्चे भी हो चुके होंगे। `मां' के बदले बेटी संबोधित किया जाता तो शायद ज्यादा फबता। पर, एक लड़की अपने जन्म से मृत्यु तक मां ही तो रहती है। शादी से पहले मां-बाप-भाई की सेवा, शादी के बाद पति-पुत्र की सेवा और बुढ़ापे में नाती-नातिन की सेवा। बिना किसी प्रति-उपकार के सारा जीवन सेवा करना ही मानों उसका धर्म है। मां के अलावा कौन करेगा इतनी सेवा? बदले में उसे मिलता क्या है! बेचारी तरसती रहती है पूरी ज़िन्दगी दो टूक स्नेह और संबोधन के लिए। यहां मिलेगा। न, न यहां नहीं, वहां। या फिर और कहीं। इसी तरह के विचारों से रसानंद बाबू का मन करुणा से द्रवीभूत हो गया। वे आत्म-समीक्षा करने लगे। खुद उन्होनें भी क्या दिया है, वह स्नेह और श्रद्धा भरा संबोधन!


`काका! पदमपुर तक जाओगे?' पहले प्रश्न का जवाब न मिलने पर औरत ने एक बार फिर पूछा। `हां, मां!' इतना कहने के बाद सदानंद बाबू का मन आत्म-दया से भर गया। उन्हें लगा जैसे आंखों से आंसू निकल आएंगे। भरी धूप में साइकिल घसीटते-घसीटते वे अब पदमपुर तक जाएंगे। बचपन में शरीर पर कहीं चोट आने पर, मां के सहलाने के बाद जैसे वे रोया करते थे, आज न चाहते हुए भी उन्हें वैसे ही रोने का मन करने लगा। इतने में औरत पूछ बैठीज्ञ् `क्या तुम पदमपुर में नौकरी करते हो काका, तुम्हारा अपना घर कहां है?'
`बुटोमाल!' रसानंद बाबू ने कहा। `घेंसबुटोमाल'।
`हां'
`मेरी भाभी भी तो बुटोमाल की बेटी है। तुम जानते होगे। झांकट घर की। केतकी। उसकी और मेरी एक ही लगन में शादी हुई थी। इस आषाढ को चार साल हो जाएंगे।' लड़की जैसे संबंध जोड़ने के लिए उतावली हो रही थी। रसानंद बाबू को अपनी बेटी की उम्र में रखने के बाद वह औरत एक छोटी बच्ची से ज्यादा बड़ी नहीं लग रही थी। एक बातूनी, बार-बार सवाल करने वाली, जो जवाब न मिलने तक चुप न रहती हो। तीन-चार साल की छोटी-सी लड़की।
`अच्छा, अच्छा, कहीं तू समारू की बेटी की बात तो नहीं कर रही है? वह जो तालपाली में ब्याही है। चार लड़कों में एक लड़की। अच्छी लड़की है।' रसानंद बाबू ने कहा।
अब रसानंद बाबू और लड़की बराबर साथ-साथ चल रहे थे। दोनों में बातचीत का विषय थाज्ञ् केतकी और उसका बाप समारू। बाप के मरने के बाद पांचवी कक्षा में समारू की पढ़ाई छूट गई। रसानंद बाबू का यजमान है उसका परिवार। गांव छोड़ने के साथ-साथ रसानंद बाबू का यजमानी से भी नाता छूट गया। अब ये सब काम चाचा के लड़के देखते हैं। पर अपनी बेटी की शादी में समारू नहीं माना, `पंडित, चार बेटों में एक ही बिटिया है। तू जब तक पोथी नहीं पढ़ेगा, उसकी शादी नहीं होगी।' रसानंद बाबू शादी में पदमपुर से आये थे। जवांई देखने में लोहे के मूसल की तरह, सांवला, सख्त, मुंह एकदम गोल, शरीर काफी गढ़ा हुआ। इस सब का जाकर पत्नी से भी जिक्र किया था। उसी लड़के की बहन है यह लड़की।


`हमारी बेटी को ठीक तरह से रखा है न तुम्हारे दादा ने?' रसानंद बाबू ने इस आग उगलती धूप में थोड़ा मजाक किया। `लड़की' के साथ बातचीत करते हुए धूप का प्रकोप कुछ कम-सा लगा। अब आ गया है उसका गांव जहां वह रुक जाएगी। उसके बाद कष्ट झेलना होगा। रसानंद बाबू ने मन ही मन आशंका की।
`काका! जब मैं तुम्हारी बेटी जैसी हूं तो एक बात कहूंगी, तुम मना मत करना।' लड़की ने अपने गांव का रास्ता पकड़ने से पहले कहा।
`बोलो मां', रसानंद बाबू ने पूछा।
`तुम इस भरी धूप में मत जाओ। मेरे घर में दोपहर में रह जाओ। इतनी धूप है, क्या पता कुछ हो जाए तो?'
`न रे मां! घर पर तेरी काकी मेरा इंतजार कर रही होगी। फिर मुझे ऑफिस भी जाना होगा।' रसानंद बाबू के तर्क बनावटी नहीं हैं। गरमी में ज़रा सी देर हो जाने पर पत्नी घर से बाहर, बाहर से अन्दर होती रहती है। बेटियों की शादी के बाद बेचारी घर पर अकेली रह नहीं पाती है। सूना घर जैसे उसे खा जाता है। पर उससे भी बड़ी बात है कैसे वे किसी के यहां मेहमान हो जाएं। दो मिनट तो हुए इस परिचय को। दूसरी तरफ मन कर रहा था कुछ देर रुक जाने को। इन दिनों बूढ़ों के लिए लू से बड़ा यम कोई नहीं है। प्राण रहे तो सब ठीक है। एक ओर प्रचंड धूप का प्रकोप, दूसरी ओर लड़की का स्नेह भरा निमंत्रण।


`काका! हमें तुम छोटी जात का गरीब मानते हो तो बात अलग है। नहीं तो तुमको इस भरी दोपहर में जाना नहीं चाहिए। मेरी भाभी के तुम जब काका हो तो मेरे भी तो काका हुए। मैं तुम्हारी अपनी बेटी होती तो क्या तुम इस तरह चले जाते।' लड़की की बातों में आत्मीयता थी, साथ था कुछ अभिमान। पर उससे भी ज्यादा था मन में यह डर कि रास्ते में बूढ़े को लू लग जाए तो, आखिर पाप तो उसे ही लगेगा न। उपन्यास के जासूस की तरह रसानंद बाबू ने लड़की के मन की बातों को ताड़ लिया। सोचने लगेज्ञ् क्या उम्र है इसकी अभी! स्कूल का मुंह तो शायद इसने देखा भी नहीं होगा। पर, कितनी समझदारी है इसमें। कितनी चालाकी से इसने मुझे अपना कर लिया है। हो सकता है यह मेरे मन की बात को भी जान चुकी होगी। दोपहर की धूप में साइकिल ठेलते हुए बूढ़े में पदमपुर तक जाने की न ताकत है और न ही आग्रह।


`ना रे मां! मैं तो कुछ और सोच रहा था। एक तो तेरे सास-ससुर का घर और अब तू खेत से लौट रही है। घर पर कितने सारे काम पड़े होंगे। उसके ऊपर मेरा बोझ।' रसानंद बाबू ने कहा।
`क्या बात करते हो तुम काका। मेरे बाप-काका आते तो मैं क्या भगा देती। वैसे भी मेरे सास-ससुर अपनी बेटी के यहां गये हैं। कल लौटेंगे। तेरा जंवाई बेचारा कितना खुश होगा, तुम्हें देखकर और अगर तुम दो घड़ी रहोगे तो मुझे कौन-सा कष्ट है। तुम तो ठहरे बाम्हन जात। मैं चूल्हा जला दूंगी, तुम भात उतार लेना। मुझे कौन-सा काम करना पड़ेगा।
अंतत: रसानंद बाबू लड़की के घर गए। उन्हें लगा, जैसे दूसरे लोक से उनकी मां लौट आयी है। तेज़ धूप में बच्चे को किसी तरह बचाना है। पेट भर खिलाना-पिलाना है। लड़की का छोटा-सा घर, दो ही कमरे। आधी छत खपरैल की, बाकी घास-फूस की। आंगन में मिट्टी की हंडिया में पानी रखा है। रस्सी की एक चारपाई पड़ी है। चारपाई पर एक फटी-पुरानी गुदड़ी बिछी है। छोटे बच्चे के लिए कोमल शय्या। बच्चा सोया था शायद। बीच में जाग जाने पर पड़ोसी घर ले गये होंगे। घर में पहुंचते ही लड़की ने सिर से परात को उतारा। तुरन्त काका के लिए पानी ले आयी। खाट पर बिछी गुदड़ी को अंदर ले गयी। वहां बैठने को कहा। उसके बाद वह गई पड़ोसी के घर बच्चे को देखने। पल भर भी विश्राम नहीं। एकदम यंत्र की तरह।


रसानंद बाबू कुछ देर तक खाली खाट पर बैठे, फिर लेट गये। थोड़ी देर बाद सो भी गये। सिर के नीचे तकिया न था, घर पर शायद तकिया नहीं है या फिर है भी तो गंदा-पुराना। शायद इसीलिए लड़की ने काका को तकिया नहीं दिया हो।


रसानंद बाबू की पतली नींद लड़की और उसके पति की फुसर-फुसर बातचीत से टूटी। लड़की कह रही थीज्ञ् `मेरी भाभी के गांव का आदमी है, उनके घर का पुरोहित। पदमपुर में नौकरी करता है। इस गरमी में साइकिल ठेलते हुए जा रहा था। मैंने सोचा लू न लग जाए।' इस पर उसका पति बोलाज्ञ् `यह सब तो ठीक है पर क्या खिलाओगी इसे!' लड़की ने जवाब दियाज्ञ् `तुम क्या इतना मूर्ख समझते हो मुझे। एक बा्रह्मण को एक जून खिला नहीं पाऊंगी, बासी परवाल (भीगा कर रखा गया भात, इसे पांता भात भी कहा जाता है।) है, हम दोनों के लिए हो जाएगा। नुनकी के घर से पाव भर चावल लायी हूं। बूढ़े के लिए भात चढ़ा दिया है। बनबासी पंसेरी से आलू लाकर चावल में डाल दिया है, सीज जाएगा। दो कच्चे केले तोड़ लाई हूं बागान से। चूल्हे में रख दूंगी। चावल चढ़ा दिया है, पकने पर बूढ़े को जगा दूंगी, उतार लेगा। थक गया है। अभी सो लेने दो उसे एक नींद।'


लड़की की बातों पर पति को कोई असहमति नहीं है। पत्नी की सामर्थ्य पर उसे पूरा भरोसा है। तब भी उसने पूछाज्ञ् `बेटा क्या बासी परवाल खाएगा, हमारे साथ।' लड़की ने जवाब दियाज्ञ् `न, न, उसे क्यों बासी देने लगी। बूढ़ा आदमी क्या पाव भर चावल खा लेगा? बचेगा तो बेटे को खिला दूंगी। नुनकी के घर में कुछ खाया हुआ है, अभी खेल रहा है।' संतुष्ट होकर पति कहता हैज्ञ् `नुनकी के घर से वो कांसे की थाली मांग लेना। गिलट की थाली में खाना देना अच्छा नहीं लगेगा।' लड़की बोलीज्ञ् `अरे! तुमको पता नहीं, नुनकी के भाई की बीमारी में कांसे की थाली गिरवी चली गई, कहां निकाल पाये उसे? डूब गई वो तो।' `तो अब क्या करोगी?' उसके पति ने पूछा। शायद उसे नुनकी के घर की कांसे की थाली डूबने पर चिंता नहीं थी। चिंता थी तो इस बात की कि अब कहां से आयेगी कांसे की थाली। पर लड़की के उत्साह में कोई कमी नहीं है। उसने कहाज्ञ् `कांसे की थाली की क्या जरूरत है, खेत से मैं कच्चे पलाश के पत्ते ले आयी थी। पत्तल-दोना बना दूंगी।'

 

 

`थोड़ी-सी दाल होती तो अच्छा होता। सूखा भात बूढ़ा खाएगा भी तो कैसे खाएगा!' पति ने कहा।


ज्ञ् `क्यूं! अचार है। नमक पानी डालने से रस्सेदार तरकारी बन जाएगी।' लड़की के जवाब से लगा, हर सवाल का उत्तर देने की तैयारी उसने पहले से कर रखी है। अंतत: पति ने आश्वस्त भाव से कहाज्ञ् `और क्या? अपने घर पर जो है, वही तो खिला पाएंगे हम।'


इन सारे प्रसंग में रसानंद बाबू का मन कर रहा था, पति-पत्नी की बातों के बीच कहेंज्ञ् `मेरे लिए इतनी चिंता मत करो। कुछ भी होने से मेरा काम चल जाएगा। दोपहर को तुमने आश्रय दिया, ये क्या कम बात है!' पर वे उठ नहीं आये, गहरी नींद में सोने का अभिनय किये रहे। पति-पत्नी को मालूम नहीं होना चाहिए कि मैं उनकी बातों को सुन रहा था, यदि मालूम हो जाए तो बेचारे नंगे हो जाएंगे। शर्म से मुंह नहीं दिखा पाएंगे। पति-पत्नी के बीच प्रेम के अलावा और भी कई चीजें हैं जो तीसरे आदमी को पता नहीं चलनी चाहिए। उन्हें अपने घर की बात याद आई। महीने का वह आखिरी सप्ताह, जब बड़े समधी और समधन आ पहुंचे। दुर्भाग्य था जिस बनिए से उधार आता है, उसके बेटे की शादी होने के कारण दुकान भी बंद थी। वैसे में रसानंद बाबू की नज़र पड़ती है, पत्नी के हाथ खर्च की गोलक पर। मायके से लौटते हुए या फिर बाज़ार के हिसाब से बचाकर या फिर कैसे न कैसे करके पत्नी अपनी बचत को एक गोलक में रखती है। पचास-सौ रुपये निकले उसमें से। उसी से आधा किलो बासमती चावल, कुछ महंगी सब्जियां और साथ में मछली या मांस ले आये थे। केवल उनके लिए उन दिनों स्पेशल बनता है। एक बार तो समधी अड़ गए कि दोनों समधी एक साथ खाने पर बैठेंगे। रसानंद बाबू ने कहाज्ञ् `मैं तो नौ बजे भात खाकर ऑफिस जाने वाला प्राणी हूं। दोपहर को आपके साथ खाना खाऊं, एक तो तबीयत बिड़ेगी, दूसरे ऑफिस छोड़कर घर आने पर मेरी नौकरी चली जाएगी। समधी भी ज़िद पर अड़े थे, कहने लगेज्ञ् `तब तो नौ बजे मैं भी आपके साथ बैठूंगा।' अंतत: दाल में पानी डाला गया और तरकारी में चावल का चूरा। `सोमवार को मैं मांस नहीं खाता हूं। पूछना हो तो पूछ लीजिए अपनी समधन से।' यह कहते हुए रसानंद बाबू ने अपने लिए रास्ता बनाया। इसके बावजूद लगा, जैसे कोई बीच रास्ते में उनकी धोती चीर रहा हो। उनकी विनती कोई सुन नहीं रहा है।


`काका! उठोगे नहीं? भात पक गया है, उतार लो।' लड़की की आवाज़ ने रसानंद बाबू को जगा दिया। मुंह-हाथ धोकर वे भात उतारने लगे। मन कर रहा था बोलने काज्ञ् `बेटी! तूने जब सारे काम कर ही दिए तो भात भी उतार देती, मेरी कौन-सी जात चली जाती?' पर वे बोले नहीं। जात-कुजात के संस्कार की बात समझाने का यह समय नहीं है। हो सकता है लड़की समझेगी नहीं। उसके लिए जैसे सम्मान में काका बड़ा है, जात में ब्राह्मण भी ऊंचा है। फिर वे अपने आपसे पूछने लगे सचमुच मैं क्या संस्कारवादी दृष्टि से ये सब सोच रहा हूं। या आलस में कोई काम नहीं करना चाहता हूं। लड़की के हाथों सारे काम करवाना चाहता हूं।
खाने पर जब बैठे तो उसी पुराने दृश्य की पुनरावृत्ति हुई। रसानन्द बाबू ने सुझाव दिया, सब लोग एक साथ बैठ जाएं। जंवाई ने कहाज्ञ् `आप ठहरे बाहमन, गोस्वामी, मैं कैसे साथ बैठूंगा!' बेटा तो पहले से खा चुका है और रही लड़की तो उसकी बारी अंत में है। रसानंद बाबू समझ गए। उन्होंने जोर नहीं दिया। समधी की तरह नासमझ नहीं हैं।


खाना खाते समय एक बार फिर केतकी की बात आयी। `तुम कुछ भी कहो काका, मेरी भाभी के दुख का कोई अंत नहीं है। बचपन से मां नहीं है। अब बाप बीमार पड़ा तो बिस्तर में ही झा़डा-पेशाब सब कुछ। चार-चार बेटे, पर कोई नहीं पूछता। भाभी रोती रहती है। कहती है, काश भगवान ने मुझे लड़का बनाया होता तो मेरे बाप की यह दुर्दशा नहीं होती। मैं कहती हूं, भाभी! तू लड़का पैदा हुई होती तो अपने भाइयों से कोई अलग होती?' समग्र पुरुष समाज के नाम लड़की का अभियोग।
रसानंद बाबू को अब तक पता नहीं था कि समारू बिस्तर पकड़ चुका है। पिछले महीने तो वे गांव गये थे। किसी ने भी नहीं कहा। पर उन्होंने खुद भी तो कभी प्रयत्न नहीं किया, अपने बचपन के दोस्त के बारे में जानने का। आज किस मुंह से कहेंगे, समारू उसके बचपन का साथी है, पर गांव में उससे कभी मुलाकात तक नहीं होती। इतनी होशियार लड़की, उपन्यास के जासूस की तरह उनकी चालबाज़ी को पकड़ भी चुकी होगी। रसानंद बाबू के मन में भय सा पैदा हो गया।
`तुम लोग एक बार पदमपुर आओ बेटी! दो दिन रहकर जाओ। अच्छा लगेगा। तेरी काकी भी बहुत खुश होगी।' रसानंद बाबू के मन में अंदेशा हुआ, यह उनकी मन की बात नहीं है। समारू की चर्चा को टालने की मनसा से उन्होंने यह निमंत्रण दिया है। अपनी चालबाज़ी के लिए लड़की के आगे आत्म-समर्पण करने से पहले मानों वे उसके हाथों घूस थमा रहे थे।


शरीर में थकान थी, पेट में भूख। खाना भी खूब स्वादिष्ट था। गरम भात, आलू, केले का भर्ता (चोखा) अचार, झोल (शोरबा) और हरी मिर्च। देगची से भात निकालते हुए उन्हें डर लग रहा था, बच्चे के लिए कुछ बचेगा तो, या लोभवश सारा भात अकेले उंड़ेल लेंगे।
भोजन के बाद रसानंद बाबू फिर कुछ देर के लिए सो गए। जब तक उनकी नींद खुली, जंवाई वापस खेत पर जा चुका था। मेहमान की खातिरदारी के लिए उसके पास समय कहां है? मुंह-हाथ धोने के बाद रसानन्द बाबू भी निकल पड़े। निकलने से पहले लड़की को एक बार फिर परिवार सहित पदमपुर आने का निमंत्रण दिया। आने का दिन भी तय कर गये। निमंत्रण कोई बनावटी नहीं है, यह सिद्ध करने के लिए इससे ज्यादा और कह भी क्या सकते थे!


इस घटना के दो महीने बाद सचमुच अपना परिवार लिए लड़की पदमपुर पहुंची। घर में पहुंचते ही एक थैला लड़की ने काकी के हाथ थमा दिया। उसमें आठ-दस कच्चे केले, दो पाव मूढ़ी-धान (लाई), एक किलो के माफिक परवल और अलग से कुछ पुड़ियाआें में सुखुआ (सूखी) मादल (मछली)। अपने पति की ओर इशारा करते हुए उसने कहाज्ञ् `समझे, काका! तुम्हारे जंवाई के साथ मेरा खूब झगड़ा हुआ, कह रहे थे, ये सब क्या ले रही हो। शहर में क्या कोई ऐसी चीजें खाता है?' मैंने कहाज्ञ् `काका-काकी मेरे गांव के लोग हैं। शहर में रह रहे हैं तो क्या, गांव का खाना भूल जाएंगे। उनके घर में क्या पेड़े-रसगुल्ले की कमी है, जो हम यहां से लेकर जाएं।'
पहली मुलाकात में ही रसानंद बाबू की पत्नी ने लड़की और उसके परिवार को एकदम अपना लिया। बोलने लगीज्ञ् `तुम ठहरी बेटी, मां के घर जब बेटी आती है, तो क्या कभी कुछ लेकर आती है?' रसानंद बाबू ने कहाज्ञ् `परवल उनको बहुत पसंद है।' केले की उन्नत आकृति देखकर पत्नी ने आश्र्चर्य जताया। लड़की और उसके पति आश्वस्त हुए। साथ में `कुछ' नहीं लाने की ग्लानि उन्हें खा नहीं गयी। दो दिन में ही वे लोग रसानंद बाबू के परिवार के साथ घुल-मिल गये। पत्नी ने जिस आत्मीयता से उन लोगों के साथ बातचीत की, रसानंद बाबू आश्र्चर्यचकित रह गए। महिलाएं सचमुच बहुत ही बुद्धिमती होती हैं। परिस्थिति के साथ ताल मिलाकर चलने में वे हमेशा पुरुष से ज्यादा पारंगत मालूम पड़ती हैं। लगता है जैसे वर्षों से वह उन लोगों को जानती हो।


इस बीच दो बार लड़की ने घर में झाड़ू लगा दी। एक स्टूल पर चढ़कर लंबी झाड़ू से ऊपर का जाला भी साफ कर दिया। आंगन में मिट्टी का एक चूल्हा बनाने का उसने प्रस्ताव रखा यह कहकर कि कभी कभार काकी उस पर मूढ़ी (लाई) भूजेंगी। उसके लिए केवल उसे एक फावड़ा चाहिए। दूसरी ओर जवांई को भी फावड़ा चाहिए। बाहर एक गड्ढा खोद देगा, बची-खुची साग-सब्जी उसमें डालते जाओ, अच्छी खाद बन जाती है। अपनी बगिया में कुछ लगा लो, तो सरकारी खाद की जरूरत नहीं होती है। अपनी बगिया की सब्जी में जो मिठास है, बाज़ार की सब्जी में कहां?


पत्नी बीच-बीच में उन्हें रोक रही थी। `मां के घर पर कभी बेटी-जवांई काम करते हैं?' उसकी बातों को लड़की अनसुना कर देती थी। `यह भला कोई काम है? मां की मदद बेटी नहीं करेगी तो और कौन करेगा?' एक-दो बार रसानंद बाबू ने भी उन्हें रोका। पर, उनके रोकने में दम नहीं था। `मेरी अपनी बेटियां भी तो गरमी-दशहरे में जब आती हैं, अपनी बूढ़ी मां की मदद करती हैं।' पर, उन्हें अहसास हुआ कि ये तर्क वे लड़की को अपनी बेटी मानकर नहीं दे रहे थे, पत्नी का काम यथासंभव कम करने के स्वार्थ से दे रहे थे। अपने ओछेपन को वे पहचान पाये। फिर भी लड़की और उसके पति को काम करने से जोर देकर रोका नहीं, चुप रहे।


रात को लड़की और उसके पति में काफी देर तक फुसर-फुसर चली। रसानंद बाबू की पतली नींद। पास के कमरे में वे लेटे हुए थे। न चाहते हुए भी उन दोनों की बातें उनके कानों तक आ रही थीं। यहां मेहमान होकर आने के अलावा पदमपुर में उन लोगों का एक और बड़ा काम है। बाज़ार से कपड़े खरीदना। बात चल रही थी किसके लिए कपड़े खरीदे जाएं। बेटे के लिए पैंट-शर्ट या फिर `लड़की' के लिए साड़ी या पति के लिए धोती। लड़की का तर्क थाज्ञ् `मैं तो घर पर रहती हूं। तुमको कई बार आना होता है पदमपुर बाजार। सब्जी बेचने या फिर कुछ न हुआ तो साहू की बैलगाड़ी के साथ। हाट में काका के साथ इस फटी हुई धोती में भेंट हो जाए तो मेरी और क्या इज्जत रह जाएगी। घूम-घामकर बात भाभी के कानों में पड़ेगी।' सुनते ही उसका पति बिगड़ गयाज्ञ् `फालतू की बात मत कर, किसी की नज़र मुझ पर नहीं पड़ेगी। तू फटा पहनेगी तो लोग तुझ पर नहीं मुझ पर हंसेंगे।' लड़की ने कहाज्ञ् `मैं कह नहीं रही थी, गागर को गणेशिया के घर गिरवी रख देते हैं। पदमपुर जब जा ही रहे हैं, सबके लिए थोड़ा-बहुत कपड़ा ले आयेंगे। तुमने तो मना कर दिया। प्रधान के घर बर्तन मांजकर मैं दो महीने में गागार निकाल लाती।' जवांई ने कहाज्ञ् `छोड़ो भी, बेटे के इक्कीसवें पर उसके मामू ने जो पीतल की थाली दी थी, वह क्या निकल पायी! इसलिए मैं कहता हूं चीज़ें गिरवी रखने का कोई मतलब नहीं है। बेच दो तो कम से कम ठीक-ठाक दाम तो मिल जाएंगे।' लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। अंतत: तय हुआ बेटे के कपड़े अगली बार खरीदेंगे। लड़की के लिए आठ हाती (आठ हाथ का) एक थान कपड़ा लेंगे और जवऎंई के लिए एक गंड (मोटे कपड़े) चार हाती (चार हाथ का) गमछा बारिश के दिनों में जरूरत पड़ने पर पहना भी जा सकेगा। कपड़े खरीदने की बात तय होने के बाद लड़की ने प्रस्ताव रखा काका के साथ दुकान पर जाएंगे, तनिक सस्ता मिल जाएगा। जवांई को यह बात पसंद नहीं आयी। `बड़ी दुकान में जाने के लिए पैसे होने चाहिए। काका के आगे मोल-भाव करना भी अच्छा नहीं लगेगा।' आखिर में तय हुआ, काका के घर से निकल जाने पर वे लोग बाज़ार जाएंगे। खरीदारी के बाद वहां से सीधे घर चल देंगे। रिश्तेदारों के आगे खरीदारी करके आदमी को अपमानित नहीं होना चाहिए।


रसानंद बाबू सारी बातें सुनते रहे। पति-पत्नी की बातों में कोई अस्वाभाविकता दिखाई नहीं पड़ी। परिवार की पूरी आस रहती है, थोड़ी-सी खेती के ऊपर। कभी धान को बंगी कीड़े खा गये, तो कभी सूखे की चपेट में सारी खेती लुट गयी। छोटे किसान हैं ये लोग अनायास बेचारे मजदूरी के स्तर पर उतर आते हैं। पेट काटकर साग-सब्जी को बाज़ार में बेचेंगे। अपनी खेती का काम जल्द खत्म करते ही दूसरे के खेतों पर काम करेंगे। उसके बाद ही साल भर के लिए कपड़ा-लत्ता खरीदेंगे, शादी-ब्याह में शामिल होंगे। दशहरा और रथयात्रा के लिए चंदा देंगे। क्या धूप, क्या बरसात! चींटी की तरह एक-एक दाना जोड़ रहे होंगे। उसके बावजूद गिरवी रखा बरतन निकलता नहीं, डूब जाता है। छत की टूटी हुई खपरैल के बदले घास-फूस लगाते हैं। कभी किसी के बीमार पड़ जाने पर ज़मीन भी चली जाती है। सब कुछ सरल, स्वाभाविक छंदहीन है इनका संसार। जन्म, मृत्यु, बाढ़ और सूखे की तरह।


रसानंद बाबू को याद आया, दशहरे में देने के लिए दोनों बेटियों के लिए साड़ी खरीदकर रखी थी। छोटी बेटी के दादा ससुर चल बसे, बेटी आयी नहीं। श्राद्ध के बाद आएगी। उसकी साड़ी रखी हुई है। दुकान में लौटाई नहीं। उस साड़ी को इस लड़की को दे दें तो? पत्नी के आगे प्रस्ताव रखने का साहस नहीं हुआ, मना कर देगी तो? रहने दो, रसानंद बाबू ने करवट बदली। आजकल नींद नहीं आती आसानी से। कभी-कभी तो सारी रात कट जाती है। सब उम्र का ही दोष है। पत्नी के आगे प्रस्ताव न रखने के पीछे केवल पत्नी का डर ही क्या एकमात्र कारण है? या साथ में अपनी कंजूसी भी। छोड़ो भी, ये लोग खेत में काम करते हैं, मोटी साड़ी पहनते हैं। महंगी-पतली साड़ी से इनका काम नहीं बनेगा। रसानंद बाबू को याद आया। मजदूरों को नाश्ता बांटते हुए, मां ठीक इसी तरह के तर्क दिया करती थीज्ञ् महीन चावल के भात इनको हजम नहीं होते हैं, ये ठहरे मजदूर लोग, मोटे चावल का भात इन्हें अच्छा लगता है।
सुबह नाश्ते में पत्नी ने पूड़ियां बनाई थीं। साथ में रस्सेदार परवल की सब्जी। केवल खास मेहमानों के लिए पत्नी इस तरह का नाश्ता बनाती है। पत्नी के सम्मान-बोध से रसानंद बाबू बहुत प्रसन्न हुए।


आखिर लड़की और उसके परिवार के जाने का समय हुआ। पत्नी ने कब से थैले में वह साड़ी डाल रखी है। रसानंद बाबू को शायद इस बात का पता भी न लगता, यदि लड़की थैले को देखते ही चिल्ला न उठती। मानों कुछ अप्रत्याशित सा घट गया। `न, न, ये क्या कर रही हो काकी। मैं बिलकुल नहीं लूंगी। मेरे पास तो कई साड़ियां हैं। मैं क्या करूंगी साड़ी का?' लड़की ने कहा।
`क्या बात कर रही हो तुम, तुम्हारे पास क्यों साड़ी की कमी होने लगी! पर, मां के घर से क्या बेटी कभी खाली हाथ लौटती है? लोग क्या कहेंगे मुझे?' पत्नी ने कहा। रसानन्द बाबू को लगा, पत्नी ने भी सुनी है इन लोगों की बातें। डर से रसानंद बाबू के आगे साड़ी देने का प्रस्ताव रख न सकी। उनसे छिपाकर साड़ी दे देने को तय किया था। बाद में रसानंद बाबू नाराज होते तो चुपचाप सह जाती।
काकी का तर्क सुनकर लड़की एक बार चुप रही। शायद सोच रही थी प्रतितर्क क्या रखेगी। फिर बोलीज्ञ् `ठीक है काकी, तूने दिया है मैं क्या इंकार करूंगी। यह साड़ी मैं रख रही हूं। अब मैं दे रही हूं अपनी बहनों को, रख लो, रखने से तू मना नहीं कर सकती क्योंकि मैं तुम्हें नहीं दे रही हूंं। दशहरे में जब मेरी बहनें आएंगी तो किसी एक को मेरी तरफ से दे देना।' लड़की ने साड़ी को काकी के हाथ में जबरदस्ती थमा दिया। अपने थैले के मुंह को इस तरह पकड़े रखा जैसे साड़ी उसके अन्दर जबरदस्ती घुस न जाए।


इसके बाद वे लोग घर से निकल गये। रसानंद बाबू ने उन लोगों के साथ-साथ कुछ देर तक जाना चाहा। पर वे पीछे रह गये। जवांई ने बेटे को कंधों पर बिठा रखा था। वह कह रहा था, `मैं तो बीच में डर सा गया, तू लोभ संभाल नहीं पाएगी। साड़ी रख लेगी।' लड़की बोलीज्ञ् `क्या बात करते हो तुम? मैं क्या इतनी बेवकूफ हूं? साड़ी ले आती तो मेरी क्या इज्जत रह जाती? वे समझते भूखे लोग हैं। साड़ी वसूलने के लिए रिश्ते बनाते हैं। मुझे कोई दरकार नहीं इस पाट साड़ी की। मेरी फटी साड़ी ही मेरे लिए अच्छी है।


रसानंद बाबू तमाम प्रयासों के बावजूद उनसे ताल नहीं मिला सके, पीछे रह गये। क्रमश: रसानंद बाबू और उन लोगों में फासला बढ़ता गया। वे लोग जल्दी-जल्दी पांव बढ़ा रहे थे, आसन्न विपत्ति से मुक्ति पाने की खुशी में। मूल्यवान कुछ न गंवाने के आनन्द में। खरीदारी खत्म करने के बाद शाम होने से पहले उन्हें घर पहुंचना होगा।


8 टिप्‍पणियां:

  1. दिल को छूने वाली प्यारी कहानी। कहानी किसी की भी हो अपनी सी लगती है।

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  2. बहुत ही अच्छी लगी ये कहानी..
    एक सांस में ही पढ डाली..

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  3. पैसे के युग में मानवीय सम्बन्धों को अण्डरलाइन करती कथा। पूरी कथा में अपनत्व की गन्ध बिखरी है। बहुत सुन्दर लगी और बहुत याद रहेगी।

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  4. लंबे समय तक याद रहेगी यह कहानी।

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  5. sahaj bahaav vaali....bahut acchhi lagi..shukriyaa..seedhi sapaat baten mun me jaldi ghar kar leti hain..

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  6. अत्यन्त ह्रदयस्पर्शी कहानी,समय का पता ही नहीं चला इसे पढते पढ्ते.मानवीय रिश्तों का गहराई से परिचय कराती है ये कहानी .

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  7. सच मे दिल के तारो को हिला दिया इस कहानी ने, बहुत सुन्दर, धन्यवाद, बुरा ना मनाना, अगर हो सके तो लम्बी कहानी को २,३ हिस्सो मे दे दो, फ़िर ज्यादा लोग पढ पाये गे, ओर इन्त्जार मे मजा भी दुगना हो जाता हे, कई तो लम्बी कहानी देख कर भाग जाते हे

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  8. बेनामी7:46 am

    bahut achhi, dilko chu gai

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