रविवार, अप्रैल 20, 2008

साप्ताहिक डिपार्टमेण्ट सेमिनार की बखिया के उधडे धागे !!!

नोट: ज्ञानदत्तजी के सुझाव पर पोस्ट का टाईटल बदल दिया गया है :-)

पिछले लगभग ६ वर्षों से मैं हर सप्ताह रासायनिक अभियांत्रिकी से सम्बन्धित (जैव-रासायनिकी, नैनो टेक्नालाजी आदि) कम से कम एक सेमिनार में उपस्थिति दर्ज कराता रहा हूँ । इस लिहाज से देखा जाये तो १५०-२०० सेमिनार सुन चुका हूँ (छुट्टियाँ हटाकर) । इन सब सेमिनारों में से कम से कम ३५-५०% सेमिनार मैने ध्यान से सुने होंगे । उनमें से भी १०-१५ % सेमिनारों के अन्त में मैने कोई प्रश्न पूछा होगा ।

कल ज्ञानदत्तजी ने पूर्वाग्रह और जडता की बात की थी
, इन सेमिनारों में भी यही पूर्वाग्रह और जडता दिखती है । अगर सेमिनार बायो से सम्बन्धित है तो फ़्लूड-मेकेनिक्स वाले ध्यान नहीं देंगे । सेमिनार के बाद बोलेंगे कि बायो का पाखण्ड आजकल बहुत बढ गया है । बायो वाले बोलेंगे पूरी एक स्लाईड पर कठिन सी दिखने वाली Equations दिखाकर क्या समझाना चाहते हो ? फ़ंडिग के लिये नैनो के पाखण्ड की चर्चा तो हर कहीं है । आमतौर पर केवल सेमिनार का टाईटल सुनकर ही बहुत से फ़ैसला कर लेते है कि उसको ध्यान से सुनना भी है या नहीं । फ़िर अगर ध्यान से सुनो भी तो कुछ १०% सेमिनार ही होंगे जिनके बाद १-२ से अधिक प्रश्न पूछे गये हों ।

एक व्यक्ति जो उस क्षेत्र में शोध नहीं कर रहा होता है, द्वारा पूछा गया प्रश्न सबसे दिलचस्प होता है । जिस प्रश्न के अंत में स्पीकर यह कहे कि "ये बहुत उत्तम प्रश्न है", पक्का जानिये कि उस प्रश्न का सीधा जवाब स्पीकर कभी (>९० % मौकों पर ) नहीं देगा । घुमा फ़िराकर कुछ बात कही जायेगी और पूछने वाला भी शान्त हो जायेगा ।

इसके अलावा एक श्रोता के हिसाब से मुझे सेमिनार में प्रश्न पूछना बडा कठिन होता है । कभी कभी ध्यान से सुनने के बाद भी जेहन में कोई सवाल नहीं आते हैं । कभी कभी आपका प्रश्न कोई दूसरा पूछ देता है । कभी कभी कोई भी प्रश्न नहीं होता है और बेचारा स्पीकर और प्रोफ़ेसर शर्मसार होने लगते हैं । फ़िर ऐसे में कोई १-२ प्रोफ़ेसर सवाल पूछ्ने का उपक्रम करते हैं । कुछ सवाल इतने लंबे होते हैं और पूछ्ने वाला इतनी धीमी आवाज में पूछता है कि प्रश्न और उसके उत्तर में कोई साम्य नहीं दिखता । "फ़िलासाफ़िकली स्पीकिंग", से शुरू होने वाले प्रश्नों के उत्तर अधिकतर लम्बे खिंचते हैं और उनका पूछे गये प्रश्न से ताल्लुख कुछ कम ही होता है ।


लेकिन बीच बीच में कुछ इतने अच्छे सेमिनार सुनने को मिलते हैं कि मन वाह वाह कर उठता है । एक अच्छे सेमिनार के लिये उस विषय पर अच्छे अधिकार के साथ ही अच्छे प्रेजेन्टेशन स्किल्स की भी आवश्यकता होती है । इस बारे में विस्तार में फ़िर कभी...

पीएचडी कामिक्स डाट काम वालों ने इस मौके पर एक मस्त स्ट्रिप निकाली थी, उसी को यहाँ पर साभार पेश कर रहा हूँ












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3 टिप्‍पणियां:

  1. लेख का वैकल्पिक हेडिंग - "सेमीनार की बखिया के उधड़े धागे" ज्यादा क्लिक-इफेक्टिव होता! कि नही‍!!!

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  2. सम्मेलनों में अलग अलग तरह के अनुभव होते हैं। बोलने की कला भी सबके पास नहीं होती है। मैं ठीक से तो नहीं कह सकता पर शायद - आपको जितने सम्मेलन में रहने का मौका मिला, मुझे उससे अधिक सम्मेलनों में बोलने का मौका मिला।

    कुछ दिन पहले बिटिया रानी ने आप जैसे अनुभव का जिक्र किया था। मैंने बोलने वाले लोगों के अनुभवों को, उसके एवं आप सबके साथ जब एक घन्टा, एक मिनट लगता है में साझा किया था। यह बोलने वाले की तरफ से हैं :-)

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  3. बहुत अच्छी तरह से अपने विचार लिखे। लेकिन ई भैया अभी तक वर्ड वेरीफ़िकेशन लगाये हुये हो।

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