रविवार, अप्रैल 06, 2008

सीता स्वयंवर श्री अनूप जलोटा के स्वर में !!!

इस कडी में अनूप जलोटा जी के स्वर में सीता स्वयंवर को सुनिये । ये प्रसंग मुझे बेहद पसंद है । इसमें तुलसीदासजी ने राजा जनक की मनोस्थिति का सजीव चित्रण किया है ।




हिन्दी विकीपीडिया से श्रीरामचरितमानस के ये अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

जानि कठिन सिवचाप बिसूरति, चली राखि उर स्यामल मूरति ||
प्रभु जब जात जानकी जानी, सुख सनेह सोभा गुन खानी ||
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही, चारु चित भीतीं लिख लीन्ही ||
गई भवानी भवन बहोरी, बंदि चरन बोली कर जोरी ||
जय जय गिरिबरराज किसोरी, जय महेस मुख चंद चकोरी ||
जय गज बदन षड़ानन माता, जगत जननि दामिनि दुति गाता ||
नहिं तव आदि मध्य अवसाना, अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ||
भव भव बिभव पराभव कारिनि, बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ||

दोहा -
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख,
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष ||
२३५ ||
सेवत तोहि सुलभ फल चारी, बरदायनी पुरारि पिआरी ||
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे, सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ||
मोर मनोरथु जानहु नीकें, बसहु सदा उर पुर सबही कें ||
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं, अस कहि चरन गहे बैदेहीं ||
बिनय प्रेम बस भई भवानी, खसी माल मूरति मुसुकानी ||
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ, बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ||
सुनु सिय सत्य असीस हमारी, पूजिहि मन कामना तुम्हारी ||
नारद बचन सदा सुचि साचा, सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा ||

छं:-
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो,
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ||
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली,
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ||

सो:-
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि,
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ||
२३६ ||
हृदयँ सराहत सीय लोनाई, गुर समीप गवने दोउ भाई ||
राम कहा सबु कौसिक पाहीं, सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं ||
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही, पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही ||
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे, रामु लखनु सुनि भए सुखारे ||
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी, लगे कहन कछु कथा पुरानी ||
बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई, संध्या करन चले दोउ भाई ||
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा, सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा ||
बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं, सीय बदन सम हिमकर नाहीं ||

दोहा -
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक,
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक ||
२३७ ||
घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई, ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई ||
कोक सिकप्रद पंकज द्रोही, अवगुन बहुत चंद्रमा तोही ||
बैदेही मुख पटतर दीन्हे, होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे ||
सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी, गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी ||
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा, आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा ||
बिगत निसा रघुनायक जागे, बंधु बिलोकि कहन अस लागे ||
उदउ अरुन अवलोकहु ताता, पंकज कोक लोक सुखदाता ||
बोले लखनु जोरि जुग पानी, प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी ||

दोहा -
अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन,
जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन ||
२३८ ||
नृप सब नखत करहिं उजिआरी, टारि न सकहिं चाप तम भारी ||
कमल कोक मधुकर खग नाना, हरषे सकल निसा अवसाना ||
ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे, होइहहिं टूटें धनुष सुखारे ||
उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा, दुरे नखत जग तेजु प्रकासा ||
रबि निज उदय ब्याज रघुराया, प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया ||
तव भुज बल महिमा उदघाटी, प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी ||
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने, होइ सुचि सहज पुनीत नहाने ||
नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए, चरन सरोज सुभग सिर नाए ||
सतानंदु तब जनक बोलाए, कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए ||
जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई, हरषे बोलि लिए दोउ भाई ||

दोहा -
सतानंद&#६५५३३;पद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ,
चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ ||
२३९ ||
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई, ईसु काहि धौं देइ बड़ाई ||
लखन कहा जस भाजनु सोई, नाथ कृपा तव जापर होई ||
हरषे मुनि सब सुनि बर बानी, दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी ||
पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला, देखन चले धनुषमख साला ||
रंगभूमि आए दोउ भाई, असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई ||
चले सकल गृह काज बिसारी, बाल जुबान जरठ नर नारी ||
देखी जनक भीर भै भारी, सुचि सेवक सब लिए हँकारी ||
तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू, आसन उचित देहू सब काहू ||

दोहा -
कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि,
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि ||
२४० ||
राजकुअँर तेहि अवसर आए, मनहुँ मनोहरता तन छाए ||
गुन सागर नागर बर बीरा, सुंदर स्यामल गौर सरीरा ||
राज समाज बिराजत रूरे, उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे ||
जिन्ह कें रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी ||
देखहिं रूप महा रनधीरा, मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा ||
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी, मनहुँ भयानक मूरति भारी ||
रहे असुर छल छोनिप बेषा, तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा ||
पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई, नरभूषन लोचन सुखदाई ||

दोहा -
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप,
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप ||
२४१ ||
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा, बहु मुख कर पग लोचन सीसा ||
जनक जाति अवलोकहिं कैसैं, सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें ||
सहित बिदेह बिलोकहिं रानी, सिसु सम प्रीति न जाति बखानी ||
जोगिन्ह परम तत्वमय भासा, सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा ||
हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता, इष्टदेव इव सब सुख दाता ||
रामहि चितव भायँ जेहि सीया, सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया ||
उर अनुभवति न कहि सक सोऊ, कवन प्रकार कहै कबि कोऊ ||
एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ, तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ ||

दोहा -
राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर,
सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर ||
२४२ ||
सहज मनोहर मूरति दोऊ, कोटि काम उपमा लघु सोऊ ||
सरद चंद निंदक मुख नीके, नीरज नयन भावते जी के ||
चितवत चारु मार मनु हरनी, भावति हृदय जाति नहीं बरनी ||
कल कपोल श्रुति कुंडल लोला, चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला ||
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा, भृकुटी बिकट मनोहर नासा ||
भाल बिसाल तिलक झलकाहीं, कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं ||
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई, कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं ||
रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ, जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ ||

दोहा -
कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल,
बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल ||
२४३ ||
कटि तूनीर पीत पट बाँधे, कर सर धनुष बाम बर काँधे ||
पीत जग्य उपबीत सुहाए, नख सिख मंजु महाछबि छाए ||
देखि लोग सब भए सुखारे, एकटक लोचन चलत न तारे ||
हरषे जनकु देखि दोउ भाई, मुनि पद कमल गहे तब जाई ||
करि बिनती निज कथा सुनाई, रंग अवनि सब मुनिहि देखाई ||
जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ, तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ ||
निज निज रुख रामहि सबु देखा, कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा ||
भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ, राजाँ मुदित महासुख लहेऊ ||

दोहा -
सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल,
मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल ||
२४४ ||
प्रभुहि देखि सब नृप हिँयँ हारे, जनु राकेस उदय भएँ तारे ||
असि प्रतीति सब के मन माहीं, राम चाप तोरब सक नाहीं ||
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला, मेलिहि सीय राम उर माला ||
अस बिचारि गवनहु घर भाई, जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई ||
बिहसे अपर भूप सुनि बानी, जे अबिबेक अंध अभिमानी ||
तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा, बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा ||
एक बार कालउ किन होऊ, सिय हित समर जितब हम सोऊ ||
यह सुनि अवर महिप मुसकाने, धरमसील हरिभगत सयाने ||

सो:-
सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के ||
जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे ||
२४५ ||
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई, मन मोदकन्हि कि भूख बुताई ||
सिख हमारि सुनि परम पुनीता, जगदंबा जानहु जियँ सीता ||
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी, भरि लोचन छबि लेहु निहारी ||
सुंदर सुखद सकल गुन रासी, ए दोउ बंधु संभु उर बासी ||
सुधा समुद्र समीप बिहाई, मृगजलु निरखि मरहु कत धाई ||
करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा, हम तौ आजु जनम फलु पावा ||
अस कहि भले भूप अनुरागे, रूप अनूप बिलोकन लागे ||
देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना, बरषहिं सुमन करहिं कल गाना ||

दोहा -
जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई,
चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं ||
२४६ ||
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी, जगदंबिका रूप गुन खानी ||
उपमा सकल मोहि लघु लागीं, प्राकृत नारि अंग अनुरागीं ||
सिय बरनिअ तेइ उपमा देई, कुकबि कहाइ अजसु को लेई ||
जौ पटतरिअ तीय सम सीया, जग असि जुबति कहाँ कमनीया ||
गिरा मुखर तन अरध भवानी, रति अति दुखित अतनु पति जानी ||
बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही, कहिअ रमासम किमि बैदेही ||
जौ छबि सुधा पयोनिधि होई, परम रूपमय कच्छप सोई ||
सोभा रजु मंदरु सिंगारू, मथै पानि पंकज निज मारू ||

दोहा -
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल,
तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल ||
२४७ ||
चलिं संग लै सखीं सयानी, गावत गीत मनोहर बानी ||
सोह नवल तनु सुंदर सारी, जगत जननि अतुलित छबि भारी ||
भूषन सकल सुदेस सुहाए, अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए ||
रंगभूमि जब सिय पगु धारी, देखि रूप मोहे नर नारी ||
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई, बरषि प्रसून अपछरा गाई ||
पानि सरोज सोह जयमाला, अवचट चितए सकल भुआला ||
सीय चकित चित रामहि चाहा, भए मोहबस सब नरनाहा ||
मुनि समीप देखे दोउ भाई, लगे ललकि लोचन निधि पाई ||

दोहा -
गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि ||
लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि ||
२४८ ||
राम रूपु अरु सिय छबि देखें, नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें ||
सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं, बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं ||
हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई, मति हमारि असि देहि सुहाई ||
बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु, सीय राम कर करै बिबाहू ||
जग भल कहहि भाव सब काहू, हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू ||
एहिं लालसाँ मगन सब लोगू, बरु साँवरो जानकी जोगू ||
तब बंदीजन जनक बौलाए, बिरिदावली कहत चलि आए ||
कह नृप जाइ कहहु पन मोरा, चले भाट हियँ हरषु न थोरा ||

दोहा -
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल,
पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल ||
२४९ ||
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू, गरुअ कठोर बिदित सब काहू ||
रावनु बानु महाभट भारे, देखि सरासन गवँहिं सिधारे ||
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा, राज समाज आजु जोइ तोरा ||
त्रिभुवन जय समेत बैदेही ||
बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही ||
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे, भटमानी अतिसय मन माखे ||
परिकर बाँधि उठे अकुलाई, चले इष्टदेवन्ह सिर नाई ||
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं, उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं ||
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं, चाप समीप महीप न जाहीं ||

दोहा -
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ,
मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ ||
२५० ||
भूप सहस दस एकहि बारा, लगे उठावन टरइ न टारा ||
डगइ न संभु सरासन कैसें, कामी बचन सती मनु जैसें ||
सब नृप भए जोगु उपहासी, जैसें बिनु बिराग संन्यासी ||
कीरति बिजय बीरता भारी, चले चाप कर बरबस हारी ||
श्रीहत भए हारि हियँ राजा, बैठे निज निज जाइ समाजा ||
नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने, बोले बचन रोष जनु साने ||
दीप दीप के भूपति नाना, आए सुनि हम जो पनु ठाना ||
देव दनुज धरि मनुज सरीरा, बिपुल बीर आए रनधीरा ||

दोहा -
कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय,
पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय ||
२५१ ||
कहहु काहि यहु लाभु न भावा, काहुँ न संकर चाप चढ़ावा ||
रहउ चढ़ाउब तोरब भाई, तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई ||
अब जनि कोउ माखै भट मानी, बीर बिहीन मही मैं जानी ||
तजहु आस निज निज गृह जाहू, लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू ||
सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ, कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ ||
जो जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई, तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई ||
जनक बचन सुनि सब नर नारी, देखि जानकिहि भए दुखारी ||
माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें, रदपट फरकत नयन रिसौंहें ||

दोहा -
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान,
नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान ||
२५२ ||
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई, तेहिं समाज अस कहइ न कोई ||
कही जनक जसि अनुचित बानी, बिद्यमान रघुकुल मनि जानी ||
सुनहु भानुकुल पंकज भानू, कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू ||
जौ तुम्हारि अनुसासन पावौं, कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं ||
काचे घट जिमि डारौं फोरी, सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी ||
तव प्रताप महिमा भगवाना, को बापुरो पिनाक पुराना ||
नाथ जानि अस आयसु होऊ, कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ ||
कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं, जोजन सत प्रमान लै धावौं ||

5 टिप्‍पणियां:

  1. जय हो रघुवर की और धन्यवाद आपको.
    अनूप जी भी मस्त होकर गाते हैं. इस पोस्ट को हमने अपनी फेवरेट लिस्ट में शामिल कर लिया है.

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  2. जय जय गिरिबरराज किसोरी...
    जय गज बदन षड़ानन माता ...
    वाह, सवेरे सवेरे स्मरण। आनन्द आ गया। और निमित्त बनी आपकी यह सुन्दर पोस्ट!

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  3. जय रघुवर की,
    सु्न्दर प्रसंग! धन्यवाद।

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  4. वाह, बहुत आभार इसे पेश करने का. सहेज लिया है..बार बार के लिये. :)

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