आज सुबह एक ६ किमी की क्रास कंट्री दौड़ में भाग लिया गया | इस दौड़ की ख़ास बात थी कि बजाय सड़क पर दौड़ने के, दौड़ घास और मिट्टी और कीचड (हमारे यहाँ पिछले २ दिनों में खूब बरसात हुयी) से भरी पगडंडियों पर दौड़ी गयी | दौड़ में २ किमी के एक लूप को तीन बार दौड़ना था और हर लूप में २ विकट चढ़ाई थी, मतलब पूरे ६ किमी में ६ चढ़ाइयाँ|
इस ६ किमी की दौड़ को हमने २५ मिनट और १० सेकेंड्स में पूरा किया| हमारे मित्र साइमन ने हमें चुनौती दी थी जिसे स्वीकारते हुए हमने उन्हें इस दौड़ में १५ सेकेंड्स से परास्त किया, उनका समाया २५ मिनट २५ सेकेंड्स रहा | अब साइमन से जब बुधवार को मिलेंगे तो उनकी खूब टांग खींची जायेगी और शायद वो अभी से अगली दौड़ में हमारी वाट लगाने की तैयारी शुरू कर चुके होंगे, ;-)
(With my team members before the race)
(At starting line)
(Looking up ahead for that upcoming hill)
(A nice flat stretch in the race)
(The mean hill and jumping across the nasty mud pit)
(The whole race was run on muddy trail)
(The final sprint. Poor Simon couldn't close the gap and I kept increasing the lead and beat him by 15 seconds in the end)
१७ जनवरी २०१० को ह्यूस्टन में एक मैराथन दौड़ का आयोजन हुआ| हम इस दौड़ की पिछले ६ महीनो से तैयारी कर रहे थे | २००९ में इस दौड़ को हमने ३ घंटा और ३८ मिनट में पूरा किया था और इस साल हमारी नजर ३ घंटा और २० मिनट के समय पर थी |
शुक्रवार और शनिवार को हमने जम कर आराम किया और छक कर खाया, शनिवार की रात को दस बजे सोने चले गए लेकिन उत्साह के मारे सुबह २ बजे तक नींद नहीं आयी | हमने अपने आपको समाप्ति पंक्ति पर फर्राटे मारते हुए दौड़ समाप्त करते देखने के सपने देखे और सुबह ४:५० के अलार्म ने हमारी नींद खोल दी | हमारे दोस्त/रूममेट अंकुर अपने जीवन की पहली हाफ मैराथन दौड़ने की तैयारी में थे | घर से स्नान आदि करने के बाद हमने बाहर निकलकर मौसम का जायजा लिया और कसम से इससे अच्छा मौसम मैराथन के लिए नहीं हो सकता था | ८-१० डिग्री तापमान और हल्की हल्की हवा...
खैर, अंकुर को रास्ता नहीं पता था तो वो अपनी कार में हमारी कार का पीछा कर रहे थे| हाइवे पर तो हम दोनों लगभग १०० किमी/घंटा पर गाडी चला रहे थे लेकिन जब गंतव्य नजदीक आया तो हमने अपने कार की गति धीमी की और बाकी लोगों की तरह धीमे होकर रुक कर सिग्नल के हरे होने का इन्तजार करने लगे | अचानक हमें जोर का धक्का लगा और हमारी कार का सारा सामन हवा में उछल गया, हमारी छाती स्टेयरिंग व्हील से टकराई और घुटने व्हील के नीचे जोर से भिड गए | २ सेकेंड्स के बाद होश वजा हुए तो पता चला कि अंकुर ने सोचा की गाडी रोकना स्वैच्छिक है और उन्होंने अपनी गति पर विराम नहीं लगाया और हमारी गाडी पर मेहरबानी कर दी| उनके धक्के से हमारी गाडी आगे खडी गाडी से टकराई और आगे वाली कार को भी थोड़ी खरोंच आ गयी | अंकुर की गाडी का अगला हिस्सा और हमारी का पिछला पूरी तरह ध्वस्त हो गया | लेकिन ईश्वर का शुक्र कि किसी को कोई भी चोट नहीं आयी, सिवाय हमारे घुटने में थोड़े दर्द के |
अंकुर की कार का अगला हिस्सा ये रहा:
पुलिस को बुलाकर खबर दी गयी, चूँकि हम तीनो के पास गाडी का बीमा था और अंकुर ने अच्छे इंसान की तरह गलती क़ुबूल कर ली थी, पुलिस आयी और बोली कि आप लोग जा सकते हैं| अब मैराथन शुरू होने में ३५ मिनट शेष थे, अंकुर की गाडी चलने लायक नहीं थी और हमारी रेंगकर चलने लायक थी | अंकुर की गाडी को जब खींचकर ले जाने वाला ट्रक आ गया तो अंकुर ने हमसे कहा कि तुम जाओ और अपनी दौड़ दौड़ो क्योंकि ६ महीने की कठिन ट्रेनिंग बेकार करने का कोई फायदा नहीं है| हम अपनी रेंगती गाडी से धीरे धीरे नियत स्थान पर गए और दौड़ से पहले ही दौड़ते हुए शुरूआती पंक्ति तक दौड़ शुरू होने के ५ मिनट पहले पंहुच पाए |
दौड़ के शुरू होने पर भी हमारा दिमाग ठिकाने पर नहीं था लेकिन हमने सोचा कि अब जो भी होगा दौड़ के बाद ही देखा जाएगा, घुटने का जायजा लिया तो यदा कदा किसी कदम के साथ थोडा सा दर्द था लेकिन कुछ ख़ास नहीं| बार बार अलग अलग ख्याल आ रहे थे और दौड़ पर ध्यान नहीं था| लेकिन शुरुआती ६ मील पलक झपकते ही कट गये | हर साल की तरह इस साल भी ह्यूस्टन निवासी धावकों का हौसला बढ़ने के लिए सड़क के दोनों ओर खड़े थे| मील ५ पर मार्क (Mark) और सेरा (Sarah) ने हमारा नाम लेकर पुकारा और उसके बाद मील ९ पर हमारे दोस्त रामदास हमारा इन्तजार कर रहे थे| अब तक हम भी अपना ध्यान मैराथन पर फोकस करने की कोशिश कर रहे थे, भले ही मानसिक तौर पर हम थका हुआ महसूस कर रहे थे, रफ़्तार के ख्याल से हम अपने गोल पर थे| आधा रास्ता = १३.१ मील = २१.१ किमी = १ घंटा ३९ मिनट ४० सेकेंड्स = मतलब अपने गोल से २० सेकेंड्स तेज
लेकिन चौदहवाँ मील पूरा होते ही हमारे बांये पैर ने एक झटका दिया, पिछले साल ऐसा ही झटका हमें १८ वें मील पर हमारे बांये पैर ने दिया था लेकिन इस बार चौदहवें पर ही | १६ वें मील तक आते आते तय हो चुका था कि ३:२० हाथ से निकल चुका है और अब दौड़ को समाप्त करना भी मुश्किल दिख रहा था | मील १ से १४ तक प्रति मील समय: ७:३० +/- १० सेकेंड्स 15 वां मील: ७:५३ १६ वां मील: ७:५२ इस समय तीन धावक जिन्हें मैंने पिछली कई दौड़ों में पीछे छोड़ा था, मुझसे आगे बढ़ जाते हैं| १७ वां मील: ७:५५ १८ वां मील: ८:०४ १९ वां मील: ८:४८ अब स्थिति बहुत कठिन हो रही है, हमारे मन में २० वें मील पर दौड़ को छोड़कर मेडिकल टेंट में जाकर रुकने का मन कर रहा है| थकावट नहीं है लेकिन पैरों की मासपेशियों में बहुत तनाव है और Cramps हैं, २० वां मील: ९:०९ (सबसे धीमा मील) अब हमने अपने आप से कहा कि ३२.२ किमी पूरे हो चुके हैं और केवल आख़िरी दस किमी बचे हैं| थिंक पाजिटिव...When going gets tough, tough gets going. इस समय हमने सड़क पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश सीनियर को धावकों का उत्साह बढ़ाते देखा, जार्ज बुश सीनियर हर साल यहाँ मौजूद रहते हैं| अब लोग नाम ले ले कर धावकों को उत्साहित कर रहे हैं, एक व्यक्ति हमें देखता है और कहता है: Man! you are not dead yet. Keep going. Keep going... अब हमने अगले २-३ मील में दौड़ छोड़ने का निश्चय कर लिया है लेकिन अगले २-३ मील दर्द के बावजूद दौड़ने का मन है... २१ वां मील: ८:४२ २२ वां मील: ७:५२ अब दर्द अपने चरम पर है और हमने इस आख़िरी मील में जी जान लगाने का निश्चय किया है, २३ वां मील: ७:०५ (दौड़ का सबसे दर्दीला और सबसे तेज मील): इस २३ वें मील में कुछ ऐसा हुआ कि जिसका मुझे एहसास नहीं था |
Almost every senior runner talks about that hidden source of energy which is there but inaccessible. They say you have to really dig deep to tap into it. I can say that I felt that hidden source during my 23rd mile. 23rd mile in Houston Marathon is the hardest mile. First, because it is 23rd mile and you are tired; second because it has 3 little hills (overpasses) which slow you down. I ran 23rd mile really well and I was taking down runners ahead of me one by one. At one point, I was running so fast that people on both sides of road simply started shouting and clapping. I will never forget that feeling. 23rd mile was the high point of my marathon and I refused to acknowledge any pain during that mile. And, now I knew that I will definitely finish this race even if I have to crawl on my knees to the finish line.
अब बाकी लोग धीमा हो रहे हैं और मैं एक एक करके धावकों से आगे निकल रहा हूँ| वो तीन धावक जिन्होंने मुझे पीछे छोड़ा था अब केवल २५ मीटर आगे हैं और हर कदम पर में उनके करीब होता जा रहा हूँ... २४ वां मील: ७:५९ २४.५ मील के आस पास मैं उन तीनो को पीछे छोड़ देता हूँ और अब दौड़ का अंत नजदीक है| २५ वां मील: ८:२० अब केवल १.२ मील बाकी है, लोगों की भीड़ चिल्ला रही है और मैं एक एक करके और भी धावकों को पीछे छोड़ रहा हूँ... २६ वां मील: ८:२० ०.२ मील: १ मिनट २५ सेकेंड्स : अब समाप्ति पंक्ति सामने है, लोग चिल्ला रहे हैं....इस समय मैं अपनी मुट्ठियाँ भींचता हूँ और सब कुछ भूलकर सिर्फ अपने लिए दौड़ता हूँ....इस ३२० मीटर में मैं ५ लोगों को पीछे छोड़ता हूँ और समाप्ति पंक्ति मेरे सामने है....
२६.२ मील: ३:२६:२३....पिछले समय (२००९) से १२ मिनट का सुधार
मैराथन वेबसाईट के हवाले से: आख़िरी ७.५ मील में मैंने ७४ धावकों को पीछे छोड़ा और २५ धावक मुझसे आगे निकले...
मैराथन की कहानी चित्रों की ज़ुबानी:
(जी हाँ, मर्द को भी दर्द होता है और बहुत होता है. Really bad cramps in both legs)
( जब तक है जान, जाने जहां मैं दौडूंगा... ;-))
(अब किसमे दम है जो हमसे आगे निकले)
लगे हाथों वीडियो भी देख लो, देखें इसमें हमें कितने लोग खोज पाते हैं....(बाईं तरफ हाफ मैराथन वाले है, हम दांयी तरफ बड़ी तेजी से आते हुए दिखेंगे :-) )
पिछले कई महीनों में लगभग १००० किमी दौड़ने के बाद इम्तिहान की घड़ी आ गयी है | कल ह्यूस्टन मैराथन है और उम्मीद है की हम अपने पिछले समय ३ घंटा ३८ मिनट को सुधार कर इस बार ३ घंटा और २० मिनट में इस दौड़ को पूरा करेंगे...
जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में बताया था कि आज हमें एक दस किमी की दौड में भाग लेना था। सुबह उठकर देखा तो कार के सभी शीशों पर बर्फ़ की मोटी परत जमी हुयी थी। जब खुरचने से नहीं उतरी और देर हो रही थी तो उस पर पानी डालने का सोचा। पानी डालने से खतरा था कि शीशा चटक सकता था लेकिन जल्दबाजी में इस खतरे को उठाया और धीरे धीरे बर्फ़ को खुरचकर शीशे को साफ़ किया। इतने में ठंड के मारे हाथ दर्द करने लगे थे...मेरी दर्द में आऊ आऊ करने की आदत है, बचपन में भी चोट लगने पर आंसू नहीं निकलते थे बस हाथों को झटकते हुये आऊ आऊ करता रहता था।
आज जब हाथों में जबरदस्त ठंड लगी तो आऊ आऊ अपने आप मुंह से निकल गया। खैर २० मील दूर जाकर देखा तो इक्का दुक्का लोग ही आये हुये थे। लेकिन आयोजकों ने कहा कि दौड जरूर होगी। थोडी देर में बाकी लोग भी आ गये।
ठीक सुबह ७:३० बजे -४ डिग्री तापमान में दौड शुरू हुयी। हमने एक टीशर्ट के ऊपर ट्रेकिंग जैकेट पहनी हुयी थी। लेकिन अपने दौडने वाली निक्कर पहनने के चलते अब घुटने आऊ आऊ कर रहे थे। प्रारम्भ पंक्ति के पास एक हीटर रखा था, जिससे दौड से पहले सब हाथ-पैर सेंक रहे थे। गोली की आवाज के साथ दौड शुरू हुयी और आधे मिनट में ही हीटर की गर्मी रफ़ूचक्कर हो गयी। आधे मील तक आते आते महसूस हुआ कि पैर के अंगूठे और उंगलियाँ एकदम पत्थर जैसे लग रहे हैं। खैर हम कदम आगे बढाते रहे।
पहला मील: ६:३० मिनट (आशा से थोडा तेज)
ये चूंकि छोटी दौड(~३०० धावक) थी इसलिये पहले मील में ही सबका स्थान तय सा हो गया था। हमने गिना तो हम दसवें नम्बर पर दौड रहे थे। हमने २ धावकों को मार्क किया जिन्हें पछाडने का अगले ५.२ मील मे प्रयास किया जायेगा। उनमें से एक को हमने चौथे और दूसरे को पाँचवे मील पर पीछे छोडा। अब हम आंठवे नम्बर पर थे और हमारे आगे वाला धावक अपने हाथ झटक रहा था और बार बार पीछे देख रहा था। हमने सोचा कि मौका अच्छा है देखते हैं किसमें कितना दम है, हमने थोडी रफ़्तार बढाई और उसके बराबर आ गये। अब सब कुछ उसे करना था। इसे हमारी भाषा में Shaking a runner कहते हैं। थोडी सी रफ़्तार बढाकर दूसरे धावक को उत्तेजित करना होता है। इसमें कभी आप सफ़ल होते हैं और कभी असफ़ल...
नये खिलाडी तुरन्त अपनी रफ़्तार बढाकर आपसे आगे निकल जाने की कोशिश करता है और ऐसे में कभी कभी वो अपने को ज्यादा थका लेता है। जिसका फ़ायदा आपको अगले मील में मिलता है। घाघ टाईप के धावक आपकी तरफ़ मुस्कुराते हैं और अपनी गति पर दौडते रहते हैं। अब चूंकि उसके बराबर आने में आपने अपनी गति बढाई होती है, अगर दूसरा बन्दा आपकी चाल में न फ़ंसे तो आप खुद अपने आप को हांफ़ते हुये पाते हैं और पासा उल्टा पड जाता है।
खैर, वो हमारी चाल में आ गया और छठे मील से थोडा पहले हमने उसे पीछे छोड दिया।
कुल समय: १० किमी ४१ मिनट में पिछला बेस्ट समय: ४१ मिनट १८ सेकेंड्स इस लिहाज से १८ सेकेंड्स का सुधार।
Overall: 7th position Age Group (Male 25-29): 2nd position (मतलब ईनाम मिला)
हमने अपनी कल की पोस्ट में ह्यूस्टन के जलील मौसम के बारे में बताया था। वैसे तो आज दोपहर में बर्फ़ गिरनी चाहिये थी लेकिन आज सुबह ७ बजे से ही बर्फ़ गिरनी शुरू हो गयी। आज के दिन ह्यूस्टन ने १९४४ का रेकार्ड तोडकर सर्दी के मौसम में सबसे पहले बर्फ़ गिरने की घटना दर्ज की।
हम जब तक स्कूल पंहुचे तो अच्छी खासी बर्फ़ गिर रही थी, लिहाजा हमने कुछ फ़ोटो और वीडियो भी बनाये। जिन्हे आप यहाँ देखिये...
इसके बाद, कुछ काम किया फ़िर बार बार बाहर जाकर बर्फ़बारी का मजा लिया। उसके बाद फ़ैसला लिया कि इस बर्फ़ में ३ मील दौडा जायेगा। लोगों ने वायदा तो किया लेकिन जब दौडने की बारी आयी तो केवल हम और एक कन्या मोनिका ही पंहुची। खैर ५ मिनट इन्तजार के बाद हम दोनो ने ही दौड लगानी शुरू कर दी। लोग अपनी कार से हमे ऐसे देख रहे थे जैसे दो पागल दौडे चले जा रहे हों। एक-दो लोगों ने अपनी कार का शीशा नीचे करके हमको घर जाने की सलाह भी दी तो कुछ लोगों ने थम्स अप भी दिया। दस्तानों के बावजूद -५ डिग्री की चुभती ठंड में दौडने में लुत्फ़ तो आया लेकिन ठंड भी लगी। ये रहे फ़ोटो जिससे सनद रहे।
इसके अलावा हम कल सुबह ७ बजे एक १० किमी की दौड में भी भाग ले रहे हैं, जहाँ तापमान शून्य के नीचे रहने की सम्भावना है। देखते हैं कल कितने शहसवार इस ठंड में दौडने आते हैं। हम तो जा ही रहे हैं। ये रहा आज अभी का और कल सुबह तक के मौसम की भविष्यवाणी।
कल अगर दौड में हमें कोई स्थान प्राप्त हुआ तो ईनाम के साथ अपनी तस्वीर जरूर चस्पा करेंगे। तब तक आप भी प्रकॄति के इस अद्भुत कारनामे का मजा लीजिये।
पिछले तीन दिन से ह्यूस्टन का जलील मौसम अपने चरम पर है। पिछले रविवार को अच्छी खासी गर्मी कि सुबह की दौड में लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे। अगले दिन सुबह स्कूल जाने के लिये एक पतली सी टी-शर्ट पहनकर घर से निकले और स्कूल तक आते आते हाथ रगडने कि नौबत आ गयी, इतनी ठंड वो भी इतनी जल्दी। फ़िर मंगलवार और बुधवार को ठंड बरकरार रही।
इसमें हमारे जैसे गरीब विद्यार्थियों (जिनके कपडों में सूती टी-शर्ट के अलावा और कुछ शायद ही मिले) को बडा कष्ट होता है। अब २ हफ़्ते के लिये नये कपडे, नहीं नहीं तौबा...
अरे, जब पहली बार भारत से आये थे तो मम्मी ने एक स्वेटर दिया तो था कि कभी कभी गर्मी में भी सर्दी हो जाती है। लेकिन उसको तो पिछले साल के सालाना घर की सफ़ाई अभियान में फ़ेंक दिया था। और उस नीली जैकेट का क्या हुआ? अरे भूल गये पिछली सर्दी में दोस्तों के साथ जब एक बार (bar) में मित्र के डाक्टर बनने की खुशी मनाने गये थे, तो टल्ली होकर जब सुबह बिस्तर पर नींद खुली थी तो टोपी और जैकेट नदारद थी। शायद बार में ही छूट गयी होगी।
अच्छा पुराना ब्रीफ़केस खोलकर देखो, शायद कुछ पडा हो। अरे ये एक जैकेट जैसी चीज तो है, लेकिन इतनी गन्दी है, इसे पहनोगे क्या? ड्राई क्लीनिंग, नहीं यार बहुत दूर जाना पडेगा और फ़िर वहाँ जाने के लिये क्या पहनोगे?
ह्म्म, कुछ लोग गरीबों को कपडें बाँट रहे हैं, शायद वहाँ से....हे राम, नरक में भी जगह न मिलेगी। घर पे वैसे भी शादी के रिश्ते नहीं आ रहे हैं और किसी ने ब्लाग पर पढ लिया तो फ़िर फ़ुल स्टाप। अरे, मैं तो ऐसे ही ब्रेन स्टार्मिंग कर रहा था। तुमने कैसे सोच लिया कि मैं इतना भी गिर सकता हूँ। ऐसा इसलिये सोचा कि पिछले साल एक बार जब घर में रात को खाने को घर में कुछ नहीं भी नहीं था, तो तुम....अरे, छोडो। ये ही गलत आदत है तुम्हारी, पुरानी बातें याद बहुत रखते हो। और, पडौस वाली आंटी ने कहा था कि कभी भी अच्छा खाना का मन कर तो...। लेकिन शाम को ८:३० बजे बिना बताये? अच्छा छोडो उसे, वो पुरानी बात है। मैं सुधर गया हूँ।
अंकुर से पूछ के देखो उसके पतले दिनों के टाईम का शायद कोई स्वेटर पडा हो। नहीं नहीं, इससे उसे याद आ जायेगा कि अब वो मोटा हो गया है, वैसे भी उसके लिये भी मोटापे के चलते शादी के रिश्ते नहीं आ रहे हैं। नहीं नहीं, ये बिलो द बेल्ट होगा...
अरे, ये क्या है? सचमुच अद्भुत!!! ये कहाँ से आया? पता नहीं, तुमने कब खरीदा? याद नहीं, नहीं नहीं मैने इसे कभी नहीं खरीदा। कहीं ये उसका तो नहीं? किसका? अरे, उसी का, समझो...अरे नहीं, ये तो लडकों वाला रंग है, कहीं गुलाबी या लाल दिख रहा है तुम्हे? तुम्हे भी बहाना चाहिये पुरानी बातें छेडकर याद मुझे कष्ट देने में। नहीं, नहीं मैं तो ऐसे ही...हे हे हे...खामोश, आगे कुछ भी कहा तो अच्छा नहीं होगा।
लेकिन ये स्वेटर यहाँ आया कहाँ से....ह्म्म....हम्म...अच्छा जरा नजदीक से देखने दो। कुछ तो याद आ रहा है लेकिन कुछ पक्का नहीं है। किसी ने गिफ़्ट तो नहीं दिया? हमें कौन गिफ़्ट देगा? हाँ, वो भी है।
अरे, कसम से....भगवान भी बडा कारसाज है। उसने हमारी सर्दी का इन्तजाम अगस्त में ही कर दिया था। हमारे गरीबखाने से विदा होते समय उन्होने हमको उनकी पुस्तक "बिखरे मोती" और एक गर्म स्वेटर भेंट की थी। जय हो...चलो अब सब ठीक ही होगा।
बर्फ़ से याद आया कि हमने अपने जीवन में पहली बार बर्फ़ पिछले साल देखी थी जब ह्यूस्टन में ११ दिसम्बर को बर्फ़ गिरी थी। उसके फ़ोटो भी लिये थे जो लगा रहे हैं जिससे सनद रहे। अगर कल बर्फ़ गिरी तो उसके भी लगायेंगे। :-)
कुछ दिन पहले पारूलजी ने अपने चिट्ठे पर वीणा सहस्रबुधे की आवाज में कबीर की रचना "घट घट में पंछी बोलता" सुनवायी थी। इत्तेफ़ाक की बात है कि कुछ दिनों पहले मैं भी इसी रचना को अपने चिट्ठे पर पोस्ट करने की फ़िराक में था लेकिन अनुराग हर्ष की आवाज में,
तो लीजिये पेश-ए-खिदमत है:
घट घट में पंछी बोलता
आप ही दंडी, आप तराज़ू आप ही बैठा तोलता आप ही माली, आप बगीचा आप ही कलियाँ तोड़ता
सब बन में सब आप बिराजे जड़ चेतना में डोलता कहत कबीरा सुनो भाई साधो मन की घुंडी खोलता
आज अपने चिट्ठे पर किसी और की पुरानी पोस्ट प्रकाशित कर रहा हूँ। दीप्ति ध्यानी कालेज में हमसे दो वर्ष कनिष्ठ थीं और कम्प्यूटर साईंस की छात्रा थीं। कालेज में शायद ही कभी उनसे बात हुयी हो लेकिन कालेज से निकलने के बाद बातचीत शुरू हो गयी। दीप्ती भी आज की उस युवा पीढी से ताल्लुख रखती हैं जिन्हे बात बात पर पथभ्रष्ट और संस्कृतिविहीन मान लिया जाता है अगर हम अपने व्यवहार से उसको गलत साबित न करें तो। यानि की संस्कृति सम्पन्न सिद्ध करने की जिम्मेदारी हमारी बनती है। खैर ये विषयान्तर हो जायेगा...दीप्ति के चिट्ठे का नाम है Forgot to grow up!!!
एक और महत्वपूर्ण बात ये कि कुछ ही दिनों पहले दीप्ति और अंशुल पुनेथा का विवाह होना पक्का हुआ है और ये दोनो ६ फ़रवरी को अपने दाम्पत्य जीवन का प्रारम्भ करेंगे। दीप्ति और अंशुल को मेरी ओर से ढेर सारी शुभकामनायें।
दीप्ति ने अभी कुछ दिन पहले बडी मेहनत करके हिन्दी में एक पोस्ट लिखी और उस पोस्ट के भावों को संक्षेप में लिखने के स्थान पर मैं उसकी इज़ाजत से पूरी पोस्ट ही यहाँ छाप रहा हूँ। आशा है आगे भी दीप्ति हिन्दी अथवा हिन्दी/अंग्रेजी मिश्रित पोस्ट लिखती रहेंगी। अगर आपको टिप्पणी देने की इच्छा हो तो दीप्ति की पोस्ट पर ही दें। दीप्ति को इस पोस्ट को लिखने में कई घंटे लग गये और वो सुबह के ४:३० बजे तक लिखती रही। बहुत मेहनती लडकी है, ;-)
आज शुक्रवार की शाम है.....ऑफिस में विशेष काम था नहीं, तो हमारे दिमाग में भांति भांति के विचार आने लगे; जब से नौकरी करना शुरू किये हैं, शुक्रवार नामक इस दिवस ने ज़िन्दगी में एक अलग ही स्थान प्राप्त कर लिया है; शुक्रवार की शाम आते ही मन प्रफुल्लित हो उठता है, आगे दो दिन की छुट्टी है....ऐसे लगता है मानो बस इन्ही दो दिन का इंतज़ार था..अब हम विश्व विजय कर लेंगे....वो सारे काम, जिनका चिटठा लिए हम हफ्तों से घूम रहे हैं; इसी सप्ताहंत में सभी का निर्वाह करके, आनंद और कर्त्तव्य परायणता की चरम सीमा को छू लेंगे...:) अगर पिछले दो सालों पर नज़र डालें तो विरले ही ऐसे सप्ताहंत रहे हैं जहाँ हमने खुद से किये गए कुछ वायेदों को निभाया है; अमूमन शनिवार और रविवार घर पे ही आराम फरमाते हुए, बचे हुए कुछ कामों को थोडा सा अंजाम के और करीब पहुंचाते हुए निकल जाते हैं; किन्तु शुक्रवार की शाम को जो मन मयूर में माहौल होता है..उसमे कोई विशेष अंतर नहीं आया है ..:)...आज ऐसे ही मन में विचार आ रहा था...कि क्या शुक्रवार सचमुच इतना मत्वपूर्ण होता है??? ....सांख्यिकी को अगर ध्यान में रखा जाए तो ९०% लोग ऐसे होंगे जो सप्ताह में इतना काम करते हैं, जिसे की सामान्य ऊर्जा स्तर से इति की ओर पहुँचाया जा सकता है ..और जिसके बाद २ दिन के अविघ्नकारी अवकाश की आवश्यकता नहीं होती....किन्तु हमारा मन मस्तिष्क इस तरह से यंत्रस्थ किया जा चुका है कि अगर ऊपर से निर्देश आ गए की इस शनिवार/ रविवार आपको ऑफिस आना पड़ सकता है, तो हम मानसिक रूप से ही इतने थक जाते हैं कि काम क्या ही हो पाता है....
Ok, as I write this post i realise, that I have lost all my grip over Hindi..:(...framing one sentence is taking more than 2 minutes, which by all standards is too too much, needless to mention the help from some random site and kind souls like N. I remember, there use to be a time when I was more of a Hindi person. Writing in our mother tongue came all very naturally. In addition to scoring highest marks in Hindi literature and grammar ..I use to be an active member of Hindi debate and writing club..:( .English was something which needed efforts, I still remember my first essay in English in class IV....I was disqualified from participating in a district level essay competetion as I committed some gross mistakes in my writing on "The Gulf War"-1991 (mistakes are too embarrassing to be mentioned here..:))....the remainder of this post has to be in Hindi...no matter how much time it takes.... "Shukra hai Shukravaar hai" can take a back seat...I guess I am more tempted to go down the "Hindi" memory lane :)
हमारी पीढी के अधिकाँश उत्तर भारतीय बच्चों की तरह हमारे घर में भी हिंदी का ही वर्चस्व था; हमारी मातृभाषा गढ़वाली है, और अक्सर माँ एवं पिताजी गढ़वाली में वार्तालाप करते पाए जाते हैं; किन्तु रोजमर्रह कि ज़िन्दगी में, और आसपास के वातावरण में भी हिंदी ही सबसे प्राभाव पूर्ण भाषा थी; हमारी माताजी संस्कृत/ हिंदी कि अध्यापिका हैं, दोनों ही भाषाओं में निपुण हैं, एवं पिताजी अलाहबाद विश्वविद्यालय से स्नातक तो हिंदी या यूँ कहिये काफी शुद्ध हिंदी में घर में वार्तालाप हो जाया करता था... मुझे याद आता है जब मेरे भाई बहिन का कक्षा १० का परिणाम आया...और वो अपेक्षा के अनुसार नहीं था; हमेशा की भाँती दोनों समझदार बच्चे सो गए...:) सोये रहेंगे तो पिताजी के प्रवचन कम सुनने मिलेंगे.....पिताजी ने शुध्ध हिंदी में कटाक्ष किया....
" ये पलायनवादी दृष्टिकोण कोई विशेष मदद नहीं करता है जीवन में"..:D उनके मुह से ऐसे वाक्य अक्सर सुनने मिल जाया करते थे...
" दीप्ति, तुम में व्यवहारिक ज्ञान और विवेक कि कमी है "...... " मेरी बातें तुम्हे अभी कटु लगेंगी, पर बेटा, सत्य यही है कि देर से उठने वाले जीवन में बहुत आगे नहीं जाया करते" "समय समय पे आत्म विश्लेषण अति आवश्यक है"
ऊपर लिखीं बातों को हमने जीवन में कितना अपनाया, इस पे तो टिपण्णी नहीं करुँगी ....पर घर में शुध्ध हिंदी कोई बहुत दूर कि चीज़ नहीं थी....माताजी अक्सर हमारे गलत उच्चारण को सही कर देतीं थीं.....फूल (phool) ओर फूल (fool) में अंतर करना उन्होने ही सिखाया.....मौसियों और चाचियों ने जब अपने बच्चों के कठिन नामों (जैसे: कनिष्क) को गलत हिंदी में लिखा तो माताजी ने आगे बढ़के "श" और "ष" में अंतर बताया...कक्षा ६ से १० तक, नवीन भारती, पराग, स्वाति (हमारी हिंदी पुस्तकें) के सभी गद्य और कविताओं का भावार्थ, प्रसंग और भी न जाने क्या क्या, को अत्यंत भावपूर्ण तरीके से लिखवाने में माताजी ने कोई कसर न रख छोड़ी ; हमने भी हिंदी में उच्चतम अंक पाके, उनको गौरवान्वित किया....और १ हिंदी अध्यापिका कि सुपुत्री होने का कर्त्तव्य पूर्ण रूप से निभाया..:) खैर, कहने का तात्पर्य ये है कि आसपास अच्छी हिंदी का माहौल था.....कक्षा ११ तक हम हिंदी वाद विवाद प्रतियोगिताओं में न केवल भाग लिया करते थे..बल्कि प्रथम या द्वितीय स्थान प्राप्त करके विद्यालय के गौरव को बढाते थे... (इन प्रतियोगिताओं में शीर्षक कुछ ऐसे होते थे: भारतीय राजनीति में धर्मं का हस्तक्षेप-कितना उचित/ अनुचित) ऐसे विषयों का ६वीं कक्षा में न तो सिर समझ आता था न पैर ..:) ८-१० पन्नों का १ झुंड हमें पकडा दिया जाता था......"बेटा, ये बोलना है...."...हम ख़ुशी ख़ुशी कर्तव्यपरायणता से उसे याद कर लेते थे....और किसी भी प्रतियोगिता में जाके.....मंडल/ जिले के हिंदी विद्वानों के सामने पूरे आत्मविश्वास एवं भावनाओं के साथ उगल दिया करते थे.....(Dias के पीछे hearbeats कितनी तीव्र गति से दौड़ रही होती थीं; इसका अनुमान शुक्र है किसी को कभी नहीं हुआ:) )
आज जब पीछे देखती हूँ तो याद पड़ता है...घर में १ रामायण हुआ करती थी....किसी हिंदी गाइड कि तरह दिखने वाली वो पुस्तक, २-३ भागों में थी.....हमने कक्षा २-३ में....पूरी रामायण (उत्तर रामायण सहित) ऐसे ही यहाँ वहां डोलते हुए पढ़ डाली थी (कहने कि आवश्यकता नहीं है..कि पुस्तक अत्यंत सरल हिंदी में थी)..... थोडा और बड़े हुए तो घर में रखे सभी शिवानी के उपन्यास (शिवानी हिंदी कि १ बहुचर्चित लेखिका हैं- उनकी सुपुत्री मृणाल पाण्डेय कुछ समय पहले तक हिंदी समाचार वाचिका थीं) पढ़ डाले; रुचि का १ कारण ये भी था कि सभी कहानियां/ उपन्यास गढ़वाल/ कुमाऊं का बड़ा ही रोचक वर्णन करते थे;
जब तक हम कक्षा १० में थे, घर में हिंदी अखबार नवभारत टाईम्स आया करता था; अखबार के मुख्य उपभोग्कता हमारे पिताजी थे, जो कि किसी भी दिन हिंदी भाषा से ज्यादा प्रेम/ तालुक रखते थे; स्कूल से आते ही, हम बिना change किये पहले पूरा अखबार पढ़ते....लोकल से ले कर विदेशी ख़बरों तक में सामान रुचि हुआ करती थी....फिर कक्षा ११वीं में ये अहसास हुआ, कि reading an English newspaper would any day be more beneficial:))..तो घर में टाईम्स ऑफ़ इंडिया भी आने लगा.....उसमे भी हमारी रुचि बस सन्डे टाईम्स में ही रहती थी....बाकी का अखबार अक्सर खाना खाते हुए बिछाने के काम आता था या अपनी अलमारी में किताबों के नीचे बिछाने के..:) इसी बीच हमने कहीं Readers' Digest और CSR देख लीं..:)..तो घर में वो भी आने लगीं.....ये दोनों ही बड़े मन से पढ़े जाते थे.... (Readers' Digest deserves a complete post in itself-its one of the most captivating reads I have ever come across). खैर, हिंदी भाषा से ताल्लुक शायद वहीँ तक था; इधर हम घर से बाहर निकले जीवन में कुछ कर दिखाने के लिए..:P...उधर मातृभाषा से तार टूटने से लगे....इंजीनियरिंग कॉलेज में आके पहले दो साल तो "कुछ भी नहीं पढ़ा"..:D..उसके बाद जब लगा कि अब आगे क्या.......तो MBA रुपी जीव सामने दिखाई पड़ा........बस....तब से जो अंग्रेजी भाषा से नाता जुडा है..आज आलम ये है कि......इस पोस्ट को लिखने में इस साईट से लेके श्री N का सहारा लेना पड़ा......फाइनल इयर में The Hindu , आसपास पायी जाने वालीं सभी अंग्रेजी magazines पढ़ी जाने लगीं.....हर वो लेख जो कि कठिन हो, जिसका सिर, पैर ना समझ आ रहा हो....उसपे शोध होने लगा... TOI का एडिटोरिअल जो मैं पूरे होशो हवास में मुश्किल ही पढ़ती हूँ कभी, पूरी शिद्दत एवं तल्लीन्त्ता से रुचि लेके पढ़ा जाने लगा...
जीवन तो इन सब में पता नहीं कितना सुधरा है....पर इतना ज़रूर है कि....हिंदी से कहीं नाता टूट गया लगता है इस बार घर गए, तो प्रेमचंद की गोदान रखी मिली १ शेल्फ में पूरे जोश से उसे तुंरत बैग में डाला. ..ये पढ़नी है....आज ६ महीने हो गए हैं किताब लाये हुए घर से......मुश्किल से ५० पन्ने पढ़ पाए हैं...:( रुचि पूरी है...पर पढने की गति इतनी चरमरा गयी है कि अब उठाने का मन ही नहीं करता....:( भाषा कोई भी हो..अपने आप में बहुत आदरणीय होती है .....किन्तु मातृभाषा में जब लिखने/ पढने में कठिनाई होने लगे तो कहीं ये बात दिल को अखरती ज़रूर है; PS: १. Thanks to N, for being the शब्द kosh for writing this post :) २. गोदान शीघ्रातिशीघ्र ख़तम कर ली जायेगी.....कितना भी समय क्यूँ न लगे...:) ३. शीर्षक का लेख से कोई सम्बन्ध नहीं है....शीर्षक twitter से उठाये गए कुछ वार्तालापों का मिश्रण है:) ४. पूरे लेख में पूर्णविराम की जगह ";" लगाना पड़ा है...:( ब्लॉग पूर्णविराम दिखा नहीं रहा है पोस्ट :(
ये लेख लिखते हुए सुबह के ४:३० हो गए.....निम्न वर्णित गीत ने काफी साथ दिया tempo बनाये रखने में.....इसे अवश्य सुने.....:) http://www.youtube.com/watch?v=XJJv83-5EyQ cheers :)
आज सुबह नींद खुली तो देखा कि झमाझम बरसात हो रही है। ११ बजे तक पडे ऊँघते रहे और तर्क दिया कि जब घडी का आविष्कार नहीं हुआ होगा तो लोग रोशनी देखकर ही उठते होंगे और अभी रोशनी से लग रहा है कि सुबह का ५ बजा है।
जब आत्मा पर बोझ बढने लगा और भूख से पेट सिकुडने लगा तो उठे, तैयार हुये और देखा कि घर में खाने का एक दाना भी नहीं है। खुश हुये कि चलो अब पका पकाया खायेंगे, बरसात में भीगते एक रेस्तराँ से खाना खाकर भीगते हुये अपने गरीब-रथ तक पंहुचे। आप सोच रहे होंगे कि हमने साथ में छाता क्यों नहीं लिया । हमने भी यही सोचा और अपने अजायबखाने रूपी घर में ५ मिनट तक छाता खोजा भी, लेकिन उसके बाद निष्कर्ष निकाला कि या तो रूममेट उठाकर ले गया होगा, अथवा किसी को उधार देकर भूल गये होंगे अथवा लैब में पडा हमारी डेस्क की शोभा बढा रहा होगा।
खैर झमाझम बारिश के बीच में अपने गरीब-रथ का बाजा चालू किया तो मानो बादलों के बीच बैठी श्रीमती किशोरी अमोनकर इसी क्षण का इन्तजार कर रही थीं। उनके स्वर से जब "मेहा झर झर बरसत रे" सुना तो तुरन्त पोस्ट लिखने का मन भी बना लिया। अपने रथ को एक कोने में रोककर बरसात के बीच में "मेहा झर झर बरसत रे" का आनन्द लिया और उसके बाद अपनी लैब में नमूदार हुये। आप भी इस गीत को सुनिये।
अब पोस्ट लिखने के बहाने पिछले कुछ महीनों का लेखा जोखा भी दे दें। ८ सितम्बर को जब हम भारत आये थे तो सोचा था कि ये करेंगे वो करेंगे, इससे मिलेंगे, उससे मिलेंगे आदि आदि इत्यादि। लेकिन ये सभी चुनावी वादे/विचार साबित हुये। और समझ भी आया कि हर काम को भारत यात्रा पर टाल देना अच्छी बात नहीं है क्योंकि घर वाले भी ऐसे ही चुनावी वादे कर चुके होते हैं।
जाहिर है घर वालों के वादे वादे होते हैं और हमारे वादे भांग के नशे में कहे गये शब्द अथवा ब्लागर मीट में लिये गये संकल्प, ;-) इसके चलते हमारे कई वादे कत्ल हो लिये। दिल्ली में रचना से मिलने का कार्यक्रम था जो सिर्फ़ फ़ोन पर बातचीत पर सीमित रह गया। गाहे बगाहे (ताना-बाना) वाले विनीत से बात करके मन खुश हुया और उनके शोधकार्य के बारे में सुनकर बहुत अच्छा लगा। पी.डी. तो भरे बैठे थे, हमने फ़ोन पर पहले ही माफ़ी मांग ली और उनके तलवार उठाने के पहले ही उनकी शादी की बात करके मामले को नया मोड दे दिया। मुम्बई वासी अभय तिवारी जी से बात हुयी और पता लगा कि वो असल में फ़रूखाबादी हैं और चूंकि हम एक बार फ़रूखाबाद गंगा नहाने जा चुके हैं तो उन पर अपनी करीबी जाहिर कर दी। उनसे नियमित लिखने का वायदा भी लिया गया। ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के फ़ोन की घंटी बजाने के प्रयास कई बार असफ़ल रहे, सम्भवत: वो व्यस्त रहे हों अथवा अनूप जी ने हमें गलत नम्बर दे दिया हो अथवा ये BSNL वालों का हमारी उनसे बात न होने देने का षणयन्त्र (षणयंत्र ?) रहा हो।
खैर इस बार भी घर वालों ने ध्यान नहीं दिया और हम कुंवारे ही रह गये, ;-) बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फ़िर भी कम निकले।
इस छुट्टियों में हिमालय यात्रा की गयी लेकिन उसकी रिपोर्ट अंकुर वर्मा के जिम्मे...
ह्य़ूस्टन वापिसी के बाद:
भारत में जब तक रहे दौडने से रिश्ता टूट चुका था, फ़िर से रिश्ता जोडने की कोशिश अभी भी चल रही है। ९ अक्टूबर की रात को ह्य़ूस्टन लौटते ही हमने ११ अक्टूबर की सुबह १० मील (१६ किमी) वाली दौड दौडने का निश्चय किया। जैट लैग के चलते न तो ठीक से सो पाये और १ दिन में न ही थकान उतर पायी। खैर सुबह दौडना शुरू किया तो ३ मील तक तो ठीक था लेकिन उसके बाद टांगो ने विद्रोह कर दिया। बडे कष्ट में अगले ७ मील गुजरे और जिस दौड को ७० मिनट में समाप्त करने की इच्छा थी वो ७१ मिनट और २१ सेकेंड्स में समाप्त हुयी। ये फ़ोटो गवाह है कि हमने आखिरी ७ मील किस दर्द में पूरे किये। (आऊच, बहुत दर्द हो रहा है)
इसके बाद हमने अगले दो हफ़्ते धीरे धीरे दौडने से अपना टूटे रिश्ते के तार धीरे धीरे जोडे और कल एक हाफ़-मैराथन (२१.१ किमी) दौडी। ये दौड अच्छी रही क्योंकि इसमें हमने अब तक का अपने सर्वोत्तम समय दर्ज किया। हमने इसे १ घंटा ३२ मिनट और ५६ सेकेंड्स में पूरा किया। हाफ़-मैराथन के लिये हमारा पिछला सबसे अच्छा समय १ घंटा ३४ मिनट और ४१ सेकेंड्स था। इस दौड के अंतिम ३ मील कष्टप्रद रहे लेकिन हमने अपने मित्र और ट्रेनिंग पार्टनर डेविड पाईपर को ४० सेकेंड्स से पीछे छोडा। ध्यान रहे पिछली २ दौडों में डेविड ने हमारी वाट लगा रखी थी, ;-) अब मामला बराबरी पर है। अगली दौड २५ किमी की है जो २ हफ़्ते बाद है, जैसा कि हम आपस में कहते हैं The bet is ON David...
कल की दौड के सबक हैं कि हमें अपनी रनिंग फ़ार्म को सुधारना है। कन्धे सीधे रहने चाहिये और कदम एकदम मशीनी एकुरेसी के साथ पडने चाहिये। हम तीन फ़ोटो दिखाते हैं। एक हमारा है, एक डेविड का है और एक ट्वांग का है जो हमारे स्तर से बहुत ऊँचे धावक हैं तेज रफ़्तार पर भी उनकी रनिंग फ़ार्म देखिये, देखकर ही मन खुश हो जाता है।
चलिये, अब विदा दीजिये...अब नियमित पोस्ट छापते रहेंगे, अगर कोई पढने वाला है तो, ;-)
(७१९ नंबरी नीरज)
(२२३४ नंबरी डेविड) (और ३८ नंबरी ट्वांग, क्या बात है)
प्रिय मित्रों/साथियों, बड़े दिनों से व्यस्तता के चलते कुछ लिखना नहीं हो पाया लेकिन खबर है कि नीरज रोहिल्ला ८ सितम्बर को लगभग ४ हफ्तों के लिए अपने देश भारत आ रहे हैं, ;-)
फिलहाल अंदाजा है कि दिल्ली/नोयडा क्षेत्र में कुछ दिन ठहरने का कार्यक्रम बनेगा | बाकी समय माताजी/पिताजी के आदेश पर बुशर्ट पैंट पहन कर घर में राजा बबुआ बन कर बैठे रहेंगे कि इसी से माताजी पिताजी को अहसास हो कि लड़का जवान हो गया है और शायद वो शादी के लिए कोई लडकी देखना शुरू कर दें, वरना जैसी ईश-इच्छा, ;-)
८ सितम्बर: दिल्ली से मथुरा १० सितम्बर-१४ सितम्बर: दिल्ली/नोयडा १५ सितम्बर-२२ सितम्बर: निंदा पुराण/ वाले अंकुर वर्मा और हमारे एक अन्य मित्र टोड गिल्बर्थ के साथ हरिद्वार/ऋषिकेश/चोपटा/.../ वैली आफ फ्लावर्स होते हुए वापिस दिल्ली २३ सितम्बर से २ अक्टूबर तक: मथुरा में राजा बबुआ बनकर बैठे रहना ;-)
हमारे मित्र टोड गिल्बर्थ बड़े दिलचस्प इंसान हैं और वो ५ हफ्ते के लिए भारत आ रहे हैं | हम उनके साथ ७ दिन घूमेंगे लेकिन टोड झोला लटकाए भारतीय रेल के माध्यम से भारत घूमेंगे | फिलहाल उन्हें वाराणसी में एक मित्र की तलाश है जो उन्हें बनारस दर्शन करा सके, अगर कोई बनारस वासी टोड को गंगा मैया के दर्शन कराने का पुण्य लेना चाहे तो उनकी मुश्किल हल हो जायेगी और वो इसके लिए बड़े कृतज्ञ रहेंगे, आप अपने पुण्य कार्य को कन्फर्म करने के लिए हमें nrohilla@gmail.com ईमेल कर सकते हैं....
मुंबई और गोवा निवासी भी इस पुण्य को प्राप्त कर सकते हैं, बिना हिचकिचाहट के हमसे संपर्क करें, nrohilla@gmail.com ;-)
इस बीच में अन्य हिन्दी ब्लागर्स से संपर्क स्थापित करने का यत्न किया जाएगा, और टेलीफोन डायरेक्टरी के स्थान पर अनूप जी की सहायता ली जाएगा...
मथुरा में हमें इन फ़ोन नंबर पर पकडा/जकडा जा सकता है: ५६५-२४२४७८८ ९७१९६१८२७९
बाकी, अगर आप सभी जिनकी इस हलके वजन वाले नाचीज़ से मुक्कालात अथवा बातचीत करने की इच्छा हो हमें अपना फ़ोन नंबर हमें nrohilla@gmail.com ईमेल कर सकते हैं, ;-)
इस बार की ह्यूस्टन मैराथन ने दौड़ से पहले ही कई रेकार्ड बनाये | दौड़ तो १७ जनवरी २०१० को दौडी जायेगी लेकिन इसको दौड़ने के लिए पंजीकरण जुलाई १८ को शुरू हुआ | पिछली बार की दौड़ में हाफ और फुल मैराथन के लिए कुल २२००० स्थान थे लेकिन फुल मैराथन के लिए स्थान निश्चित न होने के कारण देखते ही देखते हाफ दौड़ने वालों ने फुल मैराथन दौड़ने वालों के लिए स्थान की तंगी कर दी | इस साल आयोजकों ने फुल और हाफ दोनों के लिए ११००० -११००० स्थान निश्चित कर दिये |
ताज्जुब हुआ कि मात्र २४ घंटे में ही हाफ मैराथन के ११००० स्थान भर गए और इन्ही २४ घंटों में फुल मैराथन भी ७०% भर गयी | हमने तो रात को २ बजे जागकर अपना पंजीकरण करवाया था लेकिन अगले दिन उनके डेटाबेस में अपना नाम खोजा तो नहीं मिला | हमारे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी क्योंकि अब केवल १००० स्थान बाकी थे और हमें समझ नहीं आ रहा था कि क्या हमें दुबारा पंजीकरण कराना पड़ेगा | हमने तुंरत उन्हें फ़ोन मिलाया और इमेल पर प्राप्त हुयी पंजीकरण की रसीद उन्हें भेजी | उसके बाद रेस डायरेक्टर ने हमको फ़ोन करके भरोसा दिलाया कि हम चिंता न करें और चाहे जो हो जाए वो हमें इस दौड़ में स्थान अवश्य दिलायेंगी | हमको भरोसा देने के लिए उन्होंने आन-द-रेकार्ड ये ईमेल भी भेजी|
Neeraj,
I’m looking into this for you. I am terribly sorry for the inconvenience. No matter what has happened, I promise that you will have a spot in our race. We will get this taken care of for you. I hope to be calling you soon with a response.
Best regards, Carly Caulfield Operations Director Chevron Houston Marathon 713.957.3453 voice
खैर, अगले ३ दिनों में हमारी समस्या सुलझ गयी और हम आधिकारिक रूप से ह्यूस्टन मैराथन दौड़ने वालों की सूची में आ गये | अब पंजीकरण के पश्चात हमारी ट्रेनिंग जोर-शोर से शुरू हो गयी है (जो पिछले दो महीनो से धीमी चल रही थी) | इस साल की दौड़ में हमारी कोशिश इस मैराथन को ३ घंटा और १० मिनट में समाप्त करने की है जिससे कि हम बोस्टन मैराथन जो अमेरिका की सबसे पुरानी मैराथन दौड़ है में हिस्सा ले सकें | ये ध्यान दिला दें कि कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू खैरा बोस्टन मैराथन में दौड़ नहीं सकता और इसके लिए बाकायदा क्वालीफाई करना होता है जो आसान नहीं है | विभिन्न आयु-वर्गों के लिए क्वालीफाइंग समय इस प्रकार हैं:
Age Group
Men
Women
18 - 34
3:10:59
3:40:59
35 - 39
3:15:59
3:45:59
40 - 44
3:20:59
3:50:59
45 - 49
3:30:59
4:00:59
50 - 54
3:35:59
4:05:59
55 - 59
3:45:59
4:15:59
60 - 64
4:00:59
4:30:59
65 - 69
4:15:59
4:45:59
70 - 74
4:30:59
5:00:59
75 - 79
4:45:59
5:15:59
80 and over
5:00:59
5:30:59
नोट करें कि अगर हमारा नाम नीरजा रोहिल्ला होता तो हमें केवल ३ घंटा ४० मिनट में ही दौड़ पूरी करनी होती जो हम पिछले साल ही दौड़ने में सक्षम थे, बड़ी नाइंसाफी है, ;-)
हमको अपने पिछली मैराथन के समय ३:३८ से ३:१० पर लाने के लिए कड़ी मेहनत और ह्यूस्टन के जलील मौसम (अभी ३८ डिग्री और ९५% आद्रता) में खूब पसीना बहाना होगा | ३:१० मैराथन का अर्थ है कि हम किलोमीटर को ४ मिनट और ३२ सेकेंड्स में दौडें और एक-दो नहीं बल्कि ४२.२ किलोमीटर तक दौड़ते रहें | देखते हैं, हमारी ट्रेनिंग क्या रंग लाती है, ;-)
हम हर महीने पर अपनी ट्रेनिंग रिपोर्ट आपको देते रहेंगे, फिलहाल अगले तीन हफ्तों का उद्देश्य है कि हर हफ्ते लगभग १० प्रतिशत की दूरी का इजाफा करते करते लगभग ४० मील प्रति हफ्ता (६४ किलोमीटर प्रति हफ्ता) तक लाया जाए | उसके बाद अगले २ महीने में इसे ५०-५५ (८०-८५ किमी/हफ्ता) तक ले जाकर उसके अगले २ महीनों तक स्थिर रखा जाए | ये रहा हमारे जुलाई की दौड़ का लेखा जोखा, ;-)
जिया साहब की आवाज में हमने पहले भी कुछ किस्से सुनवायें हैं, इसी कडी में आज पतरस बुखारी साहब का किस्सा "होस्टल" पेश है। इस किस्से में जिया साहब पढाई के लिये घर से दूर जाने पर "होस्टल" की अहमियत बतायी गयी है :-) उम्मीद है जो लोग घर से दूर होस्टल में रहे हैं, उन्हें उनके पुराने दिन जरूर याद आ जायेंगे।
हम तो मारे शर्म के गडे जा रहे हैं। अनामी भाई/बहन की टिप्पणियों पर हिन्दी ब्लाग जगत में आतंक मचा हुआ है। जो भी उसकी पैरवी करे, उसे तुरन्त काजमी साहब की तर्ज पर ब्गागद्रोही साबित कर दिया जाता है। और एक हमारा चिट्ठा है जो हमने खुल्ला छोड रखा है जिसके चलते भी कभी अनामी साहब नहीं फ़टकते। बहुत पहले जब लिखना शुरू किया तो बस ऐसा इन्तजाम किया कि टिप्पणी पोस्ट होते ही ईमेल से खबर मिल जाये जिससे कि अगर कभी कुछ सेंसर करना पडे तो तुरन्त कर सकें, वरना तुरन्त टिप्पणी छप जाये। लगभग तीन वर्षों में एक बार भी स्थिति नहीं आयी की मामला सेंसर करना पडा हो। एक-आध बार लगा की हटा दें लेकिन टिप्पणी पडी रहने दी और अगली पोस्ट तक याद भी नहीं रहा।
और भी गम हैं जमाने में अनामी के सिवा, राहतें और भी हैं १५ मील की दौड के सिवा।
खैर, अनामी टिप्पणी हमारे ब्लाग पर जारी रहेगी क्योंकि हम चर्चा में इसके स्थान का महत्व मानते हैं। ये वैसा ही है, जब हम और आप अपनी कहानी सुनाते समय कहते हैं कि "एक बार मेरे दोस्त के साथ ऐसा हुआ"। इससे आगे अगर कोई गाली लिखे तो एक बटन से टिप्पणी डिलीट हो जाती है। उसका लिखा एक पैराग्राफ़ और आपका सिर्फ़ एक क्लिक, हम तो ये खेल रोज खेलने को तैयार हैं लेकिन हमें कोई भाव ही नहीं देता।
क्यों एक टिप्पणी से ही हमारा आपा खो जाता है और फ़िर हम जवाबी टिप्पणी लिखकर उसे द्वन्द युद्ध के लिये आमंत्रित कर लेते हैं। चिट्ठे से इतना मोह ठीक नहीं, साईबर जगत में टहल रहे इलेक्ट्रानों से इतनी नजदीकी का भ्रम पालें तो अपनी रिस्क पर :-) खैर, जो इसको अपनी प्रतिष्ठा का सामान बनाकर आईटी के औजार तरकशों में सजाये बैठे हैं, उनको इस एक तरफ़ी लडाई में जीत के लिये पहले से बधाई।
एक और प्रश्न है जो काफ़ी समय से सोचने पर मजबूर कर रहा है। कई चिट्ठाकार हैं जो नियमित लिख रहे हैं और बहुत अच्छा लिख रहे हैं। अचानक किसी एक विषय पर विचार न मिलने पर इतना हंगामा? कहाँ गयी सहिष्णुता कि हम असहमति पर सहमत हैं? क्या हर बहस का अन्त किसी एक की जीत से होना चाहिये। निर्मल आनन्द पर कभी पढा था कि विचार व्यक्ति/व्यक्तित्व का एक बहुत छोटा सा हिस्सा होता है जो अमूर्त है और बदलता रहता है, लेकिन यहाँ पर केवल वैचारिक असहमति पर इतना प्रलाप? इसे प्रतिष्ठा का चिन्ह बना लेना कहाँ तक ठीक है।
चलते चलते, हमारे मित्र अंकुर भारत से वापिस लौटकर आये हैं और बहुत सारी नयी खबरे, मिठाई, घर की बनी पूरियाँ, मठरी, और मुकेश की आवाज में हमारे लिये पाँच सीडी का "रामचरित मानस" का सेट लाये हैं और हम सुने जा रहे हैं, मुग्ध होकर, अहा आनन्दम आनन्दम!!!
I am a graduate student in Chemical Engg. at Rice University. I was recruited into BCRR over two free beers one fine Wednesday evening. I have been running with BCRR since then. I am also serving on BCRR board as "Member at Large".
I come from India so catch me at Valhalla for some interesting stories about Indian culture and people.