शनिवार, अगस्त 25, 2007

कव्वाली: भाग २

कव्वाली पर मेरी पिछली प्रविष्टी को आप सभी ने पसन्द किया इसके लिये धन्यवाद । इस प्रविष्टी में हम हिन्दी फ़िल्म संगीत की कव्वालियों पर चर्चा करेंगे । संगीत निर्देशक "रोशन" ने अपनी फ़िल्मों में बेहतरीन कव्वालियों का प्रयोग किया । उन्होनें "बहू बेगम", "दिल ही तो है", "ताज महल" और "बरसात की एक रात" जैसी कई फ़िल्मों में दिलकश कव्वालियों का प्रयोग किया ।

इस पहली पोडकास्ट में उनकी चार कव्वालियों के कुछ अंश प्रस्तुत हैं ।

१) न तो कारवाँ की तलाश है, न हम सफ़र की तलाश है ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")
२) ये इश्क इश्क है ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")
३) वाकिफ़ हूँ खूब इश्क के तर्जे बयाँ से मैं ("बहू बेगम", संगीत निर्देशक: "रोशन")
४) ऐसे में तुझको ढूँढ के लाऊँ कहाँ से मैं ("बहू बेगम", संगीत निर्देशक: "रोशन")

इन कव्वालियों के अंशो को मिलाकर मैने लगभग १२:३० मिनट का एक पोड्कास्ट तैयार किया है । तो नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन चार कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।


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दूसरी पोडकास्ट भी "रोशन" साहब के नाम पर है, इसमें आप सुनेंगे ।

१) चाँदी का बदन सोने की नजर ("ताज महल", संगीत निर्देशक: "रोशन")
२) जी चाहता है चूम लूँ अपनी नजर को मैं ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")
३) निगाहे नाज के मारों को हाल क्या होगा ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")

नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन तीन कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।

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तीसरी पोडकास्ट में आप सुनेंगे:

१) चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में ("निकाह", संगीत निर्देशक: "रवि")
२) निगाहें मिलाने को जी चाहता है ("दिल ही तो है", संगीत निर्देशक: "रोशन")
३) पल दो पल का साथ हमारा पल दो पल के याराने हैं ("द बर्निंग ट्रेन", संगीत निर्देशक: "राहुल देव बर्मन")
4) अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में ("मेरे हमदम मेरे दोस्त", संगीत निर्देशक: "लक्ष्मीकांत प्यारेलाल")

नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।
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और अंत में आपके लिये पेश हैं कव्वाल "इस्माईल आजाद" की दो प्रसिद्ध कव्वालियाँ:

१) हमें तो लूट लिया मिल के हुस्न वालों नें
२) झूम बराबर झूम शराबी, झूम बराबर झूम ।

नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।

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हिन्दी फ़िल्म संगीत की कुछ अन्य प्रसिद्ध कव्वालियाँ इस प्रकार हैं ।

१) तेरी महफ़िल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे ("मुगले आजम", संगीत निर्देशक: "नौशाद", गायक :"लता मंगेशकर, शमशाद बेगम")
२) ये माना मेरी जाँ मोहब्बत सजा है मजा इसमें इतना मगर किसलिये है ("हँसते जख्म", संगीत निर्देशक: "मदन मोहन")
३) हाल क्या है दिलों का न पूछो सनम ("अनोखी अदा", संगीत निर्देशक: "नौशाद")
४) आज क्यों हमसे पर्दा है ("साधना", संगीत निर्देशक : "नारायण दत्ता")
५) यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिन्दगी ("जंजीर", संगीत निर्देशक : "कल्यानजी आनन्दजी")
६) मेरी तस्वीर लेकर क्या करोगे तुम ("काला समुन्दर, संगीत निर्देशक : "नारायण दत्ता")
७) है अगर दुश्मन दुश्मन जमाना गम नहीं ("हम किसी से कम नहीं", संगीत निर्देशक : "राहुल देव बर्मन")
८) परदा है परदा ("अमर अकबर एंथनी", संगीत निर्देशक : "लक्ष्मीकांत प्यारेलाल")
९) परदे में बैठा है कोई परदा करके ("दादा", संगीत निर्देशक : "ऊषा खन्ना")
१०)उनसे नजरे मिली और हिजाब आ गया ("गजल", संगीत निर्देशक : "मदन मोहन")
११) जाते जाते एक नजर भर देख लो, देख लो ("कव्वाली की रात", संगीत निर्देशक : "इकबाल कुरैशी")


फ़िलहाल बस इतने ही गीत याद आ रहे हैं । अगर आपकी भी कोई पसंदीदा कव्वाली है तो आप अपनी टिप्पणी के माध्यम से बता सकते हैं ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! आप तो एक के बाद एक खजाने खोलते चले जा रहे हैं! यह तो बार-बार विजिट करने वाली पोस्ट बन गयी है.

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  2. नीरज अच्‍छी मेहनत की है ।
    मज़ा आया सुनकर । फिल्‍मी क़व्‍वालियों की ज़बर्दस्‍त महफिल सजाई है ।
    शायद कव्‍वाली के शौकीन जानते हों संगीतकार सी रामचंद्र ने धनंजय फिल्‍म
    में एक कव्‍वाली गाई थी । जबर्दसत कव्‍वाली है ये--हम वफादार नहीं तू भी तो
    दिलदार नहीं । इसके अलावा कुछ और कम चर्चित कव्‍वालियां हैं
    जिनकी चर्चा बाद में की जाएगी ।
    श्रृंखला जारी रखो ।
    हम जुगलबंदी सजा रहे हैं

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  3. आपने तो बिल्कुल भूल सी गयी कव्वालियों की याद दिला दी । आज कल ना तो ऐसी कव्वालियाँ बनती है और ना ही ये पुरानी कव्वालियाँ सुनाई देती है।

    आपकी मेहनत काबिले तारीफ है।

    आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।

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  4. बढ़िया रहा आपका ये प्रयास ! मुझे तो एक गैर फिल्मी कव्वाली याद आ रही है जिसे मैंने तब live सुना था जब कक्षा ८ में था। गायक थे असलम शाबरी और बोल थे
    तू किसी और की जागीर है ओ जाने ग़ज़ल ...
    लोग तूफान मचा देंगे मेरे साथ ना चल!

    और मन झूम उठा था. तब दशहरा में पटना में अक्सर ऍसे कार्यक्रम हुआ करते थै।

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आप अपनी टिप्पणी के माध्यम से अपनी राय से मुझे अवगत करा सकते हैं । आप कैसी भी टिप्पणी देने के लिये स्वतन्त्र हैं ।