सोमवार, दिसंबर 24, 2007

जूतों के फ़ीतों के बहाने पुरानी यादें !!!

मेरा ह्यूस्टन मैराथन १३ जनवरी को आने वाला है इसीलिये आजकल दौडना थोडा बढ गया है (रोज लगभग १० किमी.) । आजकल यूनिवर्सिटी में यीशू के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में छुट्टियाँ चल रही हैं, इस कारण जिस इमारत में मेरी प्रयोगशाला है के सभी दरवाजें बन्द रहते हैं । अगर आपको अन्दर जाना है तो अपना परिचय पत्र एक रीडर की स्लाट में से गुजारिये और दरवाजे खुल जायेगें । उसके बाद मुख्य इमारत में घुसकर प्रयोगशाला में जाने के लिये एक चाबी की आवश्यकता पडती है ।

 

यही समस्या है, मेरे दौडने वाले कपडों में एक भी जेब नहीं है और मुझे हाथ में कुछ भी पकडकर दौडना बहुत असुविधाजनक लगता है । इस कारण आजकल मुझे अपना परिचय पत्र इमारत के बाहर रखे एक गमले में छुपा कर जाना पडता है और प्रयोगशाला की चाबी को मैं अपने जूते के फ़ीतों में फ़ंसा लेता हूँ । आज जब मैं अपनी चाबी को जूते के फ़ीतों में फ़ंसा रहा था तो देखा कि मेरे फ़ीते के सिरे में लगा हुआ प्लास्टिक का कैप जैसा कुछ टूट गया (इस प्लास्टिक वाली वस्तु का कुछ विशेष नाम होता है जो याद नहीं आ रहा है ) । इसके बाद दौडते समय मैं जूते और फ़ीतों के बारे में सोचता रहा ।

 

मुझे अच्छे से याद है बचपन में मेरे जूते बहुत जल्दी टूटते थे । मुझे दौडने भागने और फ़ुटबाल खेलने का शौक था और रास्ते में पडे पत्थरों को ठोकर मारने की भी कुछ आदत सी थी । मेरे नये जूते लगभग ४-५ महीने ही चल पाते थे । बाटा हो या साटा हर तरीके के जूते खरीद कर देख चुके थे, एक बार तो पिताजी ने जूते की दुकान वाले को कहा था कि भैया तुम्हारे पास लकडी/लोहे के जूते हों तो वो दिखाओ । इसके अलावा बीच-बीच में जूते के फ़ीते टूटते रहते थे और जूते मरम्मत को भी जाते रहते थे । उस समय जूते ठीक करने वाला मेरा दोस्त सा बन गया था, अन्दर की बात बता देता था कि २.५ रूपये दर्जन तो केवल कीलें ही मिलती हैं और ज्यादा पैसे नहीं बच पाते हैं ।

 

मैं भी फ़ीतों के टूटने पर घर में आखिरी संभव समय तक नहीं बताता था, पहले आधे हुये फ़ीते को ही पिरो लेता था उससे गाँठ जरा छोटी लगानी पडती थी । उसके बाद भी काम न चले तो alternate छेदों में से फ़ीता पिरो कर काम चला लेता था । उस समय जूतों में ३-४ छेदों की पंक्तियाँ हुआ करती थी । पहली बार स्पोर्ट्स शू में ६-७ छेदों की पंक्तियाँ देखकर बडा खुश हुआ था । खैर बात फ़ीतों की, जब घर वाले फ़ीतों पर मेरी मितव्ययिता देखा करते थे तो नाराज होते थे कि पहले क्यों नहीं बताया कि फ़ीते टूट गये हैं । यही हाल मेरी जुराबों का भी होता था, कहीं से एक भी धागा देखकर मैं उसे खींच लेता था और उससे जुराबें फ़ट जाया करती थीं । उस समय घर के नुक्कड का दुकानवाला जूतों के फ़ीते भी बेचने को रखता था, पता नहीं अब भी रखता होगा क्या ?

इसी से एक बात याद आयी जो मैं बचपन में अपने आस पडौस में खूब सुना करता था । किसी भी विद्युत उपकरण/मोटर आदि के गरम होने की बात । कोई कहता था कि इसे लगातार मत चलाओ गरम हो जायेगा । शायद उन सबके डिजाइन में इन बातों का ध्यान नहीं रखा जाता होगा या फ़िर लोगो ने मरम्मत कराने के डर से ऐसा रूल आफ़ थम्ब बना लिया होगा ।

 

लेकिन अभी पिछले कई वर्षों से देखा है कि मेरे जूतों के फ़ीते टूटे नहीं हैं । या तो फ़ीतों की गुणवत्ता अच्छी हो गयी है अथवा मैं थोडा सुधर गया हूँ । आपके जूतों के फ़ीते आखिरी बार कब टूटे थे ?

7 टिप्‍पणियां:

  1. बचपन में सब एक जैसे उधमी होते हैं शायद! हमारा भी यही हाल था जूते दुकान में जाते ही साथ हमारे घरवाले भी यही कहते थे भैया, लोहे या लकड़ी के जूते हों तो दिखाओ इसके लिए।
    फ़ीतों और जुराबों का भी तकरीबन यही हाल रहा।
    बस स्कूल लाईफ़ खत्म हुई और फ़ीते टूटने भी बंद हो गए।

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  2. sanjoobhai2:10 am

    संजीत भाई...आप बड़े ज़ालिम (प्यारे) हैं.ज़िन्दगी के सबसे ख़ूबसूरत लम्हों की याद दिला देते हैं.जूते और फ़ीते कुछ अनुभूतियाँ:

    साल भर जूते ख़रीदते रहने का जुनून मन में रहता था.पर पिताजी कहते थे दशहरे पर ही दिलवाएँगे.

    फ़ीते टूटते ही थे लेकिन इतनी आसानी से हर दूकान पर दस्तेयाब नहीं होते थे जैसे आज होते हैं सो कई कई दिनों तक फ़ीतों के लिये तरसना पड़ता था.

    अब मेरा लड़का जब चाहे जूते ख़रीदने की फ़रमाइश करता है और दिलवाने ही पड़ते हैं . मैं बहुत समर्थ नहीं हो गया लेकिन अब बच्चों द्वारा शांति धरने का का सवाल ही नहीं उठता , वरना घर की शांति भंग हो जाती है.

    आख़िरी बात ....
    मैं अपने पिता के जूतों की सार सम्हाल करता था,उनके जूतों पर पाँलिश फ़ेर कर आनंदित होता था...आज मेरा लड़का अपने ख़ुद के जूतों को भी साफ़ नहीं करता ....मैं अपने दस्तर के सहयोगी को भेज कर उसके जूते पाँलिश करवाता हूं.

    पिता के जूतों पर की गई चैरी ब्लाँसम ख़ुशबू की मानिंद आज भी दिल में महदूद है.

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  3. हमारे फीते तो अब भी टूटते हैं। बहुत कस कर बांधने की आदत है शायद।
    बचपन की जो यादें हैं वे फीते टूटने की कम, नया जूता काटने की ज्यादा हैं। एक बार तो नया जूता इतना काट रहा था हि स्कूल से लौटते समय बस्ते से बांध दिया और नंगे पैर चल कर आया। घर आने पर देखा कि एक पैर का जूता बस्ते से खुल कर कहीं गिर गया था। नया जूता चला गया।
    आपने यह पोस्ट लिख कर पुरानी यादें ताजा करा दीं। बड़ा अच्छा लगा।

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  4. हमारे जूते तो एकाध ही टूटे होंगे.. पर फीते ज़रूर टूट जाया करते थे.. मगर अब तो जूतों से पीछा छुड़ाना जैसे नामुमकिन है.. ना खराब होते हैं न टूटते हैं.. वैसे पहने भी कितने जाते हैं.. आखिरी जूता जिसे विदा किया गया वो बेहद प्रिय था और खूब तन्दरुस्त भी लेकिन मुम्बई प्रलय के दिन फैली बीमारियों के चलते बीबी के धकेले जाने पर ही उसे नमस्ते कहना पड़ा..

    रही बात आप की.. आप तो बिलकुल ही सुधर गए होगे.. फिर सड़के भी तो अमरीकी हैं..)

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  5. बहुत अच्छा याद दिलाया हमारे भी उपकरण काफ़ी गरम हो जाया करते थे. चलचित्र या रेडियॊ भी ज्यादा देर नही सुन पाते थे :)

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  6. बेनामी4:16 pm

    You have to believe in yourself . That's the secret of success.


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    Sofia University of St. Kliment Ohridski

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  7. बेनामी1:49 pm

    Wasting time is robbing oneself.

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