सोमवार, जुलाई 09, 2007

ताज को वोट न देकर क्या बडा तीर मार लिया !!!

कोई कह रहा था कि प्रेम से ताज महल के लिये फ़टाफ़ट वोट करें;
किसी ने कहा कि ये ताज पर वोटिंग भी एक मुद्दा ही है;
कोई बोला नहीं देते ताज को वोट, का कल लोगे?
किसी को चिन्ता कि ताज के नाम पर देश लुटा जा रहा है;
कोई बोला कि मैं तो भोलेपन में ताज को वोट करके लुट गया;
किसी ने वोट न देने पर बधाईयाँ बाँटी;
और आखिर में किसी ने पूछा कि क्या वाकई ताज नंबर वन है?

हो सकता है एक-दो पोस्ट छूट गयी हो लेकिन हमारे ब्लागजगत में ये "ताजमहल की वोटिंग" भी एक मुद्दा ही था । मैं भी आज तक इसे एक मुद्दा ही समझ रहा था लेकिन अपने लैब से कालेज की पार्किंग लाट की ओर टहलते हुये सहसा लगा कि किसी ने हमें पुकारा । पलटकर देखा तो कोई नहीं था, हम फ़िर आगे बढे ही थे कि फ़िर आवाज आयी, "मूर्खराज, कहाँ जा रहे हो?" आजू-बाजू देखा तो कोई नहीं था फ़िर गौर से सुना कि आवाज अंदर से ही आ रही थी । क्या मेरा अन्तर्मन स्वयं को मूर्खराज कह रहा था ? जी हाँ, सत्य तो यही था कि मैं स्वयं को मूर्खराज महसूस कर रहा था ।


आप सोच रहे होंगे, कि पक्का मैने भी ताज को वोट दिया होगा और इसका अफ़सोस अब हो रहा होगा कि मैं इत्ता बडा मूर्ख कैसे बन गया । बिल्कुल गलत । मैने ताज को वोट नहीं दिया और इस कारण मैं स्वयं को बेवकूफ़ समझ रहा था । चलिये थोडा विस्तार में समझाते हैं ।

मान लीजिये कि हमें ताज को वोट करना होता तो हम क्या करते । एक झटके में वोटिंग वाली वेबसाईट खोलते, दूसरे झटके में रजिस्टर होते, और तीसरे झटके में वोट डाल देते । जेब से आठ आने भी खर्च न होते (भाई, स्कूल में मुफ़्त का इंटरनेट है और घर वाले इंटरनेट के लिये हर महीने पैसे दे ही रहे हैं), कौन सी बडी बात हो जाती । मन खुश रहता थोडी देर, और जब भी वोटिंग की बात चलती हम टुन्नाकर कहते भईया हम तो पहले ही वोट डाल चुके हैं । आते जाते चार लोगों को और बता देते कि तुम भी वोट डाल आओ ।

हमने वोट न डाला, उससे क्या हुआ ? एक तो मन में जिद (थोडा गुस्सा भी) थी कि वोट करेंगे तो बिना रजिस्टर किये और अपने ईमेल पते से किसी को कमाई न करने देंगे । इस जिद में थोडा खून जला क्योंकि मन तो कर ही रहा था वोट करने का । फ़िर जब जब वोट करने के लिये फ़ारवर्ड ईमेल के जरिये संदेश आये, थोडा खून फ़िर जला कि कैसे बेवकूफ़ लोग हैं जरा भी नहीं समझते कि कोई इन्हे उल्लू बना रहा है । फ़िर अगर किसी ने गलती से टोक दिया कि भईया वोट डाला कि नहीं तो हमारे शरीर में काटो तो खून नहीं ।


ध्यान दीजिये कि दिन में कम से कम ६०-८० ईमेल आती हैं, कम से कम (नहीं बतायेंगे कि कितना समय) इंटरनेट पर फ़िजूल बिताते हैं । बीसियों स्पाम ईमेल आती हैं, इसका मतलब मेरा ईमेल पहले ही नीलाम हो चुका है । अब ऐसे में जब अठन्नी भी खर्च न होनी थी, तो वोट न करके मैने और कुछ और लोगों ने कौन सा तीर मार लिया ?

मान लीजिये कि ताज को वोट करने में देशवासियों के ४-६ रूपये खर्च भी हो जाते तो क्या होता ? जो पहले से जेब में ५०००-१५००० का मोबाइल धरे घूम रहा है, ४-६ रूपये अगले नुक्कड पर गुटखे में खर्च कर देता या कोक/पेप्सी पी लेता तो उसका स्वास्थ्य भी तो खराब होता । होता कि नहीं? वो तो तब भी बेवकूफ़ बनता है जब १० रूपये की काफ़ी कैफ़े डे में २०० रूपये में पीता है । क्या तब वो बेवकूफ़ नहीं बनता जब वो दिन भर घर पर स्कूल से भागकर क्रिकेट देखता है ?

जब हम दिन में हजार बार बेवकूफ़ बन ही रहे हैं तो हमने मुफ़्त में या ४-६ रूपये खर्च करके अपना आत्मसम्मान बढाने या फ़िर फ़ील गुड करने का एक मौका खो दिया । वो तो अच्छा हुआ कि मेरे वोट के बिना भी ताजमहल सात अजूबों में शामिल हो गया वरना पता नहीं कितने दिनों ये दुख कलेजा दुखाता रहता ।

किसी ने सही ही कहा है, फ़ालतू कि बात में ज्यादा दिमाग न लगाना चाहिये ।

आप कैसा महसूस कर रहे हैं, क्या आपने वोट दिया था ?
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जो लोग अब भी आधारभूत सिद्धान्तों, व्यक्तिगत सोच, वैचारिक तर्क और ब्ला, ब्ला, ईटा, बीटा, न्यू, गामा आदि तर्क देकर खुश हो रहे हों, उन्हे साधुवाद । आप बहुत बडा दुख झेलने से बच गये । वरना मेरे लिये आज की रात तो बस बोतल का ही सहारा है :-)

3 टिप्‍पणियां:

  1. भाई हमने तो ताज को वोट दिया और हम खुश भी है। चलिये इसी बहाने ताज पर आपके विचार भी जान गए।

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  2. सात तारीख के सात अजूबों पर लिखी सात चिट्ठियों का अपने संकलन किया और उनका लिंक अपने यहाँ चिपकाया...ये अत्यंत शुभ है..
    समझो आपका (आपके ब्लाग का)तो हो गया.......कल्याण :)

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