रविवार, मई 27, 2007

क्या हैं परदेस में भारतीयता के मायने?

डिस्क्लेमर: मैं अपने प्रवासी भारतीयों का बहुत सम्मान करता हूँ और इस लेख के पीछे मेरी कोई भी दुर्भावना नहीं है । ये भी सम्भव है कि यहाँ पर दिये हुये उदाहरण आपको केवल अपवाद लगें तो भी मैं आपसे क्षमाप्रार्थी हूँ ।


जब तक मैं भारत में था इस प्रश्न का कोई औचित्य ही नहीं था लेकिन पिछले कम से कम दो वर्षों से ये प्रश्न मुझे परेशान कर रहा है । एक मौके पर मेरे एक साथी ने यूनिवर्सिटी में भारतीय से दिखने वाले एक विद्यार्थी से पूछा था कि वो भारत में कहाँ से है, तो उसका जवाब था कि वो एक अमेरिकन है और उसका घर कैलीफ़ोर्निया में है । उस समय तो कुछ नहीं लेकिन बाद में मेरे साथी ने तुरन्त उसको ABCD (America born confused desi) की उपाधि से नवाज दिया और इस विषय पर मेरी अपने साथी से भारतीयता और अमेरिकीपन पर लम्बी चर्चा हुयी थी ।

आखिर एक अमेरिकी नागरिक के अपने आप को भारतीय न माननें पर किसी को आपत्ति क्यों ? और यदि वो अपने आपको भारतीय कहे तो भी आप उसे ABCD कहकर उसकी भावनाओं का मजाक बनायें ।

मेरी समझ में प्रवासी भारतीयों की दूसरी पीढियों को अक्सर अनावश्यक ही प्रश्नवाचक नजरों का सामना करना पडता है । पहली पीढी वाले तो अपने आप को खालिस भारतीय समझकर और इस प्रकार का दावा करके खुश हो लेते हैं । उनसे कोई प्रश्न नहीं पूछता क्योंकि वो बडे गर्व से उनकी मेहनत और परदेस में उनके संघर्ष के किस्से सुनाते हैं । उन्हे गर्व होता है कि ग्रीन कार्ड और अमेरिका की नागरिकता के बाद भी वो एकदम भारतीय हैं, हाँ भारत में रहते जरूर नहीं ।

इसके विपरीत दूसरी पीढी जन्म से ही अमेरिकन होती है, एक्सेंट भी बिलकुल अमेरिकन लेकिन फ़िर भी दोनों ओर के लोग (अमेरिकन और भारतीय) उन्हें अजीब सी नजर से देखते हैं । ऐसा नहीं कि उनमें संस्कारों की कमी हो (वैसे ये बताता चलूँ कि संस्कारों का ठेका केवल भारत ने ही नहीं ले रखा है) फ़िर भी कभी कभी वो अपनी जडें तलाशते से दिखते हैं तो कभी अमेरिका की भीड का हिस्सा बनने की कोशिश करते हैं ।

विदेशों में रहने वाले दूसरे मूल के लोगों के इस प्रश्न की प्रासंगिकता और भी बढ जाती है जब हम देखते हैं कि लंदन में ब्रिटिश नागरिक जिनका जन्म ब्रिटेन में हुआ खुद अपने ही देश पर आतंकी हमले करते हैं । इसको हम भले ही एक धर्म अथवा देश विशेष से जोड कर देखें लेकिन इसकी परिभाषा व्यापक है ।

इसका कारण समझने के लिये मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ; आप ६० और ७० के दशक में अमेरिका आने वाली प्रथम भारतीय पीढी के बारे में सोचिये । अमेरिकी समाज के "मेल्टिंग पाट" में मेल्ट होना उनकी एक जरूरत थी । एक बार की भारत यात्रा का खर्चा ३००० डालर, २-३ डालर प्रति मिनट की दर पर भारत में फ़ोन करना, भारतीय सिनेमा और संगीत के लिये उन दुकानों की ओर तकना जहाँ फ़िल्मों और संगीत की घटिया रेकार्डिंग वीडीयो कैसेट पर किराये पर मिलती थी ।

इसके विपरीत अगर आज आप भारत में अमेरिका की तरह और अमेरिका में विशुद्ध भारतीय जीवन बिताना चाहते हैं तो किसी भी बडे शहर में आपको कोई तकलीफ़ नहीं होगी । अमेरिका में बिजली और फ़ोन के कनेक्शन के लिये भी आप हिन्दी, उर्दू और गुजराती में फ़ोन पर बात कर सकते हैं । जिस दिन भारत में "धूम २" रिलीज हो उसी दिन अमेरिका में फ़र्स्ट डे, फ़र्स्ट शो देख सकते हैं; भारत फ़ोन करना तो इतना सस्ता हो गया है कि पूछिये मत । अपने कम्प्यूटर से सारी जानकारी अपनी पसन्द की भाषा में ले सकते हैं । इसको ग्लोब्लाइजेशन कहिये या "वसुधैव कुटुम्बकम" लेकिन ये सत्य है ।

क्या आज के दौर में देश और नागरिकता के मायने गौण हो गये हैं ?


मैं दो साल तक अपनी यूनिवर्सिटी के "भारतीय छात्र संगठन" से जुडा हुआ था और मैने अनुभव किया कि यहाँ पर पिछले काफ़ी दशकों से रहने वाले प्रवासी भारतीय नये भारतीय छात्रों की सहायता के लिये सदैव तत्पर रहते हैं । किसी भी कार्यक्रम को आयोजित करने के लिये धन की कमी तो कभी भी आडे नहीं आयी । क्या ये उनकी भारतीयता का एक पहलू नहीं है ? अथवा ये उनकी अपनी जडों से अलग होने की टीस है ?

ये प्रश्न एक बार फ़िर उठा था जब मैं एक प्रवासी भारतीय परिवार के घर एक उत्सव में आमन्त्रित था । एक महोदय (जो पिछले लगभग तीस साल से यहीं पर बसे हुये हैं) ने बडे गर्व से कहा कि उनके पुत्र और पुत्री भारत में रहने वाले आजकल के नौजवानों से अधिक भारतीय हैं । मेरी उन सज्जन से बडी बेबाक बहस हुयी थी और ये उनका बडप्पन और उनके खुद के विचारों के प्रति ईमानदारी ही थी कि ऐसी चर्चा संभव हो सकी थी । मैं उनसे सहमत नहीं था और अन्त में हमने कहा कि "हम सहमत हैं कि हम असहमत हैं" और बिना किसी मनमुटाव के अपने अपने घर चले गये ।


सबसे पहले मैं उन सज्जन के विचार आपके सामने रखता हूँ,

उनके पुत्र/पुत्री आम अमरीकी बच्चों की तरह पार्टी नहीं करते, माता पिता की आज्ञा का पूरा सम्मान करते हैं । उनके बच्चों ने आर्यसमाज मंदिर में "वेदों के ऊपर आख्यान" सुने और समझे थे, उन्हे भारतीय खाना बहुत पसन्द है, भारतीय शास्त्रीय संगीत में रूचि है और उनके पुत्र ने तो विधिवत सितार बजाना भी सीखा है । उनकी पुत्री "भरतनाट्यम" की शिक्षा ले रही है । पिछले वर्ष वो भारत यात्रा पर गये थे और वहाँ के नौजवानों के नैतिक पतन और "माल कल्चर" से उन्हे बडी ठेंस लगी थी । उन्होने भी मैकाले को गरियाया था और भारत में पुरातन गुरूकुल टाईप के शिक्षापद्यति के पक्षधर थे । इस बात का वहाँ बैठे हुये कुछ लोगों ने समर्थन भी किया था । क्या भारतीयता के मायने केवल यही हैं ?

मुझे बहुत सारे ऐसे प्रवासी भारतीय मिले हैं जिनके विचार परस्पर विरोधी हैं । एक प्रकार के लोग केवल भारत की खामियों के बारे में बात करना चाहते हैं । राजनीति, गुन्डागर्दी, शरीफ़ आदमी की समस्यायें, प्रदूषण, भीड, रोजगार सम्बन्धी समस्यायें और पता नहीं क्या क्या । स्पष्ट तौर पर या तो वे भारत में बहुत सताये गये हैं या फ़िर इस तर्क के द्वारा अपने अमेरिका आने के फ़ैसले को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं । दूसरे प्रकार के लोग इसके एकदम विपरीत होते हैं । भारत की जरा सी बुराई नहीं सह सकते, जातिगत अस्पृश्यता की बात हो तो अमेरिका के नस्लभेद का उदाहरण, जरा जरा सी बात पर अपनी संस्कृति का उलाहना और इसी प्रकार की बातें ।

क्या भारतीय होने के लिये राग दरबारी के "वैद्यजी" के किरदार की समझ जरूरी है ? अगर ऐसा है तो भारत में रहने वाले कितने ही भारतीय भारतीय नहीं रहेंगे । भारतीयता को किसी भाषा अथवा धर्म के संदर्भ में तो परिभाषित किया ही नहीं जा सकता । तो फ़िर क्या है ये भारतीयता ? अमेरिका के जन्मास्टमी आयोजन में दांडिया करके, दीवाली और होली पर भारतीय परिधान पहनने से, ए. आर. रहमान और जगजीत सिंह के कार्यक्रम में जाकर या शास्त्रीय संगीत सीखकर आप मेरी नजर में भारतीय नहीं हो जाते ।

कम से कम आज मेरी राय में: "भारतीयता के मायने भारत की साहित्यिक, सांस्कृतिक और कलात्मक चमक दमक भी हैं और भारतीय कहलाने के लिये आपको भारत की खामियों के लिये भी जिम्मेदारी दिखानी पडेगी ।"

10 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी4:23 pm

    आप्रवासी भारतीय होना भावनाओं की रोलर कोस्टर राइड है। आप के द्वारा दी गई लगभग सभी बातों से हो कर गुजरें हैं। अभी कल सोनी पर इंडियन आईडोल देख रहा था। एक लड़का जो चेहरे से चाईनीज़ लगता था आया व एक दम सही हिन्दी में गाने गाए नाम था - मीयेंग चांग। उसके बारे में जरा यहाँ पढ़िए

    So, now we meet someone, we wanted to meet like for million years… the love of many of me gals on this very site – Meiyang Chang! Dentist by profession and Chinese by ancestry… Meiyang informed us that he was third generation Chinese settled in India.

    ...........

    Oh, I love this guy already! He won’t win though, because for hi to win, people would need a very broad mind and that’s not the case as far as majority is concerned! He will be the Chinese contestant – Trust me, I know this! It doesn’t matter how long he is living in India, he will always be the foreigner!

    तो नीरज भैया अभी समय लगेगा सबको अपने frames of reference बदलने में कि कोई चाईनीज़ चेहरे के साथ भी भारतीय हो सकता या फिर भारतीय चेहरे के साथ अमरीकी।

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  2. बेनामी4:25 pm

    अच्छा विचारमंथन है और आपने काफ़ी हद तक निष्पक्ष और संवेदनशील रहने की कोशिश की है। जीवन में कुछ भी ब्लैक एंड व्हाइट नहीं होता है। अपनी दूसरी पीढ़ी के बच्चे को भारतीयों से ज्यादा भारतीय बनाना कोई बहुत अच्छी बात नहीं है, पेड़ पर मछली पालने की इस कोशिश का कोई अर्थ नहीं है। बच्चा एक अच्छा अमरीकी नागरिक बने और भारतीय मूल्यों को खुले मन से समझ सके, उससे जुड़ाव महसूस कर सके, यही बड़ी उपलब्धि होगी, न कि अमरीका में रहने वाले बच्चे को भारतीय बनाने के चक्कर में एबीसीडी बना दिया जाए। अच्छा है।

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  3. बहुत विचार परक आलेख है नीरज. यह ऐसे मुद्दे हैं जो समय, संस्कार और व्यक्ति की सोच पर निर्धारित होते हैं. यह प्रसंग अनेकों बार अनेकों तरीके से सामने आते रहे हैं और आते ही रहेंगे. अच्छा आलेख है.

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  4. आपने जड़ों और उन्हे तलाशने की बात कही है. तो उसकी भी सुन लें. जब ये जड़ें आपके पास होती हैं तो बड़े मीनासिंगली आपसे लिपटती हैं. आपके गले से ऐसे चिपटती हैं कि आपका गला घुटने लगता है. बहुत डिमांडिंग होती हैं ये जड़ें. आज कल अपने मूल स्थान के पास यह मैं महसूस करता हूं.

    और जब ये पास नहीं होतीं तो बेचैनी होती है उन्हें तलाशने की. वह बेचैनी तो आपने व्यक्त कर ही दी है.
    विचित्र होती हैं ये जड़ें!

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  5. अच्छी विवेचना है.
    पहली पीढी के आप्रवासी भारतीय भारतीय समाज की उपज हैं, उनका सोचने का तरीका, प्रतिक्रियायें, पसन्द नापसन्द, मूल्य आदि परोक्ष या अपरोक्ष रुप से भारतीयता से प्रभावित हुआ है.
    दूसरी पीढी के लोग अलग समाज में पले बढे हैं, उनके अभिभावको के संस्कार का कुछ असर पडता है, इस तरह से भारतीय और स्थानीय दोनो घटक मौजूद रहते हैं.
    हममें से हर किसी पर एकाधिक सभ्यताओ का असर पडता है, एम टी वी और अंग्रेजी साहित्य के द्वारा यहां कि संतति पर भी अमेरिकन असर पडता है. अमेरीकी लोग योग के माध्यम से भारतीय दर्शन से परिचित होते हैं, और अलग अलग मूलो का प्रभाव एक ही साथ होने में कोई विसंगति भी नहीं है.
    और अन्तत: यह बात बहुत मतलब नहीं रखती कि आप ज्यादा भारतीय हैं या ज्यादा अमेरिकन. लोकाचार से ज्यादा मतलब व्यक्तिगत नैतिक मुल्यो का है.

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  6. बहुत ही संतुलित और निष्पक्ष लेख।

    शुक्र है कि हम ABCD नहीं हैं और भारत में सुखी हैं। :)

    किसी जमाने में लगता था हाय अमरीका, शमरीका लेकिन बाद में नैट वगैरा के चलते ये सब सामान्य लगने लगा। वहाँ भी हमारी तरह इंसान बसते हैं। मीडिया से, फिल्मों और नैट से इतनी जानकारी तो मिल ही जाती है कि कभी देखना हुआ तो झटका नहीं लगेगा।

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  7. बेनामी7:10 am

    आपका चिंतन पसंद आया.

    पश्चिमी देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है. पहला विदेश में भी भारतीय माहौल खोजता है. भारत को आमतौर पर अच्छा देश मानता है. भारत की आर्थिक तरक्की पर उसे गर्व होता है.

    दूसरी श्रेणी का प्रवासी ये कहने में गर्व महसूस करता है कि उसके इलाक़े में सिर्फ़ गोरे रहते हैं. शहर के देसियों वाले इलाक़े को 'घेटो' बताते हुए उसका मुखमंडल ऐसा रूप अख़्तियार कर लेता है, मानो अब बस थूकेगा ही! हॉलीवुड की फ़िल्मों के अमरीका के साथ ही भारत में रिलीज़ होने, आइपॉड-ब्लैकबेरी भारतीय बाज़ारों में भी आसानी से मिलने, भारतीय प्राइवेट सेक्टर के अधिकारियों को पश्चिमी मानदंडों के अनुरूप वेतन-भत्ते मिलने, दिल्ली-मुंबई के बच्चों के बढ़िया अंग्रेज़ी बोलने, अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थलों पर बड़ी संख्या में भारतीय सैलानियों की उपस्थिति, और बुश-ब्लेयर-मर्केल जैसे इंटरनेशनल लीडरों के मुख से उदयीमान भारत की तारीफ़ जैसी बातें उन्हें फ़्रस्ट्रेट करती हैं.

    -बेनाम

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  8. भारतीयता एक सनातन जीवनशैली है. जो भू-भाग और काल-परिवेश से परे है. जहां भी प्रकाश(भा) की खोज (रत) में प्रयास हो रहा है,वहां भारत है. जो भी सत्य की खोज कर रहे हैं वे भारतीय हैं. वसुधैव कुटुम्बकम् कहना आसान है, जीना बहुत मुश्किल है.

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  9. aisa kuch likho ki mere bhi samjh main aye;)

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  10. mujhe lagta hai ye neeraj kisi hindu ki santaan na hokar kisi vishesh prani ki santaan hai, jo hinduo ke liye itna keh kar bhi zinda hai

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