बुधवार, मई 02, 2007

चलो कुछ तो मेहनत सफ़ल हुयी ।

आज अपने लेपटाप के बहाने से आपसे कुछ बाते करते हैं । ये तब की बात है जब हमने अगस्त २००४ में ह्यूस्टन नगर के राइस विश्वविद्यालय में दाखिला लिया था । घर से चले थे तो पिताजी ने ढेर सारे डालर हंसी खुशी हमारे हवाले कर दिये थे । हमने कहा था कि वहाँ जाते ही पैसे मिलना शुरू हो जायेंगे पर माताजी ने कहा इतनी खुशी से तुम्हारे बापू दे रहे हैं तो मना क्यों कर रहे हो ? और परदेस में तो पता नहीं कब कैसी जरूरत आ जाये । हमने भी कहा कि "मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है?" और वैसे भी पिताजी की अंटी से कुछ ढीला होना बडे सौभाग्य की बात है ।

यहाँ आते ही खूब खातिर हुयी, सबसे पहले हमारे विभाग वालों ने १५०० डालर हमारे हाथ में रख दिये, हमने पूछा कि ये क्या है तो बोले कि ये मुँहदिखायी की रस्म है (ट्रेवल एलाउंस) । जिन्दगी में पहली बार इतना पैसा और खर्च करने के लिये बाजार नहीं जा सकते (भाई कार नहीं थी न हमारे पास) । हम मन मसोस कर रह गये । खैर कुछ दिनों के बाद हमारा जन्मदिन आया और हमारे रूममेट भाईयों नें एक कार वाले भईया को पटा लिया । हम भी भोलेपन में फ़ंस गये, पता ही नहीं था कि यहाँ जन्मदिन पर बाकी लोग खर्चा उठाते हैं । जन्मदिन के बहाने भी हम कुल मिलाकर मात्र ९० डालर ही खर्च कर पाये (छ: लोगो का खाना) । हमें बडी कोफ़्त हुयी कि बडी ही सस्ती जगह है अमरीका, हम चाहकर भी पैसे खर्च नहीं कर पा रहे हैं ।

तभी हमारे दिमाग के खाली भाग में घंटी बजी, सोचा जब इतना पैसा है तो क्यों न एक लेपटाप खरीद लिया जाये । बार बार कम्प्यूटर रूम जाने का टंटा ही खत्म और कमरे में बैठकर मस्त टाइमपास करेंगे । अब हम भी पूरे हीरो थे, न किसी से पूछा न ताछा और खट से १६०० डालर का एक एच. पी. का लेपटाप आनलाइन खरीद लिया । वो इतनी महँगी मेरी पहली खरीद थी । बाद में लोगों ने बताया की अमरीका में हर चीज के छत्तीस दाम होते हैं, और कुछ लोग चीजों के सस्ते दाम ढूँढने में महारथी होते हैं । मेरे भी एक मित्र ऐसे ही हैं, मैं उन्हे बाजार का बादशाह कहता हूँ । उनके पास हर सामान का कूपन या डील होती है । खैर फ़िर वापस आते हैं लेपटाप पर, जैसे की होस्टल की प्रथा होती है, हर नये कम्प्यूटर की नथ एक विशेष प्रकार की फ़िल्म देखकर उतारी जाती है; ठीक वैसा ही यहाँ भी हुआ । वो लेपटाप लगभग दो साल हमारा साथ निभाकर खुदा को प्यारे हो गये ।

जैसा कि हर दूसरी शादी के साथ होता है, नये लेपटाप ने हमारा काम तो संभाल लिया लेकिन हमारा दिल उस मुर्दा पुराने लेपटाप में ही फ़ंसा रहा । दोस्तो की सलाह पर भी हमने उसका अंतिम संस्कार नहीं किया, उसे कलेजे से लगाये रहे । दिन बीते, महीने बीते और ख्याल आया कि क्यों न लेपटाप के मुर्दा शरीर पर कुछ शोध किया जाये । हम पेंचकस लेकर बैठ गये और उसके अंजर पंजर खोल डाले । हमें लगा कि इस मुर्दा मशीन में केवल हार्ड डिस्क ही खराब है, लिहाजा हमने उसे फ़िर से मुर्दा से जिन्दा बनाने की ठान ली । फ़टाफ़ट एक हार्डडिस्क लायी गयी और मुर्दे में जान फ़ूँक दी गयी ।


अब हमने कहा कि जब ये जिन्दा हो गया है तो क्यों न थोडे और प्रयोग कर लिये जायें । लिनक्स पर काम किये हुये लगभग दो-तीन साल बीत चुके थे और सोचा कि इससे अच्छा मौका फ़िर नहीं मिलेगा । इन वर्षों में लिनक्स बहुत तेजी से बदल चुकी थी । हमारे पार फ़ेडोरा कोर ३ (जो उस समय लेटेस्ट थी) और रेडहेट ७ की डिस्क थी, लेकिन अब तो फ़ेडोरा कोर ६, उबन्टू और सुसी का जमाना है । फ़टाफ़ट ये तीनों वितरण अन्तर्जाल से टापे गये और फ़िर सिलसिला प्रारम्भ हुआ एक जद्दोजहद का ।

ये सभी कम्प्यूटर पर आसानी से स्थापित हो गये लेकिन इनमें से कोई भी हमारे बेतार वाले यंत्र (वायरलेस इंटरफ़ेस) में प्राण न फ़ूंक सका । खोजबीन की तो पता चला कि हमारा बेतार यंत्र पुराने जमाने का है और उसको चलाने वाले मंत्र (ड्राइवर प्रोग्राम) लिनक्स वालों के पास नहीं हैं । बहुत हाथ पैर मारे लेकिन नतीजा वोही सिफ़र का सिफ़र । रोज अन्तर्जाल पर समय बिताकर नये नये उपाय खोजना, कभी फ़ेडोरा, कभी सुसी और कभी उबन्टू लेकिन रोज वही नाउम्मीदी ।

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नजर नहीं आती ।

और तो और कुछ लोगों ने तो अन्तर्जाल पर यहाँ तक लिख दिया कि इस मार्का बेतार यंत्र को लिन्क्स पर चलाना नितान्त कठिन है । इस बीच काफ़ी दिन फ़ेडोरा कोर ६ पर तार के साथ अन्तर्जाल चलाया और आईट्रान्स नाम के एक प्रोग्राम से हिन्दी चिट्ठों पर टिपियाया भी और चिट्ठे भी लिखे । ये सब तो ठीक था लेकिन कम्प्यूटर को लेकर न घूम पाने का गम सालता रहा ।


कल देखा कि उबन्टू का नया वितरण बाजार में आया है, "उबन्टू ७.४" । अन्तर्जाल पर बडी तारीफ़ सुनी और सोचा शायद ये ही मेरा तारनहार हो । पहले तो इसने भी हाथ खडे कर दिये लेकिन थोडे से लाड/दुलार और पुचकारने के बाद आखिरकार बेतार यंत्र की बत्ती जल ही गयी । और उबन्टू ने हमारा दिल जीत लिया । हमने सबसे पहले नारद जी को सलाम ठोंका और मनभर हिन्दी चिट्ठे पढे । उबन्टू पर हिन्दी पढने में कोई समस्या नहीं आयी लेकिन हिन्दी लिखें कैसे? अन्तर्जाल पर देखा तो बारहा जैसे प्रोग्राम केवल खिडकी (विन्डोज) के लिये हैं लिनक्स के लिये भी कुछ लिंक मिले लेकिन कुछ मजा नहीं आया । इसका मतलब है कि जद्दोजहद अभी जारी है और लिनक्स को विंडोज के मुकाबले में अभी भी काफ़ी मेहनत करनी है ।


चलिये फ़िलहाल के लिये इतना ही और मेरी बकबक सुनने के लिये धन्यवाद ।

और हाँ अगर लिनक्स पर आसानी से हिन्दी लिखने का कोई तरीका आपको आता हो तो टिपियाकर सूचित कीजियेगा ।

साभार,
नीरज

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बाद में पिताजी को पता चला था कि हमने उनके पैसे कितनी निर्दयता से खर्च (उनकी नजर में उडाये थे) किये थे तो आप सोच ही सकते हैं उनसे फ़ोन पर कैसी बात हुयी होगी :-)

6 टिप्‍पणियां:

  1. नीरज जी, उब‌न्तु व‌ाक‌ई द‌म‌द‌ार है. ह‌म भी अप‌ने कुछ क‌म्प्यूट‌र्स में उब‌न्तु प्रयोग क‌र रहे हैं.

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  2. अब ऐसे फेडोरा-७ (टेस्टिंग) का जमाना है। लिनेक्स में हिन्दी का समर्थन और लिखना विंडोज़ से ज्यादा आसान है। फेडोरा- ६ या ७ में SCIM के द्वारा हिन्दी बहुत बढ़िया और आसान तरीके से लिखी जा सकती है। जहां तक मैं जानता हूं यूबंटू में भी SCIM के द्वारा हिन्दी लिखी जाती है। स्थापित करते समय हिन्दी को जरूर स्थापित करें।
    यदि QWERTY कीबोर्ड में अभ्यत हैं तो ध्वन्यातमक और शब्दलिपी दोनो टाईप कर पायेंगे पर मुझे ध्न्यात्मक अच्छी लगती है। ऐसे इसमें ईंस्क्रिप्ट और रेमिंगटन की बोर्ड भी है।

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  3. सही दिये हो...पढ़ डाले डगर डगर किसी तरह बस.. हा हा... :)

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  4. अमां यार ,
    हम भी बहुत दिनो से लिऩक्स प्रयोग करना चाह्ते हैं
    उबुन्टु की सी डी भी पडी हुई है लेकिन कम्बख्त इन्स्टाल ही नही हो रहा............

    दर असल मैं खिरकी को भी हटाना नही चाह्ता..........

    कोइ रास्ता है क्या??

    यार है तो बताओ ना
    मेरा इ-मेल-ckdutta1@gmail.com है

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  5. वाह भई, मजा आ गया, तुम्हारी लैपटाप गाथा सुनकर। अच्छा लिखते हो, लगे रहो।

    हमारे ब्लॉगिंग मे भी हर तरह के प्राणी है, कोई विन्डोज वाला, कोई लीनिक्स वाला, अब लोग बढ रहे है, मै तो यही कहूंगा कि लीनिक्स वाले आपस मे मिलकर एक छोटा सा ग्रुप भी बना लें और अपना एक छोटा सा ग्रुप ब्लॉग भी। ताकि किसी को लीनिक्स पर दिक्कत आए तो उसे सीधे सीधे उस ब्लॉग पर भेज दिया जाए। क्या कहते हो, लीनिक्स प्राणियों?

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  6. वाह मजेदार रही आपकी लैपटॉप गाथा।

    लिनक्स पर हिन्दी लिखने के बारे में तो रविरतलामी जी सबसे अच्छी तरह बता सकते हैं। हाँ यदि आप फायरफॉक्स इस्तेमाल करते हैं तो उसके लिए एक एक्सटेंशन है Indic Input Extension जिसके बारे में मैंने इस पोस्ट में बताया है।

    और हाँ मैं जीतू भाई से सहमत हूँ। लिनक्स के प्रयोगकर्ताओं के विभिन्न शहरों में LUG (Linux Users Group) तो होते ही हैं तो आप लोग मिलकर एक Hindi LUG बना डालिए।

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