रविवार, मई 13, 2007

व्यवहारिक सम्बन्ध और मित्रता की कसौटी !

काफी अरसे से इस लेख को लिखने का सोच रखा था परन्तु हर बार कुछ न कुछ रुकावट आ जाती थी. आज संभवतः इसे लिखकर ही शयन करूँगा ।

ये तब की बात है जब मेरे एक अभिन्न मित्र से मतभेद के कारण वार्तालाप बन्द हो गया था। गलती किसकी थी ये न तो आज ठीक से याद है और न ही मैं पीठ पीछे किसी पर दोषारोपण उचित समझता हूँ। शायद छः माह तक हमारी बातचीत नहीं हुयी। एक दिन सहसा मुझे एहसास हुआ कि मित्र से बात न करने की जिद की सांत्वना के लिये मैं काफ़ी बडा दण्ड चुका रहा हूँ। अक्सर हम एक दूसरे के सामने आते और सदैव सोचते कि शायद कोई दूसरा फ़िर से हाथ बढा दे। आज इस बारे में सोचता हूँ तो स्वयं के व्यवहार पर शर्म आती है। छ: माह के बाद हमारे एक मित्र ने पुन: दोनों की बातचीत प्रारम्भ करा दी। शायद हम दोनों ही किसी अवसर की तलाश में थे जिसे हम अपने छुद्र अभिमान के कारण छ: माह तक तलाश न कर सके। इस पूरे वाकये का विचारणीय पहलू ये था कि छ: माह के बाद हम दोनों को ही ठीक से इस बात का ज्ञान नहीं था कि हमारे मनभेद किस कारण से हुये थे।

बस दोनो अपनी जिद पर अडे थे कि मैं अपनी तरफ़ से पुन: मित्रता की पहल नहीं करूँगा। दोनों एक दूसरे के बारे में अन्य लोगों से जानकारी लेते रहते थे। शायद हमारी मित्रता समाप्त नहीं हुयी थी, एक दूसरे के लिये घृणा के भाव नहीं थे, हॄदय में कोई कटुता भी नहीं थी। एक दूसरे को दु:ख अथवा हानि पहुँचाने का किसी ने भी प्रयास नहीं किया था। किसी ने ठीक ही कहा है:

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुँजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों ।

अभी कुछ दिनों पहले
महाभारत में द्रोणाचार्य एवं द्रुपद की कहानी याद आयी जब द्रोणाचार्य नें अपने शिष्यों से द्रुपद को बन्दी बनाकर लाने को कहा था। मैनें मन ही मन इस कहानी का विश्लेषण किया तो मित्रता की एक नयी व्याख्या मिली। द्रुपद तो संभवतः द्रोण को अपमानित करके उन्हें भूल भी गये होंगे परन्तु द्रोण द्रुपद को कभी भुला न सके। उनका ध्येय द्रुपद को बन्दी बनाकर उसे अपमानित करना नहीं अपितु अपने पुराने मित्र को पुनः प्राप्त करना था। द्रोण अपने मित्र के कटु व्यवहार के बाद भी अपने मित्र से न तो घृणा कर सके और न ही मित्रता को भुला सके। द्रोण के ह्रदय में मित्रता की सरिता मित्र की अनुपस्थिति में और भी प्रबल होती रही होगी।

महाभारत की इस घटना की मेरी व्याख्या सम्भवत: गलत हो सकती है। मैने अपने जीवन में ऐसे कई उदाहरण देखे हैं जब एक मित्र दूसरे मित्र को केवल इसीलिये क्षमा कर देता है क्योंकि क्षमा करना मित्र से क्रोधित रहने से कहीं कम कष्टकारक होता है। इस विषय पर सोचने पर एक पहलू और सामने आया है। अक्सर व्यक्तिगत सम्बन्धों में सभी समान स्तर पर नहीं होते हैं, अति निकट मित्रों को छोड दें तो बाकी में कोई एक दूसरे पर किसी न किसी प्रकार हावी रहता है। ऐसी स्थिति में मैने अक्सर महसूस किया है कि उनमें से एक सदैव प्राप्ति छोर (रिसीविंग एन्ड) पर रहता है। क्या आपने कभी अनुभव किया है कि कोई एक मित्र दूसरे पर जान छिड़कता है दूसरा उसे कुछ खास भाव नहीं देता है। ऐसे में मित्रता का धागा तब तक चलता है जब तक कोई एक समझौता करता रहता है। ऐसे संबंध में कौन अपराधी है ? ऐसा ही कुछ प्रेम संबंधों में भी देखा जा सकता है।

इसके विपरीत कुछ संबंध ऐसे होते हैं जिनको हम कभी समझ नही पाते। मेरे कुछ मित्र ऐसे हैं जिनसे मेरी वर्षों से बात नहीं हुयी है, लेकिन विश्वास है कि अगर कल उनसे मिलूँगा तो फिर पहले जैसी बेतकल्लुफी होगी। अपने खास दोस्तो को ईमेल लिखना अक्सर छूट जाता है क्योंकि सोचते हैं कि फुर्सत में लिखेंगे, और ये फुर्सत कभी हाथ नहीं आती। कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि आपका मित्र आपको जन्मदिन कि बधाई देना भूल गया और बाद में कभी बात हुयी तो उसका कहना कि उसे तारीखें याद नहीं रहती बेईमानी सा नहीं लगता है। क्योंकि हमे पता होता है कि वो झूठ नहीं बोल रहा है और हम एक हंसी और दो गालियों के साथ बात को वहीँ समाप्त कर देते हैं। ईश्वर करे हम सब अपने मित्रों से प्रेम करते रहें और यदा कदा कभी किसी से भूल हो भी जाये तो उसे "बनिये" की रसीद पर लिखी उक्ति ("भूल चूक, लेनी देनी") की तरह समझ कर क्षमा करें।

5 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा, आत्ममंथन; बधाई.

    ईश्वर करे हम सब अपने मित्रों से प्रेम करते रहें और यदा कदा कभी किसी से भूल हो भी जाये तो उसे "बनिये" की रसीद पर लिखी उक्ति ("भूल चूक, लेनी देनी") की तरह समझ कर क्षमा करें।

    -पूर्णतः सहमत!!

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  2. अच्छी लगी आप की अंतर्ध्वनि ..

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  3. बहुत सही लिखा है आपने दोस्तों से तकल्लुफ़ नही होता,..चाहे जितने साल बाद मिलिए..दोस्ती वैसी ही रहती है,..इसका एक कारण और भी है,जितना पास हम होते है एक दूसरे की कमिओ का पता चलता है और रोज-रोज मिलने से प्यार के साथ-साथ तकरार भी बढ जाती है,.....बस सभी दोस्तों से यही निवेदन है कि इतनी तकरार भी ना हो की बाद में माफ़ी भी ना मांगी जाए,..बहुत अच्छा लेख है,..
    सुनीता(शानू)

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  4. अच्छा लिखा है आपने । कई बार क्षमा की भी आवश्यकता नहीं होती, बस यह सोच सकते हैं कि शायद मैंने गलत समझा, शायद उसका भाव कुछ और रहा हो, या शायद यह क्षणिक गुस्सा है । और फिर हम यदि अधिक परेशान हैं तो पूछ सकते हैं कि वह ऐसा क्यों कह रहा है आदि ।
    घुघूती बासूती

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  5. अच्छा लिखा है..

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