गुरुवार, जनवरी 29, 2009

युनुसजी के लिये जवाबी कव्वाली: कन्हैया याद है कुछ भी हमारी !!!

कुछ दिन पहले युनुसजी ने फ़रीद अयाज कव्वाल की आवाज में "कन्हैया याद है कुछ भी हमारी" कव्वाली सुनवायी थी। आज हम आपके लिये वही कव्वाली फ़रीद के वालिद मरहूम मुंशी रजीउद्दीन की आवाज में लेकर आये हैं। ये रेकार्डिंग १९८८ की है और इस इस कव्वाली में मुंशीजी के बेटे फ़रीद अयाज और अबु मोहम्म्द भी उनके साथ गा रहे हैं।

ये कव्वाली मुंशीजी ने कराची डिफ़ेंस कालोनी की एक प्राइवेट महफ़िल में गायी थी, जिसे मैने कम्प्यूटर पर साउंडकार्ड से रेकार्ड किया है। ये बडी फ़ुरसत में गायी हुयी कव्वाली है इसलिये आपको थोडा अधिक समय देना पडेगा लेकिन हमारी तरफ़ से आपकी सन्तुष्टि की पूरी गारण्टी, :-)

इसी सीरीज में आगे मुंशीजी की और कव्वालियाँ भी पेश करने का इरादा है जैसे "फ़ूल रही सरसों सकल बन" और "ख्वाजा संग खेलिये धमार" आदि, लेकिन फ़िलहाल अगली पेशकश युनुसभाई के चिट्ठे पर होगी।




कव्वाली के बोल युनुसभाई के चिट्ठे से पोस्ट कर रहा हूँ ।

कन्‍हैया बोलो याद भी है कुछ हमारी,
कहूं क्‍या तेरे भूलने के मैं वारी
बिनती मैं कर कर पमना से पूछी
पल पल की खबर तिहारी
पैंया परीं महादेव के जाके
टोना भी करके मैं हारी
कन्‍हैया याद है कुछ भी हमारी
खाक परो लोगो इस ब्‍याहने पर
अच्‍छी मैं रहती कंवारी
मैका में हिल मिल रहती थी सुख से
फिरती थी क्‍यों मारी मारी ।
कन्‍हैया कन्‍हैया ।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. लाजवाब भाई, मस्ती आगई आज तो.

    रामराम.

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  2. यार नीरज ! तुम्हारे कर्ज़दार रहे .

    फ़रीद अयाज की आवाज में इसे पहले भी कई बार सुना था . पर अपने बेटों के साथ स्व.मुंशी रजीउद्दीन जी द्वारा गाई इस कव्वाली के तो क्या कहने . मुख्य गायक और संगतकारों की कैसी उदात्त सामूहिक स्वरलहरी गूंजती है .

    आभार ! बहुत-बहुत आभार !

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  3. क्या गजब का मोती लाये मित्र, कहां से निकाल कर!

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  4. पहले टिपण्णी दे कर आप का धन्यवाद कर दुं, फ़िर मस्ती से सुन्नुगां, इस को सुनते सुनते ओरो को टिपण्णी भी देता रहू गां.
    आप का धन्यवाद

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  5. नीरज अभी अभी तुम्‍हारी ये पोस्‍ट देखी । इन दिनों व्‍यस्‍तताओं की वजह से ज़रा तांकाझांकी कम हो रही है । बहरहाल शानदार है ये मोती । मुंशी रजीउद्दीन के तुम्‍हारे भेज लिंक मिले । लगता है मुंशी रजीउद्दीन को खोजते हुए हम दोनों एक जैसे ठिकानों की ख़ाक छान रहे हैं । चलो पाकिस्‍तान चलें । वहां की भी खा़क छानें । क्‍योंकि इंटरनेट पर जो था वो तो चुरा लिया ।

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