गुरुवार, सितंबर 02, 2010

शतरंज में मात खाना अब भी दुख देता है !

आज वैसे तो कुछ खास नहीं हुआ। शाम को ९.५ मील दौडने के बाद पिछले हफ़्ते हुये अपने जन्मदिन की खुशी में दोस्तों को छककर बीयर पिलायी और देखते ही देखते रात का ग्यारह बज गया। हमारे धावक समूह के गिने चुने (कोर ग्रुप) लोग बार में रह गये और हमें एक बन्दा शतरंज खेलता मिल गया।

आमतौर पर बीयर बार में टल्ली (हम खुद भी) हुये लोगों से शतरंज खेलना होता रहता है लेकिन उसमें कोई खास मेहनत नहीं करनी पडती। शुरूआती ५-६ दांवो में दूसरे को परखो फ़िर उसका १-२ मोहरा पीट लो, उसके बाद मोहरे से मोहरा बदलो और उसको गलती करने का इन्तजार करो वरना वैसे भी १-२ मोहरा फ़ायदे में हो तो डरना क्या।

खैर आज बात दूसरी रही। आज बरसों के बाद असल में दिमाग लगाना पडा। शुरूआत कोई खास नहीं, हमने उसको सफ़ेद मोहरों से खेलने दिया। फ़िर उसने आक्रामक खेल दिखाया लेकिन हमने उसके दो पैदल मार ही लिये। इसके बाद हम उसकी गलती का इन्तजार करते रहे और वो हमारे सिर पर आ गया। हम सुरक्षात्मक खेल रहे थे लेकिन उसके बावजूद हमारे खाने की पहली दो पंक्तियों में उसका हाथी, वजीर और घोडे का जोर लेकिन वो हमारी सुरक्षा को भेद नहीं पाया।

आस पास लोग इकट्ठे हुये और हमें भी लगा कि ये कोई आम बन्दा नहीं है। चुस्त और दुरूस्त होकर खेलने लगे...

हां, उसका नाम ग्राह्म था। उसकी साथी रूबी और हमारी जान पहचान के कुछ लोग रूककर खेल देखने लगे। देखने में हमारी स्थिति कमजोर थी और उसकी भारी लेकिन हमें अपने डिफ़ेन्स पर भरोसा था और विश्वास भी कि २ पैदल से आगे हैं। खैर नाजुक स्थिति में खेल चला और आखिर वो कुछ पीट नहीं पाया। खेल सीरियस हो गया और इसके बाद हमने कुछ मोहरे बदले और स्थिति थी:

सफ़ेद: ऊंट, हाथी, बादशाह और ४ पैदल
काला (हम): ऊंट, हाथी, बादशाह और ६ पैदल

अब तक खेल १.५ घंटा चल चुका था और दोनों की उतर चुकी थी। खेल की स्थिति चित्र में स्पष्ट है। कम रोशनी के चलते काले मोहरे इतने साफ़ नहीं हैं।




इसके बाद हमने एक गलती कर दी और बैठे बिठाये अपने हाथी को पिट जाने दिया। उफ़, खेल के बीच में सुन्दर लडकियों की बात करने से यही होता है :)

और, यहीं बाजी पलटी और २० मिनट बाद उसने हमें मात दे दी। उस एक गलती ने बहुत दुख दिया, खासकर इसलिये कि चलते चलते उसने कहा कि "I almost lost but just got lucky". लेकिन हम दोनों ने माना कि टल्ली हालत में इतना इंटेन्स खेल कई सालों के बाद खेला होगा।

अब वो अगर फ़िर कहीं मिला तो एक खेल उधार रहा । लेकिन बेवकूफ़ी से हारी हुयी बाजी अब भी दुख देती है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. हमारी पीड़ा इस कदर होती है ति जब तक जीत नहीं जाते है, खेलने के लिये टल्ली रहते हैं।

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  2. इतने साल हो गए पापा से एक बार भी बाजी नहीं जीत पाया ....एक बार स्ट्रोंग पोजीशन में था तो उनके एक दोस्त आ गए थे .सो बाजी बीच में छोडनी पड़ी .......
    वैसे बियर थोड़ी कंप्यूटर में डाल देते तो थोडा इधर भी.बह आती

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  3. mujhe chess khelna nahi aata...:(...nice post..aap aur frequently likha kijiye...aapka narration sahi hai 1 dum...:)

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  4. लगता है बिसात काफी तगड़ी थी ।

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