रविवार, अगस्त 01, 2010

हे दईया कहाँ गये वे लोग...

आज पंकज की पोस्ट ने पढते पढते बहुत भावुक कर दिया। वैसे तो फ़्रेंडशिप डे जैसे त्योंहारों की कोई जरूरत नहीं लेकिन अकेलेपन में बैठे बैठे जब पुराने दिनों को याद करते करते आंखे नम हो जायें तो कोई चारा नहीं।

वैसे तो जरूरत नहीं है इन त्योंहारों की लेकिन एक मौका मिल जाता है आंख बन्द करके पुराने दिनों को जीने का और शायद कोई कसक कहीं कम सी हो जाती है।

बाकी भी बहुत यादें हैं जो जेहन के किसी बक्स में बन्द हैं, शायद किसी और रोज निकल के चौंका दें।

खैर, चिट्ठे पर बहुत पर्सनल कभी नहीं लिखता लेकिन शायद ये क्रम जल्दी ही तोडना पडे, तब तक के लिये एक ऐसा नगीना सुनिये जो हमारे दिल के बहुत करीब है।

हाय दईया,
कहाँ गये वे लोग, बृज के बसईया...
न कोई संगी, न कोई साथी...
न कोई सुध का लेवईया...

कहाँ गये वे लोग....

स्वर लहरी फ़िर से मुंशी रजीउद्दीन और उनके बेटों फ़रीद अयाज और अबु मोहम्मद की हैं।

7 टिप्‍पणियां:

  1. यह कोई कम पर्सनल है?! ब्रज (ब्रजवासी) को ले कर कोई गुहार अन्तरमन से ही निकलती है।
    और निश्चय ही वह किसी दिन की मोहताज नहीं है!
    बहुत सुन्दर।

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  2. इतने दिन बाद जागे और उठते ही धमाका कर दिया।

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  3. मित्रता किसी दिन का मोहताज नहीं. इसीलिए हमने किसी को विश नहीं किया. पर इसी बहाने ये सुनने को मिले तो दिन होना भी बुरा नहीं !

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  4. दोस्तों के बारे में लिखना शुरू करो! तब तक हम इसई से काम चलाते हैं।

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  5. मेरी पोस्ट तो बस चन्द यादो का कोलाज था, आप काफी भावुक इन्सान है इसलिये उसमे डूब गये...

    मैने ब्लोग सिर्फ़ अपनी लिखी कुछ टेढी-मेढी कविताओ को एक जगह रखने के लिये बनाया था... फिर अपनी पर्सनल थिन्ग्स लिखकर थोडा हल्का हो जाता था... अब जब ज्यादा लोग जानने लगे है, मै भी पर्सनल चीजो को कहने से कतराने लगा हू..

    आपकी यादो के कोलाज का इन्तजार रहेगा.. और हमारी पोस्ट ने आपको सेन्टियाने की कोशिश की, उसके लिये हमारी मुआफ़ी.. :-( आप अपनी पोस्ट से उसका हिसाब किताब ले लीजियेगा हमसे..

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  6. बहुत अच्छा लगा यह गीत। और यादें भी।
    घुघूती बासूती

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  7. दोस्ती ऐसी ही चीज़ है अच्छे खासे सीरियस लोगो को इमोशनल कर देती है ...चिट्ठे पर पर्सनल नहीं लिखते ...ऐसे रुल मत बनायो यार ..कभी कभी दिल का सुनना भी बेहतर होता है उसे बांटना भी .अब देखो ना इस बहाने हमें एक बढ़िया चीज़ सुनने को मिल गयी

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