गुरुवार, फ़रवरी 19, 2009

उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान की आवाज में पंजाबी कव्वाली (बुल्ले शाह का कलाम) !!!

इस बार पेश-ए-खिदमत है उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान और साथियों की आवाज में एक पंजाबी कव्वाली। मुझे बेहद अफ़सोस है कि कभी पंजाबी नहीं सीखी, मेरा ननिहाल रोहतक में था(है?)। मेरी माताजी पंजाबी बोल/समझ लेती हैं लेकिन कभी उनसे पंजाबी नहीं सीखी इसका बडा रंज है। फ़िलहाल इस कव्वाली का हिन्दी अनुवाद मेरे एक मित्र की सहेली ने किया है। ये बुल्लेशाह का कलाम है और ये एक बडा हृदयवेदी विरहगीत है। इस कव्वाली का लब्बोलुआब(Approximate) कुछ इस प्रकार है :-)



गफ़लत न कर तू, छोड जंगली बसेरा ।
पंछी वापिस घर आ गये, तेरा मन क्यों नहीं करता,
मैं तेरी तू मेरा,
यार जिन्दगी करे कुरबानी जे यार आये एक बार,
इश्क का चर्खा दुखों का पूरिया (पहाड)

मेरी जिन्दगी चरखा सूत काट कर कटी जा रही है।
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।

तेरे पास जो दिल है वो महरूम है, तेरा जो
मेरे लहू में मेरी नस नस में तेरी याद है।
अब तो सजना सब छोड कर आ जा, मेरी निगाह तेरा पता हर आते जाते राही से पूछ्ती है।
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।

चरखा मेरा रंग रंगीला है, तेरी याद मेरे मन में बसी है।
मेरे दुखडे कौन समेटे, मैं तुझे याद करती हूं।
मैं तो जलती रहती हूं, मुझे पता ही नहीं बस जलती रहती हूं।
लोग कहते हैं कि इश्क भूल जा लेकिन इश्क छूटता नहीं,
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।

13 टिप्‍पणियां:

  1. आभार इसे प्रस्तुति का..आनन्द आ गया.

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  2. इस सुन्दर कव्वाली के लिये धन्य्वाद्

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  3. लाजवाब जी. बहुत धन्यवाद.

    रामराम.

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  4. भाई वाह! अति उत्तम!

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  5. बहुत बढ़िया अदभुत इसको सुनवाने का शुक्रिया

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  6. kamal hai, aap ne to kamal kar diya. ham bhi kamal karne ja rahein hai, jo aap sa sath jurne ja rahein hein. ati dhanyawad. lage rahiye. mulakat hoti rahegi

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  7. बहुत आनँद आया तरुण भाई
    - लावण्या

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  8. कितनी सुन्दर दार्शनिकता है बुल्लेशाह की इस रचना में। मैं तो इसे जीव और ईश्वर के प्रेम भाव से जोड़ कर देखता हूं।
    और आपकी पसन्द की तो दाद देनी ही होगी - कहां एक धावक, और कहां यह इत्मीनान से बैठ सुनने का गीत।

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  9. Dr. Jaiveer kaushik9:14 pm

    Aap Ka Anuwad Kai jagah GAlat h

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