शनिवार, जून 23, 2007

एक कविता खोजने का प्रयास!!!

बचपन में (शायद कक्षा ६ में) एक कविता पढी थी । आज उसकी केवल कुछ पंक्तियाँ ही याद हैं । आशा करता हूँ कि ब्लाग जगत में शायद किसी के पास ये पूरी कविता हो, अगर आपके पास इस कविता के बाकी अंश हैं तो अपनी टिप्प्णी अथवा ईमेल से सूचित करें ।

कुटिल कंकडों की कर्कश रज,
घिस घिस कर सारे तन में,
किस निर्मम निर्दय ने मुझको,
बाँधा है इस बंधन में ।

फ़ाँसी सी है पडी गले में,
नीचे गिरता जाता हूँ,
बार बार इस महाकूप में,
इधर उधर टकराता हूँ ।

8 टिप्‍पणियां:

  1. कविता तो नही याद है, शीर्षक शायद 'घड़ा' था।

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  2. मिश्रा जी शायद नही सही पहचाना,घडा ही है

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  3. याद नहीं आ रहा. बता इसलिये दिया कि कहीं भरोसे में न रह जाओ. :)

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  4. मुझे भी पता नहीं है…पर यह कविता जरुर अच्छी है…।इसे प्रस्तुत करने का शुक्रिया।

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  5. kuch na ho toh gooogle maharaj ki sharan main jao...usko sab pata hain...try karke dekh lo waise mil toh jana chahiye......maine try kiya mujhe toh nahi mila:)....aap karo shayad mil jaye:)
    waise mujhe toh peechle saal ke lessons ke naam bhi nahi yaad aapko chatti class ki itni saaro pankityaaaan yaad hain :O
    kya khaaya hain bachpan main?

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  6. oh and on second thought ye kavita kaun hain;)

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  7. कविता का शॅर्षक है घट
    सातवीं क्लास में थी।
    हमको याद भी है पूरी लेकिन नेट पर देखिये पूरी है।

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  8. कुटिल कंकडों की कर्कश रज,
    घिस घिस कर सारे तन में,
    किस निर्मम निर्दयी ने मुझको,
    बाँधा है इस बंधन में।

    फांसी सी है पड़ी गले में,
    नीचे गिरता जाता हूँ,
    बार बार इस महाकूप में,
    इधर उधर टकराता हूँ।

    ऊपर नीचे तम ही तम है,
    बंधन है अवलम्ब यहाँ,
    ये भी नहीं समझ में आता,
    गिरकर मैं जा रहा कहाँ।

    काँप रहा हूँ विवश करूँ क्या,
    नहीं दीखता एक उपाए,
    ये क्या ये तो श्याम नीर है,
    डूबा अब डूबा मैं हाय।

    चला जा रहा हूँ ऊपर अब,
    परिपूरित गौरव लेकर,
    क्या उऋण हो सकूँगा मैं,
    ये नवजीवन भी देकर?
    -- सुमित्रानंदन पन्त

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