गुरुवार, नवंबर 01, 2007

ठ से ठठेरा, ज से शिप

आजकल घर में हर कोई व्यस्त है । मेरी बडी दीदी और उनका साढे तीन वर्ष का पुत्र निकुंज जब से घर में आये हैं हर तरफ़ धूम मची हुयी है । मैं निकुंज से पिछली बार मिला था तो वो १.५ वर्ष का था लेकिन अब तो उससे बातें करते करते ही सभी लोगों का समय बीत जाता है । बच्चों से बातचीत करने में मैं हमेशा से कंजूस हूँ, इस बार अपनी इस आदत को सुधारने का प्रयास भी कर रहा हूँ और सम्भवत: इसी कारण एक नये संसार से जान पहचान बढ रही है । साथ ही साथ एक अजीब सा जैनरेशन गैप भी अनुभव हो रहा है । बच्चों के सोचने समझने का एक अजीब सा ढंग होता है जिसको समझने के लिये आपको भी बच्चे की तरह बनना पडता है तब जाकर १० में से ५ पूर्वानुमान सही साबित होते हैं । लेकिन ये काम बडा मुश्किल है ।

 

आज दिल मचल उठा है किसी बच्चे की तरह,

या तो इसे सब कुछ चाहिये या कुछ भी नहीं ।

इस पर मेरा जवाब है

बच्चे सा जिद पर अडना तो नहीं मुश्किल,

बच्चे सा मासूम दिल पैदा कर तो जानूँ ।

अपना चेहरा नहीं याद मुखौटे बदलते लगाते,

बच्चे सी मुस्कान चेहरे पर ला तो जानूँ ।

घर पर ही निकुंज थोडी बहुत पढाई भी कर लेता है । गिनतियाँ याद कर ली हैं,  A ... Z लिख लेता है और सुना भी लेता है, लेकिन हिन्दी के लिये अभी उसे चित्र वाली किताब की आवश्यकता होती है । कल वो मेरे सामने जब हिन्दी वाली किताब पढ रहा था तो उसने कहा,

क से कबूतर

ख से खरगोश ....

ठ से ठठेरा

ज से शिप...(दीदी ने कहा कि ज से जहाज) लेकिन इसके बाद भी वो १-२ बार ज से शिप ही बोला ।

सम्भवत: इसका कारण है कि टी.वी. और घर में अन्य बातचीत को सुनते हुये जब भी उसने जहाज का फ़ोटो देखा होगा घर वालों ने उसे शिप ही बोला होगा और वही शिप शब्द उस चित्र के साथ उसके मस्तिष्क पर अंकित हो गया होगा ।

मैं हैरान हूँ कि आजकल के बच्चे इतना इन्फ़ार्मेशन लोड कैसे सहेज पाते हैं । साढे तीन वर्ष के बच्चे को मोबाईल, कार, कम्प्यूटर, टी.वी., फ़िल्मी गाने और पता नहीं क्या क्या पता है । बच्चों की हाजिर-जवाबी ऐसी कि आप सोचने पर मजबूर हो जायें । मेरे पास उससे करने के लिये जब बातें खत्म हो जाती हैं तो वो शैतानी पर उतर आता है । बच्चों के डर भी बडी तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं । अकेले कमरे में छोडने की धमकी २ दिन में ही बेअसर हो गयी । मार पिटाई आजकल होती नहीं (हमारे समय में तो पक्का होती होगी :-) ) ।

दिन के समय में घर पर केवल माँ और बच्चे के बीच में कितनी बाते हो सकती हैं ? अगर बच्चा दिन में सो लेगा तो रात को देर तक जागेगा । और दिन भर बैठ कर बच्चे के साथ खेला या बातें नहीं की जा सकती । अगर ये सभी अनुभव मुझे दूर से बिना इनवाल्व हुये देखने को मिलें तो काफ़ी रोचक हो सकते हैं । आजकल के बच्चों के मस्तिष्क पर इस अलग प्रकार की जीवन पद्यति का लम्बे समय में क्या प्रभाव पडेगा ? इतनी सारी जानकारी को सजेहने और दिमागी कसरत से क्या आजकल के बच्चों मस्तिष्क तेजी से विकसित हो रहे हैं ?

अभी तक तो निकुंज केवल घर पर ही है, अगले साल स्कूल में जाने पर जिस प्रकार के दवाब(स्कूल का भारी बस्ता, पढाई के नाम पर रटाई और पता नहीं क्या क्या) उसे झेलने पडेंगे ये सोचकर मैं सिहर सा जाता हूँ । मेरे मन में तो केवल सवाल ही सवाल हैं, छोटे बच्चों के साथ आपके अनुभव क्या कहते हैं ?

अन्त में निकुंज के लिये हुये कुछ चित्र (इनमें वो चित्र भी शामिल हैं, जब उसके शैतानी करने पर मैने हंसी हंसी में उसके हाथ पैर बांध दिये थे और उसके लिये ये नया खेल था । ये अलग बात है कि उसके बाद मेरी माताजी ने मुझे कंस मामा की उपाधि दे दी थी ।)

 

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10 टिप्‍पणियां:

  1. कंस मामा तो आप है जनाब. मासूम निकुंज के साथ यह व्यवहार उचित नहीं है. मेरी तरफ़ से उसे ढेर सारा प्यार.

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  2. माताजी बिल्कुल सही कहती है।बिल्कुल कंस मामा हो आप।
    :)

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  3. कंस मामा की उपाधि तो हमें भी मिल चुकी है भाई, अपने शैतान नटखट प्यार भांजे को ऐसे ही सजा देने के कारण

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  4. अब ऐसा करने पर कंस मामा ही तो कहलाये जायेंगे। :)
    आपने सही कहा आजकल के बच्चे बहुत तेज होते है।

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  5. भाई, कंस की उपाधि तो तब दें जब निकुंज के चेहरे पर वेदना हो। वह तो खिलखिला रहा है!
    जिन्दगी पूरी खिलखिलाहट भरी हो बच्चे की। यही कामना है।

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  6. कंस मामा की हरकतें तो फोटो में जाहिर हो ही रही हैं. निकुंज भी बड़ा होकर जब यह ब्लॉग देखेगा तो समझो, बुढ़ापा आपका नमस्ते करके ही दम लेगा. :) शुभकामनाओं के सिवाय तो क्या कहूँ.

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  7. ठीक कहा आपने नीरज भाई ..बच्चे तो भगवान् का रुप होते है ।
    " किसी मासूम बच्चे के तब्बसुम में उतर जाओ ,तो जानो ।
    खुदा ऐसा ही होता है । ।

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  8. हर मामा कंस मामा होता है. मेरा छोटा भाई तो मेरे और दीदी के बच्चो को पेन चुभा कर बोलता था कि injection लगा रहा हूँ (भविष्य का डॉक्टर जो ठहरा)

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  9. ज से शिप पढकर सोच रहा हूँ कि छोटा सा बच्चा ठ से ठठेरा कैसे समझेगा, हमें तो ठेठ हिन्दी क्षेत्र में रहते हुए ठठेरे के बारे में जाने कब तक पता ही नहीं था।

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  10. का बाबू, कहाँ नुकाए हो इत्ता दिन से?

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