बुधवार, मई 12, 2010

आईये फ़िर कव्वालीमय हो जायें....!!!

बस, आंख बन्द करें और गुम हो जायें...


सखी बाली उमरिया थी मोरी,
मोरे चिश्ती बलम चोरी चोरी,
लूटी रे मोरे मन की नगरिया....

सोमवार, अप्रैल 05, 2010

चले जइयो बेदर्दा मैं रोये मरी हूँ !!!

आज पेश-ए-खिदमत है, पाकिस्तान के मशहूर कव्वाल मुंशी रजीउद्दीन और उनके पुत्रों (फ़रीद-अयाज़ कव्वाल) की आवाज में पाकिस्तान में कराची की एक प्राईवेट महफ़िल की दुर्लभ रेकार्डिंग...

चले जइयो बेदर्दा मैं रोये मरी हूँ...



चलते चलते ये भी बताते जायें कि पिछले शनिवार को हमने उस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया जिसके लिये हम कई महीनों से प्रयासरत थे। हमने इस बसन्त के लिये अपने लिये दो लक्ष्य रखे थे, पहला कि १० किमी की दौड ४० मिनट से कम समय में पूरी की जाये और दूसरा कि ५ किमी की दौड १९ मिनट से कम समय में पूरी की जाये। १० किमी वाले गोल को इस बसन्त दो बार पूरा किया गया और ५ किमी वाले गोल को सिर्फ़ एक बार ही पूरा कर सके। १७ अपैल को हम एक और ५ किमी वाली रेस दौड रहे हैं, शायद उसमें एक बार फ़िर १९ मिनट से कम समय में इसे पूरा कर सकें।

रोडियो रन (१० किमी): ३९:४९
बायू सिटी क्लासिक (१० किमी): ३९:३३
अर्थ डे रन (५ किमी): १८:५१.७
अब हम दिल पे हाथ रखकर कह सकते हैं कि ह्यूस्टन में शौकिया दौडने वालों में हमें भी लोग पहचानने लगे हैं :)

५ किमी वाली दौड की रिपोर्ट अंग्रेजी में यहाँ लिखी है, हिन्दी में लिखकर आप सभी को बोर नहीं करना चाहते थे, ;-)


अब तक बसन्त में हुयी दौडों का व्यौरा:
मेडिकल सेंटर ५किमी (मैराथन के २ हफ़्ते बाद) : १९:४५
बफ़ैलो वालो ६ किमी (क्रास कंट्री, ऊंचा नीचा रस्ता): २५:१०
स्टेप्स फ़ार स्टूडेंट्स ५ किमी : १९:१२ (अपने उम्र वर्ग में प्रथम)
रोडियो रन (१० किमी): ३९: ४९ (पहली बार ४० मिनट से कम समय में १० किमी)
रेस अगेन्स्ट वायलेंस (५ किमी): १९:२९ (अपने उम्र वर्ग में द्वितीय)
बायू सिटी क्लासिक (१० किमी): ३९:३३ (अब तक की मेरी सबसे तेज १० किमी दौड)
अर्थ डे ५ किमी: १८:५१ (अब तक की मेरी सबसे तेज ५ किमी दौड)

मंगलवार, मार्च 30, 2010

माइक्रो पोस्ट !!!

अक्सर मैं शाम को अपनी प्रयोगशाला से निकल कर अपने स्कूल के चारों ओर की परिधि के दो चक्कर दौड़ कर पूरे करता हूँ, उसके बाद स्कूल के व्यायामशाला में स्नान करने के बाद लैब में वापिस आकर कुछ काम अथवा टाइमपास करने के बाद घर रवानगी होती है | आज इस रूटीन से जरा सा भटकने से देखो बुद्धि कैसी खराब हुयी...

दौड़ने के बाद लैब वापिस आये, झोला उठाया और व्यायामशाला की तरफ जाने लगे, उसमे बटुआ रखा और फोन ये सोचकर मेज की दराज में डाल दिया कि जिम मैं कहीं गम हो गया तो...(नया नया महंगा फोन लिया है न :) )|
फिर रास्ते में चलते हुए सोचा कि आज जिम से ही सीधे घर चले जायेंगे और लैब वापिस नहीं आयेंगे, हमारे मन ने इसका पूर्ण समर्थन किया...

उसके बाद जब जिम के दरवाजे पर पंहुचे और माथा पकड़ कर सोचा कि जब नहाने के बाद घर ही जा रहे हैं तो घर जाके क्यों नहीं नहा सकते? बात तो सही है, फिजूल में इतनी दूर आये...लौटे और अपनी चम्पाकली में बैठकर घर की तरफ रवाना हुए, रास्ते में याद आया कि किसी को फोन करना है....फिर माथा पकड़ किया कि फोन तो लैब की मेज की दराज में बंद है....

खैर घर आये, झोला खाली किया तो देखा बटुए के साथ फोन भी पडा मुस्कुरा रहा था....इसे क्या कहेंगे? सब कान्शियश माइंड की उठापटक ?

या फिर, उम्र हो रही है और बुढापे की दस्तक पर बुद्धि काम करना कम कर दे रही है...;)

सोमवार, मार्च 15, 2010

अगर ये पोस्ट अझेल लगे तो दोष दीप्ति को देना !!!

हमने कुछ हफ़्तों पहले लिखा था कि दीप्ति जल्दी ही वैवाहिक बन्धन (कैसा बन्धन?) नहीं नहीं वैवाहिक सम्बन्ध में बंधने वाली हैं। तो दीप्ति की शादी भी हो गयी और उनके पडौस वाली ब्यूटी पार्लर वाली आंटीजी ने उनपर जो अत्याचार किये उसकी भी किस्सा उन्होने यहाँ हिंग्लिश में लिखा है, ;-)

दीप्ति ने कुछ दिन पहले हमें टैग किया था कि हम अपने पसन्दीदा १० फ़िल्मी डायलाग लिखें, तो लीजिये हाजिर हैं बिना किसी वरीयता के क्रम में (स्मृति से):


१) मैं हूँ जुर्म से नफ़रत करने वाला, शरीफ़ों के लिये ज्योति और तुम जैसे गुंडो के लिये ज्वाला। नाम है शंकर और हूँ मैं गुंडा नम्बर वन...प्रभुजी फ़िल्म गुंडा में.



४) आज हमने पहली बार आपको इतने करीब से देखा है, आपको भरपूर पहरेदारी की जरूरत है। फ़िल्म: हासिल

५) You have to get over your first love to be free. (कसम से बडी गहरी बात है) फ़िल्म: हज़ारो ख्वाहिशें ऐसी

६) इस १० मिनट के सीन में अनेको हीरे छुपे हुये हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ में "हे...हे हे...हे" मोहनीश बहल का कहना, "हे प्रेम रिलेक्स, टेक इट ईजी, कूल इट यार"...भारत की Pop जेनरेशन का पहला बीज यहीं से पडा था। उसके बाद मोहनीश भाई एक और बम्पर मारते हैं, "भूखे तो हम भी हैं..." उसके बाद श्री श्री श्री १००८ मोहनीश बहल महाराज एक और ज्ञान देते हैं, "एक लडका और लडकी कभी दोस्त नहीं हो सकते" याद नहीं होस्टल में कितनी बार इस डायलाग को सुना होगा, ;) फ़िल्म: मैने प्यार किया

आज का लौंडा ये कहता हम तो बिस्मिल थक गये, अपनी आजादी तो भैया लौंडिया के तिल में है।
हाथ की खादी बनाने का जमाना लद गया, आज तो चड्डी भी सिलती इंगलिशों की मिल में है।

फ़िल्म: गुलाल

८) तुम्हारा नाम क्या है बसन्ती...

९) हमने आपके पांव देखे हैं, बेहद हसीन हैं; इन्हे जमीन पे न रखियेगा मैले हो जायेंगे । फ़िल्म: पाकीजा

१०) गहने तुडवाओ, गहने बनवाओ और कौडियाँ खेलो (कसम से बहुत दर्द है इस फ़िल्म में)....फ़िल्म: साहिब बीवी और गुलाम...


रविवार, फ़रवरी 07, 2010

बफैलो वालो (Buffalo Wallow) ६ किमी क्रास कंट्री दौड़ ....

आज सुबह एक ६ किमी की क्रास कंट्री दौड़ में भाग लिया गया |  इस दौड़ की ख़ास बात थी कि बजाय सड़क पर दौड़ने के, दौड़ घास और मिट्टी और कीचड (हमारे यहाँ पिछले २ दिनों में खूब बरसात हुयी) से भरी पगडंडियों पर दौड़ी गयी | दौड़ में २ किमी के एक लूप को तीन बार दौड़ना था और हर लूप में २ विकट चढ़ाई थी, मतलब पूरे ६ किमी में ६ चढ़ाइयाँ|

इस ६ किमी की दौड़ को हमने २५ मिनट और १० सेकेंड्स में पूरा किया| हमारे मित्र साइमन ने हमें चुनौती दी थी जिसे स्वीकारते हुए हमने उन्हें इस दौड़ में १५ सेकेंड्स से परास्त किया, उनका समाया २५ मिनट २५ सेकेंड्स रहा | अब साइमन से जब बुधवार को मिलेंगे तो उनकी खूब टांग खींची जायेगी और शायद वो अभी से अगली दौड़ में हमारी वाट लगाने की तैयारी शुरू कर चुके होंगे, ;-)


(With my team members before the race)


(At starting line)




(Looking up ahead for that upcoming hill)







(A nice flat stretch in the race)


(The mean hill and jumping across the nasty mud pit)




(The whole race was run on muddy trail)



(The final sprint. Poor Simon couldn't close the gap and I kept increasing the lead and beat him by 15 seconds in the end)



बुधवार, जनवरी 27, 2010

ह्यूस्टन मैराथन की लम्बी रिपोर्टिंग...

Disclaimer: लम्बी और भावनात्मक पोस्ट


१७ जनवरी २०१० को ह्यूस्टन में एक मैराथन दौड़ का आयोजन हुआ| हम इस दौड़ की पिछले ६ महीनो से तैयारी कर रहे थे | २००९ में इस दौड़ को हमने ३ घंटा और ३८ मिनट में पूरा किया था और इस साल हमारी नजर ३ घंटा और २० मिनट के समय पर थी |

शुक्रवार और शनिवार को हमने जम कर आराम किया और छक कर खाया, शनिवार की रात को दस बजे सोने चले गए लेकिन उत्साह के मारे सुबह २ बजे तक नींद नहीं आयी | हमने अपने आपको समाप्ति पंक्ति पर फर्राटे मारते हुए दौड़ समाप्त करते देखने के सपने देखे और सुबह ४:५० के अलार्म ने हमारी नींद खोल दी | हमारे दोस्त/रूममेट  अंकुर अपने जीवन की पहली हाफ मैराथन दौड़ने की तैयारी में थे | घर से स्नान आदि करने के बाद हमने बाहर निकलकर मौसम का जायजा लिया और कसम से इससे अच्छा मौसम मैराथन के लिए नहीं हो सकता था |  ८-१० डिग्री तापमान और हल्की हल्की हवा...

खैर, अंकुर को रास्ता नहीं पता था तो वो अपनी कार में हमारी कार का पीछा कर रहे थे| हाइवे पर तो हम दोनों लगभग १०० किमी/घंटा पर गाडी चला रहे थे लेकिन जब गंतव्य नजदीक आया तो हमने अपने कार की गति धीमी की और बाकी लोगों की तरह धीमे होकर रुक कर सिग्नल के हरे होने का इन्तजार करने लगे | अचानक हमें जोर का धक्का लगा और हमारी कार का सारा सामन हवा में उछल गया, हमारी छाती स्टेयरिंग व्हील से टकराई और घुटने व्हील के नीचे जोर से भिड गए | २ सेकेंड्स के बाद होश वजा हुए तो पता चला कि अंकुर ने सोचा की गाडी रोकना स्वैच्छिक है और उन्होंने अपनी गति पर विराम नहीं लगाया और हमारी गाडी पर मेहरबानी कर दी| उनके धक्के से हमारी गाडी आगे खडी गाडी से टकराई और आगे वाली कार को भी थोड़ी खरोंच आ गयी | अंकुर की गाडी का अगला हिस्सा और हमारी का पिछला पूरी तरह ध्वस्त हो गया | लेकिन ईश्वर का शुक्र कि किसी को कोई भी चोट नहीं आयी, सिवाय हमारे घुटने में थोड़े दर्द के |

अंकुर की कार का अगला हिस्सा ये रहा:



पुलिस को बुलाकर खबर दी गयी, चूँकि हम तीनो के पास गाडी का बीमा था और अंकुर ने अच्छे इंसान की तरह गलती क़ुबूल कर ली थी, पुलिस आयी और बोली कि आप लोग जा सकते हैं| अब मैराथन शुरू होने में ३५ मिनट शेष थे, अंकुर की गाडी चलने लायक नहीं थी और हमारी रेंगकर चलने लायक थी | अंकुर की गाडी को जब खींचकर ले जाने वाला ट्रक आ गया तो अंकुर ने हमसे कहा कि तुम जाओ और अपनी दौड़ दौड़ो क्योंकि ६ महीने की कठिन ट्रेनिंग बेकार करने का कोई फायदा नहीं है| हम अपनी रेंगती गाडी से धीरे धीरे नियत स्थान पर गए और दौड़ से पहले ही दौड़ते हुए शुरूआती पंक्ति तक दौड़ शुरू होने के ५ मिनट पहले पंहुच पाए |


दौड़ के शुरू होने पर भी हमारा दिमाग ठिकाने पर नहीं था लेकिन हमने सोचा कि अब जो भी होगा दौड़ के बाद ही देखा जाएगा, घुटने का जायजा लिया तो यदा कदा किसी कदम के साथ थोडा सा दर्द था लेकिन कुछ ख़ास नहीं| बार बार अलग अलग ख्याल आ रहे थे और दौड़ पर ध्यान नहीं था| लेकिन शुरुआती ६ मील पलक झपकते ही कट गये | हर साल की तरह इस साल भी ह्यूस्टन निवासी धावकों का हौसला बढ़ने के लिए सड़क के दोनों ओर खड़े थे| मील ५ पर मार्क (Mark) और सेरा (Sarah) ने हमारा नाम लेकर पुकारा और उसके बाद मील ९ पर हमारे दोस्त रामदास हमारा इन्तजार कर रहे थे| अब तक हम भी अपना ध्यान मैराथन पर फोकस करने की कोशिश कर रहे थे, भले ही मानसिक तौर पर हम थका हुआ महसूस कर रहे थे, रफ़्तार के ख्याल से हम अपने गोल पर थे|
आधा रास्ता = १३.१ मील = २१.१ किमी = १ घंटा ३९ मिनट ४० सेकेंड्स = मतलब अपने गोल से २० सेकेंड्स तेज

लेकिन चौदहवाँ मील पूरा होते ही हमारे बांये पैर ने एक झटका दिया, पिछले साल ऐसा ही झटका हमें १८ वें मील पर हमारे बांये पैर ने दिया था लेकिन इस बार चौदहवें पर ही | १६ वें मील तक आते आते तय हो चुका था कि ३:२० हाथ से निकल चुका है और अब दौड़ को समाप्त करना भी मुश्किल दिख रहा था |
मील १ से १४ तक प्रति मील समय: ७:३० +/- १० सेकेंड्स
15 वां मील: ७:५३
१६ वां मील: ७:५२
इस समय तीन धावक जिन्हें मैंने पिछली कई दौड़ों में पीछे छोड़ा था, मुझसे आगे बढ़ जाते हैं|
१७ वां मील: ७:५५
१८ वां मील: ८:०४
१९ वां मील: ८:४८
अब स्थिति बहुत कठिन हो रही है, हमारे मन में २० वें मील पर दौड़ को छोड़कर मेडिकल टेंट में जाकर रुकने का मन कर रहा है| थकावट नहीं है लेकिन पैरों की मासपेशियों में बहुत तनाव है और Cramps हैं,
२० वां मील: ९:०९ (सबसे धीमा मील)
अब हमने अपने आप से कहा कि ३२.२ किमी पूरे हो चुके हैं और केवल आख़िरी दस किमी बचे हैं| थिंक पाजिटिव...When going gets tough, tough gets going.
इस समय हमने सड़क पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश सीनियर को धावकों का उत्साह बढ़ाते देखा, जार्ज बुश सीनियर हर साल यहाँ मौजूद रहते हैं| अब लोग नाम ले ले कर धावकों को उत्साहित कर रहे हैं,
एक व्यक्ति हमें देखता है और कहता है: Man! you are not dead yet. Keep going. Keep going...
अब हमने अगले २-३ मील में दौड़ छोड़ने का निश्चय कर लिया है लेकिन अगले २-३ मील दर्द के बावजूद दौड़ने का मन है...
२१ वां मील: ८:४२
२२ वां मील: ७:५२
अब दर्द अपने चरम पर है और हमने इस आख़िरी मील में जी जान लगाने का निश्चय किया है,
२३ वां मील: ७:०५ (दौड़ का सबसे दर्दीला और सबसे तेज मील): इस २३ वें मील में कुछ ऐसा हुआ कि जिसका मुझे एहसास नहीं था |   


Almost every senior runner talks about that hidden source of energy which is there but inaccessible. They say you have to really dig deep to tap into it. I can say that I felt that hidden source during my 23rd mile. 23rd mile in Houston Marathon is the hardest mile. First, because it is 23rd mile and you are tired; second because it has 3 little hills (overpasses) which slow you down. I ran 23rd mile really well and I was taking down runners ahead of me one by one. At one point, I was running so fast that people on both sides of road simply started shouting and clapping. I will never forget that feeling. 23rd mile was the high point of my marathon and I refused to acknowledge any pain during that mile. And, now I knew that I will definitely finish this race even if I have to crawl on my knees to the finish line.


अब बाकी लोग धीमा हो रहे हैं और मैं एक एक करके धावकों से आगे निकल रहा हूँ| वो तीन धावक जिन्होंने मुझे पीछे छोड़ा था अब केवल २५ मीटर आगे हैं और हर कदम पर में उनके करीब होता जा रहा हूँ...
२४ वां मील: ७:५९
२४.५ मील के आस पास मैं उन तीनो को पीछे छोड़ देता हूँ और अब दौड़ का अंत नजदीक है|
२५ वां मील: ८:२०
अब केवल १.२ मील बाकी है, लोगों की भीड़ चिल्ला रही है और मैं एक एक करके और भी धावकों को पीछे छोड़ रहा हूँ...
२६ वां मील: ८:२०
०.२ मील: १ मिनट २५ सेकेंड्स : अब समाप्ति पंक्ति सामने है, लोग चिल्ला रहे हैं....इस समय मैं अपनी मुट्ठियाँ भींचता हूँ और सब कुछ भूलकर सिर्फ अपने लिए दौड़ता हूँ....इस ३२० मीटर में मैं ५ लोगों को पीछे छोड़ता हूँ और समाप्ति पंक्ति मेरे सामने है....

२६.२ मील: ३:२६:२३....पिछले समय (२००९) से १२ मिनट का सुधार 


मैराथन वेबसाईट के हवाले से: आख़िरी ७.५ मील में मैंने ७४ धावकों को पीछे छोड़ा और २५ धावक मुझसे आगे निकले...


मैराथन की कहानी चित्रों की ज़ुबानी:

























                     
























          (जी हाँ, मर्द को भी दर्द होता है और बहुत होता है. Really bad cramps in both legs)
























   ( जब तक है जान, जाने जहां मैं दौडूंगा... ;-))
















































      (अब किसमे दम है जो हमसे आगे निकले)



लगे हाथों वीडियो भी देख लो, देखें इसमें हमें कितने लोग खोज पाते हैं....(बाईं तरफ हाफ मैराथन वाले है, हम दांयी तरफ बड़ी तेजी से आते हुए दिखेंगे :-) )



मंगलवार, जनवरी 26, 2010

रविवार, जनवरी 17, 2010

Athlete Alert

Event Information:
Event: 2010 Chevron Houston Marathon
Runner: Neeraj Rohilla
Latest Results:
Location Time Pace/mile
10km0:47:217:37
Half-Marathon1:39:497:36
30km2:23:497:42
Finish3:26:237:52

All times are unofficial. Times may vary in post race official results.

ऐसे तो आपके चिट्ठे पर कुछ भी छप जायेगा

ये पता बदल दीजिये

Athlete Alert

Event Information:
Event: 2010 Chevron Houston Marathon
Runner: Neeraj Rohilla
Latest Results:
Location Time Pace/mile
10km0:47:217:37
Half-Marathon1:39:497:36
30km2:23:497:42

All times are unofficial. Times may vary in post race official results.

Athlete Alert

Event Information:
Event: 2010 Chevron Houston Marathon
Runner: Neeraj Rohilla
Latest Results:
Location Time Pace/mile
10km0:47:217:37
Half-Marathon1:39:497:36

All times are unofficial. Times may vary in post race official results.

Athlete Alert

Event Information:
Event: 2010 Chevron Houston Marathon
Runner: Neeraj Rohilla
Latest Results:
Location Time Pace/mile
10km0:47:217:37

All times are unofficial. Times may vary in post race official results.

शनिवार, जनवरी 16, 2010

TEST: Houston Athlete Alerts

01/16/2010 18:12

CONFIRMING Houston Athlete Alerts address nrohilla.rohilla@blogger.com.

Alert messages will be sent to this address for
Neeraj Rohilla (bib 2113).

ताकि सनद रहे....

पिछले कई महीनों में लगभग १००० किमी दौड़ने के बाद इम्तिहान की घड़ी आ गयी है | कल ह्यूस्टन मैराथन है और उम्मीद है की हम अपने पिछले समय ३ घंटा ३८ मिनट को सुधार कर इस बार ३ घंटा और २० मिनट में इस दौड़ को पूरा करेंगे...

बाकी जानकारी और दौड़ की रिपोर्ट कल दी जायेगी...

www.chevronhoustonmarathon.com

शनिवार, दिसंबर 05, 2009

तस्वीरें कुछ बोलती हैं।

जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में बताया था कि आज हमें एक दस किमी की दौड में भाग लेना था। सुबह उठकर देखा तो कार के सभी शीशों पर बर्फ़ की मोटी परत जमी हुयी थी। जब खुरचने से नहीं उतरी और देर हो रही थी तो उस पर पानी डालने का सोचा। पानी डालने से खतरा था कि शीशा चटक सकता था लेकिन जल्दबाजी में इस खतरे को उठाया और धीरे धीरे बर्फ़ को खुरचकर शीशे को साफ़ किया। इतने में ठंड के मारे हाथ दर्द करने लगे थे...मेरी दर्द में आऊ आऊ करने की आदत है, बचपन में भी चोट लगने पर आंसू नहीं निकलते थे बस हाथों को झटकते हुये आऊ आऊ करता रहता था।

आज जब हाथों में जबरदस्त ठंड लगी तो आऊ आऊ अपने आप मुंह से निकल गया। खैर २० मील दूर जाकर देखा तो इक्का दुक्का लोग ही आये हुये थे। लेकिन आयोजकों ने कहा कि दौड जरूर होगी। थोडी देर में बाकी लोग भी आ गये।

ठीक सुबह ७:३० बजे -४ डिग्री तापमान में दौड शुरू हुयी। हमने एक टीशर्ट के ऊपर ट्रेकिंग जैकेट पहनी हुयी थी। लेकिन अपने दौडने वाली निक्कर पहनने के चलते अब घुटने आऊ आऊ कर रहे थे। प्रारम्भ पंक्ति के पास एक हीटर रखा था, जिससे दौड से पहले सब हाथ-पैर सेंक रहे थे। गोली की आवाज के साथ दौड शुरू हुयी और आधे मिनट में ही हीटर की गर्मी रफ़ूचक्कर हो गयी। आधे मील तक आते आते महसूस हुआ कि पैर के अंगूठे और उंगलियाँ एकदम पत्थर जैसे लग रहे हैं। खैर हम कदम आगे बढाते रहे।

पहला मील: ६:३० मिनट (आशा से थोडा तेज)

ये चूंकि छोटी दौड(~३०० धावक) थी इसलिये पहले मील में ही सबका स्थान तय सा हो गया था। हमने गिना तो हम दसवें नम्बर पर दौड रहे थे। हमने २ धावकों को मार्क किया जिन्हें पछाडने का अगले ५.२ मील मे प्रयास किया जायेगा। उनमें से एक को हमने चौथे और दूसरे को पाँचवे मील पर पीछे छोडा। अब हम आंठवे नम्बर पर थे और हमारे आगे वाला धावक अपने हाथ झटक रहा था और बार बार पीछे देख रहा था। हमने सोचा कि मौका अच्छा है देखते हैं किसमें कितना दम है, हमने थोडी रफ़्तार बढाई और उसके बराबर आ गये। अब सब कुछ उसे करना था। इसे हमारी भाषा में Shaking a runner कहते हैं। थोडी सी रफ़्तार बढाकर दूसरे धावक को उत्तेजित करना होता है। इसमें कभी आप सफ़ल होते हैं और कभी असफ़ल...

नये खिलाडी तुरन्त अपनी रफ़्तार बढाकर आपसे आगे निकल जाने की कोशिश करता है और ऐसे में कभी कभी वो अपने को ज्यादा थका लेता है। जिसका फ़ायदा आपको अगले मील में मिलता है। घाघ टाईप के धावक आपकी तरफ़ मुस्कुराते हैं और अपनी गति पर दौडते रहते हैं। अब चूंकि उसके बराबर आने में आपने अपनी गति बढाई होती है, अगर दूसरा बन्दा आपकी चाल में न फ़ंसे तो आप खुद अपने आप को हांफ़ते हुये पाते हैं और पासा उल्टा पड जाता है।

खैर, वो हमारी चाल में आ गया और छठे मील से थोडा पहले हमने उसे पीछे छोड दिया।

कुल समय: १० किमी ४१ मिनट में
पिछला बेस्ट समय: ४१ मिनट १८ सेकेंड्स
इस लिहाज से १८ सेकेंड्स का सुधार।

Overall: 7th position
Age Group (Male 25-29): 2nd position (मतलब ईनाम मिला)

अब आप फ़ोटो भी बांच लो....


(दौड की समाप्ति के बाद भी बर्फ़ पिघली नहीं थी)



(दौडने के बाद काफ़ी पीते हुये, और ईनाम लेते हुये)



(ईनाम का क्लोजअप)

शुक्रवार, दिसंबर 04, 2009

ह्यूस्टन में बर्फ़बारी के नजारे!!!

हमने अपनी कल की पोस्ट में ह्यूस्टन के जलील मौसम के बारे में बताया था। वैसे तो आज दोपहर में बर्फ़ गिरनी चाहिये थी लेकिन आज सुबह ७ बजे से ही बर्फ़ गिरनी शुरू हो गयी। आज के दिन ह्यूस्टन ने १९४४ का रेकार्ड तोडकर सर्दी के मौसम में सबसे पहले बर्फ़ गिरने की घटना दर्ज की।

हम जब तक स्कूल पंहुचे तो अच्छी खासी बर्फ़ गिर रही थी, लिहाजा हमने कुछ फ़ोटो और वीडियो भी बनाये। जिन्हे आप यहाँ देखिये...



इसके बाद, कुछ काम किया फ़िर बार बार बाहर जाकर बर्फ़बारी का मजा लिया। उसके बाद फ़ैसला लिया कि इस बर्फ़ में ३ मील दौडा जायेगा। लोगों ने वायदा तो किया लेकिन जब दौडने की बारी आयी तो केवल हम और एक कन्या मोनिका ही पंहुची। खैर ५ मिनट इन्तजार के बाद हम दोनो ने ही दौड लगानी शुरू कर दी। लोग अपनी कार से हमे ऐसे देख रहे थे जैसे दो पागल दौडे चले जा रहे हों। एक-दो लोगों ने अपनी कार का शीशा नीचे करके हमको घर जाने की सलाह भी दी तो कुछ लोगों ने थम्स अप भी दिया। दस्तानों के बावजूद -५ डिग्री की चुभती ठंड में दौडने में लुत्फ़ तो आया लेकिन ठंड भी लगी। ये रहे फ़ोटो जिससे सनद रहे।




इसके अलावा हम कल सुबह ७ बजे एक १० किमी की दौड में भी भाग ले रहे हैं, जहाँ तापमान शून्य के नीचे रहने की सम्भावना है। देखते हैं कल कितने शहसवार इस ठंड में दौडने आते हैं। हम तो जा ही रहे हैं। ये रहा आज अभी का और कल सुबह तक के मौसम की भविष्यवाणी।

कल अगर दौड में हमें कोई स्थान प्राप्त हुआ तो ईनाम के साथ अपनी तस्वीर जरूर चस्पा करेंगे। तब तक आप भी प्रकॄति के इस अद्भुत कारनामे का मजा लीजिये।






























गुरुवार, दिसंबर 03, 2009

जैकेट, घर की सफ़ाई, स्वेटर, बर्फ़ और कुछ यादें....

ग्लोबल वार्मिंग: माई फ़ुट...

पिछले तीन दिन से ह्यूस्टन का जलील मौसम अपने चरम पर है। पिछले रविवार को अच्छी खासी गर्मी कि सुबह की दौड में लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे। अगले दिन सुबह स्कूल जाने के लिये एक पतली सी टी-शर्ट पहनकर घर से निकले और स्कूल तक आते आते हाथ रगडने कि नौबत आ गयी, इतनी ठंड वो भी इतनी जल्दी। फ़िर मंगलवार और बुधवार को ठंड बरकरार रही।

इसमें हमारे जैसे गरीब विद्यार्थियों (जिनके कपडों में सूती टी-शर्ट के अलावा और कुछ शायद ही मिले) को बडा कष्ट होता है। अब २ हफ़्ते के लिये नये कपडे, नहीं नहीं तौबा...

अरे, जब पहली बार भारत से आये थे तो मम्मी ने एक स्वेटर दिया तो था कि कभी कभी गर्मी में भी सर्दी हो जाती है। लेकिन उसको तो पिछले साल के सालाना घर की सफ़ाई अभियान में फ़ेंक दिया था। और उस नीली जैकेट का क्या हुआ? अरे भूल गये पिछली सर्दी में दोस्तों के साथ जब एक बार (bar) में मित्र के डाक्टर बनने की खुशी मनाने गये थे, तो टल्ली होकर जब सुबह बिस्तर पर नींद खुली थी तो टोपी और जैकेट नदारद थी। शायद बार में ही छूट गयी होगी।

अच्छा पुराना ब्रीफ़केस खोलकर देखो, शायद कुछ पडा हो। अरे ये एक जैकेट जैसी चीज तो है, लेकिन इतनी गन्दी है, इसे पहनोगे क्या? ड्राई क्लीनिंग, नहीं यार बहुत दूर जाना पडेगा और फ़िर वहाँ जाने के लिये क्या पहनोगे?

ह्म्म, कुछ लोग गरीबों को कपडें बाँट रहे हैं, शायद वहाँ से....हे राम, नरक में भी जगह न मिलेगी। घर पे वैसे भी शादी के रिश्ते नहीं आ रहे हैं और किसी ने ब्लाग पर पढ लिया तो फ़िर फ़ुल स्टाप। अरे, मैं तो ऐसे ही ब्रेन स्टार्मिंग कर रहा था। तुमने कैसे सोच लिया कि मैं इतना भी गिर सकता हूँ। ऐसा इसलिये सोचा कि पिछले साल एक बार जब घर में रात को खाने को घर में कुछ नहीं भी नहीं था, तो तुम....अरे, छोडो। ये ही गलत आदत है तुम्हारी, पुरानी बातें याद बहुत रखते हो। और, पडौस वाली आंटी ने कहा था कि कभी भी अच्छा खाना का मन कर तो...। लेकिन शाम को ८:३० बजे बिना बताये?
अच्छा छोडो उसे, वो पुरानी बात है। मैं सुधर गया हूँ।

अंकुर से पूछ के देखो उसके पतले दिनों के टाईम का शायद कोई स्वेटर पडा हो। नहीं नहीं, इससे उसे याद आ जायेगा कि अब वो मोटा हो गया है, वैसे भी उसके लिये भी मोटापे के चलते शादी के रिश्ते नहीं आ रहे हैं। नहीं नहीं, ये बिलो द बेल्ट होगा...

अरे, ये क्या है? सचमुच अद्भुत!!! ये कहाँ से आया? पता नहीं, तुमने कब खरीदा? याद नहीं, नहीं नहीं मैने इसे कभी नहीं खरीदा। कहीं ये उसका तो नहीं? किसका? अरे, उसी का, समझो...अरे नहीं, ये तो लडकों वाला रंग है, कहीं गुलाबी या लाल दिख रहा है तुम्हे? तुम्हे भी बहाना चाहिये पुरानी बातें छेडकर याद मुझे कष्ट देने में। नहीं, नहीं मैं तो ऐसे ही...हे हे हे...खामोश, आगे कुछ भी कहा तो अच्छा नहीं होगा।


लेकिन ये स्वेटर यहाँ आया कहाँ से....ह्म्म....हम्म...अच्छा जरा नजदीक से देखने दो। कुछ तो याद आ रहा है लेकिन कुछ पक्का नहीं है। किसी ने गिफ़्ट तो नहीं दिया? हमें कौन गिफ़्ट देगा? हाँ, वो भी है।

फ़िर देखने में नया भी लग रहा है। अरे याद आया....क्या? कुछ महीनों पहले तुमने घर की सफ़ाई कब की थी। लेकिन तब तो ये यहाँ नहीं था? हाँ, लेकिन सफ़ाई क्यों की थी?
क्योंकि समीरलाल जी सपत्नीक ह्यूस्टन आ रहे थेसमीरलाल जी, लाल शर्ट और ब्लैक फ़ुल पैंट वाले...

अरे, कसम से....भगवान भी बडा कारसाज है। उसने हमारी सर्दी का इन्तजाम अगस्त में ही कर दिया था। हमारे गरीबखाने से विदा होते समय उन्होने हमको उनकी पुस्तक "बिखरे मोती" और एक गर्म स्वेटर भेंट की थी। जय हो...चलो अब सब ठीक ही होगा।

कट जायेगा कल का दिन भी जब ह्यूस्टन में २-४ इंच बर्फ़ गिरने की उम्मीद है और हमारा धावक क्लब इस बर्फ़बारी को यादगार बनाने के लिये इसमें दौडने का कार्यक्रम बना रहे हैं।

बर्फ़ से याद आया कि हमने अपने जीवन में पहली बार बर्फ़ पिछले साल देखी थी जब ह्यूस्टन में ११ दिसम्बर को बर्फ़ गिरी थी। उसके फ़ोटो भी लिये थे जो लगा रहे हैं जिससे सनद रहे। अगर कल बर्फ़ गिरी तो उसके भी लगायेंगे। :-)



गुरुवार, नवंबर 05, 2009

घट घट में पंछी बोलता: अनुराग हर्ष की आवाज में !

कुछ दिन पहले पारूलजी ने अपने चिट्ठे पर वीणा सहस्रबुधे की आवाज में कबीर की रचना "घट घट में पंछी बोलता" सुनवायी थी। इत्तेफ़ाक की बात है कि कुछ दिनों पहले मैं भी इसी रचना को अपने चिट्ठे पर पोस्ट करने की फ़िराक में था लेकिन अनुराग हर्ष की आवाज में,


तो लीजिये पेश-ए-खिदमत है:


घट घट में पंछी बोलता

आप ही दंडी, आप तराज़ू
आप ही बैठा तोलता
आप ही माली, आप बगीचा
आप ही कलियाँ तोड़ता

सब बन में सब आप बिराजे
जड़ चेतना में डोलता
कहत कबीरा सुनो भाई साधो
मन की घुंडी खोलता

अनुराग हर्ष की आवाज में:



वीणा सहस्रबुधे की आवाज में:

मंगलवार, अक्टूबर 27, 2009

हिन्दी ब्लागिंग का प्रसार दीप्ति के माध्यम से भी हो सकता है !!!

आज अपने चिट्ठे पर किसी और की पुरानी पोस्ट प्रकाशित कर रहा हूँ। दीप्ति ध्यानी कालेज में हमसे दो वर्ष कनिष्ठ थीं और कम्प्यूटर साईंस की छात्रा थीं। कालेज में शायद ही कभी उनसे बात हुयी हो लेकिन कालेज से निकलने के बाद बातचीत शुरू हो गयी। दीप्ती भी आज की उस युवा पीढी से ताल्लुख रखती हैं जिन्हे बात बात पर पथभ्रष्ट और संस्कृतिविहीन मान लिया जाता है अगर हम अपने व्यवहार से उसको गलत साबित न करें तो। यानि की संस्कृति सम्पन्न सिद्ध करने की जिम्मेदारी हमारी बनती है। खैर ये विषयान्तर हो जायेगा...दीप्ति के चिट्ठे का नाम है Forgot to grow up!!!

एक और महत्वपूर्ण बात ये कि कुछ ही दिनों पहले दीप्ति और अंशुल पुनेथा का विवाह होना पक्का हुआ है और ये दोनो ६ फ़रवरी को अपने दाम्पत्य जीवन का प्रारम्भ करेंगे। दीप्ति और अंशुल को मेरी ओर से ढेर सारी शुभकामनायें।


दीप्ति ने अभी कुछ दिन पहले बडी मेहनत करके हिन्दी में एक पोस्ट लिखी और उस पोस्ट के भावों को संक्षेप में लिखने के स्थान पर मैं उसकी इज़ाजत से पूरी पोस्ट ही यहाँ छाप रहा हूँ। आशा है आगे भी दीप्ति हिन्दी अथवा हिन्दी/अंग्रेजी मिश्रित पोस्ट लिखती रहेंगी।
अगर आपको टिप्पणी देने की इच्छा हो तो दीप्ति की पोस्ट पर ही दें। दीप्ति को इस पोस्ट को लिखने में कई घंटे लग गये और वो सुबह के ४:३० बजे तक लिखती रही। बहुत मेहनती लडकी है, ;-)

आज शुक्रवार की शाम है.....ऑफिस में विशेष काम था नहीं, तो हमारे दिमाग में भांति भांति के विचार आने लगे; जब से नौकरी करना शुरू किये हैं, शुक्रवार नामक इस दिवस ने ज़िन्दगी में एक अलग ही स्थान प्राप्त कर लिया है; शुक्रवार की शाम आते ही मन प्रफुल्लित हो उठता है, आगे दो दिन की छुट्टी है....ऐसे लगता है मानो बस इन्ही दो दिन का इंतज़ार था..अब हम विश्व विजय कर लेंगे....वो सारे काम, जिनका चिटठा लिए हम हफ्तों से घूम रहे हैं; इसी सप्ताहंत में सभी का निर्वाह करके, आनंद और कर्त्तव्य परायणता की चरम सीमा को छू लेंगे...:) अगर पिछले दो सालों पर नज़र डालें तो विरले ही ऐसे सप्ताहंत रहे हैं जहाँ हमने खुद से किये गए कुछ वायेदों को निभाया है; अमूमन शनिवार और रविवार घर पे ही आराम फरमाते हुए, बचे हुए कुछ कामों को थोडा सा अंजाम के और करीब पहुंचाते हुए निकल जाते हैं; किन्तु शुक्रवार की शाम को जो मन मयूर में माहौल होता है..उसमे कोई विशेष अंतर नहीं आया है ..:)...आज ऐसे ही मन में विचार आ रहा था...कि क्या शुक्रवार सचमुच इतना मत्वपूर्ण होता है??? ....सांख्यिकी को अगर ध्यान में रखा जाए तो ९०% लोग ऐसे होंगे जो सप्ताह में इतना काम करते हैं, जिसे की सामान्य ऊर्जा स्तर से इति की ओर पहुँचाया जा सकता है ..और जिसके बाद २ दिन के अविघ्नकारी अवकाश की आवश्यकता नहीं होती....किन्तु हमारा मन मस्तिष्क इस तरह से यंत्रस्थ किया जा चुका है कि अगर ऊपर से निर्देश आ गए की इस शनिवार/ रविवार आपको ऑफिस आना पड़ सकता है, तो हम मानसिक रूप से ही इतने थक जाते हैं कि काम क्या ही हो पाता है....

Ok, as I write this post i realise, that I have lost all my grip over Hindi..:(...framing one sentence is taking more than 2 minutes, which by all standards is too too much, needless to mention the help from some random site and kind souls like N. I remember, there use to be a time when I was more of a Hindi person. Writing in our mother tongue came all very naturally. In addition to scoring highest marks in Hindi literature and grammar ..I use to be an active member of Hindi debate and writing club..:( .English was something which needed efforts, I still remember my first essay in English in class IV....I was disqualified from participating in a district level essay competetion as I committed some gross mistakes in my writing on "The Gulf War"-1991 (mistakes are too embarrassing to be mentioned here..:))....the remainder of this post has to be in Hindi...no matter how much time it takes.... "Shukra hai Shukravaar hai" can take a back seat...I guess I am more tempted to go down the "Hindi" memory lane :)

हमारी पीढी के अधिकाँश उत्तर भारतीय बच्चों की तरह हमारे घर में भी हिंदी का ही वर्चस्व था; हमारी मातृभाषा गढ़वाली है, और अक्सर माँ एवं पिताजी गढ़वाली में वार्तालाप करते पाए जाते हैं; किन्तु रोजमर्रह कि ज़िन्दगी में, और आसपास के वातावरण में भी हिंदी ही सबसे प्राभाव पूर्ण भाषा थी; हमारी माताजी संस्कृत/ हिंदी कि अध्यापिका हैं, दोनों ही भाषाओं में निपुण हैं, एवं पिताजी अलाहबाद विश्वविद्यालय से स्नातक तो हिंदी या यूँ कहिये काफी शुद्ध हिंदी में घर में वार्तालाप हो जाया करता था... मुझे याद आता है जब मेरे भाई बहिन का कक्षा १० का परिणाम आया...और वो अपेक्षा के अनुसार नहीं था; हमेशा की भाँती दोनों समझदार बच्चे सो गए...:) सोये रहेंगे तो पिताजी के प्रवचन कम सुनने मिलेंगे.....पिताजी ने शुध्ध हिंदी में कटाक्ष किया....

" ये पलायनवादी दृष्टिकोण कोई विशेष मदद नहीं करता है जीवन में"..:D
उनके मुह से ऐसे वाक्य अक्सर सुनने मिल जाया करते थे...
" दीप्ति, तुम में व्यवहारिक ज्ञान और विवेक कि कमी है "......
" मेरी बातें तुम्हे अभी कटु लगेंगी, पर बेटा, सत्य यही है कि देर से उठने वाले जीवन में बहुत आगे नहीं जाया करते"
"समय समय पे आत्म विश्लेषण अति आवश्यक है"

ऊपर लिखीं बातों को हमने जीवन में कितना अपनाया, इस पे तो टिपण्णी नहीं करुँगी ....पर घर में शुध्ध हिंदी कोई बहुत दूर कि चीज़ नहीं थी....माताजी अक्सर हमारे गलत उच्चारण को सही कर देतीं थीं.....फूल (phool) ओर फूल (fool) में अंतर करना उन्होने ही सिखाया.....मौसियों और चाचियों ने जब अपने बच्चों के कठिन नामों (जैसे: कनिष्क) को गलत हिंदी में लिखा तो माताजी ने आगे बढ़के "श" और "ष" में अंतर बताया...कक्षा ६ से १० तक, नवीन भारती, पराग, स्वाति (हमारी हिंदी पुस्तकें) के सभी गद्य और कविताओं का भावार्थ, प्रसंग और भी न जाने क्या क्या, को अत्यंत भावपूर्ण तरीके से लिखवाने में माताजी ने कोई कसर न रख छोड़ी ; हमने भी हिंदी में उच्चतम अंक पाके, उनको गौरवान्वित किया....और १ हिंदी अध्यापिका कि सुपुत्री होने का कर्त्तव्य पूर्ण रूप से निभाया..:) खैर, कहने का तात्पर्य ये है कि आसपास अच्छी हिंदी का माहौल था.....कक्षा ११ तक हम हिंदी वाद विवाद प्रतियोगिताओं में न केवल भाग लिया करते थे..बल्कि प्रथम या द्वितीय स्थान प्राप्त करके विद्यालय के गौरव को बढाते थे... (इन प्रतियोगिताओं में शीर्षक कुछ ऐसे होते थे: भारतीय राजनीति में धर्मं का हस्तक्षेप-कितना उचित/ अनुचित) ऐसे विषयों का ६वीं कक्षा में न तो सिर समझ आता था न पैर ..:) ८-१० पन्नों का १ झुंड हमें पकडा दिया जाता था......"बेटा, ये बोलना है...."...हम ख़ुशी ख़ुशी कर्तव्यपरायणता से उसे याद कर लेते थे....और किसी भी प्रतियोगिता में जाके.....मंडल/ जिले के हिंदी विद्वानों के सामने पूरे आत्मविश्वास एवं भावनाओं के साथ उगल दिया करते थे.....(Dias के पीछे hearbeats कितनी तीव्र गति से दौड़ रही होती थीं; इसका अनुमान शुक्र है किसी को कभी नहीं हुआ:) )

आज जब पीछे देखती हूँ तो याद पड़ता है...घर में १ रामायण हुआ करती थी....किसी हिंदी गाइड कि तरह दिखने वाली वो पुस्तक, २-३ भागों में थी.....हमने कक्षा २-३ में....पूरी रामायण (उत्तर रामायण सहित) ऐसे ही यहाँ वहां डोलते हुए पढ़ डाली थी (कहने कि आवश्यकता नहीं है..कि पुस्तक अत्यंत सरल हिंदी में थी)..... थोडा और बड़े हुए तो घर में रखे सभी शिवानी के उपन्यास (शिवानी हिंदी कि १ बहुचर्चित लेखिका हैं- उनकी सुपुत्री मृणाल पाण्डेय कुछ समय पहले तक हिंदी समाचार वाचिका थीं) पढ़ डाले; रुचि का १ कारण ये भी था कि सभी कहानियां/ उपन्यास गढ़वाल/ कुमाऊं का बड़ा ही रोचक वर्णन करते थे;

जब तक हम कक्षा १० में थे, घर में हिंदी अखबार नवभारत टाईम्स आया करता था; अखबार के मुख्य उपभोग्कता हमारे पिताजी थे, जो कि किसी भी दिन हिंदी भाषा से ज्यादा प्रेम/ तालुक रखते थे; स्कूल से आते ही, हम बिना change किये पहले पूरा अखबार पढ़ते....लोकल से ले कर विदेशी ख़बरों तक में सामान रुचि हुआ करती थी....फिर कक्षा ११वीं में ये अहसास हुआ, कि reading an English newspaper would any day be more beneficial:))..तो घर में टाईम्स ऑफ़ इंडिया भी आने लगा.....उसमे भी हमारी रुचि बस सन्डे टाईम्स में ही रहती थी....बाकी का अखबार अक्सर खाना खाते हुए बिछाने के काम आता था या अपनी अलमारी में किताबों के नीचे बिछाने के..:) इसी बीच हमने कहीं Readers' Digest और CSR देख लीं..:)..तो घर में वो भी आने लगीं.....ये दोनों ही बड़े मन से पढ़े जाते थे.... (Readers' Digest deserves a complete post in itself-its one of the most captivating reads I have ever come across).
खैर, हिंदी भाषा से ताल्लुक शायद वहीँ तक था; इधर हम घर से बाहर निकले जीवन में कुछ कर दिखाने के लिए..:P...उधर मातृभाषा से तार टूटने से लगे....इंजीनियरिंग कॉलेज में आके पहले दो साल तो "कुछ भी नहीं पढ़ा"..:D..उसके बाद जब लगा कि अब आगे क्या.......तो MBA रुपी जीव सामने दिखाई पड़ा........बस....तब से जो अंग्रेजी भाषा से नाता जुडा है..आज आलम ये है कि......इस पोस्ट को लिखने में इस साईट से लेके श्री N का सहारा लेना पड़ा......फाइनल इयर में The Hindu , आसपास पायी जाने वालीं सभी अंग्रेजी magazines पढ़ी जाने लगीं.....हर वो लेख जो कि कठिन हो, जिसका सिर, पैर ना समझ आ रहा हो....उसपे शोध होने लगा... TOI का एडिटोरिअल जो मैं पूरे होशो हवास में मुश्किल ही पढ़ती हूँ कभी, पूरी शिद्दत एवं तल्लीन्त्ता से रुचि लेके पढ़ा जाने लगा...

जीवन तो इन सब में पता नहीं कितना सुधरा है....पर इतना ज़रूर है कि....हिंदी से कहीं नाता टूट गया लगता है इस बार घर गए, तो प्रेमचंद की गोदान रखी मिली १ शेल्फ में पूरे जोश से उसे तुंरत बैग में डाला. ..ये पढ़नी है....आज ६ महीने हो गए हैं किताब लाये हुए घर से......मुश्किल से ५० पन्ने पढ़ पाए हैं...:( रुचि पूरी है...पर पढने की गति इतनी चरमरा गयी है कि अब उठाने का मन ही नहीं करता....:( भाषा कोई भी हो..अपने आप में बहुत आदरणीय होती है .....किन्तु मातृभाषा में जब लिखने/ पढने में कठिनाई होने लगे तो कहीं ये बात दिल को अखरती ज़रूर है;
PS:
१. Thanks to N, for being the शब्द kosh for writing this post :)
२. गोदान शीघ्रातिशीघ्र ख़तम कर ली जायेगी.....कितना भी समय क्यूँ न लगे...:)
३. शीर्षक का लेख से कोई सम्बन्ध नहीं है....शीर्षक twitter से उठाये गए कुछ वार्तालापों का मिश्रण है:)
४. पूरे लेख में पूर्णविराम की जगह ";" लगाना पड़ा है...:( ब्लॉग पूर्णविराम दिखा नहीं रहा है पोस्ट :(
ये लेख लिखते हुए सुबह के ४:३० हो गए.....निम्न वर्णित गीत ने काफी साथ दिया tempo बनाये रखने में.....इसे अवश्य सुने.....:)
http://www.youtube.com/watch?v=XJJv83-5EyQ
cheers :)

दीप्ति ध्यानी