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शनिवार, मार्च 22, 2008

परदेश की होली का आँखो देखा हाल !!!

राईस विश्वविद्यालय में भारतीय विद्यार्थी संघ ने हर साल की तरह इस बार भी होली का आयोजन किया । इस प्रविष्टी में हम आपको इस भव्य आयोजन का आंखो देखा हाल तस्वीरों के साथ पेश कर रहे हैं ।

कल रात को हम अपने तीन अन्य मित्रों के साथ बालीवुड की बहुचर्चित फ़िल्म "रेस" देखने गये । फ़िल्म के बारे में फ़िर कभी लेकिन रात को सोते सोते २ बज गये । सुबह १०:२० मिनट पर अलसाई आंखों से नींद खुली और याद आया कि आज तो सुबह १० बजे होली खेलने जाना था । बिस्तर पर ही अजदकी मुद्रा में दो बार पलटी मारने के बाद हाथ में मोबाईल आया । दोस्तों को फ़ोन लगाया तो पता चला कि हम ही सबसे पहले उठ गये थे, कई दोस्तों को दोस्ती का वास्ता देकर होली खेलने जाने को राजी किया । एक पुरानी सी टी-शर्ट, थोडे से फ़टे जूते और एक नया सा पायजामा पहनकर हम होली के रंग में रंगने के लिये निकल पडे ।

मेरे दोनो रूममेट में से कोई भी अपनी कार निकालने को तैयार नहीं था (एक की गाडी में तेल खत्म हो गया था तो दूसरी की में कुछ और गडबड थी :-) )। लिहाजा हमें अपने गरीब रथ को निकालना पडा और दोस्तों को ताकीद की कि कई सारे पुराने अखबार रख लो जिससे कि वापिस लौटते समय कपडे बचें तो सीट पर अखबार बिछाकर बैठ जाना वरना अखबार लपेटकर घर आ जाना :-)

जब कालेज पँहुचे तो वहाँ का दॄश्य अवर्णनीय था । एक बडे से हरे मैदान पर ७-८ लोग खडे होकर भीड जमने का इन्तजार कर रहे थे । हमने दूर से ही हाथ हिलाकर अपने आने का संकेत दिया तो देखा कि वो सभी हाथों में पानी से भरे गुब्बारे और बाल्टी में पानी लेकर हमारी तरफ़ आने लगे । हमने उनको कहा कि थोडा सब्र करो हम खुद ही तुम्हारे पास आये जाते हैं । पहले हमें गुलाल में स्नान कराया गया और उसके बाद ३-४ बाल्टी पानी डाला गया । तब तक मैदान में पानी से कीचड जैसा कुछ नहीं बन पाया था । बदन में थोडी तरावट आ गयी तो हमने भी बाकी लोगों को रंग लगाकर, गले लगाकर होली की बधाईयाँ दी ।

इसके बाद लोग आते रहे और सभी रंग, पानी और पानी भरे गुब्बारों से उनका स्वागत करते रहे । बीच बीच में कुछ विदेशी भी हमारे हल्ले में शामिल हुये और फ़िर जल्दी ही पतली गली से निकल लिये । तभी एकमत (ये हमारा ही था) से निर्णय लिया गया कि इस बार प्राकृतिक रूप से होली खेली जायेगी । पानी के दोनों पाईपों का बहाव मैदान के एक हिस्से पर केन्द्रित करने के उपरान्त थोडे ही प्रयास से मिट्टी और पानी से समागम से गीली मिट्टी कीचड जैसी दिखने लगी । अब चूँकि मिट्टी और पानी दोनो प्राकृतिक तत्व हैं इसमे मिलावट का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता है । सभी लोगों ने ध्वनिमत से हमारी सोच का समर्थन किया और हमें पहला शिकार आता दिखायी दिया ।

हमारे परममित्र होली खेलने सपत्नीक आ रहे थे । उनको मिट्टी में लेटाकर और ऊपर से ढेर सारा पानी डालकर इस महान Environmentally Friendly होली का श्रीगणेश किया गया । देखने लायक बात थी कि उनकी पत्नी ने उनको जमीन पर लेटाने और ऊपर से पानी उडेलने में हम सबका भरसक सहयोग किया । इतने पर पत्नीजी की अन्य सहेलियों ने पत्नीजी को मिट्टी में बैठाकर रंग लगाने का कार्यक्रम प्रारम्भ कर दिया था ।

अब किसी का कभी भी नम्बर लग सकता था । १५-२० लोगों की भीड किसी भी शख्स का नाम ले लेती थी और तुरन्त उसका हैप्पी बर्थडे मन जाता था । हमारे पुराने अनुभव ने हमें बताया कि ऐसे में जितना जल्दी नंबर लग जाये उतना अच्छा होता है । यही सोचकर जब हमारे नाम का उद्घोष हुआ तो हम स्वयं ही कीचड में जाकर बैठ गये, एक हाथ से पानी का पाईप पकडा और अपने आप को गीला कर लिया । आस पास वाले १-२ लोगों ने हम पर ३-४ बाल्टी मिट्टी का पानी डाला और हमारा होली संस्कार सम्पन्न हो गया । इसके बाद हमें किसी का भी होली संस्कार करने का लाइसेंस भी मिल गया था ।

तुरन्त नये नये तरीके आजमाये जाने लगे । दोस्तों को साथ बैठाकर, पति पत्नी को साथ बैठाकर, रिसर्च इंट्रेस्ट के हिसाब से लोगों को बैठाकर सबका होली संस्कार किया गया । मजे की बात थी कि कोई जोर जबरदस्ती नहीं थी :-) सब कुछ एक पूर्ववत घोषित कार्यक्रम की तरह चलता चला जा रहा था । इस प्रकार पानी, मिट्टी, गुलाल, मिट्टी, फ़िर गुलाल, फ़िर पानी और अन्त में कीचड के साथ सबका होली संस्कार सम्पन्न हुआ ।


अन्त में तस्वीरें जिससे सनद रहे ।


(भारतीय विद्यार्थी संघ की अध्यक्षा अनुभा गोयल का होली संस्कार)


(भारतीय विद्यार्थी संघ के उपाध्यक्षा गौतम किमि का होली संस्कार)

(कहीं कोई जबरदस्ती नहीं, सभी पूरी मौज के मूड में थे)

(अब दोस्तों के साथ थोडी जोर जबरदस्ती तो चलती ही है)

(सभी होली की उमंग में घर से हजारो मील दूर, लेकिन सभी एक परिवार की तरह)
हमें उचककर अपना फ़ोटो खिंचवाते हुये देखा जा सकता है :-)

(होली के रंग में देसी क्या और विदेशी क्या सब मस्त थे)
ध्यान दें मेहमानों को पूरे सम्मान से साथ बिना मिट्टी के होली का आनन्द लेने की छूट थी :-)


(मौका मिले और सारी लडकियाँ एक साथ फ़ोटो न खिंचवायें, ऐसा हुआ है कभी? )


(होली खेलने के बाद बढिया मिठाई का मजा ही कुछ और था)


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बुधवार, जुलाई 04, 2007

रसोई: कुछ अनुभव, भ्रम/भ्राँतियाँ, वास्तविकता/छल

भारतीय परिवारों में रसोई महिलाओं का अधिकार क्षेत्र माना जाता रहा है । और महिलाओं ने भी अपने इस अधिकार क्षेत्र की सुरक्षा के लिये कोई कसर नहीं उठा रखी है । खाना बनाने को एक बडी ही कठिन कला समझा जाता रहा है और महिलाओं ने भी इस गलतफ़हमी को दूर करने की कभी कोई चेष्टा नहीं की । और करें भी क्यों जब कोई हमसे कहता है कि पी.एच.डी. करना बडा कठिन है तो हम भी बस मुस्कुरा देते हैं और प्रार्थना करते हैं कि कहीं पोल न खुल जाये । बहुत सारे सरकारी अफ़सरों की अफ़सरी इसी में चलती है कि बस लोगों तो लगता रहे बडा तनावपूर्ण काम है और अगर कार्य थोडा धीमी गति से हो रहे हैं तो इसका कारण है कि उन मुद्दों पर व्यापक सोच विचार चल रहा है ।

जब तक हम भारत में रहे हमारा रसोई में प्रवेश निषिद्ध रहा । हमारा रसोई में घुसते ही माताजी का कहना कि "अरे फ़िर चप्पल पहनकर आ गये !" और कुछ छूने से पहले हाथ धोने का आग्रह हमें रसोई से दूर करता गया । विद्यालयों में पढाई के दौरान "छात्रावास मैस" के भोजन के अनुभवों ने ये मानने पर बाध्य कर दिया कि शायद खाना पकाना बडा ही दुष्कर कार्य है और संभवत: पुरूष ये काम नहीं कर सकते ।

अपने घर और देश से दूर जाते समय हमारी माताजी ने भी कहा था, "हाय राम! इस लडके को तो पानी उबालना भी नहीं आता, इसका क्या होगा ।" पिताजी ने सान्त्वना दी कि बहुत लडके घर से बाहर रहते हैं, कुछ न कुछ सीख ही जायेगा । उस बात को कई साल बीत गये हैं और आज रसोई पर मेरे विचार कुछ भिन्न हैं ।

इससे पहले कि हम रसोई पुराण के कच्चे चिट्ठे खोलें और आपके रसोई सम्बन्धी कुछ भ्रम दूर करें, एक नजर डालते हैं कुछ चित्रों पर; मैने कल १२ लोगों के लिये भोजन पकाया था और ये सभी भोजन ३ घंटे के रेकार्ड समय में तैयार किया गया था । इस भोजन में किसी भी शार्ट कट का प्रयोग नहीं किया गया था और आलू/प्याज/टमाटर/सब्जी सब अपने इन्ही दोनों हाथों से काटी/छाँटी गयी थी ।

(मटर पनीर)

(राजमा)


(आलू टमाटर मटर)

(वैजी बिरयानी, सादा चावल)


(और किसी शक/शुबहे की गुंजाइश न बचे, इसलिये सारे व्यंजन एक साथ )

मेहरबान, कदरदान, साहेबान दिल थाम कर बैठिये क्योंकि आज हम रसोई पर किये अपने शोध के परिणाम आपके सामने रख रहे हैं । इस शोधपत्र द्वारा हम जनसामान्य के मानसपटल पर अंकित कुछ भ्राँतियों को दूर करने का प्रयास भी करेंगे ।

महिलाओं का किसी भी व्यंजन की रैसिपी को छुपा कर रखना, ये न बताना कि धनिया/मिर्च/जीरा/हल्दी आदि कितनी मात्रा में पडता है बल्कि ये कहना कि ये तो अंदाज से डाला जाता है और ये अंदाज वर्षों की मेहनत/परीक्षण का फ़ल है ।
ये कथन पूर्णतया असत्य है । चाहे तो २४ के फ़ान्ट में बोल्ड करके रसोई में चिपका लें । भारतीय मसालेदार भोजन में पडने वाले मसालों की एरर एनालिसिस (Error Analysis) के परिणाम और हर मसाले की एररबार (Errorbar) इस प्रकार हैं ।

अ) धनिया : इसकी मात्रा कुछ खास फ़र्क नहीं डालती है, १ चम्मच की जगह अगर तीन भी डाल दें तो फ़िनिश्ड प्रोडक्ट पर इसका असर बताना नामुमकिन है ।

ब) हल्दी : इसकी मात्रा में ५० प्रतिशत तक फ़ेरबदल किया जा सकता है । कम हल्दी डालेंगे तो रंग अच्छा नहीं आयेगा और ज्यादा डाल दी तो उसको थोडा पक जाने दें । फ़िनिश्ड प्रोडक्ट पर कोई प्रभाव नहीं पडेगा ।

स ) मिर्च : इसमें थोडा संयम की जरूरत है लेकिन जिस प्रकार कैमिस्ट्री के टाइट्रेशन वाले प्रयोग में पिपेट से धोरे धीरे रसायन छोडा जाता है, यहाँ पर भी उसी विधि का प्रयोग करें ।

द) गरम-मसाला: २० से ३० प्रतिशत तक घोटाला यहाँ भी आराम से चल सकता है ।

न) नमक : इसके बारे में तो आप स्वयं जानते हैं, स्वाद-अनुसार

च ) जीरा : १०० प्रतिशत तक फ़ेरबदल कर सकते हैं, जरा ध्यान दें कि जीरा जलकर कडवा न हो जाये ।

छ ) अमचूर/खटाई : नमक की मात्रा में फ़ेरबदल करके इसमें भी ५० प्रतिशत तक का घोटाला किसी को पता नहीं चलेगा ।

लगभग हर सब्जी/दाल/राजमा की सार्वत्रिक "नीरज विधि":

१) तेल गरम करके उसमें जीरा डाल दें ।

२) बारीक कटी हुयी प्याज धीमी आंच पर तलें ।

३) अगर सब्जी में शिमला मिर्च/गोभी/बैंगन आदि हैं तो इस समय डाल सकते हैं । (दाल/राजमा) बनाने के लिये इस चरण को स्किप करें ।
नोट : आलू बहुत जल्दी पक जाते हैं इसलिये थोडी देर से डालें ।

३) सभी मसाले अपने स्वाद अनुसार डालकर थोडी देर पक जाने दें ।

४) बारीक कटे हुये टमाटर डाल कर थोडी देर पकने दें ।
नोट: टमाटर को धीमी आंच पर पकने दें और इनका पकना महत्वपूर्ण है । अगर टमाटर कच्चे रह गये तो फ़िनिश्ड प्रोडक्ट में वो मजा नहीं आयेगा ।

५) दाल/राजमा बनाने के लिये इस समय पहले से उबली हुयी दाल राजमा (पानी समेत) इस मिश्रण में डाल दें ।

६) आंच को बिल्कुल ही धीमा कर दें और थोडी ही देर में आपके व्यंजन तैयार हैं ।

नोट: इस पूरी विधि को परफ़ेक्ट करने के लिये केवल दो-तीन बार के अनुभव की आवश्यकता है ।


आपदाकालीन टिप्स/ट्रिक्स:

१) अगर नमक ज्यादा पड गया है तो चिन्ता की जरूरत नहीं है । आहिस्ता से सब्जी का मसालेदार पानी निकालकर गर्म सादा पानी मिला दें, मसालों के नुकसान की पूर्ति के लिये एक अलग पात्र में गर्म तेल में मसाले पकाकर पुरानी सब्जी में मिला दें ।

२) सब्जी बनाते समय पात्र के मुंह को खोलकर रखें और जैसे जैसे पानी कम होता रहे पानी मिलाते रहें । इस विधि में समय थोडा अधिक लगता है लेकिन सब्जी खराब होने की प्रायिकता लगभग समाप्त हो जाती है ।

३) भिंडी बनाते समय प्याज बारीक न काटकर लम्बी काटें; सब्जी अधिक प्रभावी दिखेगी ।


चलिये, हमें जितना कहना था हम कह चुके । इस पोस्ट पर आपकी टिप्पणियों की सबसे ज्यादा जरूरत है और आप ही नहीं आपकी श्रीमती जी (जो श्री विवाहित हैं :-) ) की इस पोस्ट पर क्या राय है हम ये भी जाननें के इच्छुक रहेंगे ।

इस पोस्ट के लिखने में महिलाओं के अधिकार क्षेत्र में अगर गलती से थोडा ज्यादा अतिक्रमण कर दिया हो तो इसके लिये क्षमाप्रार्थी हूँ ।

साभार,
नीरज रोहिल्ला

शुक्रवार, मई 04, 2007

लड़कियों से बात करो, लड़कियों के बारे में नहीं !!!

कुछ लोगो ने धूप में छतियाने के किस्से सुनाये तो किसी ने शर्त जीतने की कहानी सुनायी | लीजिये हम भी हाजिर हैं कुछ आजमाये हुये नुस्खे लेकर | अब चूँकि ये चिट्ठा घरवाले भी पढ सकते हैं इसलिये पोलिटिकली करेक्ट होने के लिए एक डिस्क्लेमर भी जरूरी है, "ये सभी नुस्खे आजमाये हुये हैं लेकिन जरूरी नहीं कि सारे के सारे मैंने खुद आजमाये हो" |

लीजिये कुछ साश्वत सत्य वचन पेश हैं:

१) अगर किसी लडके ने किसी लड़की से "हाय/हैलो" कहा है तो वो इसे केवल "हाय/हैलो" ही समझती है | इसके उल्टे अगर किसी लड़की ने किसी लडके को "हैलो" कहा तो लड़का इसको केवल "हैलो" नहीं समझेगा |

२) अगर लड़का "हैलो" को केवल "हैलो" समझना भी चाहेगा तो उसके दोस्त ऐसा नहीं होने देंगे, आख़िर दोस्त होते ही किस दिन के लिए हैं :-)

) लड़के जिनकी गर्ल फ्रेंड होती है और जिनकी नहीं होती है, में केवल एक फर्क होता है, पहले वाले लोग "लड़कियों से बात करते हैं" और दूसरे वाले "लड़कियों के बारे में बात करते हैं" |

४) इंजीनियरिंग कालेज छोड़ दिए जाएँ तो संसार में सुन्दर लड़कियों की कोई कमी नहीं है |

५) जो इंजीनियरिंग कालेज जितना अच्छा होगा वहाँ लड़कियों कि गुणवत्ता कालेज की रैंक के व्युत्क्रमानुपाती होगी |

६) आपके मित्र कभी नहीं चाहते कि आपकी कोई गर्ल फ्रेंड बने, वरना वो कैंटीन में किसके साथ बैठ कर मौज करेंगे |

७) कालेज में लड़कियों के पीछे पंजीकरण बिल्कुल मुफ्त होता है, बन्दा साल में दो बार लड़की से बात नहीं करेगा लेकिन कैंटीन में हमेशा "मेरी वाली"/"तेरी वाली" संबोधन से ही बात होगी |

८) अगर आप पढाई में अच्छे हैं तो इसका सहारे आप बातचीत की शुरुआत तो कर सकते हैं, लेकिन सफलता के लिए जल्द से जल्द दूसरे मुद्दों पर आना नितांत जरूरी है |

९) लड़कियों के साथ कभी भी तार्किक बातें न करें, जो लडकियां कहती हैं कि उन्हें लाजिकल/सत्यवादी लडके पसंद हैं वो झूठ बोलती हैं | कभी उन्हें बोल कर देखिए कि वो कितनी बेवकूफी भरी बातें कर रही है फिर पता चलेगा कि उन्हें सत्य कितना पसंद है |

१०) पेट भर भर कर झूठ बोलना लड़कियों को काफी भाता है, लड़कियों के हर सवाल के जवाब का अंत एक सवाल से करें |

११) लड़कियों को बात करना बहुत पसंद होता है आप केवल बीच बीच में "आह/वाह" और "सच में/तुम मजाक कर रही हो" जैसा कुछ बोलते रहें, बाक़ी वो अपने आप बोलती रहेगी |

१२) दोस्तो की भावुक बातों से सावधान रहें, "तूने लड़की के लिए दोस्ती छोड़ दी" जैसे वाक्यों ने कितने ही लड़कों का रोमांटिक कैरियर बीच में चौपट किया है |

१३) यदि आप सभ्यता से किसी लड़की से बात करते हैं तो इससे उसे कोई दिक्कत नहीं, हाँ उसको भाईयों के बारे में पूर्व जानकारी हमेशा काम आ सकती है |

१४) ज्यादा से ज्यादा लड़की आपको शालीनता से मना कर सकती है, लेकिन इस प्रकार की कई असफलताओं के बाद ही व्यक्ति सफल होता है |

१५) लड़की की सहेली का रोल दुनिया में गुब्बारे की तरह फुलाकर रखा गया है, आमतौर पर इसकी कोई आवश्यकता नहीं होती, हिम्मत करके अकेले दम पर बात करने जैसा सुख और कुछ नहीं |

फिलहाल के लिए इतना ही, बाक़ी के पाठ फिर किसी दिन !!!

बुधवार, मई 02, 2007

चलो कुछ तो मेहनत सफ़ल हुयी ।

आज अपने लेपटाप के बहाने से आपसे कुछ बाते करते हैं । ये तब की बात है जब हमने अगस्त २००४ में ह्यूस्टन नगर के राइस विश्वविद्यालय में दाखिला लिया था । घर से चले थे तो पिताजी ने ढेर सारे डालर हंसी खुशी हमारे हवाले कर दिये थे । हमने कहा था कि वहाँ जाते ही पैसे मिलना शुरू हो जायेंगे पर माताजी ने कहा इतनी खुशी से तुम्हारे बापू दे रहे हैं तो मना क्यों कर रहे हो ? और परदेस में तो पता नहीं कब कैसी जरूरत आ जाये । हमने भी कहा कि "मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है?" और वैसे भी पिताजी की अंटी से कुछ ढीला होना बडे सौभाग्य की बात है ।

यहाँ आते ही खूब खातिर हुयी, सबसे पहले हमारे विभाग वालों ने १५०० डालर हमारे हाथ में रख दिये, हमने पूछा कि ये क्या है तो बोले कि ये मुँहदिखायी की रस्म है (ट्रेवल एलाउंस) । जिन्दगी में पहली बार इतना पैसा और खर्च करने के लिये बाजार नहीं जा सकते (भाई कार नहीं थी न हमारे पास) । हम मन मसोस कर रह गये । खैर कुछ दिनों के बाद हमारा जन्मदिन आया और हमारे रूममेट भाईयों नें एक कार वाले भईया को पटा लिया । हम भी भोलेपन में फ़ंस गये, पता ही नहीं था कि यहाँ जन्मदिन पर बाकी लोग खर्चा उठाते हैं । जन्मदिन के बहाने भी हम कुल मिलाकर मात्र ९० डालर ही खर्च कर पाये (छ: लोगो का खाना) । हमें बडी कोफ़्त हुयी कि बडी ही सस्ती जगह है अमरीका, हम चाहकर भी पैसे खर्च नहीं कर पा रहे हैं ।

तभी हमारे दिमाग के खाली भाग में घंटी बजी, सोचा जब इतना पैसा है तो क्यों न एक लेपटाप खरीद लिया जाये । बार बार कम्प्यूटर रूम जाने का टंटा ही खत्म और कमरे में बैठकर मस्त टाइमपास करेंगे । अब हम भी पूरे हीरो थे, न किसी से पूछा न ताछा और खट से १६०० डालर का एक एच. पी. का लेपटाप आनलाइन खरीद लिया । वो इतनी महँगी मेरी पहली खरीद थी । बाद में लोगों ने बताया की अमरीका में हर चीज के छत्तीस दाम होते हैं, और कुछ लोग चीजों के सस्ते दाम ढूँढने में महारथी होते हैं । मेरे भी एक मित्र ऐसे ही हैं, मैं उन्हे बाजार का बादशाह कहता हूँ । उनके पास हर सामान का कूपन या डील होती है । खैर फ़िर वापस आते हैं लेपटाप पर, जैसे की होस्टल की प्रथा होती है, हर नये कम्प्यूटर की नथ एक विशेष प्रकार की फ़िल्म देखकर उतारी जाती है; ठीक वैसा ही यहाँ भी हुआ । वो लेपटाप लगभग दो साल हमारा साथ निभाकर खुदा को प्यारे हो गये ।

जैसा कि हर दूसरी शादी के साथ होता है, नये लेपटाप ने हमारा काम तो संभाल लिया लेकिन हमारा दिल उस मुर्दा पुराने लेपटाप में ही फ़ंसा रहा । दोस्तो की सलाह पर भी हमने उसका अंतिम संस्कार नहीं किया, उसे कलेजे से लगाये रहे । दिन बीते, महीने बीते और ख्याल आया कि क्यों न लेपटाप के मुर्दा शरीर पर कुछ शोध किया जाये । हम पेंचकस लेकर बैठ गये और उसके अंजर पंजर खोल डाले । हमें लगा कि इस मुर्दा मशीन में केवल हार्ड डिस्क ही खराब है, लिहाजा हमने उसे फ़िर से मुर्दा से जिन्दा बनाने की ठान ली । फ़टाफ़ट एक हार्डडिस्क लायी गयी और मुर्दे में जान फ़ूँक दी गयी ।


अब हमने कहा कि जब ये जिन्दा हो गया है तो क्यों न थोडे और प्रयोग कर लिये जायें । लिनक्स पर काम किये हुये लगभग दो-तीन साल बीत चुके थे और सोचा कि इससे अच्छा मौका फ़िर नहीं मिलेगा । इन वर्षों में लिनक्स बहुत तेजी से बदल चुकी थी । हमारे पार फ़ेडोरा कोर ३ (जो उस समय लेटेस्ट थी) और रेडहेट ७ की डिस्क थी, लेकिन अब तो फ़ेडोरा कोर ६, उबन्टू और सुसी का जमाना है । फ़टाफ़ट ये तीनों वितरण अन्तर्जाल से टापे गये और फ़िर सिलसिला प्रारम्भ हुआ एक जद्दोजहद का ।

ये सभी कम्प्यूटर पर आसानी से स्थापित हो गये लेकिन इनमें से कोई भी हमारे बेतार वाले यंत्र (वायरलेस इंटरफ़ेस) में प्राण न फ़ूंक सका । खोजबीन की तो पता चला कि हमारा बेतार यंत्र पुराने जमाने का है और उसको चलाने वाले मंत्र (ड्राइवर प्रोग्राम) लिनक्स वालों के पास नहीं हैं । बहुत हाथ पैर मारे लेकिन नतीजा वोही सिफ़र का सिफ़र । रोज अन्तर्जाल पर समय बिताकर नये नये उपाय खोजना, कभी फ़ेडोरा, कभी सुसी और कभी उबन्टू लेकिन रोज वही नाउम्मीदी ।

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नजर नहीं आती ।

और तो और कुछ लोगों ने तो अन्तर्जाल पर यहाँ तक लिख दिया कि इस मार्का बेतार यंत्र को लिन्क्स पर चलाना नितान्त कठिन है । इस बीच काफ़ी दिन फ़ेडोरा कोर ६ पर तार के साथ अन्तर्जाल चलाया और आईट्रान्स नाम के एक प्रोग्राम से हिन्दी चिट्ठों पर टिपियाया भी और चिट्ठे भी लिखे । ये सब तो ठीक था लेकिन कम्प्यूटर को लेकर न घूम पाने का गम सालता रहा ।


कल देखा कि उबन्टू का नया वितरण बाजार में आया है, "उबन्टू ७.४" । अन्तर्जाल पर बडी तारीफ़ सुनी और सोचा शायद ये ही मेरा तारनहार हो । पहले तो इसने भी हाथ खडे कर दिये लेकिन थोडे से लाड/दुलार और पुचकारने के बाद आखिरकार बेतार यंत्र की बत्ती जल ही गयी । और उबन्टू ने हमारा दिल जीत लिया । हमने सबसे पहले नारद जी को सलाम ठोंका और मनभर हिन्दी चिट्ठे पढे । उबन्टू पर हिन्दी पढने में कोई समस्या नहीं आयी लेकिन हिन्दी लिखें कैसे? अन्तर्जाल पर देखा तो बारहा जैसे प्रोग्राम केवल खिडकी (विन्डोज) के लिये हैं लिनक्स के लिये भी कुछ लिंक मिले लेकिन कुछ मजा नहीं आया । इसका मतलब है कि जद्दोजहद अभी जारी है और लिनक्स को विंडोज के मुकाबले में अभी भी काफ़ी मेहनत करनी है ।


चलिये फ़िलहाल के लिये इतना ही और मेरी बकबक सुनने के लिये धन्यवाद ।

और हाँ अगर लिनक्स पर आसानी से हिन्दी लिखने का कोई तरीका आपको आता हो तो टिपियाकर सूचित कीजियेगा ।

साभार,
नीरज

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बाद में पिताजी को पता चला था कि हमने उनके पैसे कितनी निर्दयता से खर्च (उनकी नजर में उडाये थे) किये थे तो आप सोच ही सकते हैं उनसे फ़ोन पर कैसी बात हुयी होगी :-)

मंगलवार, मार्च 27, 2007

My experience at Hospital

Today was definitely an interesting day in my life. Today one thing led to another and it ended up putting me in hospital for a day with a sore head. I was expecting not to play cricket today but something made me go to Rice and start playing cricket.

First, the ground on which we started playing cricket was different. Secondly, the ground was in poor shape. There was lots of moisture in the ground and the pitch was surrounded by think grass. In a nutshell, it was not a great environment to play cricket. But, since we were really frustrated by the weather for last three weeks, we decided to play on that not so good looking ground.

I bowled a few balls as practice and it was okay, some were really off line and length but later I got myself well in line and length. After that I put on the pads and thought of doing some batting practice. It occured to me that I should wear a helmet but I am not sure why I shrugged off that idea. I faced couple of balls and it seems okay. I was really frustrated by the wide balls of Hamid and then came Shekhar.

First few balls of Shekhar were either slower deliveries and some short pitched medium paced deliveries outside off stump. Then all of a sudden he bowled a beamer and I completely missed the line and the height of the ball. I heard a big bang in my head, then came little sparkling stars all around. I think I had blurred vision for a second and heard someone saying something. I did not become unconscious. However, I sat down first and then lay down on the ground using a pad a pillow.

Soon, excruciating pain followed and someone called Rice Emergency Medical Services (EMS). EMS guys and girls asked routines questions and I answered them. Then they asked me if I wanted to go to the Hermann Memorial hospital or some other place. I asked them to take me to Hermann Memorial because that was the first name which came to my mind.

Soon, an ambulence came and they strapped me on a board with duct tape and some plastic support and put me on a stretcher and loaded me into the ambulence. This whole setup was quite uncomfortable and it somehow increased my pain. My neck also started to hurt because of the uncomfortable situation of my head. I kept my cool and wits and was not feeling so much pain. I think I have lots of threshold for pain so may be I felt pain but it did not bother me.

We reached Hermann Memorial hospital within couple of minutes and then started the ordeal of frustration, agony and disgust about the incompetence and lack of professionalism of the hospital staff.

I had to wait 20-25 minutes just to be removed from the stretcher and moved into the emergency room (ER). There was some small kid who kept crying in very high pitch and it made me uncomfortable because I was all strapped and unable to move my leg or turn around my head. I was also feeling extremely thristy and they informed me that I couldn't drink any water before a doctor looks after my condition first.

I think first I was attended by an orthopaedic who after asking some simple question and probing the area around me neck concluded that probably I don't have a fractured skull and sent me to trauma center.

Another doctor came and he sent me to get a CT scan. CT scan was a quickie. My head went inside a big machine and within seconds I was done.

The most funny thing which happened at the hospital was that they didn't keep their words. Some nurse will come and ask some funny quesitons and then disappear while promising that she/he will be back in moments. I don't know what unit of time the hospital staff followed but a moment was never less than an hour.

Later, I got to drink some water and the doctor came with my CT scan report only to tell a bad news. He told that something unusual is found on my CT scan and that I have two 5 mm size internal bleeding spots because of the impact of the ball. He told me that soon a Neuro-surgeon will examine me within couple of minutes and I simply waited and waited and waited.

At around 8 pm Shekhar was informed that they intend to keep me in the hospital for the whole night and this really made me uncomfortable. A nurse came around 8:40 and told me that they need to shift me to different room. I asked that I don't want to spend the night here and would like to spend night at my home and come back again in morning if required.

Next, she came back with the Neuro Surgeon and he made a lame excuse about why he could not see me earlier because he was very busy. He seems a good doctor and he explained me his concerns and said that we should take another CT scan at 11 pm and if everything is fine I can go back home. He told me that as I am hit in the right side of my head, more internal bleeding could lead to seizure of my heart. I was really scared and decided to go with the doctor's advice.

Now, they have shifted me to another room which is more comfortable and has a TV and a couch for the visitors to sit.

I could access one computer in the hospital and I have written this blog from that computer in one sitting. I hope I can finish it soon because it will highlight the poor state of healthcare services in United States.

Good News: I got my second CT scan done and it does not show any increase in the internal bleeding. This is a good news but I still need to be little careful for next couple of months like not to become stressed or consume any alchohol.

More to follow later once I get out of hospital probably tomorrow morning...