मंगलवार, अगस्त 19, 2008
सहजता,कहीं मोल मिलती है क्या?
कभी इस बात का दंभ कि मैं तो हिन्दी पढ़ रह हूँ डंके की चोट पर, जिसे गंवार कहना हो कह ले मुझे परवाह नहीं।
कहाँ मेरे स्कूल में चीनी विद्यार्थी की कमजोर अंग्रेजी के कारण एक साधारण सी बात को जरा तकलीफ़ से समझाने के बाद उसके चेहरे पर आयी सहज मुस्कान और कहाँ किसी अंग्रेजीदां नौजवान की दिल्ली के कैफ़े काफ़ी डे में अमेरिकन एक्सेंट में बातचीत के दौरान असहजता से "डैम इट" और "होली शिट" ।
कहाँ है इसके बीच में मेरा नायक जो सहजता से अपनी अंगरेजी कि किताब बंद करके स्टेशन पर उतरकर वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास खरीदकर उतनी ही सहजता से पढता है । न तो वो बात बात में काले फिरंगियों को गरियाता है और न ही उन्ही की भाषा में बात करता है ? आपने मेरे नायक को कहीं देखा है ?
रविवार, दिसंबर 02, 2007
मृत्यु-दंड पर मेरे विचार
मानवाधिकार संगठन सम्पूर्ण विश्व में मृत्यु-दंड के प्रावधान को जड से हटाने की माँग कर रहे हैं । ब्रिटेन, इटली और फ़्रांस जैसे अनेकों यूरोपीय देशों में मृत्यु-दंड को समाप्त कर दिया गया है । भारत में मृत्यु-दंड का प्रावधान अवश्य है लेकिन पिछले कई दशकों में मृत्यु-दंड की सजा बहुत कम सुनायी गयी है । इसके विपरीत अमेरिका में मृत्यु-दंड की सजा के नियम विभिन्न प्रदेशों में अलग अलग हैं । १९०९ से १९७६ तक अमेरिका के कई प्रदेशों में मृत्यु-दंड का प्रावधान आता और जाता रहा । १९७६ में अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने अपने फ़ैसले में राज्यों के मृत्यु-दंड देने के अधिकार को मान्यता दी । इसके पश्चात आज अमेरिका के ३८ राज्यों में मृत्यु-दंड की सजा का प्रावधान है ।
१९७६ से २००६ तक अमेरिका में १०९९ मृत्यु-दंड की सजा सुनायी जा चुकी हैं । ३३७० लोग अपनी सजा का इन्तजार कर रहे हैं । इस तथ्य का एक पहलू ये है कि इन १०९९ में से ४०५ लोगों को टेक्सास में मौत की सजा सुनायी गयी जो पूरे अमेरिका में दिये गये मृत्यु-दंड का एक तिहाई से भी ज्यादा है । टेक्सास में लगभग ३९३ अपनी मौत की सजा का इन्तजार कर रहे हैं । अमेरिका में मृत्यु-दंड पहले फ़ाँसी के माध्यम से दी जाती थी, इसके बाद बिजली वाली कुर्सी आयी जिसका आविष्कार थामस एल्वा एडीसन ने किया था । आजकल लगभग सभी जगह जहरीला मौत का इन्जेक्शन देकर मौत की नींद में सुलाया जाता है, ये इन्जेक्शन हृदय की गति को रोक देता है और जल्दी ही व्यक्ति मृत हो जाता है । यद्यपि कुछ प्रदेशों में बिजली वाली कुर्सी और जहरीला इन्जेक्शन दोनो उपलब्ध हैं । पिछले कुछ वर्षों में जहरीले इन्जेक्शन के विरुद्ध काफ़ी प्रदर्शन हुये हैं । विरोध करने वालों का दावा है कि कई बार जहरीले इन्जेक्शन को काम करने में ३० मिनट तक का समय लगा और ये अत्यधिक दर्दनाक है । इस विषय पर मामला उच्चतम न्यायालय के अधीन विचारार्थ है ।
मैं किसी भी जघन्यतम अपराध के लिये, किसी भी स्थिति में, किसी भी व्यक्ति को दिये गये मृत्यु-दंड के विरुद्ध हूँ ।
कई बार कुछ ऐसे मामले भी सामने आये हैं जब भावनाओं के बहाव में मैने सोचा है कि सम्भवत: इस मामले में मृत्यु-दंड उचित है लेकिन फ़िर सोच विचार करने पर मैं पुन: अपनी सोच पर वापस आ जाता हूँ । मेरी इस सोच के मुख्य रूप से चार कारण हैं और मेरे लिये चौथा कारण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है ।
१ ) प्रत्येक मानव जीवन अमूल्य है और इस जीवन का अंत करने का अधिकार केवल प्रकृति अथवा उस मनुष्य को खुद है । जघन्य अपराधों के लिये मैं लम्बी कैद का हिमायती हूँ (केवल १४ वर्ष की कैद नहीं), यदि समाज को लगता है कि उसका अपराध अक्षम्य है तो उस व्यक्ति को सम्पूर्ण जीवन के लिये कारागार में डाल दीजिये जिससे वो कभी कारागार के बाहर न आ सके परन्तु समाज को जीवन छीन लेने का मेरी नजर में कोई अधिकार नहीं है ।
२) लोगों में ऐसी धारणा है कि उम्रकैद की सजा देने पर उसके सारे जीवन का खर्चा सरकार को उठाना पडेगा जबकि मृत्यु-दंड देने से उस खर्च से बचा जा सकता है । वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है । मृत्यु-दंड वाले मुकदमों में सरकारी खर्च अन्य मुकदमों के मुकाबले कहीं अधिक होता है । भारत में हुये इस खर्च पर मेरे पास कोई आधिकारिक आँकडे नहीं हैं,परन्तु अमेरिका में जहाँ मृत्यु-दंड की सजा सुनायी जाती है के आँकडे ये कहते हैं:
क) न्यू-जर्सी में १९८३ से अभी तक मृत्यु-दंड के मुकदमों और मुकदमे के फ़ैसले के बाद की अपीलों पर लगभग २५.३ करोड डालर खर्च हो चुके हैं और इन मामलों में अभी तक एक भी व्यक्ति को मृत्यु-दंड नहीं मिल पाया है । ये अलग बात है कि १० व्यक्ति अपने मृत्यु-दंड का इन्तजार कर रहे हैं । विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इतना धन पुलिस विभाग को दिया जाता तो सम्भवत: अपराधों पर अच्छी खासी लगाम लग सकती थी ।
ख) टेक्सास में जहाँ पर मृत्यु-दंड बडी उदारता से दिया जाता है, वहाँ भी मृत्यु-दंड के किसी मुकदमें पर हुआ पूरा खर्चा उस व्यक्ति को ४० वर्ष तक सबसे सुरक्षित जेल में रखने पर होने वाले खर्चे का लगभग ३ गुना है ।
३) कई बार किसी निर्दोष व्यक्ति को मुकदमें में सजा हो जाती है । अमेरिका में पिछले ४-५ वर्षों में ही सैकडों व्यक्तियों को DNA के सबूत के आधार पर मौत की सजा से छुडा ही नहीं वरन बाइज्जत बरी किया जा चुका है । अगर इन व्यक्तियों को तुरत-फ़ुरत मौत की सजा दे दी गयी होती तो सोचिये कि मानवता के प्रति हमारे समाज और अदालतों से कितना बडा अपराध हो गया होता । १५ वर्ष बाद भी मिला न्याय भी कम से कम न्याय तो है ।
४) मेरी समझ में ये सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है । समाज ने अपराध के बदले सजा का प्रावधान बनाते समय सोचा था कि सजा अन्य व्यक्तियों के लिये एक डर का कार्य करेगी । पिछले लगभग पचास वर्षों के शोधकार्य के बावजूद भी अभी तक इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि मृत्यु-दंड का डर अपराधियों के अपराध करते समय उम्रकैद के डर से अधिक होता है । अभी हाल में छपे शोधपत्रों में इस बात को साबित करने का प्रयास किया गया है परन्तु Academic Circle में उस शोधकार्य की पद्यति और निकाले गये निष्कर्षों पर काफ़ी उंगलियाँ उठी हैं ।
जब मृत्यु-दंड अन्य किसी दंड के मुकाबले अपराध रोकने में अधिक सक्षम नहीं है तो फ़िर मेरी नजर में अन्य पहलुओं का ध्यान में रखते हुये इसका कोई औचित्य नहीं है ।
नीरज रोहिल्ला
०२ दिसम्बर, २००७
चलते चलते: वैसे तो मैने पहले ही "जघन्यतम" शब्द का प्रयोग कर दिया है लेकिन स्प्ष्टीकरण के लिये मैं देशद्रोह, आतंकवाद, बलात्कार आदि प्रकार के अथवा किसी भी प्रकार के अपराध के लिये मृत्यु-दंड का हिमायती नहीं हूँ । पूर्णविराम ।
रविवार, जुलाई 22, 2007
सुख, सफ़लता और संतुष्टि के चक्रव्यूह में फ़ँसी दुनिया !!!
सफलता और संतुष्टि के बीच का संबंध क्या है ?
क्या संतुष्टि और सुख एक दूसरे के पूरक हैं ?
सुखिया ये संसार है खावे अरू सोये, दुखिया दास कबीर है जागे अरू रोये।
ऐसे कितने ही सवाल हमारे सामने प्रतिदिन आते हैं और हम अक्सर उन्हें टालकर अथवा बिना विचारे कोई दार्शनिक तर्क देकर आगे बढ जाते हैं। लेकिन उसके बाद भी ये प्रश्न हमारा पीछा नहीं छोड़ते हैं। मेरी समझ में सुख और संतुष्टि दोनो ही आपके "मन", "विचार" और "कर्मों" के आपसी संतुलन और साम्य पर निर्भर करती है। कम से कम मेरे जीवन में ये साम्य और संतुलन अभी स्थापित नहीं हो सका है; इस दिशा में प्रयासरत अवश्य हूँ देखिए कब मेहनत रंग लाती है।
कथनी और करनी का अंतर, विचार और आचार की भिन्नता, स्वयं के व्यवहार पर खिन्नता और मन के अन्दर सदैव चलने वाला अंतर्कलह सब एक ही तो हैं। बात बड़ी सरल सी लगती है और सरल बात इतनी आसानी से समझ नहीं आती।
इस छोटे से जीवन में मुझे कुछ विलक्षण प्रतिभा के धनी महापुरुषों के साथ कुछ समय बिताने का सुअवसर मिला और उन सभी के व्यक्तित्व में मुझे एक बात समान लगी, उन सब के आचरण और व्यवहार में मुझे एक अजीब सी सहजता दिखी। बहुत से लोग अपने व्यक्तित्व में इस सहजता को जबरन ठूँसने का प्रयास करते हैं। लेकिन ये प्रयास उसी प्रकार असफल हो जाते हैं जैसे कि युवाओं में "कूल" दिखने के प्रयास। किसी ने कहा है कि अगर आप "कूल" हैं तो आपको "कूल" दिखने के किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं है। उसी प्रकार व्यवहार और आचरण की सहजता अपने आप ही आती है। आप इस प्रकार के आचरण का झूठा लबादा देर तक नहीं ओढ़ सकते। आपके मन और चरित्र की दुर्बलातायें उस ओढे हुये लबादे तो तार तार करने में देर नहीं लगाती ।
अब प्रश्न ये उठता है कि क्या इस प्रकार की व्यवहार की सहजता को प्रयास से अर्जित किया जा सकता है ? क्या निरन्तर प्रयास के द्वारा आप सच जैसा दिखने वाला झूठा लबादा ओढ सकते हैं ? इस प्रकार के प्रयासो का आपके व्यक्तित्व और मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड सकता है ? दूसरों को जताना कि आप बडे सहज हैं आसान है; लेकिन स्वयं के मस्तिष्क को इतना ट्रेन करना कि आप झूठा लबादा सहजता से ओढे रहें अलग बात है । मेरी राय में ऐसे प्रयासों का सफल होना मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं । इसके अलावा अगर आप इस प्रकार की झूठी सहजता को ओढने में सफ़ल हो भी जायें तो भी दोहरा जीवन जीने की विडम्बना के रूप में एक कीमत आपको देनी ही पडती है ।
"Ayn Rand" बड़ी ही प्रसिद्ध लेखिका हैं। "Atlas Shrugged" और "Fountainhead" उनके बडे प्रसिद्ध उपन्यास हैं । युवावस्था में जो भी उन्हें पढता है उनकी विचारधारा का मुरीद हो जाता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ लेकिन समय के साथ मेरे विचार बदल गये। आज मैं उन्हें केवल उन्हें एक सशक्त लेखिका के रूप में मानता हूँ। उनकी विचारधारा के प्रति आकर्षण के पीछे एक सशक्त लेखिका की चालबाजी है । कृपया "चालबाज" शब्द को अन्यथा न लें । मेरा मंतव्य आगे चलकर स्पष्ट हो जायेगा ।
अपने लेखों और उपन्यासों में लेखिका दो प्रकार के किरदारों का निर्माण करती है । एक प्रकार के किरदार ऐसे होते हैं जो आपको उनकी ओर आकर्षित करते है, वो वे सभी कार्य करते हैं जो आप कभी करना चाहते थे/हैं । वो समाज में अपनी शर्तों पर जीते हैं, किसी की परवाह नहीं करते, अपने क्षेत्र में जीनियस हैं, वगैरह वगैरह... दूसरे प्रकार के किरदारों में आप अपनी झलक देखते हैं; कभी अपने मतलब के लिये जीने वाले, कभी गलत समझौते करने वाले, समाज के लिये कुछ और वास्तव में कुछ और...लेकिन इसके बाद भी अपने अन्तर्मन की आवाज उन्हे सदैव सताती रहती है । ऐसे में खुद के कॄत्यों के खिलाफ़ प्रतिरोध स्वयं जैसे किरदारों के प्रति घॄणा के रूप में स्फ़ुटित होता है ।
आप स्वयं एक प्रयोग कर सकते हैं, जिस व्यक्ति से आपको घृणा होती है उसके व्यक्तित्व की कोई ऐसी बात होती है जो आप स्वयं में भी पाते हैं (दूसरे लोग ये जानते हों जरूरी नहीं है ), और यही बात आपको कभी कभी बहुत परेशान करती है ।
अगर इस उपन्यास में केवल दूसरा किरदार (आपके जैसा) होता तो शायद आप उसे पसन्द भी करते, उसकी उपलब्धियों की अपनी उपलब्धियों से तुलना भी करते, "ये ही दुनिया है और जहाँ के कारखाने ऐसे ही चलते हैं" कहकर इतराते और सब कुछ मजे में रहता । लेकिन ये पहला वाला किरदार आपका चैन छीन लेता है । आप सोचते हैं कि ये बेवकूफ़ किरदार दुनिया से शिकायत भी तो नहीं करता । धीरे धीरे पहले किरदार के साथ हुआ हर छलावा आपको कचोटने लगता है । इच्छा होती है कि काश अगर घडी को उल्टा कर पाता तो मैं भी पहले किरदार की तरह जीवन बिताता । बस इसी क्षण लेखिका अपनी चालबाजी में सफ़ल हो जाती है । इसके बाद आप लेखिका की विचारधारा से प्रभावित नहीं होते बल्कि स्वयं की कमियाँ और एक काल्पनिक किरदार के तिलिस्म में कैद होकर रह जाते हैं ।
आगे भी जारी रहेगा......
शनिवार, जुलाई 21, 2007
वाद-विवादी भारतीय

आज आप लोगों से इंटरनेट पर अपने कुछ अनुभव आपके साथ बाँट रहा हूँ । पिछ्ले कुछ महीनों से मैं रेडिफ़ (www.rediff.com) पर लिखे जाने वाले लगभग सभी लेख और उनके नीचे लिखे पाठकों की टिप्पणियाँ पढ रहा हूँ । यही नहीं, और्कुट पर भी विभिन्न समूहों (Indian History, India, Hinduism, etc.) में होने वाले वाद-विवाद पर भी नजर रखता रहा हूँ । कुल मिलाकर मैं इस निष्कर्ष पर पँहुचा हूँ कि हम भारतीयों को वाद-विवाद में बडा सुख मिलता है । इस वाद-विवाद का उद्देश्य किसी आम सहमति अथवा परिणाम पर पँहुचना नहीं बल्कि केवल वाद-विवाद सुख होता है ।
तुमने ५ पंक्तियों का तर्क दिया है तो मेरा जवाब १० पंक्तियों का होगा । इंटरनेट पर वाद-विवाद में कुछ ट्रेंड भी देखने तो मिलते हैं । आम तौर पर ऐसा लगता है कि लगभग हर लेख पर वाद-विवाद की परिणति एक ही होती है । वाद-विवाद किसी एक तर्क से प्रारम्भ होकर आपस में गाली गलौज पर होते हुये इस स्तर पर उतर आता है कि बस पूछिये मत ।
पहले मैं आर्कुट पर भारतीय इतिहास नामक समूह में काफ़ी हद तक सक्रिय (पढने और लिखने दोनों) था । प्रारम्भ में वहाँ पर कुछ अच्छे विषयों पर विचार विमर्श हुआ परन्तु समय के साथ वहाँ पर भी वाद-विवाद का स्तर इतना गिर गया कि अब वहाँ जाने का मन भी नहीं करता । धीरे धीरे मुझे एहसास हुआ है कि इंटरनेट पर किसी विवाद में समय बिताने की अपेक्षा दोनों पक्षों से सम्बन्धित कुछ विश्वसनीय लेख अथवा पुस्तक पढना ज्यादा उपयोगी है । और अब मेरी भूमिका केवल एक तटस्थ दर्शक की रह गयी है । हाँलाकि बहुत से लोग "जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध" कहकर उकसाने का प्रयास करते हैं, लेकिन हम अपने आप को तटस्थ दर्शक बनाये हुये हैं ।
रेडिफ़ (Rediff) पर विभिन्न लेखों पर दी गयी टिप्पणियों को अगर आप लम्बे समय तक पढेगें तो आप अपने साथ एक खेल खेल सकते हैं । सुबह एक लेख पढिये और भविष्यवाणी कीजिये कि इस विषय पर टिप्पणियाँ क्या रंग दिखायेंगी । यकीन मानिये, ये काम बहुत मुश्किल नहीं है ।
मसलन, अगर किसी NRI से सम्बन्धित कोई खबर है तो वाद विवाद "भारतीयों में स्वयं के गौरव की कमी/सरकार की अमेरिका की चापलूसी/राजनीति में भ्रष्टाचार" जैसे मुद्दों को छुयेगी ।
क्रिकेट से सम्बन्धित खबर होने पर वाद विवाद "दक्षिण/ उत्तर/ बंगाल/ दिल्ली/ फ़िरंगी कोच/ क्रिकेट में पैसा/ हाकी की दुर्दशा" जैसे मुद्दों तक पँहुचेगा ।
साहित्य से संबन्धित किसी भी खबर पर मराठी/बंगाली/हिन्दी/तमिल के नाम पर जूतम पैजार होना आम बात है ।
इन सभी के बीच में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो वाद-विवाद को सही दिशा देने की कोशिश करते हैं लेकिन उनकी आवाज नक्कारखाने में दब कर रह जाती है । आप कह सकते हैं कि अगर ऐसे अधिक लोग हों तो सम्भवत: वाद-विवाद को संयत (Moderate) किया जा सकता है । परन्तु ऐसे वाद विवाद से क्या हासिल है ? मेरी राय में अपनी ऊर्जा को सहेज कर किसी अन्य दिशा में लगाना कहीं अधिक फ़ायदेमन्द होगा ।
रविवार, जुलाई 15, 2007
निरपेक्ष सोच/मत प्रचार और आम आदमी !!!
किसी भी विषय पर मत प्रचार (प्रोपागेंडा) करने के लिये इन कारकों का शोषण करना पडता है । शोषण अर्थात जन सम्पर्क के माध्यमों पर अपना एकाधिकार बनाने का प्रयास करना जिससे कि दूसरी विचारधारा का गला घोंटा जा सके । मत प्रचार भी कई चरणों में किया जाता है । पहले चरण में विषयसामग्री बनायी जाती है । प्रोपागेंडा फ़ैलाने का सबसे महत्वपूर्ण नियम है कि विषयसामग्री विस्तारपूर्ण हो और अधिक से अधिक विचारबिन्दु दे । विचारबिन्दु विषय के बारे में कम और पढने वाले की मानसिकता/सोच और सांस्कृतिक विचारों को ध्यान में रखकर लिखे जाते हैं । प्रत्येक विचारबिन्दु अपने आप में अधूरा होता है, परन्तु यदि पढते समय आपके मन में संदेह न हो तो ऊपरी तौर पर आप इससे सहमत होते दिखते हैं । विचारबिन्दु आपस में असम्बद्ध (डिसकनेक्टेड) और मूल विषय से विसंगति लिये होते हैं । विषयसामग्री का विस्तार इसलिये आवश्यक है जिससे कि जागरूक पाठक प्रस्तुत किये तर्कों को सत्यापित करने का प्रयास न करे । पाठक को विश्वास में लेने के लिये अक्सर सर्कुलर रेफ़रेंसिग का प्रयोग किया जाता है । सर्कुलर रेफ़रेंसिग से आशय है कि बीस लेख अगर एक दूसरे का रेफ़रेंस दें तो हर लेख में कम से कम बीस रेफ़रेंस होंगे ।
एक बार मसौदा पूरा हो गया तब दूसरे चरण में इसको वितरित करने का कार्य किया जाता है, इसमें कार्यकर्ताओं/धन इत्यादि कि सबसे अधिक आवश्यकता होती है । इंटरनेट की क्रान्ति आने से ये कार्य थोडा आसान हो गया है । जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ आज हर कोई अपने को किसी भी विषय का विशेषज्ञ बता सकता है, अपना लिखा अगर आप peer reviewed जनरल/पत्रिकाओं में प्रकाशित नहीं कर सकते तो एक वेबसाईट खोलिये, अपनी पूरी सामग्री वहाँ पर रखिये और प्रचार प्रारम्भ कर दीजिये ।
प्रोपागेंडा फ़ैलाने के दूरगामी प्रभाव होते हैं । एक बार अगर आप अपनी बात फ़ैलाने में सफ़ल हो गये तो लोग जी जान लगा लें जन मानस से उसको निकालना बडा कठिन होता है । यही कारण है कि सैक्षिक/सैद्धांतिक अथवा व्यवसायिक, लगभग हर क्षेत्र में आपको प्रोपागेंडा दिखायी दे जायेगा (अगर आप देखना चाहें तो ) ।
ऐसे लेखों से बचने के उपाय:
१) अगर किसी विषय पर आपकी जानकारी कम है तो सन्तुलित/परिमित (Conservative) दिशा लेनी चाहिये । अर्थात अच्छे प्रकाशन की पुस्तक को किसी व्यक्तिगत लेख से ज्यादा तरजीह देनी चाहिये ।
२) अच्छी जानकारी जुटाने के लिये आलस्य न करें, किसी विषय पर शोध करने के लिये विश्वविद्यालयों के पुस्तकालय इंटरनेट पर की गयी सर्च से ज्यादा मुफ़ीद स्थान हैं ।
३) आइन्स्टीन के भौतिकी के अतिरिक्त किसी अन्य विषय पर लिखे लेखों को आँख मूंदकर सत्य मान लेना आत्महत्या जैसा होगा । अक्सर किसी एक विषय के प्रकाण्ड विद्वान दूसरे विषय में पक्षपाती (Prejudiced) हो सकते हैं इसीलिये अपने विवेक का प्रयोग करें ।
४) बहुत से लोग इतिहास/दर्शन/साहित्य/कला पर अपनी खुद को सोच को शोध का रूप देनें का प्रयास करते हैं । इन विषयों पर भी शोध करने के लिये विषय की पृष्ठभूमि और शोध कौशल की उतनी ही आवश्यकता होती है जितनी कि भौतिकी अथवा गणित में शोध करने के लिये होती है।
इस लेख पर आप अपने विचार अपनी टिप्पणियों के माध्यम से बता सकते हैं ।
नीरज रोहिल्ला
१५ जुलाई, २००७
सोमवार, जुलाई 09, 2007
ताज को वोट न देकर क्या बडा तीर मार लिया !!!
किसी ने कहा कि ये ताज पर वोटिंग भी एक मुद्दा ही है;
कोई बोला नहीं देते ताज को वोट, का कल लोगे?
किसी को चिन्ता कि ताज के नाम पर देश लुटा जा रहा है;
कोई बोला कि मैं तो भोलेपन में ताज को वोट करके लुट गया;
किसी ने वोट न देने पर बधाईयाँ बाँटी;
और आखिर में किसी ने पूछा कि क्या वाकई ताज नंबर वन है?
हो सकता है एक-दो पोस्ट छूट गयी हो लेकिन हमारे ब्लागजगत में ये "ताजमहल की वोटिंग" भी एक मुद्दा ही था । मैं भी आज तक इसे एक मुद्दा ही समझ रहा था लेकिन अपने लैब से कालेज की पार्किंग लाट की ओर टहलते हुये सहसा लगा कि किसी ने हमें पुकारा । पलटकर देखा तो कोई नहीं था, हम फ़िर आगे बढे ही थे कि फ़िर आवाज आयी, "मूर्खराज, कहाँ जा रहे हो?" आजू-बाजू देखा तो कोई नहीं था फ़िर गौर से सुना कि आवाज अंदर से ही आ रही थी । क्या मेरा अन्तर्मन स्वयं को मूर्खराज कह रहा था ? जी हाँ, सत्य तो यही था कि मैं स्वयं को मूर्खराज महसूस कर रहा था ।
आप सोच रहे होंगे, कि पक्का मैने भी ताज को वोट दिया होगा और इसका अफ़सोस अब हो रहा होगा कि मैं इत्ता बडा मूर्ख कैसे बन गया । बिल्कुल गलत । मैने ताज को वोट नहीं दिया और इस कारण मैं स्वयं को बेवकूफ़ समझ रहा था । चलिये थोडा विस्तार में समझाते हैं ।
मान लीजिये कि हमें ताज को वोट करना होता तो हम क्या करते । एक झटके में वोटिंग वाली वेबसाईट खोलते, दूसरे झटके में रजिस्टर होते, और तीसरे झटके में वोट डाल देते । जेब से आठ आने भी खर्च न होते (भाई, स्कूल में मुफ़्त का इंटरनेट है और घर वाले इंटरनेट के लिये हर महीने पैसे दे ही रहे हैं), कौन सी बडी बात हो जाती । मन खुश रहता थोडी देर, और जब भी वोटिंग की बात चलती हम टुन्नाकर कहते भईया हम तो पहले ही वोट डाल चुके हैं । आते जाते चार लोगों को और बता देते कि तुम भी वोट डाल आओ ।
हमने वोट न डाला, उससे क्या हुआ ? एक तो मन में जिद (थोडा गुस्सा भी) थी कि वोट करेंगे तो बिना रजिस्टर किये और अपने ईमेल पते से किसी को कमाई न करने देंगे । इस जिद में थोडा खून जला क्योंकि मन तो कर ही रहा था वोट करने का । फ़िर जब जब वोट करने के लिये फ़ारवर्ड ईमेल के जरिये संदेश आये, थोडा खून फ़िर जला कि कैसे बेवकूफ़ लोग हैं जरा भी नहीं समझते कि कोई इन्हे उल्लू बना रहा है । फ़िर अगर किसी ने गलती से टोक दिया कि भईया वोट डाला कि नहीं तो हमारे शरीर में काटो तो खून नहीं ।
ध्यान दीजिये कि दिन में कम से कम ६०-८० ईमेल आती हैं, कम से कम (नहीं बतायेंगे कि कितना समय) इंटरनेट पर फ़िजूल बिताते हैं । बीसियों स्पाम ईमेल आती हैं, इसका मतलब मेरा ईमेल पहले ही नीलाम हो चुका है । अब ऐसे में जब अठन्नी भी खर्च न होनी थी, तो वोट न करके मैने और कुछ और लोगों ने कौन सा तीर मार लिया ?
मान लीजिये कि ताज को वोट करने में देशवासियों के ४-६ रूपये खर्च भी हो जाते तो क्या होता ? जो पहले से जेब में ५०००-१५००० का मोबाइल धरे घूम रहा है, ४-६ रूपये अगले नुक्कड पर गुटखे में खर्च कर देता या कोक/पेप्सी पी लेता तो उसका स्वास्थ्य भी तो खराब होता । होता कि नहीं? वो तो तब भी बेवकूफ़ बनता है जब १० रूपये की काफ़ी कैफ़े डे में २०० रूपये में पीता है । क्या तब वो बेवकूफ़ नहीं बनता जब वो दिन भर घर पर स्कूल से भागकर क्रिकेट देखता है ?
जब हम दिन में हजार बार बेवकूफ़ बन ही रहे हैं तो हमने मुफ़्त में या ४-६ रूपये खर्च करके अपना आत्मसम्मान बढाने या फ़िर फ़ील गुड करने का एक मौका खो दिया । वो तो अच्छा हुआ कि मेरे वोट के बिना भी ताजमहल सात अजूबों में शामिल हो गया वरना पता नहीं कितने दिनों ये दुख कलेजा दुखाता रहता ।
किसी ने सही ही कहा है, फ़ालतू कि बात में ज्यादा दिमाग न लगाना चाहिये ।
आप कैसा महसूस कर रहे हैं, क्या आपने वोट दिया था ?
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जो लोग अब भी आधारभूत सिद्धान्तों, व्यक्तिगत सोच, वैचारिक तर्क और ब्ला, ब्ला, ईटा, बीटा, न्यू, गामा आदि तर्क देकर खुश हो रहे हों, उन्हे साधुवाद । आप बहुत बडा दुख झेलने से बच गये । वरना मेरे लिये आज की रात तो बस बोतल का ही सहारा है :-)
शुक्रवार, जून 29, 2007
इंटरनेट/ब्लागजगत की आचारसंहिता के कुछ विचारबिन्दु
इंटरनेट पर आपका आचरण काफ़ी हद तक आपके व्यक्तित्व और सोच को दर्शाता है । कारपोरेट जगत में तो ये और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इंटरनेट पर की गयी एक जरा सी गलती कभी कभी आपके पूरे कैरियर को चौपट कर सकती है । अमेरिका में न्याय-विभाग अभी तक ईमेल सम्बन्धी प्रकरण से उबरा नहीं है जहाँ उन्होने गलती से अथवा जानबूझ कर कुछ महत्वपूर्ण ईमेल डिलीट कर दी थीं ।
ईमेल फ़ारवर्ड करना आमतौर पर सभी लोग बुरा मानते हैं (कुछ अपवादों को छोडकर) लेकिन इसमें भी कई प्रकार के वर्गीकरण हैं ।
१) कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मौका लगते ही आपको कुछ भी फ़ारवर्ड कर देंगे; फ़ूलों का गुलदस्ता, यूरोप के फ़ोटो, प्यार जताने के १०० तरीके, दुनिया के १० अजूबे और बाकी सभी कु्छ ।
२) आपको कुछ लोग ऐसे मिल जायेंगे जो फ़ूलों का गुलदस्ता तो फ़ारवर्ड नहीं करेंगे लेकिन "सिद्धिविनायक मन्दिर का फ़ोटो"/"साईं बाबा का दुर्लभ फ़ोटो"/"तुम और हम दोनों आई. पाड जीते"/"मुफ़्त में पैसा कमायें" तुरन्त फ़ारवर्ड कर देंगे ।
३) इसके अगले पायदान पर जो लोग होते हैं जो बाकी कुछ तो नहीं पर कुछ विशेष चीजें जरूर फ़ारवर्ड करते हैं । उनको लगता है ये चीजें वास्तव में महत्वपूर्ण हैं और इनको फ़ारवर्ड करना कुछ गलत नहीं है । उदाहरण के लिये, "फ़ैक्ट्स टू मेक यू प्राउड अबाउट इंडिया"/ "किसी कारगिल/अक्षरधाम आपरेशन में शहीद हुये वीर के बारे में जानकारी"/ "सीमेन्स बैंगलौर में काम करने वाली किसी काल्पनिक महिला के बच्चे के लिये अस्थिमज्जा दान करने की अपील"/ " बिल गेट्स इस शेयरिंग हिज वैल्थ" आदि आदि ।
४) ये पायदान सबसे अलग होता है, और इस पायदान के लोग केवल "आनलाईन पिटीशन"/"हस्ताक्षर अभियान"/"ताजमहल को वोट दें" फ़ारवर्ड करते हैं ।
५) (इस पायदान में मैं भी आता हूँ) कुछ लोग किसी अन्य विषय से सम्बन्धित जानकारी (संगीत/इतिहास/कला/विज्ञान आदि) से सम्बन्धित "सत्य/रोचक" जानकारी अपने कुछ ऐसे मित्रों को फ़ारवर्ड करते हैं जो उनके हिसाब से इस जानकारी को रोचक/ज्ञानपद्र समझेंगे । चूँकि इस श्रेणी में मैं भी आता हूँ, इस श्रेणी के कुछ अलिखित नियमों (मेरे हिसाब से) की बात करते हैं ।
क) ऐसी ईमेल केवल उन्ही को भेजे जिनको आप व्यक्तिगत तौर पर जानते हों । अंगूठे का नियम हो सकता है कि आपने सम्बन्धित विषय पर उनसे पिछले दो महीने में कम से कम एक बार बात की हो । आपके पास उनका पता और फ़ोन नंबर हो ।
ख) दो-तीन बार ईमेल भेजने के बाद कभी बात होने पर उस ईमेल का जिक्र करें । अगर आपको दो या उससे अधिक बार ये सुनने को मिलता है कि "यार, मेल दिखी थी लेकिन इतना व्यस्त था कि पढ नहीं सका", तो इसे आप सभ्य भाषा में ये समझें कि उनको आपकी भेजी हुयी जानकारी में कोई रूचि नहीं है । आपको उन्हे दोबारा ऐसी ईमेल नहीं करनी चाहिये ।
ग) ऐसी ईमेल एक सप्ताह में दो बार से अधिक न करें ।
घ) अगर आपकी भेजी गयी जानकारी आपकी ईमेल के पाठकों को रोचक लगी होगी तो उनमें से कुछ निश्चित ही वापस ईमेल करके आपको धन्यवाद देंगे ।
ड) कभी भी धन्यवाद करते समय सभी लोगों को ईमेल न भेंजे, केवल सम्बन्धित व्यक्ति को ही प्रेषित करें ।
आप इन पाँचो पायदानों में से किस पायदान पर खडे हैं ? चाहे तो अपनी टिप्पणी के माध्यम से मुझे बता सकते हैं ।
मैने जब आचारसंहिता वाली पुस्तक पढी थी तो उसमें ब्लाग से सम्बन्धित कोई जानकारी नहीं थी । मैं अपने विचार से ब्लाग सम्बन्धी कुछ "अंगूठे के नियम" बता रहा हूँ । मेरी राय में इन्हे अपनाकर फ़ालतू के विवाद से आसानी से बचा जा सकता है ।
१) आपके ब्लाग पर टिप्प्णी भले ही दिखाई सबको दे, लेकिन एक प्रकार से वो आपके साथ व्यक्तिगत संवाद है । आप टिप्पणी के जवाब ईमेल से दे सकते हैं, लेकिन आम तौर पर टिप्पणी का जवाब आपके खुद के ब्लाग पर आपकी टिप्पणी से दिया जा सकता है । आप पर हुयी किसी व्यक्तिगत टिप्पणी/आक्षेप की जवाबदेही सिर्फ़ आपकी है । आपके मित्र अपनी टिप्पणी के माध्यम से उसका जवाब दे सकते हैं लेकिन इससे सदैव बचने का प्रयास करना चाहिये, वरना आपके मित्रों पर भी आक्षेप लगने की सम्भावना रहती है और फ़िर वो एक संवाद न रहकर व्यक्तिगत झगडा बन जाता है । आप पर लगाये गये किसी आक्षेप पर अपने किसी मित्र/अन्य पाठक द्वारा किसी जवाब की आकांक्षा नैतिक तौर पर गलत है । इस पचडे में पडना या न पडना उनका व्यक्तिगत मामला और आप इसे अपने सम्बन्धों की कसौटी न ही बनायें तो अच्छा है ।
२) किसी भी ब्लाग पर की गयी टिप्पणी को ब्लाग पर स्थान देने का फ़ैसला ब्लाग के मालिक के अधिकारक्षेत्र में आता है । हिन्दी ब्लागजगत में जहाँ टिप्पणियों का काफ़ी मोल है मेरी समझ से कोई भी ऐसा नहीं करेगा लेकिन अगर ऐसा हो तो आपकी नाराजगी नितांत अनुचित है । निश्चित रूप से पुन: टिप्पणी न करने अथवा उस ब्लाग को न पढने के लिये आप स्व्तन्त्र हैं, लेकिन इस मुद्दे का जवाब एक पोस्ट के माध्यम से सबको सुनाकर देना मेरी समझ से अनुचित व्यवहार होगा ।
३) ठीक इसी प्रकार, किसी टिप्पणीकर्ता की टिप्पणी के जवाब में लिखी गयी पोस्ट में टिप्पणीकर्ता का नाम बार बार लेना और अत्यधिक भावुक होना भी गलत है । ऐसे संवाद/जवाब के लिये व्यक्तिगत ईमेल कहीं बेहतर है । संवाद की समाप्ति के बाद आप एक पोस्ट में अपने वार्तालाप के मुख्य बिंदुओं को संक्षेप में लिख सकते हैं (दूसरे संवादी से उस संवाद को छापने की अनुमति के बाद) ।
४) जैसा कि रवि रतलामीजी ने बताया था कि इंटरनेट पर आपका लिखा हुआ कुछ भी लम्बे समय तक बना रह सकता है इसलिये अपने गुस्से को सदैव काबू में रखें । एक आदर्श नियम हो सकता है कि आप लिखते समय संयम रखे और पढते समय दिल को एकदम खुला रखें और अपने विवेक का प्रयोग करत हुये यथासंभव छोटी बातों को नजरअन्दाज करें ।
ये कुछ ऐसे विचारबिन्दु हैं जो मैं पिछले काफ़ी समय से आप सबके सम्मुख रखना चाह रहा था । आप अपनी प्रतिक्रिया टिप्पणी के माध्यम से दे सकते हैं ।
साभार,
नीरज रोहिल्ला
रविवार, मई 27, 2007
क्या हैं परदेस में भारतीयता के मायने?
जब तक मैं भारत में था इस प्रश्न का कोई औचित्य ही नहीं था लेकिन पिछले कम से कम दो वर्षों से ये प्रश्न मुझे परेशान कर रहा है । एक मौके पर मेरे एक साथी ने यूनिवर्सिटी में भारतीय से दिखने वाले एक विद्यार्थी से पूछा था कि वो भारत में कहाँ से है, तो उसका जवाब था कि वो एक अमेरिकन है और उसका घर कैलीफ़ोर्निया में है । उस समय तो कुछ नहीं लेकिन बाद में मेरे साथी ने तुरन्त उसको ABCD (America born confused desi) की उपाधि से नवाज दिया और इस विषय पर मेरी अपने साथी से भारतीयता और अमेरिकीपन पर लम्बी चर्चा हुयी थी ।
आखिर एक अमेरिकी नागरिक के अपने आप को भारतीय न माननें पर किसी को आपत्ति क्यों ? और यदि वो अपने आपको भारतीय कहे तो भी आप उसे ABCD कहकर उसकी भावनाओं का मजाक बनायें ।
मेरी समझ में प्रवासी भारतीयों की दूसरी पीढियों को अक्सर अनावश्यक ही प्रश्नवाचक नजरों का सामना करना पडता है । पहली पीढी वाले तो अपने आप को खालिस भारतीय समझकर और इस प्रकार का दावा करके खुश हो लेते हैं । उनसे कोई प्रश्न नहीं पूछता क्योंकि वो बडे गर्व से उनकी मेहनत और परदेस में उनके संघर्ष के किस्से सुनाते हैं । उन्हे गर्व होता है कि ग्रीन कार्ड और अमेरिका की नागरिकता के बाद भी वो एकदम भारतीय हैं, हाँ भारत में रहते जरूर नहीं ।
इसके विपरीत दूसरी पीढी जन्म से ही अमेरिकन होती है, एक्सेंट भी बिलकुल अमेरिकन लेकिन फ़िर भी दोनों ओर के लोग (अमेरिकन और भारतीय) उन्हें अजीब सी नजर से देखते हैं । ऐसा नहीं कि उनमें संस्कारों की कमी हो (वैसे ये बताता चलूँ कि संस्कारों का ठेका केवल भारत ने ही नहीं ले रखा है) फ़िर भी कभी कभी वो अपनी जडें तलाशते से दिखते हैं तो कभी अमेरिका की भीड का हिस्सा बनने की कोशिश करते हैं ।
विदेशों में रहने वाले दूसरे मूल के लोगों के इस प्रश्न की प्रासंगिकता और भी बढ जाती है जब हम देखते हैं कि लंदन में ब्रिटिश नागरिक जिनका जन्म ब्रिटेन में हुआ खुद अपने ही देश पर आतंकी हमले करते हैं । इसको हम भले ही एक धर्म अथवा देश विशेष से जोड कर देखें लेकिन इसकी परिभाषा व्यापक है ।
इसका कारण समझने के लिये मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ; आप ६० और ७० के दशक में अमेरिका आने वाली प्रथम भारतीय पीढी के बारे में सोचिये । अमेरिकी समाज के "मेल्टिंग पाट" में मेल्ट होना उनकी एक जरूरत थी । एक बार की भारत यात्रा का खर्चा ३००० डालर, २-३ डालर प्रति मिनट की दर पर भारत में फ़ोन करना, भारतीय सिनेमा और संगीत के लिये उन दुकानों की ओर तकना जहाँ फ़िल्मों और संगीत की घटिया रेकार्डिंग वीडीयो कैसेट पर किराये पर मिलती थी ।
इसके विपरीत अगर आज आप भारत में अमेरिका की तरह और अमेरिका में विशुद्ध भारतीय जीवन बिताना चाहते हैं तो किसी भी बडे शहर में आपको कोई तकलीफ़ नहीं होगी । अमेरिका में बिजली और फ़ोन के कनेक्शन के लिये भी आप हिन्दी, उर्दू और गुजराती में फ़ोन पर बात कर सकते हैं । जिस दिन भारत में "धूम २" रिलीज हो उसी दिन अमेरिका में फ़र्स्ट डे, फ़र्स्ट शो देख सकते हैं; भारत फ़ोन करना तो इतना सस्ता हो गया है कि पूछिये मत । अपने कम्प्यूटर से सारी जानकारी अपनी पसन्द की भाषा में ले सकते हैं । इसको ग्लोब्लाइजेशन कहिये या "वसुधैव कुटुम्बकम" लेकिन ये सत्य है ।
क्या आज के दौर में देश और नागरिकता के मायने गौण हो गये हैं ?
मैं दो साल तक अपनी यूनिवर्सिटी के "भारतीय छात्र संगठन" से जुडा हुआ था और मैने अनुभव किया कि यहाँ पर पिछले काफ़ी दशकों से रहने वाले प्रवासी भारतीय नये भारतीय छात्रों की सहायता के लिये सदैव तत्पर रहते हैं । किसी भी कार्यक्रम को आयोजित करने के लिये धन की कमी तो कभी भी आडे नहीं आयी । क्या ये उनकी भारतीयता का एक पहलू नहीं है ? अथवा ये उनकी अपनी जडों से अलग होने की टीस है ?
ये प्रश्न एक बार फ़िर उठा था जब मैं एक प्रवासी भारतीय परिवार के घर एक उत्सव में आमन्त्रित था । एक महोदय (जो पिछले लगभग तीस साल से यहीं पर बसे हुये हैं) ने बडे गर्व से कहा कि उनके पुत्र और पुत्री भारत में रहने वाले आजकल के नौजवानों से अधिक भारतीय हैं । मेरी उन सज्जन से बडी बेबाक बहस हुयी थी और ये उनका बडप्पन और उनके खुद के विचारों के प्रति ईमानदारी ही थी कि ऐसी चर्चा संभव हो सकी थी । मैं उनसे सहमत नहीं था और अन्त में हमने कहा कि "हम सहमत हैं कि हम असहमत हैं" और बिना किसी मनमुटाव के अपने अपने घर चले गये ।
सबसे पहले मैं उन सज्जन के विचार आपके सामने रखता हूँ,
उनके पुत्र/पुत्री आम अमरीकी बच्चों की तरह पार्टी नहीं करते, माता पिता की आज्ञा का पूरा सम्मान करते हैं । उनके बच्चों ने आर्यसमाज मंदिर में "वेदों के ऊपर आख्यान" सुने और समझे थे, उन्हे भारतीय खाना बहुत पसन्द है, भारतीय शास्त्रीय संगीत में रूचि है और उनके पुत्र ने तो विधिवत सितार बजाना भी सीखा है । उनकी पुत्री "भरतनाट्यम" की शिक्षा ले रही है । पिछले वर्ष वो भारत यात्रा पर गये थे और वहाँ के नौजवानों के नैतिक पतन और "माल कल्चर" से उन्हे बडी ठेंस लगी थी । उन्होने भी मैकाले को गरियाया था और भारत में पुरातन गुरूकुल टाईप के शिक्षापद्यति के पक्षधर थे । इस बात का वहाँ बैठे हुये कुछ लोगों ने समर्थन भी किया था । क्या भारतीयता के मायने केवल यही हैं ?
मुझे बहुत सारे ऐसे प्रवासी भारतीय मिले हैं जिनके विचार परस्पर विरोधी हैं । एक प्रकार के लोग केवल भारत की खामियों के बारे में बात करना चाहते हैं । राजनीति, गुन्डागर्दी, शरीफ़ आदमी की समस्यायें, प्रदूषण, भीड, रोजगार सम्बन्धी समस्यायें और पता नहीं क्या क्या । स्पष्ट तौर पर या तो वे भारत में बहुत सताये गये हैं या फ़िर इस तर्क के द्वारा अपने अमेरिका आने के फ़ैसले को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं । दूसरे प्रकार के लोग इसके एकदम विपरीत होते हैं । भारत की जरा सी बुराई नहीं सह सकते, जातिगत अस्पृश्यता की बात हो तो अमेरिका के नस्लभेद का उदाहरण, जरा जरा सी बात पर अपनी संस्कृति का उलाहना और इसी प्रकार की बातें ।
क्या भारतीय होने के लिये राग दरबारी के "वैद्यजी" के किरदार की समझ जरूरी है ? अगर ऐसा है तो भारत में रहने वाले कितने ही भारतीय भारतीय नहीं रहेंगे । भारतीयता को किसी भाषा अथवा धर्म के संदर्भ में तो परिभाषित किया ही नहीं जा सकता । तो फ़िर क्या है ये भारतीयता ? अमेरिका के जन्मास्टमी आयोजन में दांडिया करके, दीवाली और होली पर भारतीय परिधान पहनने से, ए. आर. रहमान और जगजीत सिंह के कार्यक्रम में जाकर या शास्त्रीय संगीत सीखकर आप मेरी नजर में भारतीय नहीं हो जाते ।
कम से कम आज मेरी राय में: "भारतीयता के मायने भारत की साहित्यिक, सांस्कृतिक और कलात्मक चमक दमक भी हैं और भारतीय कहलाने के लिये आपको भारत की खामियों के लिये भी जिम्मेदारी दिखानी पडेगी ।"
रविवार, मई 13, 2007
व्यवहारिक सम्बन्ध और मित्रता की कसौटी !
ये तब की बात है जब मेरे एक अभिन्न मित्र से मतभेद के कारण वार्तालाप बन्द हो गया था। गलती किसकी थी ये न तो आज ठीक से याद है और न ही मैं पीठ पीछे किसी पर दोषारोपण उचित समझता हूँ। शायद छः माह तक हमारी बातचीत नहीं हुयी। एक दिन सहसा मुझे एहसास हुआ कि मित्र से बात न करने की जिद की सांत्वना के लिये मैं काफ़ी बडा दण्ड चुका रहा हूँ। अक्सर हम एक दूसरे के सामने आते और सदैव सोचते कि शायद कोई दूसरा फ़िर से हाथ बढा दे। आज इस बारे में सोचता हूँ तो स्वयं के व्यवहार पर शर्म आती है। छ: माह के बाद हमारे एक मित्र ने पुन: दोनों की बातचीत प्रारम्भ करा दी। शायद हम दोनों ही किसी अवसर की तलाश में थे जिसे हम अपने छुद्र अभिमान के कारण छ: माह तक तलाश न कर सके। इस पूरे वाकये का विचारणीय पहलू ये था कि छ: माह के बाद हम दोनों को ही ठीक से इस बात का ज्ञान नहीं था कि हमारे मनभेद किस कारण से हुये थे।
बस दोनो अपनी जिद पर अडे थे कि मैं अपनी तरफ़ से पुन: मित्रता की पहल नहीं करूँगा। दोनों एक दूसरे के बारे में अन्य लोगों से जानकारी लेते रहते थे। शायद हमारी मित्रता समाप्त नहीं हुयी थी, एक दूसरे के लिये घृणा के भाव नहीं थे, हॄदय में कोई कटुता भी नहीं थी। एक दूसरे को दु:ख अथवा हानि पहुँचाने का किसी ने भी प्रयास नहीं किया था। किसी ने ठीक ही कहा है:
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुँजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों ।
अभी कुछ दिनों पहले महाभारत में द्रोणाचार्य एवं द्रुपद की कहानी याद आयी जब द्रोणाचार्य नें अपने शिष्यों से द्रुपद को बन्दी बनाकर लाने को कहा था। मैनें मन ही मन इस कहानी का विश्लेषण किया तो मित्रता की एक नयी व्याख्या मिली। द्रुपद तो संभवतः द्रोण को अपमानित करके उन्हें भूल भी गये होंगे परन्तु द्रोण द्रुपद को कभी भुला न सके। उनका ध्येय द्रुपद को बन्दी बनाकर उसे अपमानित करना नहीं अपितु अपने पुराने मित्र को पुनः प्राप्त करना था। द्रोण अपने मित्र के कटु व्यवहार के बाद भी अपने मित्र से न तो घृणा कर सके और न ही मित्रता को भुला सके। द्रोण के ह्रदय में मित्रता की सरिता मित्र की अनुपस्थिति में और भी प्रबल होती रही होगी।
महाभारत की इस घटना की मेरी व्याख्या सम्भवत: गलत हो सकती है। मैने अपने जीवन में ऐसे कई उदाहरण देखे हैं जब एक मित्र दूसरे मित्र को केवल इसीलिये क्षमा कर देता है क्योंकि क्षमा करना मित्र से क्रोधित रहने से कहीं कम कष्टकारक होता है। इस विषय पर सोचने पर एक पहलू और सामने आया है। अक्सर व्यक्तिगत सम्बन्धों में सभी समान स्तर पर नहीं होते हैं, अति निकट मित्रों को छोड दें तो बाकी में कोई एक दूसरे पर किसी न किसी प्रकार हावी रहता है। ऐसी स्थिति में मैने अक्सर महसूस किया है कि उनमें से एक सदैव प्राप्ति छोर (रिसीविंग एन्ड) पर रहता है। क्या आपने कभी अनुभव किया है कि कोई एक मित्र दूसरे पर जान छिड़कता है दूसरा उसे कुछ खास भाव नहीं देता है। ऐसे में मित्रता का धागा तब तक चलता है जब तक कोई एक समझौता करता रहता है। ऐसे संबंध में कौन अपराधी है ? ऐसा ही कुछ प्रेम संबंधों में भी देखा जा सकता है।
इसके विपरीत कुछ संबंध ऐसे होते हैं जिनको हम कभी समझ नही पाते। मेरे कुछ मित्र ऐसे हैं जिनसे मेरी वर्षों से बात नहीं हुयी है, लेकिन विश्वास है कि अगर कल उनसे मिलूँगा तो फिर पहले जैसी बेतकल्लुफी होगी। अपने खास दोस्तो को ईमेल लिखना अक्सर छूट जाता है क्योंकि सोचते हैं कि फुर्सत में लिखेंगे, और ये फुर्सत कभी हाथ नहीं आती। कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि आपका मित्र आपको जन्मदिन कि बधाई देना भूल गया और बाद में कभी बात हुयी तो उसका कहना कि उसे तारीखें याद नहीं रहती बेईमानी सा नहीं लगता है। क्योंकि हमे पता होता है कि वो झूठ नहीं बोल रहा है और हम एक हंसी और दो गालियों के साथ बात को वहीँ समाप्त कर देते हैं। ईश्वर करे हम सब अपने मित्रों से प्रेम करते रहें और यदा कदा कभी किसी से भूल हो भी जाये तो उसे "बनिये" की रसीद पर लिखी उक्ति ("भूल चूक, लेनी देनी") की तरह समझ कर क्षमा करें।