गुस्ताखी माफ़, आज बहुत दिनों के बाद फ़िर से काव्य का रूख किया है । यूँ ही बेतरतीब लफ़्जों को छापते में थोडी शर्म भी हो रही है ।
चल के दो कदम जो निकला बस्ती से बाहर,
मुर्दा बदन को किसी ने छू लिया हो जैसे ।
सुरमई सूरज से महकती मिट्टी की सौंधी खुशबू,
बारिश से धुली शाखों पर दमकते पत्ते,
और उन पत्तों पर जिन्दादिल चिडियों का शोर ।
मेरी लाचारी को रुक कर ताकती दो गिलहरियाँ,
फ़िर भागकर गुम होती शाखों की हरियाली में ।
मानो नन्हें हाथों से मुझे ही बुला रही हों,
कि आओ कुछ बात करें, कुछ बात करें ।
बोलने की ख्वाहिश में गले तक उमडे गूंगे जज्बात,
सीने में अटकी सांसो में जाने क्यों खो जाते हैं ?
कभी बोलना इतना भी दुश्वार नहीं था ।
आँखो की जुबान होती है, मैने तो नहीं सुनी,
बन्द बोझिल थकी आँखे भी कुछ बोलती हैं क्या?
जज्बातों को भी आवाज की बैसाखी चाहिये ।
ये खामोशी, ये सच्चाई अब बर्दाश्त न होगी,
झूठ छुप नहीं पाता, तार तार हो जाता है,
बेहतर है फ़िर से बस्ती का ही रूख करें ।
नीरज रोहिल्ला,
८ जुलाई, २००७
कविता/नज्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता/नज्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रविवार, जुलाई 08, 2007
सदस्यता लें
संदेश (Atom)