सोमवार, अप्रैल 27, 2009
बुधवार, अप्रैल 22, 2009
मैराथन का मक्का: बोस्टन मैराथन २००९
आज अमेरिका के बोस्टन शहर में विश्व प्रसिद्ध बोस्टन मैराथन का आयोजन हुआ। बोस्टन मैराथन अमेरिका की सबसे पुरानी (१८९७ से) और सबसे प्रतिष्ठित मैराथन दौड है। अक्सर लोग पूछते हैं कि जब सभी मैराथन २६.२ मील की होती हैं तो इनमें अन्तर क्या है। अलग-अलग शहरों का चरित्र अलग अलग होता है, जब बोस्टन में मैराथन होती है तो पूरा शहर इसका हिस्सा होता है। सोमवार के दिन भी लोग समय निकालकर सडक के किनारे घंटो धावको का उत्साह बढाते रहते हैं। जिन्होने बोस्टन मैराथन दौडी है वो अपने जूते/Hamstring/Calf/Quads पर कसम खा के कहेंगे कि ऐसा आनन्द और कहीं नहीं । मैं कभी बोस्टन नहीं गया और बोस्टन मैराथन में दौडना एक सपना है जो शायद अगले साल पूरा हो। विशिष्ट धावक भी बोस्टन के लिए महीनो तैयारी करते हैं और बोस्टन मैराथन जीतना उनके कैरियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है|
अगर आप एलीट धावक नहीं हैं तो इसे दौडने के लिये आपको बाकायदा क्वालिफ़ाई करना पडता है। कोई भी ऐरा-गैरा जाकर प्रारम्भ पंक्ति पर खडा नहीं हो सकता। बोस्टन मैराथन के क्वालिफ़ाईंग स्टैन्डर्ड इस प्रकार हैं:
इस साल की बोस्टन मैराथन को लेकर लोग ज्यादा उत्साहित थे। इस बार लोग उम्मीद कर रहे थे कि शायद महिला और पुरूष दोनों वर्गों में से किसी एक में तो कोई अमेरिकन इस दौड को जीतेगा। पुरूष वर्ग में रायन हाल (Ryan Hall) से लोगों को बडी उम्मीदें थीं लेकिन महिला वर्ग में कारा गाऊचर भी प्रबल प्रतिद्वन्दी थीं।
लोग कयास लगा रहे थे कि शायद रायन हॉल २४ वर्षों के बाद फिर से बोस्टन मैराथन जीतने वाले अमेरिकन धावक बन सकेंगे| पुरुषों के दौड़ में अन्य मुख्य प्रतिद्वंदी इथियोपिया के राबर्ट चेरिओट (Robert Cheruiyot, जो इस दौड़ को चार बार पहले जीत चुके हैं) , कीनिया के डेनिएल रोनो (Daniel Rono) और कीनिया के ही इवांस चेरिओट (Evans Cheruiyot) थे | इथियोपिया के देरिबा मर्गा ने बीजिंग ओलंपिक में आख़िरी ४०० मीटर में अपना तीसरा स्थान खो दिया था, लेकिन जनवरी में हमारे शहर ह्यूस्टन में देरिबा में शानदार दौड लगाते हुये Houston Marathon जीती थी, इसीलिये वो भी प्रबल दावेदार थे।
महिलाओं की दौड़ की बात करें तो रायन हॉल की ही तरह अमेरिका की ही कारा गाऊचर (Kara Gaucher) से लोगों को काफी उम्मीदे थी| कीनिया निवासी पिछले वर्ष की चैम्पियन डीरे टयून (Dire Tune) और इथियोपिया की सेलिना कोस्गी (Salina Kosgei) कट्टर प्रतिद्वंदियों में से थीं | पिछले वर्ष महिलाओं की दौड़ में प्रथान और द्वितीय स्थान का अंतर दो सेकेंड्स से ही कम था और इस साल ही कुछ ऐसी ही प्रतियोगिता की आशा थी|
सबसे पहले महिलाओं की ही दौड का पिछले साल का वीडियो देखिये और आखिरी ४०० मीटर दौड की उत्तेजन महसूस कीजिये।
इस वर्ष भी महिलाओं की दौड की समाप्ति देखना अपने में एक अनुभव था। २५.२ मील के बाद आख़िरी मील की दौड़ में कारा (Kara) डीरे (Dire) और सेलिना (Salina) से लगभग २-३ कदम आगे चल रहीं थीं, लेकिन इस आख़िरी १ मील की दौड़ में जो हुआ उसे शब्दों में बता पाना संभव नहीं है और इसके लिए आपको ये वीडियो देखना पडेगा|
अगर आप केवल परिणाम पढना चाहे तो वो इस प्रकार हैं:
1. Salina Kosgei KEN 2:32:16
2. Dire Tune ETH 2:32:17
3. Kara Goucher USA 2:32:25
4. Bezunesh Bekele ETH 2:33:08
5. Helena Kirop KEN 2:33:24
6. Lidiya Grigoryeva RUS 2:34:20
7. Atsede Habtamu ETH 2:35:34
8. Colleen S. De Reuck USA 2:35:37
9. Alice Timbilili KEN 2:36:25
10. Alina Ivanova RUS 2:36:50
पुरुषों की दौड़ में १७ मील के बाद कुछ ख़ास नहीं बदला | देरिबा मर्गा ने अपनी बढ़त बनाए रखी और रायन हॉल चौथे से तीसरे स्थान पर आ गए | देरिबा मर्गा ने अपने प्रतिद्वंदी को ५० सेकेंड्स से पछाड़कर इस दौड़ को जीता, इसके साथ ही उन्होंने बोस्टन मैराथन के $१५०,००० (लगभग ७५ लाख रुपये) के ईनाम को भी जीता| पुरुषों की दौड़ के परिणाम इस प्रकार रहे |
1. Deriba Merga ETH 2:08:42
2. Daniel Rono KEN 2:09:32
3. Ryan Hall USA 2:09:40
4. Tekeste Kebede ETH 2:09:49
5. Robert Cheruiyot KEN 2:10:06
6. Gashaw Asfaw ETH 2:10:44
7. Solomon Molia ETH 2:12:02
8. Evans Cheruiyot KEN 2:12:45
9. Stephen Kiogora KEN 2:13:00
10. Timothy Cherigat KEN 2:13:04
और अन्त में इथियोपिया के धावक अपनी विजयी मुस्कान के साथ, ;-)

अगर आप एलीट धावक नहीं हैं तो इसे दौडने के लिये आपको बाकायदा क्वालिफ़ाई करना पडता है। कोई भी ऐरा-गैरा जाकर प्रारम्भ पंक्ति पर खडा नहीं हो सकता। बोस्टन मैराथन के क्वालिफ़ाईंग स्टैन्डर्ड इस प्रकार हैं:
| उम्र समूह | पुरूष | महिला |
| 18-34 | 3hrs 10min | 3hrs 40min |
| 35-39 | 3hrs 15min | 3hrs 45min |
| 40-44 | 3hrs 20min | 3hrs 50min |
| 45-49 | 3hrs 30min | 4hrs 00min |
| 50-54 | 3hrs 35min | 4hrs 05min |
| 55-59 | 3hrs 45min | 4hrs 15min |
| 60-64 | 4hrs 00min | 4hrs 30min |
| 65-69 | 4hrs 15min | 4hrs 45min |
| 70-74 | 4hrs 30min | 5hrs 00min |
| 75-79 | 4hrs 45min | 5hrs 15min |
| 80 and over | 5hrs 00min | 5hrs 30min |
इस साल की बोस्टन मैराथन को लेकर लोग ज्यादा उत्साहित थे। इस बार लोग उम्मीद कर रहे थे कि शायद महिला और पुरूष दोनों वर्गों में से किसी एक में तो कोई अमेरिकन इस दौड को जीतेगा। पुरूष वर्ग में रायन हाल (Ryan Hall) से लोगों को बडी उम्मीदें थीं लेकिन महिला वर्ग में कारा गाऊचर भी प्रबल प्रतिद्वन्दी थीं।
लोग कयास लगा रहे थे कि शायद रायन हॉल २४ वर्षों के बाद फिर से बोस्टन मैराथन जीतने वाले अमेरिकन धावक बन सकेंगे| पुरुषों के दौड़ में अन्य मुख्य प्रतिद्वंदी इथियोपिया के राबर्ट चेरिओट (Robert Cheruiyot, जो इस दौड़ को चार बार पहले जीत चुके हैं) , कीनिया के डेनिएल रोनो (Daniel Rono) और कीनिया के ही इवांस चेरिओट (Evans Cheruiyot) थे | इथियोपिया के देरिबा मर्गा ने बीजिंग ओलंपिक में आख़िरी ४०० मीटर में अपना तीसरा स्थान खो दिया था, लेकिन जनवरी में हमारे शहर ह्यूस्टन में देरिबा में शानदार दौड लगाते हुये Houston Marathon जीती थी, इसीलिये वो भी प्रबल दावेदार थे।
महिलाओं की दौड़ की बात करें तो रायन हॉल की ही तरह अमेरिका की ही कारा गाऊचर (Kara Gaucher) से लोगों को काफी उम्मीदे थी| कीनिया निवासी पिछले वर्ष की चैम्पियन डीरे टयून (Dire Tune) और इथियोपिया की सेलिना कोस्गी (Salina Kosgei) कट्टर प्रतिद्वंदियों में से थीं | पिछले वर्ष महिलाओं की दौड़ में प्रथान और द्वितीय स्थान का अंतर दो सेकेंड्स से ही कम था और इस साल ही कुछ ऐसी ही प्रतियोगिता की आशा थी|
सबसे पहले महिलाओं की ही दौड का पिछले साल का वीडियो देखिये और आखिरी ४०० मीटर दौड की उत्तेजन महसूस कीजिये।
इस वर्ष भी महिलाओं की दौड की समाप्ति देखना अपने में एक अनुभव था। २५.२ मील के बाद आख़िरी मील की दौड़ में कारा (Kara) डीरे (Dire) और सेलिना (Salina) से लगभग २-३ कदम आगे चल रहीं थीं, लेकिन इस आख़िरी १ मील की दौड़ में जो हुआ उसे शब्दों में बता पाना संभव नहीं है और इसके लिए आपको ये वीडियो देखना पडेगा|
अगर आप केवल परिणाम पढना चाहे तो वो इस प्रकार हैं:
1. Salina Kosgei KEN 2:32:16
2. Dire Tune ETH 2:32:17
3. Kara Goucher USA 2:32:25
4. Bezunesh Bekele ETH 2:33:08
5. Helena Kirop KEN 2:33:24
6. Lidiya Grigoryeva RUS 2:34:20
7. Atsede Habtamu ETH 2:35:34
8. Colleen S. De Reuck USA 2:35:37
9. Alice Timbilili KEN 2:36:25
10. Alina Ivanova RUS 2:36:50
पुरुषों की दौड़ में १७ मील के बाद कुछ ख़ास नहीं बदला | देरिबा मर्गा ने अपनी बढ़त बनाए रखी और रायन हॉल चौथे से तीसरे स्थान पर आ गए | देरिबा मर्गा ने अपने प्रतिद्वंदी को ५० सेकेंड्स से पछाड़कर इस दौड़ को जीता, इसके साथ ही उन्होंने बोस्टन मैराथन के $१५०,००० (लगभग ७५ लाख रुपये) के ईनाम को भी जीता| पुरुषों की दौड़ के परिणाम इस प्रकार रहे |
1. Deriba Merga ETH 2:08:42
2. Daniel Rono KEN 2:09:32
3. Ryan Hall USA 2:09:40
4. Tekeste Kebede ETH 2:09:49
5. Robert Cheruiyot KEN 2:10:06
6. Gashaw Asfaw ETH 2:10:44
7. Solomon Molia ETH 2:12:02
8. Evans Cheruiyot KEN 2:12:45
9. Stephen Kiogora KEN 2:13:00
10. Timothy Cherigat KEN 2:13:04
और अन्त में इथियोपिया के धावक अपनी विजयी मुस्कान के साथ, ;-)
मंगलवार, अप्रैल 21, 2009
क्या नाईकी (Nike) का ये विज्ञापन अश्लील है
नोट: सिर्फ़ १८ वर्ष या उससे अधिक उम्र के पाठकों के लिये। वैसे इसमें ऐसा कुछ भी अश्लील नहीं है। कल एक मित्र ने यूट्यूब पर इस विज्ञापन का लिंक भेजा और इसे देखने के बाद मैं हंसता रहा, लैब में सब सोच रहे थे कि क्या नीरज पागल हो गया है। फ़िर बाकी सबको दिखाया तो सब लोग विज्ञापन देखकर मुस्कुराने लगे। इस विज्ञापन को अभी तक टेलीविजन पर नहीं देखा है, हो सकता है Nike इसे दिखाये भी नहीं। लेकिन आप देखिये और बताईये कि क्या ये अश्लील है?
ध्यान दीजियेगा कि इस विज्ञापन में दिखाये गये धावकों में से अधिकतर विश्वस्तरीय हैं। बाकी आप देखकर खुद ही निर्णय लें, ;-)
ध्यान दीजियेगा कि इस विज्ञापन में दिखाये गये धावकों में से अधिकतर विश्वस्तरीय हैं। बाकी आप देखकर खुद ही निर्णय लें, ;-)
रविवार, अप्रैल 12, 2009
दो दौडों का विवरण फ़ोटुआ के साथ !!!
अपनी दाँयी टांग को चिट्ठी लिखने के बाद मामला कुछ सुधरा है और इस प्रविष्टी में हम दो दौडों का विवरण बांच रहे हैं। इसी बीच हमारी दांयी टांग ने हमारे शिकायती पत्र का जवाब हमें लिख भेजा है जिसे अगली पोस्ट में छापा जायेगा।
पहली दौड थी Bellaire Trolley Run 5k। ये ह्यूस्टन की पाँच किमी दूरी की प्रसिद्ध दौड है, इसको लगभग सभी अच्छे धावक दौडते हैं क्योंकि इसमें ईनाम में एक ट्राम मिलती है जो चाबी घुमाने पर मधुर संगीत बजाती है। हमारा उद्देश्य था कि इस दौड को २० मिनट से कम समय में पूरा किया जाये। लेकिन एक लफ़डा हो गया, दौड से एक दिन पहले हमारे प्रिय मित्र शेखर जैन का फ़ोन आया कि वो अपनी पी.एच.डी. पूरी करके नौकरी करने के लिये भारत रवाना हो रहे हैं और इसीलिये आज शाम को उनकी शान में एक आयरिश बार में मदिरासेवन का कार्यक्रम है। अक्सर ऐसे मौके छोडे नहीं जाते लेकिन अगले दिन सुबह दौड और इधर अपने प्रिय मित्र की फ़ेयरवैल पार्टी। खैर आयरिश बार में सब लोग मिले और हम एक बीयर का गिलास उठाकर जितना धीरे पी सकते थे उतना धीरे पीने का प्रयास करते हुये चर्चा करते रहे। लेकिन फ़िर भी दो गिलास बीयर और चर्चा करके घर आते आते सुबह का १ बज गया। घडी में सुबह ५:३० का अलार्म भरकर सोने का प्रयास किया लेकिन नींद देर तक न आयी।
सुबह ५:३० बजे उठकर, नहाकर (जी हाँ नहाकर, आप बिना नहाये मन्दिर नहीं जाते, आफ़िस नहीं जाते तो हम बिना नहाये रेस कैसे दौड सकते हैं) ७ बजे तक दौड स्थल तक आ चुके थे। वहाँ पर हमारे धावक क्लब का तम्बू पहले से तैयार था वहाँ पर Rosie काफ़ी का थर्मस लेकर आयी थीं। हमने रात का सूरूर उतारने के लिये दो कप काफ़ी निपटा दी। उसके बाद दौड से १५ मिनट पहले हम वार्म अप करने निकल पडे। लगभग १ मील की धीमी दौड लगाकर मांशपेशियों को सोते से जगाकर आगे वाले काम के लिये मनुहार करके तैयार किया गया।
हमको पता चला कि इसी दौड में ह्यूस्टन निवासी ६० वर्षीय महिला सेब्रा हार्वी (Sabra Harvey) ५ किमी की दौड का विश्व कीर्तिमान बनाने का प्रयास करेंगी। रेस के प्रारम्भ में सेब्रा के बगल में खडे होना ही बडी बात थी, उनके आत्मविश्वास को देखते हुये लग रहा था कि वे अपने गोल में सफ़ल होंगी। सेब्रा को इस कीर्तिमान के लिये इस दौड में १९ मिनट और ३७ सेकेंड्स के समय की आवश्यकता थी लेकिन उन्होनें इस दौड को १९ मिनट और १२ सेकेंड्स मे पूरा करके विश्व कीर्तिमान अपने नाम किया।
फ़िलहाल बन्दूक की आवाज के साथ ही दौड शुरू हो गयी। हमने अपनी दौड लीड ग्रुप के साथ प्रारम्भ की लेकिन शुरूआती ४०० मीटर में ही वो हमसे दूर होते चले गये। पहला मील उत्तेजना में आवश्यकता से अधिक तेज दौडा गया। घडी देखने पर लगा कि पहला मील ६ मिनट और १० सेकेंड्स में पूरा हुआ। सवा मील तक आते आते हमारी सांस उखडने सी लगी और इसी पशोपेश में ७ लोग हमसे आगे बढ गये। हमने अपने आप को संभाला और दूसरे मील में अपनी सांस और हृदयगति पर नियंत्रण करने का प्रयास किया। दूसरा मील ६ मिनट और ३५ सेकेंड्स में पूरा हुआ। इसके बाद हमने अपने को सहज महसूस किया और एक-एक करके आगे निकले ७ लोगों को खदेडने का प्रयास किया। लगभग २.७५ मील पर हमने सातवें धावक को भी पीछे छोडा और आगे हमारे मित्र Simon Brabo दौड रहे थे। Simon की आदत सब जानते हैं कि अगर कोई उनसे आगे निकलने का प्रयास करे तो फ़िर Simon को गुस्सा आता है :-)
खैर हम दौडते दौडते Simon के कन्धे तक आ गये और बिना आवाज किये उनके पीछे लगे रहे, अचानक Simon ने पीछे मुडकर देखा और हमने बिना कुछ कहे अपनी रफ़्तार बढा दी। जब तक Simon कुछ समझते हमने ५-६ कदम की लीड ले ली थी। उसके बाद समाप्ति पंक्ति तक Simon और हम कडी प्रतिस्पर्धा में रहे लेकिन हमने उनको पीछे छोड ही दिया। Simon उस दिन अच्छा महसूस नहीं कर रहे थे और अगली दौड में हमारी खैर नहीं है (बिना ईस्माइली के)।

(दौड की समाप्ति के बाद हरदीप और हम विजयी मुस्कान के साथ) (अपने धावक क्लब के लिये ईनाम जीतते हुये)


(हमारे धावक क्लब के लिये ईनाम जीतने पर Lara की तरफ़ बधाई तो बनती ही थी )
उसके अगले हफ़्ते यानि कल (शनिवार को) हमने Flying Owls 5k में भाग लिया। मजे की बात है कि इस दौड में हमारा समय १९ मिनट और १७ सेकेंड्स रहा जो पिछली दौड (१९:३७) की अपेक्षा बेहतर रहा लेकिन फ़िर भी हमें कोई ईनाम नहीं मिला क्योंकि इस दौड में उम्र समूह ५ वर्ष के अन्तराल (२५-२९) के स्थान पर १० वर्ष (२०-२९) का था और २०-२१ साल के छोकरे लोग हमसे भी तेज दौड गये :-)
इस दौड में हमारे कुछ बेहतरीन फ़ोटो लिये गये जो हम लगा रहे हैं।


(ये वाला फ़ोटो मेरा पसंदीदा है, दोनो पैर हवा में फ़्लोट करते हुये ऐसा लग रहा है कि जैसे Flying Owls 5k में हम सच में ही उड रहे हों)

(इस वाले फ़ोटो का क्या कहना, आखिरी ३०० मीटर में जिस तेजी और विश्वास की जरूरत होती है, बिल्कुल वैसा ही फ़ोटो आया है)
पहली दौड थी Bellaire Trolley Run 5k। ये ह्यूस्टन की पाँच किमी दूरी की प्रसिद्ध दौड है, इसको लगभग सभी अच्छे धावक दौडते हैं क्योंकि इसमें ईनाम में एक ट्राम मिलती है जो चाबी घुमाने पर मधुर संगीत बजाती है। हमारा उद्देश्य था कि इस दौड को २० मिनट से कम समय में पूरा किया जाये। लेकिन एक लफ़डा हो गया, दौड से एक दिन पहले हमारे प्रिय मित्र शेखर जैन का फ़ोन आया कि वो अपनी पी.एच.डी. पूरी करके नौकरी करने के लिये भारत रवाना हो रहे हैं और इसीलिये आज शाम को उनकी शान में एक आयरिश बार में मदिरासेवन का कार्यक्रम है। अक्सर ऐसे मौके छोडे नहीं जाते लेकिन अगले दिन सुबह दौड और इधर अपने प्रिय मित्र की फ़ेयरवैल पार्टी। खैर आयरिश बार में सब लोग मिले और हम एक बीयर का गिलास उठाकर जितना धीरे पी सकते थे उतना धीरे पीने का प्रयास करते हुये चर्चा करते रहे। लेकिन फ़िर भी दो गिलास बीयर और चर्चा करके घर आते आते सुबह का १ बज गया। घडी में सुबह ५:३० का अलार्म भरकर सोने का प्रयास किया लेकिन नींद देर तक न आयी।
सुबह ५:३० बजे उठकर, नहाकर (जी हाँ नहाकर, आप बिना नहाये मन्दिर नहीं जाते, आफ़िस नहीं जाते तो हम बिना नहाये रेस कैसे दौड सकते हैं) ७ बजे तक दौड स्थल तक आ चुके थे। वहाँ पर हमारे धावक क्लब का तम्बू पहले से तैयार था वहाँ पर Rosie काफ़ी का थर्मस लेकर आयी थीं। हमने रात का सूरूर उतारने के लिये दो कप काफ़ी निपटा दी। उसके बाद दौड से १५ मिनट पहले हम वार्म अप करने निकल पडे। लगभग १ मील की धीमी दौड लगाकर मांशपेशियों को सोते से जगाकर आगे वाले काम के लिये मनुहार करके तैयार किया गया।
हमको पता चला कि इसी दौड में ह्यूस्टन निवासी ६० वर्षीय महिला सेब्रा हार्वी (Sabra Harvey) ५ किमी की दौड का विश्व कीर्तिमान बनाने का प्रयास करेंगी। रेस के प्रारम्भ में सेब्रा के बगल में खडे होना ही बडी बात थी, उनके आत्मविश्वास को देखते हुये लग रहा था कि वे अपने गोल में सफ़ल होंगी। सेब्रा को इस कीर्तिमान के लिये इस दौड में १९ मिनट और ३७ सेकेंड्स के समय की आवश्यकता थी लेकिन उन्होनें इस दौड को १९ मिनट और १२ सेकेंड्स मे पूरा करके विश्व कीर्तिमान अपने नाम किया।
फ़िलहाल बन्दूक की आवाज के साथ ही दौड शुरू हो गयी। हमने अपनी दौड लीड ग्रुप के साथ प्रारम्भ की लेकिन शुरूआती ४०० मीटर में ही वो हमसे दूर होते चले गये। पहला मील उत्तेजना में आवश्यकता से अधिक तेज दौडा गया। घडी देखने पर लगा कि पहला मील ६ मिनट और १० सेकेंड्स में पूरा हुआ। सवा मील तक आते आते हमारी सांस उखडने सी लगी और इसी पशोपेश में ७ लोग हमसे आगे बढ गये। हमने अपने आप को संभाला और दूसरे मील में अपनी सांस और हृदयगति पर नियंत्रण करने का प्रयास किया। दूसरा मील ६ मिनट और ३५ सेकेंड्स में पूरा हुआ। इसके बाद हमने अपने को सहज महसूस किया और एक-एक करके आगे निकले ७ लोगों को खदेडने का प्रयास किया। लगभग २.७५ मील पर हमने सातवें धावक को भी पीछे छोडा और आगे हमारे मित्र Simon Brabo दौड रहे थे। Simon की आदत सब जानते हैं कि अगर कोई उनसे आगे निकलने का प्रयास करे तो फ़िर Simon को गुस्सा आता है :-)
खैर हम दौडते दौडते Simon के कन्धे तक आ गये और बिना आवाज किये उनके पीछे लगे रहे, अचानक Simon ने पीछे मुडकर देखा और हमने बिना कुछ कहे अपनी रफ़्तार बढा दी। जब तक Simon कुछ समझते हमने ५-६ कदम की लीड ले ली थी। उसके बाद समाप्ति पंक्ति तक Simon और हम कडी प्रतिस्पर्धा में रहे लेकिन हमने उनको पीछे छोड ही दिया। Simon उस दिन अच्छा महसूस नहीं कर रहे थे और अगली दौड में हमारी खैर नहीं है (बिना ईस्माइली के)।
हमने इस दौड को १९ मिनट और ३७ सेकेंड्स में पूरा किया और अपने उम्र समूह (२५-२९ वर्ष) में हमें द्वितीय पुरस्कार मिला जिसका फ़ोटो हम सनद के साथ लगा रहे हैं।
(दौड की समाप्ति के बाद हरदीप और हम विजयी मुस्कान के साथ) (अपने धावक क्लब के लिये ईनाम जीतते हुये)
(हमारे धावक क्लब के लिये ईनाम जीतने पर Lara की तरफ़ बधाई तो बनती ही थी )
उसके अगले हफ़्ते यानि कल (शनिवार को) हमने Flying Owls 5k में भाग लिया। मजे की बात है कि इस दौड में हमारा समय १९ मिनट और १७ सेकेंड्स रहा जो पिछली दौड (१९:३७) की अपेक्षा बेहतर रहा लेकिन फ़िर भी हमें कोई ईनाम नहीं मिला क्योंकि इस दौड में उम्र समूह ५ वर्ष के अन्तराल (२५-२९) के स्थान पर १० वर्ष (२०-२९) का था और २०-२१ साल के छोकरे लोग हमसे भी तेज दौड गये :-)
इस दौड में हमारे कुछ बेहतरीन फ़ोटो लिये गये जो हम लगा रहे हैं।
(ये वाला फ़ोटो मेरा पसंदीदा है, दोनो पैर हवा में फ़्लोट करते हुये ऐसा लग रहा है कि जैसे Flying Owls 5k में हम सच में ही उड रहे हों)
(इस वाले फ़ोटो का क्या कहना, आखिरी ३०० मीटर में जिस तेजी और विश्वास की जरूरत होती है, बिल्कुल वैसा ही फ़ोटो आया है)
बुधवार, अप्रैल 01, 2009
मेरी दांयी टांग के नाम एक चिट्ठी:
पहले सोचा कि तुमसे (दांयी टांग) अकेले में बात की जाये, लेकिन कल के तुम्हारे व्यवहार ने जो दिल तोडा है उसके बाद मौखिक संवाद की जगह लिखित में आन द रेकार्ड तुम्हे चिट्ठी लिख रहा हूँ। पहले कुछ बातें याद दिलाता हूँ,
१) याद है ह्यूस्टन मैराथन? हमने फ़ैसला किया था कि इसे ३:३० में खत्म करेंगे। दौड से पहले अपना पेट काटकर तुम्हारी मालिश भी करवायी थी। तुम्हारे लिये अच्छे से अच्छे जूते खरीदे, उनमें स्पेशन इन-सोल भी लगवाये कि तुम्हे कोई तकलीफ़ न हो। नतीजा क्या निकला? २२वें मील तक तुमने खूब साथ निभाया, उसके बाद जब केवल ४.२ मील बाकी थे, तुमने ऐसे नजरें फ़ेर लीं जैसे जानते भी नहीं। भला हो बांयी टांग का जिसने तुम्हारा बोझ भी अपने ऊपर लिया और जो जिम्मेदारी तुम्हे और उसे ५०-५० बांटनी थी, ६५-३५ बांटकर मैराथन पूरी करनी पडी।
ठीक है, हमने तुम्हारी बात मानी की ये पहला मैराथन था और तुम स्ट्रैस नहीं झेल पायी। उसके बाद हमने कागज पर कैलकुलेशन की थी कि अगली मैराथन में बोस्टन के लिये क्वालीफ़ाई करना है। याद है? तुमने कहा था कि एक मौका और दे दो, इस बार मायूस नहीं करोगी। बोस्टन कोई मजाक नहीं है, हम सब इसके लिये मेहनत कर रहे
हैं। इसके लिये एक साल में ३:३८ से ३:१० पर जाना होगा। मतलब कि पूरे २८ मिनट का इम्प्रूवमेंट।
२) याद है Run Wild Half Marathon? वो तो केवल १३.१ मील की थी। इतना तो तुम्हे भी पता है कि इस दूरी में तुम्हे कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिये। लेकिन फ़िर १० वें मील के आस पास तुम्हारे नाटक शुरू हो गये थे। वो तो भला हो कि जैसे तैसे तुम्हें घसीटकर १:३४:४१ में रेस पूरी हुयी थी। वरना तुम्हारी सुनते तो मिल लिया था फ़र्स्ट प्राईज।
३) इसके बाद Bayou City Classic 10K, ये तो केवल १० किमी की दौड थी। हमने तय किया था कि इसे ४२ मिनट में पूरा करेंगे। तुमने भी काफ़ी साथ दिया लेकिन आखिरी आधे मील में जब मैने तुमसे पूछा कि थोडा तेज दौडें तो बांयी टांग तैयार थी और तुमने धोका दे दिया। सोचो अगर तुम साथ देती तो ४१:०८ की जगह ४१ मिनट में दौड पूरी हो सकती थी।
४) बोस्टन की तैयारी के लिये हम सब राजी हुये थे कि टैक वर्क बहुत जरूरी है। पहले ३ वर्क आऊट में तो तुम भी कितनी खुश थी। लेकिन कल क्या हुया? इतनी सुन्दर कन्या आकर बोलती है कि पिछले हफ़्ते मैने तुम्हे दौडते देखा था, हम दोनो लगभग एक ही रफ़्तार पे दौडते हैं। क्या मैं आज तुम्हारे साथ दौड सकती हूँ। हमने उस कन्या को वादा दे दिया और पहले ही वर्क आऊट में तुम्हारे ड्रामे शुरू हो गये। वो तो अच्छा था कि हर वर्क आऊट के बीच में ३ मिनट का अन्तर था और उस बीच में हमने तुम्हे समझा लिया कि इज्जत की बात है आज साथ न छोडो। वरना कल तो तुमने इज्जत का कूडा कर दिया था। देखा आखिरी वर्क आऊट के बाद कन्या कितनी खुश थी, अपने से अपना फ़ोन नम्बर दिया और कहा कि हमें शुक्रवार को भी साथ दौडना चाहिये। आज सुबह सुबह ईमेल आया कि क्या शुक्रवार को शाम ४:३० का समय मेरे लिये उचित है। लेकिन तुम्हे ये सब क्यों बरदाश्त होगा, जलती जो हो तुम मुझसे।
कुछ सीखो बांयी टांग से, कितना भी कम्पटीशन हो जरा भी नहीं डरती। उसको बोलो कि थोडा तेज दौडें तो बोलती है हाँ क्यों नहीं। एक तुम हो, जरा जरा सी बात में नाटक शुरू कि आज गर्मी बहुत है, आज वार्म अप ठीक से नहीं हुआ।
अब शनिवार को एक ५ किमी की दौड है। तुम्हे भी पता है कि ये दौड कितनी जरूरी है। इस दौड में हम सब मिलकर २० मिनट का गोल तोडने की फ़िराक में हैं। २० मिनट का मतलब जानती हो? हर किमी ४ मिनट से कम समय में पूरा करना। ये तुम भी जानती हो कि पिछले एक महीने की मेहनत के बाद ये हो जाना चाहिये। अगर तुम राजी न हो तो मैं अपना नाम वापिस ले लूँ लेकिन अगर एक बार तैयार हो जाओ तो फ़िर ५ किमी के बीच में तुम्हारा ड्रामा नहीं चाहिये।
एक बात और, हमें पता है कि दौड से १ दिन पहले तुम्हे आराम चाहिये होता है। लेकिन ये केवल ५ किमी की दौड है और हम शुक्रवार को उस कन्या के साथ दौडने का वादा कर चुके हैं। अब नौटंकी बन्द करो और सीधे सीधे लाईन पर आ जाओ वरना हमें उंगली टेढा करना भी आता है।
१) याद है ह्यूस्टन मैराथन? हमने फ़ैसला किया था कि इसे ३:३० में खत्म करेंगे। दौड से पहले अपना पेट काटकर तुम्हारी मालिश भी करवायी थी। तुम्हारे लिये अच्छे से अच्छे जूते खरीदे, उनमें स्पेशन इन-सोल भी लगवाये कि तुम्हे कोई तकलीफ़ न हो। नतीजा क्या निकला? २२वें मील तक तुमने खूब साथ निभाया, उसके बाद जब केवल ४.२ मील बाकी थे, तुमने ऐसे नजरें फ़ेर लीं जैसे जानते भी नहीं। भला हो बांयी टांग का जिसने तुम्हारा बोझ भी अपने ऊपर लिया और जो जिम्मेदारी तुम्हे और उसे ५०-५० बांटनी थी, ६५-३५ बांटकर मैराथन पूरी करनी पडी।
ठीक है, हमने तुम्हारी बात मानी की ये पहला मैराथन था और तुम स्ट्रैस नहीं झेल पायी। उसके बाद हमने कागज पर कैलकुलेशन की थी कि अगली मैराथन में बोस्टन के लिये क्वालीफ़ाई करना है। याद है? तुमने कहा था कि एक मौका और दे दो, इस बार मायूस नहीं करोगी। बोस्टन कोई मजाक नहीं है, हम सब इसके लिये मेहनत कर रहे
२) याद है Run Wild Half Marathon? वो तो केवल १३.१ मील की थी। इतना तो तुम्हे भी पता है कि इस दूरी में तुम्हे कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिये। लेकिन फ़िर १० वें मील के आस पास तुम्हारे नाटक शुरू हो गये थे। वो तो भला हो कि जैसे तैसे तुम्हें घसीटकर १:३४:४१ में रेस पूरी हुयी थी। वरना तुम्हारी सुनते तो मिल लिया था फ़र्स्ट प्राईज।
३) इसके बाद Bayou City Classic 10K, ये तो केवल १० किमी की दौड थी। हमने तय किया था कि इसे ४२ मिनट में पूरा करेंगे। तुमने भी काफ़ी साथ दिया लेकिन आखिरी आधे मील में जब मैने तुमसे पूछा कि थोडा तेज दौडें तो बांयी टांग तैयार थी और तुमने धोका दे दिया। सोचो अगर तुम साथ देती तो ४१:०८ की जगह ४१ मिनट में दौड पूरी हो सकती थी।
४) बोस्टन की तैयारी के लिये हम सब राजी हुये थे कि टैक वर्क बहुत जरूरी है। पहले ३ वर्क आऊट में तो तुम भी कितनी खुश थी। लेकिन कल क्या हुया? इतनी सुन्दर कन्या आकर बोलती है कि पिछले हफ़्ते मैने तुम्हे दौडते देखा था, हम दोनो लगभग एक ही रफ़्तार पे दौडते हैं। क्या मैं आज तुम्हारे साथ दौड सकती हूँ। हमने उस कन्या को वादा दे दिया और पहले ही वर्क आऊट में तुम्हारे ड्रामे शुरू हो गये। वो तो अच्छा था कि हर वर्क आऊट के बीच में ३ मिनट का अन्तर था और उस बीच में हमने तुम्हे समझा लिया कि इज्जत की बात है आज साथ न छोडो। वरना कल तो तुमने इज्जत का कूडा कर दिया था। देखा आखिरी वर्क आऊट के बाद कन्या कितनी खुश थी, अपने से अपना फ़ोन नम्बर दिया और कहा कि हमें शुक्रवार को भी साथ दौडना चाहिये। आज सुबह सुबह ईमेल आया कि क्या शुक्रवार को शाम ४:३० का समय मेरे लिये उचित है। लेकिन तुम्हे ये सब क्यों बरदाश्त होगा, जलती जो हो तुम मुझसे।
कुछ सीखो बांयी टांग से, कितना भी कम्पटीशन हो जरा भी नहीं डरती। उसको बोलो कि थोडा तेज दौडें तो बोलती है हाँ क्यों नहीं। एक तुम हो, जरा जरा सी बात में नाटक शुरू कि आज गर्मी बहुत है, आज वार्म अप ठीक से नहीं हुआ।
अब शनिवार को एक ५ किमी की दौड है। तुम्हे भी पता है कि ये दौड कितनी जरूरी है। इस दौड में हम सब मिलकर २० मिनट का गोल तोडने की फ़िराक में हैं। २० मिनट का मतलब जानती हो? हर किमी ४ मिनट से कम समय में पूरा करना। ये तुम भी जानती हो कि पिछले एक महीने की मेहनत के बाद ये हो जाना चाहिये। अगर तुम राजी न हो तो मैं अपना नाम वापिस ले लूँ लेकिन अगर एक बार तैयार हो जाओ तो फ़िर ५ किमी के बीच में तुम्हारा ड्रामा नहीं चाहिये।
एक बात और, हमें पता है कि दौड से १ दिन पहले तुम्हे आराम चाहिये होता है। लेकिन ये केवल ५ किमी की दौड है और हम शुक्रवार को उस कन्या के साथ दौडने का वादा कर चुके हैं। अब नौटंकी बन्द करो और सीधे सीधे लाईन पर आ जाओ वरना हमें उंगली टेढा करना भी आता है।
मंगलवार, मार्च 24, 2009
एडल्ट ह्यूमर और हिन्दी ब्लाग जगत !!!
हम माने या न माने लेकिन एडल्ट ह्यूमर समाज में हमेशा रहा है और रहेगा। मेरी राय में एडल्ट ह्यूमर में सर्वश्रेष्ठ वो होता है जो Tangential होता है। उसका शीर्षक अथवा कन्टेंट खुद कुछ बहुत ही मासूम सा कहता है लेकिन आपके दिमाग पर उसका अपेक्षित असर होता है। लेकिन हिन्दी ब्लाग जगत पर कुछ भी लिखते समय बडा डर सा लगता है, क्योंकि यहां आत्म शुद्धता बहुत है। ये ही बात कभी कभी थोडा बोझिल भी करती है। बोझिल इसलिये करती है क्योंकि जिस वातावरण (स्कूल) में हम रहते हैं वहां इस प्रकार कि बाते हम रोज ही करते हैं इसलिये इससे इंकार करना कथनी और करनी का फ़र्क होगा।
एक उदाहरण देता हूं, मेरी एक जानने वाली कन्या ने एक दौडने वाली GPS घडी खरीदी। लेकिन चूंकि वो Apple के Mac कम्प्यूटर का प्रयोग करती थी, घडी और कम्प्यूटर की किसी वजह से आपस में नहीं बनती थी और वो बार बार डिस्कनेक्ट हो जाती थी। उसका मानना था कि दौडते समय भी जब कभी घडी गडबडी करती है ये उसके कम्प्यूटर के कारण है।
घडी के निर्माताओं ने जब Mac कम्प्यूटर के लिये अलग से Software निकाला तो वो कन्या बहुत खुश हो गयी। उसने खुशी खुशी अपने भाई को ईमेल किया जिसका जवाब उसके भाई ने कुछ इस प्रकार दिया। जवाब मजेदार था इसलिये उसने अपने दोस्तों को बताया और मैं उससे पूछकर यहाँ पोस्ट कर रहा हूं।
उसके भाई ने घडी के बारे में जो लिखा उसका विवरण ये है (फ़िल लडकी का अपनी घडी को दिया हुआ नाम है और ध्यान रखिये कि कन्या क्रास कन्ट्री यानि झील, झरने, पहाड के आस पास दौडती है)।
Too bad, like most of the men in your life, this is going to be full of promise and intrigue. He will lure your heart and tempt your mind with bits of information. He will wonder hills, explore valleys, cross chasms, streams and maybe even a river or mountain top. You will do all of these things believing that Phil is right there with you, savoring every moment just waiting for the opportunity to share his take on your adventures together only to find out that, like before, nothing has changed and he lost interest a mile and a half into your journey.
जब मैने इसको पहली बार पढा तो हंसते हंसते लोटपोट हो गया और उसके भाई के सेंस आफ़ ह्यूमर का कायल हो गया। ऐसा ही कुछ हिन्दी ब्लाग पर भी हो तो हंगामा तो नहीं मचेगा, :-)
एक और उदाहरण है, एक दौडने वाली वेबसाईट पर आपके धावक होने की कई परिभाषायें थीं। बढिया लगा इसीलिये हिन्दी अनुवाद करने लगा कि इसे अपने ब्लाग पर छापूंगा। यहां तक पंहुचा कि अटक गया कि इसका अनुवाद कैसे होगा और इसे ब्लाग पर पोस्ट करूं कि न करूं।
You say things like "long and hard" to your female friends and it is not a sexual innuendo.
क्या यही कल्चरल डिफ़्रेन्स है? फ़िलहाल तो आप बाकी परिभाषाओं का हिन्दी अनुवाद पढ लें।
१) आप "आसान" और १० मील एक ही वाक्य में प्रयोग कर सकते हैं,
२) एक दिन में आपके जूते आपकी कार से ज्यादा दूरी तय करते हैं,
३) आप गोल्फ़ कोर्स जाते हैं जिससे वहां दौड सकें,
४) आप दौडते हैं लेकिन पता नहीं क्यों,
५) एक से अधिक बार आपने पेडों के पीछे जाकर अपने को हल्का किया है और आप भीड में भी कपडे बदलने में शर्म महसूस नहीं करते। कभी कभी तौलिया न हो तब भी नहीं, :-)
६) आप एक मैदान देखकर उसकी परिधि ठीक ठीक बता सकते हैं,
७) आप मानते हैं कि रात की पार्टी का हैंगओवर दूर करने के लिये १५ मील की दौड सबसे बढिया उपाय है,
८) आप जमकर जंक फ़ूड खाते हैं, उल्टा सीधा, कैसा भी कभी भी लेकिन फ़िर भी आपका वजन केवल ५५ किलो है,
९) पसीने से तरबतर लडकी को गले लगाने में आप जरा भी संकोच नहीं करते,
१०) आपके फ़्रिज में दो पेय पदार्थ हमेशा होते हैं, बीयर और गेटोरेड (स्पोर्ट्स ड्रिंक),
११) आप बहुत सा समय दौडने और ट्रेनिंग की बातों पर बेकार करते हैं,
१२) आपके पास हर सम्भव प्रकार के जूते हैं, नये, एक्दम नये, पुराने, घिसे हुये, बिल्कुल घिसे हुये, फ़टे हुये,
आपके पास एक जैसे दिखने वाले कम से कम ४ जोडी जूते हैं,
एक उदाहरण देता हूं, मेरी एक जानने वाली कन्या ने एक दौडने वाली GPS घडी खरीदी। लेकिन चूंकि वो Apple के Mac कम्प्यूटर का प्रयोग करती थी, घडी और कम्प्यूटर की किसी वजह से आपस में नहीं बनती थी और वो बार बार डिस्कनेक्ट हो जाती थी। उसका मानना था कि दौडते समय भी जब कभी घडी गडबडी करती है ये उसके कम्प्यूटर के कारण है।
घडी के निर्माताओं ने जब Mac कम्प्यूटर के लिये अलग से Software निकाला तो वो कन्या बहुत खुश हो गयी। उसने खुशी खुशी अपने भाई को ईमेल किया जिसका जवाब उसके भाई ने कुछ इस प्रकार दिया। जवाब मजेदार था इसलिये उसने अपने दोस्तों को बताया और मैं उससे पूछकर यहाँ पोस्ट कर रहा हूं।
उसके भाई ने घडी के बारे में जो लिखा उसका विवरण ये है (फ़िल लडकी का अपनी घडी को दिया हुआ नाम है और ध्यान रखिये कि कन्या क्रास कन्ट्री यानि झील, झरने, पहाड के आस पास दौडती है)।
Too bad, like most of the men in your life, this is going to be full of promise and intrigue. He will lure your heart and tempt your mind with bits of information. He will wonder hills, explore valleys, cross chasms, streams and maybe even a river or mountain top. You will do all of these things believing that Phil is right there with you, savoring every moment just waiting for the opportunity to share his take on your adventures together only to find out that, like before, nothing has changed and he lost interest a mile and a half into your journey.
जब मैने इसको पहली बार पढा तो हंसते हंसते लोटपोट हो गया और उसके भाई के सेंस आफ़ ह्यूमर का कायल हो गया। ऐसा ही कुछ हिन्दी ब्लाग पर भी हो तो हंगामा तो नहीं मचेगा, :-)
एक और उदाहरण है, एक दौडने वाली वेबसाईट पर आपके धावक होने की कई परिभाषायें थीं। बढिया लगा इसीलिये हिन्दी अनुवाद करने लगा कि इसे अपने ब्लाग पर छापूंगा। यहां तक पंहुचा कि अटक गया कि इसका अनुवाद कैसे होगा और इसे ब्लाग पर पोस्ट करूं कि न करूं।
You say things like "long and hard" to your female friends and it is not a sexual innuendo.
क्या यही कल्चरल डिफ़्रेन्स है? फ़िलहाल तो आप बाकी परिभाषाओं का हिन्दी अनुवाद पढ लें।
१) आप "आसान" और १० मील एक ही वाक्य में प्रयोग कर सकते हैं,
२) एक दिन में आपके जूते आपकी कार से ज्यादा दूरी तय करते हैं,
३) आप गोल्फ़ कोर्स जाते हैं जिससे वहां दौड सकें,
४) आप दौडते हैं लेकिन पता नहीं क्यों,
५) एक से अधिक बार आपने पेडों के पीछे जाकर अपने को हल्का किया है और आप भीड में भी कपडे बदलने में शर्म महसूस नहीं करते। कभी कभी तौलिया न हो तब भी नहीं, :-)
६) आप एक मैदान देखकर उसकी परिधि ठीक ठीक बता सकते हैं,
७) आप मानते हैं कि रात की पार्टी का हैंगओवर दूर करने के लिये १५ मील की दौड सबसे बढिया उपाय है,
८) आप जमकर जंक फ़ूड खाते हैं, उल्टा सीधा, कैसा भी कभी भी लेकिन फ़िर भी आपका वजन केवल ५५ किलो है,
९) पसीने से तरबतर लडकी को गले लगाने में आप जरा भी संकोच नहीं करते,
१०) आपके फ़्रिज में दो पेय पदार्थ हमेशा होते हैं, बीयर और गेटोरेड (स्पोर्ट्स ड्रिंक),
११) आप बहुत सा समय दौडने और ट्रेनिंग की बातों पर बेकार करते हैं,
१२) आपके पास हर सम्भव प्रकार के जूते हैं, नये, एक्दम नये, पुराने, घिसे हुये, बिल्कुल घिसे हुये, फ़टे हुये,
आपके पास एक जैसे दिखने वाले कम से कम ४ जोडी जूते हैं,
सोमवार, मार्च 09, 2009
इलाहाबादी ध्यान दें: ज्ञानजी इस बार कोरे न बच् पायें :-)

समय की कमी के चलते नैनो पोस्ट और १ खबर:
इलाहाबाद में रहने वाले भाईयों/बहनों और सज्जनों (दुर्जनों से क्या अनुरोध करना :-) ) से अनुरोध है कि इस बार होली के अवसर पर अपने ज्ञानदत्त पाण्डेयजी कोरे कोरे न बच पायें जैसे वो पिछली होली पर कोरे कोरे बच गये थे :-)
जो भी हमारे दौडने सम्बन्धी खबरो को पढते हैं, उनकी दुआओं के चलते हमने भी एक ईनाम जीत लिया। कुछ हफ़्ते पहले हमने Run Wild Half Marathon में भाग लिया और इस दौड (१३.१ मील अथवा २१.१ किमी) को हमने १ घंटा ३४ मिनट और ४१ सेकेंडस में पूरा किया। हालांकि सभी प्रतिभागियों में हमारा स्थान १५/३०० रहा (टाप ५%) लेकिन अ
पने उम्र समूह (Age Group 25-29) में हमने अपने निकटतम प्रतिद्वन्दी को लगभग १० मिनट से परास्त करके स्वर्णपदक (नहीं, असल में एक बीयर का गिलास जिस पर Age Group Winner खुदा हुआ है) प्राप्त किया, :-) जिन्हे हमारी बात पर भरोसा नहीं, वो इस वेबसाईट पर जाकर सनद देख लें, "Neeraj Rohilla" सर्च करने से हमारा नाम दिख जायेगा :-)


पने उम्र समूह (Age Group 25-29) में हमने अपने निकटतम प्रतिद्वन्दी को लगभग १० मिनट से परास्त करके स्वर्णपदक (नहीं, असल में एक बीयर का गिलास जिस पर Age Group Winner खुदा हुआ है) प्राप्त किया, :-) जिन्हे हमारी बात पर भरोसा नहीं, वो इस वेबसाईट पर जाकर सनद देख लें, "Neeraj Rohilla" सर्च करने से हमारा नाम दिख जायेगा :-)

मंगलवार, फ़रवरी 24, 2009
इन्फ़ार्मेशन ओवरलोड और फ़िल्टरिंग !!!
ये वीडियो अंग्रेजी में है लेकिन मुझे बडा प्रभावी लगा इसलिये पोस्ट कर रहा हूँ । उनके प्रेजेन्टेशन से कोट किया जाये तो,
We’ve had information overload in some form or another since the 1500’s. What’s changing now is the filters used for most of that 500 year period are breaking. And designing new filters doesn’t mean simply updating the old filters. They’re broken for structural reasons, not surface reasons.
When you feel yourself getting too much information, I think the discipline is not to say to yourself “What’s happened to the information?” but rather “What was I relying on before that stopped functioning?”
We’ve had information overload in some form or another since the 1500’s. What’s changing now is the filters used for most of that 500 year period are breaking. And designing new filters doesn’t mean simply updating the old filters. They’re broken for structural reasons, not surface reasons.
When you feel yourself getting too much information, I think the discipline is not to say to yourself “What’s happened to the information?” but rather “What was I relying on before that stopped functioning?”
शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2009
घूँघट चक वो सजना (फ़िर से बुल्ले शाह) वडाली बन्धुओं की आवाज में !!!
कल की पोस्ट से बुल्लेशाह का जो खुमार चढा है वो अभी तक उतरा नहीं है। इसी सिलसिले को जारी रखते हुये आज सुनिये अपने वडाली बन्धुओं की आवाज में "घूँघट चक वो सजना"। आशा है आपको पसन्द आयेगा, :-)
गुरुवार, फ़रवरी 19, 2009
उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान की आवाज में पंजाबी कव्वाली (बुल्ले शाह का कलाम) !!!
इस बार पेश-ए-खिदमत है उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान और साथियों की आवाज में एक पंजाबी कव्वाली। मुझे बेहद अफ़सोस है कि कभी पंजाबी नहीं सीखी, मेरा ननिहाल रोहतक में था(है?)। मेरी माताजी पंजाबी बोल/समझ लेती हैं लेकिन कभी उनसे पंजाबी नहीं सीखी इसका बडा रंज है। फ़िलहाल इस कव्वाली का हिन्दी अनुवाद मेरे एक मित्र की सहेली ने किया है। ये बुल्लेशाह का कलाम है और ये एक बडा हृदयवेदी विरहगीत है। इस कव्वाली का लब्बोलुआब(Approximate) कुछ इस प्रकार है :-)
गफ़लत न कर तू, छोड जंगली बसेरा ।
पंछी वापिस घर आ गये, तेरा मन क्यों नहीं करता,
मैं तेरी तू मेरा,
यार जिन्दगी करे कुरबानी जे यार आये एक बार,
इश्क का चर्खा दुखों का पूरिया (पहाड)
मेरी जिन्दगी चरखा सूत काट कर कटी जा रही है।
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
तेरे पास जो दिल है वो महरूम है, तेरा जो
मेरे लहू में मेरी नस नस में तेरी याद है।
अब तो सजना सब छोड कर आ जा, मेरी निगाह तेरा पता हर आते जाते राही से पूछ्ती है।
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
चरखा मेरा रंग रंगीला है, तेरी याद मेरे मन में बसी है।
मेरे दुखडे कौन समेटे, मैं तुझे याद करती हूं।
मैं तो जलती रहती हूं, मुझे पता ही नहीं बस जलती रहती हूं।
लोग कहते हैं कि इश्क भूल जा लेकिन इश्क छूटता नहीं,
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
गफ़लत न कर तू, छोड जंगली बसेरा ।
पंछी वापिस घर आ गये, तेरा मन क्यों नहीं करता,
मैं तेरी तू मेरा,
यार जिन्दगी करे कुरबानी जे यार आये एक बार,
इश्क का चर्खा दुखों का पूरिया (पहाड)
मेरी जिन्दगी चरखा सूत काट कर कटी जा रही है।
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
तेरे पास जो दिल है वो महरूम है, तेरा जो
मेरे लहू में मेरी नस नस में तेरी याद है।
अब तो सजना सब छोड कर आ जा, मेरी निगाह तेरा पता हर आते जाते राही से पूछ्ती है।
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
चरखा मेरा रंग रंगीला है, तेरी याद मेरे मन में बसी है।
मेरे दुखडे कौन समेटे, मैं तुझे याद करती हूं।
मैं तो जलती रहती हूं, मुझे पता ही नहीं बस जलती रहती हूं।
लोग कहते हैं कि इश्क भूल जा लेकिन इश्क छूटता नहीं,
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
शुक्रवार, फ़रवरी 06, 2009
हिन्दी, सामाजिक विमर्श, दो बिन्दु से निष्कर्ष: सभी सही हैं !!!
मेरा हिन्दी साहित्य, हिन्दी विमर्श अथवा सामाजिक विमर्श से कभी सीधा वास्ता तो नहीं पडा लेकिन मित्रों के साथ चर्चा में इसको अनुभव किया है। हिन्दी ब्लागजगत पर लेखक/पत्रकारों और अन्य भी विमर्शिंयों की टोलियाँ भरी पडी हैं। ब्लागजगत के बारे में सबसे बडी समस्या इसका सरलीकरण है, ऐसे सरलीकरण में व्यक्तिगत राय को तर्क का जामा पहनाना बहुत आसान है (शायद मैं भी यही कह रहा हूँ)।
कुछ दिन पहले किन्ही सचिनजी के चिट्ठे पर पढा कि उन्होने आई.आई.एम. अहमदाबाद में देखा कि सभी युवा केवल पैकेज के बारे में बात कर रहे हैं।
निष्कर्ष: आज के युवाओं को केवल पैकेज की चिन्ता है, बाकी किसी चीज की फ़िक्र नहीं।
किसी और चिट्ठे पर पढने को मिलेगा कि उनके साथ ऐसा हादसा हुआ, निष्कर्ष: जो उनके साथ हुआ वही सत्य है और ऐसा ही सबके साथ होता होगा।
बहुत बचपन में (कक्षा ६ में), मेरी बहन ने भी निष्कर्ष निकाला था कि हमारे मामाजी दिल्ली में रहते हैं और उनकी क्लास की तीन सहेलियों के मामाजी भी दिल्ली में रहते हैं, इसका मतलब देश में अधिकतर बच्चों के मामाजी दिल्ली में रहते हैं। अच्छे से याद है कि उस समय पिताजी ने पहली बार डेटा एनालिसिस की पहली क्लास ली थी।
मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ लेकिन अन्य सभी विषयों/विधाओं का सम्मान करता हूँ लेकिन ब्लागजगत पर होने वाले अधिकतर वैचारिक विमर्श के बारे में अपनी व्यक्तिगत राय को एक ग्राफ़ के माध्यम से व्यक्त कर रहा हूँ।

ऊपर दिये ग्राफ़ में अगर आपके पास केवल दो बिन्दु हैं (बडे लाल वाले) तो आप किसी भी थ्योरी को सही साबित कर सकते हैं, लेकिन असल मुद्दा काले वाले बिन्दु है, जिनको किसी भी एक निष्कर्ष से समझाना असम्भव है।
विज्ञान में किसी भी निष्कर्ष को निकालने के लिये काफ़ी बिन्दुओं का प्रयोग होता है। किन्ही किन्ही स्थितियों में जब Sufficient Data उपलब्ध नहीं होता है तो भी कुछ निश्कर्ष निकाले जाते हैं और कहा जाता है कि Take it with a pinch of salt, if not bucket full, :-) लेकिन ऐसे अधिकतर किस्सों में बाल्टी भर नहीं बल्कि ट्रक भर नमक और सावधानी की आवश्यकता होती है।
ऐसे में लगता है कि सभी विमर्शियों को Data Analysis और Statistics पढाना अनिवार्य कर देना चाहिये जिससे दो बिन्दुओं से निश्कर्ष निकालने की प्रवत्ति पर कुछ रोक लगे। वैसे भी जब मुद्दे बडे उलझे होते हैं तो दो तो क्या दस बिन्दु भी उपलब्ध हों तब भी निश्कर्ष निकालना मुश्किल होता है, लेकिन शायद......
कुछ दिन पहले किन्ही सचिनजी के चिट्ठे पर पढा कि उन्होने आई.आई.एम. अहमदाबाद में देखा कि सभी युवा केवल पैकेज के बारे में बात कर रहे हैं।
निष्कर्ष: आज के युवाओं को केवल पैकेज की चिन्ता है, बाकी किसी चीज की फ़िक्र नहीं।
किसी और चिट्ठे पर पढने को मिलेगा कि उनके साथ ऐसा हादसा हुआ, निष्कर्ष: जो उनके साथ हुआ वही सत्य है और ऐसा ही सबके साथ होता होगा।
बहुत बचपन में (कक्षा ६ में), मेरी बहन ने भी निष्कर्ष निकाला था कि हमारे मामाजी दिल्ली में रहते हैं और उनकी क्लास की तीन सहेलियों के मामाजी भी दिल्ली में रहते हैं, इसका मतलब देश में अधिकतर बच्चों के मामाजी दिल्ली में रहते हैं। अच्छे से याद है कि उस समय पिताजी ने पहली बार डेटा एनालिसिस की पहली क्लास ली थी।
मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ लेकिन अन्य सभी विषयों/विधाओं का सम्मान करता हूँ लेकिन ब्लागजगत पर होने वाले अधिकतर वैचारिक विमर्श के बारे में अपनी व्यक्तिगत राय को एक ग्राफ़ के माध्यम से व्यक्त कर रहा हूँ।
ऊपर दिये ग्राफ़ में अगर आपके पास केवल दो बिन्दु हैं (बडे लाल वाले) तो आप किसी भी थ्योरी को सही साबित कर सकते हैं, लेकिन असल मुद्दा काले वाले बिन्दु है, जिनको किसी भी एक निष्कर्ष से समझाना असम्भव है।
विज्ञान में किसी भी निष्कर्ष को निकालने के लिये काफ़ी बिन्दुओं का प्रयोग होता है। किन्ही किन्ही स्थितियों में जब Sufficient Data उपलब्ध नहीं होता है तो भी कुछ निश्कर्ष निकाले जाते हैं और कहा जाता है कि Take it with a pinch of salt, if not bucket full, :-) लेकिन ऐसे अधिकतर किस्सों में बाल्टी भर नहीं बल्कि ट्रक भर नमक और सावधानी की आवश्यकता होती है।
ऐसे में लगता है कि सभी विमर्शियों को Data Analysis और Statistics पढाना अनिवार्य कर देना चाहिये जिससे दो बिन्दुओं से निश्कर्ष निकालने की प्रवत्ति पर कुछ रोक लगे। वैसे भी जब मुद्दे बडे उलझे होते हैं तो दो तो क्या दस बिन्दु भी उपलब्ध हों तब भी निश्कर्ष निकालना मुश्किल होता है, लेकिन शायद......
गुरुवार, जनवरी 29, 2009
युनुसजी के लिये जवाबी कव्वाली: कन्हैया याद है कुछ भी हमारी !!!
कुछ दिन पहले युनुसजी ने फ़रीद अयाज कव्वाल की आवाज में "कन्हैया याद है कुछ भी हमारी" कव्वाली सुनवायी थी। आज हम आपके लिये वही कव्वाली फ़रीद के वालिद मरहूम मुंशी रजीउद्दीन की आवाज में लेकर आये हैं। ये रेकार्डिंग १९८८ की है और इस इस कव्वाली में मुंशीजी के बेटे फ़रीद अयाज और अबु मोहम्म्द भी उनके साथ गा रहे हैं।
ये कव्वाली मुंशीजी ने कराची डिफ़ेंस कालोनी की एक प्राइवेट महफ़िल में गायी थी, जिसे मैने कम्प्यूटर पर साउंडकार्ड से रेकार्ड किया है। ये बडी फ़ुरसत में गायी हुयी कव्वाली है इसलिये आपको थोडा अधिक समय देना पडेगा लेकिन हमारी तरफ़ से आपकी सन्तुष्टि की पूरी गारण्टी, :-)
इसी सीरीज में आगे मुंशीजी की और कव्वालियाँ भी पेश करने का इरादा है जैसे "फ़ूल रही सरसों सकल बन" और "ख्वाजा संग खेलिये धमार" आदि, लेकिन फ़िलहाल अगली पेशकश युनुसभाई के चिट्ठे पर होगी।
कव्वाली के बोल युनुसभाई के चिट्ठे से पोस्ट कर रहा हूँ ।
कन्हैया बोलो याद भी है कुछ हमारी,
कहूं क्या तेरे भूलने के मैं वारी
बिनती मैं कर कर पमना से पूछी
पल पल की खबर तिहारी
पैंया परीं महादेव के जाके
टोना भी करके मैं हारी
कन्हैया याद है कुछ भी हमारी
खाक परो लोगो इस ब्याहने पर
अच्छी मैं रहती कंवारी
मैका में हिल मिल रहती थी सुख से
फिरती थी क्यों मारी मारी ।
कन्हैया कन्हैया ।।
ये कव्वाली मुंशीजी ने कराची डिफ़ेंस कालोनी की एक प्राइवेट महफ़िल में गायी थी, जिसे मैने कम्प्यूटर पर साउंडकार्ड से रेकार्ड किया है। ये बडी फ़ुरसत में गायी हुयी कव्वाली है इसलिये आपको थोडा अधिक समय देना पडेगा लेकिन हमारी तरफ़ से आपकी सन्तुष्टि की पूरी गारण्टी, :-)
इसी सीरीज में आगे मुंशीजी की और कव्वालियाँ भी पेश करने का इरादा है जैसे "फ़ूल रही सरसों सकल बन" और "ख्वाजा संग खेलिये धमार" आदि, लेकिन फ़िलहाल अगली पेशकश युनुसभाई के चिट्ठे पर होगी।
कव्वाली के बोल युनुसभाई के चिट्ठे से पोस्ट कर रहा हूँ ।
कन्हैया बोलो याद भी है कुछ हमारी,
कहूं क्या तेरे भूलने के मैं वारी
बिनती मैं कर कर पमना से पूछी
पल पल की खबर तिहारी
पैंया परीं महादेव के जाके
टोना भी करके मैं हारी
कन्हैया याद है कुछ भी हमारी
खाक परो लोगो इस ब्याहने पर
अच्छी मैं रहती कंवारी
मैका में हिल मिल रहती थी सुख से
फिरती थी क्यों मारी मारी ।
कन्हैया कन्हैया ।।
बुधवार, जनवरी 28, 2009
और बस दुनिया उसी पल खत्म हो जाये!!!
एक निर्जन टापू पर ऐसी मधुर आवाज में कोई गीत पर गीत सुनाये। बस उसी समय दुनिया समाप्त हो जाये तो ईश्वर का कितना ऐहसान रहे। मित्र कह रहे थे कि शादी करने से पहले देख लेना कि कन्या बढिया गाना गाती हो, इन्शाअल्लाह... आमीन... :-)
गायिका किरन अहलूवालिया हैं जो भारतीय शास्त्रीय संगीत में पारंगत हैं। इनके बारे में मेरे मित्र गौरव ने बताया और तब से सुने जा रहे हैं। यू-ट्यूब पर उनके और वीडियो भी देखे जा सकते हैं। खुद किरन अहलूवालिया की वेबसाईट पर उनके अन्य गीत सुने जा सकते हैं। ये रही उनकी वेबसाईट:
http://www.kiranmusic.com/flash_content/main_full.html
वो कुछ ऐसे मन में समाये हुये हैं,
और ऐसे ख्यालों पे छाये हुये हैं।
मोहब्बत में हम यूँ अकेले चले हैं,
उन्हें इस तपिश से बचाये हुये हैं।
सुना है रकीबों से अनबन है उनकी,
उम्मीदों की शम्मा जलाये हुये हैं।
नहीं 'ताहिरा' कुछ ज़माने से शिकवा
ये ग़म खुद खुशी से उठाए हुए हैं।
(इस गजल का मक़ता लिखना छूट गया था, रमण कौल जी का बहुत धन्यवाद याद दिलाने के लिये)
इस पंजाबी गीत को सुनकर ही दम निकला जा रहा है, अब तक कल से दसियों बार सुनकर भी मन नहीं भरा।
गायिका किरन अहलूवालिया हैं जो भारतीय शास्त्रीय संगीत में पारंगत हैं। इनके बारे में मेरे मित्र गौरव ने बताया और तब से सुने जा रहे हैं। यू-ट्यूब पर उनके और वीडियो भी देखे जा सकते हैं। खुद किरन अहलूवालिया की वेबसाईट पर उनके अन्य गीत सुने जा सकते हैं। ये रही उनकी वेबसाईट:
http://www.kiranmusic.com/flash_content/main_full.html
वो कुछ ऐसे मन में समाये हुये हैं,
और ऐसे ख्यालों पे छाये हुये हैं।
मोहब्बत में हम यूँ अकेले चले हैं,
उन्हें इस तपिश से बचाये हुये हैं।
सुना है रकीबों से अनबन है उनकी,
उम्मीदों की शम्मा जलाये हुये हैं।
नहीं 'ताहिरा' कुछ ज़माने से शिकवा
ये ग़म खुद खुशी से उठाए हुए हैं।
(इस गजल का मक़ता लिखना छूट गया था, रमण कौल जी का बहुत धन्यवाद याद दिलाने के लिये)
इस पंजाबी गीत को सुनकर ही दम निकला जा रहा है, अब तक कल से दसियों बार सुनकर भी मन नहीं भरा।
सोमवार, जनवरी 26, 2009
राईस यूनिवर्सिटी में गणतन्त्र दिवस समारोह !!!
कल भारत के ६०वें गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारतीय विद्यार्थी समिति (Indian Students at Rice) ने राईस यूनिवर्सिटी में गणतन्त्र दिवस मनाने का भव्य आयोजन किया। इस आयोजन में सर्वप्रथम हमारे मुख्य अतिथि श्री सुरेन्द्र तलवार द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फ़हराया गया। इसके पश्चात सभी लोगों ने मिलकर राष्ट्रगान का पाठ किया और भारतमाता की जय के उद्घोष लगाये। इसके बाद सुरेन्द्र तलवार जी ने अपनी मधुर आवाज में "हर करम अपना करेंगे, ए वतन तेरे लिये" की कुछ पंक्तियाँ गाकर सबको मुग्ध कर दिया।
श्री सुरेन्द्र तलवार ह्यूस्टन में भारत से सम्बन्धित लगभग हर आयोजन में प्रमुख भूमिका में रहते हैं। इसके अलावा सुरेन्द्र तलवार जी एक एंटीक शाप जिसका नाम जारपोश है, चलाते हैं। उनका राईस विश्वविद्यालय से सम्बन्ध बडा पुराना है, हर वर्ष ग्रेजुएट होने वाले विद्यार्थी नये विद्यार्थियों को तलवारजी से मिलवा देते हैं और दोस्ती का ये सिलसिला चलता रहता है। जब भी किसी कार्यक्रम के लिये हमें कुछ एंटीक अथवा अन्य मदद की जरूरत होती है, हम लोग तलवार अंकल के घर जा धमकते हैं। पहले चाय पीते हैं और फ़िर उनकी दुकान से अपनी जरूरत का सामान उठा लाते हैं, इसकी वापिसी के समय तलवार अंकल भी हमारी तरफ़ से मिठाई के डब्बे का इन्तजार करते हैं क्योंकि उनकी मदद के कारण अक्सर किसी भी प्रतियोगिता में भारत का बूथ कोई न कोई स्थान अवश्य जीतता है। तलवार अंकल भले ही इसे न पढ रहे हों, लेकिन तलवार अंकल जिन्दाबाद....
ये थोडा विषयांतर हो गया खैर....
झंडा फ़हराने के बाद एक मेले का आयोजन था जिसमें खाने के सामान के साथ साथ कुछ खेल भी थे। जीतने वाली टीम को $२५ डालर का मिठाई का कूपन मिलना था। लिहाजा हमने फ़टाफ़ट एक टीम बनायी और चालू हो गये। थोडी जुगत, थोडी बेईमानी, थोडी लडाई के बाद आखिर हमारी टीम इस प्रतियोगिता को जीत ही गयी। जैसा हर बार होता है, नियमों में सेंध लगायी गयी और दूसरी टीम ने अपील की लेकिन फ़िर थोडी न नुकुर के बाद हम जीत ही गये :-) याहू..............
अब आप कुछ चित्रों का मजा लीजिये।



(एक खेल में हमें टायलेट पेपर से १ मिनट में ममी बनाने का प्रयास हो रहा है, दूसरे में हम पर बेईमानी का आरोप लग रहा है)

(अब हम अपने कूपन गिनकर बता रहे हैं कि हम जीत गये, दूसरी लडकी कह रही है कि हाय उनकी टीम केवल २ कूपन से हार गयी)

(अन्त में एक ग्रुप फ़ोटो)
नोट: सभी फ़ोटो हेमतेज के सौजन्य से...
श्री सुरेन्द्र तलवार ह्यूस्टन में भारत से सम्बन्धित लगभग हर आयोजन में प्रमुख भूमिका में रहते हैं। इसके अलावा सुरेन्द्र तलवार जी एक एंटीक शाप जिसका नाम जारपोश है, चलाते हैं। उनका राईस विश्वविद्यालय से सम्बन्ध बडा पुराना है, हर वर्ष ग्रेजुएट होने वाले विद्यार्थी नये विद्यार्थियों को तलवारजी से मिलवा देते हैं और दोस्ती का ये सिलसिला चलता रहता है। जब भी किसी कार्यक्रम के लिये हमें कुछ एंटीक अथवा अन्य मदद की जरूरत होती है, हम लोग तलवार अंकल के घर जा धमकते हैं। पहले चाय पीते हैं और फ़िर उनकी दुकान से अपनी जरूरत का सामान उठा लाते हैं, इसकी वापिसी के समय तलवार अंकल भी हमारी तरफ़ से मिठाई के डब्बे का इन्तजार करते हैं क्योंकि उनकी मदद के कारण अक्सर किसी भी प्रतियोगिता में भारत का बूथ कोई न कोई स्थान अवश्य जीतता है। तलवार अंकल भले ही इसे न पढ रहे हों, लेकिन तलवार अंकल जिन्दाबाद....
ये थोडा विषयांतर हो गया खैर....
झंडा फ़हराने के बाद एक मेले का आयोजन था जिसमें खाने के सामान के साथ साथ कुछ खेल भी थे। जीतने वाली टीम को $२५ डालर का मिठाई का कूपन मिलना था। लिहाजा हमने फ़टाफ़ट एक टीम बनायी और चालू हो गये। थोडी जुगत, थोडी बेईमानी, थोडी लडाई के बाद आखिर हमारी टीम इस प्रतियोगिता को जीत ही गयी। जैसा हर बार होता है, नियमों में सेंध लगायी गयी और दूसरी टीम ने अपील की लेकिन फ़िर थोडी न नुकुर के बाद हम जीत ही गये :-) याहू..............
अब आप कुछ चित्रों का मजा लीजिये।
(एक खेल में हमें टायलेट पेपर से १ मिनट में ममी बनाने का प्रयास हो रहा है, दूसरे में हम पर बेईमानी का आरोप लग रहा है)
(अब हम अपने कूपन गिनकर बता रहे हैं कि हम जीत गये, दूसरी लडकी कह रही है कि हाय उनकी टीम केवल २ कूपन से हार गयी)
(अन्त में एक ग्रुप फ़ोटो)
नोट: सभी फ़ोटो हेमतेज के सौजन्य से...
सोमवार, जनवरी 19, 2009
ह्यूस्टन मैराथन: एक रिपोर्ट !!!
छोटी रिपोर्ट:
आखिरकार आज ह्यूस्टन मैराथन सम्पन्न हो गयी। इसमें तीन प्रतियोगितायें थी, पहली पूरी मैराथन यानि २६.२ मील अथवा ४२.२ किमी, दूसरी हाफ़ मैराथन यानि २१.१ किमी और तीसरी ५ किमी की दौड। कुल २५,००० प्रतिभागियों में से ८२२९ प्रतिभागियों ने पूरी मैराथन दौड में भाग लिया और इनमें से ५३९६ धावकों ने नियत अधिकतम समय (६ घंटा) में दौड समाप्त की। बाकी लोगों ने या तो दौड अधूरी छोड दी अथवा ६ घंटे से अधिक समय लिया। हमने पूरी मैराथन में भाग लिया और इसको ३ घंटा ३८ मिनट और ४३ सेकेंड्स में पूरा किया। अगर सभी प्रतिभागियों को गिने तो हम टाप ८.९ प्रतिशत में आते हैं, अगर दौड समाप्त करने वाले प्रतिभागियों को गिने तो हम टाप १३.६ प्रतिशत में आते हैं।
लम्बी और विस्तृत रिपोर्ट (फ़ोटो और वीडियो के साथ):
आज सुबह ४ बजे नींद खुली, ५ बजे तक तैयार होकर सुबह ५:४० पर हम दौड के स्थान पर आ चुके थे। इसके बाद हमने अपने धावक क्लब के तम्बू में अपने मित्रो से बात की और मौसम की हालत पर चिन्ता व्यक्त की। पिछले १० दिन से ह्यूस्टन में हल्की ठंड पड रही थी लेकिन आज अचानक ही गर्मी का सामना हो गया। दौड की शुरूआत (सुबह सात बजे) में तापमान (५६ डिग्री फ़ारेनहाईट, अर्थात १३.३ डिग्री सेल्सियस) था जो अन्त तक आते आते ७२ डिग्री फ़ारेनहाईट यानि लगभग २३ डिग्री सेल्सियस हो गया। मैराथन दौड के लिये आदर्श तापमान ४० से ६० डिग्री के बीच का होता है ।
खैर, जैसा हमने पिछली पोस्ट में लिखा था कि अगर सभी सितारे लाईन में हों और किस्मत मेहरबान हो तो हम ३ घंटा और ३० मिनट, अन्य परिस्थितियों में ३ घंटा ४० मिनट और अगर सितारे एकदम गर्दिश में हों तो अधिकतम ४ घंटा में दौड समाप्त करने का सोच रहे थे। आज गर्मी के चलते भी हमने अपने आदर्श (३:३०) गोल को निगाह में रखकर दौड प्रारम्भ की। ३ घंटा ३० मिनट का मतलब है कि हर मील को ठीक ८ मिनट में पूरा करना या फ़िर हर किमी को ५ मिनट में दौडना और ४२.२ किमी तक यही करते रहना।
नीचे दी गयी सारिणी में आप मेरे हर मील का समय देख सकते हैं। आप देखेंगे कि हर दूसरे मील पर ५-१० सेकेंड्स का अन्तर है, इसका कारण है कि हर दूसरे मील पर धीमे होकर पानी का कप उठाने और उसे पीने में लगभग इतना ही समय लगता है।
मील का समय, कुल समय
1) 8:20 (8:20) शुरू में भीड के चलते थोडा अधिक समय लगा।
2) 7:33 (15:53) ये वाला मील ढलान (Downhill) पर था।
3) 7:44 (23:37) इस समय बहुत सारे दर्शक लोग हौसला अफ़जाई कर रहे थे।
4) 8:12 (31:48) इस मील को हाफ़/फ़ुल मैराथन वाले साथ दौडते हैं जिससे थोडी भीड हो जाती है ।
5) 8:02 (39:51) अब धीमे धावक पीछे हो रहे हैं, और तेज धावक आगे निकल रहे हैं ।
6) 7:56 (47:46)
7) 8:06 (55:52)
8) 7:58 (1:03:51)
9) 7:57 (1:11:48) इस मील पर हाफ़ मैराथन वाले अगल रास्ता लेकर अपने समाप्ति की ओर चले जाते हैं
10) 8:02 (1:19:50) भीड कम हो रही है, लोग धीमे हो रहे हैं लेकिन हमें ८ मिनट/मील पर जमे रहना है
11) 7:59 (1:27:48) अब हम राईस विश्वविद्यालय के पास से गुजर रहे हैं, हम राईस की टी-शर्ट पहने हर
12) 8:04 (1:35:52) व्यक्ति को Go Owls Go कहते हैं। Owl (उल्लू) हमारे स्कूल का मस्कट है ।
13) 8:00 (1:43:52) इस समय दर्शकों की भीड सबसे ज्यादा है, लोग केले, सन्तरे बांट रहे हैं ।
14) 8:03 (1:51:55) आधी दौड खत्म, इसका मतलब कि वार्म अप पूरा हो गया है और अब असल दौड शुरू
15) 8:08 (2:00:03) उद्देश्य है लक्ष्य से बिना भटके और खूब पानी पीते हुये अगले ५ मील पूरे किये जायें।
16) 8:02 (2:08:06)
17) 7:55 (2:16:01)
18) 8:15 (2:24:16) अचानक गर्मी बढ गयी है, रेस का कोड Green से Yellow कर दिया गया है।
19) 7:52 (2:32:07) Volunteers, ज्यादा पानी पीने और गर्मी के हिसाब से थोडा धीमे दौडने को कह रहे हैं
20) 7:53 (2:40:01) बीस मील खत्म, मतलब आधी दौड समाप्त अब केवल १० किमी बचे हैं।
21) 7:55 (2:47:55) अब तक हम ८ मिनट प्रति मील पर कायम हैं ।
22) 8:22 (2:56:17) इस मील में पैर की मांसपेशी में जबरदस्त खिंचाव अनुभव हुआ। हर २० से २५ सेकेंड्स के बाद पैर में दर्द उठ रहा है। लेकिन अब केवल ४.२ मील बचे हैं, उम्मीद है कि Cramps अपने आप चले जायेगें।
23) 9:00 (3:05:17) दुनिया लुटनी शुरू हो चुकी है, ८ के स्थान पर ९ मिनट लगे। Focus, Focus, Focus.
24) 9:58 (3:15:16) इस समय भयंकर दर्द हो रहा है लेकिन केवल ३ से भी कम मील बाकी हैं। अब मैं रूककर अपने पैर को स्ट्रैच कर रहा हूँ। पैर की मांशपेशी थोडी फ़ूली हुयी है और मैं सोच रहा हूँ कि ३:३० तो हाथ से गया, अब मन में ३:४० की गणना चल रही है।
25) 10:58 (3:26:14) इस मील के दौरान २ बार रूककर चलना पडा और भयंकर दर्द हुआ। इस समय हर कदम के साथ ऐसा लग रहा कि कोई पैर में हथौडे मार रहा हो। इस मील के दौरान रास्ता थोडा चढाई वाला भी था।
26) 10:29 (3:36:44) ये आखिरी १.२ मील हैं, इस समय एक बैनर पर नजर पडी,
PAIN IS TEMPORARY, FINISH IS FOREVER... इससे थोडी ऊर्जा मिली है। अब चूँकि सभी धावक कठिनाई में है, लोग उनका नाम लेकर प्रोत्साहित कर रहे हैं। हम दर्द को दिमाग से निकालकर दौडने का प्रयास कर रहे हैं। कई भारतीय लोगों ने मेरा नाम पुकार कर जमकर प्रोत्साहित किया। अब उनको हाथ उठाकर धन्यवाद देने के स्थान पर (जो हम <२० मील तक कर रहे थे), केवल सिर झुकाकर धन्यवाद दे रहे हैं।
0.2) 1:59 (3:38:43) आखिरी ०.२ मील, और हम Finish Line के पार लग गये । इस दौड में हमारा स्थान ७३५ वाँ रहा। जो टाप १३.६% में है। अब आप कुछ फ़ोटो और एक वीडियो का आनन्द लें।

(दौड शुरू होने से पहले हमारे धावक क्लब के तम्बू का नजारा)

(दौड के बाद हमारी विजयी मुस्कान और पार्टनर्स इन क्राईम, वैसे इन पाँचों में मेरा समय सबसे अच्छा रहा इसीलिये ये सब पार्टी मांग रहे हैं :-) )
क्या इतने कष्ट के बाद हम दोबारा मैराथन दौडेंगे। शायद मैराथन का खूब अब मुंह को लग गया है, :-) मेरा मानना है कि अगर मैराथन २६.२ के स्थान पर २० मील की होती तो इसका इतना असर नहीं होता लेकिन आखिरी ५-६ मील ही आपकी मानसिक शक्ति की कठिन परीक्षा लेते हैं। ये भी निश्चित है कि अब तक के जीवन में मैने ये सबसे कठिन शारीरिक श्रम वाला काम किया है। इसके अलावा दौडने को जिन्दगी में स्थान देने का मतलब है कि कभी तोंद नहीं निकलेगी, दिल खुश रहेगा और मन भरके कुछ भी खा सकते हो (एक बार मैने शर्त की बात पर ७५० ग्राम रबडी खा ली थी, अब कोई ऐसी शर्त लगाने वाला नहीं मिलता) :-)
अब अगला गोल है बोस्टन मैराथन के लिये क्वालिफ़ाई करना। इसके लिये मुझे ३ घंटा १० मिनट का समय चाहिये, मुझे लगता है कि मैं ये कर सकता हूँ लेकिन इसके लिये कठिन ट्रेनिंग, संयम और कम से कम २ साल लगेगे। पिछले वर्ष की तुलना में मेरे दौडने की क्षमताओं में लगभग १०-१२% का सुधार हुआ है लेकिन ये भी सत्य है कि अब और सुधार करने के लिये बहुत ज्यादा श्रम लगेगा। इसीलिये शायद मैराथन को आराम देकर छोटी दौड (५, १०, २१.१ किमी) दौडी जायें, और अपनी रफ़्तार बढाने पर ध्यान दिया जाये। और उसके बाद ही अगली मैराथन दौडी जाये जिसका उद्देश्य बोस्टन मैराथन के लिये क्वालीफ़ाई करना हो। देखते हैं भविष्य में ऊँट किस करवट बैठता है।
आंकडों के शौकीन ज्ञानदत्तजी के लिये दो ग्राफ़ भी प्रस्तुत है।


अब ले चलते हैं हमारी दौड की समाप्ति पर फ़िनिशलाईन का वीडियो, ध्यान से १० सेकेण्ड्स से १८ सेकेंड्स को देखिये हम दोनों हाथ हवा में उठाये एक कन्या के बगल से फ़िनिशलाईन क्रास कर रहे हैं।
और आखिर में ह्यूस्टन क्रानिकल समाचार का कुछ धावकों से दौड समाप्त होने के बाद की बातचीत (इसमें हम कहीं नहीं हैं) ।
आखिरकार आज ह्यूस्टन मैराथन सम्पन्न हो गयी। इसमें तीन प्रतियोगितायें थी, पहली पूरी मैराथन यानि २६.२ मील अथवा ४२.२ किमी, दूसरी हाफ़ मैराथन यानि २१.१ किमी और तीसरी ५ किमी की दौड। कुल २५,००० प्रतिभागियों में से ८२२९ प्रतिभागियों ने पूरी मैराथन दौड में भाग लिया और इनमें से ५३९६ धावकों ने नियत अधिकतम समय (६ घंटा) में दौड समाप्त की। बाकी लोगों ने या तो दौड अधूरी छोड दी अथवा ६ घंटे से अधिक समय लिया। हमने पूरी मैराथन में भाग लिया और इसको ३ घंटा ३८ मिनट और ४३ सेकेंड्स में पूरा किया। अगर सभी प्रतिभागियों को गिने तो हम टाप ८.९ प्रतिशत में आते हैं, अगर दौड समाप्त करने वाले प्रतिभागियों को गिने तो हम टाप १३.६ प्रतिशत में आते हैं।
लम्बी और विस्तृत रिपोर्ट (फ़ोटो और वीडियो के साथ):
आज सुबह ४ बजे नींद खुली, ५ बजे तक तैयार होकर सुबह ५:४० पर हम दौड के स्थान पर आ चुके थे। इसके बाद हमने अपने धावक क्लब के तम्बू में अपने मित्रो से बात की और मौसम की हालत पर चिन्ता व्यक्त की। पिछले १० दिन से ह्यूस्टन में हल्की ठंड पड रही थी लेकिन आज अचानक ही गर्मी का सामना हो गया। दौड की शुरूआत (सुबह सात बजे) में तापमान (५६ डिग्री फ़ारेनहाईट, अर्थात १३.३ डिग्री सेल्सियस) था जो अन्त तक आते आते ७२ डिग्री फ़ारेनहाईट यानि लगभग २३ डिग्री सेल्सियस हो गया। मैराथन दौड के लिये आदर्श तापमान ४० से ६० डिग्री के बीच का होता है ।
खैर, जैसा हमने पिछली पोस्ट में लिखा था कि अगर सभी सितारे लाईन में हों और किस्मत मेहरबान हो तो हम ३ घंटा और ३० मिनट, अन्य परिस्थितियों में ३ घंटा ४० मिनट और अगर सितारे एकदम गर्दिश में हों तो अधिकतम ४ घंटा में दौड समाप्त करने का सोच रहे थे। आज गर्मी के चलते भी हमने अपने आदर्श (३:३०) गोल को निगाह में रखकर दौड प्रारम्भ की। ३ घंटा ३० मिनट का मतलब है कि हर मील को ठीक ८ मिनट में पूरा करना या फ़िर हर किमी को ५ मिनट में दौडना और ४२.२ किमी तक यही करते रहना।
नीचे दी गयी सारिणी में आप मेरे हर मील का समय देख सकते हैं। आप देखेंगे कि हर दूसरे मील पर ५-१० सेकेंड्स का अन्तर है, इसका कारण है कि हर दूसरे मील पर धीमे होकर पानी का कप उठाने और उसे पीने में लगभग इतना ही समय लगता है।
मील का समय, कुल समय
1) 8:20 (8:20) शुरू में भीड के चलते थोडा अधिक समय लगा।
2) 7:33 (15:53) ये वाला मील ढलान (Downhill) पर था।
3) 7:44 (23:37) इस समय बहुत सारे दर्शक लोग हौसला अफ़जाई कर रहे थे।
4) 8:12 (31:48) इस मील को हाफ़/फ़ुल मैराथन वाले साथ दौडते हैं जिससे थोडी भीड हो जाती है ।
5) 8:02 (39:51) अब धीमे धावक पीछे हो रहे हैं, और तेज धावक आगे निकल रहे हैं ।
6) 7:56 (47:46)
7) 8:06 (55:52)
8) 7:58 (1:03:51)
9) 7:57 (1:11:48) इस मील पर हाफ़ मैराथन वाले अगल रास्ता लेकर अपने समाप्ति की ओर चले जाते हैं
10) 8:02 (1:19:50) भीड कम हो रही है, लोग धीमे हो रहे हैं लेकिन हमें ८ मिनट/मील पर जमे रहना है
11) 7:59 (1:27:48) अब हम राईस विश्वविद्यालय के पास से गुजर रहे हैं, हम राईस की टी-शर्ट पहने हर
12) 8:04 (1:35:52) व्यक्ति को Go Owls Go कहते हैं। Owl (उल्लू) हमारे स्कूल का मस्कट है ।
13) 8:00 (1:43:52) इस समय दर्शकों की भीड सबसे ज्यादा है, लोग केले, सन्तरे बांट रहे हैं ।
14) 8:03 (1:51:55) आधी दौड खत्म, इसका मतलब कि वार्म अप पूरा हो गया है और अब असल दौड शुरू
15) 8:08 (2:00:03) उद्देश्य है लक्ष्य से बिना भटके और खूब पानी पीते हुये अगले ५ मील पूरे किये जायें।
16) 8:02 (2:08:06)
17) 7:55 (2:16:01)
18) 8:15 (2:24:16) अचानक गर्मी बढ गयी है, रेस का कोड Green से Yellow कर दिया गया है।
19) 7:52 (2:32:07) Volunteers, ज्यादा पानी पीने और गर्मी के हिसाब से थोडा धीमे दौडने को कह रहे हैं
20) 7:53 (2:40:01) बीस मील खत्म, मतलब आधी दौड समाप्त अब केवल १० किमी बचे हैं।
21) 7:55 (2:47:55) अब तक हम ८ मिनट प्रति मील पर कायम हैं ।
22) 8:22 (2:56:17) इस मील में पैर की मांसपेशी में जबरदस्त खिंचाव अनुभव हुआ। हर २० से २५ सेकेंड्स के बाद पैर में दर्द उठ रहा है। लेकिन अब केवल ४.२ मील बचे हैं, उम्मीद है कि Cramps अपने आप चले जायेगें।
23) 9:00 (3:05:17) दुनिया लुटनी शुरू हो चुकी है, ८ के स्थान पर ९ मिनट लगे। Focus, Focus, Focus.
24) 9:58 (3:15:16) इस समय भयंकर दर्द हो रहा है लेकिन केवल ३ से भी कम मील बाकी हैं। अब मैं रूककर अपने पैर को स्ट्रैच कर रहा हूँ। पैर की मांशपेशी थोडी फ़ूली हुयी है और मैं सोच रहा हूँ कि ३:३० तो हाथ से गया, अब मन में ३:४० की गणना चल रही है।
25) 10:58 (3:26:14) इस मील के दौरान २ बार रूककर चलना पडा और भयंकर दर्द हुआ। इस समय हर कदम के साथ ऐसा लग रहा कि कोई पैर में हथौडे मार रहा हो। इस मील के दौरान रास्ता थोडा चढाई वाला भी था।
26) 10:29 (3:36:44) ये आखिरी १.२ मील हैं, इस समय एक बैनर पर नजर पडी,
PAIN IS TEMPORARY, FINISH IS FOREVER... इससे थोडी ऊर्जा मिली है। अब चूँकि सभी धावक कठिनाई में है, लोग उनका नाम लेकर प्रोत्साहित कर रहे हैं। हम दर्द को दिमाग से निकालकर दौडने का प्रयास कर रहे हैं। कई भारतीय लोगों ने मेरा नाम पुकार कर जमकर प्रोत्साहित किया। अब उनको हाथ उठाकर धन्यवाद देने के स्थान पर (जो हम <२० मील तक कर रहे थे), केवल सिर झुकाकर धन्यवाद दे रहे हैं।
0.2) 1:59 (3:38:43) आखिरी ०.२ मील, और हम Finish Line के पार लग गये । इस दौड में हमारा स्थान ७३५ वाँ रहा। जो टाप १३.६% में है। अब आप कुछ फ़ोटो और एक वीडियो का आनन्द लें।
(दौड शुरू होने से पहले हमारे धावक क्लब के तम्बू का नजारा)
(दौड के बाद हमारी विजयी मुस्कान और पार्टनर्स इन क्राईम, वैसे इन पाँचों में मेरा समय सबसे अच्छा रहा इसीलिये ये सब पार्टी मांग रहे हैं :-) )
क्या इतने कष्ट के बाद हम दोबारा मैराथन दौडेंगे। शायद मैराथन का खूब अब मुंह को लग गया है, :-) मेरा मानना है कि अगर मैराथन २६.२ के स्थान पर २० मील की होती तो इसका इतना असर नहीं होता लेकिन आखिरी ५-६ मील ही आपकी मानसिक शक्ति की कठिन परीक्षा लेते हैं। ये भी निश्चित है कि अब तक के जीवन में मैने ये सबसे कठिन शारीरिक श्रम वाला काम किया है। इसके अलावा दौडने को जिन्दगी में स्थान देने का मतलब है कि कभी तोंद नहीं निकलेगी, दिल खुश रहेगा और मन भरके कुछ भी खा सकते हो (एक बार मैने शर्त की बात पर ७५० ग्राम रबडी खा ली थी, अब कोई ऐसी शर्त लगाने वाला नहीं मिलता) :-)
अब अगला गोल है बोस्टन मैराथन के लिये क्वालिफ़ाई करना। इसके लिये मुझे ३ घंटा १० मिनट का समय चाहिये, मुझे लगता है कि मैं ये कर सकता हूँ लेकिन इसके लिये कठिन ट्रेनिंग, संयम और कम से कम २ साल लगेगे। पिछले वर्ष की तुलना में मेरे दौडने की क्षमताओं में लगभग १०-१२% का सुधार हुआ है लेकिन ये भी सत्य है कि अब और सुधार करने के लिये बहुत ज्यादा श्रम लगेगा। इसीलिये शायद मैराथन को आराम देकर छोटी दौड (५, १०, २१.१ किमी) दौडी जायें, और अपनी रफ़्तार बढाने पर ध्यान दिया जाये। और उसके बाद ही अगली मैराथन दौडी जाये जिसका उद्देश्य बोस्टन मैराथन के लिये क्वालीफ़ाई करना हो। देखते हैं भविष्य में ऊँट किस करवट बैठता है।
आंकडों के शौकीन ज्ञानदत्तजी के लिये दो ग्राफ़ भी प्रस्तुत है।
अब ले चलते हैं हमारी दौड की समाप्ति पर फ़िनिशलाईन का वीडियो, ध्यान से १० सेकेण्ड्स से १८ सेकेंड्स को देखिये हम दोनों हाथ हवा में उठाये एक कन्या के बगल से फ़िनिशलाईन क्रास कर रहे हैं।
और आखिर में ह्यूस्टन क्रानिकल समाचार का कुछ धावकों से दौड समाप्त होने के बाद की बातचीत (इसमें हम कहीं नहीं हैं) ।
शनिवार, जनवरी 17, 2009
ह्यूस्टन मैराथन: कल देखेंगे किसमें कितना है दम !!!
इन्तजार की घडियाँ खत्म होने वाली हैं । कल सुबह ७ बजे ह्यूस्टन मैराथन है । कल पता चलेगा कि पिछले पाँच महीने की ट्रेनिंग का कितना फ़ायदा हुआ । ये रहा २६.२ मील (४२.२ किमी) की दौड का नक्शा ।

मजे की बात है कि मेरे अनुमान के विपरीत कुछ दोस्त रविवार के दिन सुबह उठकर मुझे प्रोत्साहित करने के लिये आ रहे हैं ।
९ वें मील पर: सुमेध
१२ वें मील पर: माईकल, अर्जुन और रामदास
१३.१ मील (हाफ़ मार्क) पर: अंकुर (मेरा रूममेट) एक बोर्ड के साथ मिलेगा जिस पर लिखा है । Screw You Guys, I am going home. दूसरे बोर्ड पर लिखा है, Don't Run from your worries. Stand upto them. अंकुर के सेंस आफ़ ह्यूमर के हम पहले से मुरीद हैं अब और ज्यादा हो गये।
१५ वें मील पर: मेरी होस्ट फ़ैमिली मार्था अकेक्जेंडर, लेसली और राबर्ट
२० वें मील पर: मोनिका और ग्रेसियला (जिन्होनें ये प्यारा सा बोर्ड तैयार किया है )

२२ वें मील पर: फ़िर से अंकुर और शशांक
कल दौड पूरी होने के बाद पूरे विवरण के साथ रेस रिपोर्ट पेश की जायेगी । तब तक इन्तजार करें ।

मजे की बात है कि मेरे अनुमान के विपरीत कुछ दोस्त रविवार के दिन सुबह उठकर मुझे प्रोत्साहित करने के लिये आ रहे हैं ।
९ वें मील पर: सुमेध
१२ वें मील पर: माईकल, अर्जुन और रामदास
१३.१ मील (हाफ़ मार्क) पर: अंकुर (मेरा रूममेट) एक बोर्ड के साथ मिलेगा जिस पर लिखा है । Screw You Guys, I am going home. दूसरे बोर्ड पर लिखा है, Don't Run from your worries. Stand upto them. अंकुर के सेंस आफ़ ह्यूमर के हम पहले से मुरीद हैं अब और ज्यादा हो गये।
१५ वें मील पर: मेरी होस्ट फ़ैमिली मार्था अकेक्जेंडर, लेसली और राबर्ट
२० वें मील पर: मोनिका और ग्रेसियला (जिन्होनें ये प्यारा सा बोर्ड तैयार किया है )

२२ वें मील पर: फ़िर से अंकुर और शशांक
कल दौड पूरी होने के बाद पूरे विवरण के साथ रेस रिपोर्ट पेश की जायेगी । तब तक इन्तजार करें ।
मंगलवार, जनवरी 13, 2009
सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह
लीजिये पेश-ए-खिदमत है जिया मोहयेद्दीन की आवाज में सआदत हसन मंटो का अफ़साना "टोबा टेक सिंह" । इस मजमून का Text ब्रजेशजी के ब्लाग चायघर से उनकी अनुमति से उठाया गया है इसके लिये उनका आभार ।
सुनने के लिये यहाँ चटका लगायें और पढने के लिये नीचे निगाह डालें ।
मालूम नहीं, यह बात माक़ूल थी या ग़ैर माक़ूल, बहरहाल दानिशमंदों के फ़ैसले के मुताबिक़ इधर-उधर ऊँची सतह की कान्फ्रेंसें हुईं और बिलआख़िर पागलों के तबादले के लिए एक दिन मुक़र्रर हो गया.
अच्छी तरह छानबीन की गई- वे मुसलमान पागल जिनके लवाहिक़ीन हिंदुस्तान ही में थे, वहीं रहने दिए गए; जितने हिंदू-सिख पागल थे, सबके-सब पुलिस की हिफाज़त में बॉर्डर पह पहुंचा दिए गए.
उधर का मालूम नहीं लेकिन इधर लाहौर के पागलख़ाने में जब इस तबादले की ख़बर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चिमेगोइयाँ (गपशप) होने लगीं.
एक मुसलमान पागल जो 12 बरस से, हर रोज़, बाक़ायदगी के साथ “ज़मींदार” पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा: “मौलबी साब, यह पाकिस्तान क्या होता है...?” तो उसने बड़े ग़ौरो-फ़िक़्र के बाद जवाब दिया: “हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहाँ उस्तरे बनते हैं...!” यह जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया.
इसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा: “सरदार जी, हमें हिंदुस्तान क्यों भेजा जा रहा है... हमें तो वहाँ की बोली नहीं आती...” दूसरा मुस्कराया; “मुझे तो हिंदुस्तोड़ों की बोली आती है, हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिरते हैं...”
एक दिन, नहाते-नहाते, एक मुसलमान पागल ने “पाकिस्तान: जिंदाबाद” का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फ़र्श पर फिसलकर गिरा और बेहोश हो गया.
बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे; उनमें अक्सरीयत (बहुतायत) ऐसे क़ातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफ़सरों को कुछ दे दिलाकर पागलख़ाने भिजवा दिया था कि वह फाँसी के फंदे से बच जाएँ; यह पागल कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान क्यों तक़्सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है; लेकिन सही वाक़िआत से वह भी बेख़बर थे; अख़बारों से उन्हें कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे, जिनकी गुफ़्तुगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे. उनको सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्नाह है: जिसको क़ायदे-आज़म कहते हैं; उसने मुसलमानों के लिए एक अलहदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है; यह कहाँ है, इसका महल्ले-वुक़ू (भौगोलिक स्थिति) क्या है, इसके मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जानते थे- यही वजह है कि वह सब पागल जिनका दिमाग़ पूरी तरह माऊफ़ नहीं हुआ था, इस मख़मसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में; अगर हिंदुस्तान में है तो पाकिस्तान कहाँ है; अगर पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह कुछ अर्से पहले यहीं रहते हुए हिंदुस्तान में थे.
एक पागल तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान, पाकिस्तान और हिंदुस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज़्यादा पागल हो गया. झाड़ू देते-देते वह एक दिन दरख़्त पर चढ़ गया और टहने पर बैठकर दो घंटे मुसलसल तक़रीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी... सिपाहियों ने जब उसे नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया. जब उसे डराया-धमकाया गया तो उसने कहा: “मैं हिंदुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में... मैं इस दरख़्त ही पर रहूंगा...” बड़ी देर के बाद जब उसका दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिंदू-सिख दोस्तों से गले मिलकर रोने लगा- उस ख्याल से उसका दिल भर आया था कि वह उसे छोड़कर हिंदुस्तान चले जाएँगे...
एक एमएससी पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिलकुल अलग-थलग बाग़ की एक ख़ास रविश पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली नुमूदार हुई कि उसने अपने तमाम कपड़े उतारकर दफ़ेदार के हवाले कर दिए और नंग-धड़ंग सारे बाग़ में चलना-फिरना शुरू कर दिया.
चियौट के एक मोटे मुसलमान ने, जो मुस्लिम लीग का सरगर्म कारकुन रह चुका था और दिन में 15-16 मर्तबा नहाया करता था, यकलख़्त यह आदत तर्क कर दी उसका नाम मुहम्मद अली था, चुनांचे उसने एक दिन अपने जंगल में एलान कर दिया कि वह क़ायदे-आज़म मुहम्मद अली जिन्नाह है; उसकी देखा-देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंह बन गया- इससे पहले कि ख़ून-ख़राबा हो जाए, दोनों को ख़तरनाक पागल क़रार देकर अलहदा-अलहदा बंद कर दिया गया.
लाहौर का एक नौजवान हिंदू पकील मुहब्बत में नाकाम होकर पागल हो गया; जब उसने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो बहुत दुखी हुआ. अमृतसर की एक हिंदू लड़की से उसे मुहब्बत थी जिसने उसे ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस लड़की को नहीं भूला था-वह उन तमाम हिंदू और मुसलमान लीडरों को गालियाँ देने लगा जिन्होंने मिल-मिलाकर हिंदुस्तान के दो टुकड़े कर दिए हैं, और उनकी महबूबा हिंदुस्तानी बन गई है और वह पाकिस्तानी…जब तबादले की बात शुरू हुई तो उस वकील को कई पागलों ने समझया कि दिल बुरा न करे… उसे हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा, उसी हिंदुस्तान में जहाँ उसकी महबूबा रहती है- मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था; उसका ख़याल था कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी.
योरोपियन वार्ड मं दो एंग्लो इंडियन पागल थे. उनको जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आज़ाद करके अंग्रेज़ चले गए हैं तो उनको बहुत सदमा हुआ; वह छुप-छुपकर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ़्तुगू करते रहते कि पागलख़ाने में अब उनकी हैसियत किस क़िस्म की होगी; योरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा; ब्रेक-फ़ास्ट मिला करेगा या नहीं; क्या उन्हें डबल रोटी के बजाय ब्लडी इंडियन चपाटी तो ज़हर मार नहीं करनी पड़ेगी?
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एक सिख था, जिसे पागलख़ाने में दाख़िल हुए 15 बरस हो चुके थे. हर वक़्त उसकी ज़ुबान से यह अजीबो-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुनने में आते थे : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन…” वह दिन को सोता था न रात को.
पहरेदारों का यह कहना था कि 15 बरस के तलीव अर्से में वह लहज़े के लिए भी नहीं सोया था; वह लेटता भी नहीं था, अलबत्ता कभी-कभी दीवार के साथ टेक लगा लेता था- हर वक़्त खड़ा रहने से उसके पाँव सूज गए थे और पिंडलियाँ भी फूल गई थीं, मगर जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था.
हिंदुस्तान, पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुताल्लिक़ जब कभी पागलख़ाने में गुफ़्तुगू होती थी तो वह ग़ौर से सुनता था; कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख़याल़ है तो वह बड़ी संजीदगी से जवाब देता : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट…! ” लेकिन बाद में “आफ़ दि पाकिस्तान गवर्नमेंट ” की जगह “आफ़ दि टोबा सिंह गवर्नमेंट!” ने ले ली, और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू कर दिया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है, जहाँ का वह रहने वाला है. किसी को भी मालूम नहीं था कि टोबा सिंह पाकिस्तान में है... या हिंदुस्तान में; जो बताने की कोशिश करते थे वह ख़ुद इस उलझाव में गिरफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पहले हिंदुस्तान में होता था, पर अब सुना है पाकिस्तान में है. क्या पता है कि लाहौर जो आज पाकिस्तान में है... कल हिंदुस्तान में चला जाए... या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए... और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान, दोनों किसी दिन सिरे से ग़ायब ही हो जाएँ...!
इस सिख पागल के केश छिदरे होकर बहुत मुख़्तसर रह गए थे; चूंकि बहुत कम नहाता था, इसलिए दाढ़ी और सिर के बाल आपस में जम गए थे. जिसके बायस उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी; मगर आदमी बे-ज़रर था. 15 बरसों में उसने कभी किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था. पागलख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे, वह उसके मुताल्लिक़ इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में उसकी कई ज़मीनें थीं; अच्छा खाता-पीता ज़मींदार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया, उसके रिश्तेदार उसे लोहे की मोटी-मोटी ज़ंजीरों में बाँधकर लाए और पागलख़ाने में दाख़िल करा गए.
महीने में एक मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उसकी ख़ैर-ख़ैरियत दरयाफ़्त करके चले जाते थे; एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान, हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उसका आना-जाना बंद हो गया.
उसका नाम बिशन सिंह था मगर सब उसे टोबा टेक सिंह कहते थे. उसको यह क़त्अन मालूम नहीं था कि दिन कौन सा है, महीना कौन सा है या कितने साल बीत चुके हैं; लेकिन हर महीने जब उसके अज़ीज़ो-अकारिब उससे मिलने के लिए आने के क़रीब होते तो उसे अपने आप पता चल जाता; उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और बालों में तेल डालकर कंघा करता; अपने वह कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यूँ सज-बनकर मिलने वालों के पास जाता. वह उससे कुछ पूछते तो वह ख़ामोश रहता या कभी-कभार “औपड़ दि गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन...” कह देता.
उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक ऊँगली बढ़ती-बढ़ती 15 बरसों में जवान हो गई थी. बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था-वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आँखों से आँसू बहते थे.
पाकिस्तान और हिंदुस्तान का क़िस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है; जब उसे इत्मीनानबख़्श जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गई. अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी; पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलनेवाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज़ भी बंद हो गई थी जो उनकी आमद की ख़बर दे दिया करती थी-उसकी बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएँ जो उससे हमदर्दी का इज़हार करते थे और उसके लिए फल, मिठाइयाँ और कपड़े लाते थे. वह आएँ तो वह उनके पूछे कि टोबा टेक सिंह कहाँ है... वह उसे यक़ीनन बता देंगे कि टोबा टेक सिंह वहीं से आते हैं जहाँ उसकी ज़मीनें हैं.
पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो ख़ुद को ख़ुदा कहता था. उससे जब एक रोज़ बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में तो उसने हस्बे-आदत क़हक़हा लगाया और कहा : “वह पाकिस्तान में है न हिंदुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म ही नहीं दिया...!”
बिशन सिंह ने उस ख़ुदा से कई मर्तबा बड़ी मिन्नत-समाजत से कहा कि वह हुक्कम दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो, मगर ख़ुदा बहुत मसरूफ़ था, इसलिए कि उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे.
एक दिन तंग आकर बिशन सिंह ख़ुदा पर बरस पड़ा: “ औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ वाहे गुरु जी दा ख़ालसा एंड वाहे गुरु जी दि फ़तह...!” इसका शायद मतलब था कि तुम मुसलमानों के ख़ुदा हो, सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते.
तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंह का एक मुसलमान जो बिशन सिंह का दोस्त था, मुलाक़ात के लिए आया; मुसलमान दोस्त पहले कभी नहीं आया था. जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया, फिर वापिस जाने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका: “यह तुमसे मिलने आया है...तुम्हारा दोस्त फ़ज़लदीन है...!”
बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा.
बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा : “मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूँ लेकिन फ़ुरसत ही न मिली... तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिंदुस्तान चले गए थे... मुझसे जितनी मदद हो सकी, मैंने की... तुम्हारी बेटी रूपकौर...” वह कहते-कहते रुक गया.
बिशन सिंह कुछ याद करने लगा : “बेटी रूपकौर...”
फ़ज़लदीन ने फिर कहना शुरू किया : उन्होंने मुझे कहा था कि तुम्हारी ख़ैर-ख़ैरियत पूछता रहूँ... अब मैंने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो... भाई बलबीर सिंह और भाई वधावा सिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृतकौर से भी... भाई बलबीर से कहना कि फ़ज़लदीन राज़ीख़ुशी है...दो भूरी भैसें जो वह छोड़ गए थे, उनमें से एक ने कट्टा दिया है... दूसरी के कट्टी हुई थी, पर वह 6 दिन की होके मर गई...और... मेरे लायक़ जो ख़िदमत हो, कहना, मैं वक़्त तैयार हूँ... और यह तुम्हारे लिए थोड़े-से मरोंडे लाया हूँ...!”
बिशन सिंह ने मरोंडों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़लदीन से पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है...”
फ़ज़लदीन ने क़दरे हैरत से कहा : “कहाँ है... वहीं है, जहाँ था!”
बिशन सिंह ने फिर पूछा : “पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में...”
“हिंदुस्तान में... नहीं, नहीं पाकिस्तान में...! ” फ़ज़लदीन बौखला-सा गया. बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान आफ़ दी दुर फ़िटे मुँह...! ”
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तबादले की तैयारियाँ मुकम्मल हो चुकी थीं, इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले पागलों की फ़ेहरिस्तें पहुँच चुकी थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था.
सख़्त सर्दियाँ थीं जब लाहौर के पागलख़ाने से हिंदू-सिख पागलों से भरी हुई लारियाँ पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुई, मुताल्लिक़ा अफ़सर भी हमराह थे. वागह के बौर्डर पर तरफ़ैन के सुपरिटेंडेंट एक-दूसरे से मिले और इब्तिदाई कार्रवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया, जो रात भर जारी रहा.
पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”
पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था; बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे, जो निकलने पर रज़ामंद होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि उन्हें फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते-कोई गालियाँ बक रहा है... कोई गा रहा है... कुछ आपस में झगड़ रहे हैं... कुछ रो रहे हैं, बिलख रहे हैं-कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी- पागल औरतों का शोरो-ग़ोग़ा अलग था, और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दाँत से दाँत बज रहे थे.
पागलों की अक्सरीयत इस तबादले के हक़ में नहीं थी, इसलिए कि उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें अपनी जगह से उख़ाड़कर कहाँ फेंका जा रहा है; वह चंद जो कुछ सोच-समझ सकते थे, “पाकिस्तान : ज़िंदाबाद” और “पाकिस्तान : मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे थे ; दो-तीन मर्तबा फ़साद होते-होते बचा, क्योंकि बाज़ मुसलमानों और सिखों को यह नारे सुनकर तैश आ गया था.
जब बिशन सिंह की बारी आई और वागन के उस पार का मुताल्लिक़ अफ़सर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है... पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में.... ?”
मुताल्लिक़ा अफ़सर हँसा : “पाकिस्तान में...! ”
यह सुनकर बिशन सिंह उछलकर एक तरफ़ हटा और दौड़कर अपने बाक़ीमादा साथियों के पास पहुंच गया.
पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”
उसे बहुत समझाया गया कि देखो, अब टोबा टेक सिंह हिंदुस्तान में चला गया... अगर नहीं गया है तो उसे फ़ौरन वहाँ भेज दिया जाएगा, मगर वह न माना! जब उसको जबर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दरमियान में एक जगह इस अंदाज़ में अपनी सूजी हुई टाँगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे कोई ताक़त नहीं हिला सकेगी... आदमी चूंकि बे-ज़रर था, इसलिए उससे मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई ; उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया, और तबादले का बाक़ी काम होता रहा.
सूरज निकलने से पहले साकितो-सामित (बिना हिलेडुले खड़े) बिशन सिंह के हलक़ के एक फ़लक शिगाफ़(गगनभेदी) चीख़ निकली.
इधर-उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और उन्होंने देखा कि वह आदमी जो 15 बरस तक दिन-रात अपनी दाँगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुँह लेटा है-उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान ; दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था.
सुनने के लिये यहाँ चटका लगायें और पढने के लिये नीचे निगाह डालें ।
मालूम नहीं, यह बात माक़ूल थी या ग़ैर माक़ूल, बहरहाल दानिशमंदों के फ़ैसले के मुताबिक़ इधर-उधर ऊँची सतह की कान्फ्रेंसें हुईं और बिलआख़िर पागलों के तबादले के लिए एक दिन मुक़र्रर हो गया.
अच्छी तरह छानबीन की गई- वे मुसलमान पागल जिनके लवाहिक़ीन हिंदुस्तान ही में थे, वहीं रहने दिए गए; जितने हिंदू-सिख पागल थे, सबके-सब पुलिस की हिफाज़त में बॉर्डर पह पहुंचा दिए गए.
उधर का मालूम नहीं लेकिन इधर लाहौर के पागलख़ाने में जब इस तबादले की ख़बर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चिमेगोइयाँ (गपशप) होने लगीं.
एक मुसलमान पागल जो 12 बरस से, हर रोज़, बाक़ायदगी के साथ “ज़मींदार” पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा: “मौलबी साब, यह पाकिस्तान क्या होता है...?” तो उसने बड़े ग़ौरो-फ़िक़्र के बाद जवाब दिया: “हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहाँ उस्तरे बनते हैं...!” यह जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया.
इसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा: “सरदार जी, हमें हिंदुस्तान क्यों भेजा जा रहा है... हमें तो वहाँ की बोली नहीं आती...” दूसरा मुस्कराया; “मुझे तो हिंदुस्तोड़ों की बोली आती है, हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिरते हैं...”
एक दिन, नहाते-नहाते, एक मुसलमान पागल ने “पाकिस्तान: जिंदाबाद” का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फ़र्श पर फिसलकर गिरा और बेहोश हो गया.
बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे; उनमें अक्सरीयत (बहुतायत) ऐसे क़ातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफ़सरों को कुछ दे दिलाकर पागलख़ाने भिजवा दिया था कि वह फाँसी के फंदे से बच जाएँ; यह पागल कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान क्यों तक़्सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है; लेकिन सही वाक़िआत से वह भी बेख़बर थे; अख़बारों से उन्हें कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे, जिनकी गुफ़्तुगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे. उनको सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्नाह है: जिसको क़ायदे-आज़म कहते हैं; उसने मुसलमानों के लिए एक अलहदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है; यह कहाँ है, इसका महल्ले-वुक़ू (भौगोलिक स्थिति) क्या है, इसके मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जानते थे- यही वजह है कि वह सब पागल जिनका दिमाग़ पूरी तरह माऊफ़ नहीं हुआ था, इस मख़मसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में; अगर हिंदुस्तान में है तो पाकिस्तान कहाँ है; अगर पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह कुछ अर्से पहले यहीं रहते हुए हिंदुस्तान में थे.
एक पागल तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान, पाकिस्तान और हिंदुस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज़्यादा पागल हो गया. झाड़ू देते-देते वह एक दिन दरख़्त पर चढ़ गया और टहने पर बैठकर दो घंटे मुसलसल तक़रीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी... सिपाहियों ने जब उसे नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया. जब उसे डराया-धमकाया गया तो उसने कहा: “मैं हिंदुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में... मैं इस दरख़्त ही पर रहूंगा...” बड़ी देर के बाद जब उसका दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिंदू-सिख दोस्तों से गले मिलकर रोने लगा- उस ख्याल से उसका दिल भर आया था कि वह उसे छोड़कर हिंदुस्तान चले जाएँगे...
एक एमएससी पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिलकुल अलग-थलग बाग़ की एक ख़ास रविश पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली नुमूदार हुई कि उसने अपने तमाम कपड़े उतारकर दफ़ेदार के हवाले कर दिए और नंग-धड़ंग सारे बाग़ में चलना-फिरना शुरू कर दिया.
चियौट के एक मोटे मुसलमान ने, जो मुस्लिम लीग का सरगर्म कारकुन रह चुका था और दिन में 15-16 मर्तबा नहाया करता था, यकलख़्त यह आदत तर्क कर दी उसका नाम मुहम्मद अली था, चुनांचे उसने एक दिन अपने जंगल में एलान कर दिया कि वह क़ायदे-आज़म मुहम्मद अली जिन्नाह है; उसकी देखा-देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंह बन गया- इससे पहले कि ख़ून-ख़राबा हो जाए, दोनों को ख़तरनाक पागल क़रार देकर अलहदा-अलहदा बंद कर दिया गया.
लाहौर का एक नौजवान हिंदू पकील मुहब्बत में नाकाम होकर पागल हो गया; जब उसने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो बहुत दुखी हुआ. अमृतसर की एक हिंदू लड़की से उसे मुहब्बत थी जिसने उसे ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस लड़की को नहीं भूला था-वह उन तमाम हिंदू और मुसलमान लीडरों को गालियाँ देने लगा जिन्होंने मिल-मिलाकर हिंदुस्तान के दो टुकड़े कर दिए हैं, और उनकी महबूबा हिंदुस्तानी बन गई है और वह पाकिस्तानी…जब तबादले की बात शुरू हुई तो उस वकील को कई पागलों ने समझया कि दिल बुरा न करे… उसे हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा, उसी हिंदुस्तान में जहाँ उसकी महबूबा रहती है- मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था; उसका ख़याल था कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी.
योरोपियन वार्ड मं दो एंग्लो इंडियन पागल थे. उनको जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आज़ाद करके अंग्रेज़ चले गए हैं तो उनको बहुत सदमा हुआ; वह छुप-छुपकर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ़्तुगू करते रहते कि पागलख़ाने में अब उनकी हैसियत किस क़िस्म की होगी; योरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा; ब्रेक-फ़ास्ट मिला करेगा या नहीं; क्या उन्हें डबल रोटी के बजाय ब्लडी इंडियन चपाटी तो ज़हर मार नहीं करनी पड़ेगी?
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एक सिख था, जिसे पागलख़ाने में दाख़िल हुए 15 बरस हो चुके थे. हर वक़्त उसकी ज़ुबान से यह अजीबो-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुनने में आते थे : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन…” वह दिन को सोता था न रात को.
पहरेदारों का यह कहना था कि 15 बरस के तलीव अर्से में वह लहज़े के लिए भी नहीं सोया था; वह लेटता भी नहीं था, अलबत्ता कभी-कभी दीवार के साथ टेक लगा लेता था- हर वक़्त खड़ा रहने से उसके पाँव सूज गए थे और पिंडलियाँ भी फूल गई थीं, मगर जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था.
हिंदुस्तान, पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुताल्लिक़ जब कभी पागलख़ाने में गुफ़्तुगू होती थी तो वह ग़ौर से सुनता था; कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख़याल़ है तो वह बड़ी संजीदगी से जवाब देता : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट…! ” लेकिन बाद में “आफ़ दि पाकिस्तान गवर्नमेंट ” की जगह “आफ़ दि टोबा सिंह गवर्नमेंट!” ने ले ली, और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू कर दिया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है, जहाँ का वह रहने वाला है. किसी को भी मालूम नहीं था कि टोबा सिंह पाकिस्तान में है... या हिंदुस्तान में; जो बताने की कोशिश करते थे वह ख़ुद इस उलझाव में गिरफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पहले हिंदुस्तान में होता था, पर अब सुना है पाकिस्तान में है. क्या पता है कि लाहौर जो आज पाकिस्तान में है... कल हिंदुस्तान में चला जाए... या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए... और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान, दोनों किसी दिन सिरे से ग़ायब ही हो जाएँ...!
इस सिख पागल के केश छिदरे होकर बहुत मुख़्तसर रह गए थे; चूंकि बहुत कम नहाता था, इसलिए दाढ़ी और सिर के बाल आपस में जम गए थे. जिसके बायस उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी; मगर आदमी बे-ज़रर था. 15 बरसों में उसने कभी किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था. पागलख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे, वह उसके मुताल्लिक़ इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में उसकी कई ज़मीनें थीं; अच्छा खाता-पीता ज़मींदार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया, उसके रिश्तेदार उसे लोहे की मोटी-मोटी ज़ंजीरों में बाँधकर लाए और पागलख़ाने में दाख़िल करा गए.
महीने में एक मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उसकी ख़ैर-ख़ैरियत दरयाफ़्त करके चले जाते थे; एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान, हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उसका आना-जाना बंद हो गया.
उसका नाम बिशन सिंह था मगर सब उसे टोबा टेक सिंह कहते थे. उसको यह क़त्अन मालूम नहीं था कि दिन कौन सा है, महीना कौन सा है या कितने साल बीत चुके हैं; लेकिन हर महीने जब उसके अज़ीज़ो-अकारिब उससे मिलने के लिए आने के क़रीब होते तो उसे अपने आप पता चल जाता; उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और बालों में तेल डालकर कंघा करता; अपने वह कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यूँ सज-बनकर मिलने वालों के पास जाता. वह उससे कुछ पूछते तो वह ख़ामोश रहता या कभी-कभार “औपड़ दि गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन...” कह देता.
उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक ऊँगली बढ़ती-बढ़ती 15 बरसों में जवान हो गई थी. बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था-वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आँखों से आँसू बहते थे.
पाकिस्तान और हिंदुस्तान का क़िस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है; जब उसे इत्मीनानबख़्श जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गई. अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी; पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलनेवाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज़ भी बंद हो गई थी जो उनकी आमद की ख़बर दे दिया करती थी-उसकी बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएँ जो उससे हमदर्दी का इज़हार करते थे और उसके लिए फल, मिठाइयाँ और कपड़े लाते थे. वह आएँ तो वह उनके पूछे कि टोबा टेक सिंह कहाँ है... वह उसे यक़ीनन बता देंगे कि टोबा टेक सिंह वहीं से आते हैं जहाँ उसकी ज़मीनें हैं.
पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो ख़ुद को ख़ुदा कहता था. उससे जब एक रोज़ बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में तो उसने हस्बे-आदत क़हक़हा लगाया और कहा : “वह पाकिस्तान में है न हिंदुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म ही नहीं दिया...!”
बिशन सिंह ने उस ख़ुदा से कई मर्तबा बड़ी मिन्नत-समाजत से कहा कि वह हुक्कम दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो, मगर ख़ुदा बहुत मसरूफ़ था, इसलिए कि उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे.
एक दिन तंग आकर बिशन सिंह ख़ुदा पर बरस पड़ा: “ औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ वाहे गुरु जी दा ख़ालसा एंड वाहे गुरु जी दि फ़तह...!” इसका शायद मतलब था कि तुम मुसलमानों के ख़ुदा हो, सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते.
तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंह का एक मुसलमान जो बिशन सिंह का दोस्त था, मुलाक़ात के लिए आया; मुसलमान दोस्त पहले कभी नहीं आया था. जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया, फिर वापिस जाने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका: “यह तुमसे मिलने आया है...तुम्हारा दोस्त फ़ज़लदीन है...!”
बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा.
बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा : “मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूँ लेकिन फ़ुरसत ही न मिली... तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिंदुस्तान चले गए थे... मुझसे जितनी मदद हो सकी, मैंने की... तुम्हारी बेटी रूपकौर...” वह कहते-कहते रुक गया.
बिशन सिंह कुछ याद करने लगा : “बेटी रूपकौर...”
फ़ज़लदीन ने फिर कहना शुरू किया : उन्होंने मुझे कहा था कि तुम्हारी ख़ैर-ख़ैरियत पूछता रहूँ... अब मैंने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो... भाई बलबीर सिंह और भाई वधावा सिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृतकौर से भी... भाई बलबीर से कहना कि फ़ज़लदीन राज़ीख़ुशी है...दो भूरी भैसें जो वह छोड़ गए थे, उनमें से एक ने कट्टा दिया है... दूसरी के कट्टी हुई थी, पर वह 6 दिन की होके मर गई...और... मेरे लायक़ जो ख़िदमत हो, कहना, मैं वक़्त तैयार हूँ... और यह तुम्हारे लिए थोड़े-से मरोंडे लाया हूँ...!”
बिशन सिंह ने मरोंडों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़लदीन से पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है...”
फ़ज़लदीन ने क़दरे हैरत से कहा : “कहाँ है... वहीं है, जहाँ था!”
बिशन सिंह ने फिर पूछा : “पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में...”
“हिंदुस्तान में... नहीं, नहीं पाकिस्तान में...! ” फ़ज़लदीन बौखला-सा गया. बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान आफ़ दी दुर फ़िटे मुँह...! ”
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तबादले की तैयारियाँ मुकम्मल हो चुकी थीं, इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले पागलों की फ़ेहरिस्तें पहुँच चुकी थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था.
सख़्त सर्दियाँ थीं जब लाहौर के पागलख़ाने से हिंदू-सिख पागलों से भरी हुई लारियाँ पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुई, मुताल्लिक़ा अफ़सर भी हमराह थे. वागह के बौर्डर पर तरफ़ैन के सुपरिटेंडेंट एक-दूसरे से मिले और इब्तिदाई कार्रवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया, जो रात भर जारी रहा.
पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”
पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था; बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे, जो निकलने पर रज़ामंद होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि उन्हें फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते-कोई गालियाँ बक रहा है... कोई गा रहा है... कुछ आपस में झगड़ रहे हैं... कुछ रो रहे हैं, बिलख रहे हैं-कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी- पागल औरतों का शोरो-ग़ोग़ा अलग था, और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दाँत से दाँत बज रहे थे.
पागलों की अक्सरीयत इस तबादले के हक़ में नहीं थी, इसलिए कि उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें अपनी जगह से उख़ाड़कर कहाँ फेंका जा रहा है; वह चंद जो कुछ सोच-समझ सकते थे, “पाकिस्तान : ज़िंदाबाद” और “पाकिस्तान : मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे थे ; दो-तीन मर्तबा फ़साद होते-होते बचा, क्योंकि बाज़ मुसलमानों और सिखों को यह नारे सुनकर तैश आ गया था.
जब बिशन सिंह की बारी आई और वागन के उस पार का मुताल्लिक़ अफ़सर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है... पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में.... ?”
मुताल्लिक़ा अफ़सर हँसा : “पाकिस्तान में...! ”
यह सुनकर बिशन सिंह उछलकर एक तरफ़ हटा और दौड़कर अपने बाक़ीमादा साथियों के पास पहुंच गया.
पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”
उसे बहुत समझाया गया कि देखो, अब टोबा टेक सिंह हिंदुस्तान में चला गया... अगर नहीं गया है तो उसे फ़ौरन वहाँ भेज दिया जाएगा, मगर वह न माना! जब उसको जबर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दरमियान में एक जगह इस अंदाज़ में अपनी सूजी हुई टाँगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे कोई ताक़त नहीं हिला सकेगी... आदमी चूंकि बे-ज़रर था, इसलिए उससे मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई ; उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया, और तबादले का बाक़ी काम होता रहा.
सूरज निकलने से पहले साकितो-सामित (बिना हिलेडुले खड़े) बिशन सिंह के हलक़ के एक फ़लक शिगाफ़(गगनभेदी) चीख़ निकली.
इधर-उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और उन्होंने देखा कि वह आदमी जो 15 बरस तक दिन-रात अपनी दाँगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुँह लेटा है-उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान ; दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था.
बुधवार, दिसंबर 31, 2008
जिया मोहिनुद्दीन की आवाज में सुनिये "लाहौर"
जिया मोहिनुद्दीन की आवाज में पिछली कुछ प्रविष्टियों को आपकी सराहना मिली, इसी के चलते एक और नगीना पेश कर रहा हूँ । इस बार उनकी आवाज में लाहौर के बारे में सुनिये ।
इसी के साथ आप सभी को नये साल की हार्दिक शुभकामनायें ।
इसी के साथ आप सभी को नये साल की हार्दिक शुभकामनायें ।
मंगलवार, दिसंबर 30, 2008
सोमवार, दिसंबर 29, 2008
शेयर बाजार में निवेश: आपबीती और सीखे हुये सबक
आज ज्ञानदत्त पाण्डेयजी के चिट्ठे पर "हैप्योनेर निवेशक बनें" पढा । पहले तो हैप्योनेर का अर्थ ही समझ में नहीं आया, फ़िर लगा कि ज्ञानदत्तजी हमारे जैसे हिन्दी माध्यम में पढाई करने वालों की टांग तो नहीं खींच रहे हैं । अगर स्पेलिंग ही लिख देते तो कुछ समझने की कोशिश करते । फ़िर आगे पढा तो पता चला कि हैप्योनेर (Happionaire) बोले तो "आनन्द से तृप्त" ।
आब्जेक्शन माई लार्ड: शेयर बाजार और आनन्द से तृप्त, कैसी लीला है विरोधाभास की ।
कुछ महीनों पहले जब अमेरिका के शेयर बाजार की वाट लगी हुयी थी तो एक पार्टी में इस बात पर चर्चा होने लगी । एक बुजुर्ग (जिनका पोर्टफ़ोलियो काफ़ी सिकुड चुका था) ने हमसे कहा कि तुम तो जवान हो, ये बडा माकूल समय है शेयर बाजार में पैसा लगाने का । सब कुछ गाजर मूली के दाम पर बिक रहा है, कोई कम्पनी देखो जिसकी नींव (Fundamentals) मजबूत हो, पैसा निवेश करो और फ़िर इसे भूल जाओ । कुछ सालों के बाद हमको दुआयें दोगे । हमने उस समय तो हंसी में टाल दिया कि गरीब विद्यार्थियों के पास कैसा पैसा लेकिन जिस प्रकार कलयुग राजा परीक्षित के सोने के मुकुट में समा चुका था, कुछ कुछ वैसा ही हमारे साथ हुआ ।
पहली बार finance.google.com खोल कर देखा, पता चला दुनिया में बहुत कुछ चल रहा है । फ़िर देखा कि माउस के क्लिक से ही शेयर खरीदे/बेचे जा सकते हैं । मन को समझाया कि केवल देख लो, बाकी पैसा वैसा कहाँ है डालने के लिये । फ़िर कहा कि चला खाता खुलवा लो, कोई जबरदस्ती तो है नहीं कि खरीदना ही पडेगा । वैसे भी खाता तो मुफ़्त खुल रहा है, नो सर्विस चार्ज :-)
२ हफ़्ते निवेश से सम्बन्धित खबरे पढने में गुजारे । मन तो तसल्ली दी कि ये ठीक कर रहे हो, कुछ भी करने से पहले ज्ञान जुटाना बहुत जरूरी है । तुम उन लोगों में से नहीं हो कि किसी ने कुछ कहा और कूद पडे । भले ही लोग न माने लेकिन तुम खुद तो काफ़ी समझदार और औसत बुद्दि तो समझते ही हो । फ़िर कहा कि चलो अपने बैंक से ट्रेडिंग अकाउंट में पैसा तो भिजवा ही दो, मान लो कल कोई अच्छा मौका आया खरीदने का और तुम मुंह देखते रह जाओगे । चलो ये भी करवा लिया, अपनी कठिन मेहनत से बचाये हुये कुछ पैसे (पिताजी न पढ लें, इसलिये बतायेंगे नहीं :-) ) डालकर पहला निवेश किया । Wachovia Coroporation डूब चुकी थी और उसका शेयर अर्श से फ़र्श पर आ चुका था । Wells Fargo ने जब Wachovia को खरीदने की बात की तो उसका मरे हुये शेयर ने फ़र्श से जरा सा लडखडाकर ऊपर की ओर देखा, ठीक इसी समय हमने उसे थाम लिया । अगले हफ़्ते में Wells Fargo से डील पक्की हुयी और हमारा पोर्टफ़ोलियो ३३% के लाभ में हरा-हरा दिख रहा था ।
हमने खुद को शाबाशी दी और कुछ अन्य निवेश किये जो औंधे मुंह गिर पडे । ध्यान रहे कि हमारे हिसाब से ये सारे निवेश So Called दिमाग और Analysis के बाद किये गये थे । लेकिन अब चलते है कुछ महत्वपूर्ण सबक पर जो इन ५-६ महीने में हमने सीखे :
१) कहना आसान है कि पैसा लगाओ कि और Long Term भूल जाओ । जब आप अपनी गाढी कमाई को लाल होते देखते हैं तो बडा दुख होता है ।
२) कहा जाता है कि Buy Low, Sell High । लेकिन अक्सर होता उलटा है ।
३) शेयर खरीदते ही दाम गिरने पर पहला रिऐक्शन होता है "Cost Averaging" | अर्थात अगर आपने १०० शेयर २० के दाम खरीदे और अब दाम १५ है तो अगर आप १०० शेयर और खरीदें तो आपके निवेश की औसत खरीद १७.५ होगी । ये एक खतरनाक Slippery Slope है, इसमें मैने अच्छे अच्छों को फ़िसलते देखा है । हम भी एक बार इसके चक्कर में फ़ंसे लेकिन समय चलते बच निकले ।
४) जब बाजार बूम पर होता है तो पनवाडी की सलाह भी ५०% से ज्यादा सही होती है । लेकिन Recession के समय बाजार सारे सूत्र (Logic, Fundamental, Expectation) भूल जाता है । इस समय यहाँ अमेरिका में तो कम से कम Panic-Driven बाजार है । किसी भी कम्पनी के Fundamentals कितने भी मजबूत हों सब उठापटक में फ़ंसे हुये हैं ।
५) हमने कुछ निवेश Solar Companies में भी किया था । सोचा था कि बराक ओबामा Non-Conventional Energy के बहुत पक्ष में हैं और उनके जीतने की संभावना के चलते ये एक अच्छा निवेश होगा । अफ़सोस गलत जवाब....इस समय अमेरिका में पेट्रोल ६५ रूपये ($१.३५) में ३.७८ लीटर (१ गैलन) मिल रहा है, ऐसे में सोलर का
क्या हश्र होगा आप खुद ही सोच लीजिये । लेकिन इस Panic-driven/Manupulative बाजार का कोई भरोसा नहीं । आज जब सब कुछ डाउन है, एक सोलर कम्पनी के शेयर लगभग १२% ऊपर हैं बिना किसी ठोस/सकारात्मक खबर के (इसे आप चित्र में देख सकते हैं) ।
६) इस समय निवेश करने के लिये Nerves और Balls दोनों स्टील की चाहियें, अगर दम हो तो निवेश करो वरना अभी और इन्तजार करो । क्योंकि अगर विशेषज्ञों की माने तो यहाँ अमेरिका के बाजार के होश बजा होने में कम से कम दो साल या और अधिक समय लगेगा । तब तक यूँ ही खटपट चलती रहेगी ।
७) Temptation के मामले में शेयर बाजार बहुत खतरनाक है । हम खुद ही कई बार Tempt हुये लेकिन निवेश के लिये खुद के लिये बनाये गये नियमों को पालन करने की बाध्यता के चलते कई बार इस Temptation से बचे तो अन्त में सही साबित हुआ ।
इसीलिये, चाहे बूम (Boom) हो या Recession अगर निवेश आपका Profession नहीं है तो आप नौसिखिये (Ameteur) ही हैं । निवेश से पहले कुछ नियम बनाईये और इनका पालन कीजिये । कभी भी उधार लेकर पैसा मत लगाईये, और जिस पैसे की आपको निकट भविष्य (१-२ साल) में जरूरत पडने की सम्भावना हो उसे बाजार में निवेश मत कीजिये ।
आब्जेक्शन माई लार्ड: शेयर बाजार और आनन्द से तृप्त, कैसी लीला है विरोधाभास की ।
कुछ महीनों पहले जब अमेरिका के शेयर बाजार की वाट लगी हुयी थी तो एक पार्टी में इस बात पर चर्चा होने लगी । एक बुजुर्ग (जिनका पोर्टफ़ोलियो काफ़ी सिकुड चुका था) ने हमसे कहा कि तुम तो जवान हो, ये बडा माकूल समय है शेयर बाजार में पैसा लगाने का । सब कुछ गाजर मूली के दाम पर बिक रहा है, कोई कम्पनी देखो जिसकी नींव (Fundamentals) मजबूत हो, पैसा निवेश करो और फ़िर इसे भूल जाओ । कुछ सालों के बाद हमको दुआयें दोगे । हमने उस समय तो हंसी में टाल दिया कि गरीब विद्यार्थियों के पास कैसा पैसा लेकिन जिस प्रकार कलयुग राजा परीक्षित के सोने के मुकुट में समा चुका था, कुछ कुछ वैसा ही हमारे साथ हुआ ।
पहली बार finance.google.com खोल कर देखा, पता चला दुनिया में बहुत कुछ चल रहा है । फ़िर देखा कि माउस के क्लिक से ही शेयर खरीदे/बेचे जा सकते हैं । मन को समझाया कि केवल देख लो, बाकी पैसा वैसा कहाँ है डालने के लिये । फ़िर कहा कि चला खाता खुलवा लो, कोई जबरदस्ती तो है नहीं कि खरीदना ही पडेगा । वैसे भी खाता तो मुफ़्त खुल रहा है, नो सर्विस चार्ज :-)
२ हफ़्ते निवेश से सम्बन्धित खबरे पढने में गुजारे । मन तो तसल्ली दी कि ये ठीक कर रहे हो, कुछ भी करने से पहले ज्ञान जुटाना बहुत जरूरी है । तुम उन लोगों में से नहीं हो कि किसी ने कुछ कहा और कूद पडे । भले ही लोग न माने लेकिन तुम खुद तो काफ़ी समझदार और औसत बुद्दि तो समझते ही हो । फ़िर कहा कि चलो अपने बैंक से ट्रेडिंग अकाउंट में पैसा तो भिजवा ही दो, मान लो कल कोई अच्छा मौका आया खरीदने का और तुम मुंह देखते रह जाओगे । चलो ये भी करवा लिया, अपनी कठिन मेहनत से बचाये हुये कुछ पैसे (पिताजी न पढ लें, इसलिये बतायेंगे नहीं :-) ) डालकर पहला निवेश किया । Wachovia Coroporation डूब चुकी थी और उसका शेयर अर्श से फ़र्श पर आ चुका था । Wells Fargo ने जब Wachovia को खरीदने की बात की तो उसका मरे हुये शेयर ने फ़र्श से जरा सा लडखडाकर ऊपर की ओर देखा, ठीक इसी समय हमने उसे थाम लिया । अगले हफ़्ते में Wells Fargo से डील पक्की हुयी और हमारा पोर्टफ़ोलियो ३३% के लाभ में हरा-हरा दिख रहा था ।
हमने खुद को शाबाशी दी और कुछ अन्य निवेश किये जो औंधे मुंह गिर पडे । ध्यान रहे कि हमारे हिसाब से ये सारे निवेश So Called दिमाग और Analysis के बाद किये गये थे । लेकिन अब चलते है कुछ महत्वपूर्ण सबक पर जो इन ५-६ महीने में हमने सीखे :
१) कहना आसान है कि पैसा लगाओ कि और Long Term भूल जाओ । जब आप अपनी गाढी कमाई को लाल होते देखते हैं तो बडा दुख होता है ।
२) कहा जाता है कि Buy Low, Sell High । लेकिन अक्सर होता उलटा है ।
३) शेयर खरीदते ही दाम गिरने पर पहला रिऐक्शन होता है "Cost Averaging" | अर्थात अगर आपने १०० शेयर २० के दाम खरीदे और अब दाम १५ है तो अगर आप १०० शेयर और खरीदें तो आपके निवेश की औसत खरीद १७.५ होगी । ये एक खतरनाक Slippery Slope है, इसमें मैने अच्छे अच्छों को फ़िसलते देखा है । हम भी एक बार इसके चक्कर में फ़ंसे लेकिन समय चलते बच निकले ।
४) जब बाजार बूम पर होता है तो पनवाडी की सलाह भी ५०% से ज्यादा सही होती है । लेकिन Recession के समय बाजार सारे सूत्र (Logic, Fundamental, Expectation) भूल जाता है । इस समय यहाँ अमेरिका में तो कम से कम Panic-Driven बाजार है । किसी भी कम्पनी के Fundamentals कितने भी मजबूत हों सब उठापटक में फ़ंसे हुये हैं ।
५) हमने कुछ निवेश Solar Companies में भी किया था । सोचा था कि बराक ओबामा Non-Conventional Energy के बहुत पक्ष में हैं और उनके जीतने की संभावना के चलते ये एक अच्छा निवेश होगा । अफ़सोस गलत जवाब....इस समय अमेरिका में पेट्रोल ६५ रूपये ($१.३५) में ३.७८ लीटर (१ गैलन) मिल रहा है, ऐसे में सोलर का
६) इस समय निवेश करने के लिये Nerves और Balls दोनों स्टील की चाहियें, अगर दम हो तो निवेश करो वरना अभी और इन्तजार करो । क्योंकि अगर विशेषज्ञों की माने तो यहाँ अमेरिका के बाजार के होश बजा होने में कम से कम दो साल या और अधिक समय लगेगा । तब तक यूँ ही खटपट चलती रहेगी ।
७) Temptation के मामले में शेयर बाजार बहुत खतरनाक है । हम खुद ही कई बार Tempt हुये लेकिन निवेश के लिये खुद के लिये बनाये गये नियमों को पालन करने की बाध्यता के चलते कई बार इस Temptation से बचे तो अन्त में सही साबित हुआ ।
इसीलिये, चाहे बूम (Boom) हो या Recession अगर निवेश आपका Profession नहीं है तो आप नौसिखिये (Ameteur) ही हैं । निवेश से पहले कुछ नियम बनाईये और इनका पालन कीजिये । कभी भी उधार लेकर पैसा मत लगाईये, और जिस पैसे की आपको निकट भविष्य (१-२ साल) में जरूरत पडने की सम्भावना हो उसे बाजार में निवेश मत कीजिये ।
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