ये वीडियो अंग्रेजी में है लेकिन मुझे बडा प्रभावी लगा इसलिये पोस्ट कर रहा हूँ । उनके प्रेजेन्टेशन से कोट किया जाये तो,
We’ve had information overload in some form or another since the 1500’s. What’s changing now is the filters used for most of that 500 year period are breaking. And designing new filters doesn’t mean simply updating the old filters. They’re broken for structural reasons, not surface reasons.
When you feel yourself getting too much information, I think the discipline is not to say to yourself “What’s happened to the information?” but rather “What was I relying on before that stopped functioning?”
मंगलवार, फ़रवरी 24, 2009
शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2009
घूँघट चक वो सजना (फ़िर से बुल्ले शाह) वडाली बन्धुओं की आवाज में !!!
कल की पोस्ट से बुल्लेशाह का जो खुमार चढा है वो अभी तक उतरा नहीं है। इसी सिलसिले को जारी रखते हुये आज सुनिये अपने वडाली बन्धुओं की आवाज में "घूँघट चक वो सजना"। आशा है आपको पसन्द आयेगा, :-)
गुरुवार, फ़रवरी 19, 2009
उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान की आवाज में पंजाबी कव्वाली (बुल्ले शाह का कलाम) !!!
इस बार पेश-ए-खिदमत है उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान और साथियों की आवाज में एक पंजाबी कव्वाली। मुझे बेहद अफ़सोस है कि कभी पंजाबी नहीं सीखी, मेरा ननिहाल रोहतक में था(है?)। मेरी माताजी पंजाबी बोल/समझ लेती हैं लेकिन कभी उनसे पंजाबी नहीं सीखी इसका बडा रंज है। फ़िलहाल इस कव्वाली का हिन्दी अनुवाद मेरे एक मित्र की सहेली ने किया है। ये बुल्लेशाह का कलाम है और ये एक बडा हृदयवेदी विरहगीत है। इस कव्वाली का लब्बोलुआब(Approximate) कुछ इस प्रकार है :-)
गफ़लत न कर तू, छोड जंगली बसेरा ।
पंछी वापिस घर आ गये, तेरा मन क्यों नहीं करता,
मैं तेरी तू मेरा,
यार जिन्दगी करे कुरबानी जे यार आये एक बार,
इश्क का चर्खा दुखों का पूरिया (पहाड)
मेरी जिन्दगी चरखा सूत काट कर कटी जा रही है।
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
तेरे पास जो दिल है वो महरूम है, तेरा जो
मेरे लहू में मेरी नस नस में तेरी याद है।
अब तो सजना सब छोड कर आ जा, मेरी निगाह तेरा पता हर आते जाते राही से पूछ्ती है।
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
चरखा मेरा रंग रंगीला है, तेरी याद मेरे मन में बसी है।
मेरे दुखडे कौन समेटे, मैं तुझे याद करती हूं।
मैं तो जलती रहती हूं, मुझे पता ही नहीं बस जलती रहती हूं।
लोग कहते हैं कि इश्क भूल जा लेकिन इश्क छूटता नहीं,
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
गफ़लत न कर तू, छोड जंगली बसेरा ।
पंछी वापिस घर आ गये, तेरा मन क्यों नहीं करता,
मैं तेरी तू मेरा,
यार जिन्दगी करे कुरबानी जे यार आये एक बार,
इश्क का चर्खा दुखों का पूरिया (पहाड)
मेरी जिन्दगी चरखा सूत काट कर कटी जा रही है।
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
तेरे पास जो दिल है वो महरूम है, तेरा जो
मेरे लहू में मेरी नस नस में तेरी याद है।
अब तो सजना सब छोड कर आ जा, मेरी निगाह तेरा पता हर आते जाते राही से पूछ्ती है।
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
चरखा मेरा रंग रंगीला है, तेरी याद मेरे मन में बसी है।
मेरे दुखडे कौन समेटे, मैं तुझे याद करती हूं।
मैं तो जलती रहती हूं, मुझे पता ही नहीं बस जलती रहती हूं।
लोग कहते हैं कि इश्क भूल जा लेकिन इश्क छूटता नहीं,
हर चर्खे के चक्कर के साथ मैं तुझे याद करती हूँ।
शुक्रवार, फ़रवरी 06, 2009
हिन्दी, सामाजिक विमर्श, दो बिन्दु से निष्कर्ष: सभी सही हैं !!!
मेरा हिन्दी साहित्य, हिन्दी विमर्श अथवा सामाजिक विमर्श से कभी सीधा वास्ता तो नहीं पडा लेकिन मित्रों के साथ चर्चा में इसको अनुभव किया है। हिन्दी ब्लागजगत पर लेखक/पत्रकारों और अन्य भी विमर्शिंयों की टोलियाँ भरी पडी हैं। ब्लागजगत के बारे में सबसे बडी समस्या इसका सरलीकरण है, ऐसे सरलीकरण में व्यक्तिगत राय को तर्क का जामा पहनाना बहुत आसान है (शायद मैं भी यही कह रहा हूँ)।
कुछ दिन पहले किन्ही सचिनजी के चिट्ठे पर पढा कि उन्होने आई.आई.एम. अहमदाबाद में देखा कि सभी युवा केवल पैकेज के बारे में बात कर रहे हैं।
निष्कर्ष: आज के युवाओं को केवल पैकेज की चिन्ता है, बाकी किसी चीज की फ़िक्र नहीं।
किसी और चिट्ठे पर पढने को मिलेगा कि उनके साथ ऐसा हादसा हुआ, निष्कर्ष: जो उनके साथ हुआ वही सत्य है और ऐसा ही सबके साथ होता होगा।
बहुत बचपन में (कक्षा ६ में), मेरी बहन ने भी निष्कर्ष निकाला था कि हमारे मामाजी दिल्ली में रहते हैं और उनकी क्लास की तीन सहेलियों के मामाजी भी दिल्ली में रहते हैं, इसका मतलब देश में अधिकतर बच्चों के मामाजी दिल्ली में रहते हैं। अच्छे से याद है कि उस समय पिताजी ने पहली बार डेटा एनालिसिस की पहली क्लास ली थी।
मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ लेकिन अन्य सभी विषयों/विधाओं का सम्मान करता हूँ लेकिन ब्लागजगत पर होने वाले अधिकतर वैचारिक विमर्श के बारे में अपनी व्यक्तिगत राय को एक ग्राफ़ के माध्यम से व्यक्त कर रहा हूँ।

ऊपर दिये ग्राफ़ में अगर आपके पास केवल दो बिन्दु हैं (बडे लाल वाले) तो आप किसी भी थ्योरी को सही साबित कर सकते हैं, लेकिन असल मुद्दा काले वाले बिन्दु है, जिनको किसी भी एक निष्कर्ष से समझाना असम्भव है।
विज्ञान में किसी भी निष्कर्ष को निकालने के लिये काफ़ी बिन्दुओं का प्रयोग होता है। किन्ही किन्ही स्थितियों में जब Sufficient Data उपलब्ध नहीं होता है तो भी कुछ निश्कर्ष निकाले जाते हैं और कहा जाता है कि Take it with a pinch of salt, if not bucket full, :-) लेकिन ऐसे अधिकतर किस्सों में बाल्टी भर नहीं बल्कि ट्रक भर नमक और सावधानी की आवश्यकता होती है।
ऐसे में लगता है कि सभी विमर्शियों को Data Analysis और Statistics पढाना अनिवार्य कर देना चाहिये जिससे दो बिन्दुओं से निश्कर्ष निकालने की प्रवत्ति पर कुछ रोक लगे। वैसे भी जब मुद्दे बडे उलझे होते हैं तो दो तो क्या दस बिन्दु भी उपलब्ध हों तब भी निश्कर्ष निकालना मुश्किल होता है, लेकिन शायद......
कुछ दिन पहले किन्ही सचिनजी के चिट्ठे पर पढा कि उन्होने आई.आई.एम. अहमदाबाद में देखा कि सभी युवा केवल पैकेज के बारे में बात कर रहे हैं।
निष्कर्ष: आज के युवाओं को केवल पैकेज की चिन्ता है, बाकी किसी चीज की फ़िक्र नहीं।
किसी और चिट्ठे पर पढने को मिलेगा कि उनके साथ ऐसा हादसा हुआ, निष्कर्ष: जो उनके साथ हुआ वही सत्य है और ऐसा ही सबके साथ होता होगा।
बहुत बचपन में (कक्षा ६ में), मेरी बहन ने भी निष्कर्ष निकाला था कि हमारे मामाजी दिल्ली में रहते हैं और उनकी क्लास की तीन सहेलियों के मामाजी भी दिल्ली में रहते हैं, इसका मतलब देश में अधिकतर बच्चों के मामाजी दिल्ली में रहते हैं। अच्छे से याद है कि उस समय पिताजी ने पहली बार डेटा एनालिसिस की पहली क्लास ली थी।
मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ लेकिन अन्य सभी विषयों/विधाओं का सम्मान करता हूँ लेकिन ब्लागजगत पर होने वाले अधिकतर वैचारिक विमर्श के बारे में अपनी व्यक्तिगत राय को एक ग्राफ़ के माध्यम से व्यक्त कर रहा हूँ।
ऊपर दिये ग्राफ़ में अगर आपके पास केवल दो बिन्दु हैं (बडे लाल वाले) तो आप किसी भी थ्योरी को सही साबित कर सकते हैं, लेकिन असल मुद्दा काले वाले बिन्दु है, जिनको किसी भी एक निष्कर्ष से समझाना असम्भव है।
विज्ञान में किसी भी निष्कर्ष को निकालने के लिये काफ़ी बिन्दुओं का प्रयोग होता है। किन्ही किन्ही स्थितियों में जब Sufficient Data उपलब्ध नहीं होता है तो भी कुछ निश्कर्ष निकाले जाते हैं और कहा जाता है कि Take it with a pinch of salt, if not bucket full, :-) लेकिन ऐसे अधिकतर किस्सों में बाल्टी भर नहीं बल्कि ट्रक भर नमक और सावधानी की आवश्यकता होती है।
ऐसे में लगता है कि सभी विमर्शियों को Data Analysis और Statistics पढाना अनिवार्य कर देना चाहिये जिससे दो बिन्दुओं से निश्कर्ष निकालने की प्रवत्ति पर कुछ रोक लगे। वैसे भी जब मुद्दे बडे उलझे होते हैं तो दो तो क्या दस बिन्दु भी उपलब्ध हों तब भी निश्कर्ष निकालना मुश्किल होता है, लेकिन शायद......
गुरुवार, जनवरी 29, 2009
युनुसजी के लिये जवाबी कव्वाली: कन्हैया याद है कुछ भी हमारी !!!
कुछ दिन पहले युनुसजी ने फ़रीद अयाज कव्वाल की आवाज में "कन्हैया याद है कुछ भी हमारी" कव्वाली सुनवायी थी। आज हम आपके लिये वही कव्वाली फ़रीद के वालिद मरहूम मुंशी रजीउद्दीन की आवाज में लेकर आये हैं। ये रेकार्डिंग १९८८ की है और इस इस कव्वाली में मुंशीजी के बेटे फ़रीद अयाज और अबु मोहम्म्द भी उनके साथ गा रहे हैं।
ये कव्वाली मुंशीजी ने कराची डिफ़ेंस कालोनी की एक प्राइवेट महफ़िल में गायी थी, जिसे मैने कम्प्यूटर पर साउंडकार्ड से रेकार्ड किया है। ये बडी फ़ुरसत में गायी हुयी कव्वाली है इसलिये आपको थोडा अधिक समय देना पडेगा लेकिन हमारी तरफ़ से आपकी सन्तुष्टि की पूरी गारण्टी, :-)
इसी सीरीज में आगे मुंशीजी की और कव्वालियाँ भी पेश करने का इरादा है जैसे "फ़ूल रही सरसों सकल बन" और "ख्वाजा संग खेलिये धमार" आदि, लेकिन फ़िलहाल अगली पेशकश युनुसभाई के चिट्ठे पर होगी।
कव्वाली के बोल युनुसभाई के चिट्ठे से पोस्ट कर रहा हूँ ।
कन्हैया बोलो याद भी है कुछ हमारी,
कहूं क्या तेरे भूलने के मैं वारी
बिनती मैं कर कर पमना से पूछी
पल पल की खबर तिहारी
पैंया परीं महादेव के जाके
टोना भी करके मैं हारी
कन्हैया याद है कुछ भी हमारी
खाक परो लोगो इस ब्याहने पर
अच्छी मैं रहती कंवारी
मैका में हिल मिल रहती थी सुख से
फिरती थी क्यों मारी मारी ।
कन्हैया कन्हैया ।।
ये कव्वाली मुंशीजी ने कराची डिफ़ेंस कालोनी की एक प्राइवेट महफ़िल में गायी थी, जिसे मैने कम्प्यूटर पर साउंडकार्ड से रेकार्ड किया है। ये बडी फ़ुरसत में गायी हुयी कव्वाली है इसलिये आपको थोडा अधिक समय देना पडेगा लेकिन हमारी तरफ़ से आपकी सन्तुष्टि की पूरी गारण्टी, :-)
इसी सीरीज में आगे मुंशीजी की और कव्वालियाँ भी पेश करने का इरादा है जैसे "फ़ूल रही सरसों सकल बन" और "ख्वाजा संग खेलिये धमार" आदि, लेकिन फ़िलहाल अगली पेशकश युनुसभाई के चिट्ठे पर होगी।
कव्वाली के बोल युनुसभाई के चिट्ठे से पोस्ट कर रहा हूँ ।
कन्हैया बोलो याद भी है कुछ हमारी,
कहूं क्या तेरे भूलने के मैं वारी
बिनती मैं कर कर पमना से पूछी
पल पल की खबर तिहारी
पैंया परीं महादेव के जाके
टोना भी करके मैं हारी
कन्हैया याद है कुछ भी हमारी
खाक परो लोगो इस ब्याहने पर
अच्छी मैं रहती कंवारी
मैका में हिल मिल रहती थी सुख से
फिरती थी क्यों मारी मारी ।
कन्हैया कन्हैया ।।
बुधवार, जनवरी 28, 2009
और बस दुनिया उसी पल खत्म हो जाये!!!
एक निर्जन टापू पर ऐसी मधुर आवाज में कोई गीत पर गीत सुनाये। बस उसी समय दुनिया समाप्त हो जाये तो ईश्वर का कितना ऐहसान रहे। मित्र कह रहे थे कि शादी करने से पहले देख लेना कि कन्या बढिया गाना गाती हो, इन्शाअल्लाह... आमीन... :-)
गायिका किरन अहलूवालिया हैं जो भारतीय शास्त्रीय संगीत में पारंगत हैं। इनके बारे में मेरे मित्र गौरव ने बताया और तब से सुने जा रहे हैं। यू-ट्यूब पर उनके और वीडियो भी देखे जा सकते हैं। खुद किरन अहलूवालिया की वेबसाईट पर उनके अन्य गीत सुने जा सकते हैं। ये रही उनकी वेबसाईट:
http://www.kiranmusic.com/flash_content/main_full.html
वो कुछ ऐसे मन में समाये हुये हैं,
और ऐसे ख्यालों पे छाये हुये हैं।
मोहब्बत में हम यूँ अकेले चले हैं,
उन्हें इस तपिश से बचाये हुये हैं।
सुना है रकीबों से अनबन है उनकी,
उम्मीदों की शम्मा जलाये हुये हैं।
नहीं 'ताहिरा' कुछ ज़माने से शिकवा
ये ग़म खुद खुशी से उठाए हुए हैं।
(इस गजल का मक़ता लिखना छूट गया था, रमण कौल जी का बहुत धन्यवाद याद दिलाने के लिये)
इस पंजाबी गीत को सुनकर ही दम निकला जा रहा है, अब तक कल से दसियों बार सुनकर भी मन नहीं भरा।
गायिका किरन अहलूवालिया हैं जो भारतीय शास्त्रीय संगीत में पारंगत हैं। इनके बारे में मेरे मित्र गौरव ने बताया और तब से सुने जा रहे हैं। यू-ट्यूब पर उनके और वीडियो भी देखे जा सकते हैं। खुद किरन अहलूवालिया की वेबसाईट पर उनके अन्य गीत सुने जा सकते हैं। ये रही उनकी वेबसाईट:
http://www.kiranmusic.com/flash_content/main_full.html
वो कुछ ऐसे मन में समाये हुये हैं,
और ऐसे ख्यालों पे छाये हुये हैं।
मोहब्बत में हम यूँ अकेले चले हैं,
उन्हें इस तपिश से बचाये हुये हैं।
सुना है रकीबों से अनबन है उनकी,
उम्मीदों की शम्मा जलाये हुये हैं।
नहीं 'ताहिरा' कुछ ज़माने से शिकवा
ये ग़म खुद खुशी से उठाए हुए हैं।
(इस गजल का मक़ता लिखना छूट गया था, रमण कौल जी का बहुत धन्यवाद याद दिलाने के लिये)
इस पंजाबी गीत को सुनकर ही दम निकला जा रहा है, अब तक कल से दसियों बार सुनकर भी मन नहीं भरा।
सोमवार, जनवरी 26, 2009
राईस यूनिवर्सिटी में गणतन्त्र दिवस समारोह !!!
कल भारत के ६०वें गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारतीय विद्यार्थी समिति (Indian Students at Rice) ने राईस यूनिवर्सिटी में गणतन्त्र दिवस मनाने का भव्य आयोजन किया। इस आयोजन में सर्वप्रथम हमारे मुख्य अतिथि श्री सुरेन्द्र तलवार द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फ़हराया गया। इसके पश्चात सभी लोगों ने मिलकर राष्ट्रगान का पाठ किया और भारतमाता की जय के उद्घोष लगाये। इसके बाद सुरेन्द्र तलवार जी ने अपनी मधुर आवाज में "हर करम अपना करेंगे, ए वतन तेरे लिये" की कुछ पंक्तियाँ गाकर सबको मुग्ध कर दिया।
श्री सुरेन्द्र तलवार ह्यूस्टन में भारत से सम्बन्धित लगभग हर आयोजन में प्रमुख भूमिका में रहते हैं। इसके अलावा सुरेन्द्र तलवार जी एक एंटीक शाप जिसका नाम जारपोश है, चलाते हैं। उनका राईस विश्वविद्यालय से सम्बन्ध बडा पुराना है, हर वर्ष ग्रेजुएट होने वाले विद्यार्थी नये विद्यार्थियों को तलवारजी से मिलवा देते हैं और दोस्ती का ये सिलसिला चलता रहता है। जब भी किसी कार्यक्रम के लिये हमें कुछ एंटीक अथवा अन्य मदद की जरूरत होती है, हम लोग तलवार अंकल के घर जा धमकते हैं। पहले चाय पीते हैं और फ़िर उनकी दुकान से अपनी जरूरत का सामान उठा लाते हैं, इसकी वापिसी के समय तलवार अंकल भी हमारी तरफ़ से मिठाई के डब्बे का इन्तजार करते हैं क्योंकि उनकी मदद के कारण अक्सर किसी भी प्रतियोगिता में भारत का बूथ कोई न कोई स्थान अवश्य जीतता है। तलवार अंकल भले ही इसे न पढ रहे हों, लेकिन तलवार अंकल जिन्दाबाद....
ये थोडा विषयांतर हो गया खैर....
झंडा फ़हराने के बाद एक मेले का आयोजन था जिसमें खाने के सामान के साथ साथ कुछ खेल भी थे। जीतने वाली टीम को $२५ डालर का मिठाई का कूपन मिलना था। लिहाजा हमने फ़टाफ़ट एक टीम बनायी और चालू हो गये। थोडी जुगत, थोडी बेईमानी, थोडी लडाई के बाद आखिर हमारी टीम इस प्रतियोगिता को जीत ही गयी। जैसा हर बार होता है, नियमों में सेंध लगायी गयी और दूसरी टीम ने अपील की लेकिन फ़िर थोडी न नुकुर के बाद हम जीत ही गये :-) याहू..............
अब आप कुछ चित्रों का मजा लीजिये।



(एक खेल में हमें टायलेट पेपर से १ मिनट में ममी बनाने का प्रयास हो रहा है, दूसरे में हम पर बेईमानी का आरोप लग रहा है)

(अब हम अपने कूपन गिनकर बता रहे हैं कि हम जीत गये, दूसरी लडकी कह रही है कि हाय उनकी टीम केवल २ कूपन से हार गयी)

(अन्त में एक ग्रुप फ़ोटो)
नोट: सभी फ़ोटो हेमतेज के सौजन्य से...
श्री सुरेन्द्र तलवार ह्यूस्टन में भारत से सम्बन्धित लगभग हर आयोजन में प्रमुख भूमिका में रहते हैं। इसके अलावा सुरेन्द्र तलवार जी एक एंटीक शाप जिसका नाम जारपोश है, चलाते हैं। उनका राईस विश्वविद्यालय से सम्बन्ध बडा पुराना है, हर वर्ष ग्रेजुएट होने वाले विद्यार्थी नये विद्यार्थियों को तलवारजी से मिलवा देते हैं और दोस्ती का ये सिलसिला चलता रहता है। जब भी किसी कार्यक्रम के लिये हमें कुछ एंटीक अथवा अन्य मदद की जरूरत होती है, हम लोग तलवार अंकल के घर जा धमकते हैं। पहले चाय पीते हैं और फ़िर उनकी दुकान से अपनी जरूरत का सामान उठा लाते हैं, इसकी वापिसी के समय तलवार अंकल भी हमारी तरफ़ से मिठाई के डब्बे का इन्तजार करते हैं क्योंकि उनकी मदद के कारण अक्सर किसी भी प्रतियोगिता में भारत का बूथ कोई न कोई स्थान अवश्य जीतता है। तलवार अंकल भले ही इसे न पढ रहे हों, लेकिन तलवार अंकल जिन्दाबाद....
ये थोडा विषयांतर हो गया खैर....
झंडा फ़हराने के बाद एक मेले का आयोजन था जिसमें खाने के सामान के साथ साथ कुछ खेल भी थे। जीतने वाली टीम को $२५ डालर का मिठाई का कूपन मिलना था। लिहाजा हमने फ़टाफ़ट एक टीम बनायी और चालू हो गये। थोडी जुगत, थोडी बेईमानी, थोडी लडाई के बाद आखिर हमारी टीम इस प्रतियोगिता को जीत ही गयी। जैसा हर बार होता है, नियमों में सेंध लगायी गयी और दूसरी टीम ने अपील की लेकिन फ़िर थोडी न नुकुर के बाद हम जीत ही गये :-) याहू..............
अब आप कुछ चित्रों का मजा लीजिये।
(एक खेल में हमें टायलेट पेपर से १ मिनट में ममी बनाने का प्रयास हो रहा है, दूसरे में हम पर बेईमानी का आरोप लग रहा है)
(अब हम अपने कूपन गिनकर बता रहे हैं कि हम जीत गये, दूसरी लडकी कह रही है कि हाय उनकी टीम केवल २ कूपन से हार गयी)
(अन्त में एक ग्रुप फ़ोटो)
नोट: सभी फ़ोटो हेमतेज के सौजन्य से...
सोमवार, जनवरी 19, 2009
ह्यूस्टन मैराथन: एक रिपोर्ट !!!
छोटी रिपोर्ट:
आखिरकार आज ह्यूस्टन मैराथन सम्पन्न हो गयी। इसमें तीन प्रतियोगितायें थी, पहली पूरी मैराथन यानि २६.२ मील अथवा ४२.२ किमी, दूसरी हाफ़ मैराथन यानि २१.१ किमी और तीसरी ५ किमी की दौड। कुल २५,००० प्रतिभागियों में से ८२२९ प्रतिभागियों ने पूरी मैराथन दौड में भाग लिया और इनमें से ५३९६ धावकों ने नियत अधिकतम समय (६ घंटा) में दौड समाप्त की। बाकी लोगों ने या तो दौड अधूरी छोड दी अथवा ६ घंटे से अधिक समय लिया। हमने पूरी मैराथन में भाग लिया और इसको ३ घंटा ३८ मिनट और ४३ सेकेंड्स में पूरा किया। अगर सभी प्रतिभागियों को गिने तो हम टाप ८.९ प्रतिशत में आते हैं, अगर दौड समाप्त करने वाले प्रतिभागियों को गिने तो हम टाप १३.६ प्रतिशत में आते हैं।
लम्बी और विस्तृत रिपोर्ट (फ़ोटो और वीडियो के साथ):
आज सुबह ४ बजे नींद खुली, ५ बजे तक तैयार होकर सुबह ५:४० पर हम दौड के स्थान पर आ चुके थे। इसके बाद हमने अपने धावक क्लब के तम्बू में अपने मित्रो से बात की और मौसम की हालत पर चिन्ता व्यक्त की। पिछले १० दिन से ह्यूस्टन में हल्की ठंड पड रही थी लेकिन आज अचानक ही गर्मी का सामना हो गया। दौड की शुरूआत (सुबह सात बजे) में तापमान (५६ डिग्री फ़ारेनहाईट, अर्थात १३.३ डिग्री सेल्सियस) था जो अन्त तक आते आते ७२ डिग्री फ़ारेनहाईट यानि लगभग २३ डिग्री सेल्सियस हो गया। मैराथन दौड के लिये आदर्श तापमान ४० से ६० डिग्री के बीच का होता है ।
खैर, जैसा हमने पिछली पोस्ट में लिखा था कि अगर सभी सितारे लाईन में हों और किस्मत मेहरबान हो तो हम ३ घंटा और ३० मिनट, अन्य परिस्थितियों में ३ घंटा ४० मिनट और अगर सितारे एकदम गर्दिश में हों तो अधिकतम ४ घंटा में दौड समाप्त करने का सोच रहे थे। आज गर्मी के चलते भी हमने अपने आदर्श (३:३०) गोल को निगाह में रखकर दौड प्रारम्भ की। ३ घंटा ३० मिनट का मतलब है कि हर मील को ठीक ८ मिनट में पूरा करना या फ़िर हर किमी को ५ मिनट में दौडना और ४२.२ किमी तक यही करते रहना।
नीचे दी गयी सारिणी में आप मेरे हर मील का समय देख सकते हैं। आप देखेंगे कि हर दूसरे मील पर ५-१० सेकेंड्स का अन्तर है, इसका कारण है कि हर दूसरे मील पर धीमे होकर पानी का कप उठाने और उसे पीने में लगभग इतना ही समय लगता है।
मील का समय, कुल समय
1) 8:20 (8:20) शुरू में भीड के चलते थोडा अधिक समय लगा।
2) 7:33 (15:53) ये वाला मील ढलान (Downhill) पर था।
3) 7:44 (23:37) इस समय बहुत सारे दर्शक लोग हौसला अफ़जाई कर रहे थे।
4) 8:12 (31:48) इस मील को हाफ़/फ़ुल मैराथन वाले साथ दौडते हैं जिससे थोडी भीड हो जाती है ।
5) 8:02 (39:51) अब धीमे धावक पीछे हो रहे हैं, और तेज धावक आगे निकल रहे हैं ।
6) 7:56 (47:46)
7) 8:06 (55:52)
8) 7:58 (1:03:51)
9) 7:57 (1:11:48) इस मील पर हाफ़ मैराथन वाले अगल रास्ता लेकर अपने समाप्ति की ओर चले जाते हैं
10) 8:02 (1:19:50) भीड कम हो रही है, लोग धीमे हो रहे हैं लेकिन हमें ८ मिनट/मील पर जमे रहना है
11) 7:59 (1:27:48) अब हम राईस विश्वविद्यालय के पास से गुजर रहे हैं, हम राईस की टी-शर्ट पहने हर
12) 8:04 (1:35:52) व्यक्ति को Go Owls Go कहते हैं। Owl (उल्लू) हमारे स्कूल का मस्कट है ।
13) 8:00 (1:43:52) इस समय दर्शकों की भीड सबसे ज्यादा है, लोग केले, सन्तरे बांट रहे हैं ।
14) 8:03 (1:51:55) आधी दौड खत्म, इसका मतलब कि वार्म अप पूरा हो गया है और अब असल दौड शुरू
15) 8:08 (2:00:03) उद्देश्य है लक्ष्य से बिना भटके और खूब पानी पीते हुये अगले ५ मील पूरे किये जायें।
16) 8:02 (2:08:06)
17) 7:55 (2:16:01)
18) 8:15 (2:24:16) अचानक गर्मी बढ गयी है, रेस का कोड Green से Yellow कर दिया गया है।
19) 7:52 (2:32:07) Volunteers, ज्यादा पानी पीने और गर्मी के हिसाब से थोडा धीमे दौडने को कह रहे हैं
20) 7:53 (2:40:01) बीस मील खत्म, मतलब आधी दौड समाप्त अब केवल १० किमी बचे हैं।
21) 7:55 (2:47:55) अब तक हम ८ मिनट प्रति मील पर कायम हैं ।
22) 8:22 (2:56:17) इस मील में पैर की मांसपेशी में जबरदस्त खिंचाव अनुभव हुआ। हर २० से २५ सेकेंड्स के बाद पैर में दर्द उठ रहा है। लेकिन अब केवल ४.२ मील बचे हैं, उम्मीद है कि Cramps अपने आप चले जायेगें।
23) 9:00 (3:05:17) दुनिया लुटनी शुरू हो चुकी है, ८ के स्थान पर ९ मिनट लगे। Focus, Focus, Focus.
24) 9:58 (3:15:16) इस समय भयंकर दर्द हो रहा है लेकिन केवल ३ से भी कम मील बाकी हैं। अब मैं रूककर अपने पैर को स्ट्रैच कर रहा हूँ। पैर की मांशपेशी थोडी फ़ूली हुयी है और मैं सोच रहा हूँ कि ३:३० तो हाथ से गया, अब मन में ३:४० की गणना चल रही है।
25) 10:58 (3:26:14) इस मील के दौरान २ बार रूककर चलना पडा और भयंकर दर्द हुआ। इस समय हर कदम के साथ ऐसा लग रहा कि कोई पैर में हथौडे मार रहा हो। इस मील के दौरान रास्ता थोडा चढाई वाला भी था।
26) 10:29 (3:36:44) ये आखिरी १.२ मील हैं, इस समय एक बैनर पर नजर पडी,
PAIN IS TEMPORARY, FINISH IS FOREVER... इससे थोडी ऊर्जा मिली है। अब चूँकि सभी धावक कठिनाई में है, लोग उनका नाम लेकर प्रोत्साहित कर रहे हैं। हम दर्द को दिमाग से निकालकर दौडने का प्रयास कर रहे हैं। कई भारतीय लोगों ने मेरा नाम पुकार कर जमकर प्रोत्साहित किया। अब उनको हाथ उठाकर धन्यवाद देने के स्थान पर (जो हम <२० मील तक कर रहे थे), केवल सिर झुकाकर धन्यवाद दे रहे हैं।
0.2) 1:59 (3:38:43) आखिरी ०.२ मील, और हम Finish Line के पार लग गये । इस दौड में हमारा स्थान ७३५ वाँ रहा। जो टाप १३.६% में है। अब आप कुछ फ़ोटो और एक वीडियो का आनन्द लें।

(दौड शुरू होने से पहले हमारे धावक क्लब के तम्बू का नजारा)

(दौड के बाद हमारी विजयी मुस्कान और पार्टनर्स इन क्राईम, वैसे इन पाँचों में मेरा समय सबसे अच्छा रहा इसीलिये ये सब पार्टी मांग रहे हैं :-) )
क्या इतने कष्ट के बाद हम दोबारा मैराथन दौडेंगे। शायद मैराथन का खूब अब मुंह को लग गया है, :-) मेरा मानना है कि अगर मैराथन २६.२ के स्थान पर २० मील की होती तो इसका इतना असर नहीं होता लेकिन आखिरी ५-६ मील ही आपकी मानसिक शक्ति की कठिन परीक्षा लेते हैं। ये भी निश्चित है कि अब तक के जीवन में मैने ये सबसे कठिन शारीरिक श्रम वाला काम किया है। इसके अलावा दौडने को जिन्दगी में स्थान देने का मतलब है कि कभी तोंद नहीं निकलेगी, दिल खुश रहेगा और मन भरके कुछ भी खा सकते हो (एक बार मैने शर्त की बात पर ७५० ग्राम रबडी खा ली थी, अब कोई ऐसी शर्त लगाने वाला नहीं मिलता) :-)
अब अगला गोल है बोस्टन मैराथन के लिये क्वालिफ़ाई करना। इसके लिये मुझे ३ घंटा १० मिनट का समय चाहिये, मुझे लगता है कि मैं ये कर सकता हूँ लेकिन इसके लिये कठिन ट्रेनिंग, संयम और कम से कम २ साल लगेगे। पिछले वर्ष की तुलना में मेरे दौडने की क्षमताओं में लगभग १०-१२% का सुधार हुआ है लेकिन ये भी सत्य है कि अब और सुधार करने के लिये बहुत ज्यादा श्रम लगेगा। इसीलिये शायद मैराथन को आराम देकर छोटी दौड (५, १०, २१.१ किमी) दौडी जायें, और अपनी रफ़्तार बढाने पर ध्यान दिया जाये। और उसके बाद ही अगली मैराथन दौडी जाये जिसका उद्देश्य बोस्टन मैराथन के लिये क्वालीफ़ाई करना हो। देखते हैं भविष्य में ऊँट किस करवट बैठता है।
आंकडों के शौकीन ज्ञानदत्तजी के लिये दो ग्राफ़ भी प्रस्तुत है।


अब ले चलते हैं हमारी दौड की समाप्ति पर फ़िनिशलाईन का वीडियो, ध्यान से १० सेकेण्ड्स से १८ सेकेंड्स को देखिये हम दोनों हाथ हवा में उठाये एक कन्या के बगल से फ़िनिशलाईन क्रास कर रहे हैं।
और आखिर में ह्यूस्टन क्रानिकल समाचार का कुछ धावकों से दौड समाप्त होने के बाद की बातचीत (इसमें हम कहीं नहीं हैं) ।
आखिरकार आज ह्यूस्टन मैराथन सम्पन्न हो गयी। इसमें तीन प्रतियोगितायें थी, पहली पूरी मैराथन यानि २६.२ मील अथवा ४२.२ किमी, दूसरी हाफ़ मैराथन यानि २१.१ किमी और तीसरी ५ किमी की दौड। कुल २५,००० प्रतिभागियों में से ८२२९ प्रतिभागियों ने पूरी मैराथन दौड में भाग लिया और इनमें से ५३९६ धावकों ने नियत अधिकतम समय (६ घंटा) में दौड समाप्त की। बाकी लोगों ने या तो दौड अधूरी छोड दी अथवा ६ घंटे से अधिक समय लिया। हमने पूरी मैराथन में भाग लिया और इसको ३ घंटा ३८ मिनट और ४३ सेकेंड्स में पूरा किया। अगर सभी प्रतिभागियों को गिने तो हम टाप ८.९ प्रतिशत में आते हैं, अगर दौड समाप्त करने वाले प्रतिभागियों को गिने तो हम टाप १३.६ प्रतिशत में आते हैं।
लम्बी और विस्तृत रिपोर्ट (फ़ोटो और वीडियो के साथ):
आज सुबह ४ बजे नींद खुली, ५ बजे तक तैयार होकर सुबह ५:४० पर हम दौड के स्थान पर आ चुके थे। इसके बाद हमने अपने धावक क्लब के तम्बू में अपने मित्रो से बात की और मौसम की हालत पर चिन्ता व्यक्त की। पिछले १० दिन से ह्यूस्टन में हल्की ठंड पड रही थी लेकिन आज अचानक ही गर्मी का सामना हो गया। दौड की शुरूआत (सुबह सात बजे) में तापमान (५६ डिग्री फ़ारेनहाईट, अर्थात १३.३ डिग्री सेल्सियस) था जो अन्त तक आते आते ७२ डिग्री फ़ारेनहाईट यानि लगभग २३ डिग्री सेल्सियस हो गया। मैराथन दौड के लिये आदर्श तापमान ४० से ६० डिग्री के बीच का होता है ।
खैर, जैसा हमने पिछली पोस्ट में लिखा था कि अगर सभी सितारे लाईन में हों और किस्मत मेहरबान हो तो हम ३ घंटा और ३० मिनट, अन्य परिस्थितियों में ३ घंटा ४० मिनट और अगर सितारे एकदम गर्दिश में हों तो अधिकतम ४ घंटा में दौड समाप्त करने का सोच रहे थे। आज गर्मी के चलते भी हमने अपने आदर्श (३:३०) गोल को निगाह में रखकर दौड प्रारम्भ की। ३ घंटा ३० मिनट का मतलब है कि हर मील को ठीक ८ मिनट में पूरा करना या फ़िर हर किमी को ५ मिनट में दौडना और ४२.२ किमी तक यही करते रहना।
नीचे दी गयी सारिणी में आप मेरे हर मील का समय देख सकते हैं। आप देखेंगे कि हर दूसरे मील पर ५-१० सेकेंड्स का अन्तर है, इसका कारण है कि हर दूसरे मील पर धीमे होकर पानी का कप उठाने और उसे पीने में लगभग इतना ही समय लगता है।
मील का समय, कुल समय
1) 8:20 (8:20) शुरू में भीड के चलते थोडा अधिक समय लगा।
2) 7:33 (15:53) ये वाला मील ढलान (Downhill) पर था।
3) 7:44 (23:37) इस समय बहुत सारे दर्शक लोग हौसला अफ़जाई कर रहे थे।
4) 8:12 (31:48) इस मील को हाफ़/फ़ुल मैराथन वाले साथ दौडते हैं जिससे थोडी भीड हो जाती है ।
5) 8:02 (39:51) अब धीमे धावक पीछे हो रहे हैं, और तेज धावक आगे निकल रहे हैं ।
6) 7:56 (47:46)
7) 8:06 (55:52)
8) 7:58 (1:03:51)
9) 7:57 (1:11:48) इस मील पर हाफ़ मैराथन वाले अगल रास्ता लेकर अपने समाप्ति की ओर चले जाते हैं
10) 8:02 (1:19:50) भीड कम हो रही है, लोग धीमे हो रहे हैं लेकिन हमें ८ मिनट/मील पर जमे रहना है
11) 7:59 (1:27:48) अब हम राईस विश्वविद्यालय के पास से गुजर रहे हैं, हम राईस की टी-शर्ट पहने हर
12) 8:04 (1:35:52) व्यक्ति को Go Owls Go कहते हैं। Owl (उल्लू) हमारे स्कूल का मस्कट है ।
13) 8:00 (1:43:52) इस समय दर्शकों की भीड सबसे ज्यादा है, लोग केले, सन्तरे बांट रहे हैं ।
14) 8:03 (1:51:55) आधी दौड खत्म, इसका मतलब कि वार्म अप पूरा हो गया है और अब असल दौड शुरू
15) 8:08 (2:00:03) उद्देश्य है लक्ष्य से बिना भटके और खूब पानी पीते हुये अगले ५ मील पूरे किये जायें।
16) 8:02 (2:08:06)
17) 7:55 (2:16:01)
18) 8:15 (2:24:16) अचानक गर्मी बढ गयी है, रेस का कोड Green से Yellow कर दिया गया है।
19) 7:52 (2:32:07) Volunteers, ज्यादा पानी पीने और गर्मी के हिसाब से थोडा धीमे दौडने को कह रहे हैं
20) 7:53 (2:40:01) बीस मील खत्म, मतलब आधी दौड समाप्त अब केवल १० किमी बचे हैं।
21) 7:55 (2:47:55) अब तक हम ८ मिनट प्रति मील पर कायम हैं ।
22) 8:22 (2:56:17) इस मील में पैर की मांसपेशी में जबरदस्त खिंचाव अनुभव हुआ। हर २० से २५ सेकेंड्स के बाद पैर में दर्द उठ रहा है। लेकिन अब केवल ४.२ मील बचे हैं, उम्मीद है कि Cramps अपने आप चले जायेगें।
23) 9:00 (3:05:17) दुनिया लुटनी शुरू हो चुकी है, ८ के स्थान पर ९ मिनट लगे। Focus, Focus, Focus.
24) 9:58 (3:15:16) इस समय भयंकर दर्द हो रहा है लेकिन केवल ३ से भी कम मील बाकी हैं। अब मैं रूककर अपने पैर को स्ट्रैच कर रहा हूँ। पैर की मांशपेशी थोडी फ़ूली हुयी है और मैं सोच रहा हूँ कि ३:३० तो हाथ से गया, अब मन में ३:४० की गणना चल रही है।
25) 10:58 (3:26:14) इस मील के दौरान २ बार रूककर चलना पडा और भयंकर दर्द हुआ। इस समय हर कदम के साथ ऐसा लग रहा कि कोई पैर में हथौडे मार रहा हो। इस मील के दौरान रास्ता थोडा चढाई वाला भी था।
26) 10:29 (3:36:44) ये आखिरी १.२ मील हैं, इस समय एक बैनर पर नजर पडी,
PAIN IS TEMPORARY, FINISH IS FOREVER... इससे थोडी ऊर्जा मिली है। अब चूँकि सभी धावक कठिनाई में है, लोग उनका नाम लेकर प्रोत्साहित कर रहे हैं। हम दर्द को दिमाग से निकालकर दौडने का प्रयास कर रहे हैं। कई भारतीय लोगों ने मेरा नाम पुकार कर जमकर प्रोत्साहित किया। अब उनको हाथ उठाकर धन्यवाद देने के स्थान पर (जो हम <२० मील तक कर रहे थे), केवल सिर झुकाकर धन्यवाद दे रहे हैं।
0.2) 1:59 (3:38:43) आखिरी ०.२ मील, और हम Finish Line के पार लग गये । इस दौड में हमारा स्थान ७३५ वाँ रहा। जो टाप १३.६% में है। अब आप कुछ फ़ोटो और एक वीडियो का आनन्द लें।
(दौड शुरू होने से पहले हमारे धावक क्लब के तम्बू का नजारा)
(दौड के बाद हमारी विजयी मुस्कान और पार्टनर्स इन क्राईम, वैसे इन पाँचों में मेरा समय सबसे अच्छा रहा इसीलिये ये सब पार्टी मांग रहे हैं :-) )
क्या इतने कष्ट के बाद हम दोबारा मैराथन दौडेंगे। शायद मैराथन का खूब अब मुंह को लग गया है, :-) मेरा मानना है कि अगर मैराथन २६.२ के स्थान पर २० मील की होती तो इसका इतना असर नहीं होता लेकिन आखिरी ५-६ मील ही आपकी मानसिक शक्ति की कठिन परीक्षा लेते हैं। ये भी निश्चित है कि अब तक के जीवन में मैने ये सबसे कठिन शारीरिक श्रम वाला काम किया है। इसके अलावा दौडने को जिन्दगी में स्थान देने का मतलब है कि कभी तोंद नहीं निकलेगी, दिल खुश रहेगा और मन भरके कुछ भी खा सकते हो (एक बार मैने शर्त की बात पर ७५० ग्राम रबडी खा ली थी, अब कोई ऐसी शर्त लगाने वाला नहीं मिलता) :-)
अब अगला गोल है बोस्टन मैराथन के लिये क्वालिफ़ाई करना। इसके लिये मुझे ३ घंटा १० मिनट का समय चाहिये, मुझे लगता है कि मैं ये कर सकता हूँ लेकिन इसके लिये कठिन ट्रेनिंग, संयम और कम से कम २ साल लगेगे। पिछले वर्ष की तुलना में मेरे दौडने की क्षमताओं में लगभग १०-१२% का सुधार हुआ है लेकिन ये भी सत्य है कि अब और सुधार करने के लिये बहुत ज्यादा श्रम लगेगा। इसीलिये शायद मैराथन को आराम देकर छोटी दौड (५, १०, २१.१ किमी) दौडी जायें, और अपनी रफ़्तार बढाने पर ध्यान दिया जाये। और उसके बाद ही अगली मैराथन दौडी जाये जिसका उद्देश्य बोस्टन मैराथन के लिये क्वालीफ़ाई करना हो। देखते हैं भविष्य में ऊँट किस करवट बैठता है।
आंकडों के शौकीन ज्ञानदत्तजी के लिये दो ग्राफ़ भी प्रस्तुत है।
अब ले चलते हैं हमारी दौड की समाप्ति पर फ़िनिशलाईन का वीडियो, ध्यान से १० सेकेण्ड्स से १८ सेकेंड्स को देखिये हम दोनों हाथ हवा में उठाये एक कन्या के बगल से फ़िनिशलाईन क्रास कर रहे हैं।
और आखिर में ह्यूस्टन क्रानिकल समाचार का कुछ धावकों से दौड समाप्त होने के बाद की बातचीत (इसमें हम कहीं नहीं हैं) ।
शनिवार, जनवरी 17, 2009
ह्यूस्टन मैराथन: कल देखेंगे किसमें कितना है दम !!!
इन्तजार की घडियाँ खत्म होने वाली हैं । कल सुबह ७ बजे ह्यूस्टन मैराथन है । कल पता चलेगा कि पिछले पाँच महीने की ट्रेनिंग का कितना फ़ायदा हुआ । ये रहा २६.२ मील (४२.२ किमी) की दौड का नक्शा ।

मजे की बात है कि मेरे अनुमान के विपरीत कुछ दोस्त रविवार के दिन सुबह उठकर मुझे प्रोत्साहित करने के लिये आ रहे हैं ।
९ वें मील पर: सुमेध
१२ वें मील पर: माईकल, अर्जुन और रामदास
१३.१ मील (हाफ़ मार्क) पर: अंकुर (मेरा रूममेट) एक बोर्ड के साथ मिलेगा जिस पर लिखा है । Screw You Guys, I am going home. दूसरे बोर्ड पर लिखा है, Don't Run from your worries. Stand upto them. अंकुर के सेंस आफ़ ह्यूमर के हम पहले से मुरीद हैं अब और ज्यादा हो गये।
१५ वें मील पर: मेरी होस्ट फ़ैमिली मार्था अकेक्जेंडर, लेसली और राबर्ट
२० वें मील पर: मोनिका और ग्रेसियला (जिन्होनें ये प्यारा सा बोर्ड तैयार किया है )

२२ वें मील पर: फ़िर से अंकुर और शशांक
कल दौड पूरी होने के बाद पूरे विवरण के साथ रेस रिपोर्ट पेश की जायेगी । तब तक इन्तजार करें ।

मजे की बात है कि मेरे अनुमान के विपरीत कुछ दोस्त रविवार के दिन सुबह उठकर मुझे प्रोत्साहित करने के लिये आ रहे हैं ।
९ वें मील पर: सुमेध
१२ वें मील पर: माईकल, अर्जुन और रामदास
१३.१ मील (हाफ़ मार्क) पर: अंकुर (मेरा रूममेट) एक बोर्ड के साथ मिलेगा जिस पर लिखा है । Screw You Guys, I am going home. दूसरे बोर्ड पर लिखा है, Don't Run from your worries. Stand upto them. अंकुर के सेंस आफ़ ह्यूमर के हम पहले से मुरीद हैं अब और ज्यादा हो गये।
१५ वें मील पर: मेरी होस्ट फ़ैमिली मार्था अकेक्जेंडर, लेसली और राबर्ट
२० वें मील पर: मोनिका और ग्रेसियला (जिन्होनें ये प्यारा सा बोर्ड तैयार किया है )

२२ वें मील पर: फ़िर से अंकुर और शशांक
कल दौड पूरी होने के बाद पूरे विवरण के साथ रेस रिपोर्ट पेश की जायेगी । तब तक इन्तजार करें ।
मंगलवार, जनवरी 13, 2009
सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह
लीजिये पेश-ए-खिदमत है जिया मोहयेद्दीन की आवाज में सआदत हसन मंटो का अफ़साना "टोबा टेक सिंह" । इस मजमून का Text ब्रजेशजी के ब्लाग चायघर से उनकी अनुमति से उठाया गया है इसके लिये उनका आभार ।
सुनने के लिये यहाँ चटका लगायें और पढने के लिये नीचे निगाह डालें ।
मालूम नहीं, यह बात माक़ूल थी या ग़ैर माक़ूल, बहरहाल दानिशमंदों के फ़ैसले के मुताबिक़ इधर-उधर ऊँची सतह की कान्फ्रेंसें हुईं और बिलआख़िर पागलों के तबादले के लिए एक दिन मुक़र्रर हो गया.
अच्छी तरह छानबीन की गई- वे मुसलमान पागल जिनके लवाहिक़ीन हिंदुस्तान ही में थे, वहीं रहने दिए गए; जितने हिंदू-सिख पागल थे, सबके-सब पुलिस की हिफाज़त में बॉर्डर पह पहुंचा दिए गए.
उधर का मालूम नहीं लेकिन इधर लाहौर के पागलख़ाने में जब इस तबादले की ख़बर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चिमेगोइयाँ (गपशप) होने लगीं.
एक मुसलमान पागल जो 12 बरस से, हर रोज़, बाक़ायदगी के साथ “ज़मींदार” पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा: “मौलबी साब, यह पाकिस्तान क्या होता है...?” तो उसने बड़े ग़ौरो-फ़िक़्र के बाद जवाब दिया: “हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहाँ उस्तरे बनते हैं...!” यह जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया.
इसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा: “सरदार जी, हमें हिंदुस्तान क्यों भेजा जा रहा है... हमें तो वहाँ की बोली नहीं आती...” दूसरा मुस्कराया; “मुझे तो हिंदुस्तोड़ों की बोली आती है, हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिरते हैं...”
एक दिन, नहाते-नहाते, एक मुसलमान पागल ने “पाकिस्तान: जिंदाबाद” का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फ़र्श पर फिसलकर गिरा और बेहोश हो गया.
बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे; उनमें अक्सरीयत (बहुतायत) ऐसे क़ातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफ़सरों को कुछ दे दिलाकर पागलख़ाने भिजवा दिया था कि वह फाँसी के फंदे से बच जाएँ; यह पागल कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान क्यों तक़्सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है; लेकिन सही वाक़िआत से वह भी बेख़बर थे; अख़बारों से उन्हें कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे, जिनकी गुफ़्तुगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे. उनको सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्नाह है: जिसको क़ायदे-आज़म कहते हैं; उसने मुसलमानों के लिए एक अलहदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है; यह कहाँ है, इसका महल्ले-वुक़ू (भौगोलिक स्थिति) क्या है, इसके मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जानते थे- यही वजह है कि वह सब पागल जिनका दिमाग़ पूरी तरह माऊफ़ नहीं हुआ था, इस मख़मसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में; अगर हिंदुस्तान में है तो पाकिस्तान कहाँ है; अगर पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह कुछ अर्से पहले यहीं रहते हुए हिंदुस्तान में थे.
एक पागल तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान, पाकिस्तान और हिंदुस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज़्यादा पागल हो गया. झाड़ू देते-देते वह एक दिन दरख़्त पर चढ़ गया और टहने पर बैठकर दो घंटे मुसलसल तक़रीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी... सिपाहियों ने जब उसे नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया. जब उसे डराया-धमकाया गया तो उसने कहा: “मैं हिंदुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में... मैं इस दरख़्त ही पर रहूंगा...” बड़ी देर के बाद जब उसका दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिंदू-सिख दोस्तों से गले मिलकर रोने लगा- उस ख्याल से उसका दिल भर आया था कि वह उसे छोड़कर हिंदुस्तान चले जाएँगे...
एक एमएससी पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिलकुल अलग-थलग बाग़ की एक ख़ास रविश पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली नुमूदार हुई कि उसने अपने तमाम कपड़े उतारकर दफ़ेदार के हवाले कर दिए और नंग-धड़ंग सारे बाग़ में चलना-फिरना शुरू कर दिया.
चियौट के एक मोटे मुसलमान ने, जो मुस्लिम लीग का सरगर्म कारकुन रह चुका था और दिन में 15-16 मर्तबा नहाया करता था, यकलख़्त यह आदत तर्क कर दी उसका नाम मुहम्मद अली था, चुनांचे उसने एक दिन अपने जंगल में एलान कर दिया कि वह क़ायदे-आज़म मुहम्मद अली जिन्नाह है; उसकी देखा-देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंह बन गया- इससे पहले कि ख़ून-ख़राबा हो जाए, दोनों को ख़तरनाक पागल क़रार देकर अलहदा-अलहदा बंद कर दिया गया.
लाहौर का एक नौजवान हिंदू पकील मुहब्बत में नाकाम होकर पागल हो गया; जब उसने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो बहुत दुखी हुआ. अमृतसर की एक हिंदू लड़की से उसे मुहब्बत थी जिसने उसे ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस लड़की को नहीं भूला था-वह उन तमाम हिंदू और मुसलमान लीडरों को गालियाँ देने लगा जिन्होंने मिल-मिलाकर हिंदुस्तान के दो टुकड़े कर दिए हैं, और उनकी महबूबा हिंदुस्तानी बन गई है और वह पाकिस्तानी…जब तबादले की बात शुरू हुई तो उस वकील को कई पागलों ने समझया कि दिल बुरा न करे… उसे हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा, उसी हिंदुस्तान में जहाँ उसकी महबूबा रहती है- मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था; उसका ख़याल था कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी.
योरोपियन वार्ड मं दो एंग्लो इंडियन पागल थे. उनको जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आज़ाद करके अंग्रेज़ चले गए हैं तो उनको बहुत सदमा हुआ; वह छुप-छुपकर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ़्तुगू करते रहते कि पागलख़ाने में अब उनकी हैसियत किस क़िस्म की होगी; योरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा; ब्रेक-फ़ास्ट मिला करेगा या नहीं; क्या उन्हें डबल रोटी के बजाय ब्लडी इंडियन चपाटी तो ज़हर मार नहीं करनी पड़ेगी?
।।।।।।।।।
एक सिख था, जिसे पागलख़ाने में दाख़िल हुए 15 बरस हो चुके थे. हर वक़्त उसकी ज़ुबान से यह अजीबो-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुनने में आते थे : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन…” वह दिन को सोता था न रात को.
पहरेदारों का यह कहना था कि 15 बरस के तलीव अर्से में वह लहज़े के लिए भी नहीं सोया था; वह लेटता भी नहीं था, अलबत्ता कभी-कभी दीवार के साथ टेक लगा लेता था- हर वक़्त खड़ा रहने से उसके पाँव सूज गए थे और पिंडलियाँ भी फूल गई थीं, मगर जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था.
हिंदुस्तान, पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुताल्लिक़ जब कभी पागलख़ाने में गुफ़्तुगू होती थी तो वह ग़ौर से सुनता था; कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख़याल़ है तो वह बड़ी संजीदगी से जवाब देता : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट…! ” लेकिन बाद में “आफ़ दि पाकिस्तान गवर्नमेंट ” की जगह “आफ़ दि टोबा सिंह गवर्नमेंट!” ने ले ली, और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू कर दिया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है, जहाँ का वह रहने वाला है. किसी को भी मालूम नहीं था कि टोबा सिंह पाकिस्तान में है... या हिंदुस्तान में; जो बताने की कोशिश करते थे वह ख़ुद इस उलझाव में गिरफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पहले हिंदुस्तान में होता था, पर अब सुना है पाकिस्तान में है. क्या पता है कि लाहौर जो आज पाकिस्तान में है... कल हिंदुस्तान में चला जाए... या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए... और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान, दोनों किसी दिन सिरे से ग़ायब ही हो जाएँ...!
इस सिख पागल के केश छिदरे होकर बहुत मुख़्तसर रह गए थे; चूंकि बहुत कम नहाता था, इसलिए दाढ़ी और सिर के बाल आपस में जम गए थे. जिसके बायस उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी; मगर आदमी बे-ज़रर था. 15 बरसों में उसने कभी किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था. पागलख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे, वह उसके मुताल्लिक़ इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में उसकी कई ज़मीनें थीं; अच्छा खाता-पीता ज़मींदार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया, उसके रिश्तेदार उसे लोहे की मोटी-मोटी ज़ंजीरों में बाँधकर लाए और पागलख़ाने में दाख़िल करा गए.
महीने में एक मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उसकी ख़ैर-ख़ैरियत दरयाफ़्त करके चले जाते थे; एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान, हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उसका आना-जाना बंद हो गया.
उसका नाम बिशन सिंह था मगर सब उसे टोबा टेक सिंह कहते थे. उसको यह क़त्अन मालूम नहीं था कि दिन कौन सा है, महीना कौन सा है या कितने साल बीत चुके हैं; लेकिन हर महीने जब उसके अज़ीज़ो-अकारिब उससे मिलने के लिए आने के क़रीब होते तो उसे अपने आप पता चल जाता; उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और बालों में तेल डालकर कंघा करता; अपने वह कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यूँ सज-बनकर मिलने वालों के पास जाता. वह उससे कुछ पूछते तो वह ख़ामोश रहता या कभी-कभार “औपड़ दि गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन...” कह देता.
उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक ऊँगली बढ़ती-बढ़ती 15 बरसों में जवान हो गई थी. बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था-वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आँखों से आँसू बहते थे.
पाकिस्तान और हिंदुस्तान का क़िस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है; जब उसे इत्मीनानबख़्श जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गई. अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी; पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलनेवाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज़ भी बंद हो गई थी जो उनकी आमद की ख़बर दे दिया करती थी-उसकी बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएँ जो उससे हमदर्दी का इज़हार करते थे और उसके लिए फल, मिठाइयाँ और कपड़े लाते थे. वह आएँ तो वह उनके पूछे कि टोबा टेक सिंह कहाँ है... वह उसे यक़ीनन बता देंगे कि टोबा टेक सिंह वहीं से आते हैं जहाँ उसकी ज़मीनें हैं.
पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो ख़ुद को ख़ुदा कहता था. उससे जब एक रोज़ बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में तो उसने हस्बे-आदत क़हक़हा लगाया और कहा : “वह पाकिस्तान में है न हिंदुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म ही नहीं दिया...!”
बिशन सिंह ने उस ख़ुदा से कई मर्तबा बड़ी मिन्नत-समाजत से कहा कि वह हुक्कम दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो, मगर ख़ुदा बहुत मसरूफ़ था, इसलिए कि उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे.
एक दिन तंग आकर बिशन सिंह ख़ुदा पर बरस पड़ा: “ औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ वाहे गुरु जी दा ख़ालसा एंड वाहे गुरु जी दि फ़तह...!” इसका शायद मतलब था कि तुम मुसलमानों के ख़ुदा हो, सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते.
तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंह का एक मुसलमान जो बिशन सिंह का दोस्त था, मुलाक़ात के लिए आया; मुसलमान दोस्त पहले कभी नहीं आया था. जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया, फिर वापिस जाने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका: “यह तुमसे मिलने आया है...तुम्हारा दोस्त फ़ज़लदीन है...!”
बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा.
बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा : “मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूँ लेकिन फ़ुरसत ही न मिली... तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिंदुस्तान चले गए थे... मुझसे जितनी मदद हो सकी, मैंने की... तुम्हारी बेटी रूपकौर...” वह कहते-कहते रुक गया.
बिशन सिंह कुछ याद करने लगा : “बेटी रूपकौर...”
फ़ज़लदीन ने फिर कहना शुरू किया : उन्होंने मुझे कहा था कि तुम्हारी ख़ैर-ख़ैरियत पूछता रहूँ... अब मैंने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो... भाई बलबीर सिंह और भाई वधावा सिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृतकौर से भी... भाई बलबीर से कहना कि फ़ज़लदीन राज़ीख़ुशी है...दो भूरी भैसें जो वह छोड़ गए थे, उनमें से एक ने कट्टा दिया है... दूसरी के कट्टी हुई थी, पर वह 6 दिन की होके मर गई...और... मेरे लायक़ जो ख़िदमत हो, कहना, मैं वक़्त तैयार हूँ... और यह तुम्हारे लिए थोड़े-से मरोंडे लाया हूँ...!”
बिशन सिंह ने मरोंडों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़लदीन से पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है...”
फ़ज़लदीन ने क़दरे हैरत से कहा : “कहाँ है... वहीं है, जहाँ था!”
बिशन सिंह ने फिर पूछा : “पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में...”
“हिंदुस्तान में... नहीं, नहीं पाकिस्तान में...! ” फ़ज़लदीन बौखला-सा गया. बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान आफ़ दी दुर फ़िटे मुँह...! ”
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तबादले की तैयारियाँ मुकम्मल हो चुकी थीं, इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले पागलों की फ़ेहरिस्तें पहुँच चुकी थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था.
सख़्त सर्दियाँ थीं जब लाहौर के पागलख़ाने से हिंदू-सिख पागलों से भरी हुई लारियाँ पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुई, मुताल्लिक़ा अफ़सर भी हमराह थे. वागह के बौर्डर पर तरफ़ैन के सुपरिटेंडेंट एक-दूसरे से मिले और इब्तिदाई कार्रवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया, जो रात भर जारी रहा.
पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”
पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था; बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे, जो निकलने पर रज़ामंद होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि उन्हें फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते-कोई गालियाँ बक रहा है... कोई गा रहा है... कुछ आपस में झगड़ रहे हैं... कुछ रो रहे हैं, बिलख रहे हैं-कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी- पागल औरतों का शोरो-ग़ोग़ा अलग था, और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दाँत से दाँत बज रहे थे.
पागलों की अक्सरीयत इस तबादले के हक़ में नहीं थी, इसलिए कि उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें अपनी जगह से उख़ाड़कर कहाँ फेंका जा रहा है; वह चंद जो कुछ सोच-समझ सकते थे, “पाकिस्तान : ज़िंदाबाद” और “पाकिस्तान : मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे थे ; दो-तीन मर्तबा फ़साद होते-होते बचा, क्योंकि बाज़ मुसलमानों और सिखों को यह नारे सुनकर तैश आ गया था.
जब बिशन सिंह की बारी आई और वागन के उस पार का मुताल्लिक़ अफ़सर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है... पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में.... ?”
मुताल्लिक़ा अफ़सर हँसा : “पाकिस्तान में...! ”
यह सुनकर बिशन सिंह उछलकर एक तरफ़ हटा और दौड़कर अपने बाक़ीमादा साथियों के पास पहुंच गया.
पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”
उसे बहुत समझाया गया कि देखो, अब टोबा टेक सिंह हिंदुस्तान में चला गया... अगर नहीं गया है तो उसे फ़ौरन वहाँ भेज दिया जाएगा, मगर वह न माना! जब उसको जबर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दरमियान में एक जगह इस अंदाज़ में अपनी सूजी हुई टाँगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे कोई ताक़त नहीं हिला सकेगी... आदमी चूंकि बे-ज़रर था, इसलिए उससे मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई ; उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया, और तबादले का बाक़ी काम होता रहा.
सूरज निकलने से पहले साकितो-सामित (बिना हिलेडुले खड़े) बिशन सिंह के हलक़ के एक फ़लक शिगाफ़(गगनभेदी) चीख़ निकली.
इधर-उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और उन्होंने देखा कि वह आदमी जो 15 बरस तक दिन-रात अपनी दाँगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुँह लेटा है-उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान ; दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था.
सुनने के लिये यहाँ चटका लगायें और पढने के लिये नीचे निगाह डालें ।
मालूम नहीं, यह बात माक़ूल थी या ग़ैर माक़ूल, बहरहाल दानिशमंदों के फ़ैसले के मुताबिक़ इधर-उधर ऊँची सतह की कान्फ्रेंसें हुईं और बिलआख़िर पागलों के तबादले के लिए एक दिन मुक़र्रर हो गया.
अच्छी तरह छानबीन की गई- वे मुसलमान पागल जिनके लवाहिक़ीन हिंदुस्तान ही में थे, वहीं रहने दिए गए; जितने हिंदू-सिख पागल थे, सबके-सब पुलिस की हिफाज़त में बॉर्डर पह पहुंचा दिए गए.
उधर का मालूम नहीं लेकिन इधर लाहौर के पागलख़ाने में जब इस तबादले की ख़बर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चिमेगोइयाँ (गपशप) होने लगीं.
एक मुसलमान पागल जो 12 बरस से, हर रोज़, बाक़ायदगी के साथ “ज़मींदार” पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा: “मौलबी साब, यह पाकिस्तान क्या होता है...?” तो उसने बड़े ग़ौरो-फ़िक़्र के बाद जवाब दिया: “हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहाँ उस्तरे बनते हैं...!” यह जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया.
इसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा: “सरदार जी, हमें हिंदुस्तान क्यों भेजा जा रहा है... हमें तो वहाँ की बोली नहीं आती...” दूसरा मुस्कराया; “मुझे तो हिंदुस्तोड़ों की बोली आती है, हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिरते हैं...”
एक दिन, नहाते-नहाते, एक मुसलमान पागल ने “पाकिस्तान: जिंदाबाद” का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फ़र्श पर फिसलकर गिरा और बेहोश हो गया.
बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे; उनमें अक्सरीयत (बहुतायत) ऐसे क़ातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफ़सरों को कुछ दे दिलाकर पागलख़ाने भिजवा दिया था कि वह फाँसी के फंदे से बच जाएँ; यह पागल कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान क्यों तक़्सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है; लेकिन सही वाक़िआत से वह भी बेख़बर थे; अख़बारों से उन्हें कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे, जिनकी गुफ़्तुगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे. उनको सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्नाह है: जिसको क़ायदे-आज़म कहते हैं; उसने मुसलमानों के लिए एक अलहदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है; यह कहाँ है, इसका महल्ले-वुक़ू (भौगोलिक स्थिति) क्या है, इसके मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जानते थे- यही वजह है कि वह सब पागल जिनका दिमाग़ पूरी तरह माऊफ़ नहीं हुआ था, इस मख़मसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में; अगर हिंदुस्तान में है तो पाकिस्तान कहाँ है; अगर पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह कुछ अर्से पहले यहीं रहते हुए हिंदुस्तान में थे.
एक पागल तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान, पाकिस्तान और हिंदुस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज़्यादा पागल हो गया. झाड़ू देते-देते वह एक दिन दरख़्त पर चढ़ गया और टहने पर बैठकर दो घंटे मुसलसल तक़रीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी... सिपाहियों ने जब उसे नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया. जब उसे डराया-धमकाया गया तो उसने कहा: “मैं हिंदुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में... मैं इस दरख़्त ही पर रहूंगा...” बड़ी देर के बाद जब उसका दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिंदू-सिख दोस्तों से गले मिलकर रोने लगा- उस ख्याल से उसका दिल भर आया था कि वह उसे छोड़कर हिंदुस्तान चले जाएँगे...
एक एमएससी पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिलकुल अलग-थलग बाग़ की एक ख़ास रविश पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली नुमूदार हुई कि उसने अपने तमाम कपड़े उतारकर दफ़ेदार के हवाले कर दिए और नंग-धड़ंग सारे बाग़ में चलना-फिरना शुरू कर दिया.
चियौट के एक मोटे मुसलमान ने, जो मुस्लिम लीग का सरगर्म कारकुन रह चुका था और दिन में 15-16 मर्तबा नहाया करता था, यकलख़्त यह आदत तर्क कर दी उसका नाम मुहम्मद अली था, चुनांचे उसने एक दिन अपने जंगल में एलान कर दिया कि वह क़ायदे-आज़म मुहम्मद अली जिन्नाह है; उसकी देखा-देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंह बन गया- इससे पहले कि ख़ून-ख़राबा हो जाए, दोनों को ख़तरनाक पागल क़रार देकर अलहदा-अलहदा बंद कर दिया गया.
लाहौर का एक नौजवान हिंदू पकील मुहब्बत में नाकाम होकर पागल हो गया; जब उसने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो बहुत दुखी हुआ. अमृतसर की एक हिंदू लड़की से उसे मुहब्बत थी जिसने उसे ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस लड़की को नहीं भूला था-वह उन तमाम हिंदू और मुसलमान लीडरों को गालियाँ देने लगा जिन्होंने मिल-मिलाकर हिंदुस्तान के दो टुकड़े कर दिए हैं, और उनकी महबूबा हिंदुस्तानी बन गई है और वह पाकिस्तानी…जब तबादले की बात शुरू हुई तो उस वकील को कई पागलों ने समझया कि दिल बुरा न करे… उसे हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा, उसी हिंदुस्तान में जहाँ उसकी महबूबा रहती है- मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था; उसका ख़याल था कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी.
योरोपियन वार्ड मं दो एंग्लो इंडियन पागल थे. उनको जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आज़ाद करके अंग्रेज़ चले गए हैं तो उनको बहुत सदमा हुआ; वह छुप-छुपकर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ़्तुगू करते रहते कि पागलख़ाने में अब उनकी हैसियत किस क़िस्म की होगी; योरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा; ब्रेक-फ़ास्ट मिला करेगा या नहीं; क्या उन्हें डबल रोटी के बजाय ब्लडी इंडियन चपाटी तो ज़हर मार नहीं करनी पड़ेगी?
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एक सिख था, जिसे पागलख़ाने में दाख़िल हुए 15 बरस हो चुके थे. हर वक़्त उसकी ज़ुबान से यह अजीबो-ग़रीब अल्फ़ाज़ सुनने में आते थे : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन…” वह दिन को सोता था न रात को.
पहरेदारों का यह कहना था कि 15 बरस के तलीव अर्से में वह लहज़े के लिए भी नहीं सोया था; वह लेटता भी नहीं था, अलबत्ता कभी-कभी दीवार के साथ टेक लगा लेता था- हर वक़्त खड़ा रहने से उसके पाँव सूज गए थे और पिंडलियाँ भी फूल गई थीं, मगर जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था.
हिंदुस्तान, पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुताल्लिक़ जब कभी पागलख़ाने में गुफ़्तुगू होती थी तो वह ग़ौर से सुनता था; कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख़याल़ है तो वह बड़ी संजीदगी से जवाब देता : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट…! ” लेकिन बाद में “आफ़ दि पाकिस्तान गवर्नमेंट ” की जगह “आफ़ दि टोबा सिंह गवर्नमेंट!” ने ले ली, और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू कर दिया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है, जहाँ का वह रहने वाला है. किसी को भी मालूम नहीं था कि टोबा सिंह पाकिस्तान में है... या हिंदुस्तान में; जो बताने की कोशिश करते थे वह ख़ुद इस उलझाव में गिरफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पहले हिंदुस्तान में होता था, पर अब सुना है पाकिस्तान में है. क्या पता है कि लाहौर जो आज पाकिस्तान में है... कल हिंदुस्तान में चला जाए... या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए... और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान, दोनों किसी दिन सिरे से ग़ायब ही हो जाएँ...!
इस सिख पागल के केश छिदरे होकर बहुत मुख़्तसर रह गए थे; चूंकि बहुत कम नहाता था, इसलिए दाढ़ी और सिर के बाल आपस में जम गए थे. जिसके बायस उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी; मगर आदमी बे-ज़रर था. 15 बरसों में उसने कभी किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था. पागलख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे, वह उसके मुताल्लिक़ इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में उसकी कई ज़मीनें थीं; अच्छा खाता-पीता ज़मींदार था कि अचानक दिमाग़ उलट गया, उसके रिश्तेदार उसे लोहे की मोटी-मोटी ज़ंजीरों में बाँधकर लाए और पागलख़ाने में दाख़िल करा गए.
महीने में एक मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उसकी ख़ैर-ख़ैरियत दरयाफ़्त करके चले जाते थे; एक मुद्दत तक यह सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान, हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उसका आना-जाना बंद हो गया.
उसका नाम बिशन सिंह था मगर सब उसे टोबा टेक सिंह कहते थे. उसको यह क़त्अन मालूम नहीं था कि दिन कौन सा है, महीना कौन सा है या कितने साल बीत चुके हैं; लेकिन हर महीने जब उसके अज़ीज़ो-अकारिब उससे मिलने के लिए आने के क़रीब होते तो उसे अपने आप पता चल जाता; उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और बालों में तेल डालकर कंघा करता; अपने वह कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यूँ सज-बनकर मिलने वालों के पास जाता. वह उससे कुछ पूछते तो वह ख़ामोश रहता या कभी-कभार “औपड़ दि गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी लालटेन...” कह देता.
उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक ऊँगली बढ़ती-बढ़ती 15 बरसों में जवान हो गई थी. बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था-वह बच्ची थी जब भी अपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आँखों से आँसू बहते थे.
पाकिस्तान और हिंदुस्तान का क़िस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेक सिंह कहाँ है; जब उसे इत्मीनानबख़्श जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गई. अब मुलाक़ात भी नहीं आती थी; पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलनेवाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज़ भी बंद हो गई थी जो उनकी आमद की ख़बर दे दिया करती थी-उसकी बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएँ जो उससे हमदर्दी का इज़हार करते थे और उसके लिए फल, मिठाइयाँ और कपड़े लाते थे. वह आएँ तो वह उनके पूछे कि टोबा टेक सिंह कहाँ है... वह उसे यक़ीनन बता देंगे कि टोबा टेक सिंह वहीं से आते हैं जहाँ उसकी ज़मीनें हैं.
पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो ख़ुद को ख़ुदा कहता था. उससे जब एक रोज़ बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में तो उसने हस्बे-आदत क़हक़हा लगाया और कहा : “वह पाकिस्तान में है न हिंदुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म ही नहीं दिया...!”
बिशन सिंह ने उस ख़ुदा से कई मर्तबा बड़ी मिन्नत-समाजत से कहा कि वह हुक्कम दे दे ताकि झंझट ख़त्म हो, मगर ख़ुदा बहुत मसरूफ़ था, इसलिए कि उसे और बे-शुमार हुक्म देने थे.
एक दिन तंग आकर बिशन सिंह ख़ुदा पर बरस पड़ा: “ औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ वाहे गुरु जी दा ख़ालसा एंड वाहे गुरु जी दि फ़तह...!” इसका शायद मतलब था कि तुम मुसलमानों के ख़ुदा हो, सिखों के ख़ुदा होते तो ज़रूर मेरी सुनते.
तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंह का एक मुसलमान जो बिशन सिंह का दोस्त था, मुलाक़ात के लिए आया; मुसलमान दोस्त पहले कभी नहीं आया था. जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया, फिर वापिस जाने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका: “यह तुमसे मिलने आया है...तुम्हारा दोस्त फ़ज़लदीन है...!”
बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा.
बिशन सिंह ने फ़ज़लदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा : “मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूँ लेकिन फ़ुरसत ही न मिली... तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिंदुस्तान चले गए थे... मुझसे जितनी मदद हो सकी, मैंने की... तुम्हारी बेटी रूपकौर...” वह कहते-कहते रुक गया.
बिशन सिंह कुछ याद करने लगा : “बेटी रूपकौर...”
फ़ज़लदीन ने फिर कहना शुरू किया : उन्होंने मुझे कहा था कि तुम्हारी ख़ैर-ख़ैरियत पूछता रहूँ... अब मैंने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो... भाई बलबीर सिंह और भाई वधावा सिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृतकौर से भी... भाई बलबीर से कहना कि फ़ज़लदीन राज़ीख़ुशी है...दो भूरी भैसें जो वह छोड़ गए थे, उनमें से एक ने कट्टा दिया है... दूसरी के कट्टी हुई थी, पर वह 6 दिन की होके मर गई...और... मेरे लायक़ जो ख़िदमत हो, कहना, मैं वक़्त तैयार हूँ... और यह तुम्हारे लिए थोड़े-से मरोंडे लाया हूँ...!”
बिशन सिंह ने मरोंडों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फ़ज़लदीन से पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है...”
फ़ज़लदीन ने क़दरे हैरत से कहा : “कहाँ है... वहीं है, जहाँ था!”
बिशन सिंह ने फिर पूछा : “पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में...”
“हिंदुस्तान में... नहीं, नहीं पाकिस्तान में...! ” फ़ज़लदीन बौखला-सा गया. बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान आफ़ दी दुर फ़िटे मुँह...! ”
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तबादले की तैयारियाँ मुकम्मल हो चुकी थीं, इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले पागलों की फ़ेहरिस्तें पहुँच चुकी थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था.
सख़्त सर्दियाँ थीं जब लाहौर के पागलख़ाने से हिंदू-सिख पागलों से भरी हुई लारियाँ पुलिस के मुहाफ़िज़ दस्ते के साथ रवाना हुई, मुताल्लिक़ा अफ़सर भी हमराह थे. वागह के बौर्डर पर तरफ़ैन के सुपरिटेंडेंट एक-दूसरे से मिले और इब्तिदाई कार्रवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया, जो रात भर जारी रहा.
पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”
पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था; बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे, जो निकलने पर रज़ामंद होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि उन्हें फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते-कोई गालियाँ बक रहा है... कोई गा रहा है... कुछ आपस में झगड़ रहे हैं... कुछ रो रहे हैं, बिलख रहे हैं-कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी- पागल औरतों का शोरो-ग़ोग़ा अलग था, और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दाँत से दाँत बज रहे थे.
पागलों की अक्सरीयत इस तबादले के हक़ में नहीं थी, इसलिए कि उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें अपनी जगह से उख़ाड़कर कहाँ फेंका जा रहा है; वह चंद जो कुछ सोच-समझ सकते थे, “पाकिस्तान : ज़िंदाबाद” और “पाकिस्तान : मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे थे ; दो-तीन मर्तबा फ़साद होते-होते बचा, क्योंकि बाज़ मुसलमानों और सिखों को यह नारे सुनकर तैश आ गया था.
जब बिशन सिंह की बारी आई और वागन के उस पार का मुताल्लिक़ अफ़सर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है... पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में.... ?”
मुताल्लिक़ा अफ़सर हँसा : “पाकिस्तान में...! ”
यह सुनकर बिशन सिंह उछलकर एक तरफ़ हटा और दौड़कर अपने बाक़ीमादा साथियों के पास पहुंच गया.
पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया : “टोबा टेक सिंह यहाँ है..! ” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा : “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल आफ़ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान...! ”
उसे बहुत समझाया गया कि देखो, अब टोबा टेक सिंह हिंदुस्तान में चला गया... अगर नहीं गया है तो उसे फ़ौरन वहाँ भेज दिया जाएगा, मगर वह न माना! जब उसको जबर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दरमियान में एक जगह इस अंदाज़ में अपनी सूजी हुई टाँगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे कोई ताक़त नहीं हिला सकेगी... आदमी चूंकि बे-ज़रर था, इसलिए उससे मज़ीद ज़बर्दस्ती न की गई ; उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया, और तबादले का बाक़ी काम होता रहा.
सूरज निकलने से पहले साकितो-सामित (बिना हिलेडुले खड़े) बिशन सिंह के हलक़ के एक फ़लक शिगाफ़(गगनभेदी) चीख़ निकली.
इधर-उधर से कई अफ़सर दौड़े आए और उन्होंने देखा कि वह आदमी जो 15 बरस तक दिन-रात अपनी दाँगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुँह लेटा है-उधर ख़ारदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान ; दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था.
बुधवार, दिसंबर 31, 2008
जिया मोहिनुद्दीन की आवाज में सुनिये "लाहौर"
जिया मोहिनुद्दीन की आवाज में पिछली कुछ प्रविष्टियों को आपकी सराहना मिली, इसी के चलते एक और नगीना पेश कर रहा हूँ । इस बार उनकी आवाज में लाहौर के बारे में सुनिये ।
इसी के साथ आप सभी को नये साल की हार्दिक शुभकामनायें ।
इसी के साथ आप सभी को नये साल की हार्दिक शुभकामनायें ।
मंगलवार, दिसंबर 30, 2008
सोमवार, दिसंबर 29, 2008
शेयर बाजार में निवेश: आपबीती और सीखे हुये सबक
आज ज्ञानदत्त पाण्डेयजी के चिट्ठे पर "हैप्योनेर निवेशक बनें" पढा । पहले तो हैप्योनेर का अर्थ ही समझ में नहीं आया, फ़िर लगा कि ज्ञानदत्तजी हमारे जैसे हिन्दी माध्यम में पढाई करने वालों की टांग तो नहीं खींच रहे हैं । अगर स्पेलिंग ही लिख देते तो कुछ समझने की कोशिश करते । फ़िर आगे पढा तो पता चला कि हैप्योनेर (Happionaire) बोले तो "आनन्द से तृप्त" ।
आब्जेक्शन माई लार्ड: शेयर बाजार और आनन्द से तृप्त, कैसी लीला है विरोधाभास की ।
कुछ महीनों पहले जब अमेरिका के शेयर बाजार की वाट लगी हुयी थी तो एक पार्टी में इस बात पर चर्चा होने लगी । एक बुजुर्ग (जिनका पोर्टफ़ोलियो काफ़ी सिकुड चुका था) ने हमसे कहा कि तुम तो जवान हो, ये बडा माकूल समय है शेयर बाजार में पैसा लगाने का । सब कुछ गाजर मूली के दाम पर बिक रहा है, कोई कम्पनी देखो जिसकी नींव (Fundamentals) मजबूत हो, पैसा निवेश करो और फ़िर इसे भूल जाओ । कुछ सालों के बाद हमको दुआयें दोगे । हमने उस समय तो हंसी में टाल दिया कि गरीब विद्यार्थियों के पास कैसा पैसा लेकिन जिस प्रकार कलयुग राजा परीक्षित के सोने के मुकुट में समा चुका था, कुछ कुछ वैसा ही हमारे साथ हुआ ।
पहली बार finance.google.com खोल कर देखा, पता चला दुनिया में बहुत कुछ चल रहा है । फ़िर देखा कि माउस के क्लिक से ही शेयर खरीदे/बेचे जा सकते हैं । मन को समझाया कि केवल देख लो, बाकी पैसा वैसा कहाँ है डालने के लिये । फ़िर कहा कि चला खाता खुलवा लो, कोई जबरदस्ती तो है नहीं कि खरीदना ही पडेगा । वैसे भी खाता तो मुफ़्त खुल रहा है, नो सर्विस चार्ज :-)
२ हफ़्ते निवेश से सम्बन्धित खबरे पढने में गुजारे । मन तो तसल्ली दी कि ये ठीक कर रहे हो, कुछ भी करने से पहले ज्ञान जुटाना बहुत जरूरी है । तुम उन लोगों में से नहीं हो कि किसी ने कुछ कहा और कूद पडे । भले ही लोग न माने लेकिन तुम खुद तो काफ़ी समझदार और औसत बुद्दि तो समझते ही हो । फ़िर कहा कि चलो अपने बैंक से ट्रेडिंग अकाउंट में पैसा तो भिजवा ही दो, मान लो कल कोई अच्छा मौका आया खरीदने का और तुम मुंह देखते रह जाओगे । चलो ये भी करवा लिया, अपनी कठिन मेहनत से बचाये हुये कुछ पैसे (पिताजी न पढ लें, इसलिये बतायेंगे नहीं :-) ) डालकर पहला निवेश किया । Wachovia Coroporation डूब चुकी थी और उसका शेयर अर्श से फ़र्श पर आ चुका था । Wells Fargo ने जब Wachovia को खरीदने की बात की तो उसका मरे हुये शेयर ने फ़र्श से जरा सा लडखडाकर ऊपर की ओर देखा, ठीक इसी समय हमने उसे थाम लिया । अगले हफ़्ते में Wells Fargo से डील पक्की हुयी और हमारा पोर्टफ़ोलियो ३३% के लाभ में हरा-हरा दिख रहा था ।
हमने खुद को शाबाशी दी और कुछ अन्य निवेश किये जो औंधे मुंह गिर पडे । ध्यान रहे कि हमारे हिसाब से ये सारे निवेश So Called दिमाग और Analysis के बाद किये गये थे । लेकिन अब चलते है कुछ महत्वपूर्ण सबक पर जो इन ५-६ महीने में हमने सीखे :
१) कहना आसान है कि पैसा लगाओ कि और Long Term भूल जाओ । जब आप अपनी गाढी कमाई को लाल होते देखते हैं तो बडा दुख होता है ।
२) कहा जाता है कि Buy Low, Sell High । लेकिन अक्सर होता उलटा है ।
३) शेयर खरीदते ही दाम गिरने पर पहला रिऐक्शन होता है "Cost Averaging" | अर्थात अगर आपने १०० शेयर २० के दाम खरीदे और अब दाम १५ है तो अगर आप १०० शेयर और खरीदें तो आपके निवेश की औसत खरीद १७.५ होगी । ये एक खतरनाक Slippery Slope है, इसमें मैने अच्छे अच्छों को फ़िसलते देखा है । हम भी एक बार इसके चक्कर में फ़ंसे लेकिन समय चलते बच निकले ।
४) जब बाजार बूम पर होता है तो पनवाडी की सलाह भी ५०% से ज्यादा सही होती है । लेकिन Recession के समय बाजार सारे सूत्र (Logic, Fundamental, Expectation) भूल जाता है । इस समय यहाँ अमेरिका में तो कम से कम Panic-Driven बाजार है । किसी भी कम्पनी के Fundamentals कितने भी मजबूत हों सब उठापटक में फ़ंसे हुये हैं ।
५) हमने कुछ निवेश Solar Companies में भी किया था । सोचा था कि बराक ओबामा Non-Conventional Energy के बहुत पक्ष में हैं और उनके जीतने की संभावना के चलते ये एक अच्छा निवेश होगा । अफ़सोस गलत जवाब....इस समय अमेरिका में पेट्रोल ६५ रूपये ($१.३५) में ३.७८ लीटर (१ गैलन) मिल रहा है, ऐसे में सोलर का
क्या हश्र होगा आप खुद ही सोच लीजिये । लेकिन इस Panic-driven/Manupulative बाजार का कोई भरोसा नहीं । आज जब सब कुछ डाउन है, एक सोलर कम्पनी के शेयर लगभग १२% ऊपर हैं बिना किसी ठोस/सकारात्मक खबर के (इसे आप चित्र में देख सकते हैं) ।
६) इस समय निवेश करने के लिये Nerves और Balls दोनों स्टील की चाहियें, अगर दम हो तो निवेश करो वरना अभी और इन्तजार करो । क्योंकि अगर विशेषज्ञों की माने तो यहाँ अमेरिका के बाजार के होश बजा होने में कम से कम दो साल या और अधिक समय लगेगा । तब तक यूँ ही खटपट चलती रहेगी ।
७) Temptation के मामले में शेयर बाजार बहुत खतरनाक है । हम खुद ही कई बार Tempt हुये लेकिन निवेश के लिये खुद के लिये बनाये गये नियमों को पालन करने की बाध्यता के चलते कई बार इस Temptation से बचे तो अन्त में सही साबित हुआ ।
इसीलिये, चाहे बूम (Boom) हो या Recession अगर निवेश आपका Profession नहीं है तो आप नौसिखिये (Ameteur) ही हैं । निवेश से पहले कुछ नियम बनाईये और इनका पालन कीजिये । कभी भी उधार लेकर पैसा मत लगाईये, और जिस पैसे की आपको निकट भविष्य (१-२ साल) में जरूरत पडने की सम्भावना हो उसे बाजार में निवेश मत कीजिये ।
आब्जेक्शन माई लार्ड: शेयर बाजार और आनन्द से तृप्त, कैसी लीला है विरोधाभास की ।
कुछ महीनों पहले जब अमेरिका के शेयर बाजार की वाट लगी हुयी थी तो एक पार्टी में इस बात पर चर्चा होने लगी । एक बुजुर्ग (जिनका पोर्टफ़ोलियो काफ़ी सिकुड चुका था) ने हमसे कहा कि तुम तो जवान हो, ये बडा माकूल समय है शेयर बाजार में पैसा लगाने का । सब कुछ गाजर मूली के दाम पर बिक रहा है, कोई कम्पनी देखो जिसकी नींव (Fundamentals) मजबूत हो, पैसा निवेश करो और फ़िर इसे भूल जाओ । कुछ सालों के बाद हमको दुआयें दोगे । हमने उस समय तो हंसी में टाल दिया कि गरीब विद्यार्थियों के पास कैसा पैसा लेकिन जिस प्रकार कलयुग राजा परीक्षित के सोने के मुकुट में समा चुका था, कुछ कुछ वैसा ही हमारे साथ हुआ ।
पहली बार finance.google.com खोल कर देखा, पता चला दुनिया में बहुत कुछ चल रहा है । फ़िर देखा कि माउस के क्लिक से ही शेयर खरीदे/बेचे जा सकते हैं । मन को समझाया कि केवल देख लो, बाकी पैसा वैसा कहाँ है डालने के लिये । फ़िर कहा कि चला खाता खुलवा लो, कोई जबरदस्ती तो है नहीं कि खरीदना ही पडेगा । वैसे भी खाता तो मुफ़्त खुल रहा है, नो सर्विस चार्ज :-)
२ हफ़्ते निवेश से सम्बन्धित खबरे पढने में गुजारे । मन तो तसल्ली दी कि ये ठीक कर रहे हो, कुछ भी करने से पहले ज्ञान जुटाना बहुत जरूरी है । तुम उन लोगों में से नहीं हो कि किसी ने कुछ कहा और कूद पडे । भले ही लोग न माने लेकिन तुम खुद तो काफ़ी समझदार और औसत बुद्दि तो समझते ही हो । फ़िर कहा कि चलो अपने बैंक से ट्रेडिंग अकाउंट में पैसा तो भिजवा ही दो, मान लो कल कोई अच्छा मौका आया खरीदने का और तुम मुंह देखते रह जाओगे । चलो ये भी करवा लिया, अपनी कठिन मेहनत से बचाये हुये कुछ पैसे (पिताजी न पढ लें, इसलिये बतायेंगे नहीं :-) ) डालकर पहला निवेश किया । Wachovia Coroporation डूब चुकी थी और उसका शेयर अर्श से फ़र्श पर आ चुका था । Wells Fargo ने जब Wachovia को खरीदने की बात की तो उसका मरे हुये शेयर ने फ़र्श से जरा सा लडखडाकर ऊपर की ओर देखा, ठीक इसी समय हमने उसे थाम लिया । अगले हफ़्ते में Wells Fargo से डील पक्की हुयी और हमारा पोर्टफ़ोलियो ३३% के लाभ में हरा-हरा दिख रहा था ।
हमने खुद को शाबाशी दी और कुछ अन्य निवेश किये जो औंधे मुंह गिर पडे । ध्यान रहे कि हमारे हिसाब से ये सारे निवेश So Called दिमाग और Analysis के बाद किये गये थे । लेकिन अब चलते है कुछ महत्वपूर्ण सबक पर जो इन ५-६ महीने में हमने सीखे :
१) कहना आसान है कि पैसा लगाओ कि और Long Term भूल जाओ । जब आप अपनी गाढी कमाई को लाल होते देखते हैं तो बडा दुख होता है ।
२) कहा जाता है कि Buy Low, Sell High । लेकिन अक्सर होता उलटा है ।
३) शेयर खरीदते ही दाम गिरने पर पहला रिऐक्शन होता है "Cost Averaging" | अर्थात अगर आपने १०० शेयर २० के दाम खरीदे और अब दाम १५ है तो अगर आप १०० शेयर और खरीदें तो आपके निवेश की औसत खरीद १७.५ होगी । ये एक खतरनाक Slippery Slope है, इसमें मैने अच्छे अच्छों को फ़िसलते देखा है । हम भी एक बार इसके चक्कर में फ़ंसे लेकिन समय चलते बच निकले ।
४) जब बाजार बूम पर होता है तो पनवाडी की सलाह भी ५०% से ज्यादा सही होती है । लेकिन Recession के समय बाजार सारे सूत्र (Logic, Fundamental, Expectation) भूल जाता है । इस समय यहाँ अमेरिका में तो कम से कम Panic-Driven बाजार है । किसी भी कम्पनी के Fundamentals कितने भी मजबूत हों सब उठापटक में फ़ंसे हुये हैं ।
५) हमने कुछ निवेश Solar Companies में भी किया था । सोचा था कि बराक ओबामा Non-Conventional Energy के बहुत पक्ष में हैं और उनके जीतने की संभावना के चलते ये एक अच्छा निवेश होगा । अफ़सोस गलत जवाब....इस समय अमेरिका में पेट्रोल ६५ रूपये ($१.३५) में ३.७८ लीटर (१ गैलन) मिल रहा है, ऐसे में सोलर का
६) इस समय निवेश करने के लिये Nerves और Balls दोनों स्टील की चाहियें, अगर दम हो तो निवेश करो वरना अभी और इन्तजार करो । क्योंकि अगर विशेषज्ञों की माने तो यहाँ अमेरिका के बाजार के होश बजा होने में कम से कम दो साल या और अधिक समय लगेगा । तब तक यूँ ही खटपट चलती रहेगी ।
७) Temptation के मामले में शेयर बाजार बहुत खतरनाक है । हम खुद ही कई बार Tempt हुये लेकिन निवेश के लिये खुद के लिये बनाये गये नियमों को पालन करने की बाध्यता के चलते कई बार इस Temptation से बचे तो अन्त में सही साबित हुआ ।
इसीलिये, चाहे बूम (Boom) हो या Recession अगर निवेश आपका Profession नहीं है तो आप नौसिखिये (Ameteur) ही हैं । निवेश से पहले कुछ नियम बनाईये और इनका पालन कीजिये । कभी भी उधार लेकर पैसा मत लगाईये, और जिस पैसे की आपको निकट भविष्य (१-२ साल) में जरूरत पडने की सम्भावना हो उसे बाजार में निवेश मत कीजिये ।
गुरुवार, दिसंबर 25, 2008
चेस्ट बीटिंग नेशनलिज्म और देशभक्ति का भद्दा प्रदर्शन !!!
आज ही इस वीडियो पर नजर गयी और इसके बाद अन्नु कपूर की जितनी इज्जत मेरे जेहन में थी वो एक झटके में काफ़ी कम हो गयी है । वैसे भी झटके लगने का सिलसिला कल आमिर खान की "बी ग्रेड" फ़िल्म "गजनी" देखकर शुरू हुआ है, देखते हैं कब तक चलता है ।
कल ही दिनेशजी ने अपने चिट्ठे पर लिखा था कि एक टिप्पणी जिसमें गुनाहगार के वकील के वकील को भी सजा देने की बात की गयी थी पर उन्हे दुख हुआ था । उस टिप्पणी से दुख मुझे भी हुआ था, दुख मुझे हर उस समय होता है जब हम देशभक्ति, नेशनलिज्म और कभी कबीलाई इंसाफ़ के नाम पर भावनाओं के अंबार में बहकर तर्क का साथ छोड देते हैं ।
फ़िलहाल तो आप इस वीडियो का आनन्द उठायें । हाँ, इस वीडियो में तो देशभक्ति के नाम पर एक भद्दा मजाक किया गया है जिसे देखकर क्या पता हंसी आ जाये तो भी पैसे वसूल ।
मेरे रूममेट अंकुर की टिप्पणी: अंकुर कहते हैं कि भारत का रियेलटी टी.वी. जल्द ही अमेरिका के रियलटी टी.वी. को मात देगा । उनकी भविष्यवाणी है कि अब केवल रियेलटी शो के जजों में जूतम-पैजार होने की कसर बाकी है ।
मंगलवार, दिसंबर 23, 2008
पुस्तकालय की महिमा: छुट्टी का जुगाड !!!
हमारे विश्वविद्यालय का फ़ाण्ड्रन पुस्तकालय अमेरिका के चुने हुये विशाल पुस्तकालयों में से एक है । अपने शोधकार्य के अलावा अन्य विषयों पर जानकारी लेने के लिये इंटरनेट की अपेक्षा कभी कभी पुस्तकालय में जाना बहुत सुखद होता है । भारत के पुरातन इतिहास (Ancient History of India) में मेरी विशेष रूचि है | इसके परिपेक्ष्य में पिछले कई वर्षों में Indo-Aryan Controversy पर काफ़ी कुछ पढा लेकिन नोट्स बनाकर लिखने का हमेशा आलस रहा ।
अभी कुछ दिन पहले पुस्तकालय में भारतीय इतिहास वाले सेक्शन में भटकते हुये एक पुस्तक पर नजर पडी । The Indo-Aryan Controversy: Evidence and inference in Indian History | सबसे पहले प्रकाशक पर नजर डाली, "Routledge, Taylor & Francis Group" | हम्म, प्रकाशक तो बढिया है सोचकर शेल्फ़ से उठा ली । मेरे मित्र अंकुर वर्मा ने लगभग आठ साल पहले सलाह दी थी कि किसी भी पुस्तक के प्रस्तावना अथवा Preface से मजमून के बारे में अच्छी जानकारी मिलती है और Preface कोशिश करके एक बार में पूरा पढना चाहिये । तुरन्त उनकी सलाह पर अमल किया और ये पढने को मिला ।
(चित्र को क्लिक करके पढने में आसानी होगी )
(चित्र को क्लिक करके पढने में आसानी होगी )
Preface पढते ही दिल बाग बाग हो गया और लगा कि चलो कोई राईट/लेफ़्ट विंग प्रोपागेंडा तो नहीं है । ठोस इतिहास की बात हो रही है । अब इसके बाद आगे पन्ने पलटे तो पता चला कि इस पुस्तक में माइकेल विट्जल, बी. बी. लाल, सत्य स्वरूप मिश्रा, सुभाष काक, श्रीकांत तलगेरी, माधव देशपांडे, कोइनार्ड एस्ट जैसे दिग्गजों के लेख हैं । तुरन्त इस पुस्तक को उठाया गया और निश्चित किया कि क्रिसमस की छुट्टियों में इसे दबाकर पढेंगे और यदि संभव हुआ तो कुछ नोट्स भी तैयार किये जायेंगे ।
हिन्दी ब्लागजगत में भी निश्चित ही बहुत से लोगों के इस Indo-Aryan Controversy के बारे में कुछ विचार होंगे । मसलन क्या आर्य (Race) और द्रविण भिन्न हैं? सिन्धु घाटी सभ्यता में रहने वाले कौन थे ? वैदिक सभ्यता और सिन्धु घाटी सभ्यता का आपस में क्या सम्बन्ध है ? क्या ये दोनों एक ही हैं ? इत्यादि इत्यादि ।
देर किस बात की है, लिख भेजिये इस विषय पर अपनी राय ।
P.S.: मैक्स मूलर और मैकाले को गरियाने/जुतियाने में अपना समय व्यर्थ न करें , :-)
अभी कुछ दिन पहले पुस्तकालय में भारतीय इतिहास वाले सेक्शन में भटकते हुये एक पुस्तक पर नजर पडी । The Indo-Aryan Controversy: Evidence and inference in Indian History | सबसे पहले प्रकाशक पर नजर डाली, "Routledge, Taylor & Francis Group" | हम्म, प्रकाशक तो बढिया है सोचकर शेल्फ़ से उठा ली । मेरे मित्र अंकुर वर्मा ने लगभग आठ साल पहले सलाह दी थी कि किसी भी पुस्तक के प्रस्तावना अथवा Preface से मजमून के बारे में अच्छी जानकारी मिलती है और Preface कोशिश करके एक बार में पूरा पढना चाहिये । तुरन्त उनकी सलाह पर अमल किया और ये पढने को मिला ।
(चित्र को क्लिक करके पढने में आसानी होगी )
(चित्र को क्लिक करके पढने में आसानी होगी )Preface पढते ही दिल बाग बाग हो गया और लगा कि चलो कोई राईट/लेफ़्ट विंग प्रोपागेंडा तो नहीं है । ठोस इतिहास की बात हो रही है । अब इसके बाद आगे पन्ने पलटे तो पता चला कि इस पुस्तक में माइकेल विट्जल, बी. बी. लाल, सत्य स्वरूप मिश्रा, सुभाष काक, श्रीकांत तलगेरी, माधव देशपांडे, कोइनार्ड एस्ट जैसे दिग्गजों के लेख हैं । तुरन्त इस पुस्तक को उठाया गया और निश्चित किया कि क्रिसमस की छुट्टियों में इसे दबाकर पढेंगे और यदि संभव हुआ तो कुछ नोट्स भी तैयार किये जायेंगे ।
हिन्दी ब्लागजगत में भी निश्चित ही बहुत से लोगों के इस Indo-Aryan Controversy के बारे में कुछ विचार होंगे । मसलन क्या आर्य (Race) और द्रविण भिन्न हैं? सिन्धु घाटी सभ्यता में रहने वाले कौन थे ? वैदिक सभ्यता और सिन्धु घाटी सभ्यता का आपस में क्या सम्बन्ध है ? क्या ये दोनों एक ही हैं ? इत्यादि इत्यादि ।
देर किस बात की है, लिख भेजिये इस विषय पर अपनी राय ।
P.S.: मैक्स मूलर और मैकाले को गरियाने/जुतियाने में अपना समय व्यर्थ न करें , :-)
सोमवार, दिसंबर 22, 2008
ज़िया मोहिनुद्दीन की आवाज में सुनिये "चचा छक्कन"
हमने पिछली बार आपको जिया मोहिनुद्दीन की आवाज में एक कहानी "धोबी" सुनवायी थी, जिसके बाद पारूलजी ने जिया मोहिनुद्दीन की आवाज में और अफ़साने भी सुनने की इच्छा जताई थी । लीजिये इसी कडी में पेश है, चचा छक्कन ।
इस पूरे मजमून को सुनने के बाद बतायें कि अगर कहानी के किरदार अपने ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, उनकी पत्नी श्रीमती रीता पाण्डेय और उनके भृत्य भरतलाल होते तो कहानी कैसी बनती । इसे हमारा ज्ञानदत्तजी की मौज लेने का प्रयास बिल्कुल न समझा जाये, :-)
इस पूरे मजमून को सुनने के बाद बतायें कि अगर कहानी के किरदार अपने ज्ञानदत्त पाण्डेय जी, उनकी पत्नी श्रीमती रीता पाण्डेय और उनके भृत्य भरतलाल होते तो कहानी कैसी बनती । इसे हमारा ज्ञानदत्तजी की मौज लेने का प्रयास बिल्कुल न समझा जाये, :-)
रविवार, दिसंबर 21, 2008
दीवार से टकराना और टकरा के आगे बढने की कला !!!
सावधान: ये एक लम्बी और बडे कष्ट (३६ किमी दौडने) के बाद लिखी गयी पोस्ट है ।
लम्बी दौडों, साईकलिंग और लम्बी तैराकी में एक प्रक्रिया होती है जिसे "दीवार से टकराना कहते हैं" (Hitting the Wall) | दीवार से टकराने का वैज्ञानिक कारण है । आपका शरीर ग्लूकोज को ग्लाईकोजन के रूप में सहेज कर रखता है, इसके अलावा आपके शरीर में वसा भी एकत्रित रहती है जो भी ऊर्जा का एक स्रोत है । जब आप कोई शारीरिक श्रम करते हैं तो उस श्रम को करने के लिये ऊर्जा ग्लाईकोजन अथवा वसा से प्राप्त होती है । वसा को ऊर्जा में बदलने की क्रिया बहुत धीमी और क्लिष्ट (Complex) होती है । इसके विपरीत ग्लाईकोजन बडी आसानी से ग्लूकोज में परिवर्तित होता है और तुरन्त ऊर्जा में बदला जा सकता है । इसका सीधा अर्थ हुआ की दौडने की अवस्था में जब शरीर के ऊतकों को तेजी से ऊर्जा की आवश्यकता होती है, आप ग्लाईकोजन पर निर्भर रहते हैं ।
ये सब तो ठीक हुआ लेकिन इ
सका दीवार से टकराने का क्या सम्बन्ध ? समस्या है कि हमारा शरीर केवल २००० किलो कैलोरी ही ग्लाईकोजन के रूप में संचित कर पाता है । दौडते समय इस २००० किलो कैलोरी को आप (वजन के हिसाब से) १७ मील से २० मील की दूरी में खर्च कर देते हैं । उसके बाद आपके शरीर में अचानक बदलाव आता है । जहाँ आप १८ मील तक बडे आराम से दौड रहे होते हैं, ग्लाईकोजन का टैंक खत्म होते ही शरीर को वसा पर निर्भर होना पडता है और उस समय ऐसा महसूस होता है कि जैसे अचानक चलती कार पर किसी ने ब्रेक लगा दिये हों । कुछ स्थितियों में केवल २०-५० मीटर की दूरी में ही आप दौडने से रूककर पैदल चलने पर मजबूर हो जाते हैं । इस स्थिति को Hitting The Wall कहते हैं ।
अब चूँकि मैराथन २६.२ मील की होती है, आखिरी ६-९ मील सबसे दूरूह होते हैं । कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि मैराथन में २० मील वार्म अप करने के लिये होते हैं और असली दौड आखिरी ६.२ मील की होती है । पिछले तीन हफ़्तों में मैने इस दीवार को स्वयं अनुभव किया । हमने २५ किमी (१५.६ मील) की एक दौड दौडी और हंसते हंसते इसे पूरा किया और लगा कि हम अब मैराथन के लिये पूरी तरह तैयार हैं । लेकिन उसके बाद २५ से ३६ किमी की दौडों में इस दीवार ने खूब छकाया । आज इस पोस्ट को लिखने से पहले सुबह ३६ किमी दौडकर आये हैं और ३० किमी के बाद ऐसा लगा कि अचानक पैरों पर कोई डंडे से जोर जोर से पिटाई करने लगा हो ।
चलिये ये सब तो ठीक है लेकिन इस दुष्ट दीवार से बचा कैसे जाये ? इसका इलाज है कार्बो लोडिंग (Carb Loading) | आप ३० किमी से लम्बी दौड वाले हफ़्ते में वसा को कम करके Carbohydrate ज्यादा खायें और जमकर खायें । दौड शुरु होने से पहले Liquid Carbohydrate Drinks का सेवन करें क्योंकि दौड से तुरन्त पहले ठोस पदार्थ खाने का मतलब है दौड के दौरान पेट में हिमेश रेशमिया का संगीत
:-)
इसके अलावा हर ५ वें मील के दौरान Gu Gel का सेवन करें जिससे पूरी दौड में आपको अतिरिक्त ५००-६०० किलो कैलोरी ग्लाईकोजन की आपूर्ति हो सके । और फ़िर आखिरी ३-४ मील अल्लाह/राम/जीजस जिसको भी आप मानते हों कि भरोसे छोड दें ।
सागर भाईजी ने पूछा था कि मैं इस दौड को जीतूँगा तो मुझे क्या ईनाम मिलेगा, तो इसके चलते मैराथन से सम्बन्धित कुछ मजेदार बाते बतायी जायें ।
१) मैं अपनी जिन्दगी में कभी भी मैराथन नहीं जीत सकता । जो धावक मैराथन जीतते हैं उनमें कुछ जन्मजात गुण होते हैं और वो इसकी ट्रेनिंग एक Profession समझ कर करते हैं । इसके विपरीत मैराथन दौडना मेरी रूचि है ।
२) हर मैराथन दौडने वाले के मन में तीन समय होते हैं । पहला समय जो वो सबको बताता है, मेरे लिये ये ३ घंटा ४० मिनट होगा । ये समय वो होता है कि अगर दौड के दौरान थोडी गडबड भी हो जाये तो भी निकल पाये । दूसरा समय होता है जिससे वो सन्तुष्ट होगा लेकिन खुश नहीं, मसलन अगर सब कुछ गडबड हो जाये फ़िर भी कम से कम इस समय में दौड पूरी हो जाये । मेरे लिये ये ४ घंटे का समय होगा । तीसरा समय उसके खुद के लिये होता है, ये वो समय होता है कि अगर सारे सितारे साथ में हो और कोई चोट, खिंचाव, दर्द न उठे तो इस समय में दौड पूरी हो । आमतौर पर ये सीक्रेट होता है क्योंकि जरा सी भी गडबड होने पर ये तुरन्त हाथ से रेत की तरह फ़िसलता जाता है । मेरे लिये ये समय ३ घंटा २८ मिनट से ३ घंटा ३० मिनट के बीच होगा ।
३) अब आपके समय के हिसाब से मैराथन में आपकी श्रेणी इस प्रकार की होती है । अब आप खुद ही देख लें हम कहाँ खडे हैं ।
2:30 or under = Elite runner
2:30-3:00 = Still very fast, would win most smaller marathon
3:00-3:30 = Strong time, top 10-15% of most marathons
3:30-4:00 = Top २0-40% of field
4:00-4:30 = Middle of the pack
4:30-5:00 = Bottom third
5:00 + = Back of the pack
जो भी मैराथन दौडने का संकल्प लेते हैं उनको मैं बहुत इज्जत की नजर से देखता हूँ । जो भी इसको समाप्त करते हैं भले ही इसमें कितना भी समय लगे, उनको मेरा सलाम । कारण है कि अगर आप ३:३० से कम समय में इसको पूरा करते हैं तो आपमें क्षमता है और दौड आपको मुबारक । लेकिन अगर आप इसको ५-६ घंटे में पूरा कर रहे हैं, इसका अर्थ है कि आप केवल अपनी ट्रेनिंग और इच्छाशक्ति के बल पर इस पूरा कर रहे हैं जो बहुत मुश्किल है । क्योंकि किसी भी मैराथन को सिर्फ़ पूरा करने के लिये कम से कम ५ महीने की सम्पूर्ण निष्ठावान ट्रेनिंग चाहिये । जिसमें आप हर हफ़्ते २५-४० मील दौडें और जब आप धीमा दौड रहे हों तो इसको जारी रखना बहुत मुश्किल है जब लोग आसानी से आपसे आगे निकले जा रहे हों ।
लेकिन लोग कहते हैं किसी भी लम्बी दौड को पूरा करने के बाद की स्थिति जिसे Runners High कहते हैं, वो किसी भी नशे से हासिल नहीं की जा सकती है । इसके लिये तो कष्ट करना ही पडेगा, :-)
अन्त में कुछ रोचक तथ्य:
१) मैराथन की उत्पत्ति ग्रीक सभ्यता से जुडी हुयी है जब एक धावक मैराथन के युद्ध में विजय की सूचना लेकर बिना रूके दौडते हुये गया था और सूचना देते ही गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुआ था ।
२) माडर्न मैराथन १८९६ से प्रारम्भ हुयी हैं जिसमे काफ़ी समय तक दूरी निश्चित नहीं थी ।
३) १९०८ लंदन ओलम्पिक में २६.२ मील की दूरी तय हुयी थी । इस अजीब सी २६.२ मील का दूरी इसलिये जिससे दौड शाही महल के सामने खत्म हो सके ।
४) १९१२ के बाद से हम मैराथन २६.२ मील अथवा ४२.१९५ किमी की होती है । लेकिन भीड और दांये/बांये चलने के कारण आप एक सीधी रेखा में नहीं दौड पाते और लगभग २६.४ मील तक दौडते हैं ।
५) एक मैराथन में आप लगभग 65,000-70,000 कदम दौडते हैं ।
६) Elite Marathoners को छोडकर लगभग बाकी लोग अपनी ट्रेनिंग में अधिकतम २२-२४ मील ही दौडते हैं और २६.२ लगातार पूरी ट्रेनिंग में एक ही बार यानि दौड वाले दिन दौडते हैं । इस लिहाज से दौड आपकी ट्रेनिंग का कठिनतम दिन होता है ।
७) मैराथन में अगर आप ठीक ढंग से पानी न पियें अथवा बहुत अधिक पानी पियें तो Under-hydration/Over-hydration से किसी किसी स्थिति में मृत्यु तक हो सकती है । इसके अलावा अगर आपका हृदय कमजोर है तो भी ये आपके लिये खतरनाक हो सकती है, लेकिन मैराथन में मृत्यु होने की प्रायिकता घर के बाहर बिजली गिरने से होनी वाली प्रायिकता अथवा सडक दुर्घटना में मृत्यु होने की प्रायिकता से भी कम है अगर आप ठीक प्रकार से दौडें ।
अन्त में पिछले हफ़्ते ३० किमी वाली दौड के कुछ फ़ोटो, और उसके बाद आराम से पैर की मसाज करवाते समय के फ़ोटो :-)


लम्बी दौडों, साईकलिंग और लम्बी तैराकी में एक प्रक्रिया होती है जिसे "दीवार से टकराना कहते हैं" (Hitting the Wall) | दीवार से टकराने का वैज्ञानिक कारण है । आपका शरीर ग्लूकोज को ग्लाईकोजन के रूप में सहेज कर रखता है, इसके अलावा आपके शरीर में वसा भी एकत्रित रहती है जो भी ऊर्जा का एक स्रोत है । जब आप कोई शारीरिक श्रम करते हैं तो उस श्रम को करने के लिये ऊर्जा ग्लाईकोजन अथवा वसा से प्राप्त होती है । वसा को ऊर्जा में बदलने की क्रिया बहुत धीमी और क्लिष्ट (Complex) होती है । इसके विपरीत ग्लाईकोजन बडी आसानी से ग्लूकोज में परिवर्तित होता है और तुरन्त ऊर्जा में बदला जा सकता है । इसका सीधा अर्थ हुआ की दौडने की अवस्था में जब शरीर के ऊतकों को तेजी से ऊर्जा की आवश्यकता होती है, आप ग्लाईकोजन पर निर्भर रहते हैं ।
ये सब तो ठीक हुआ लेकिन इ
सका दीवार से टकराने का क्या सम्बन्ध ? समस्या है कि हमारा शरीर केवल २००० किलो कैलोरी ही ग्लाईकोजन के रूप में संचित कर पाता है । दौडते समय इस २००० किलो कैलोरी को आप (वजन के हिसाब से) १७ मील से २० मील की दूरी में खर्च कर देते हैं । उसके बाद आपके शरीर में अचानक बदलाव आता है । जहाँ आप १८ मील तक बडे आराम से दौड रहे होते हैं, ग्लाईकोजन का टैंक खत्म होते ही शरीर को वसा पर निर्भर होना पडता है और उस समय ऐसा महसूस होता है कि जैसे अचानक चलती कार पर किसी ने ब्रेक लगा दिये हों । कुछ स्थितियों में केवल २०-५० मीटर की दूरी में ही आप दौडने से रूककर पैदल चलने पर मजबूर हो जाते हैं । इस स्थिति को Hitting The Wall कहते हैं ।अब चूँकि मैराथन २६.२ मील की होती है, आखिरी ६-९ मील सबसे दूरूह होते हैं । कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि मैराथन में २० मील वार्म अप करने के लिये होते हैं और असली दौड आखिरी ६.२ मील की होती है । पिछले तीन हफ़्तों में मैने इस दीवार को स्वयं अनुभव किया । हमने २५ किमी (१५.६ मील) की एक दौड दौडी और हंसते हंसते इसे पूरा किया और लगा कि हम अब मैराथन के लिये पूरी तरह तैयार हैं । लेकिन उसके बाद २५ से ३६ किमी की दौडों में इस दीवार ने खूब छकाया । आज इस पोस्ट को लिखने से पहले सुबह ३६ किमी दौडकर आये हैं और ३० किमी के बाद ऐसा लगा कि अचानक पैरों पर कोई डंडे से जोर जोर से पिटाई करने लगा हो ।
चलिये ये सब तो ठीक है लेकिन इस दुष्ट दीवार से बचा कैसे जाये ? इसका इलाज है कार्बो लोडिंग (Carb Loading) | आप ३० किमी से लम्बी दौड वाले हफ़्ते में वसा को कम करके Carbohydrate ज्यादा खायें और जमकर खायें । दौड शुरु होने से पहले Liquid Carbohydrate Drinks का सेवन करें क्योंकि दौड से तुरन्त पहले ठोस पदार्थ खाने का मतलब है दौड के दौरान पेट में हिमेश रेशमिया का संगीत
:-)
इसके अलावा हर ५ वें मील के दौरान Gu Gel का सेवन करें जिससे पूरी दौड में आपको अतिरिक्त ५००-६०० किलो कैलोरी ग्लाईकोजन की आपूर्ति हो सके । और फ़िर आखिरी ३-४ मील अल्लाह/राम/जीजस जिसको भी आप मानते हों कि भरोसे छोड दें ।
सागर भाईजी ने पूछा था कि मैं इस दौड को जीतूँगा तो मुझे क्या ईनाम मिलेगा, तो इसके चलते मैराथन से सम्बन्धित कुछ मजेदार बाते बतायी जायें ।
१) मैं अपनी जिन्दगी में कभी भी मैराथन नहीं जीत सकता । जो धावक मैराथन जीतते हैं उनमें कुछ जन्मजात गुण होते हैं और वो इसकी ट्रेनिंग एक Profession समझ कर करते हैं । इसके विपरीत मैराथन दौडना मेरी रूचि है ।
२) हर मैराथन दौडने वाले के मन में तीन समय होते हैं । पहला समय जो वो सबको बताता है, मेरे लिये ये ३ घंटा ४० मिनट होगा । ये समय वो होता है कि अगर दौड के दौरान थोडी गडबड भी हो जाये तो भी निकल पाये । दूसरा समय होता है जिससे वो सन्तुष्ट होगा लेकिन खुश नहीं, मसलन अगर सब कुछ गडबड हो जाये फ़िर भी कम से कम इस समय में दौड पूरी हो जाये । मेरे लिये ये ४ घंटे का समय होगा । तीसरा समय उसके खुद के लिये होता है, ये वो समय होता है कि अगर सारे सितारे साथ में हो और कोई चोट, खिंचाव, दर्द न उठे तो इस समय में दौड पूरी हो । आमतौर पर ये सीक्रेट होता है क्योंकि जरा सी भी गडबड होने पर ये तुरन्त हाथ से रेत की तरह फ़िसलता जाता है । मेरे लिये ये समय ३ घंटा २८ मिनट से ३ घंटा ३० मिनट के बीच होगा ।
३) अब आपके समय के हिसाब से मैराथन में आपकी श्रेणी इस प्रकार की होती है । अब आप खुद ही देख लें हम कहाँ खडे हैं ।
2:30 or under = Elite runner
2:30-3:00 = Still very fast, would win most smaller marathon
3:00-3:30 = Strong time, top 10-15% of most marathons
3:30-4:00 = Top २0-40% of field
4:00-4:30 = Middle of the pack
4:30-5:00 = Bottom third
5:00 + = Back of the pack
जो भी मैराथन दौडने का संकल्प लेते हैं उनको मैं बहुत इज्जत की नजर से देखता हूँ । जो भी इसको समाप्त करते हैं भले ही इसमें कितना भी समय लगे, उनको मेरा सलाम । कारण है कि अगर आप ३:३० से कम समय में इसको पूरा करते हैं तो आपमें क्षमता है और दौड आपको मुबारक । लेकिन अगर आप इसको ५-६ घंटे में पूरा कर रहे हैं, इसका अर्थ है कि आप केवल अपनी ट्रेनिंग और इच्छाशक्ति के बल पर इस पूरा कर रहे हैं जो बहुत मुश्किल है । क्योंकि किसी भी मैराथन को सिर्फ़ पूरा करने के लिये कम से कम ५ महीने की सम्पूर्ण निष्ठावान ट्रेनिंग चाहिये । जिसमें आप हर हफ़्ते २५-४० मील दौडें और जब आप धीमा दौड रहे हों तो इसको जारी रखना बहुत मुश्किल है जब लोग आसानी से आपसे आगे निकले जा रहे हों ।
लेकिन लोग कहते हैं किसी भी लम्बी दौड को पूरा करने के बाद की स्थिति जिसे Runners High कहते हैं, वो किसी भी नशे से हासिल नहीं की जा सकती है । इसके लिये तो कष्ट करना ही पडेगा, :-)
अन्त में कुछ रोचक तथ्य:
१) मैराथन की उत्पत्ति ग्रीक सभ्यता से जुडी हुयी है जब एक धावक मैराथन के युद्ध में विजय की सूचना लेकर बिना रूके दौडते हुये गया था और सूचना देते ही गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुआ था ।
२) माडर्न मैराथन १८९६ से प्रारम्भ हुयी हैं जिसमे काफ़ी समय तक दूरी निश्चित नहीं थी ।
३) १९०८ लंदन ओलम्पिक में २६.२ मील की दूरी तय हुयी थी । इस अजीब सी २६.२ मील का दूरी इसलिये जिससे दौड शाही महल के सामने खत्म हो सके ।
४) १९१२ के बाद से हम मैराथन २६.२ मील अथवा ४२.१९५ किमी की होती है । लेकिन भीड और दांये/बांये चलने के कारण आप एक सीधी रेखा में नहीं दौड पाते और लगभग २६.४ मील तक दौडते हैं ।
५) एक मैराथन में आप लगभग 65,000-70,000 कदम दौडते हैं ।
६) Elite Marathoners को छोडकर लगभग बाकी लोग अपनी ट्रेनिंग में अधिकतम २२-२४ मील ही दौडते हैं और २६.२ लगातार पूरी ट्रेनिंग में एक ही बार यानि दौड वाले दिन दौडते हैं । इस लिहाज से दौड आपकी ट्रेनिंग का कठिनतम दिन होता है ।
७) मैराथन में अगर आप ठीक ढंग से पानी न पियें अथवा बहुत अधिक पानी पियें तो Under-hydration/Over-hydration से किसी किसी स्थिति में मृत्यु तक हो सकती है । इसके अलावा अगर आपका हृदय कमजोर है तो भी ये आपके लिये खतरनाक हो सकती है, लेकिन मैराथन में मृत्यु होने की प्रायिकता घर के बाहर बिजली गिरने से होनी वाली प्रायिकता अथवा सडक दुर्घटना में मृत्यु होने की प्रायिकता से भी कम है अगर आप ठीक प्रकार से दौडें ।
अन्त में पिछले हफ़्ते ३० किमी वाली दौड के कुछ फ़ोटो, और उसके बाद आराम से पैर की मसाज करवाते समय के फ़ोटो :-)


गुरुवार, दिसंबर 18, 2008
अमर सिंह का अमरीका को दिया चंदा और भांग एट गंगा तट . काम
बराक ओबामा की हिलेरी क्लिंटन को सेकेट्री आफ़ स्टेट (Secretary of State) बनाने की शर्त थी कि बिल क्लिंटन अपनी फ़ाउंडेशन को चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक करेंगे । आज न्य़ूयार्क टाईम्स की खबर ने इन चंदा देने वालों के नाम बताये हैं, मेरी नजर खबर के इन खास हिस्सों पर गयी ।
The potential for foreign donors to the Clinton foundation to create the appearance of conflicts of interest for Mrs. Clinton as she handles foreign policy matters was illustrated by Amar Singh, listed as giving between $1 million and $5 million. Mr. Singh is apparently a prominent Indian politician of that same name.
In September, Mr. Singh visited Washington to lobby Congress to support a deal allowing India to obtain civilian nuclear fuel and technology from the United States. The deal was controversial because India has developed nuclear weapons but is not a party to the Nuclear Non-Proliferation Treaty.
Mr. Singh met and posed for photographs with Mrs. Clinton, afterwards telling Indian reporters that Mrs. Clinton had assured him that Democrats would not block the deal. Congress approved the nuclear cooperation deal with India a few days later.
अब तो अमरसिंह जी को लोग गाली देना बन्द करें । वे तो महान ग्लोबल जनसेवक हैं जो पूरी दुनिया में धर्म के काम में लगे हुये हैं ।
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दूसरी खबर:
अंकुर श्रीवास्तव मेरे मित्र हैं और मेरे अपार्टमेंट में ही रहते हैं । अंकुर इलाहाबाद के मूल निवासी हैं । भविष्य में अंकुर और हम मिल कर एक प्रोजेक्ट
शुरु करने का भी सोच रहे हैं । प्रोजेक्ट का नाम है भांग एट गंगा तट . काम । ये प्रोजेक्ट व्यस्त प्रोफ़ेशनल्स के लिये डी-स्ट्रेसिंग रिट्रीट (De-Stressing retreat) जैसा होगा । जिसमें वो इलाहाबाद के गंगा तट पर हमारी कम्पनी के गेस्ट हाऊस में आराम से बैठकर भांग का मजा ले सकते हैं (मैने कभी भांग का सेवन नहीं किया लेकिन अंकुर की बात पर भरोसा करके इस बार भारत यात्रा पर इसका पूरा लुत्फ़ उठाने का इरादा है ) । भांग के साथ, आध्यात्मिक सेमिनार, काशी के अस्सी का पाठ आदि भी आयोजित कराया जायेगा । आप केवल $२,००० डालर देकर हमारी संस्था के जीवन पर्यन्त सदस्य बन सकते हैं । सदस्यता के लिये हमसे सम्पर्क करें ।
The potential for foreign donors to the Clinton foundation to create the appearance of conflicts of interest for Mrs. Clinton as she handles foreign policy matters was illustrated by Amar Singh, listed as giving between $1 million and $5 million. Mr. Singh is apparently a prominent Indian politician of that same name.
In September, Mr. Singh visited Washington to lobby Congress to support a deal allowing India to obtain civilian nuclear fuel and technology from the United States. The deal was controversial because India has developed nuclear weapons but is not a party to the Nuclear Non-Proliferation Treaty.
Mr. Singh met and posed for photographs with Mrs. Clinton, afterwards telling Indian reporters that Mrs. Clinton had assured him that Democrats would not block the deal. Congress approved the nuclear cooperation deal with India a few days later.
अब तो अमरसिंह जी को लोग गाली देना बन्द करें । वे तो महान ग्लोबल जनसेवक हैं जो पूरी दुनिया में धर्म के काम में लगे हुये हैं ।
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दूसरी खबर:
अंकुर श्रीवास्तव मेरे मित्र हैं और मेरे अपार्टमेंट में ही रहते हैं । अंकुर इलाहाबाद के मूल निवासी हैं । भविष्य में अंकुर और हम मिल कर एक प्रोजेक्ट
शुरु करने का भी सोच रहे हैं । प्रोजेक्ट का नाम है भांग एट गंगा तट . काम । ये प्रोजेक्ट व्यस्त प्रोफ़ेशनल्स के लिये डी-स्ट्रेसिंग रिट्रीट (De-Stressing retreat) जैसा होगा । जिसमें वो इलाहाबाद के गंगा तट पर हमारी कम्पनी के गेस्ट हाऊस में आराम से बैठकर भांग का मजा ले सकते हैं (मैने कभी भांग का सेवन नहीं किया लेकिन अंकुर की बात पर भरोसा करके इस बार भारत यात्रा पर इसका पूरा लुत्फ़ उठाने का इरादा है ) । भांग के साथ, आध्यात्मिक सेमिनार, काशी के अस्सी का पाठ आदि भी आयोजित कराया जायेगा । आप केवल $२,००० डालर देकर हमारी संस्था के जीवन पर्यन्त सदस्य बन सकते हैं । सदस्यता के लिये हमसे सम्पर्क करें ।
शनिवार, दिसंबर 13, 2008
शिवोहम शिवोहम...आदि शंकराचार्य द्वारा रचित पद पं जसराज की आवाज में
इस पोस्ट को लिखने में बडी अडचन है । जहाँ १५-२० सेकेंड्स में पढने में पोस्ट निपट जाती है वहाँ किसी से २८ मिनट मांगना कहाँ उचित है । लेकिन क्या करें, भारतीय शास्त्रीय संगीत के समुन्दर में डूब कर आनन्द लेने के लिये इतना समय तो देना ही होगा । वरना लोग तो वो भी हैं जो ७ मिनट की द्रुत बंदिश में भी आलाप को फ़ास्ट फ़ारवर्ड कर देते हैं :-)
लेकिन जो सुन न सकें वो पढकर ही आनन्द ले लें । इस "पद" को आदि शंकराचार्य ने अपने "अद्वैत/Non-duality" के दर्शन के अनुरूप रचा था । इसको पंडित जसराज की आवाज में सुने और अनुभव करें । इस "पद" को पंडित जसराज ने रागों के राजा राग दरबारी में गाया है ।
जिनके पास समय इफ़रात में है वो यहाँ क्लिक करें और डायमंड पैकेज का आनन्द लें,
अच्छा चलिये, जिनके पास समय की कमी है वो यहाँ क्लिक करें सिल्वर पैकेज,
जो बहुत ही व्यस्त हैं, वो केवल पढकर काम चला लें लेकिन हमसे नरक में मुलाकात हो तो हमें दोष न दीजियेगा :-)
Mano budhya ahankara chithaa ninaham,
Na cha srothra jihwe na cha graana nethrer,
Na cha vyoma bhoomir na thejo na vayu,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
Neither am I mind, nor intelligence,
Nor ego, nor thought,
Nor am I ears or the tongue or the nose or the eyes,
Nor am I earth or sky or air or the light,
But I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva.
Na cha praana samgno na vai pancha vaayur,
Na vaa saptha dhathur na va pancha kosa,
Na vak pani padam na chopa stha payu,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
Neither am I the movement due to life,
Nor am I the five airs, nor am I the seven elements,
Nor am I the five internal organs,
Nor am I voice or hands or feet or other organs,
But I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva
Na me dwesha raghou na me lobha mohou,
Madho naiva me naiva matsarya bhava,
Na dharmo na cha artha na kamo na moksha,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
I never do have enmity or friendship,
Neither do I have vigor nor feeling of competition,
Neither do I have assets, or money or passion or salvation,
But I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva
Na punyam na paapam na soukhyam na dukham,
Na manthro na theertham na veda na yagna,
Aham bhojanam naiva bhojyam na bhoktha,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
Never do I have good deeds or sins or pleasure or sorrow,
Neither do I have holy chants or holy water or holy books or fire sacrifice,
I am neither food nor the consumer who consumes food,
As I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva
Na mruthyur na sankha na me jathi bhedha,
Pitha naiva me naiva matha na janma,
Na bhandhur na mithram gurur naiva sishya,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
I do not have death or doubts or distinction of caste,
I do not have either father or mother or even birth,
And I do not have relations or friends or teacher or students,
As I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva
Aham nirvi kalpi nirakara roopi,
Vibhuthwascha sarvathra sarvendriyanaam,
Na cha sangatham naiva mukthir na meya
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
I am one without doubts, I am without form,
Due to knowledge I do not have any relation with my organs,
And I am always redeemed,
And I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva
लेकिन जो सुन न सकें वो पढकर ही आनन्द ले लें । इस "पद" को आदि शंकराचार्य ने अपने "अद्वैत/Non-duality" के दर्शन के अनुरूप रचा था । इसको पंडित जसराज की आवाज में सुने और अनुभव करें । इस "पद" को पंडित जसराज ने रागों के राजा राग दरबारी में गाया है ।
जिनके पास समय इफ़रात में है वो यहाँ क्लिक करें और डायमंड पैकेज का आनन्द लें,
अच्छा चलिये, जिनके पास समय की कमी है वो यहाँ क्लिक करें सिल्वर पैकेज,
जो बहुत ही व्यस्त हैं, वो केवल पढकर काम चला लें लेकिन हमसे नरक में मुलाकात हो तो हमें दोष न दीजियेगा :-)
Mano budhya ahankara chithaa ninaham,
Na cha srothra jihwe na cha graana nethrer,
Na cha vyoma bhoomir na thejo na vayu,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
Neither am I mind, nor intelligence,
Nor ego, nor thought,
Nor am I ears or the tongue or the nose or the eyes,
Nor am I earth or sky or air or the light,
But I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva.
Na cha praana samgno na vai pancha vaayur,
Na vaa saptha dhathur na va pancha kosa,
Na vak pani padam na chopa stha payu,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
Neither am I the movement due to life,
Nor am I the five airs, nor am I the seven elements,
Nor am I the five internal organs,
Nor am I voice or hands or feet or other organs,
But I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva
Na me dwesha raghou na me lobha mohou,
Madho naiva me naiva matsarya bhava,
Na dharmo na cha artha na kamo na moksha,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
I never do have enmity or friendship,
Neither do I have vigor nor feeling of competition,
Neither do I have assets, or money or passion or salvation,
But I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva
Na punyam na paapam na soukhyam na dukham,
Na manthro na theertham na veda na yagna,
Aham bhojanam naiva bhojyam na bhoktha,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
Never do I have good deeds or sins or pleasure or sorrow,
Neither do I have holy chants or holy water or holy books or fire sacrifice,
I am neither food nor the consumer who consumes food,
As I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva
Na mruthyur na sankha na me jathi bhedha,
Pitha naiva me naiva matha na janma,
Na bhandhur na mithram gurur naiva sishya,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
I do not have death or doubts or distinction of caste,
I do not have either father or mother or even birth,
And I do not have relations or friends or teacher or students,
As I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva
Aham nirvi kalpi nirakara roopi,
Vibhuthwascha sarvathra sarvendriyanaam,
Na cha sangatham naiva mukthir na meya
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.
I am one without doubts, I am without form,
Due to knowledge I do not have any relation with my organs,
And I am always redeemed,
And I am Shiva the all pervading happiness,
Yes, I am definitely Shiva
पं रविशंकरजी का बजाया हुआ एक टुकडा
आज पूरा दिन संगीत सुनने में बिताया कितने ही गीत और बंदिश जो महीनों से नहीं सुने थे अपनी हार्ड डिस्क पर खोज खोज कर सुने और मन भरकर आनन्द लिया । आपको आनन्दमय करने के लिये पेश-ए-खिदमत है पं रविशंकर जी का बजाया हुया द्रुत गत पर राग अडारिनि (ये बहुत कुछ राग खमज जैसा है), बाकी जिनके कान की तैयारी हो चुकी है वो फ़र्क बता पायेंगे । हम तो वही कह रहे हैं जो सीडी के कवर पर लिखा है ।
कान की तैयारी: कहा जाता है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखने में बहुत से घरानों में पहले आपको संगीत सुनाया जाता है जिसमें आप उसकी बारीकियों को पकडते हैं, इसके बाद जब आपका कान तैयार हो जाता है उसके बाद गाना/बजाना सिखाया जाता है । मैं अभी कुछ रागों को ही सुनकर पकड पाता हूँ बाकी के लिये सीडी का कवर देखना पडता है :-)
कान की तैयारी: कहा जाता है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखने में बहुत से घरानों में पहले आपको संगीत सुनाया जाता है जिसमें आप उसकी बारीकियों को पकडते हैं, इसके बाद जब आपका कान तैयार हो जाता है उसके बाद गाना/बजाना सिखाया जाता है । मैं अभी कुछ रागों को ही सुनकर पकड पाता हूँ बाकी के लिये सीडी का कवर देखना पडता है :-)
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