१) हम जून में उसके साथ मिशीगन तक टैक्सी चालक की हैसियत से उसके साथ चलेंगे और उसके बाद वायुयान द्वारा वापिस ह्यूस्टन आ जायेगें ।
२) सितम्बर में हम वायुयान से दोबारा मिशीगन जायेंगे और पुन: टैक्सीगिरी करते हुये वापिस ह्यूस्टन आयेगें ।
३) इस यात्रा के दौरान हमें भोजन भत्ता और रात में विश्राम करने के लिये होटल भत्ता दिया जायेगा ।
४) इस दौरान हुयी किसी अप्रिय घटना के जिम्मेवार हम स्वयं होंगे (इसकी जानकारी आगे दी जायेगी) ।
ह्यूस्टन से मिशीगन के रास्ते का नक्शा:

वापिसी के समय सोच विचार कर दूसरा रास्ता चुना गया जिससे कि यात्रा का रोमांच बना रहे एवं कुछ नये प्रदेशों के दर्शन का मौका मिले । वापिसी का रास्ता नीचे दिये मानचित्र में अंकित है ।
मिशीगन से ह्यूस्टन वापसी के रास्ते का नक्शा (साथ में जाने का रास्ता भी दिखाया गया है ):

संक्षेप में यात्रा के मुख्य बिन्दु:
१) आना और जाना मिलाकर हमने लगभग ३२०० मील की दूरी तय की ।
२) इस पूरी यात्रा में केवल एक बार पुलिस ने हमें (मुझे) तेज गाडी चलाते हुये पकडा । इसके लिये मुझे $१३० का जुर्माना देना पडा ।
३) रास्ते में दूसरे दिन का पडाव डेटन (Dayton, Ohio) शहर था । हवाईजहाज का आविष्कार करने वाले राइट बन्धु डेटन शहर के ही रहने वाले थे । हमने वहाँ रूक कर राइट बन्धुओं को समर्पित एक संग्रहालय में थोडा समय बिताया ।
३) हमारी मंजिल (मिडलैंड, मिशीगन) आशा से भी छोटा कस्बा (गाँव) निकला । वहाँ पर Dow Chemical के अलावा और कुछ भी नहीं था । ह्यूस्टन जैसे विराट शहर (अमेरिका के चौथे सबसे बडे नगर) में रहने के बाद इतने छोटे कस्बे को देखना अच्छा लगा ।
४) हमारी वापिसी की यात्रा के दौरान हम अमेरिका के मध्य-पश्चिमी इलाके से गुजरे । अमेरिका का ये इलाका बिल्कुल सपाट है और दूर दूर तक केवल मक्के के खेत नजर आते हैं । ये इलाका बाईबल बैल्ट के नाम से भी जाना जाता है ।
संक्षेप में सिर्फ़ इतना ही, कुछ दिनों में मौका लगा तो थोडा विस्तार में कुछ चटपटे अनुभवों को लिखूँगा । जब हम पिछली बार यात्रा पर गये थे तो उसी समय नारद पर बजार के एक चिट्ठे को लेकर बवाल हो गया था, इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ, अच्छी बात है :-)
वैसे आजकल ज्ञानदत्तजी वजन को लेकर काफ़ी हल्ला मचा रहे हैं । उन्हे ज्ञात रहे कि युवा अगरबत्ती संघ इस बात को लेकर मानहानि का दावा कर सकता है :-)
अन्त में एक संयोग वाली बात:
अपनी कार यात्रा के दौरान मैं "अजनबी शहर में अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे" को कार में बैठकर अपने लैपटाप पर सुन रहा था । वापिस लौटने पर पाया कि इसी गीत का जिक्र युनुसजी ने अपने चिट्ठे पर उसी दिन किया था । है न बिल्कुल संयोग की बात ?
उसी प्रविष्टी में युनुस जी ने एक और गाने का भी जिक्र किया था, "जिनसे हम छूट गये अब वो जहाँ कैसे हैं"
ये गीत अभी कुछ साल पहले "पैगाम-ए-मोहब्बत" नाम से जारी हुये एल्बम में था । इस एल्बम में भारत और पाकिस्तान के कलाकारों ने मिलकर गीत गाये थे । अपनी इस प्रविष्टी के अंत में मैं आपको इसी एल्बम की सबसे पहली नज्म सुनवा रहा हूँ :
गुलाम तुम भी थे यारों, गुलाम हम भी थे
नहा के खून में आयी थी फ़स्ले-आजादी ।
मजा तो तब था कि मिलकर इलाज-ए-जाँ करते,
खुद अपने हाथ से तामीर-ए-गुलसिताँ करते ।
हमारे दर्द में तुम और तुम्हारे दर्द में हम शरीक होते,
तो जश्ने आशियाँ करते ।
तुम आओ गुलशने लाहौर से चमन बरदोश,
हम आयें सुबह बनारस की रोशनी लेकर,
हिमालय की हवाओं की ताजगी लेकर,
और उसके बाद ये पूछें कौन दुश्मन है ?
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