जब मैं भारत में था (जुलाई २००४ तक) तो कभी मोबाईल फ़ोन का इस्तेमाल नहीं किया था । कभी इसकी जरूरत ही महसूस नहीं हुयी और न ही जेब में इतने पैसे थे कि इसका खर्चा उठा सकते । उसके बाद अगस्त में ह्यूस्टन के राईस विश्वविद्यालय में आये तो भी घर में एक लैंड लाईन लगवाने के बाद काम चल ही रहा था लेकिन थोडी असुविधा जरूर थी । शुरू शुरू में एक दो फ़ोन कम्पनियों से कहा कि भैया एक ठो मोबाईल दे दो तो बोले तुम इस देश में नये नये आये हो और तुमने कभी यहाँ पर उधार नहीं लिया है इससे तुम्हारी नीयत का कोई भरोसा नहीं है । लिहाजा हम तुम्हे पोस्ट पेड फ़ोन तो तब ही देंगे जब ५०० डालर नकद जमा करोगे । प्रीपेड लेने से हमने इंकार कर दिया, चूँकि खुद इनकी सरकार ने हमपे भरोसा करके अपने शोध का जिम्मा हमें सौंपा और इन नालायकों को हमारी नीयत पर ही भरोसा नहीं ।
खैर दिन कटते रहे और एक दिन स्कूल में एक मोबाईल कम्पनी वालों ने अपना तम्बू लगाया और कहा कि हम १२५ डालर जमा करने पर फ़ोन दे देंगे । उन्होने ये भी कहा कि हमारी नीयत पर पूरा भरोसा है लेकिन ससुरे पेपर वर्क के चक्कर में १२५ ले रहे हैं और वो भी सूद समेत ६ महीने के बाद लौटा देंगे । हमारे दोस्त ने कहा अब सब्र भी करो और दे दो १२५ डालर । तो प्यारे साथियों जनवरी २००५ में पहली बार हमने भी मोबाईल ले लिया । इसी के साथ अमेरिका के मोबाईल के कुछ अलग ढंग भी पता चले । ध्वनि संदेश (व्याईस मेल) से पहली बार वास्ता पडा, फ़ोन मिलाओ और अगर बन्दा फ़ोन न उठाये तो उसके ध्वनि संदेश के बाद अपना संदेश रेकार्ड कर दो । हमने भी पहली बार अपनी आवाज में संदेश रेकार्ड किया (Hi, This is Neeraj. I am unable to take your call right now but if you will leave your name, number and a brief message I will get back to you as soon as possible). ये भी पता चला कि मोबाईल शिष्टाचार के मुताबिक अगर कोई आपको ध्वनि संदेश छोडे तो उसको वापिस काल करने की जिम्मेवारी आपकी होती है ।
मेरे पिताजी एक बार बडे नाराज हुये, उन्होने मेरी आवाज सुनी और सोचा फ़ोन लग गया है और मुझे डांटना शुरू कर दिया :-) बाद में पता चला तो खूब हंसे । ये भी पता चला कि यहाँ हर महीने एक नियत मिनट (मेरे वाले प्लान में ४०० मिनट) मिलते हैं । फ़ोन मिलाने और उठाने दोनो में मिनट कटते हैं लेकिन शाम को ७ बजे के बाद से सुबह ७ बजे तक और शनिवार और रविवार को मिनट नहीं कटते हैं । मेरे तो बमुश्किल १५० मिनट खर्च हो पाते थे और हर महीने २५० मिनट बेकार चले जाते थे । मेरे पास जो मोबाईल फ़ोन था वो बडा सी सादा सा था और पाषाणकालीन लगता था, उसमें फ़ोटो, इंटरनेट आदि की रंगबाजी भी नहीं थी । ये रहा उसका फ़ोटो:
अब जल्दी से तीन साल आगे बढाते हैं और अचानक से हमने एक धांसू और चांपू सा फ़ोन लेने का निश्चय कर लिया । हमने नया फ़ोन लिया मोटोरोला Q9C, इसका फ़ोटो भी हाजिर है । ये फ़ोन तो एकदम जादू का पिटारा था, फ़ोन के साथ साथ इंटरनेट का तेज रफ़्तार कनेक्शन, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS), लाईव सर्च, टाईप करने के लिये बढिया की बोर्ड । ये नहीं कि "S" टाईप करना हो तो एक ही बटन को ४ बार दबाओ । खाने खाने जाना हो, तो फ़ोन को आदेश करो कि मैक्सिकन रेस्तरां खोजो और ३ मील के अन्दर के सभी रेस्तरां हाजिर । फ़िर बोलो कि हम जहाँ खडे हैं वहाँ से इस जगह जाने का रास्ता बताओ तो GPS की मदद से टर्न बाई टर्न निर्देश मिल जाते थे । सबसे मस्त लगता था कि पार्किंग लाट से अपनी लैब तक आते आते मैं १५-२० चिट्ठे पढ डालता था । आऊटलुक से मेरी ईमेल पलक झपकते मिल जाती थी । कुल मिला कर ये फ़ोन मेरी महबूबा बन गया था ।
लेकिन हर खुशी की उम्र छोटी ही होती है । ९ जुलाई की रात को हमारे युनिवर्सिटी के स्टूडेंट पब में मित्र लोगों के साथ बैठकर बीयर की चुस्कियों के साथ शतरंज खेलते हुये अचानक फ़ोन पर बात करने के बाद मैने फ़ोन को जेब में रखने की बजाय मेज पर रख दिया और दस मिनट बाद उसकी सुध ली तो वो वहाँ से गायब था । बडा दुख हुआ, फ़ोन खोने से बडा दुख इस बात का हुआ कि स्टूडेंट पब से फ़ोन चोरी हुआ हांलाकि उसमें कभी कभी स्कूल से बाहर के लोग भी आते हैं । इससे हमने सोचा कि घोर कलयुग आ गया है । अब बताईये शराबियों का भरोसा नहीं कर सकते तो आप आम लोगों की बात तो छोड ही दीजिये ।
हमने २ दिन तक इन्तजार किया कि शायद कोई तरस खाकर फ़ोन वापिस कर दे लेकिन ऐसा नहीं हुआ । मन मसोसकर अपने कमरे के एक कोने के कबाडे में उपेक्षित से पडे पुराने नोकिया वाले फ़ोन को झाड पोंछकर चमकाया और चालू किया । जब तक नया फ़ोन खरीदने के पैसे इकट्ठे न हों जाये, पुराने फ़ोन को ही कलेजे से लगाये रखना पडेगा ।
आज हम सब के मित्र और प्यारे सागर चन्द नाहर जी का जन्मदिवस है | सागर भाईजी के संगीत ज्ञान और उनके सरल स्वभाव के बारे में कुछ भी लिखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनके बारे में सब लोग जानते हैं | उनसे जो भी एक बार बात कर ले उनके सरल स्वभाव से प्रभावित हुये बिना नहीं रहता |
हम सब की ओर से सागर भाईसाहब को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें |
आज आप सब "वडाली बंधुओं" की आवाज में "तेरे इश्क ने नचाया" सुनिये | पंजाबी संगीत की जब बात होती है तो आजकल केवल कमर मटकाते गीत ही सुनाई देते हैं लेकिन पंजाबी संगीत बहुत समृद्ध है | इसी पंजाबी संगीत में बुल्ले शाह की "हीर" भी है जिसे फ़िर कभी सुनवायेंगे |
फिलहाल आपसे गुजारिश है अपने १० मिनट अलग निकाल कर पूरे मन से इस गीत को सुने और महसूस करें |
राजकुमार संतोषी की फ़िल्म घातक १९९७ में आयी थी । इस फ़िल्म के दो मधुर गीतों का संगीत राहुल देव बर्मन ने दिया था और अन्य गीतों का चलताऊ गीतों का संगीत अपने अन्नु मलिक ने दिया था । आज आप सुनिये सुरेश वाडेकर और साधना सरगम की आवाज में एक बहुत प्यारा सा युगल गीत । ९० के दशक में ऐसा गीत सुनना अपने आप में बडा सुखद था (इससे साबित होता है कि लडकपन से ही हमें अच्छे संगीत की परख थी :-) ) । वो अलग गीत हुआ करते थे जो लगभग ६:३० मिनट लम्बे होते थे और चार अन्तरे होने के बाद भी उनकी मधुरता बनी रहती थी ।
इस मधुर गीत को सुनने के बाद अपने सनी देओल की आवाज में घातक के दो घातक से डायलाग, पता नही जब मैं इन डायलाग को अपलोड कर रहा था को अपने भुवनेश शर्मा जी की याद आ रही थी । तो ये डायलाग खास भुवनेश जी के लिये :-)
आज मैं पाडकास्टिंग के क्षेत्र में अपना पहला प्रयास कर रहा हूँ । मुझे एक बहुत ही बढिया वेबसाईट मिली है जिसके द्वारा पाडकास्ट बनाना बेहद आसान है । बस एक नम्बर पर फ़ोन कीजिये और नंबर मिलने का बाद अपना पाडकास्ट रेकार्ड करना शुरू कर दीजिये । पाडकास्ट पूरा होने के बाद उस वेबसाईट पर जाईये और अपने पाडकास्ट की mp3 फ़ाईल सहेज लीजिये । वेबसाईट का नाम है www.gcast.com | लेकिन वेबसाईट का नम्बर अमेरिका का है इसीलिये भारत से काल करके पाडकास्ट बनाना बेहद मंहगा होगा लेकिन अमेरिका/कनाडा में रहने वाले ब्लागर बंधु इसका खूब फ़ायदा उठा सकते हैं ।
मैं श्रीलाल शुक्लजी की कालजयी रचना राग दरबारी के एक प्रसंग का आडियो प्रस्तुत कर रहा हूँ । अगले प्रयास में आडियो को और बेहतर बनाने का प्रयास करूँगा । लेकिन इस पाडकास्ट को बनाते बनाते अपने बचपन और कालेज के दिनों की याद आ गयी जब विभिन्न हिन्दी प्रतियोगिताओं में मैं खूब ईनाम जीता करता था ।
आपकी सेवा में प्रस्तुत है पाडकास्टिंग में मेरा पहला प्रयास :-)
मेरी आज की पोस्ट आलोक पुराणिकजी की पोस्ट से प्रेरित है । उन्होनें अपनी पोस्ट में भारत के परिपेक्ष्य में तेल के बढते दामों की विवेचना की है (और ये व्यंग नहीं है ) ।
ये लेख थोडा लम्बा अवश्य है लेकिन प्रयास करके इसे पूरा पढें और अपनी राय से अवगत करायें कि इसे आगे चालू रखा जाये कि नहीं
जब मैने पहली कडी लिखी थी तब कच्चे तेल का दाम ~१२० डालर प्रति बैरल था और इस समय पोस्ट लिखते समय कच्चे तेल का दाम लगभग ~१३२ डालर प्रति बैरल है । इस सीधा मतलब है कि २२ दिनों में कच्चे तेल में १० प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है । आज इसकी कोई गारंटी नहीं ले सकता कि अगले २ महीने में इसका दाम १५० डालर प्रति बैरल नहीं पंहुच जायेगा । भारत में अगर मीडिया की बात मानी जाये तो पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि सम्भावित है । अमेरिका में इसका प्रभाव दिख ही रहा है । चुनाव समीप है और दोनो राजनैतिक पार्टियाँ तेल कम्पनियों को गरियाने पर तुली हैं । उनके कुछ तर्क ठीक हैं और कुछ तर्क कुछ उस प्रकार के कि अगर पानी में से बिजली निकाल ली तो किसानों के लिये क्या बचेगा...:)
एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि कच्चे तेल के दामों को कौन नियन्त्रित करता है ? क्या तेल कम्पनियाँ सीधे रूप से तेल के दामों को नियन्त्रित करती हैं? अगर तेल कम्पनियाँ नहीं तो फ़िर क्या बिचौलिये और दलाल तेल के दामों निर्धारित करते हैं । तेल की पिछले दो महीने की तेजी देखी जाये तो ये मूल रूप से आपूर्ति-खपत और बिचौलियों/ट्रेडर्स के व्यवहार से सम्बन्धित है । आपूर्ति की बात बाद में करेंगे, पहले बिचौलियों/ट्रेडर्स के व्यवहार पर ध्यान देते हैं ।
जिस प्रकार आप सोना, डालर, रूपया, शेयर बाजार आदि में पैसे का निवेश करते हैं, उसी प्रकार बहुत से ट्रेडर्स कच्चे तेल में पैसा निवेश करते हैं । कच्चे तेल में निवेश आम तौर पर शार्ट-टर्म (कम अवधि वाला) होता है । जब जब आपूर्ति में थोडी सी भी कमी महसूस की जाती है, ट्रेडर्स जानते हैं कि कच्चे तेल के दाम बढेंगे और वो फ़टाफ़ट तेल में निवेश आरम्भ कर देते हैं । ऐसा करने से बाजार में एक असुरक्षा का माहौल बनता है और तेल के दाम तेजी से चढते हैं । ऐसी स्थिति में अगर तेल कम्पनियाँ (ओपेक OPEC और अन्य प्राईवेट कम्पनियाँ Shell, Exxon Mobil, BP, Chevron, Connocco Phillips, PetroBras, PEMEX आदि) तेल की आपूर्ति बनाये रखती हैं तो बाजार संभला रहता है । परन्तु आपूर्ति में जरा सी भी कमी अथवा नाईजीरिया की तेल पाईप में विस्फ़ोट, OPEC वालों का ऊँचे लहजे में कोई संवाद आदि कोई भी घटक बाजार को गिरा सकते हैं ।
इस हफ़्ते हमने देखा कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने सऊदी अरब से उत्पादन बढाने की गुजारिश की जिसे सऊदी अरब ने तुरन्त ठुकरा दिया । इससे अमेरिका का खासी फ़जीहत भी हुयी और तेल के दाम भी नहीं गिरे । एक और नयी बात ये हुयी कि अमेरिका की संसद ने अमेरिकी न्यायिक विभाग (American Justice Department) को OPEC पर मुकदमा चलाने की ताकत प्रदान की है । महत्वपूर्ण बात है कि अभी साफ़ नहीं है कि ये मुकदमा किन स्थितियों में चलाया जा सकता है । इसके बारे में अन्य जानकारी का इन्तजार है, लेकिन फ़िलहाल ऐसा कोई मुकदमा दूर दूर तक नहीं देख रहा है लिहाजा ये मात्र एक कूटनीतिक कदम है । तेल की मंहगी कीमतों के बावजूद तेल कम्पनियों की रेकार्ड कमाई सभी की आंखो में किरकिरी बनी हुयी है । पिछले हफ़्ते वाशिंगटन में एक संसद समिति ने अमेरिका की छ: प्रमुख तेल कम्पनियों के अधिकारियों की खिंचाई की थी । Shell के प्रमुख ने कहा कि उनकी कम्पनी तेल के ६०-८० डालर के दाम पर भी मुनाफ़ा कमा सकती है । उन्होने ये भी कहा कि वो हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि तेल का दाम न बढे परन्तु जब तक स्वयं अमेरिका में तेल का उत्पादन नहीं बढाया जाता, तेल के दामों को नियन्त्रित करना बहुत कठिन है ।
अब आपूर्ति की बात करते हैं । पिछले लेख में हमने पढा था कि वैज्ञानिक अनुमानों से तेल की कमी नहीं है । परन्तु तेल के उपस्थित होने (In principle) और उसकी आपूर्ति दो अलग अलग बाते हैं । तेल कम्पनियाँ बहुत आक्रामक रूप से नये वैज्ञानिकों और इन्जीनियरों को भर्ती करने की फ़िराक में हैं लेकिन फ़िर भी हर कम्पनी अच्छे लोगों की कमी का रोना रो रही है । पुरानी तकनीक अब पुरानी पड रही है और नयी तकनीक विकसित होने में समय लेती है । अमेरिका के परिपेक्ष्य में बात की जाये तो अलास्का और कैलीफ़ोर्निया के तट पर तेल के उत्पादन पर रोक लगी हुयी है । पर्यावरणविद कहते हैं कि दोनों ही स्थानों पर तेल निकालने से पर्यावरण को भारी क्षति हो सकती है । लगभग ३०-३५ वर्ष पहले कैलीफ़ोर्निया के तट पर तेल उत्पादन का प्रयास हुआ था, लेकिन कुछ पर्यावरण समबन्धी समस्याओं के चलते वहाँ तेल उत्पादन पर ३० साल की पाबन्दी (Moratorium) लगा दी गयी थी । आज तेल कम्पनियों का दावा है कि वो बिना पर्यावरण को क्षति पँहुचाये वहाँ से तेल का उत्पादन कर सकते हैं लेकिन अमेरिका में नवन्बर में चुनाव आने वाले हैं और तब तक इस सम्बन्ध में कुछ भी तय हो पाना मुश्किल लगता है ।
अमेरिका में तेल का उत्पादन प्रारम्भ होने से भारत/चीन को अप्रत्यक्ष रूप से बहुत फ़ायदा होगा । तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिये अमेरिका में तेल का उत्पादन बढने अथवा गैर पारम्परिक स्रोतों पर अधिक ध्यान देने से तेल के दामों में काफ़ी कमी आ सकती है । ऐसा होने से भारत और चीन को इसका सीधा फ़ायदा मिलेगा ।
दूसरा पहलू: मुझे नहीं लगता कि तेल का दाम लान्ग-टर्म (Long-Term) में गिरने वाला है । मान लीजिये आपके घर में मिठाई बनाने का कारखाना है और आपके शहर में मिठाई की लत बढती जा रही है । ऐसे में रोज आपके घर के बाहर भीड लगती है और मिठाई दलालों के माध्यम से बाँटी जाती है । जैसे जैसे भीड बढती है आप मिठाई का दाम बढाते हैं । अगर आप एक साथ मिठाई का उत्पादन दो गुना कर दें तो लोग दो दिन की मिठाई एक साथ खरीद सकते हैं और अगले दिन भीड कम हो सकती है । लेकिन भीड कम होने से दलालों को मिठाई का दाम कम करना पड सकता है ।
ऐसे में दलाल आपसे कहते हैं कि तुम मिठाई का उत्पादन इस अनुपात में बढाओ कि झींगा-मुश्ती के बाद सबको मिठाई मिल जाये लेकिन आराम से न मिले । इससे लोग मिठाई भी खा लेंगे, तुमको भी खूब मुनाफ़ा होगा और हम भी ऐश करेंगे । लोग दाम बढने पर झल्लायेंगे, लेकिन फ़िर अपनी आदत से मजबूर होकर वापिस खरीदने आयेंगे। मुझे लगता है कि तेल के साथ भी ऐसा हो रहा है ।
Geology अथवा भूविज्ञान विज्ञान की चमक्कृत कर देने वाली शाखा है । इस शाखा से सम्बन्धित आज की कडी में हम "कान्टिनेंटल ड्रिफ़्ट" के बारे में जानेंगे ।
पहले मैं इस विषय पर केवल लेख लिखने के बारे में सोच रहा था लेकिन बाद में सोचा कि इस कहानी को चित्रों के माध्यम से सुनाया जाये तो अधिक रोचक रहेगी । Abraham Ortelius (1596), Francis Bacon (1620), Benjamin Franklin, Antonio Snider-Pellegrini (1858) नाम के विभिन्न विचारकों ने काफ़ी पहले सोचा था कि विभिन्न प्रायद्वीपों के एक साथ रखा जाये तो एक चित्र पहेली सी बनती है और ऐसी सम्भावना हो सकती है कि लाखों वर्ष पहले ये सभी प्रायद्वीप आपस में जुडे हुये हों ।
Alfred Wegener ने १९१२ में इस विषय पर गहन शोध किया और केवल द्वीपों की आकृति ही नहीं बल्कि विभिन्न चट्टानों और जीवाष्मों का अध्ययन करके Continental Drift का सिद्धान्त प्रस्तुत किया । वेगनर के अनुसार लगभग ३००० लाख वर्ष पहले सभी द्वीप आपस में जुडे हुये थे और धीरे धीरे ये द्वीप एक दूसरे से खिसकते चले गये । भारतीय द्वीप कुछ समय के लिये एक अलग द्वीप बना लेकिन कालान्तर में यूरेशिया द्वीप से टकरा गया और इस प्रकार महान हिमालय की पहाडों की रचना हुयी ।
वेगनर के सिद्धान्त को शुरूआत में वैज्ञानिकों ने अधिक महत्व नहीं दिया लेकिन इसके बावजूद वेगनर १९१०-१९३० तक अपने सिद्धान्त के पक्ष में तर्क एकत्र करते रहे । वेगनर अपने समकालीन वैज्ञानिकों को ये न समझा सके कि इतने विशालकाय द्वीप किस बल के कारण एक दूसरे से इतने दूर चले गये । वेगनर ने द्वीपों की गति के लिये दो विचार प्रस्तुत किये थे लेकिन ये दोनो ही विचार लगत थे । इसके कारण वेगनर के सिद्धान्त को लगभग १९५०-६० के आस पास ही वैज्ञानिकों की स्वीकृति मिल सकी ।
इसके बाद की कहानी आप चित्रों को देखें और खुद ही समझें :-)
चित्र १: अफ़्रीका और दक्षिणी अमेरिका एक दूसरे के साथ ऐसे फ़िट होते हैं जैसे किसी चित्र पहेली का भाग हों । इसके अलावा गुलाबी रंग से दर्शायी हुयी एक प्रकार की चट्टानों एवं भूसंरचना का अफ़्रीका और दक्षिणी अमेरिका में पाया जाना इस थ्योरी को अधिक बल प्रदान करती है ।
चित्र २: विभिन्न प्रायद्वीपों की लाखों वर्ष पहले की स्थिति
चित्र ३: एक एनिमेशन जिसके द्वारा आप देख सकते हैं कि समय के साथ विभिन्न प्रायद्वीप किस प्रकार अलग अलग हुये ।
इस चित्र में आप देख सकते हैं कि केवल चट्टाने ही नहीं बल्कि विभिन्न जीवों के जीवाश्म भी इस थ्योरी को बल प्रदान करते हैं ।
आज तो हद ही हो गयी, रोज लगभग ५०-१०० ईमेल आती रहती थीं तरह तरह के आफ़रों के साथ, ऐसे आफ़र जो सडक पर चादर बिछाकर रंग बिरंगी शीशी में जादुई दवाई बेचने वालों को भी मात कर दें । लेकिन हमने कुछ नहीं कहा । आज तो सब्र का इम्तिहान हो गया । लीजिये पढिये इसको...
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हिन्दी अनुवाद:
विषय: किसी क्लास और एक्जाम की जरूरत नहीं
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दो हफ़्ते में अपना पी.एच.डी. डिप्लोमा मंगाये, वो भी बिना क्लास और एक्जाम के । दुआ करते हैं कि पिताजी को ये खबर न हो जाये, वरना उनका शक कि बेटा एकदम नाकारा है विश्वास में बदल जायेगा ।
गया आज का दिन तो पानी में, इस मेल को भी सुबह सुबह ही आना था :-) बू हू हू.....
कोई दर्द को और न बढा दे, इसीलिये अपनी टिप्पणियों में इन बातों का ख्याल रखें :-)
चिट्ठाजगत कभी कभी मुझे अचंभित कर देता है । आज ही मैने "Peak Oil Panel Discussion" में भागीदारी की और आज ही अपने ज्ञानदत्त पाण्डेयजी ने तेल पर एक लेख लिख डाला । मैं इस पैनल डिस्कशन के बाद ऊर्जा और तेल पर लेखों की एक सीरीज लिखने के बारे में सोच रहा था लेकिन पाण्डेय जी ने अपने लेख से उस सोच को मूर्त रूप दिया है । इसलिये पेश है इस सीरीज का पहला लेख:
पिछले कुछ महीनो में शायद कोई ही हो जिसने कच्चे तेल की बढती कीमतों पर विचार न किया हो । कल कच्चे तेल का दाम ~ १२० डालर प्रति बैरल था; लेकिन आज से लगभग ४ वर्ष पहले ५० डालर प्रति बैरल का दाम असम्भावित सा लगता था । मैं अपनी रोजी रोटी तेल से सम्बन्धित शोध कार्य से कमाता हूँ इसलिये इस क्षेत्र की अधिक से अधिक जानकारी रखना मेरी मजबूरी है । इस विषय से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर देने के लिये मैं इस सीरीज को आरम्भ कर रहा हूँ और मुझे खुशी होगी अगर आपके प्रश्नों को इस सीरीज में शामिल किया जा सके ।
तेल से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
१) क्या अगले १०-२०-३० वर्षों में तेल समाप्त हो जायेगा ? २) अगर नहीं तो तेल का दाम अगले वर्षों में क्या होगा ? ३) तेल के बाद का भविष्य क्या है ? क्या तेल के समाप्त होने के बाद हम आर्थिक स्पाईरल (Downwards) देखेंगे ? ४) तेल के आगे और जहाँ कौन कौन से हैं?
आज हमारे पास कितना तेल बचा है इसका अलग लोगों के पास अलग जवाब है । लेकिन उससे पहले कुछ तथ्य इस प्रकार हैं । आज तक कुल मिला कर हम सब ने लगभग १ ट्रिलियन बैरल तेल का उपयोग किया है ।
१ ट्रिलियन बैरल = १००० बिलियन बैरल = १०००,००० मिलियन बैरल = १०^(१२) बैरल
तेल के मामले में हबर्ट का सिद्धान्त बेहद प्रसिद्ध है । हबर्ट के अनुसार जब कच्चे तेल का उत्पादन अपने चरम पर होगा उस समय तक हमने अपने तेल का ५० प्रतिशत भाग प्रयोग कर लिया होगा । उसके बाद चाहकर भी हम तेल का उत्पादन एक निश्चित दर पर नहीं रख पायेंगे और तेल का उत्पादन गिरता रहेगा जब तक कि हम पूरा तेल प्रयोग नहीं कर लेते । हबर्ट ने अमेरिका के सन्दर्भ में कहा था कि तेल का उत्पादन १९६८ में अपने चरम पर होगा और १९७० में अमेरिका में तेल का उत्पादन अपने चरम पर था । १९७० के बाद अमेरिका में तेल का उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है । इस लिहाज से देखा जाये तो हबर्ट का सिद्धान्त अमेरिका के सन्दर्भ में लगभग सही सिद्ध सा होता दिखता है ।
अगला महत्वपूर्ण प्रश्न है, कि क्या ग्लोबल तेल उत्पादन में भी हबर्ट का सिद्धान्त लागू होता है । क्या ग्लोबल तेल उत्पादन भी अपने चरम पर आकर गिरना शुरू होगा ? अगर हाँ तो ये कब होगा, या फ़िर ग्लोबल तेल उत्पादन अपने चरम पर आ चुका है ? यदि ऐसा है तो क्या हमारे पास केवल अगले १०-२०-३० साल का तेल बाकी है ? अगले कुछ सालों में तेल के दाम बढने/घटने की क्या सम्भावना है ? भारत और चीन जैसे विकासशील देश ग्लोबल तेल की आपूर्ति और दामों पर क्या असर कर रहे हैं ?
इस सीरीज में हम ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे । इस सीरीज की पहली कडी को पूर्ण करने के लिये हम एक प्रश्न की तह में जाने का प्रयास करेंगे । बाकी महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर क्रमश: अगली कडियों में मिलेंगे ।
प्रश्न १: आखिर कुल कितना तेल बाकी है इस धरती पर ???
उत्तर: कच्चे तेल को दो प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है । पहला Conventional Oil और दूसरा Un-Conventional Oil । Conventional Oil का मतलब है कि ऐसा तेल स्रोत जिससे अभी तक तेल निकाला जाता रहा है । उदाहरण के तौर पर सऊदी अरब, मेक्सिको, लिबिया, नाईजिरिया और अन्य सभी सुने हुये स्रोत । Conventional Oil निकालने के लिये तरीका आसान है । पहले तेल का कुँआ खोदकर Pressure Depletion से जितना तेल निकले निकाल लो । उसके बाद पानी Inject करके और तेल निकालो । Conventional Oil लगभग ६ से ९ ट्रिलियन बैरल की मात्रा में उपलब्ध है ।
Un-conventional Oil के कई प्रकार हैं, कनाडा में उपलब्ध Tar sand, अमेरिका और अन्य स्थानों पर उपलब्ध Oil Shale और अन्य भारी तेल के स्रोत । इसके बारे में इतना समझ लें कि ये टेढी खीर है । इस प्रकार के तेल की श्यानता (Viscosity) इतनी अधिक होती है कि ये आसानी से बहता (Flow) नहीं करता है और इसके बारे में आजकल काफ़ी शोध चल रहा है । Un-Conventional Oil लगभग २ से ७ ट्रिलियन बैरल की मात्रा में उपलब्ध है ।
इसके अलावा महत्वपूर्ण है कि इसमें से Recovery Efficiency क्या है ? मान लीजिये १०० बैरल तेल मौजूद है तो इसमें से अगर आप ४० बैरल निकाल पायें तो आपकी Recovery Efficiency 40 % हुयी । आजकल ग्लोबली Recovery Efficiency लगभग ३०-३५ % है । Un-Conventional Oil के सन्दर्भ में Recovery Efficiency लगभग १०-२० % है ।
इस लिहाज से देखा जाये तो अभी भी लगभग ४-६ ट्रिलियन बैरल तेल अभी और निकाला जा सकता है । दूसरे शब्दों में अभी केवल एक चौथाई से भी कम तेल निकाला गया है । इस अंदाजे से अभी ग्लोबल हबर्ट पीक दूर की कौडी है । तेल मौजूद है बस निकालने वाले चाहिये । इसमें भी एक समस्या है, अगर तेल की माँग बढती गयी और इसी दर से तेल की आपूर्ति नहीं बढी तो निश्चित तौर पर तेल के दाम बढेंगे । जैसे जैसे तेल के दाम बढेंगे, तेल कम्पनियों का फ़ायदा बढेगा और तेल कम्पनियाँ Un-Conventional Oil/Alternate Energy में निवेश करके भविष्य के तेल/ऊर्जा की माँग के सन्दर्भ में आपूर्ति सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगी ।
बाटम लाईन: अभी चिंतित होने की जरूरत नहीं है । तेल है और अगले ३०-५०-६०-८०-१०० वर्षों तक रहेगा । लेकिन केवल तेल के रहने से समस्यायें हल नहीं होंगी, इसीलिये इस लेख की अगली कडी में हम अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करेंगे ।
यदि इस सन्दर्भ में आपके कोई प्रश्न हैं तो आप टिप्पणी के माध्यम से पूछ सकते हैं । हम उनके उत्तर देने का भरसक प्रयास करेंगे ।
आजकल समय कम होने के कारण संगीत पर पोस्ट ठेलना ज्यादा आसान लगता है । फ़टाफ़ट काम हो जाता है और आपकी शुभकामनायें मिलती हैं, वो अलग :-)
पहला गीत: भैरवी राग (तीन ताल) में एक ठुमरी है जिसे पण्डित अजय पोहनकर ने गाया है । ठुमरी के बोल हैं, "कैसी ये भलाई"
दूसरा खास बोनस गीत फ़िल्म तीसरी कसम का है । इसकी खासियत है कि गीत के बीच बीच में राज कपूर साहब की आवाज में संवाद । मेरा दावा है कि इसे सुनकर आपको फ़िल्म की याद आ जायेगी ।
इस कहानी को तकरीबन एक साल पहले कहीं पढा था, अब तो वो वेबसाईट भी याद नहीं जहाँ इसे पढा था । ये अच्छा हुआ कि इसे सहेजते समय लेखक का नाम भी लिख लिया था जिससे इसे आज पोस्ट करने की हिम्मत कर रहा हूँ । इसके लिये मैने लेखक से अनुमति नहीं ली है परन्तु यदि किसी को इससे आपत्ति हो तो मुझे सूचित करें । मैं इसे तुरन्त अपने चिट्ठे से हटा लूँगा ।
ये कहानी थोडी लम्बी अवश्य है लेकिन आपके धैर्य का आपको भरपूर फ़ल मिलेगा, ऐसी मेरी आशा है ।
रसानंद बाबू को अपने पर गुस्सा आ रहा था। मिस्त्री की बात मान ली होती तो यह दुर्दशा नहीं होती। कल जब साइकिल में हवा भरवाने गये थे तब उसने कहा थाज्ञ् `जल्द ही टायर बदलवा दीजिए।' एक ही दिन में उसकी बात सच निकली, तेज़ आवाज़ के साथ ट्यूब फट गया। कम से कम सुबह घर से निकलते समय फटा होता तो साइकिल ठीक करके निकलते या फिर निकलते ही नहीं। अब क्या करें? उनकी नज़र कलाई पर बंधी घड़ी पर पड़ी, सोचने लगे ग्यारह बज रहे हैं, यहां से पदमपुर साइकिल से जाओ तो पूरा एक घंटा। पैदल चलो तो तीन घंटे से कम नहीं लगेंगे। ऊपर से साइकिल ठेलना होगा। जब विपदा उपस्थित होती है तो जाने क्यों धूप का प्रकोप बढ़ जाता है और दूरी भी। सारी स्थिति की कल्पना करते हुए रसानंद बाबू के पांव थम से गये। प्यास के मारे गला सूखने लगा।
रसानंद बाबू ने पीछे मुड़कर देखाज्ञ् एक औरत चली आ रही है। उसकी चाल से उन्हें लगा कि मानों वह उन तक पहुंचना चाहती हो। खेत से लौट रही है, पति के लिए नाश्ता लेकर गयी थी। वहीं कुछ देर पति के साथ काम किया होगा और अब लौट रही है। पति से पहले उसे घर पहुंचना होगा। भात भी बनाना है, बच्चे इंतजार कर रहे होंगे। औरत के सिर पर एक परात थी जिस पर पलाश के कुछ पत्ते, दो-चार खजूर के दातुन, साथ में मुट्ठी भर जलावन लकड़ी जो चूल्हा जलाने के काम आयेगी। उस औरत के साथ बिना कोई बात किये रसानंद बाबू ने यह सब अनुमान लगा लिया। अनुमान लगाते हुए उनके चेहरे पर एक क्षीण मुस्कराहट दौड़ गयी। मुस्कराहट ने उनका कष्ट कुछ कम कर दिया। जासूसी उपन्यास में इसी तरह जासूस कई बातें जान लेता है, बिना कुछ पूछे, पहली मुलाकात में ही, किसी ज्योतिषी की तरह। बचपन में उन्होंने बहुत सारे जासूसी उपन्यास पढ़े थे। मन में दबी हुई इच्छा भी थी जासूस बनने की। क्या पता मौका मिलता तो शायद बन भी गए होते। फोन पर फोन करते। हुक्म तामील करने के लिए हमेशा सहायक मौजूद रहते।
लेकिन पता नहीं, क्या सोचकर वे मलेरिया विभाग में घुस गए। धेले भर की आमदनी नहीं। महीने भर तनख्वाह का इंतज़ार करो, कर्ज चुकाओ। उस पर रोज़ दस-बीस मील की साइकिल यात्रा और रास्ता भी ऐसा कि साइकिल का एक पंचर बनवाने के लिए कोई मिस्त्री न मिले। इतना सब सोच चुके थे रसानंद बाबू कि वह औरत उनके बराबर में चलते दिखाई दी। `मां, तुम्हारे गांव में कोई साइकिल की दुकान तो नहीं है?' रसानंद बाबू को पता है, आस-पास कोई साइकिल की दुकान नहीं है। कुछ दिन पहले किसी ने बताया तो था, साइकिल का बालबेरिंग किसी ने अपनी स्वदेशी बुद्धि से ग्रीस के बदले लकड़ी का गुड़ लगाकर सेट किया था। सुनकर रसानंद बाबू भी खूब हंसे थे। आज उन्हें लग रहा था साइकिल का पंचर सुधारने का ऐसा ही कुछ स्वदेशी उपाय होता तो इस प्राणांतक धूप से छुटकारा मिल जाता। `न इस गांव में तो कोई नहीं है। सीधे पदमपुर जाना पड़ेगा।' कहते हुए उस औरत ने रसानंद बाबू का सपना तोड़ा और पूछाज्ञ् `तुम्हें कहां तक जाना है, काका!' उसकी बातों से लगा वह रसानंद बाबू की विपदा से दुखी है। कोई बीस-बाईस साल की उम्र होगी उस औरत की, रसानंद बाबू की छोटी बेटी के बराबर। शादी को चार-पांच साल हो गये होंगे, उसके एक-दो बच्चे भी हो चुके होंगे। `मां' के बदले बेटी संबोधित किया जाता तो शायद ज्यादा फबता। पर, एक लड़की अपने जन्म से मृत्यु तक मां ही तो रहती है। शादी से पहले मां-बाप-भाई की सेवा, शादी के बाद पति-पुत्र की सेवा और बुढ़ापे में नाती-नातिन की सेवा। बिना किसी प्रति-उपकार के सारा जीवन सेवा करना ही मानों उसका धर्म है। मां के अलावा कौन करेगा इतनी सेवा? बदले में उसे मिलता क्या है! बेचारी तरसती रहती है पूरी ज़िन्दगी दो टूक स्नेह और संबोधन के लिए। यहां मिलेगा। न, न यहां नहीं, वहां। या फिर और कहीं। इसी तरह के विचारों से रसानंद बाबू का मन करुणा से द्रवीभूत हो गया। वे आत्म-समीक्षा करने लगे। खुद उन्होनें भी क्या दिया है, वह स्नेह और श्रद्धा भरा संबोधन!
`काका! पदमपुर तक जाओगे?' पहले प्रश्न का जवाब न मिलने पर औरत ने एक बार फिर पूछा। `हां, मां!' इतना कहने के बाद सदानंद बाबू का मन आत्म-दया से भर गया। उन्हें लगा जैसे आंखों से आंसू निकल आएंगे। भरी धूप में साइकिल घसीटते-घसीटते वे अब पदमपुर तक जाएंगे। बचपन में शरीर पर कहीं चोट आने पर, मां के सहलाने के बाद जैसे वे रोया करते थे, आज न चाहते हुए भी उन्हें वैसे ही रोने का मन करने लगा। इतने में औरत पूछ बैठीज्ञ् `क्या तुम पदमपुर में नौकरी करते हो काका, तुम्हारा अपना घर कहां है?' `बुटोमाल!' रसानंद बाबू ने कहा। `घेंसबुटोमाल'। `हां' `मेरी भाभी भी तो बुटोमाल की बेटी है। तुम जानते होगे। झांकट घर की। केतकी। उसकी और मेरी एक ही लगन में शादी हुई थी। इस आषाढ को चार साल हो जाएंगे।' लड़की जैसे संबंध जोड़ने के लिए उतावली हो रही थी। रसानंद बाबू को अपनी बेटी की उम्र में रखने के बाद वह औरत एक छोटी बच्ची से ज्यादा बड़ी नहीं लग रही थी। एक बातूनी, बार-बार सवाल करने वाली, जो जवाब न मिलने तक चुप न रहती हो। तीन-चार साल की छोटी-सी लड़की। `अच्छा, अच्छा, कहीं तू समारू की बेटी की बात तो नहीं कर रही है? वह जो तालपाली में ब्याही है। चार लड़कों में एक लड़की। अच्छी लड़की है।' रसानंद बाबू ने कहा। अब रसानंद बाबू और लड़की बराबर साथ-साथ चल रहे थे। दोनों में बातचीत का विषय थाज्ञ् केतकी और उसका बाप समारू। बाप के मरने के बाद पांचवी कक्षा में समारू की पढ़ाई छूट गई। रसानंद बाबू का यजमान है उसका परिवार। गांव छोड़ने के साथ-साथ रसानंद बाबू का यजमानी से भी नाता छूट गया। अब ये सब काम चाचा के लड़के देखते हैं। पर अपनी बेटी की शादी में समारू नहीं माना, `पंडित, चार बेटों में एक ही बिटिया है। तू जब तक पोथी नहीं पढ़ेगा, उसकी शादी नहीं होगी।' रसानंद बाबू शादी में पदमपुर से आये थे। जवांई देखने में लोहे के मूसल की तरह, सांवला, सख्त, मुंह एकदम गोल, शरीर काफी गढ़ा हुआ। इस सब का जाकर पत्नी से भी जिक्र किया था। उसी लड़के की बहन है यह लड़की।
`हमारी बेटी को ठीक तरह से रखा है न तुम्हारे दादा ने?' रसानंद बाबू ने इस आग उगलती धूप में थोड़ा मजाक किया। `लड़की' के साथ बातचीत करते हुए धूप का प्रकोप कुछ कम-सा लगा। अब आ गया है उसका गांव जहां वह रुक जाएगी। उसके बाद कष्ट झेलना होगा। रसानंद बाबू ने मन ही मन आशंका की। `काका! जब मैं तुम्हारी बेटी जैसी हूं तो एक बात कहूंगी, तुम मना मत करना।' लड़की ने अपने गांव का रास्ता पकड़ने से पहले कहा। `बोलो मां', रसानंद बाबू ने पूछा। `तुम इस भरी धूप में मत जाओ। मेरे घर में दोपहर में रह जाओ। इतनी धूप है, क्या पता कुछ हो जाए तो?' `न रे मां! घर पर तेरी काकी मेरा इंतजार कर रही होगी। फिर मुझे ऑफिस भी जाना होगा।' रसानंद बाबू के तर्क बनावटी नहीं हैं। गरमी में ज़रा सी देर हो जाने पर पत्नी घर से बाहर, बाहर से अन्दर होती रहती है। बेटियों की शादी के बाद बेचारी घर पर अकेली रह नहीं पाती है। सूना घर जैसे उसे खा जाता है। पर उससे भी बड़ी बात है कैसे वे किसी के यहां मेहमान हो जाएं। दो मिनट तो हुए इस परिचय को। दूसरी तरफ मन कर रहा था कुछ देर रुक जाने को। इन दिनों बूढ़ों के लिए लू से बड़ा यम कोई नहीं है। प्राण रहे तो सब ठीक है। एक ओर प्रचंड धूप का प्रकोप, दूसरी ओर लड़की का स्नेह भरा निमंत्रण।
`काका! हमें तुम छोटी जात का गरीब मानते हो तो बात अलग है। नहीं तो तुमको इस भरी दोपहर में जाना नहीं चाहिए। मेरी भाभी के तुम जब काका हो तो मेरे भी तो काका हुए। मैं तुम्हारी अपनी बेटी होती तो क्या तुम इस तरह चले जाते।' लड़की की बातों में आत्मीयता थी, साथ था कुछ अभिमान। पर उससे भी ज्यादा था मन में यह डर कि रास्ते में बूढ़े को लू लग जाए तो, आखिर पाप तो उसे ही लगेगा न। उपन्यास के जासूस की तरह रसानंद बाबू ने लड़की के मन की बातों को ताड़ लिया। सोचने लगेज्ञ् क्या उम्र है इसकी अभी! स्कूल का मुंह तो शायद इसने देखा भी नहीं होगा। पर, कितनी समझदारी है इसमें। कितनी चालाकी से इसने मुझे अपना कर लिया है। हो सकता है यह मेरे मन की बात को भी जान चुकी होगी। दोपहर की धूप में साइकिल ठेलते हुए बूढ़े में पदमपुर तक जाने की न ताकत है और न ही आग्रह।
`ना रे मां! मैं तो कुछ और सोच रहा था। एक तो तेरे सास-ससुर का घर और अब तू खेत से लौट रही है। घर पर कितने सारे काम पड़े होंगे। उसके ऊपर मेरा बोझ।' रसानंद बाबू ने कहा। `क्या बात करते हो तुम काका। मेरे बाप-काका आते तो मैं क्या भगा देती। वैसे भी मेरे सास-ससुर अपनी बेटी के यहां गये हैं। कल लौटेंगे। तेरा जंवाई बेचारा कितना खुश होगा, तुम्हें देखकर और अगर तुम दो घड़ी रहोगे तो मुझे कौन-सा कष्ट है। तुम तो ठहरे बाम्हन जात। मैं चूल्हा जला दूंगी, तुम भात उतार लेना। मुझे कौन-सा काम करना पड़ेगा। अंतत: रसानंद बाबू लड़की के घर गए। उन्हें लगा, जैसे दूसरे लोक से उनकी मां लौट आयी है। तेज़ धूप में बच्चे को किसी तरह बचाना है। पेट भर खिलाना-पिलाना है। लड़की का छोटा-सा घर, दो ही कमरे। आधी छत खपरैल की, बाकी घास-फूस की। आंगन में मिट्टी की हंडिया में पानी रखा है। रस्सी की एक चारपाई पड़ी है। चारपाई पर एक फटी-पुरानी गुदड़ी बिछी है। छोटे बच्चे के लिए कोमल शय्या। बच्चा सोया था शायद। बीच में जाग जाने पर पड़ोसी घर ले गये होंगे। घर में पहुंचते ही लड़की ने सिर से परात को उतारा। तुरन्त काका के लिए पानी ले आयी। खाट पर बिछी गुदड़ी को अंदर ले गयी। वहां बैठने को कहा। उसके बाद वह गई पड़ोसी के घर बच्चे को देखने। पल भर भी विश्राम नहीं। एकदम यंत्र की तरह।
रसानंद बाबू कुछ देर तक खाली खाट पर बैठे, फिर लेट गये। थोड़ी देर बाद सो भी गये। सिर के नीचे तकिया न था, घर पर शायद तकिया नहीं है या फिर है भी तो गंदा-पुराना। शायद इसीलिए लड़की ने काका को तकिया नहीं दिया हो।
रसानंद बाबू की पतली नींद लड़की और उसके पति की फुसर-फुसर बातचीत से टूटी। लड़की कह रही थीज्ञ् `मेरी भाभी के गांव का आदमी है, उनके घर का पुरोहित। पदमपुर में नौकरी करता है। इस गरमी में साइकिल ठेलते हुए जा रहा था। मैंने सोचा लू न लग जाए।' इस पर उसका पति बोलाज्ञ् `यह सब तो ठीक है पर क्या खिलाओगी इसे!' लड़की ने जवाब दियाज्ञ् `तुम क्या इतना मूर्ख समझते हो मुझे। एक बा्रह्मण को एक जून खिला नहीं पाऊंगी, बासी परवाल (भीगा कर रखा गया भात, इसे पांता भात भी कहा जाता है।) है, हम दोनों के लिए हो जाएगा। नुनकी के घर से पाव भर चावल लायी हूं। बूढ़े के लिए भात चढ़ा दिया है। बनबासी पंसेरी से आलू लाकर चावल में डाल दिया है, सीज जाएगा। दो कच्चे केले तोड़ लाई हूं बागान से। चूल्हे में रख दूंगी। चावल चढ़ा दिया है, पकने पर बूढ़े को जगा दूंगी, उतार लेगा। थक गया है। अभी सो लेने दो उसे एक नींद।'
लड़की की बातों पर पति को कोई असहमति नहीं है। पत्नी की सामर्थ्य पर उसे पूरा भरोसा है। तब भी उसने पूछाज्ञ् `बेटा क्या बासी परवाल खाएगा, हमारे साथ।' लड़की ने जवाब दियाज्ञ् `न, न, उसे क्यों बासी देने लगी। बूढ़ा आदमी क्या पाव भर चावल खा लेगा? बचेगा तो बेटे को खिला दूंगी। नुनकी के घर में कुछ खाया हुआ है, अभी खेल रहा है।' संतुष्ट होकर पति कहता हैज्ञ् `नुनकी के घर से वो कांसे की थाली मांग लेना। गिलट की थाली में खाना देना अच्छा नहीं लगेगा।' लड़की बोलीज्ञ् `अरे! तुमको पता नहीं, नुनकी के भाई की बीमारी में कांसे की थाली गिरवी चली गई, कहां निकाल पाये उसे? डूब गई वो तो।' `तो अब क्या करोगी?' उसके पति ने पूछा। शायद उसे नुनकी के घर की कांसे की थाली डूबने पर चिंता नहीं थी। चिंता थी तो इस बात की कि अब कहां से आयेगी कांसे की थाली। पर लड़की के उत्साह में कोई कमी नहीं है। उसने कहाज्ञ् `कांसे की थाली की क्या जरूरत है, खेत से मैं कच्चे पलाश के पत्ते ले आयी थी। पत्तल-दोना बना दूंगी।'
`थोड़ी-सी दाल होती तो अच्छा होता। सूखा भात बूढ़ा खाएगा भी तो कैसे खाएगा!' पति ने कहा।
ज्ञ् `क्यूं! अचार है। नमक पानी डालने से रस्सेदार तरकारी बन जाएगी।' लड़की के जवाब से लगा, हर सवाल का उत्तर देने की तैयारी उसने पहले से कर रखी है। अंतत: पति ने आश्वस्त भाव से कहाज्ञ् `और क्या? अपने घर पर जो है, वही तो खिला पाएंगे हम।'
इन सारे प्रसंग में रसानंद बाबू का मन कर रहा था, पति-पत्नी की बातों के बीच कहेंज्ञ् `मेरे लिए इतनी चिंता मत करो। कुछ भी होने से मेरा काम चल जाएगा। दोपहर को तुमने आश्रय दिया, ये क्या कम बात है!' पर वे उठ नहीं आये, गहरी नींद में सोने का अभिनय किये रहे। पति-पत्नी को मालूम नहीं होना चाहिए कि मैं उनकी बातों को सुन रहा था, यदि मालूम हो जाए तो बेचारे नंगे हो जाएंगे। शर्म से मुंह नहीं दिखा पाएंगे। पति-पत्नी के बीच प्रेम के अलावा और भी कई चीजें हैं जो तीसरे आदमी को पता नहीं चलनी चाहिए। उन्हें अपने घर की बात याद आई। महीने का वह आखिरी सप्ताह, जब बड़े समधी और समधन आ पहुंचे। दुर्भाग्य था जिस बनिए से उधार आता है, उसके बेटे की शादी होने के कारण दुकान भी बंद थी। वैसे में रसानंद बाबू की नज़र पड़ती है, पत्नी के हाथ खर्च की गोलक पर। मायके से लौटते हुए या फिर बाज़ार के हिसाब से बचाकर या फिर कैसे न कैसे करके पत्नी अपनी बचत को एक गोलक में रखती है। पचास-सौ रुपये निकले उसमें से। उसी से आधा किलो बासमती चावल, कुछ महंगी सब्जियां और साथ में मछली या मांस ले आये थे। केवल उनके लिए उन दिनों स्पेशल बनता है। एक बार तो समधी अड़ गए कि दोनों समधी एक साथ खाने पर बैठेंगे। रसानंद बाबू ने कहाज्ञ् `मैं तो नौ बजे भात खाकर ऑफिस जाने वाला प्राणी हूं। दोपहर को आपके साथ खाना खाऊं, एक तो तबीयत बिड़ेगी, दूसरे ऑफिस छोड़कर घर आने पर मेरी नौकरी चली जाएगी। समधी भी ज़िद पर अड़े थे, कहने लगेज्ञ् `तब तो नौ बजे मैं भी आपके साथ बैठूंगा।' अंतत: दाल में पानी डाला गया और तरकारी में चावल का चूरा। `सोमवार को मैं मांस नहीं खाता हूं। पूछना हो तो पूछ लीजिए अपनी समधन से।' यह कहते हुए रसानंद बाबू ने अपने लिए रास्ता बनाया। इसके बावजूद लगा, जैसे कोई बीच रास्ते में उनकी धोती चीर रहा हो। उनकी विनती कोई सुन नहीं रहा है।
`काका! उठोगे नहीं? भात पक गया है, उतार लो।' लड़की की आवाज़ ने रसानंद बाबू को जगा दिया। मुंह-हाथ धोकर वे भात उतारने लगे। मन कर रहा था बोलने काज्ञ् `बेटी! तूने जब सारे काम कर ही दिए तो भात भी उतार देती, मेरी कौन-सी जात चली जाती?' पर वे बोले नहीं। जात-कुजात के संस्कार की बात समझाने का यह समय नहीं है। हो सकता है लड़की समझेगी नहीं। उसके लिए जैसे सम्मान में काका बड़ा है, जात में ब्राह्मण भी ऊंचा है। फिर वे अपने आपसे पूछने लगे सचमुच मैं क्या संस्कारवादी दृष्टि से ये सब सोच रहा हूं। या आलस में कोई काम नहीं करना चाहता हूं। लड़की के हाथों सारे काम करवाना चाहता हूं। खाने पर जब बैठे तो उसी पुराने दृश्य की पुनरावृत्ति हुई। रसानन्द बाबू ने सुझाव दिया, सब लोग एक साथ बैठ जाएं। जंवाई ने कहाज्ञ् `आप ठहरे बाहमन, गोस्वामी, मैं कैसे साथ बैठूंगा!' बेटा तो पहले से खा चुका है और रही लड़की तो उसकी बारी अंत में है। रसानंद बाबू समझ गए। उन्होंने जोर नहीं दिया। समधी की तरह नासमझ नहीं हैं।
खाना खाते समय एक बार फिर केतकी की बात आयी। `तुम कुछ भी कहो काका, मेरी भाभी के दुख का कोई अंत नहीं है। बचपन से मां नहीं है। अब बाप बीमार पड़ा तो बिस्तर में ही झा़डा-पेशाब सब कुछ। चार-चार बेटे, पर कोई नहीं पूछता। भाभी रोती रहती है। कहती है, काश भगवान ने मुझे लड़का बनाया होता तो मेरे बाप की यह दुर्दशा नहीं होती। मैं कहती हूं, भाभी! तू लड़का पैदा हुई होती तो अपने भाइयों से कोई अलग होती?' समग्र पुरुष समाज के नाम लड़की का अभियोग। रसानंद बाबू को अब तक पता नहीं था कि समारू बिस्तर पकड़ चुका है। पिछले महीने तो वे गांव गये थे। किसी ने भी नहीं कहा। पर उन्होंने खुद भी तो कभी प्रयत्न नहीं किया, अपने बचपन के दोस्त के बारे में जानने का। आज किस मुंह से कहेंगे, समारू उसके बचपन का साथी है, पर गांव में उससे कभी मुलाकात तक नहीं होती। इतनी होशियार लड़की, उपन्यास के जासूस की तरह उनकी चालबाज़ी को पकड़ भी चुकी होगी। रसानंद बाबू के मन में भय सा पैदा हो गया। `तुम लोग एक बार पदमपुर आओ बेटी! दो दिन रहकर जाओ। अच्छा लगेगा। तेरी काकी भी बहुत खुश होगी।' रसानंद बाबू के मन में अंदेशा हुआ, यह उनकी मन की बात नहीं है। समारू की चर्चा को टालने की मनसा से उन्होंने यह निमंत्रण दिया है। अपनी चालबाज़ी के लिए लड़की के आगे आत्म-समर्पण करने से पहले मानों वे उसके हाथों घूस थमा रहे थे।
शरीर में थकान थी, पेट में भूख। खाना भी खूब स्वादिष्ट था। गरम भात, आलू, केले का भर्ता (चोखा) अचार, झोल (शोरबा) और हरी मिर्च। देगची से भात निकालते हुए उन्हें डर लग रहा था, बच्चे के लिए कुछ बचेगा तो, या लोभवश सारा भात अकेले उंड़ेल लेंगे। भोजन के बाद रसानंद बाबू फिर कुछ देर के लिए सो गए। जब तक उनकी नींद खुली, जंवाई वापस खेत पर जा चुका था। मेहमान की खातिरदारी के लिए उसके पास समय कहां है? मुंह-हाथ धोने के बाद रसानन्द बाबू भी निकल पड़े। निकलने से पहले लड़की को एक बार फिर परिवार सहित पदमपुर आने का निमंत्रण दिया। आने का दिन भी तय कर गये। निमंत्रण कोई बनावटी नहीं है, यह सिद्ध करने के लिए इससे ज्यादा और कह भी क्या सकते थे!
इस घटना के दो महीने बाद सचमुच अपना परिवार लिए लड़की पदमपुर पहुंची। घर में पहुंचते ही एक थैला लड़की ने काकी के हाथ थमा दिया। उसमें आठ-दस कच्चे केले, दो पाव मूढ़ी-धान (लाई), एक किलो के माफिक परवल और अलग से कुछ पुड़ियाआें में सुखुआ (सूखी) मादल (मछली)। अपने पति की ओर इशारा करते हुए उसने कहाज्ञ् `समझे, काका! तुम्हारे जंवाई के साथ मेरा खूब झगड़ा हुआ, कह रहे थे, ये सब क्या ले रही हो। शहर में क्या कोई ऐसी चीजें खाता है?' मैंने कहाज्ञ् `काका-काकी मेरे गांव के लोग हैं। शहर में रह रहे हैं तो क्या, गांव का खाना भूल जाएंगे। उनके घर में क्या पेड़े-रसगुल्ले की कमी है, जो हम यहां से लेकर जाएं।' पहली मुलाकात में ही रसानंद बाबू की पत्नी ने लड़की और उसके परिवार को एकदम अपना लिया। बोलने लगीज्ञ् `तुम ठहरी बेटी, मां के घर जब बेटी आती है, तो क्या कभी कुछ लेकर आती है?' रसानंद बाबू ने कहाज्ञ् `परवल उनको बहुत पसंद है।' केले की उन्नत आकृति देखकर पत्नी ने आश्र्चर्य जताया। लड़की और उसके पति आश्वस्त हुए। साथ में `कुछ' नहीं लाने की ग्लानि उन्हें खा नहीं गयी। दो दिन में ही वे लोग रसानंद बाबू के परिवार के साथ घुल-मिल गये। पत्नी ने जिस आत्मीयता से उन लोगों के साथ बातचीत की, रसानंद बाबू आश्र्चर्यचकित रह गए। महिलाएं सचमुच बहुत ही बुद्धिमती होती हैं। परिस्थिति के साथ ताल मिलाकर चलने में वे हमेशा पुरुष से ज्यादा पारंगत मालूम पड़ती हैं। लगता है जैसे वर्षों से वह उन लोगों को जानती हो।
इस बीच दो बार लड़की ने घर में झाड़ू लगा दी। एक स्टूल पर चढ़कर लंबी झाड़ू से ऊपर का जाला भी साफ कर दिया। आंगन में मिट्टी का एक चूल्हा बनाने का उसने प्रस्ताव रखा यह कहकर कि कभी कभार काकी उस पर मूढ़ी (लाई) भूजेंगी। उसके लिए केवल उसे एक फावड़ा चाहिए। दूसरी ओर जवांई को भी फावड़ा चाहिए। बाहर एक गड्ढा खोद देगा, बची-खुची साग-सब्जी उसमें डालते जाओ, अच्छी खाद बन जाती है। अपनी बगिया में कुछ लगा लो, तो सरकारी खाद की जरूरत नहीं होती है। अपनी बगिया की सब्जी में जो मिठास है, बाज़ार की सब्जी में कहां?
पत्नी बीच-बीच में उन्हें रोक रही थी। `मां के घर पर कभी बेटी-जवांई काम करते हैं?' उसकी बातों को लड़की अनसुना कर देती थी। `यह भला कोई काम है? मां की मदद बेटी नहीं करेगी तो और कौन करेगा?' एक-दो बार रसानंद बाबू ने भी उन्हें रोका। पर, उनके रोकने में दम नहीं था। `मेरी अपनी बेटियां भी तो गरमी-दशहरे में जब आती हैं, अपनी बूढ़ी मां की मदद करती हैं।' पर, उन्हें अहसास हुआ कि ये तर्क वे लड़की को अपनी बेटी मानकर नहीं दे रहे थे, पत्नी का काम यथासंभव कम करने के स्वार्थ से दे रहे थे। अपने ओछेपन को वे पहचान पाये। फिर भी लड़की और उसके पति को काम करने से जोर देकर रोका नहीं, चुप रहे।
रात को लड़की और उसके पति में काफी देर तक फुसर-फुसर चली। रसानंद बाबू की पतली नींद। पास के कमरे में वे लेटे हुए थे। न चाहते हुए भी उन दोनों की बातें उनके कानों तक आ रही थीं। यहां मेहमान होकर आने के अलावा पदमपुर में उन लोगों का एक और बड़ा काम है। बाज़ार से कपड़े खरीदना। बात चल रही थी किसके लिए कपड़े खरीदे जाएं। बेटे के लिए पैंट-शर्ट या फिर `लड़की' के लिए साड़ी या पति के लिए धोती। लड़की का तर्क थाज्ञ् `मैं तो घर पर रहती हूं। तुमको कई बार आना होता है पदमपुर बाजार। सब्जी बेचने या फिर कुछ न हुआ तो साहू की बैलगाड़ी के साथ। हाट में काका के साथ इस फटी हुई धोती में भेंट हो जाए तो मेरी और क्या इज्जत रह जाएगी। घूम-घामकर बात भाभी के कानों में पड़ेगी।' सुनते ही उसका पति बिगड़ गयाज्ञ् `फालतू की बात मत कर, किसी की नज़र मुझ पर नहीं पड़ेगी। तू फटा पहनेगी तो लोग तुझ पर नहीं मुझ पर हंसेंगे।' लड़की ने कहाज्ञ् `मैं कह नहीं रही थी, गागर को गणेशिया के घर गिरवी रख देते हैं। पदमपुर जब जा ही रहे हैं, सबके लिए थोड़ा-बहुत कपड़ा ले आयेंगे। तुमने तो मना कर दिया। प्रधान के घर बर्तन मांजकर मैं दो महीने में गागार निकाल लाती।' जवांई ने कहाज्ञ् `छोड़ो भी, बेटे के इक्कीसवें पर उसके मामू ने जो पीतल की थाली दी थी, वह क्या निकल पायी! इसलिए मैं कहता हूं चीज़ें गिरवी रखने का कोई मतलब नहीं है। बेच दो तो कम से कम ठीक-ठाक दाम तो मिल जाएंगे।' लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। अंतत: तय हुआ बेटे के कपड़े अगली बार खरीदेंगे। लड़की के लिए आठ हाती (आठ हाथ का) एक थान कपड़ा लेंगे और जवऎंई के लिए एक गंड (मोटे कपड़े) चार हाती (चार हाथ का) गमछा बारिश के दिनों में जरूरत पड़ने पर पहना भी जा सकेगा। कपड़े खरीदने की बात तय होने के बाद लड़की ने प्रस्ताव रखा काका के साथ दुकान पर जाएंगे, तनिक सस्ता मिल जाएगा। जवांई को यह बात पसंद नहीं आयी। `बड़ी दुकान में जाने के लिए पैसे होने चाहिए। काका के आगे मोल-भाव करना भी अच्छा नहीं लगेगा।' आखिर में तय हुआ, काका के घर से निकल जाने पर वे लोग बाज़ार जाएंगे। खरीदारी के बाद वहां से सीधे घर चल देंगे। रिश्तेदारों के आगे खरीदारी करके आदमी को अपमानित नहीं होना चाहिए।
रसानंद बाबू सारी बातें सुनते रहे। पति-पत्नी की बातों में कोई अस्वाभाविकता दिखाई नहीं पड़ी। परिवार की पूरी आस रहती है, थोड़ी-सी खेती के ऊपर। कभी धान को बंगी कीड़े खा गये, तो कभी सूखे की चपेट में सारी खेती लुट गयी। छोटे किसान हैं ये लोग अनायास बेचारे मजदूरी के स्तर पर उतर आते हैं। पेट काटकर साग-सब्जी को बाज़ार में बेचेंगे। अपनी खेती का काम जल्द खत्म करते ही दूसरे के खेतों पर काम करेंगे। उसके बाद ही साल भर के लिए कपड़ा-लत्ता खरीदेंगे, शादी-ब्याह में शामिल होंगे। दशहरा और रथयात्रा के लिए चंदा देंगे। क्या धूप, क्या बरसात! चींटी की तरह एक-एक दाना जोड़ रहे होंगे। उसके बावजूद गिरवी रखा बरतन निकलता नहीं, डूब जाता है। छत की टूटी हुई खपरैल के बदले घास-फूस लगाते हैं। कभी किसी के बीमार पड़ जाने पर ज़मीन भी चली जाती है। सब कुछ सरल, स्वाभाविक छंदहीन है इनका संसार। जन्म, मृत्यु, बाढ़ और सूखे की तरह।
रसानंद बाबू को याद आया, दशहरे में देने के लिए दोनों बेटियों के लिए साड़ी खरीदकर रखी थी। छोटी बेटी के दादा ससुर चल बसे, बेटी आयी नहीं। श्राद्ध के बाद आएगी। उसकी साड़ी रखी हुई है। दुकान में लौटाई नहीं। उस साड़ी को इस लड़की को दे दें तो? पत्नी के आगे प्रस्ताव रखने का साहस नहीं हुआ, मना कर देगी तो? रहने दो, रसानंद बाबू ने करवट बदली। आजकल नींद नहीं आती आसानी से। कभी-कभी तो सारी रात कट जाती है। सब उम्र का ही दोष है। पत्नी के आगे प्रस्ताव न रखने के पीछे केवल पत्नी का डर ही क्या एकमात्र कारण है? या साथ में अपनी कंजूसी भी। छोड़ो भी, ये लोग खेत में काम करते हैं, मोटी साड़ी पहनते हैं। महंगी-पतली साड़ी से इनका काम नहीं बनेगा। रसानंद बाबू को याद आया। मजदूरों को नाश्ता बांटते हुए, मां ठीक इसी तरह के तर्क दिया करती थीज्ञ् महीन चावल के भात इनको हजम नहीं होते हैं, ये ठहरे मजदूर लोग, मोटे चावल का भात इन्हें अच्छा लगता है। सुबह नाश्ते में पत्नी ने पूड़ियां बनाई थीं। साथ में रस्सेदार परवल की सब्जी। केवल खास मेहमानों के लिए पत्नी इस तरह का नाश्ता बनाती है। पत्नी के सम्मान-बोध से रसानंद बाबू बहुत प्रसन्न हुए।
आखिर लड़की और उसके परिवार के जाने का समय हुआ। पत्नी ने कब से थैले में वह साड़ी डाल रखी है। रसानंद बाबू को शायद इस बात का पता भी न लगता, यदि लड़की थैले को देखते ही चिल्ला न उठती। मानों कुछ अप्रत्याशित सा घट गया। `न, न, ये क्या कर रही हो काकी। मैं बिलकुल नहीं लूंगी। मेरे पास तो कई साड़ियां हैं। मैं क्या करूंगी साड़ी का?' लड़की ने कहा। `क्या बात कर रही हो तुम, तुम्हारे पास क्यों साड़ी की कमी होने लगी! पर, मां के घर से क्या बेटी कभी खाली हाथ लौटती है? लोग क्या कहेंगे मुझे?' पत्नी ने कहा। रसानन्द बाबू को लगा, पत्नी ने भी सुनी है इन लोगों की बातें। डर से रसानंद बाबू के आगे साड़ी देने का प्रस्ताव रख न सकी। उनसे छिपाकर साड़ी दे देने को तय किया था। बाद में रसानंद बाबू नाराज होते तो चुपचाप सह जाती। काकी का तर्क सुनकर लड़की एक बार चुप रही। शायद सोच रही थी प्रतितर्क क्या रखेगी। फिर बोलीज्ञ् `ठीक है काकी, तूने दिया है मैं क्या इंकार करूंगी। यह साड़ी मैं रख रही हूं। अब मैं दे रही हूं अपनी बहनों को, रख लो, रखने से तू मना नहीं कर सकती क्योंकि मैं तुम्हें नहीं दे रही हूंं। दशहरे में जब मेरी बहनें आएंगी तो किसी एक को मेरी तरफ से दे देना।' लड़की ने साड़ी को काकी के हाथ में जबरदस्ती थमा दिया। अपने थैले के मुंह को इस तरह पकड़े रखा जैसे साड़ी उसके अन्दर जबरदस्ती घुस न जाए।
इसके बाद वे लोग घर से निकल गये। रसानंद बाबू ने उन लोगों के साथ-साथ कुछ देर तक जाना चाहा। पर वे पीछे रह गये। जवांई ने बेटे को कंधों पर बिठा रखा था। वह कह रहा था, `मैं तो बीच में डर सा गया, तू लोभ संभाल नहीं पाएगी। साड़ी रख लेगी।' लड़की बोलीज्ञ् `क्या बात करते हो तुम? मैं क्या इतनी बेवकूफ हूं? साड़ी ले आती तो मेरी क्या इज्जत रह जाती? वे समझते भूखे लोग हैं। साड़ी वसूलने के लिए रिश्ते बनाते हैं। मुझे कोई दरकार नहीं इस पाट साड़ी की। मेरी फटी साड़ी ही मेरे लिए अच्छी है।
रसानंद बाबू तमाम प्रयासों के बावजूद उनसे ताल नहीं मिला सके, पीछे रह गये। क्रमश: रसानंद बाबू और उन लोगों में फासला बढ़ता गया। वे लोग जल्दी-जल्दी पांव बढ़ा रहे थे, आसन्न विपत्ति से मुक्ति पाने की खुशी में। मूल्यवान कुछ न गंवाने के आनन्द में। खरीदारी खत्म करने के बाद शाम होने से पहले उन्हें घर पहुंचना होगा।
आज यू-ट्यूब पर कव्वालियाँ सुनते सुनते अचानक अब्दुल रहीम फ़रीदी कव्वाल को सुनने को मौका मिला । इससे पहले कभी इनको सुना नही था लेकिन एक बार सुना तो दिन भर सुनता रहा । अब तो ऐसा जादू तारी हो गया है कि बिना आपको सुनवाये मन नहीं मानेगा ।
तो सुनिये, ख्वाजा की जोगनिया मैं बन जाऊँगी ...
बस एक ही टीस है कि ऐसे बेमिसाल कलाकार आज के बाजार की माँग के आगे कैसे चलेंगे । क्या आपको भी यही टीस उठती है कभी कभी ?
नोट: ज्ञानदत्तजी के सुझाव पर पोस्ट का टाईटल बदल दिया गया है :-)
पिछले लगभग ६ वर्षों से मैं हर सप्ताह रासायनिक अभियांत्रिकी से सम्बन्धित (जैव-रासायनिकी, नैनो टेक्नालाजी आदि) कम से कम एक सेमिनार में उपस्थिति दर्ज कराता रहा हूँ । इस लिहाज से देखा जाये तो १५०-२०० सेमिनार सुन चुका हूँ (छुट्टियाँ हटाकर) । इन सब सेमिनारों में से कम से कम ३५-५०% सेमिनार मैने ध्यान से सुने होंगे । उनमें से भी १०-१५ % सेमिनारों के अन्त में मैने कोई प्रश्न पूछा होगा । कल ज्ञानदत्तजी ने पूर्वाग्रह और जडता की बात की थी, इन सेमिनारों में भी यही पूर्वाग्रह और जडता दिखती है । अगर सेमिनार बायो से सम्बन्धित है तो फ़्लूड-मेकेनिक्स वाले ध्यान नहीं देंगे । सेमिनार के बाद बोलेंगे कि बायो का पाखण्ड आजकल बहुत बढ गया है । बायो वाले बोलेंगे पूरी एक स्लाईड पर कठिन सी दिखने वाली Equations दिखाकर क्या समझाना चाहते हो ? फ़ंडिग के लिये नैनो के पाखण्ड की चर्चा तो हर कहीं है । आमतौर पर केवल सेमिनार का टाईटल सुनकर ही बहुत से फ़ैसला कर लेते है कि उसको ध्यान से सुनना भी है या नहीं । फ़िर अगर ध्यान से सुनो भी तो कुछ १०% सेमिनार ही होंगे जिनके बाद १-२ से अधिक प्रश्न पूछे गये हों ।
एक व्यक्ति जो उस क्षेत्र में शोध नहीं कर रहा होता है, द्वारा पूछा गया प्रश्न सबसे दिलचस्प होता है । जिस प्रश्न के अंत में स्पीकर यह कहे कि "ये बहुत उत्तम प्रश्न है", पक्का जानिये कि उस प्रश्न का सीधा जवाब स्पीकर कभी (>९० % मौकों पर ) नहीं देगा । घुमा फ़िराकर कुछ बात कही जायेगी और पूछने वाला भी शान्त हो जायेगा ।
इसके अलावा एक श्रोता के हिसाब से मुझे सेमिनार में प्रश्न पूछना बडा कठिन होता है । कभी कभी ध्यान से सुनने के बाद भी जेहन में कोई सवाल नहीं आते हैं । कभी कभी आपका प्रश्न कोई दूसरा पूछ देता है । कभी कभी कोई भी प्रश्न नहीं होता है और बेचारा स्पीकर और प्रोफ़ेसर शर्मसार होने लगते हैं । फ़िर ऐसे में कोई १-२ प्रोफ़ेसर सवाल पूछ्ने का उपक्रम करते हैं । कुछ सवाल इतने लंबे होते हैं और पूछ्ने वाला इतनी धीमी आवाज में पूछता है कि प्रश्न और उसके उत्तर में कोई साम्य नहीं दिखता । "फ़िलासाफ़िकली स्पीकिंग", से शुरू होने वाले प्रश्नों के उत्तर अधिकतर लम्बे खिंचते हैं और उनका पूछे गये प्रश्न से ताल्लुख कुछ कम ही होता है ।
लेकिन बीच बीच में कुछ इतने अच्छे सेमिनार सुनने को मिलते हैं कि मन वाह वाह कर उठता है । एक अच्छे सेमिनार के लिये उस विषय पर अच्छे अधिकार के साथ ही अच्छे प्रेजेन्टेशन स्किल्स की भी आवश्यकता होती है । इस बारे में विस्तार में फ़िर कभी...
आज हमारे कालेज में एक पिकनिक का आयोजन हुआ था । लिहाजा मुफ़्त का खाना और बीयर चाँपने के लिये हम भी वहाँ उपस्थित हुये । दूर से देखा तो एक कोने में एक मेज पडी थी और कुछ टी-शर्ट वहाँ रखी हुयी थी । हमने तुरन्त उस तरफ़ का रूख किया और पता चला कि इस टी-शर्ट को जीतने के लिये एक प्रतियोगिता है । प्रतियोगिता थी कि आपको एक बडा सा छल्ला अपनी कमर में डालकर उसको पाँच मिनट तक लगातार नचाना था । इसके ऐवज में आप टी-शर्ट के हकदार होते ।
हम भी चल दिये अपनी किस्मत आजमाने । पहले प्रयास में बुरी तरफ़ फ़ेल, कुल ८ सेकेन्ड में ही छ्ल्ला नीचे आ गया । लेकिन हमने देखा कि कन्यायें अपनी नाजुक कमर में छल्ला डाले बडी आसानी से उसे घुमाये जा रही थीं । लिहाजा हमने थोडे सब्र से उनसे कुछ सीख ली और नाजुक कमर को बल खाते भी देखा :-)
फ़िर जो हुआ उसका नतीजा आपके सामने है । जरा सी मेहनत और भौतिकी के सभी नियमों की मदद से हम भी इसके माहिर हो गये और लगातार पाँच मिनट तक बिना रूके छ्ल्ला नचाकर हमने वो टी-शर्ट जीती । लीजिये आप इन चित्रों और इस खास वीडियो का आनन्द लें :-)
फ़िर तो हम ऐसे माहिर हो गये थे कि एक हाथ में बीयर के कप से चुस्कियाँ ले रहे थे और छल्ला हमारी कमर में बेदस्तूर नाचे जा रहा था । क्या आपने कभी ऐसी मेहनत से टी-शर्ट जीती है ???
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उस्ताद असलम खान साहब खुर्जा और अतरौली (जयपुर) घराने से ताल्लुख रखते हैं । आज मैं आपको उनकी महफ़िल में गायी हुयी चचा गालिब की दो गजलें सुनवा रहा हूँ । उस्ताद असलम खान को इस अंदाज में सुनने का अंदाज ही अलग है । उस्तादजी का नजाकत से कहना कि "दादरा लगाओ" और उसके बाद मोहक अंदाज में मिर्जा गालिब की गजलों को जिन्दा कर देने की अदा निराली ही है ।
पहली गजल है ।
मेरी किस्मत में गम गर इतने थे, दिल भी या रब कई दिये होते । (फ़ुटकर शेर)
रोने से और इश्क में बेबाक हो गये, धोये गये हम ऐसे के बस पाक हो गये ।
करने गये थे उनसे तगाफ़ुल का हम गिला, कि एक ही निगाह, के बस खाक हो गये ।
कहता है कौन लाला-ए-बुलबुल को बेअसर, परदे में गुल के लाख जिगर चाक हो गये ।
इस रंग से उठाई कल उसने असद की नास, दुश्मन भी जिसको देखके नमनाक हो गये ।
दूसरी गजल है,
सारी दुनिया मुझे कहती तेरा सौदाई है, अब मेरा होश में आना तेरी रूसवाई है ।
जब तुझे दिल से भुलाने की कसम खाई है, और पहले से जियादा तेरी याद आयी है ।
मैं हूँ जिन्दा में मेरे घर में बहार आयी है, कौन से जुर्म की मैने ये सजा पायी है ।
साकिया मय से मैं तौबा करू तौबा तौबा, मैने दुनिया के दिखाने को कसम खाई है ।
कैद रहता हूँ तो तौहीन है बालोफ़र की, और उड जाऊँ तो सय्याद की रूसवाई है ।
देखिये कैसे पंहुचते हैं किनारे हम लोग, नाव तूफ़ां में है मल्लाह को नींद आयी है ।
मैने पिछली पोस्ट में गाँधीजी आत्मकथा के आडियो की पहली दो कडियाँ पेश की थी । मजे की बात है कि इससे ज्ञानदत्तजी को पुस्तकों की आडियोबुक का विचार आया और मेरी समझ में हम ब्लागर मिलकर इसे मूर्त रूप दे सकते हैं । मेरी आशा से कहीं अधिक टिप्पणियाँ मिली और लोगों ने इस श्रृंखला को जारी रखने को कहा ।
नोट: गाँधीजी की गुजराती आत्मकथा का अंग्रेजी अनुवाद उनके सचिव श्री महादेव देसाई जी ने किया था ।
आज मैं आडियो की तीसरी और चौथी कडियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
प्यारे भडासी भाई: आप भी इसे सुने और पुराना दौर याद करें । उनकी खास फ़रमाईश पर पेश है,
कोई दीवार से लग के बैठा रहा और भरता रहा सिसकियां रात भर आज की रात भी चाँद आया नही राह तकती रही खिड़कियां रात भर
गम जलाता किसे कोई बस्ती ना थी मेरे चारो तरफ़ मेरे दिल के सिवा मेरे ही दिल पे आ आ के गिरती रही मेरे एहसास की बिजलियां रात भर
दायरे शोख रंगो के बनते रहे याद आती रही वो कलाई हमें दिल के सुनसान आंगन मे बजती रही रेशमी शरबती चूड़ियां रात भर
कोई दीवार से लग के बैठा रहा और भरता रहा सिसकियां रात भर आज की रात भी चाँद आया नही राह तकती रही खिड़कियां रात भर -अनाम शायर
पेश है, शायर का नाम अनाम है किसी को पता चले तो सूचित करे (यूनुसजी, आप सुन रहे हैं न???) । आवाज अशोक खोसला की है, ये वही अशोक खोसला हैं जिनका गाया गीत "अजनबी शहर में अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे" काफ़ी प्रसिद्ध हुआ था । इस गीत को यूनुसजी ने अपनी रेडियोवानी पर भी सुनवाया था ।
लीजिये पेश-ए-खिदमत है: कोई दीवार से लग के बैठा रहा !!!
पिछले साल गाँधी जयन्ती के अवसर पर उनकी आत्मकथा का आडियो जारी हुआ था । इस लगभग ८० मिनट के आडियो में गाँधीजी के जीवन से सम्बधित मुख्य घटनाओं को उनकी आत्मकथा के माध्यम से कहा गया है । प्रमुख आवाजें शेखर कपूर और नन्दिता दास की हैं । रेडिफ़ पर इस सन्दर्भ में जानकारी यहाँ पर है और इस लिंक पर जाकर आप स्वयं इस आडियो को मात्र पचास रूपये में मंगा सकते हैं । गाँधीजी के बारे में जितना पढा जाये उतना कम है और मुझे लगता है कि आज का युवा उनके बारे में अपनी राय उनके बारे में बिना किसी प्रयास के जानकारी ग्रहण किये केवल सुनी सुनायी बातों से कायम करता सा दिखता है । गाँधीजी अजातशत्रु नहीं थे, और ऐसा नहीं कि उनसे गलतियाँ न हुयी हों परन्तु मेरी समझ में वो गलतियाँ उनके विशाल व्यक्तित्व को छोटा नहीं बना देती ।
मेरी परेशानी ये है कि ये आडियो अंग्रेजी में है और अपनी व्यस्तता से मैं इस आडियो का अनुवाद करने में अक्षम हूँ । चूँकि आमतौर पर १० मिनट से लम्बा आडियो बोझिल हो जाता है, मैं इस आडियो को कई कडियों में प्रस्तुत कर रहा हूँ । सभी कडियाँ ९-१४ मिनट की अवधि की हैं । इस पोस्ट में मैं पहली दो कडियाँ सुनवा रहा हूँ । यदि आपको ये पसन्द आये तो अपनी टिप्पणी अवश्य दें जिससे बाकी कडियाँ भी प्रस्तुत की जा सकें ।
इस कडी में अनूप जलोटा जी के स्वर में सीता स्वयंवर को सुनिये । ये प्रसंग मुझे बेहद पसंद है । इसमें तुलसीदासजी ने राजा जनक की मनोस्थिति का सजीव चित्रण किया है ।
हिन्दी विकीपीडिया से श्रीरामचरितमानस के ये अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति, चली राखि उर स्यामल मूरति || प्रभु जब जात जानकी जानी, सुख सनेह सोभा गुन खानी || परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही, चारु चित भीतीं लिख लीन्ही || गई भवानी भवन बहोरी, बंदि चरन बोली कर जोरी || जय जय गिरिबरराज किसोरी, जय महेस मुख चंद चकोरी || जय गज बदन षड़ानन माता, जगत जननि दामिनि दुति गाता || नहिं तव आदि मध्य अवसाना, अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना || भव भव बिभव पराभव कारिनि, बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ||
दोहा - पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख, महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष || २३५ || सेवत तोहि सुलभ फल चारी, बरदायनी पुरारि पिआरी || देबि पूजि पद कमल तुम्हारे, सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे || मोर मनोरथु जानहु नीकें, बसहु सदा उर पुर सबही कें || कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं, अस कहि चरन गहे बैदेहीं || बिनय प्रेम बस भई भवानी, खसी माल मूरति मुसुकानी || सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ, बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ || सुनु सिय सत्य असीस हमारी, पूजिहि मन कामना तुम्हारी || नारद बचन सदा सुचि साचा, सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा ||
छं:- मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो, करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो || एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली, तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ||
सो:- जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि, मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे || २३६ || हृदयँ सराहत सीय लोनाई, गुर समीप गवने दोउ भाई || राम कहा सबु कौसिक पाहीं, सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं || सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही, पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही || सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे, रामु लखनु सुनि भए सुखारे || करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी, लगे कहन कछु कथा पुरानी || बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई, संध्या करन चले दोउ भाई || प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा, सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा || बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं, सीय बदन सम हिमकर नाहीं ||
अनीताजी ने अनूप जलोटाजी के स्वर में रामचरितमानस सुनने की आकांक्षा व्यक्त की थी । उनके आदेश पर एक प्रसंग प्रस्तुत कर रहा हूँ । यदि अन्य पाठकगण इसे पसन्द करेंगे तो ये कडी आगे भी जारी रहेगी ।
हिन्दी विकीपीडिया के सौजन्य से:
दो०-गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि। मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि॥२६५॥ –*–*– तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे॥ उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे॥१॥ लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ॥ तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को बरई॥२॥ जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई॥ साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी॥३॥ बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई॥ सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई॥४॥ दो०-देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु। लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु॥२६६॥ –*–*– बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू॥ जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही॥१॥ लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई॥ हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा॥२॥ कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी॥ रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं॥३॥ रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया॥ भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं॥४॥ दो०-अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप। मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप॥२६७॥ –*–*– खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं॥ तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयसु भृगुकुल कमल पतंगा॥१॥ देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने॥ गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा॥२॥ सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा॥ भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते॥३॥ बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला॥ कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें॥४॥ दो०-सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरुप। धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप॥२६८॥ –*–*– देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥ पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥१॥ जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥ जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥२॥ आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं॥ बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥३॥ रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥ रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥४॥ दो०-बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर॥ पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥२६९॥ –*–*– समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥ सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥१॥ अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥ बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥२॥ अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी॥सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥३॥ मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥ भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥४॥ दो०-सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु। हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥२७०॥ मासपारायण, नवाँ विश्राम –*–*– नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥ आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥१॥ सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥ सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥२॥ सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥ सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥३॥ बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥ एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥४॥ दो०-रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार॥ धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥२७१॥ –*–*– लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥ का छति लाभु जून धनु तौरें। देखा राम नयन के भोरें॥१॥ छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू । बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा॥२॥ बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही॥ बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही॥३॥ भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥ सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥४॥ दो०-मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर। गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर॥२७२॥ –*–*– बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥ पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥१॥ इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥ देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥२॥ भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी॥ सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई॥३॥ बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें॥ कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा॥४॥ दो०-जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर। सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर॥२७३॥ –*–*– कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु॥ भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू॥१॥ काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं॥ तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा॥२॥ लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा॥ अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी॥३॥ नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू॥ बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा॥४॥ दो०-सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥२७४॥ –*–*– तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥ सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥१॥ अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू॥ बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा॥२॥ कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥ खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही॥३॥ उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें॥ न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥४॥ दो०-गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ। अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ॥२७५॥ –*–*– कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा॥ माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें॥१॥ सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा॥ अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली॥२॥ सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा॥ भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही॥३॥ मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े॥ अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे॥४॥ दो०-लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु। बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु॥२७६॥ –*–*– नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू॥ जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना॥१॥ जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं॥ करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी॥२॥ राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने॥ हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी॥३॥ गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं॥ सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मौहीं॥४॥ दो०-लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल। जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल॥२७७॥ –*–*– मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया॥ टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने॥१॥ जौ अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई॥ बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं॥२॥ थर थर कापहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी॥ भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी॥३॥ बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा॥ मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसैं॥४॥ दो०- सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम। गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम॥२७८॥ –*–*– अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥ सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना॥१॥ बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ॥ तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी में नाथ तुम्हारा॥२॥ कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाई॥ कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई॥३॥ कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें॥ एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा॥४॥ दो०-गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर। परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर॥२७९॥ –*–*– बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥ भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥१॥ आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा॥ बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥२॥ जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता॥ देखु जनक हठि बालक एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू॥३॥ बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा॥ बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं॥४॥ दो०-परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु। संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु॥२८०॥ –*–*– बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें॥ करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा॥१॥ छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही॥ भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ॥२॥ गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू॥ टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू॥३॥ राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा॥ जेंहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी॥४॥ दो०-प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु। बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु॥२८१॥ –*–*– देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी॥ नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेंहिं दीन्हा॥१॥ जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं॥ छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी॥२॥ हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा॥कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा॥ राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा॥३॥ देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥ सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥४॥ दो०-बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम। बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम॥२८२॥ –*–*– निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥ चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू। कोप मोर अति घोर कृसानु॥१॥ समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई॥ मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे॥२॥ मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें॥ भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा॥३॥ राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी॥ छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं कहि हेतु करौं अभिमाना॥४॥ दो०-जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ। तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ॥२८३॥ –*–*– देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना॥ जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ॥१॥ छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना॥ कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी॥२॥ बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई॥ सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के॥३॥ राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥ देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥४॥ दो०-जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात। जोरि पानि बोले बचन ह्दयँ न प्रेमु अमात॥२८४॥ –*–*– जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु॥ जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥१॥
राईस विश्वविद्यालय में भारतीय विद्यार्थी संघ ने हर साल की तरह इस बार भी होली का आयोजन किया । इस प्रविष्टी में हम आपको इस भव्य आयोजन का आंखो देखा हाल तस्वीरों के साथ पेश कर रहे हैं ।
कल रात को हम अपने तीन अन्य मित्रों के साथ बालीवुड की बहुचर्चित फ़िल्म "रेस" देखने गये । फ़िल्म के बारे में फ़िर कभी लेकिन रात को सोते सोते २ बज गये । सुबह १०:२० मिनट पर अलसाई आंखों से नींद खुली और याद आया कि आज तो सुबह १० बजे होली खेलने जाना था । बिस्तर पर ही अजदकी मुद्रा में दो बार पलटी मारने के बाद हाथ में मोबाईल आया । दोस्तों को फ़ोन लगाया तो पता चला कि हम ही सबसे पहले उठ गये थे, कई दोस्तों को दोस्ती का वास्ता देकर होली खेलने जाने को राजी किया । एक पुरानी सी टी-शर्ट, थोडे से फ़टे जूते और एक नया सा पायजामा पहनकर हम होली के रंग में रंगने के लिये निकल पडे ।
मेरे दोनो रूममेट में से कोई भी अपनी कार निकालने को तैयार नहीं था (एक की गाडी में तेल खत्म हो गया था तो दूसरी की में कुछ और गडबड थी :-) )। लिहाजा हमें अपने गरीब रथ को निकालना पडा और दोस्तों को ताकीद की कि कई सारे पुराने अखबार रख लो जिससे कि वापिस लौटते समय कपडे बचें तो सीट पर अखबार बिछाकर बैठ जाना वरना अखबार लपेटकर घर आ जाना :-)
जब कालेज पँहुचे तो वहाँ का दॄश्य अवर्णनीय था । एक बडे से हरे मैदान पर ७-८ लोग खडे होकर भीड जमने का इन्तजार कर रहे थे । हमने दूर से ही हाथ हिलाकर अपने आने का संकेत दिया तो देखा कि वो सभी हाथों में पानी से भरे गुब्बारे और बाल्टी में पानी लेकर हमारी तरफ़ आने लगे । हमने उनको कहा कि थोडा सब्र करो हम खुद ही तुम्हारे पास आये जाते हैं । पहले हमें गुलाल में स्नान कराया गया और उसके बाद ३-४ बाल्टी पानी डाला गया । तब तक मैदान में पानी से कीचड जैसा कुछ नहीं बन पाया था । बदन में थोडी तरावट आ गयी तो हमने भी बाकी लोगों को रंग लगाकर, गले लगाकर होली की बधाईयाँ दी ।
इसके बाद लोग आते रहे और सभी रंग, पानी और पानी भरे गुब्बारों से उनका स्वागत करते रहे । बीच बीच में कुछ विदेशी भी हमारे हल्ले में शामिल हुये और फ़िर जल्दी ही पतली गली से निकल लिये । तभी एकमत (ये हमारा ही था) से निर्णय लिया गया कि इस बार प्राकृतिक रूप से होली खेली जायेगी । पानी के दोनों पाईपों का बहाव मैदान के एक हिस्से पर केन्द्रित करने के उपरान्त थोडे ही प्रयास से मिट्टी और पानी से समागम से गीली मिट्टी कीचड जैसी दिखने लगी । अब चूँकि मिट्टी और पानी दोनो प्राकृतिक तत्व हैं इसमे मिलावट का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता है । सभी लोगों ने ध्वनिमत से हमारी सोच का समर्थन किया और हमें पहला शिकार आता दिखायी दिया ।
हमारे परममित्र होली खेलने सपत्नीक आ रहे थे । उनको मिट्टी में लेटाकर और ऊपर से ढेर सारा पानी डालकर इस महान Environmentally Friendly होली का श्रीगणेश किया गया । देखने लायक बात थी कि उनकी पत्नी ने उनको जमीन पर लेटाने और ऊपर से पानी उडेलने में हम सबका भरसक सहयोग किया । इतने पर पत्नीजी की अन्य सहेलियों ने पत्नीजी को मिट्टी में बैठाकर रंग लगाने का कार्यक्रम प्रारम्भ कर दिया था ।
अब किसी का कभी भी नम्बर लग सकता था । १५-२० लोगों की भीड किसी भी शख्स का नाम ले लेती थी और तुरन्त उसका हैप्पी बर्थडे मन जाता था । हमारे पुराने अनुभव ने हमें बताया कि ऐसे में जितना जल्दी नंबर लग जाये उतना अच्छा होता है । यही सोचकर जब हमारे नाम का उद्घोष हुआ तो हम स्वयं ही कीचड में जाकर बैठ गये, एक हाथ से पानी का पाईप पकडा और अपने आप को गीला कर लिया । आस पास वाले १-२ लोगों ने हम पर ३-४ बाल्टी मिट्टी का पानी डाला और हमारा होली संस्कार सम्पन्न हो गया । इसके बाद हमें किसी का भी होली संस्कार करने का लाइसेंस भी मिल गया था ।
तुरन्त नये नये तरीके आजमाये जाने लगे । दोस्तों को साथ बैठाकर, पति पत्नी को साथ बैठाकर, रिसर्च इंट्रेस्ट के हिसाब से लोगों को बैठाकर सबका होली संस्कार किया गया । मजे की बात थी कि कोई जोर जबरदस्ती नहीं थी :-) सब कुछ एक पूर्ववत घोषित कार्यक्रम की तरह चलता चला जा रहा था । इस प्रकार पानी, मिट्टी, गुलाल, मिट्टी, फ़िर गुलाल, फ़िर पानी और अन्त में कीचड के साथ सबका होली संस्कार सम्पन्न हुआ ।
अन्त में तस्वीरें जिससे सनद रहे ।
(भारतीय विद्यार्थी संघ की अध्यक्षा अनुभा गोयल का होली संस्कार)
(भारतीय विद्यार्थी संघ के उपाध्यक्षा गौतम किमि का होली संस्कार)
(कहीं कोई जबरदस्ती नहीं, सभी पूरी मौज के मूड में थे) (अब दोस्तों के साथ थोडी जोर जबरदस्ती तो चलती ही है) (सभी होली की उमंग में घर से हजारो मील दूर, लेकिन सभी एक परिवार की तरह) हमें उचककर अपना फ़ोटो खिंचवाते हुये देखा जा सकता है :-) (होली के रंग में देसी क्या और विदेशी क्या सब मस्त थे) ध्यान दें मेहमानों को पूरे सम्मान से साथ बिना मिट्टी के होली का आनन्द लेने की छूट थी :-)
(मौका मिले और सारी लडकियाँ एक साथ फ़ोटो न खिंचवायें, ऐसा हुआ है कभी? )
(होली खेलने के बाद बढिया मिठाई का मजा ही कुछ और था)
I am a graduate student in Chemical Engg. at Rice University. I was recruited into BCRR over two free beers one fine Wednesday evening. I have been running with BCRR since then. I am also serving on BCRR board as "Member at Large".
I come from India so catch me at Valhalla for some interesting stories about Indian culture and people.