गुरुवार, मई 01, 2008
तेल और भविष्य के ऊर्जा स्रोत : भाग १
पिछले कुछ महीनो में शायद कोई ही हो जिसने कच्चे तेल की बढती कीमतों पर विचार न किया हो । कल कच्चे तेल का दाम ~ १२० डालर प्रति बैरल था; लेकिन आज से लगभग ४ वर्ष पहले ५० डालर प्रति बैरल का दाम असम्भावित सा लगता था । मैं अपनी रोजी रोटी तेल से सम्बन्धित शोध कार्य से कमाता हूँ इसलिये इस क्षेत्र की अधिक से अधिक जानकारी रखना मेरी मजबूरी है । इस विषय से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर देने के लिये मैं इस सीरीज को आरम्भ कर रहा हूँ और मुझे खुशी होगी अगर आपके प्रश्नों को इस सीरीज में शामिल किया जा सके ।
तेल से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
१) क्या अगले १०-२०-३० वर्षों में तेल समाप्त हो जायेगा ?
२) अगर नहीं तो तेल का दाम अगले वर्षों में क्या होगा ?
३) तेल के बाद का भविष्य क्या है ? क्या तेल के समाप्त होने के बाद हम आर्थिक स्पाईरल (Downwards) देखेंगे ?
४) तेल के आगे और जहाँ कौन कौन से हैं?
आज हमारे पास कितना तेल बचा है इसका अलग लोगों के पास अलग जवाब है । लेकिन उससे पहले कुछ तथ्य इस प्रकार हैं । आज तक कुल मिला कर हम सब ने लगभग १ ट्रिलियन बैरल तेल का उपयोग किया है ।
१ ट्रिलियन बैरल = १००० बिलियन बैरल = १०००,००० मिलियन बैरल = १०^(१२) बैरल
तेल के मामले में हबर्ट का सिद्धान्त बेहद प्रसिद्ध है । हबर्ट के अनुसार जब कच्चे तेल का उत्पादन अपने चरम पर होगा उस समय तक हमने अपने तेल का ५० प्रतिशत भाग प्रयोग कर लिया होगा । उसके बाद चाहकर भी हम तेल का उत्पादन एक निश्चित दर पर नहीं रख पायेंगे और तेल का उत्पादन गिरता रहेगा जब तक कि हम पूरा तेल प्रयोग नहीं कर लेते । हबर्ट ने अमेरिका के सन्दर्भ में कहा था कि तेल का उत्पादन १९६८ में अपने चरम पर होगा और १९७० में अमेरिका में तेल का उत्पादन अपने चरम पर था । १९७० के बाद अमेरिका में तेल का उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है । इस लिहाज से देखा जाये तो हबर्ट का सिद्धान्त अमेरिका के सन्दर्भ में लगभग सही सिद्ध सा होता दिखता है ।
अगला महत्वपूर्ण प्रश्न है, कि क्या ग्लोबल तेल उत्पादन में भी हबर्ट का सिद्धान्त लागू होता है । क्या ग्लोबल तेल उत्पादन भी अपने चरम पर आकर गिरना शुरू होगा ? अगर हाँ तो ये कब होगा, या फ़िर ग्लोबल तेल उत्पादन अपने चरम पर आ चुका है ? यदि ऐसा है तो क्या हमारे पास केवल अगले १०-२०-३० साल का तेल बाकी है ? अगले कुछ सालों में तेल के दाम बढने/घटने की क्या सम्भावना है ? भारत और चीन जैसे विकासशील देश ग्लोबल तेल की आपूर्ति और दामों पर क्या असर कर रहे हैं ?
इस सीरीज में हम ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे । इस सीरीज की पहली कडी को पूर्ण करने के लिये हम एक प्रश्न की तह में जाने का प्रयास करेंगे । बाकी महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर क्रमश: अगली कडियों में मिलेंगे ।
प्रश्न १: आखिर कुल कितना तेल बाकी है इस धरती पर ???
उत्तर: कच्चे तेल को दो प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है । पहला Conventional Oil और दूसरा Un-Conventional Oil । Conventional Oil का मतलब है कि ऐसा तेल स्रोत जिससे अभी तक तेल निकाला जाता रहा है । उदाहरण के तौर पर सऊदी अरब, मेक्सिको, लिबिया, नाईजिरिया और अन्य सभी सुने हुये स्रोत । Conventional Oil निकालने के लिये तरीका आसान है । पहले तेल का कुँआ खोदकर Pressure Depletion से जितना तेल निकले निकाल लो । उसके बाद पानी Inject करके और तेल निकालो । Conventional Oil लगभग ६ से ९ ट्रिलियन बैरल की मात्रा में उपलब्ध है ।
Un-conventional Oil के कई प्रकार हैं, कनाडा में उपलब्ध Tar sand, अमेरिका और अन्य स्थानों पर उपलब्ध Oil Shale और अन्य भारी तेल के स्रोत । इसके बारे में इतना समझ लें कि ये टेढी खीर है । इस प्रकार के तेल की श्यानता (Viscosity) इतनी अधिक होती है कि ये आसानी से बहता (Flow) नहीं करता है और इसके बारे में आजकल काफ़ी शोध चल रहा है । Un-Conventional Oil लगभग २ से ७ ट्रिलियन बैरल की मात्रा में उपलब्ध है ।
इसके अलावा महत्वपूर्ण है कि इसमें से Recovery Efficiency क्या है ? मान लीजिये १०० बैरल तेल मौजूद है तो इसमें से अगर आप ४० बैरल निकाल पायें तो आपकी Recovery Efficiency 40 % हुयी । आजकल ग्लोबली Recovery Efficiency लगभग ३०-३५ % है । Un-Conventional Oil के सन्दर्भ में Recovery Efficiency लगभग १०-२० % है ।
इस लिहाज से देखा जाये तो अभी भी लगभग ४-६ ट्रिलियन बैरल तेल अभी और निकाला जा सकता है । दूसरे शब्दों में अभी केवल एक चौथाई से भी कम तेल निकाला गया है । इस अंदाजे से अभी ग्लोबल हबर्ट पीक दूर की कौडी है । तेल मौजूद है बस निकालने वाले चाहिये । इसमें भी एक समस्या है, अगर तेल की माँग बढती गयी और इसी दर से तेल की आपूर्ति नहीं बढी तो निश्चित तौर पर तेल के दाम बढेंगे । जैसे जैसे तेल के दाम बढेंगे, तेल कम्पनियों का फ़ायदा बढेगा और तेल कम्पनियाँ Un-Conventional Oil/Alternate Energy में निवेश करके भविष्य के तेल/ऊर्जा की माँग के सन्दर्भ में आपूर्ति सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगी ।
बाटम लाईन: अभी चिंतित होने की जरूरत नहीं है । तेल है और अगले ३०-५०-६०-८०-१०० वर्षों तक रहेगा । लेकिन केवल तेल के रहने से समस्यायें हल नहीं होंगी, इसीलिये इस लेख की अगली कडी में हम अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करेंगे ।
यदि इस सन्दर्भ में आपके कोई प्रश्न हैं तो आप टिप्पणी के माध्यम से पूछ सकते हैं । हम उनके उत्तर देने का भरसक प्रयास करेंगे ।
मंगलवार, अप्रैल 29, 2008
एक ठुमरी और तीसरी कसम का गीत संवादों के साथ बोनस में !!!
पहला गीत: भैरवी राग (तीन ताल) में एक ठुमरी है जिसे पण्डित अजय पोहनकर ने गाया है । ठुमरी के बोल हैं, "कैसी ये भलाई"
दूसरा खास बोनस गीत फ़िल्म तीसरी कसम का है । इसकी खासियत है कि गीत के बीच बीच में राज कपूर साहब की आवाज में संवाद । मेरा दावा है कि इसे सुनकर आपको फ़िल्म की याद आ जायेगी ।
Technorati Tags भैरवीं,पं,अजय,पोहानकर,तीसरी,कसम
बुधवार, अप्रैल 23, 2008
दिल को छू लेने वाली कहानी !!!
ये कहानी थोडी लम्बी अवश्य है लेकिन आपके धैर्य का आपको भरपूर फ़ल मिलेगा, ऐसी मेरी आशा है ।
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आतिथ्य
प्रीतीश आचार्य
रूपांतर : आयुष्मान गोस्वामी
रसानंद बाबू को अपने पर गुस्सा आ रहा था। मिस्त्री की बात मान ली होती तो यह दुर्दशा नहीं होती। कल जब साइकिल में हवा भरवाने गये थे तब उसने कहा थाज्ञ् `जल्द ही टायर बदलवा दीजिए।' एक ही दिन में उसकी बात सच निकली, तेज़ आवाज़ के साथ ट्यूब फट गया। कम से कम सुबह घर से निकलते समय फटा होता तो साइकिल ठीक करके निकलते या फिर निकलते ही नहीं। अब क्या करें? उनकी नज़र कलाई पर बंधी घड़ी पर पड़ी, सोचने लगे ग्यारह बज रहे हैं, यहां से पदमपुर साइकिल से जाओ तो पूरा एक घंटा। पैदल चलो तो तीन घंटे से कम नहीं लगेंगे। ऊपर से साइकिल ठेलना होगा। जब विपदा उपस्थित होती है तो जाने क्यों धूप का प्रकोप बढ़ जाता है और दूरी भी। सारी स्थिति की कल्पना करते हुए रसानंद बाबू के पांव थम से गये। प्यास के मारे गला सूखने लगा।
रसानंद बाबू ने पीछे मुड़कर देखाज्ञ् एक औरत चली आ रही है। उसकी चाल से उन्हें लगा कि मानों वह उन तक पहुंचना चाहती हो। खेत से लौट रही है, पति के लिए नाश्ता लेकर गयी थी। वहीं कुछ देर पति के साथ काम किया होगा और अब लौट रही है। पति से पहले उसे घर पहुंचना होगा। भात भी बनाना है, बच्चे इंतजार कर रहे होंगे। औरत के सिर पर एक परात थी जिस पर पलाश के कुछ पत्ते, दो-चार खजूर के दातुन, साथ में मुट्ठी भर जलावन लकड़ी जो चूल्हा जलाने के काम आयेगी। उस औरत के साथ बिना कोई बात किये रसानंद बाबू ने यह सब अनुमान लगा लिया। अनुमान लगाते हुए उनके चेहरे पर एक क्षीण मुस्कराहट दौड़ गयी। मुस्कराहट ने उनका कष्ट कुछ कम कर दिया। जासूसी उपन्यास में इसी तरह जासूस कई बातें जान लेता है, बिना कुछ पूछे, पहली मुलाकात में ही, किसी ज्योतिषी की तरह। बचपन में उन्होंने बहुत सारे जासूसी उपन्यास पढ़े थे। मन में दबी हुई इच्छा भी थी जासूस बनने की। क्या पता मौका मिलता तो शायद बन भी गए होते। फोन पर फोन करते। हुक्म तामील करने के लिए हमेशा सहायक मौजूद रहते।
लेकिन पता नहीं, क्या सोचकर वे मलेरिया विभाग में घुस गए। धेले भर की आमदनी नहीं। महीने भर तनख्वाह का इंतज़ार करो, कर्ज चुकाओ। उस पर रोज़ दस-बीस मील की साइकिल यात्रा और रास्ता भी ऐसा कि साइकिल का एक पंचर बनवाने के लिए कोई मिस्त्री न मिले। इतना सब सोच चुके थे रसानंद बाबू कि वह औरत उनके बराबर में चलते दिखाई दी। `मां, तुम्हारे गांव में कोई साइकिल की दुकान तो नहीं है?' रसानंद बाबू को पता है, आस-पास कोई साइकिल की दुकान नहीं है। कुछ दिन पहले किसी ने बताया तो था, साइकिल का बालबेरिंग किसी ने अपनी स्वदेशी बुद्धि से ग्रीस के बदले लकड़ी का गुड़ लगाकर सेट किया था। सुनकर रसानंद बाबू भी खूब हंसे थे। आज उन्हें लग रहा था साइकिल का पंचर सुधारने का ऐसा ही कुछ स्वदेशी उपाय होता तो इस प्राणांतक धूप से छुटकारा मिल जाता। `न इस गांव में तो कोई नहीं है। सीधे पदमपुर जाना पड़ेगा।' कहते हुए उस औरत ने रसानंद बाबू का सपना तोड़ा और पूछाज्ञ् `तुम्हें कहां तक जाना है, काका!' उसकी बातों से लगा वह रसानंद बाबू की विपदा से दुखी है। कोई बीस-बाईस साल की उम्र होगी उस औरत की, रसानंद बाबू की छोटी बेटी के बराबर। शादी को चार-पांच साल हो गये होंगे, उसके एक-दो बच्चे भी हो चुके होंगे। `मां' के बदले बेटी संबोधित किया जाता तो शायद ज्यादा फबता। पर, एक लड़की अपने जन्म से मृत्यु तक मां ही तो रहती है। शादी से पहले मां-बाप-भाई की सेवा, शादी के बाद पति-पुत्र की सेवा और बुढ़ापे में नाती-नातिन की सेवा। बिना किसी प्रति-उपकार के सारा जीवन सेवा करना ही मानों उसका धर्म है। मां के अलावा कौन करेगा इतनी सेवा? बदले में उसे मिलता क्या है! बेचारी तरसती रहती है पूरी ज़िन्दगी दो टूक स्नेह और संबोधन के लिए। यहां मिलेगा। न, न यहां नहीं, वहां। या फिर और कहीं। इसी तरह के विचारों से रसानंद बाबू का मन करुणा से द्रवीभूत हो गया। वे आत्म-समीक्षा करने लगे। खुद उन्होनें भी क्या दिया है, वह स्नेह और श्रद्धा भरा संबोधन!
`काका! पदमपुर तक जाओगे?' पहले प्रश्न का जवाब न मिलने पर औरत ने एक बार फिर पूछा। `हां, मां!' इतना कहने के बाद सदानंद बाबू का मन आत्म-दया से भर गया। उन्हें लगा जैसे आंखों से आंसू निकल आएंगे। भरी धूप में साइकिल घसीटते-घसीटते वे अब पदमपुर तक जाएंगे। बचपन में शरीर पर कहीं चोट आने पर, मां के सहलाने के बाद जैसे वे रोया करते थे, आज न चाहते हुए भी उन्हें वैसे ही रोने का मन करने लगा। इतने में औरत पूछ बैठीज्ञ् `क्या तुम पदमपुर में नौकरी करते हो काका, तुम्हारा अपना घर कहां है?'
`बुटोमाल!' रसानंद बाबू ने कहा। `घेंसबुटोमाल'।
`हां'
`मेरी भाभी भी तो बुटोमाल की बेटी है। तुम जानते होगे। झांकट घर की। केतकी। उसकी और मेरी एक ही लगन में शादी हुई थी। इस आषाढ को चार साल हो जाएंगे।' लड़की जैसे संबंध जोड़ने के लिए उतावली हो रही थी। रसानंद बाबू को अपनी बेटी की उम्र में रखने के बाद वह औरत एक छोटी बच्ची से ज्यादा बड़ी नहीं लग रही थी। एक बातूनी, बार-बार सवाल करने वाली, जो जवाब न मिलने तक चुप न रहती हो। तीन-चार साल की छोटी-सी लड़की।
`अच्छा, अच्छा, कहीं तू समारू की बेटी की बात तो नहीं कर रही है? वह जो तालपाली में ब्याही है। चार लड़कों में एक लड़की। अच्छी लड़की है।' रसानंद बाबू ने कहा।
अब रसानंद बाबू और लड़की बराबर साथ-साथ चल रहे थे। दोनों में बातचीत का विषय थाज्ञ् केतकी और उसका बाप समारू। बाप के मरने के बाद पांचवी कक्षा में समारू की पढ़ाई छूट गई। रसानंद बाबू का यजमान है उसका परिवार। गांव छोड़ने के साथ-साथ रसानंद बाबू का यजमानी से भी नाता छूट गया। अब ये सब काम चाचा के लड़के देखते हैं। पर अपनी बेटी की शादी में समारू नहीं माना, `पंडित, चार बेटों में एक ही बिटिया है। तू जब तक पोथी नहीं पढ़ेगा, उसकी शादी नहीं होगी।' रसानंद बाबू शादी में पदमपुर से आये थे। जवांई देखने में लोहे के मूसल की तरह, सांवला, सख्त, मुंह एकदम गोल, शरीर काफी गढ़ा हुआ। इस सब का जाकर पत्नी से भी जिक्र किया था। उसी लड़के की बहन है यह लड़की।
`हमारी बेटी को ठीक तरह से रखा है न तुम्हारे दादा ने?' रसानंद बाबू ने इस आग उगलती धूप में थोड़ा मजाक किया। `लड़की' के साथ बातचीत करते हुए धूप का प्रकोप कुछ कम-सा लगा। अब आ गया है उसका गांव जहां वह रुक जाएगी। उसके बाद कष्ट झेलना होगा। रसानंद बाबू ने मन ही मन आशंका की।
`काका! जब मैं तुम्हारी बेटी जैसी हूं तो एक बात कहूंगी, तुम मना मत करना।' लड़की ने अपने गांव का रास्ता पकड़ने से पहले कहा।
`बोलो मां', रसानंद बाबू ने पूछा।
`तुम इस भरी धूप में मत जाओ। मेरे घर में दोपहर में रह जाओ। इतनी धूप है, क्या पता कुछ हो जाए तो?'
`न रे मां! घर पर तेरी काकी मेरा इंतजार कर रही होगी। फिर मुझे ऑफिस भी जाना होगा।' रसानंद बाबू के तर्क बनावटी नहीं हैं। गरमी में ज़रा सी देर हो जाने पर पत्नी घर से बाहर, बाहर से अन्दर होती रहती है। बेटियों की शादी के बाद बेचारी घर पर अकेली रह नहीं पाती है। सूना घर जैसे उसे खा जाता है। पर उससे भी बड़ी बात है कैसे वे किसी के यहां मेहमान हो जाएं। दो मिनट तो हुए इस परिचय को। दूसरी तरफ मन कर रहा था कुछ देर रुक जाने को। इन दिनों बूढ़ों के लिए लू से बड़ा यम कोई नहीं है। प्राण रहे तो सब ठीक है। एक ओर प्रचंड धूप का प्रकोप, दूसरी ओर लड़की का स्नेह भरा निमंत्रण।
`काका! हमें तुम छोटी जात का गरीब मानते हो तो बात अलग है। नहीं तो तुमको इस भरी दोपहर में जाना नहीं चाहिए। मेरी भाभी के तुम जब काका हो तो मेरे भी तो काका हुए। मैं तुम्हारी अपनी बेटी होती तो क्या तुम इस तरह चले जाते।' लड़की की बातों में आत्मीयता थी, साथ था कुछ अभिमान। पर उससे भी ज्यादा था मन में यह डर कि रास्ते में बूढ़े को लू लग जाए तो, आखिर पाप तो उसे ही लगेगा न। उपन्यास के जासूस की तरह रसानंद बाबू ने लड़की के मन की बातों को ताड़ लिया। सोचने लगेज्ञ् क्या उम्र है इसकी अभी! स्कूल का मुंह तो शायद इसने देखा भी नहीं होगा। पर, कितनी समझदारी है इसमें। कितनी चालाकी से इसने मुझे अपना कर लिया है। हो सकता है यह मेरे मन की बात को भी जान चुकी होगी। दोपहर की धूप में साइकिल ठेलते हुए बूढ़े में पदमपुर तक जाने की न ताकत है और न ही आग्रह।
`ना रे मां! मैं तो कुछ और सोच रहा था। एक तो तेरे सास-ससुर का घर और अब तू खेत से लौट रही है। घर पर कितने सारे काम पड़े होंगे। उसके ऊपर मेरा बोझ।' रसानंद बाबू ने कहा।
`क्या बात करते हो तुम काका। मेरे बाप-काका आते तो मैं क्या भगा देती। वैसे भी मेरे सास-ससुर अपनी बेटी के यहां गये हैं। कल लौटेंगे। तेरा जंवाई बेचारा कितना खुश होगा, तुम्हें देखकर और अगर तुम दो घड़ी रहोगे तो मुझे कौन-सा कष्ट है। तुम तो ठहरे बाम्हन जात। मैं चूल्हा जला दूंगी, तुम भात उतार लेना। मुझे कौन-सा काम करना पड़ेगा।
अंतत: रसानंद बाबू लड़की के घर गए। उन्हें लगा, जैसे दूसरे लोक से उनकी मां लौट आयी है। तेज़ धूप में बच्चे को किसी तरह बचाना है। पेट भर खिलाना-पिलाना है। लड़की का छोटा-सा घर, दो ही कमरे। आधी छत खपरैल की, बाकी घास-फूस की। आंगन में मिट्टी की हंडिया में पानी रखा है। रस्सी की एक चारपाई पड़ी है। चारपाई पर एक फटी-पुरानी गुदड़ी बिछी है। छोटे बच्चे के लिए कोमल शय्या। बच्चा सोया था शायद। बीच में जाग जाने पर पड़ोसी घर ले गये होंगे। घर में पहुंचते ही लड़की ने सिर से परात को उतारा। तुरन्त काका के लिए पानी ले आयी। खाट पर बिछी गुदड़ी को अंदर ले गयी। वहां बैठने को कहा। उसके बाद वह गई पड़ोसी के घर बच्चे को देखने। पल भर भी विश्राम नहीं। एकदम यंत्र की तरह।
रसानंद बाबू कुछ देर तक खाली खाट पर बैठे, फिर लेट गये। थोड़ी देर बाद सो भी गये। सिर के नीचे तकिया न था, घर पर शायद तकिया नहीं है या फिर है भी तो गंदा-पुराना। शायद इसीलिए लड़की ने काका को तकिया नहीं दिया हो।
रसानंद बाबू की पतली नींद लड़की और उसके पति की फुसर-फुसर बातचीत से टूटी। लड़की कह रही थीज्ञ् `मेरी भाभी के गांव का आदमी है, उनके घर का पुरोहित। पदमपुर में नौकरी करता है। इस गरमी में साइकिल ठेलते हुए जा रहा था। मैंने सोचा लू न लग जाए।' इस पर उसका पति बोलाज्ञ् `यह सब तो ठीक है पर क्या खिलाओगी इसे!' लड़की ने जवाब दियाज्ञ् `तुम क्या इतना मूर्ख समझते हो मुझे। एक बा्रह्मण को एक जून खिला नहीं पाऊंगी, बासी परवाल (भीगा कर रखा गया भात, इसे पांता भात भी कहा जाता है।) है, हम दोनों के लिए हो जाएगा। नुनकी के घर से पाव भर चावल लायी हूं। बूढ़े के लिए भात चढ़ा दिया है। बनबासी पंसेरी से आलू लाकर चावल में डाल दिया है, सीज जाएगा। दो कच्चे केले तोड़ लाई हूं बागान से। चूल्हे में रख दूंगी। चावल चढ़ा दिया है, पकने पर बूढ़े को जगा दूंगी, उतार लेगा। थक गया है। अभी सो लेने दो उसे एक नींद।'
लड़की की बातों पर पति को कोई असहमति नहीं है। पत्नी की सामर्थ्य पर उसे पूरा भरोसा है। तब भी उसने पूछाज्ञ् `बेटा क्या बासी परवाल खाएगा, हमारे साथ।' लड़की ने जवाब दियाज्ञ् `न, न, उसे क्यों बासी देने लगी। बूढ़ा आदमी क्या पाव भर चावल खा लेगा? बचेगा तो बेटे को खिला दूंगी। नुनकी के घर में कुछ खाया हुआ है, अभी खेल रहा है।' संतुष्ट होकर पति कहता हैज्ञ् `नुनकी के घर से वो कांसे की थाली मांग लेना। गिलट की थाली में खाना देना अच्छा नहीं लगेगा।' लड़की बोलीज्ञ् `अरे! तुमको पता नहीं, नुनकी के भाई की बीमारी में कांसे की थाली गिरवी चली गई, कहां निकाल पाये उसे? डूब गई वो तो।' `तो अब क्या करोगी?' उसके पति ने पूछा। शायद उसे नुनकी के घर की कांसे की थाली डूबने पर चिंता नहीं थी। चिंता थी तो इस बात की कि अब कहां से आयेगी कांसे की थाली। पर लड़की के उत्साह में कोई कमी नहीं है। उसने कहाज्ञ् `कांसे की थाली की क्या जरूरत है, खेत से मैं कच्चे पलाश के पत्ते ले आयी थी। पत्तल-दोना बना दूंगी।'
`थोड़ी-सी दाल होती तो अच्छा होता। सूखा भात बूढ़ा खाएगा भी तो कैसे खाएगा!' पति ने कहा।
ज्ञ् `क्यूं! अचार है। नमक पानी डालने से रस्सेदार तरकारी बन जाएगी।' लड़की के जवाब से लगा, हर सवाल का उत्तर देने की तैयारी उसने पहले से कर रखी है। अंतत: पति ने आश्वस्त भाव से कहाज्ञ् `और क्या? अपने घर पर जो है, वही तो खिला पाएंगे हम।'
इन सारे प्रसंग में रसानंद बाबू का मन कर रहा था, पति-पत्नी की बातों के बीच कहेंज्ञ् `मेरे लिए इतनी चिंता मत करो। कुछ भी होने से मेरा काम चल जाएगा। दोपहर को तुमने आश्रय दिया, ये क्या कम बात है!' पर वे उठ नहीं आये, गहरी नींद में सोने का अभिनय किये रहे। पति-पत्नी को मालूम नहीं होना चाहिए कि मैं उनकी बातों को सुन रहा था, यदि मालूम हो जाए तो बेचारे नंगे हो जाएंगे। शर्म से मुंह नहीं दिखा पाएंगे। पति-पत्नी के बीच प्रेम के अलावा और भी कई चीजें हैं जो तीसरे आदमी को पता नहीं चलनी चाहिए। उन्हें अपने घर की बात याद आई। महीने का वह आखिरी सप्ताह, जब बड़े समधी और समधन आ पहुंचे। दुर्भाग्य था जिस बनिए से उधार आता है, उसके बेटे की शादी होने के कारण दुकान भी बंद थी। वैसे में रसानंद बाबू की नज़र पड़ती है, पत्नी के हाथ खर्च की गोलक पर। मायके से लौटते हुए या फिर बाज़ार के हिसाब से बचाकर या फिर कैसे न कैसे करके पत्नी अपनी बचत को एक गोलक में रखती है। पचास-सौ रुपये निकले उसमें से। उसी से आधा किलो बासमती चावल, कुछ महंगी सब्जियां और साथ में मछली या मांस ले आये थे। केवल उनके लिए उन दिनों स्पेशल बनता है। एक बार तो समधी अड़ गए कि दोनों समधी एक साथ खाने पर बैठेंगे। रसानंद बाबू ने कहाज्ञ् `मैं तो नौ बजे भात खाकर ऑफिस जाने वाला प्राणी हूं। दोपहर को आपके साथ खाना खाऊं, एक तो तबीयत बिड़ेगी, दूसरे ऑफिस छोड़कर घर आने पर मेरी नौकरी चली जाएगी। समधी भी ज़िद पर अड़े थे, कहने लगेज्ञ् `तब तो नौ बजे मैं भी आपके साथ बैठूंगा।' अंतत: दाल में पानी डाला गया और तरकारी में चावल का चूरा। `सोमवार को मैं मांस नहीं खाता हूं। पूछना हो तो पूछ लीजिए अपनी समधन से।' यह कहते हुए रसानंद बाबू ने अपने लिए रास्ता बनाया। इसके बावजूद लगा, जैसे कोई बीच रास्ते में उनकी धोती चीर रहा हो। उनकी विनती कोई सुन नहीं रहा है।
`काका! उठोगे नहीं? भात पक गया है, उतार लो।' लड़की की आवाज़ ने रसानंद बाबू को जगा दिया। मुंह-हाथ धोकर वे भात उतारने लगे। मन कर रहा था बोलने काज्ञ् `बेटी! तूने जब सारे काम कर ही दिए तो भात भी उतार देती, मेरी कौन-सी जात चली जाती?' पर वे बोले नहीं। जात-कुजात के संस्कार की बात समझाने का यह समय नहीं है। हो सकता है लड़की समझेगी नहीं। उसके लिए जैसे सम्मान में काका बड़ा है, जात में ब्राह्मण भी ऊंचा है। फिर वे अपने आपसे पूछने लगे सचमुच मैं क्या संस्कारवादी दृष्टि से ये सब सोच रहा हूं। या आलस में कोई काम नहीं करना चाहता हूं। लड़की के हाथों सारे काम करवाना चाहता हूं।
खाने पर जब बैठे तो उसी पुराने दृश्य की पुनरावृत्ति हुई। रसानन्द बाबू ने सुझाव दिया, सब लोग एक साथ बैठ जाएं। जंवाई ने कहाज्ञ् `आप ठहरे बाहमन, गोस्वामी, मैं कैसे साथ बैठूंगा!' बेटा तो पहले से खा चुका है और रही लड़की तो उसकी बारी अंत में है। रसानंद बाबू समझ गए। उन्होंने जोर नहीं दिया। समधी की तरह नासमझ नहीं हैं।
खाना खाते समय एक बार फिर केतकी की बात आयी। `तुम कुछ भी कहो काका, मेरी भाभी के दुख का कोई अंत नहीं है। बचपन से मां नहीं है। अब बाप बीमार पड़ा तो बिस्तर में ही झा़डा-पेशाब सब कुछ। चार-चार बेटे, पर कोई नहीं पूछता। भाभी रोती रहती है। कहती है, काश भगवान ने मुझे लड़का बनाया होता तो मेरे बाप की यह दुर्दशा नहीं होती। मैं कहती हूं, भाभी! तू लड़का पैदा हुई होती तो अपने भाइयों से कोई अलग होती?' समग्र पुरुष समाज के नाम लड़की का अभियोग।
रसानंद बाबू को अब तक पता नहीं था कि समारू बिस्तर पकड़ चुका है। पिछले महीने तो वे गांव गये थे। किसी ने भी नहीं कहा। पर उन्होंने खुद भी तो कभी प्रयत्न नहीं किया, अपने बचपन के दोस्त के बारे में जानने का। आज किस मुंह से कहेंगे, समारू उसके बचपन का साथी है, पर गांव में उससे कभी मुलाकात तक नहीं होती। इतनी होशियार लड़की, उपन्यास के जासूस की तरह उनकी चालबाज़ी को पकड़ भी चुकी होगी। रसानंद बाबू के मन में भय सा पैदा हो गया।
`तुम लोग एक बार पदमपुर आओ बेटी! दो दिन रहकर जाओ। अच्छा लगेगा। तेरी काकी भी बहुत खुश होगी।' रसानंद बाबू के मन में अंदेशा हुआ, यह उनकी मन की बात नहीं है। समारू की चर्चा को टालने की मनसा से उन्होंने यह निमंत्रण दिया है। अपनी चालबाज़ी के लिए लड़की के आगे आत्म-समर्पण करने से पहले मानों वे उसके हाथों घूस थमा रहे थे।
शरीर में थकान थी, पेट में भूख। खाना भी खूब स्वादिष्ट था। गरम भात, आलू, केले का भर्ता (चोखा) अचार, झोल (शोरबा) और हरी मिर्च। देगची से भात निकालते हुए उन्हें डर लग रहा था, बच्चे के लिए कुछ बचेगा तो, या लोभवश सारा भात अकेले उंड़ेल लेंगे।
भोजन के बाद रसानंद बाबू फिर कुछ देर के लिए सो गए। जब तक उनकी नींद खुली, जंवाई वापस खेत पर जा चुका था। मेहमान की खातिरदारी के लिए उसके पास समय कहां है? मुंह-हाथ धोने के बाद रसानन्द बाबू भी निकल पड़े। निकलने से पहले लड़की को एक बार फिर परिवार सहित पदमपुर आने का निमंत्रण दिया। आने का दिन भी तय कर गये। निमंत्रण कोई बनावटी नहीं है, यह सिद्ध करने के लिए इससे ज्यादा और कह भी क्या सकते थे!
इस घटना के दो महीने बाद सचमुच अपना परिवार लिए लड़की पदमपुर पहुंची। घर में पहुंचते ही एक थैला लड़की ने काकी के हाथ थमा दिया। उसमें आठ-दस कच्चे केले, दो पाव मूढ़ी-धान (लाई), एक किलो के माफिक परवल और अलग से कुछ पुड़ियाआें में सुखुआ (सूखी) मादल (मछली)। अपने पति की ओर इशारा करते हुए उसने कहाज्ञ् `समझे, काका! तुम्हारे जंवाई के साथ मेरा खूब झगड़ा हुआ, कह रहे थे, ये सब क्या ले रही हो। शहर में क्या कोई ऐसी चीजें खाता है?' मैंने कहाज्ञ् `काका-काकी मेरे गांव के लोग हैं। शहर में रह रहे हैं तो क्या, गांव का खाना भूल जाएंगे। उनके घर में क्या पेड़े-रसगुल्ले की कमी है, जो हम यहां से लेकर जाएं।'
पहली मुलाकात में ही रसानंद बाबू की पत्नी ने लड़की और उसके परिवार को एकदम अपना लिया। बोलने लगीज्ञ् `तुम ठहरी बेटी, मां के घर जब बेटी आती है, तो क्या कभी कुछ लेकर आती है?' रसानंद बाबू ने कहाज्ञ् `परवल उनको बहुत पसंद है।' केले की उन्नत आकृति देखकर पत्नी ने आश्र्चर्य जताया। लड़की और उसके पति आश्वस्त हुए। साथ में `कुछ' नहीं लाने की ग्लानि उन्हें खा नहीं गयी। दो दिन में ही वे लोग रसानंद बाबू के परिवार के साथ घुल-मिल गये। पत्नी ने जिस आत्मीयता से उन लोगों के साथ बातचीत की, रसानंद बाबू आश्र्चर्यचकित रह गए। महिलाएं सचमुच बहुत ही बुद्धिमती होती हैं। परिस्थिति के साथ ताल मिलाकर चलने में वे हमेशा पुरुष से ज्यादा पारंगत मालूम पड़ती हैं। लगता है जैसे वर्षों से वह उन लोगों को जानती हो।
इस बीच दो बार लड़की ने घर में झाड़ू लगा दी। एक स्टूल पर चढ़कर लंबी झाड़ू से ऊपर का जाला भी साफ कर दिया। आंगन में मिट्टी का एक चूल्हा बनाने का उसने प्रस्ताव रखा यह कहकर कि कभी कभार काकी उस पर मूढ़ी (लाई) भूजेंगी। उसके लिए केवल उसे एक फावड़ा चाहिए। दूसरी ओर जवांई को भी फावड़ा चाहिए। बाहर एक गड्ढा खोद देगा, बची-खुची साग-सब्जी उसमें डालते जाओ, अच्छी खाद बन जाती है। अपनी बगिया में कुछ लगा लो, तो सरकारी खाद की जरूरत नहीं होती है। अपनी बगिया की सब्जी में जो मिठास है, बाज़ार की सब्जी में कहां?
पत्नी बीच-बीच में उन्हें रोक रही थी। `मां के घर पर कभी बेटी-जवांई काम करते हैं?' उसकी बातों को लड़की अनसुना कर देती थी। `यह भला कोई काम है? मां की मदद बेटी नहीं करेगी तो और कौन करेगा?' एक-दो बार रसानंद बाबू ने भी उन्हें रोका। पर, उनके रोकने में दम नहीं था। `मेरी अपनी बेटियां भी तो गरमी-दशहरे में जब आती हैं, अपनी बूढ़ी मां की मदद करती हैं।' पर, उन्हें अहसास हुआ कि ये तर्क वे लड़की को अपनी बेटी मानकर नहीं दे रहे थे, पत्नी का काम यथासंभव कम करने के स्वार्थ से दे रहे थे। अपने ओछेपन को वे पहचान पाये। फिर भी लड़की और उसके पति को काम करने से जोर देकर रोका नहीं, चुप रहे।
रात को लड़की और उसके पति में काफी देर तक फुसर-फुसर चली। रसानंद बाबू की पतली नींद। पास के कमरे में वे लेटे हुए थे। न चाहते हुए भी उन दोनों की बातें उनके कानों तक आ रही थीं। यहां मेहमान होकर आने के अलावा पदमपुर में उन लोगों का एक और बड़ा काम है। बाज़ार से कपड़े खरीदना। बात चल रही थी किसके लिए कपड़े खरीदे जाएं। बेटे के लिए पैंट-शर्ट या फिर `लड़की' के लिए साड़ी या पति के लिए धोती। लड़की का तर्क थाज्ञ् `मैं तो घर पर रहती हूं। तुमको कई बार आना होता है पदमपुर बाजार। सब्जी बेचने या फिर कुछ न हुआ तो साहू की बैलगाड़ी के साथ। हाट में काका के साथ इस फटी हुई धोती में भेंट हो जाए तो मेरी और क्या इज्जत रह जाएगी। घूम-घामकर बात भाभी के कानों में पड़ेगी।' सुनते ही उसका पति बिगड़ गयाज्ञ् `फालतू की बात मत कर, किसी की नज़र मुझ पर नहीं पड़ेगी। तू फटा पहनेगी तो लोग तुझ पर नहीं मुझ पर हंसेंगे।' लड़की ने कहाज्ञ् `मैं कह नहीं रही थी, गागर को गणेशिया के घर गिरवी रख देते हैं। पदमपुर जब जा ही रहे हैं, सबके लिए थोड़ा-बहुत कपड़ा ले आयेंगे। तुमने तो मना कर दिया। प्रधान के घर बर्तन मांजकर मैं दो महीने में गागार निकाल लाती।' जवांई ने कहाज्ञ् `छोड़ो भी, बेटे के इक्कीसवें पर उसके मामू ने जो पीतल की थाली दी थी, वह क्या निकल पायी! इसलिए मैं कहता हूं चीज़ें गिरवी रखने का कोई मतलब नहीं है। बेच दो तो कम से कम ठीक-ठाक दाम तो मिल जाएंगे।' लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। अंतत: तय हुआ बेटे के कपड़े अगली बार खरीदेंगे। लड़की के लिए आठ हाती (आठ हाथ का) एक थान कपड़ा लेंगे और जवऎंई के लिए एक गंड (मोटे कपड़े) चार हाती (चार हाथ का) गमछा बारिश के दिनों में जरूरत पड़ने पर पहना भी जा सकेगा। कपड़े खरीदने की बात तय होने के बाद लड़की ने प्रस्ताव रखा काका के साथ दुकान पर जाएंगे, तनिक सस्ता मिल जाएगा। जवांई को यह बात पसंद नहीं आयी। `बड़ी दुकान में जाने के लिए पैसे होने चाहिए। काका के आगे मोल-भाव करना भी अच्छा नहीं लगेगा।' आखिर में तय हुआ, काका के घर से निकल जाने पर वे लोग बाज़ार जाएंगे। खरीदारी के बाद वहां से सीधे घर चल देंगे। रिश्तेदारों के आगे खरीदारी करके आदमी को अपमानित नहीं होना चाहिए।
रसानंद बाबू सारी बातें सुनते रहे। पति-पत्नी की बातों में कोई अस्वाभाविकता दिखाई नहीं पड़ी। परिवार की पूरी आस रहती है, थोड़ी-सी खेती के ऊपर। कभी धान को बंगी कीड़े खा गये, तो कभी सूखे की चपेट में सारी खेती लुट गयी। छोटे किसान हैं ये लोग अनायास बेचारे मजदूरी के स्तर पर उतर आते हैं। पेट काटकर साग-सब्जी को बाज़ार में बेचेंगे। अपनी खेती का काम जल्द खत्म करते ही दूसरे के खेतों पर काम करेंगे। उसके बाद ही साल भर के लिए कपड़ा-लत्ता खरीदेंगे, शादी-ब्याह में शामिल होंगे। दशहरा और रथयात्रा के लिए चंदा देंगे। क्या धूप, क्या बरसात! चींटी की तरह एक-एक दाना जोड़ रहे होंगे। उसके बावजूद गिरवी रखा बरतन निकलता नहीं, डूब जाता है। छत की टूटी हुई खपरैल के बदले घास-फूस लगाते हैं। कभी किसी के बीमार पड़ जाने पर ज़मीन भी चली जाती है। सब कुछ सरल, स्वाभाविक छंदहीन है इनका संसार। जन्म, मृत्यु, बाढ़ और सूखे की तरह।
रसानंद बाबू को याद आया, दशहरे में देने के लिए दोनों बेटियों के लिए साड़ी खरीदकर रखी थी। छोटी बेटी के दादा ससुर चल बसे, बेटी आयी नहीं। श्राद्ध के बाद आएगी। उसकी साड़ी रखी हुई है। दुकान में लौटाई नहीं। उस साड़ी को इस लड़की को दे दें तो? पत्नी के आगे प्रस्ताव रखने का साहस नहीं हुआ, मना कर देगी तो? रहने दो, रसानंद बाबू ने करवट बदली। आजकल नींद नहीं आती आसानी से। कभी-कभी तो सारी रात कट जाती है। सब उम्र का ही दोष है। पत्नी के आगे प्रस्ताव न रखने के पीछे केवल पत्नी का डर ही क्या एकमात्र कारण है? या साथ में अपनी कंजूसी भी। छोड़ो भी, ये लोग खेत में काम करते हैं, मोटी साड़ी पहनते हैं। महंगी-पतली साड़ी से इनका काम नहीं बनेगा। रसानंद बाबू को याद आया। मजदूरों को नाश्ता बांटते हुए, मां ठीक इसी तरह के तर्क दिया करती थीज्ञ् महीन चावल के भात इनको हजम नहीं होते हैं, ये ठहरे मजदूर लोग, मोटे चावल का भात इन्हें अच्छा लगता है।
सुबह नाश्ते में पत्नी ने पूड़ियां बनाई थीं। साथ में रस्सेदार परवल की सब्जी। केवल खास मेहमानों के लिए पत्नी इस तरह का नाश्ता बनाती है। पत्नी के सम्मान-बोध से रसानंद बाबू बहुत प्रसन्न हुए।
आखिर लड़की और उसके परिवार के जाने का समय हुआ। पत्नी ने कब से थैले में वह साड़ी डाल रखी है। रसानंद बाबू को शायद इस बात का पता भी न लगता, यदि लड़की थैले को देखते ही चिल्ला न उठती। मानों कुछ अप्रत्याशित सा घट गया। `न, न, ये क्या कर रही हो काकी। मैं बिलकुल नहीं लूंगी। मेरे पास तो कई साड़ियां हैं। मैं क्या करूंगी साड़ी का?' लड़की ने कहा।
`क्या बात कर रही हो तुम, तुम्हारे पास क्यों साड़ी की कमी होने लगी! पर, मां के घर से क्या बेटी कभी खाली हाथ लौटती है? लोग क्या कहेंगे मुझे?' पत्नी ने कहा। रसानन्द बाबू को लगा, पत्नी ने भी सुनी है इन लोगों की बातें। डर से रसानंद बाबू के आगे साड़ी देने का प्रस्ताव रख न सकी। उनसे छिपाकर साड़ी दे देने को तय किया था। बाद में रसानंद बाबू नाराज होते तो चुपचाप सह जाती।
काकी का तर्क सुनकर लड़की एक बार चुप रही। शायद सोच रही थी प्रतितर्क क्या रखेगी। फिर बोलीज्ञ् `ठीक है काकी, तूने दिया है मैं क्या इंकार करूंगी। यह साड़ी मैं रख रही हूं। अब मैं दे रही हूं अपनी बहनों को, रख लो, रखने से तू मना नहीं कर सकती क्योंकि मैं तुम्हें नहीं दे रही हूंं। दशहरे में जब मेरी बहनें आएंगी तो किसी एक को मेरी तरफ से दे देना।' लड़की ने साड़ी को काकी के हाथ में जबरदस्ती थमा दिया। अपने थैले के मुंह को इस तरह पकड़े रखा जैसे साड़ी उसके अन्दर जबरदस्ती घुस न जाए।
इसके बाद वे लोग घर से निकल गये। रसानंद बाबू ने उन लोगों के साथ-साथ कुछ देर तक जाना चाहा। पर वे पीछे रह गये। जवांई ने बेटे को कंधों पर बिठा रखा था। वह कह रहा था, `मैं तो बीच में डर सा गया, तू लोभ संभाल नहीं पाएगी। साड़ी रख लेगी।' लड़की बोलीज्ञ् `क्या बात करते हो तुम? मैं क्या इतनी बेवकूफ हूं? साड़ी ले आती तो मेरी क्या इज्जत रह जाती? वे समझते भूखे लोग हैं। साड़ी वसूलने के लिए रिश्ते बनाते हैं। मुझे कोई दरकार नहीं इस पाट साड़ी की। मेरी फटी साड़ी ही मेरे लिए अच्छी है।
रसानंद बाबू तमाम प्रयासों के बावजूद उनसे ताल नहीं मिला सके, पीछे रह गये। क्रमश: रसानंद बाबू और उन लोगों में फासला बढ़ता गया। वे लोग जल्दी-जल्दी पांव बढ़ा रहे थे, आसन्न विपत्ति से मुक्ति पाने की खुशी में। मूल्यवान कुछ न गंवाने के आनन्द में। खरीदारी खत्म करने के बाद शाम होने से पहले उन्हें घर पहुंचना होगा।
रविवार, अप्रैल 20, 2008
अब्दुल रहीम फ़रीदी कव्वाल की पेशकश !!!
तो सुनिये, ख्वाजा की जोगनिया मैं बन जाऊँगी ...
बस एक ही टीस है कि ऐसे बेमिसाल कलाकार आज के बाजार की माँग के आगे कैसे चलेंगे । क्या आपको भी यही टीस उठती है कभी कभी ?
भाग एक:
इसी कव्वाली का दूसरा भाग:
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साप्ताहिक डिपार्टमेण्ट सेमिनार की बखिया के उधडे धागे !!!
पिछले लगभग ६ वर्षों से मैं हर सप्ताह रासायनिक अभियांत्रिकी से सम्बन्धित (जैव-रासायनिकी, नैनो टेक्नालाजी आदि) कम से कम एक सेमिनार में उपस्थिति दर्ज कराता रहा हूँ । इस लिहाज से देखा जाये तो १५०-२०० सेमिनार सुन चुका हूँ (छुट्टियाँ हटाकर) । इन सब सेमिनारों में से कम से कम ३५-५०% सेमिनार मैने ध्यान से सुने होंगे । उनमें से भी १०-१५ % सेमिनारों के अन्त में मैने कोई प्रश्न पूछा होगा ।
कल ज्ञानदत्तजी ने पूर्वाग्रह और जडता की बात की थी, इन सेमिनारों में भी यही पूर्वाग्रह और जडता दिखती है । अगर सेमिनार बायो से सम्बन्धित है तो फ़्लूड-मेकेनिक्स वाले ध्यान नहीं देंगे । सेमिनार के बाद बोलेंगे कि बायो का पाखण्ड आजकल बहुत बढ गया है । बायो वाले बोलेंगे पूरी एक स्लाईड पर कठिन सी दिखने वाली Equations दिखाकर क्या समझाना चाहते हो ? फ़ंडिग के लिये नैनो के पाखण्ड की चर्चा तो हर कहीं है । आमतौर पर केवल सेमिनार का टाईटल सुनकर ही बहुत से फ़ैसला कर लेते है कि उसको ध्यान से सुनना भी है या नहीं । फ़िर अगर ध्यान से सुनो भी तो कुछ १०% सेमिनार ही होंगे जिनके बाद १-२ से अधिक प्रश्न पूछे गये हों ।
एक व्यक्ति जो उस क्षेत्र में शोध नहीं कर रहा होता है, द्वारा पूछा गया प्रश्न सबसे दिलचस्प होता है । जिस प्रश्न के अंत में स्पीकर यह कहे कि "ये बहुत उत्तम प्रश्न है", पक्का जानिये कि उस प्रश्न का सीधा जवाब स्पीकर कभी (>९० % मौकों पर ) नहीं देगा । घुमा फ़िराकर कुछ बात कही जायेगी और पूछने वाला भी शान्त हो जायेगा ।
इसके अलावा एक श्रोता के हिसाब से मुझे सेमिनार में प्रश्न पूछना बडा कठिन होता है । कभी कभी ध्यान से सुनने के बाद भी जेहन में कोई सवाल नहीं आते हैं । कभी कभी आपका प्रश्न कोई दूसरा पूछ देता है । कभी कभी कोई भी प्रश्न नहीं होता है और बेचारा स्पीकर और प्रोफ़ेसर शर्मसार होने लगते हैं । फ़िर ऐसे में कोई १-२ प्रोफ़ेसर सवाल पूछ्ने का उपक्रम करते हैं । कुछ सवाल इतने लंबे होते हैं और पूछ्ने वाला इतनी धीमी आवाज में पूछता है कि प्रश्न और उसके उत्तर में कोई साम्य नहीं दिखता । "फ़िलासाफ़िकली स्पीकिंग", से शुरू होने वाले प्रश्नों के उत्तर अधिकतर लम्बे खिंचते हैं और उनका पूछे गये प्रश्न से ताल्लुख कुछ कम ही होता है ।
लेकिन बीच बीच में कुछ इतने अच्छे सेमिनार सुनने को मिलते हैं कि मन वाह वाह कर उठता है । एक अच्छे सेमिनार के लिये उस विषय पर अच्छे अधिकार के साथ ही अच्छे प्रेजेन्टेशन स्किल्स की भी आवश्यकता होती है । इस बारे में विस्तार में फ़िर कभी...
पीएचडी कामिक्स डाट काम वालों ने इस मौके पर एक मस्त स्ट्रिप निकाली थी, उसी को यहाँ पर साभार पेश कर रहा हूँ
Technorati Tags बक
शुक्रवार, अप्रैल 18, 2008
अपनी नाजुक कमर के बल पर एक टी-शर्ट जीती !!!
हम भी चल दिये अपनी किस्मत आजमाने । पहले प्रयास में बुरी तरफ़ फ़ेल, कुल ८ सेकेन्ड में ही छ्ल्ला नीचे आ गया । लेकिन हमने देखा कि कन्यायें अपनी नाजुक कमर में छल्ला डाले बडी आसानी से उसे घुमाये जा रही थीं । लिहाजा हमने थोडे सब्र से उनसे कुछ सीख ली और नाजुक कमर को बल खाते भी देखा :-)
फ़िर जो हुआ उसका नतीजा आपके सामने है । जरा सी मेहनत और भौतिकी के सभी नियमों की मदद से हम भी इसके माहिर हो गये और लगातार पाँच मिनट तक बिना रूके छ्ल्ला नचाकर हमने वो टी-शर्ट जीती । लीजिये आप इन चित्रों और इस खास वीडियो का आनन्द लें :-)
फ़िर तो हम ऐसे माहिर हो गये थे कि एक हाथ में बीयर के कप से चुस्कियाँ ले रहे थे और छल्ला हमारी कमर में बेदस्तूर नाचे जा रहा था । क्या आपने कभी ऐसी मेहनत से टी-शर्ट जीती है ???
ये रहा वीडियो:
और ये रही चन्द तस्वीरें:
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बुधवार, अप्रैल 16, 2008
उस्ताद असलम खान साहब की आवाज में गालिब गजल !!!
पहली गजल है ।
मेरी किस्मत में गम गर इतने थे,
दिल भी या रब कई दिये होते । (फ़ुटकर शेर)
रोने से और इश्क में बेबाक हो गये,
धोये गये हम ऐसे के बस पाक हो गये ।
करने गये थे उनसे तगाफ़ुल का हम गिला,
कि एक ही निगाह, के बस खाक हो गये ।
कहता है कौन लाला-ए-बुलबुल को बेअसर,
परदे में गुल के लाख जिगर चाक हो गये ।
इस रंग से उठाई कल उसने असद की नास,
दुश्मन भी जिसको देखके नमनाक हो गये ।
दूसरी गजल है,
सारी दुनिया मुझे कहती तेरा सौदाई है,
अब मेरा होश में आना तेरी रूसवाई है ।
जब तुझे दिल से भुलाने की कसम खाई है,
और पहले से जियादा तेरी याद आयी है ।
मैं हूँ जिन्दा में मेरे घर में बहार आयी है,
कौन से जुर्म की मैने ये सजा पायी है ।
साकिया मय से मैं तौबा करू तौबा तौबा,
मैने दुनिया के दिखाने को कसम खाई है ।
कैद रहता हूँ तो तौहीन है बालोफ़र की,
और उड जाऊँ तो सय्याद की रूसवाई है ।
देखिये कैसे पंहुचते हैं किनारे हम लोग,
नाव तूफ़ां में है मल्लाह को नींद आयी है ।
लीजिये अब इसको चटखा लगाकर सुनिये:
सोमवार, अप्रैल 14, 2008
गाँधीजी की आत्मकथा का आडियो (तीसरी और चोथी कडी )
नोट: गाँधीजी की गुजराती आत्मकथा का अंग्रेजी अनुवाद उनके सचिव श्री महादेव देसाई जी ने किया था ।
आज मैं आडियो की तीसरी और चौथी कडियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
पहली और दूसरी कडियाँ यहाँ सुने:
ये रही तीसरी कडी:
ये रही चौथी कडी:
रविवार, अप्रैल 13, 2008
जीतूजी की फ़रमाईश पर, कोई दीवार से लग के बैठा रहा !!!
प्यारे भडासी भाई: आप भी इसे सुने और पुराना दौर याद करें ।
उनकी खास फ़रमाईश पर पेश है,
कोई दीवार से लग के बैठा रहा
और भरता रहा सिसकियां रात भर
आज की रात भी चाँद आया नही
राह तकती रही खिड़कियां रात भर
गम जलाता किसे कोई बस्ती ना थी
मेरे चारो तरफ़ मेरे दिल के सिवा
मेरे ही दिल पे आ आ के गिरती रही
मेरे एहसास की बिजलियां रात भर
दायरे शोख रंगो के बनते रहे
याद आती रही वो कलाई हमें
दिल के सुनसान आंगन मे बजती रही
रेशमी शरबती चूड़ियां रात भर
और भरता रहा सिसकियां रात भर
आज की रात भी चाँद आया नही
राह तकती रही खिड़कियां रात भर
-अनाम शायर
पेश है, शायर का नाम अनाम है किसी को पता चले तो सूचित करे (यूनुसजी, आप सुन रहे हैं न???) । आवाज अशोक खोसला की है, ये वही अशोक खोसला हैं जिनका गाया गीत "अजनबी शहर में अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे" काफ़ी प्रसिद्ध हुआ था । इस गीत को यूनुसजी ने अपनी रेडियोवानी पर भी सुनवाया था ।
लीजिये पेश-ए-खिदमत है: कोई दीवार से लग के बैठा रहा !!!
शनिवार, अप्रैल 12, 2008
गाँधीजी की आत्मकथा का आडियो (प्रथम दो कडियाँ)
गाँधीजी अजातशत्रु नहीं थे, और ऐसा नहीं कि उनसे गलतियाँ न हुयी हों परन्तु मेरी समझ में वो गलतियाँ उनके विशाल व्यक्तित्व को छोटा नहीं बना देती ।
मेरी परेशानी ये है कि ये आडियो अंग्रेजी में है और अपनी व्यस्तता से मैं इस आडियो का अनुवाद करने में अक्षम हूँ । चूँकि आमतौर पर १० मिनट से लम्बा आडियो बोझिल हो जाता है, मैं इस आडियो को कई कडियों में प्रस्तुत कर रहा हूँ । सभी कडियाँ ९-१४ मिनट की अवधि की हैं । इस पोस्ट में मैं पहली दो कडियाँ सुनवा रहा हूँ । यदि आपको ये पसन्द आये तो अपनी टिप्पणी अवश्य दें जिससे बाकी कडियाँ भी प्रस्तुत की जा सकें ।
ये रही पहली कडी:
और ये रही दूसरी कडी:
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रविवार, अप्रैल 06, 2008
सीता स्वयंवर श्री अनूप जलोटा के स्वर में !!!
हिन्दी विकीपीडिया से श्रीरामचरितमानस के ये अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति, चली राखि उर स्यामल मूरति ||
प्रभु जब जात जानकी जानी, सुख सनेह सोभा गुन खानी ||
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही, चारु चित भीतीं लिख लीन्ही ||
गई भवानी भवन बहोरी, बंदि चरन बोली कर जोरी ||
जय जय गिरिबरराज किसोरी, जय महेस मुख चंद चकोरी ||
जय गज बदन षड़ानन माता, जगत जननि दामिनि दुति गाता ||
नहिं तव आदि मध्य अवसाना, अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ||
भव भव बिभव पराभव कारिनि, बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ||
दोहा -
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख,
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष ||
२३५ ||
सेवत तोहि सुलभ फल चारी, बरदायनी पुरारि पिआरी ||
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे, सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ||
मोर मनोरथु जानहु नीकें, बसहु सदा उर पुर सबही कें ||
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं, अस कहि चरन गहे बैदेहीं ||
बिनय प्रेम बस भई भवानी, खसी माल मूरति मुसुकानी ||
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ, बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ||
सुनु सिय सत्य असीस हमारी, पूजिहि मन कामना तुम्हारी ||
नारद बचन सदा सुचि साचा, सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा ||
छं:-
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो,
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ||
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली,
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ||
सो:-
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि,
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ||
२३६ ||
हृदयँ सराहत सीय लोनाई, गुर समीप गवने दोउ भाई ||
राम कहा सबु कौसिक पाहीं, सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं ||
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही, पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही ||
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे, रामु लखनु सुनि भए सुखारे ||
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी, लगे कहन कछु कथा पुरानी ||
बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई, संध्या करन चले दोउ भाई ||
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा, सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा ||
बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं, सीय बदन सम हिमकर नाहीं ||
दोहा -
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक,
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक ||
२३७ ||
घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई, ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई ||
कोक सिकप्रद पंकज द्रोही, अवगुन बहुत चंद्रमा तोही ||
बैदेही मुख पटतर दीन्हे, होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे ||
सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी, गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी ||
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा, आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा ||
बिगत निसा रघुनायक जागे, बंधु बिलोकि कहन अस लागे ||
उदउ अरुन अवलोकहु ताता, पंकज कोक लोक सुखदाता ||
बोले लखनु जोरि जुग पानी, प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी ||
दोहा -
अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन,
जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन ||
२३८ ||
नृप सब नखत करहिं उजिआरी, टारि न सकहिं चाप तम भारी ||
कमल कोक मधुकर खग नाना, हरषे सकल निसा अवसाना ||
ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे, होइहहिं टूटें धनुष सुखारे ||
उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा, दुरे नखत जग तेजु प्रकासा ||
रबि निज उदय ब्याज रघुराया, प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया ||
तव भुज बल महिमा उदघाटी, प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी ||
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने, होइ सुचि सहज पुनीत नहाने ||
नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए, चरन सरोज सुभग सिर नाए ||
सतानंदु तब जनक बोलाए, कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए ||
जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई, हरषे बोलि लिए दोउ भाई ||
दोहा -
सतानंद&#६५५३३;पद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ,
चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ ||
२३९ ||
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई, ईसु काहि धौं देइ बड़ाई ||
लखन कहा जस भाजनु सोई, नाथ कृपा तव जापर होई ||
हरषे मुनि सब सुनि बर बानी, दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी ||
पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला, देखन चले धनुषमख साला ||
रंगभूमि आए दोउ भाई, असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई ||
चले सकल गृह काज बिसारी, बाल जुबान जरठ नर नारी ||
देखी जनक भीर भै भारी, सुचि सेवक सब लिए हँकारी ||
तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू, आसन उचित देहू सब काहू ||
दोहा -
कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि,
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि ||
२४० ||
राजकुअँर तेहि अवसर आए, मनहुँ मनोहरता तन छाए ||
गुन सागर नागर बर बीरा, सुंदर स्यामल गौर सरीरा ||
राज समाज बिराजत रूरे, उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे ||
जिन्ह कें रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी ||
देखहिं रूप महा रनधीरा, मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा ||
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी, मनहुँ भयानक मूरति भारी ||
रहे असुर छल छोनिप बेषा, तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा ||
पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई, नरभूषन लोचन सुखदाई ||
दोहा -
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप,
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप ||
२४१ ||
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा, बहु मुख कर पग लोचन सीसा ||
जनक जाति अवलोकहिं कैसैं, सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें ||
सहित बिदेह बिलोकहिं रानी, सिसु सम प्रीति न जाति बखानी ||
जोगिन्ह परम तत्वमय भासा, सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा ||
हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता, इष्टदेव इव सब सुख दाता ||
रामहि चितव भायँ जेहि सीया, सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया ||
उर अनुभवति न कहि सक सोऊ, कवन प्रकार कहै कबि कोऊ ||
एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ, तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ ||
दोहा -
राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर,
सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर ||
२४२ ||
सहज मनोहर मूरति दोऊ, कोटि काम उपमा लघु सोऊ ||
सरद चंद निंदक मुख नीके, नीरज नयन भावते जी के ||
चितवत चारु मार मनु हरनी, भावति हृदय जाति नहीं बरनी ||
कल कपोल श्रुति कुंडल लोला, चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला ||
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा, भृकुटी बिकट मनोहर नासा ||
भाल बिसाल तिलक झलकाहीं, कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं ||
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई, कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं ||
रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ, जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ ||
दोहा -
कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल,
बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल ||
२४३ ||
कटि तूनीर पीत पट बाँधे, कर सर धनुष बाम बर काँधे ||
पीत जग्य उपबीत सुहाए, नख सिख मंजु महाछबि छाए ||
देखि लोग सब भए सुखारे, एकटक लोचन चलत न तारे ||
हरषे जनकु देखि दोउ भाई, मुनि पद कमल गहे तब जाई ||
करि बिनती निज कथा सुनाई, रंग अवनि सब मुनिहि देखाई ||
जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ, तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ ||
निज निज रुख रामहि सबु देखा, कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा ||
भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ, राजाँ मुदित महासुख लहेऊ ||
दोहा -
सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल,
मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल ||
२४४ ||
प्रभुहि देखि सब नृप हिँयँ हारे, जनु राकेस उदय भएँ तारे ||
असि प्रतीति सब के मन माहीं, राम चाप तोरब सक नाहीं ||
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला, मेलिहि सीय राम उर माला ||
अस बिचारि गवनहु घर भाई, जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई ||
बिहसे अपर भूप सुनि बानी, जे अबिबेक अंध अभिमानी ||
तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा, बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा ||
एक बार कालउ किन होऊ, सिय हित समर जितब हम सोऊ ||
यह सुनि अवर महिप मुसकाने, धरमसील हरिभगत सयाने ||
सो:-
सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के ||
जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे ||
२४५ ||
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई, मन मोदकन्हि कि भूख बुताई ||
सिख हमारि सुनि परम पुनीता, जगदंबा जानहु जियँ सीता ||
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी, भरि लोचन छबि लेहु निहारी ||
सुंदर सुखद सकल गुन रासी, ए दोउ बंधु संभु उर बासी ||
सुधा समुद्र समीप बिहाई, मृगजलु निरखि मरहु कत धाई ||
करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा, हम तौ आजु जनम फलु पावा ||
अस कहि भले भूप अनुरागे, रूप अनूप बिलोकन लागे ||
देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना, बरषहिं सुमन करहिं कल गाना ||
दोहा -
जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई,
चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं ||
२४६ ||
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी, जगदंबिका रूप गुन खानी ||
उपमा सकल मोहि लघु लागीं, प्राकृत नारि अंग अनुरागीं ||
सिय बरनिअ तेइ उपमा देई, कुकबि कहाइ अजसु को लेई ||
जौ पटतरिअ तीय सम सीया, जग असि जुबति कहाँ कमनीया ||
गिरा मुखर तन अरध भवानी, रति अति दुखित अतनु पति जानी ||
बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही, कहिअ रमासम किमि बैदेही ||
जौ छबि सुधा पयोनिधि होई, परम रूपमय कच्छप सोई ||
सोभा रजु मंदरु सिंगारू, मथै पानि पंकज निज मारू ||
दोहा -
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल,
तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल ||
२४७ ||
चलिं संग लै सखीं सयानी, गावत गीत मनोहर बानी ||
सोह नवल तनु सुंदर सारी, जगत जननि अतुलित छबि भारी ||
भूषन सकल सुदेस सुहाए, अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए ||
रंगभूमि जब सिय पगु धारी, देखि रूप मोहे नर नारी ||
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई, बरषि प्रसून अपछरा गाई ||
पानि सरोज सोह जयमाला, अवचट चितए सकल भुआला ||
सीय चकित चित रामहि चाहा, भए मोहबस सब नरनाहा ||
मुनि समीप देखे दोउ भाई, लगे ललकि लोचन निधि पाई ||
दोहा -
गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि ||
लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि ||
२४८ ||
राम रूपु अरु सिय छबि देखें, नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें ||
सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं, बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं ||
हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई, मति हमारि असि देहि सुहाई ||
बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु, सीय राम कर करै बिबाहू ||
जग भल कहहि भाव सब काहू, हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू ||
एहिं लालसाँ मगन सब लोगू, बरु साँवरो जानकी जोगू ||
तब बंदीजन जनक बौलाए, बिरिदावली कहत चलि आए ||
कह नृप जाइ कहहु पन मोरा, चले भाट हियँ हरषु न थोरा ||
दोहा -
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल,
पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल ||
२४९ ||
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू, गरुअ कठोर बिदित सब काहू ||
रावनु बानु महाभट भारे, देखि सरासन गवँहिं सिधारे ||
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा, राज समाज आजु जोइ तोरा ||
त्रिभुवन जय समेत बैदेही ||
बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही ||
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे, भटमानी अतिसय मन माखे ||
परिकर बाँधि उठे अकुलाई, चले इष्टदेवन्ह सिर नाई ||
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं, उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं ||
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं, चाप समीप महीप न जाहीं ||
दोहा -
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ,
मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ ||
२५० ||
भूप सहस दस एकहि बारा, लगे उठावन टरइ न टारा ||
डगइ न संभु सरासन कैसें, कामी बचन सती मनु जैसें ||
सब नृप भए जोगु उपहासी, जैसें बिनु बिराग संन्यासी ||
कीरति बिजय बीरता भारी, चले चाप कर बरबस हारी ||
श्रीहत भए हारि हियँ राजा, बैठे निज निज जाइ समाजा ||
नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने, बोले बचन रोष जनु साने ||
दीप दीप के भूपति नाना, आए सुनि हम जो पनु ठाना ||
देव दनुज धरि मनुज सरीरा, बिपुल बीर आए रनधीरा ||
दोहा -
कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय,
पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय ||
२५१ ||
कहहु काहि यहु लाभु न भावा, काहुँ न संकर चाप चढ़ावा ||
रहउ चढ़ाउब तोरब भाई, तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई ||
अब जनि कोउ माखै भट मानी, बीर बिहीन मही मैं जानी ||
तजहु आस निज निज गृह जाहू, लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू ||
सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ, कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ ||
जो जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई, तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई ||
जनक बचन सुनि सब नर नारी, देखि जानकिहि भए दुखारी ||
माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें, रदपट फरकत नयन रिसौंहें ||
दोहा -
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान,
नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान ||
२५२ ||
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई, तेहिं समाज अस कहइ न कोई ||
कही जनक जसि अनुचित बानी, बिद्यमान रघुकुल मनि जानी ||
सुनहु भानुकुल पंकज भानू, कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू ||
जौ तुम्हारि अनुसासन पावौं, कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं ||
काचे घट जिमि डारौं फोरी, सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी ||
तव प्रताप महिमा भगवाना, को बापुरो पिनाक पुराना ||
नाथ जानि अस आयसु होऊ, कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ ||
कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं, जोजन सत प्रमान लै धावौं ||
रविवार, मार्च 23, 2008
लक्षमण-परशुराम सम्वाद: अनूप जलोटाजी के स्वर में!!!
हिन्दी विकीपीडिया के सौजन्य से:
दो०-गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि।
मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि॥२६५॥
–*–*–
तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे॥
उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे॥१॥
लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ॥
तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को बरई॥२॥
जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई॥
साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी॥३॥
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई॥
सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई॥४॥
दो०-देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु।
लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु॥२६६॥
–*–*–
बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू॥
जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही॥१॥
लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई॥
हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा॥२॥
कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी॥
रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं॥३॥
रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया॥
भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं॥४॥
दो०-अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप।
मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप॥२६७॥
–*–*–
खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं॥
तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयसु भृगुकुल कमल पतंगा॥१॥
देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने॥
गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा॥२॥
सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा॥
भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते॥३॥
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला॥
कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें॥४॥
दो०-सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरुप।
धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप॥२६८॥
–*–*–
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥१॥
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥२॥
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥३॥
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥४॥
दो०-बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर॥
पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥२६९॥
–*–*–
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥१॥
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥२॥
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी॥सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥३॥
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥४॥
दो०-सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥२७०॥
मासपारायण, नवाँ विश्राम
–*–*–
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥१॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥२॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥३॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥४॥
दो०-रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार॥
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥२७१॥
–*–*–
लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥
का छति लाभु जून धनु तौरें। देखा राम नयन के भोरें॥१॥
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ।
बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा॥२॥
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही॥
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही॥३॥
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥
सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा॥४॥
दो०-मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर॥२७२॥
–*–*–
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥१॥
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥२॥
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी॥
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई॥३॥
बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें॥
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा॥४॥
दो०-जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर॥२७३॥
–*–*–
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु॥
भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू॥१॥
काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं॥
तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा॥२॥
लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा॥
अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी॥३॥
नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू॥
बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा॥४॥
दो०-सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥२७४॥
–*–*–
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥
सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥१॥
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू॥
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा॥२॥
कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥
खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही॥३॥
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें॥
न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥४॥
दो०-गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।
अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ॥२७५॥
–*–*–
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा॥
माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें॥१॥
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा॥
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली॥२॥
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा॥
भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही॥३॥
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े॥
अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे॥४॥
दो०-लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु॥२७६॥
–*–*–
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू॥
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना॥१॥
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं॥
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी॥२॥
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने॥
हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी॥३॥
गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं॥
सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मौहीं॥४॥
दो०-लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल॥२७७॥
–*–*–
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया॥
टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने॥१॥
जौ अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई॥
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं॥२॥
थर थर कापहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी॥
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी॥३॥
बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा॥
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसैं॥४॥
दो०- सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।
गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम॥२७८॥
–*–*–
अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना॥१॥
बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ॥
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी में नाथ तुम्हारा॥२॥
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाई॥
कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई॥३॥
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें॥
एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा॥४॥
दो०-गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।
परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर॥२७९॥
–*–*–
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥
भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥१॥
आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा॥
बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥२॥
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता॥
देखु जनक हठि बालक एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू॥३॥
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा॥
बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं॥४॥
दो०-परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।
संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु॥२८०॥
–*–*–
बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें॥
करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा॥१॥
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही॥
भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ॥२॥
गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू॥
टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू॥३॥
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा॥
जेंहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी॥४॥
दो०-प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु।
बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु॥२८१॥
–*–*–
देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी॥
नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेंहिं दीन्हा॥१॥
जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं॥
छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी॥२॥
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा॥कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा॥
राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा॥३॥
देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे॥४॥
दो०-बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।
बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम॥२८२॥
–*–*–
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥
चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू। कोप मोर अति घोर कृसानु॥१॥
समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई॥
मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे॥२॥
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें॥
भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा॥३॥
राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी॥
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं कहि हेतु करौं अभिमाना॥४॥
दो०-जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।
तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ॥२८३॥
–*–*–
देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना॥
जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ॥१॥
छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना॥
कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी॥२॥
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई॥
सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के॥३॥
राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥४॥
दो०-जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात।
जोरि पानि बोले बचन ह्दयँ न प्रेमु अमात॥२८४॥
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जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु॥
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥१॥
शनिवार, मार्च 22, 2008
परदेश की होली का आँखो देखा हाल !!!
कल रात को हम अपने तीन अन्य मित्रों के साथ बालीवुड की बहुचर्चित फ़िल्म "रेस" देखने गये । फ़िल्म के बारे में फ़िर कभी लेकिन रात को सोते सोते २ बज गये । सुबह १०:२० मिनट पर अलसाई आंखों से नींद खुली और याद आया कि आज तो सुबह १० बजे होली खेलने जाना था । बिस्तर पर ही अजदकी मुद्रा में दो बार पलटी मारने के बाद हाथ में मोबाईल आया । दोस्तों को फ़ोन लगाया तो पता चला कि हम ही सबसे पहले उठ गये थे, कई दोस्तों को दोस्ती का वास्ता देकर होली खेलने जाने को राजी किया । एक पुरानी सी टी-शर्ट, थोडे से फ़टे जूते और एक नया सा पायजामा पहनकर हम होली के रंग में रंगने के लिये निकल पडे ।
मेरे दोनो रूममेट में से कोई भी अपनी कार निकालने को तैयार नहीं था (एक की गाडी में तेल खत्म हो गया था तो दूसरी की में कुछ और गडबड थी :-) )। लिहाजा हमें अपने गरीब रथ को निकालना पडा और दोस्तों को ताकीद की कि कई सारे पुराने अखबार रख लो जिससे कि वापिस लौटते समय कपडे बचें तो सीट पर अखबार बिछाकर बैठ जाना वरना अखबार लपेटकर घर आ जाना :-)
जब कालेज पँहुचे तो वहाँ का दॄश्य अवर्णनीय था । एक बडे से हरे मैदान पर ७-८ लोग खडे होकर भीड जमने का इन्तजार कर रहे थे । हमने दूर से ही हाथ हिलाकर अपने आने का संकेत दिया तो देखा कि वो सभी हाथों में पानी से भरे गुब्बारे और बाल्टी में पानी लेकर हमारी तरफ़ आने लगे । हमने उनको कहा कि थोडा सब्र करो हम खुद ही तुम्हारे पास आये जाते हैं । पहले हमें गुलाल में स्नान कराया गया और उसके बाद ३-४ बाल्टी पानी डाला गया । तब तक मैदान में पानी से कीचड जैसा कुछ नहीं बन पाया था । बदन में थोडी तरावट आ गयी तो हमने भी बाकी लोगों को रंग लगाकर, गले लगाकर होली की बधाईयाँ दी ।
इसके बाद लोग आते रहे और सभी रंग, पानी और पानी भरे गुब्बारों से उनका स्वागत करते रहे । बीच बीच में कुछ विदेशी भी हमारे हल्ले में शामिल हुये और फ़िर जल्दी ही पतली गली से निकल लिये । तभी एकमत (ये हमारा ही था) से निर्णय लिया गया कि इस बार प्राकृतिक रूप से होली खेली जायेगी । पानी के दोनों पाईपों का बहाव मैदान के एक हिस्से पर केन्द्रित करने के उपरान्त थोडे ही प्रयास से मिट्टी और पानी से समागम से गीली मिट्टी कीचड जैसी दिखने लगी । अब चूँकि मिट्टी और पानी दोनो प्राकृतिक तत्व हैं इसमे मिलावट का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता है । सभी लोगों ने ध्वनिमत से हमारी सोच का समर्थन किया और हमें पहला शिकार आता दिखायी दिया ।
हमारे परममित्र होली खेलने सपत्नीक आ रहे थे । उनको मिट्टी में लेटाकर और ऊपर से ढेर सारा पानी डालकर इस महान Environmentally Friendly होली का श्रीगणेश किया गया । देखने लायक बात थी कि उनकी पत्नी ने उनको जमीन पर लेटाने और ऊपर से पानी उडेलने में हम सबका भरसक सहयोग किया । इतने पर पत्नीजी की अन्य सहेलियों ने पत्नीजी को मिट्टी में बैठाकर रंग लगाने का कार्यक्रम प्रारम्भ कर दिया था ।
अब किसी का कभी भी नम्बर लग सकता था । १५-२० लोगों की भीड किसी भी शख्स का नाम ले लेती थी और तुरन्त उसका हैप्पी बर्थडे मन जाता था । हमारे पुराने अनुभव ने हमें बताया कि ऐसे में जितना जल्दी नंबर लग जाये उतना अच्छा होता है । यही सोचकर जब हमारे नाम का उद्घोष हुआ तो हम स्वयं ही कीचड में जाकर बैठ गये, एक हाथ से पानी का पाईप पकडा और अपने आप को गीला कर लिया । आस पास वाले १-२ लोगों ने हम पर ३-४ बाल्टी मिट्टी का पानी डाला और हमारा होली संस्कार सम्पन्न हो गया । इसके बाद हमें किसी का भी होली संस्कार करने का लाइसेंस भी मिल गया था ।
तुरन्त नये नये तरीके आजमाये जाने लगे । दोस्तों को साथ बैठाकर, पति पत्नी को साथ बैठाकर, रिसर्च इंट्रेस्ट के हिसाब से लोगों को बैठाकर सबका होली संस्कार किया गया । मजे की बात थी कि कोई जोर जबरदस्ती नहीं थी :-) सब कुछ एक पूर्ववत घोषित कार्यक्रम की तरह चलता चला जा रहा था । इस प्रकार पानी, मिट्टी, गुलाल, मिट्टी, फ़िर गुलाल, फ़िर पानी और अन्त में कीचड के साथ सबका होली संस्कार सम्पन्न हुआ ।
अन्त में तस्वीरें जिससे सनद रहे ।
(अब दोस्तों के साथ थोडी जोर जबरदस्ती तो चलती ही है)
(सभी होली की उमंग में घर से हजारो मील दूर, लेकिन सभी एक परिवार की तरह)
हमें उचककर अपना फ़ोटो खिंचवाते हुये देखा जा सकता है :-)
(होली के रंग में देसी क्या और विदेशी क्या सब मस्त थे)
ध्यान दें मेहमानों को पूरे सम्मान से साथ बिना मिट्टी के होली का आनन्द लेने की छूट थी :-)
(मौका मिले और सारी लडकियाँ एक साथ फ़ोटो न खिंचवायें, ऐसा हुआ है कभी? )
(होली खेलने के बाद बढिया मिठाई का मजा ही कुछ और था)
Technorati Tags होली,के,रंग
सोमवार, फ़रवरी 04, 2008
केवट संवाद:पं छन्नूलाल मिश्राजी की आवाज में
रविवार, फ़रवरी 03, 2008
ज्ञानजी की पुरानी पोस्ट के सन्दर्भ में विभीषण गीता!!!
सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना।। सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।।
आइये; अतीत की पुनर्कल्पना करें। वर्तमान स्थिति में राम-रावण संग्राम हो तो राम हार जायेंगे क्या? दुर्योधन भीम की छाती फाड़ कर रक्त पियेगा? द्रौपदी वैश्या बनने को मजबूर होगी? अर्जुन कृष्ण की बजाय शल्य को अपना सारथी और शकुनि को सलाहकार बनाना पसन्द करेगा? मां सीता मन्दोदरी की सखी बन जायेंगी? पाण्डव नारायणी सेना को ले कर महाभारत मे जायेंगे - कृष्ण का साथ नहीं मागेंगे? गीता को पोर्नोग्राफी की तरह बैन कर दिया जायेगा या फ़िर संविधान संशोधन से "यत्र योगेश्वर: कृष्णौ" को उसमें से निकाल दिया जायेगा?
यूँ तो ज्ञानदत्तजी अपने कई लेखों में रामचरितमानस के बारे में लिख चुके हैं लेकिन इस प्रसंग को पहले भी पढ/सुन चुका था इसलिये इसने लम्बा असर किया । इतना लम्बा कि इतने महीनों के बाद भी मुझे याद रहा और मौका मिलते ही मैं इसके बारे में लिख रहा हूँ । ज्ञानदत्तजी के इस मूल्यवान प्रश्न का अपने सन्दर्भ से उत्तर मैं थोडा रूककर दूँगा लेकिन आपको पं छ्न्नूलाल मिश्राजी की आवाज में विभीषण गीता सुनवानें का लोभ मैं रोक नहीं सका ।
ये थोडी लम्बी अवधि का गीत (~२० मिनट) का आडियो है लेकिन पण्डितजी की आवाज और श्रीरामचरितमानस दोनों बाँधकर रखते हैं । नीचे हिन्दी विकीपीडिया के सौजन्य से इस प्रसंग को श्रीरामचरितमानस से उद्धरित भी कर दिया है ।
रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।। अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा।। नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना।। सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना।। सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।। बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।। ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना।। दान परसु बुधि सक्ति प्रचंड़ा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा।। अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना।। कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा।। सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।। दो0-महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर। इसके अलावा पण्डितजी की आवाज में केवट संवाद भी है जो मुझे बेहद प्रिय है । समस्या केवल यही है कि उसका आडियो भी लगभग २४ मिनट का है । यदि आप सभी को इतना लम्बा आडियो सुनने में कोई समस्या नहीं है तो मैं उसको भी पोस्ट करना चाहूँगा । फ़िलहाल आप विभीषण गीता सुनें और अपने मन वचन और कर्म को इसकी कसौटी पर कस कर देखें । नीरज रोहिल्ला, ३ फ़रवरी २००८
रविवार, जनवरी 13, 2008
२१.०८ किमी = १ घंटा ५३ मिनट ५३ सेकेंड्स और वो खुशी का लम्हा
दिन: १३ जनवरी, २००८
समय: सुबह के साढे चार बजे
एक अरसे के बाद इतना सुबह उठा, उठना ही था क्योंकि आज के दिन का मुझे पिछले कई महीनों से इन्तजार था । उठकर तैयार होकर सुबह ५:३० बजे घर से करीब १० मील दूर ह्यूस्टन डाउनटाउन पंहुचा । अपनी कार को पार्किंग में लगाया और उसके बाद मैं ह्यूस्टन मैराथन का हिस्सा बनने के लिये तैयार था ।
सुबह थोडी ठंडी हवा चल रही थी लेकिन दौडने के लिये इससे अच्छा मौसम नहीं हो सकता है । ६ बजे के करीब डाउनटाउन की सडकें पुलिस ने बंद करवा दी और इसी के साथ १७,००० लोगों की भी दौडने के लिये तैयार थी । इस बार की दौड की खास बात थी कि महिला प्रतिभागियों की संख्या पुरूष प्रतिभागियों से अधिक थी । ह्यूस्टन मैराथन में निम्न प्रतियोगितायें थी:
१) व्हील-चेयर मैराथन
२) शैवरान ह्यूस्टन मैराथन (Chevron Houston Marathon): २३.२ मील अथवा ४२.२ किमी.
३) साउदी अरामको हाफ़-मैराथन (Saudi Aramco Half-Marathon): १३.१ मील अथवा २१.१ किमी.
४) ई. पी. ५ के : ५ किमी.
मुझे इनमें से हाफ़-मैराथन दौडना था । ये मेरी जिन्दगी का पहला मैराथन था इसीलिये मैं इसकी शुरुआत आधी मैराथन से करना चाहता था जिससे कि मैं अपनी क्षमताओं को परख सकूँ । दौड सुबह ७ बजे प्रारम्भ हुयी । हाफ़-मैराथन में ८२८३ प्रतिभागियों ने भाग लिया था और शेष लगभग ८८०० प्रतिभागी अन्य दौडों में भाग ले रहे थे । लोग अपने वरीयता क्रम से खडे थे, मतलब अगर आप तेज दौडते हैं तो सबसे आगे और थोडा धीरे तो बीच में जिससे की शुरूआत में धक्का मुक्की न हो । इस दौड के समय को नोट करने के लिये सब प्रतिभागियों को एक चिप दी गयी थी जिसे हमें अपने जूते के फ़ीतों में पिरो लेना था । प्रारम्भ पंक्ति को पार करते ही चिप समय रेकार्ड करना शुरू कर देगी और समाप्ति पंक्ति के बाहर पैर रखते ही समय नोट करके एक बडे कम्प्यूटर को डेटा अपने आप पंहुच जायेगा ।
मैराथन दौड में दो समय होते हैं । पहला गन टाईम अर्थात जब से बंदूक चलाकर दौड प्रारम्भ की गयी से लेकर आपके समाप्ति पंक्ति को पार करने का समय और दूसरा चिप टाईम अर्थात आपकी दौड का वास्तविक समय । दौड की शुरुआत के समय आपके खडे होने की स्थिति के हिसाब से चिप टाईम और गन टाईम में १-४ मिनट का अन्तर हो सकता है । दौड के समाप्त होने पर गन टाईम तुरन्त पता चल जाता है क्योंकि जिस समय आप समाप्ति पंक्ति पार कर रहे होते हैं, एक बडी सी घडी पर समय चल रहा होता है । चिप टाईम पता करने के लिये थोडा इन्तजार करना होता है और कुछ ही घंटों में ये उपलब्ध हो जाता है ।
ह्यूस्टन मैराथन के सारे इन्तजामात बडे चुस्त थे और कहीं भी जरा भी तकलीफ़ नहीं हुयी, दौडने वाला भाग छोड कर :-) मैने अपने मन में सोचा था कि मैं इस दौड को २ घंटे से कम समय में तय करूंगा । मेरे मित्र टिम का भी लगभग यही विचार था और हम लोगों ने साथ साथ दौडने का निश्चय किया । आईये अब आपको कुछ चित्रों के साथ प्रारम्भ से अंत तक के सफ़र का आनन्द दिलवाते हैं ।
जैसा कि हर लम्बी दौड के साथ होता है, हमने अपनी शुरूआत काफ़ी धीमी की जिससे कि हम जल्दी थके नहीं और मांसपेशियों पर अधिक दवाब न पडे । दौड की शुरूआत से लेकर अन्त कर सडक के दोनो तरफ़ दर्शक तालियाँ बजाकर सभी दौडने वालों का मनोबल बढा रहे थे । कहीं कहीं छोटे छोटे बच्चे दौडने वालों से हाथ मिला रहे थे और हाथों में छोटी छोटी घंटियाँ बजाकर शोर मचा रहे थे । लगभग हर एक मील पर पीने के लिये पानी, Gatorade (Energy Drink) उपलब्ध था । मैने तीसरे मील(४.८ किमी) पर पहली बार Gatorade पिया और अपनी रफ़्तार थोडी बढा दी । इसके बाद अगला पडाव (पडाव का मतलब रुकना नहीं) ६.२ (१० किमी) पर था, यहाँ पर टिम को लगा कि हम लोग जरूरत से थोडा तेज भाग रहे हैं और शायद हम अन्त तक इस गति से नहीं दौड पायेंगे । इसीलिये ६.२ मील से ९ मील तक हम लोग थोडी धीमी गति से दौडते रहे । ९ मील के बाद पैरों में हल्की थकान सी होने लगी थी और इतनी ठंड में भी हम पसीने में भीग रहे थे ।
चूँकि आज गलती से मैं अपनी घडी ले जाना भूल गया था इसीलिये ९ मील के बाद मैने टिम से समय पूछा तो उसने कहा कि हमे दौडते ८८ मिनट हो गये हैं । ये सुनकर मेरे हाथों के तोते उड गये क्योंकि इसका मतलब था कि हम एक मील को दौडने में ९ मिनट से ज्यादा का समय लगा रहे हैं जिसके हिसाब से हम इस दौड को २ घंटे में समाप्त नहीं कर पायेंगे । इसके बाद हम दोनों ने काफ़ी तेजी से दौडना शुरू कर दिया और हम ११ मील तक तेजी से दौडते रहे । असल में ९ मील पर हमें दौडते हुये १ घंटा और १८ मिनट हुआ था और जल्दी में दौडते समय टिम ने ७८ मिनट को ८८ मिनट बोल दिया था । लेकिन इसका हमें थोडा फ़ायदा और थोडा नुकसान हुआ । हमने अगले २ मील तेजी से पार किये थे लेकिन इसी समय मेरे पैर की एक मांसपेशी ने मुझे तकलीफ़ में ला दिया । इस समय मैने टिम को कहा कि वो अच्छा दौड रहा है और उसे आगे निकल जाना चाहिये और मैं अगले २.१ मील थोडा धीमे दौडूगाँ ।
मैने थोडे कष्ट में अगला एक मील पूरा किया और तभी देखा कि सामने कुछ लोग दौडने वालों को बीयर बाँट रहे हैं । मैने जल्दी से बीयर के ५-६ घूँट गटके और थोडी जान में जान आयी । असल में थोडी मात्रा में बीयर पीने से आपको काफ़ी ऊर्जा मिलती है क्योंकि बीयर में काफ़ी कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं और आपका शरीर इसे तुरन्त ग्रहण कर लेता है । शायद इसीलिये किसी भी दौड के समाप्त होने के बाद बीयर की चुस्कियाँ आम बात है ।
खैर १२वें मील को पार करने के बाद सभी लोगों ने अपनी गति काफ़ी बढा ली और अपने पडौसी दौडने वाले के साथ कदम से कदम मिलाने की कोशिश में मैं भी काफ़ी तेजी से दौडने लगा । ये १.१ मील सबसे लम्बा महसूस हुआ । कसकर मुट्ठियाँ बांधकर, गहरी साँसे लेता और सामने मंजिल को देखता मैं दौडता चला गया । १३ वें मील के बाद एक घुमाव और बस समाप्ति पंक्ति सामने ही थी ।
ये रहे मेरी दौड के परिणाम:
गन टाईम: १:५६:०४
चिप टाईम (वास्तविक समय): १:५३:५३
पहले १० किमी (६.२ मील) दौडने में लगा समय: ५६.०१
पहले १५ किमी (९.३७ मील) दौडने में लगा समय: १:१७:३९
एक मील को दौडने में लगा औसत समय: ८:४१
दौड में कुल प्रतिभागी: ८२८३
दौड में मेरा स्थान: १२०४ (अर्थात ७०७९ लोगों ने मेरे बाद दौड समाप्त की)
जैसा कि मैने सोचा था, इस दौड को २ घंटे के अन्दर समाप्त करने से मन को बडी खुशी मिली । इसके साथ ही मैने निश्चय किया कि अगली मैराथन पूरी २४.२ मील (४२.२ किमी) दौडी जायेगी । इस पोस्ट को लिखते समय दाँये घुटने में थोडा दर्द हो रहा है और बाँये पैर की मांसपेशियाँ अभी भी तनाव में हैं । लेकिन कोई खास तकलीफ़ नहीं हैं और १ हफ़्ते में मैं पूरी तरह चंगा होने की उम्मीद करता हूँ । ये खत्म हुयी मेरी मैराथन कहानी और अब आप तस्वीरों का आनन्द लें ।
(दौड शुरू होने से पहले एक बडे से हाल में तैयारियों का जायजा लेते हुये)
(मैं और डैनी दौड के लिये तैयार, डैनी पूरी मैराथन मतलब २६.२ मील दौडे)
(प्रारम्भ/समाप्ति द्वार)
(दौडते लोगों का हुजूम, ये ऊपर वाले पाँच फ़ोटो ह्यूस्टन क्रानिकल के सौजन्य से)
(दौडने वालों की हौसला अफ़जाई करने रविवार के दिन सुबह सवेरे लोग अपने घरों के बाहर बैठे थे, दौडते समय छोटे बच्चों के साथ हाथ मिलाने में बडा अच्छा लगा । बच्चों ने भी अपने सुपर-मैन के लिये जमकर तालियाँ बजायी । और मेरे दोनो रूममेट सोते रह गये :-), ऊपर वाले तीन फ़ोटो ह्यूस्टन क्रानिकल के सौजन्य से )
(दौड पूरी होने के बाद मैडल के साथ मेरी विजयी मुस्कान)
(BCRR वो धावक क्लब है जिसका मैं सदस्य हूँ, पहली फ़ोटो में टिम दौड की समाप्ति के बाद बीयर की चुस्कियाँ लेते हुये और दूसरी फ़ोटों में क्लब के अन्य सदस्य)
(हमारे तंबू के आस-पास के नजारे )