मुझे दौडना बेहद पसंद है। अफ़सोस है कि चाहकर भी उतना नहीं दौड़ पाता जितना दिल करता है। शायद जल्दी ही मैं भी हफ्ते में कम से कम ३०-३५ मील दौडना शुरू करूं, आमीन !!!
दौड़ने के लिये कुछ टिप्स:
१) अगर आप नहीं दौड़ते हैं तो आज ही शुरू कीजिये और देखिये आप कितना आनंद प्राप्त करते हैं।
२) १०० मीटर से लेकर २० मील तक दौड़ने वाले सभी धावक होते हैं। आप जितना भी दौडें आनंद से दौडें। अगर साथ में कोई साथी मिल जाये तो सोने पे सुहागा।
३) दौड़ते समय ढीले कपडे पहनें और बिना अच्छे जूतों के कभी ना दौडें।
४) अच्छे जूते का चुनाव करते समय किसी अनुभवी व्यक्ति से राय ले सकते हैं।
५) अगर आपके जूते का नंबर X है तो (X+0.5) से (x+1.0) नंबर का जूता पहनकर दौडें।
६) दौड़ते समय शरीर में जल की कमी न रखें।
७) प्रारम्भ में सदैव धीरे धीरे दौडें।
दौड़ते समय की तीन अवस्थाओं में अंतर करना सीखें।
१) थकान:
थकान का अहसास दौड़ने के अलग अलग चरणों में अलग अलग प्रकार से होता है। शुरू के दिनों में ज़रा सा दौड़ते ही थकान लगने लगती है। आप स्वयं से कहते हैं बस अब नहीं होता, थोडा पैदल चल लूं और फिर दौडना शुरू करूंगा। थोडा पैदल चलने के बाद ज़रा सा दौड़ने पर ही दम फूलने लगता है और अगर आप दौडना स्थगित कर दें तो आप फिर सामान्य हो जाते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर ये सभी थकान के लक्षण हैं और ये लक्षण आपकी शारीरिक बनावट, अभ्यास और दौड़ने के अनुभवों पर निर्भर करते हैं।
२) दर्द:
नया नया दौड़ना प्रारम्भ करने वाले अपने आलस्य के कारण थकान को दर्द समझते हैं और दौडना बंद करके सामन्य रुप से चलकर अपना मार्ग समाप्त करते हैं। इससे कोई नुकसान नहीं होता है और थोड़े दिनों के बाद उनका आलस्य समाप्त हो जाता है।
कभी कभी अनुभवी धावक दर्द को केवल थकान मानकर दौड़ते रहते हैं और बेवजह ही अपने दर्द को चोट में तब्दील कर लेते हैं। दौड़ते समय जरूरी नहीं कि केवल आपके पैरों की मांसपेशियों में ही दर्द हो। तलुवे, पंजे, टखने, घुटने और क़मर में दर्द होने की संभावनाएं अधिक हैं लेकिन इसके अलावा आपके कंधे, गर्दन और पेट में भी दौड़ने से दर्द हो सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि आप अपने किसी भी दर्द को मामूली न समझें। दर्द का सीधा सा अर्थ है कि आपको रूक कर इसके बारे में विचार करने की आवश्यकता है। दौड़ते समय दर्द होने के मुख्य कारण हो सकते हैं:
अ) अच्छे जूते पहनकर न दौडना
ब) अच्छे जूते पहनकर न दौडना (जानबूझकर दो बार लिखा गया है )
स) दौड़ने से पहले हाथ पैरों का व्यायाम (Stretching) न करना
द) दौड़ते समय शरीर का संतुलन सही न होना
ध) दौड़ते समय शरीर में आवश्यक जल/Electrolytes की कमी
न) भोजन करने के तुरंत बाद दौडना
३) चोट:
यदि आपको दौडना पसंद है तो ईश्वर न करे आपको ये दिन देखना पडे। दौड़ने संबन्धी चोट दो प्रकार की होती हैं। अचानक से लगी हुयी चोट, जिसको आप अपनी सावधानी से टाल सकते हैं। और दूसरी लंबे समय तक किसी दर्द की अवस्था को नजरअंदाज करने के फलस्वरूप विकसित हुयी चोट। दूसरे प्रकार की चोट ठीक होने में लंबा समय लेती है और इसके पुनः लौटने की संभावना भी बनी रहती है। कई बार धावक अपनी चोट को पूरी तरह से ठीक नहीं होने देते हैं जिसके कारण उन्हें अधिक कष्ट झेलना पड़ता है।
मैंने एक बार एक बडे अनुभवी धावक से कुछ टिप्स मांगी थी तो उन्होने कहा
१) हाईड्रेट हाईड्रेट हाईड्रेट: अर्थात पानी की कमी न रखो।
२) अपनी सभी चोटों को अत्यधिक गम्भीरता से लो।
अभी के लिए बस इतना ही, अगली बार आपको दौड़ने की कुछ और टिप्स और इसके ढ़ेर सारे फ़ायदे बतायेंगे जिससे युवाओं को काफी फायदा हो सकता है :-)
शुक्रवार, अक्टूबर 12, 2007
ये हफ्ता कटता क्यों नहीं ??? + दौड़ो भागो खुश रहो !!! :-) :-) :-)
आज शुक्रवार हो गया है। बस तीन दिन, और उसके बाद (१५ अक्टूबर को) मैं देश के लिए रवाना हो जाऊँगा। लेकिन देश जाने के कारण दो महत्वपूर्ण गतिविधियों में भाग नहीं ले पाऊँगा। भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री ए पी जे अब्दुल कलाम १८ अक्टूबर को मेरे विश्वविद्यालय में एक भाषण देने आ रहे हैं। इस बात की काफी संभावना थी कि अगर यहाँ होता तो उनसे एक व्यक्तिगत मुलाक़ात भी हो जाती लेकिन अफ़सोस...
दूसरा ये कि अमेरिकी सरकार के वाणिज्य विभाग ने भारतीय विद्यार्थियों को अमेरिका में उच्च-शिक्षा के लिए बढावा देने हेतु एक वीडियो बनाने का निश्चय किया है। इसके लिए उन्होने कई प्रमुख विश्वविद्यालयों से सम्पर्क स्थापित किया है जिसमें से राईस विश्वविद्यालय भी एक है। इस वीडियो में हर कालेज में से चुने हुये भारतीय विद्यार्थियों के साक्षात्कार होंगे जिसे एक डीवीडी के रुप में प्रयोग किया जाएगा। राईस ने इस कार्य के लिये मेरा चयन किया था मगर अफ़सोस कि वाणिज्य विभाग की कैमरा टीम २२ अक्टूबर को आ रही है और मैं इसमे भाग नहीं ले सकूंगा और मेरे स्थान पर एक अन्य भारतीय विद्यार्थी का साक्षात्कार लिया जायेगा :-(
चलिये कोई बात नहीं, अब मुद्दे की बात पर आते हैं जिसके लिये हमने ये पोस्ट लिखी है। कुछ महीने पहले मैंने अपने दौड़ने भागने के किस्सों पर एक पोस्ट लिखी थी। पिछले महीने मैंने एक रिले दौड़ में भाग लिया था। इस दौड़ की विशेषता थी कि रास्ता बहुत ही ऊंचा नीचा और पहाड़ी जैसा था। हमारी टीम में चार सदस्य थे, दो लड़के और दो लडकियां और प्रत्येक सदस्य को २ मील (३.२ किमी) दौड़ना था। बिना किसी प्रैक्टिस के हमारी टीम ने नौवां स्थान प्राप्त किया जो काफी अच्छी बात थी। ये और भी महत्वपूर्ण इसलिये था कि लगभग ५ सालों के बाद मैंने किसी प्रतियोगी दौड़ में हिस्सा लिया था। २ मील दौड़ने में मुझे १५ मिनट लगे थे जो दौड़ के रास्ते को देखते हुये एक अच्छा समय था। हमारी टीम ने इस दौड़ को १ घंटा ७ मिनट और ४ सेकेंड्स में पूरा किया था।

अब आपको मिलवाते हें John Fredrickson से। जॉन ने १५ वर्ष की उम्र से सिगरेट पीना शुरू किया था, अपने चरम पर वो लगभग ३ डिब्बी सिगरेट रोज पीया करते थे (अमेरिका की एक डिब्बी में २० सिगरेट होती है) । जब जॉन ४० वर्ष के थे तब डाक्टर ने उन्हें बताया कि वो फेफडे की एक बीमारी से ग्रसित हैं जिसका कारण उनका धूम्रपान करना था। डाक्टर ने जॉन को लगभग एक साल का समय दिया था, बस यहीं पर जॉन ने अपनी जीवटता से सबको चकित कर दिया। जॉन ने जीवन में पहली बार दौड़ना शुरू किया, पहली बार केवल १०० मीटर दौड़ने में ही जॉन के हौसले पस्त हो गये थे। लेकिन उन्होने हिम्मत नहीं हारी और सिगरेट पीना छोड़ने के साथ दौड़ना जारी रखा। कुछ ही वर्षों में जॉन अपनी फेफडे की बीमारी से मुक्त हो चुके थे। और आपको ये जानकार प्रसन्नता होगी
कि पिछले हफ्ते जॉन ने अपने ८२ वीं मैराथन दौड़ पूरी की।
अभी इतना ही लेकिन आगे और भी है। इस लेख की अगली कडी में आप सब जानेंगे दौड़ने संबन्धी अन्य जानकारियां जैसे:
१) दौड़ते समय थकान, चोट और दर्द में फर्क कैसे करें।
२) दौड़ने का सबसे सुरक्षित तरीका क्या है ।
३) दौड़ने के अन्य फायदे क्या हैं ?
४) दौड़ने और बीयर पीने का क्या संबंध है :-)
आदि आदि...
दूसरा ये कि अमेरिकी सरकार के वाणिज्य विभाग ने भारतीय विद्यार्थियों को अमेरिका में उच्च-शिक्षा के लिए बढावा देने हेतु एक वीडियो बनाने का निश्चय किया है। इसके लिए उन्होने कई प्रमुख विश्वविद्यालयों से सम्पर्क स्थापित किया है जिसमें से राईस विश्वविद्यालय भी एक है। इस वीडियो में हर कालेज में से चुने हुये भारतीय विद्यार्थियों के साक्षात्कार होंगे जिसे एक डीवीडी के रुप में प्रयोग किया जाएगा। राईस ने इस कार्य के लिये मेरा चयन किया था मगर अफ़सोस कि वाणिज्य विभाग की कैमरा टीम २२ अक्टूबर को आ रही है और मैं इसमे भाग नहीं ले सकूंगा और मेरे स्थान पर एक अन्य भारतीय विद्यार्थी का साक्षात्कार लिया जायेगा :-(
चलिये कोई बात नहीं, अब मुद्दे की बात पर आते हैं जिसके लिये हमने ये पोस्ट लिखी है। कुछ महीने पहले मैंने अपने दौड़ने भागने के किस्सों पर एक पोस्ट लिखी थी। पिछले महीने मैंने एक रिले दौड़ में भाग लिया था। इस दौड़ की विशेषता थी कि रास्ता बहुत ही ऊंचा नीचा और पहाड़ी जैसा था। हमारी टीम में चार सदस्य थे, दो लड़के और दो लडकियां और प्रत्येक सदस्य को २ मील (३.२ किमी) दौड़ना था। बिना किसी प्रैक्टिस के हमारी टीम ने नौवां स्थान प्राप्त किया जो काफी अच्छी बात थी। ये और भी महत्वपूर्ण इसलिये था कि लगभग ५ सालों के बाद मैंने किसी प्रतियोगी दौड़ में हिस्सा लिया था। २ मील दौड़ने में मुझे १५ मिनट लगे थे जो दौड़ के रास्ते को देखते हुये एक अच्छा समय था। हमारी टीम ने इस दौड़ को १ घंटा ७ मिनट और ४ सेकेंड्स में पूरा किया था।
अब आपको मिलवाते हें John Fredrickson से। जॉन ने १५ वर्ष की उम्र से सिगरेट पीना शुरू किया था, अपने चरम पर वो लगभग ३ डिब्बी सिगरेट रोज पीया करते थे (अमेरिका की एक डिब्बी में २० सिगरेट होती है) । जब जॉन ४० वर्ष के थे तब डाक्टर ने उन्हें बताया कि वो फेफडे की एक बीमारी से ग्रसित हैं जिसका कारण उनका धूम्रपान करना था। डाक्टर ने जॉन को लगभग एक साल का समय दिया था, बस यहीं पर जॉन ने अपनी जीवटता से सबको चकित कर दिया। जॉन ने जीवन में पहली बार दौड़ना शुरू किया, पहली बार केवल १०० मीटर दौड़ने में ही जॉन के हौसले पस्त हो गये थे। लेकिन उन्होने हिम्मत नहीं हारी और सिगरेट पीना छोड़ने के साथ दौड़ना जारी रखा। कुछ ही वर्षों में जॉन अपनी फेफडे की बीमारी से मुक्त हो चुके थे। और आपको ये जानकार प्रसन्नता होगी
कि पिछले हफ्ते जॉन ने अपने ८२ वीं मैराथन दौड़ पूरी की।

अभी इतना ही लेकिन आगे और भी है। इस लेख की अगली कडी में आप सब जानेंगे दौड़ने संबन्धी अन्य जानकारियां जैसे:
१) दौड़ते समय थकान, चोट और दर्द में फर्क कैसे करें।
२) दौड़ने का सबसे सुरक्षित तरीका क्या है ।
३) दौड़ने के अन्य फायदे क्या हैं ?
४) दौड़ने और बीयर पीने का क्या संबंध है :-)
आदि आदि...
रविवार, अक्टूबर 07, 2007
गद्य और पद्य लेखन में कन्फ्यूजन!!!
डिस्क्लेमर: ये पोस्ट मूलतः मौज लेने के लिए लिखी गयी है, कवि ह्रदय वाले लोग अन्यथा न लें | कवि अगर अन्यथा ले लें तो चिंता की कोई बात नहीं है |
कुछ दिन पहले विचारार्थ नाम के चिट्ठे पर राजकिशोरजी का "विवाह पर कुछ विचार" नामक लेख पढ | जैसे ही पढ़ना प्रारम्भ किया घोर कन्फ्यूजन ने घेर लिया कि ये लेख पद्य है या गद्य ? फिर लेख की लम्बाई और बीच बीच में पूर्ण विराम देख कर लगा कि हो न हो ये गद्य लेखन ही है | आप भी देखिए:
"जर्मनी की सबसे चमक-दमक वाली नेता गैब्रील पॉली
ने अपने चुनाव घोषणापत्र में यह प्रस्ताव शामिल कर
हड़कंप मचा दिया है कि विवाह की मीयाद सात वर्ष
होनी चाहिए। सात वर्ष के बाद भी कोई युगल अपने
वैवाहिक संबंध को बनाए रखना चाहता है, तो उसे
इस संबंध की अवधि बढ़ाने की सुविधा मिलनी
चाहिए। पॉली की उम्र पचास वर्ष है। उनका दो बार
तलाक हो चुका है। तलाक के लिए जिम्मेदार कौन
था, नहीं मालूम। इसकी खोज करने की जरूरत भी"...
लेख की लम्बाई, कविता के शिल्प पर मेरी जानकारी बहुत ही कम है इसीलिये अगर एक पंक्ति में ८-१० शब्द हों और कुल मिलाकर १६-२० पंक्तियां हों तो मैं उसे बिना वाद विवाद के कविता मान लेता हूँ । अगर ऊपर दिए हुये उदाहरण में से पूर्ण विराम और अर्ध विराम हटा दिये जायें तो क्या ये एकदम आधुनिक कविता नहीं बन जायेगी और शायद "हिन्द-युग्म" अथवा और कहीँ छपने को भेजी जाये तो प्रकाशित भी हों जाये :-) ईस्माइली लगा दी है इसलिये अन्यथा लेने की नहीं हो रही है।
ऐसा ही एक और उदाहरण देखें विचारार्थ की आज की पोस्ट से:
"भारत सरकार 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा
दिवस के रूप में मान्यता दिलाने में सफल रही, इस
पर वे ही खुश हो सकते हैं जो गांधी को ठीक से नहीं
जानते। यह सच है कि गांधी जी आखिरी सांस तक
यही कहते रहे कि सत्य और अहिंसा, यही मेरे दो
मूल मंत्र हैं। लेकिन सत्य को निकाल दीजिए, तो
अहिंसा लुंज-पुंज हो कर रह जाएगी। महात्मा और जो
कुछ भी थे, लुंज-पुंज नहीं थे। न वे लुंज-पुंज व्यक्ति
या बिरादरी को पसंद करते थे। बल्कि उनकी शिकायत
ही यही थी कि भारत के लोगों द्वारा हथियार रखने
पर पाबंदी लगा कर अंग्रेजों ने इस देश के लोगों को
नामर्द बना दिया। मर्द और नामर्द की शब्दावली आज
की नारीवादियों को पसंद नहीं आएगी। लेकिन गांधी
जी मर्द थे, मर्दवादी नहीं थे। वे तो अपनी संतानों की
मां और बाप, दोनों बनना चाहते थे। महात्मा की पौत्री
मनु गांधी की एक किताब का नाम है, बापू मेरी मां।"...
राजकिशोरजी के दोनो लेख काफी विचारोत्तेजक हैं इसीलिये उनके चिट्ठे पर जाकर इन लेखों को पढ़ना न भूलें |
कुछ दिन पहले विचारार्थ नाम के चिट्ठे पर राजकिशोरजी का "विवाह पर कुछ विचार" नामक लेख पढ | जैसे ही पढ़ना प्रारम्भ किया घोर कन्फ्यूजन ने घेर लिया कि ये लेख पद्य है या गद्य ? फिर लेख की लम्बाई और बीच बीच में पूर्ण विराम देख कर लगा कि हो न हो ये गद्य लेखन ही है | आप भी देखिए:
"जर्मनी की सबसे चमक-दमक वाली नेता गैब्रील पॉली
ने अपने चुनाव घोषणापत्र में यह प्रस्ताव शामिल कर
हड़कंप मचा दिया है कि विवाह की मीयाद सात वर्ष
होनी चाहिए। सात वर्ष के बाद भी कोई युगल अपने
वैवाहिक संबंध को बनाए रखना चाहता है, तो उसे
इस संबंध की अवधि बढ़ाने की सुविधा मिलनी
चाहिए। पॉली की उम्र पचास वर्ष है। उनका दो बार
तलाक हो चुका है। तलाक के लिए जिम्मेदार कौन
था, नहीं मालूम। इसकी खोज करने की जरूरत भी"...
लेख की लम्बाई, कविता के शिल्प पर मेरी जानकारी बहुत ही कम है इसीलिये अगर एक पंक्ति में ८-१० शब्द हों और कुल मिलाकर १६-२० पंक्तियां हों तो मैं उसे बिना वाद विवाद के कविता मान लेता हूँ । अगर ऊपर दिए हुये उदाहरण में से पूर्ण विराम और अर्ध विराम हटा दिये जायें तो क्या ये एकदम आधुनिक कविता नहीं बन जायेगी और शायद "हिन्द-युग्म" अथवा और कहीँ छपने को भेजी जाये तो प्रकाशित भी हों जाये :-) ईस्माइली लगा दी है इसलिये अन्यथा लेने की नहीं हो रही है।
ऐसा ही एक और उदाहरण देखें विचारार्थ की आज की पोस्ट से:
"भारत सरकार 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा
दिवस के रूप में मान्यता दिलाने में सफल रही, इस
पर वे ही खुश हो सकते हैं जो गांधी को ठीक से नहीं
जानते। यह सच है कि गांधी जी आखिरी सांस तक
यही कहते रहे कि सत्य और अहिंसा, यही मेरे दो
मूल मंत्र हैं। लेकिन सत्य को निकाल दीजिए, तो
अहिंसा लुंज-पुंज हो कर रह जाएगी। महात्मा और जो
कुछ भी थे, लुंज-पुंज नहीं थे। न वे लुंज-पुंज व्यक्ति
या बिरादरी को पसंद करते थे। बल्कि उनकी शिकायत
ही यही थी कि भारत के लोगों द्वारा हथियार रखने
पर पाबंदी लगा कर अंग्रेजों ने इस देश के लोगों को
नामर्द बना दिया। मर्द और नामर्द की शब्दावली आज
की नारीवादियों को पसंद नहीं आएगी। लेकिन गांधी
जी मर्द थे, मर्दवादी नहीं थे। वे तो अपनी संतानों की
मां और बाप, दोनों बनना चाहते थे। महात्मा की पौत्री
मनु गांधी की एक किताब का नाम है, बापू मेरी मां।"...
राजकिशोरजी के दोनो लेख काफी विचारोत्तेजक हैं इसीलिये उनके चिट्ठे पर जाकर इन लेखों को पढ़ना न भूलें |
शनिवार, अक्टूबर 06, 2007
एक अन्तराल के बाद फ़िर से चिट्ठा लेखन!!!
पिछ्ले लगभग १ महीने से चिट्ठा लेखन बन्द पडा था हालाँकि इस बीच चिट्ठे पढने का कार्य अवश्य चल रहा था । अभी कुछ दिन पहले शास्त्रीजी ने अपनी किसी टिप्पणी में कहा था कि किसी भी सक्रिय चिट्ठे को हफ़्ते में एक बार अवश्य छपना चाहिये । मैं शास्त्रीजी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ, और अब सम्भवत: आगे चिट्ठा लेखन करता रहूँगा । ये बताना भी महत्वपूर्ण है कि मुझे अपना चिट्ठा लेखन बीच में क्यों बन्द करना पडा था । इसका मुख्य कारण मेरी (Academic) व्यस्तता और अन्य कार्यों (जैसे एक लम्बी दौड़ की तैयारी में दौड़ना, अन्य समितियों (शोध-कार्य के अतिरिक्त) में अधिक कार्य का होना ) का अचानक आवंटित समय से अधिक समय की माँग करना था ।
अभी अगले ९ दिनों में भारत यात्रा का भी योग है, जिसकी वजह से पुराने अधूरे कार्यों को समाप्त करने का प्रयास चल रहा है अन्यथा छुट्टियों में भी घर से काम करना पडेगा । इसके अतिरिक्त पिछले कुछ दिनों से एक प्रश्न भी मन को विचलित कर रहा था कि मैं क्यों लिखूँ ? मैं अब भी नहीं मानता कि मेरे ब्लाग लेखन से हिन्दी की कुछ सेवा होती है या अलबत्ता मैं हिन्दी की सेवा के प्रयोजन से ब्लाग लिखता हूँ । हिन्दी ब्लाग लेखन और चिट्ठे बाँचना मेरी व्यक्तिगत रूचि है । इसी रूचि के चलते कुछ ऐसे सम्बन्ध भी बने हैं जिन्होनें मेरी सोच को काफ़ी प्रभावित किया है ।
मैं ब्लाग लेखन क्यों करूँ ? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात है तो मैं मुख्यत: विवादित मुद्दों से दूर ही रहता हूँ । अपने द्वारा अर्जित ज्ञान को बाँटने की बात है तो संगीत के अलावा ऐसे किसी मुद्दे पर मैने अभी तक कुछ लिखा ही नहीं है (तेल/गैस उद्योग पर एक साधारण सी पोस्ट का अपवाद छोडकर) । अगर ब्लाग लेखन को रोजमर्रा के मशीनी जीवन से मुक्ति कहूँ तो उसके लिये भी मैं काफ़ी अन्य गैर-पाठ्यक्रम (Extra-Curriculum) गतिविधियों में संलग्न हूँ । ये सभी बहाने काफ़ी थे एक महीने तक ब्लाग लेखन से विमुख रहने के लिये ।
खैर अब वापिस आये हैं लेकिन आज की पोस्ट में अपनी बक-बक कम और आप लोगों से कुछ सवाल करने हैं ।
१) पहली समस्या है कि भारत में रहकर घर में इन्टरनेट की सुविधा प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है ? मेरे पास अपना लैपटाप होगा, घर में एक BSNL की लैंड-लाईन है और मोबाइल भी हैं | इन सब औजारों के साथ क्या और कैसे मिलाया जाये कि इन्टरनेट चालू हो सके | मेरा घर मथुरा में है इसीलिये ब्राड-बैंड अभी वहाँ आया है कि नहीं पक्का नहीं पता | क्या कोई ऐसा सर्विस प्रोवाइडर भी है जिससे केवल एक महीने के लिए इन्टरनेट लिया जा सके ? संभवतः मुझे घर से ही अपने शोध-कार्य के सिलसिले में बड़ी फाइल्स इधर-उधर सरकानी पड सकती हैं, इसीलिये शायद काफी ज्यादा बैंड-विड्थ की जरूरत पडेगी (१ महीने में लगभग १ G.B.)।
२) दूसरा प्रश्न दिल्ली वालों से है। दिल्ली में हिंदी पुस्तकें खरीदने के लिये अपनी मन पसंद जगह बताइये, जहाँ पर सुगमता से अच्छा साहित्य मिल सके |
३) तीसरा प्रश्न आप सभी लोगों से है | अगर आप किसी को हिंदी की दो पुस्तकें खरीदने के लिये कहेंगे तो वो पुस्तकें कौन सी होंगी ?
तो देर किस बात की है, फ़टाफ़ट अपने जवाब हमें १४ अक्टूबर से पहले भेज दीजिये |
अभी अगले ९ दिनों में भारत यात्रा का भी योग है, जिसकी वजह से पुराने अधूरे कार्यों को समाप्त करने का प्रयास चल रहा है अन्यथा छुट्टियों में भी घर से काम करना पडेगा । इसके अतिरिक्त पिछले कुछ दिनों से एक प्रश्न भी मन को विचलित कर रहा था कि मैं क्यों लिखूँ ? मैं अब भी नहीं मानता कि मेरे ब्लाग लेखन से हिन्दी की कुछ सेवा होती है या अलबत्ता मैं हिन्दी की सेवा के प्रयोजन से ब्लाग लिखता हूँ । हिन्दी ब्लाग लेखन और चिट्ठे बाँचना मेरी व्यक्तिगत रूचि है । इसी रूचि के चलते कुछ ऐसे सम्बन्ध भी बने हैं जिन्होनें मेरी सोच को काफ़ी प्रभावित किया है ।
मैं ब्लाग लेखन क्यों करूँ ? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात है तो मैं मुख्यत: विवादित मुद्दों से दूर ही रहता हूँ । अपने द्वारा अर्जित ज्ञान को बाँटने की बात है तो संगीत के अलावा ऐसे किसी मुद्दे पर मैने अभी तक कुछ लिखा ही नहीं है (तेल/गैस उद्योग पर एक साधारण सी पोस्ट का अपवाद छोडकर) । अगर ब्लाग लेखन को रोजमर्रा के मशीनी जीवन से मुक्ति कहूँ तो उसके लिये भी मैं काफ़ी अन्य गैर-पाठ्यक्रम (Extra-Curriculum) गतिविधियों में संलग्न हूँ । ये सभी बहाने काफ़ी थे एक महीने तक ब्लाग लेखन से विमुख रहने के लिये ।
खैर अब वापिस आये हैं लेकिन आज की पोस्ट में अपनी बक-बक कम और आप लोगों से कुछ सवाल करने हैं ।
१) पहली समस्या है कि भारत में रहकर घर में इन्टरनेट की सुविधा प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है ? मेरे पास अपना लैपटाप होगा, घर में एक BSNL की लैंड-लाईन है और मोबाइल भी हैं | इन सब औजारों के साथ क्या और कैसे मिलाया जाये कि इन्टरनेट चालू हो सके | मेरा घर मथुरा में है इसीलिये ब्राड-बैंड अभी वहाँ आया है कि नहीं पक्का नहीं पता | क्या कोई ऐसा सर्विस प्रोवाइडर भी है जिससे केवल एक महीने के लिए इन्टरनेट लिया जा सके ? संभवतः मुझे घर से ही अपने शोध-कार्य के सिलसिले में बड़ी फाइल्स इधर-उधर सरकानी पड सकती हैं, इसीलिये शायद काफी ज्यादा बैंड-विड्थ की जरूरत पडेगी (१ महीने में लगभग १ G.B.)।
२) दूसरा प्रश्न दिल्ली वालों से है। दिल्ली में हिंदी पुस्तकें खरीदने के लिये अपनी मन पसंद जगह बताइये, जहाँ पर सुगमता से अच्छा साहित्य मिल सके |
३) तीसरा प्रश्न आप सभी लोगों से है | अगर आप किसी को हिंदी की दो पुस्तकें खरीदने के लिये कहेंगे तो वो पुस्तकें कौन सी होंगी ?
तो देर किस बात की है, फ़टाफ़ट अपने जवाब हमें १४ अक्टूबर से पहले भेज दीजिये |
शुक्रवार, सितंबर 21, 2007
नीरज मोहे चिटठा बिसरत नाहीं !!!
पिछले कई दिनों से शोध और जीवन दोनों में ही मिड-लाइफ क्राइसिस चल रही थी | कुछ भी लिखने का मन नहीं कर रहा था, चिट्ठे पढ तो रहा था लेकिन टिप्पणी लिखने का कार्य नहीं हो पा रहा था | लिखें तो क्या लिखें...
ऐसी परिस्थितियों में मुझे संगीत अक्सर शांति देता है, इसीलिये फिर से संगीत पर ही एक प्रविष्टी लिख रहा हूँ | यूनुस भाई ने कुछ दिन पहले "मन कुंटो मौला" और "काहे को ब्याही बिदेश" पर प्रविष्टियाँ लिखी थी | मन कुंटो मौला को उन्होने अलग अलग कव्वालों की आवाज में सुनवाया था, अगर आपने उस पोस्ट को नहीं देखा है तो इस लिंक पर जाकर तुरन्त देखें | उन्होंने साबरी बंधुओं की आवाज में मन कुंटो मौला सुनवाया तो था लेकिन कव्वाली आधी से भी कम थी | इसीलिये आज हम आपको साबरी बंधुओं की आवाज में "मन कुंटो मौला" और "काहे को ब्याही बिदेश" दोनों सुनवायेंगे |
चटखा लगाइये "काहे को ब्याही बिदेश" सुनने के लिए:
काहे को ब्याही बिदेश के बोल जल्दी ही यहाँ पर लिख भी दूंगा, तब तक ज़रा सा इन्तजार कीजिये |
चटखा लगाइये "मन कुंटो मौला" सुनने के लिए:
इस पोस्ट को इसलिये लिख रहा हूँ क्योंकि संगीत पर लिखने के लिए ज्यादा सोचना नहीं पड़ता और आजकल 'तसस्वुर में कंगाली का दौर चल रहा है' :-) लेकिन आशा है धमाके के साथ जल्दी ही लौटेंगे |
साभार,
नीरज रोहिल्ला
ऐसी परिस्थितियों में मुझे संगीत अक्सर शांति देता है, इसीलिये फिर से संगीत पर ही एक प्रविष्टी लिख रहा हूँ | यूनुस भाई ने कुछ दिन पहले "मन कुंटो मौला" और "काहे को ब्याही बिदेश" पर प्रविष्टियाँ लिखी थी | मन कुंटो मौला को उन्होने अलग अलग कव्वालों की आवाज में सुनवाया था, अगर आपने उस पोस्ट को नहीं देखा है तो इस लिंक पर जाकर तुरन्त देखें | उन्होंने साबरी बंधुओं की आवाज में मन कुंटो मौला सुनवाया तो था लेकिन कव्वाली आधी से भी कम थी | इसीलिये आज हम आपको साबरी बंधुओं की आवाज में "मन कुंटो मौला" और "काहे को ब्याही बिदेश" दोनों सुनवायेंगे |
चटखा लगाइये "काहे को ब्याही बिदेश" सुनने के लिए:
|
काहे को ब्याही बिदेश के बोल जल्दी ही यहाँ पर लिख भी दूंगा, तब तक ज़रा सा इन्तजार कीजिये |
चटखा लगाइये "मन कुंटो मौला" सुनने के लिए:
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इस पोस्ट को इसलिये लिख रहा हूँ क्योंकि संगीत पर लिखने के लिए ज्यादा सोचना नहीं पड़ता और आजकल 'तसस्वुर में कंगाली का दौर चल रहा है' :-) लेकिन आशा है धमाके के साथ जल्दी ही लौटेंगे |
साभार,
नीरज रोहिल्ला
शनिवार, सितंबर 08, 2007
सुरैया जमाल शेख के गाये कुछ अनमोल नग्मे !!!

हिन्दी फ़िल्म जगत की बेहद सुरीली गायिका और बेहतरीन अदाकारा सुरैयाजी का पूरा नाम "सुरैया जमाल शेख" था । सुरैयाजी का जन्म १९२९ में हुआ था और २००४ में वो इस जहाँ को अलविदा कह गयीं । सुरैया जी उस जमाने की अदाकारा थीं जब कुछ अदाकार अपने गाने स्वयं ही गाया करते थे जैसे कि कुन्दन लाल सहगल और तलत महमूद ।
सुरैया जी ने १९३७ से १९४१ के बीच फ़िल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम किया और १९४२ की मशहूर फ़िल्म "ताज महल" में मुमताज महल के बचपन का किरदार निभाया । उनकी अंतिम फ़िल्म "रूस्तम सोहराब" थी जो १९६४ में आयी थी । इसी फ़िल्म का एक गीत "ये कैसी अजब दास्ताँ हो गयी है, छुपाते छुपाते बयाँ हो गयी है" मेरा पसंदीदा गीत है । उनकी फ़िल्मों की लम्बी फ़ेहरिस्त में बडी बहन, अफ़सर, प्यार की जीत, परवाना, दास्तान, दिल्लगी, शमाँ, शोखियाँ और मिर्जा गालिब प्रमुख हैं । इसके अलावा भी अनेक फ़िल्मों में उन्होनें अपनी अदाकारी बिखेरी और कितनी ही फ़िल्मों के नग्मों को अपनी सुरीली आवाज से सजाया । अधिक जानकारी के लिये IMDB के इस पृष्ठ को देखें ।
सुरैया और देव आनंद साहब को एक दूसरे से बेहद प्यार था । एक गीत के फ़िल्मांकन के समय नाव के डूबने की स्थिति में देव साहब ने सुरैया को डूबने से बचाया था । सुरैया के घर वाले इस प्रेम के सख्त खिलाफ़ थे । सुरैया और देव साहब का विवाह तो न हो सका और इसी वजह से सुरैया आजीवन अविवाहित रही । प्रेम के इस दुखद अंत को जानते हुये सुरैया जी की आवाज में फ़िल्म मिर्जा गालिब का "ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता" सुनता हूँ तो दिल भारी हुये बिना नहीं रहता । सुना है कि देव साहब ने अपनी आत्मकथा में अपने और सुरैया के समबन्धों के बारे में लिखा है | लेकिन मुझे अभी तक देव साहब की आत्मकथा पढने का मौका नहीं मिला है इसलिये विस्तार से कुछ बता नहीं सकता ।
सुरैयाजी पर लिखी इस पोस्ट को यादगार बनाने के लिये हम आपको सुरैयाजी के कुछ नग्में सुनवायेंगे । सुरैयाजी के कुछ गानों का अन्दाज कुन्दन लाल सहगल के अन्दाज से मिलता जुलता है और ऐसा स्वाभाविक भी है । कुन्दन लाल सहगल के व्यक्तित्व से कौन अछूता रहा है चाहे वो मुकेश, किशोर अथवा लताजी ही क्यों न हों ।
पहली कडी में पेश हैं सुरैयाजी के पाँच नग्में ।
१) ये कैसी अजब दास्तां हो गयी है (रूस्तम सोहराब, १९६४, संगीत निर्देशक: "सज्जाद हुसैन")
ये कैसी अजब दास्ताँ हो गयी है,
छुपाते छुपाते बयाँ हो गयी है - २
ये कैसी अजब दास्ताँ हो गयी है ।
ये दिल का धडकना, ये नजरों का झुकना,
जिगर में जलन सी, ये साँसो का रूकना,
खुदा जाने क्या दास्ताँ हो गयी है ।
छुपाते छुपाते बयाँ हो गयी है,
ये कैसी अजब दास्ताँ हो गयी है ।
बुझा दो बुझा दो, बुझा दो सितारों की शम्में बुझा दो,
छुपा दो छुपा दो, छुपा दो हंसी चाँद को भी छुपा दो,
यहाँ रोशनी मेहमाँ हो गयी है,
ये कैसी अजब दास्ताँ हो गयी है ।
इलाही ये तूफ़ान है किस बला का,
कि हाथों से छूटा है दामन हया का,
खुदा की कसम आज दिल कह रहा है - २
कि लुट जाऊँ मैं नाम लेकर वफ़ा का
तमन्ना तडप कर जवाँ हो गयी है,
ये कैसी अजब दास्ताँ हो गयी है ।
|
२) ओ दूर जाने वाले (प्यार की जीत, १९४८, संगीत निर्देशक:"हुस्नलाल भगतराम" )
ओ दूर जाने वाले - २
वादा न भूल जाना - २
राते हुयी अंधेरी - २
तुम चाँद बन के आना - २
ओ दूर जाने वाले ।
अपने हुये पराये, दुश्मन हुआ जमाना
तुम भी अगर ना आये - २
मेरा कहाँ ठिकाना,
ओ दूर जाने वाले ।
आजा किसी की आँखे, रो रो के कह रही हैं
ऐसा ना हो कि हम को - २
कर दे जुदा जमाना
ओ दूर जाने वाले ।
|
३) ओ लिखने वाले ने (बडी बहन, १९४९, संगीत निर्देशक:"हुस्नलाल भगतराम" )
दिल तेरे आने से पहले भी यू ही बरबाद था,
और यू ही बरबाद है तेरे चले जाने के बाद ।
ओ लिखने वाले ने,
लिखने वाले ने लिख दी मेरी तकदीर में बरबादी
लिखने वाले ने,
दिल को जब तेरी मोहब्बत का सहारा मिल गया,
मैंने समझा मेरी कश्ती को किनारा मिल गया,
हाय किस्मत को मगर कुछ और ही मंजूर था,
आँख जब खोली तो कश्ती से किनारा दूर था ।
लिखने वाले ने,
छोड कर दुनिया तेरी तुझको भुलाने के लिये,
हम चले आये यहाँ आंसू बहाने के लिये,
दिल अभी भूला न था तुझको कि किस्मत मेरी,
खींचकर लायी तुझे मुझको रूलाने के लिये ।
लिखने वाले ने,
|
४) मुरली वाले मुरली बजा (दिल्लगी, १९४९, संगीत निर्देशक: "नौशाद")
मुरली वाले मुरली बजा
सुन सुन मुरली को नाचे जिया,
रह रह के आज मेरा डोले है मन
जाने ना प्रीत मेरे भोले सजन
कैसे छुपाऊँ हाये दिल की लगन
मौसम प्यारा ठण्डी हवा
दिल मिल जाये वो जादू जगा
मुरली वाले मुरली बजा,
मुरली से तेरी जिया लागा बलम
आँखों में तू है नहीं अब कोई गम
ओ बंसी वाले तुझे मेरी कसम
आज सुना दे वो धुन जरा
रून झुन सावन की बरसे घटा
मुरली वाले मुरली बजा,
|
५) नाम तेरा है जुबाँ पर याद तेरी दिल में है (दास्तान, संगीत निर्देशक:"नौशाद")
आने वाले अब तो आजा ज़िन्दगी मुश्किल में है ।
|
अगर आपको ये नग्मे अच्छे लगे हैं और आप आगे भी पुराने गीतों को सुनना चाहते हैं तो अपनी प्रतिक्रिया टिप्पणी के माध्यम से देना न भूलें ।
मंगलवार, सितंबर 04, 2007
टैक्सीगिरी के किस्से, (बोनस में एक सुन्दर सी नज्म सुनिये) ।
शेखर ने मई के महीने में चहकते हुये बताया कि वो दो महीने के लिये डाओ कैमिकल्स (Dow Chemicals) के मुख्यालय मिडलैंड, मिशीगन में इंटर्नशिप करने जा रहा है । हमने एक अच्छे मित्र की तरह तुरन्त बधाई दी और पार्टी की माँग भी कर दी । शेखर ने ये भी बताया कि वो मिशीगन में अपनी कार भी ले जाने की तैयारी कर रहा है । हमने कहा कि अकेले इतनी लम्बी (~१५०० मील) कार यात्रा थोडी मुश्किल रहेगी । इस बात पर शेखर ने अपनी कातिल मुस्कान के साथ हमें सूचना दी कि हम उसके साथ इस यात्रा पर चल रहे हैं । फ़िर, बिना हमारी सलाह के सारा कार्यक्रम बनाकर हमें खबर दी गयी कि,
१) हम जून में उसके साथ मिशीगन तक टैक्सी चालक की हैसियत से उसके साथ चलेंगे और उसके बाद वायुयान द्वारा वापिस ह्यूस्टन आ जायेगें ।
२) सितम्बर में हम वायुयान से दोबारा मिशीगन जायेंगे और पुन: टैक्सीगिरी करते हुये वापिस ह्यूस्टन आयेगें ।
३) इस यात्रा के दौरान हमें भोजन भत्ता और रात में विश्राम करने के लिये होटल भत्ता दिया जायेगा ।
४) इस दौरान हुयी किसी अप्रिय घटना के जिम्मेवार हम स्वयं होंगे (इसकी जानकारी आगे दी जायेगी) ।
ह्यूस्टन से मिशीगन के रास्ते का नक्शा:

वापिसी के समय सोच विचार कर दूसरा रास्ता चुना गया जिससे कि यात्रा का रोमांच बना रहे एवं कुछ नये प्रदेशों के दर्शन का मौका मिले । वापिसी का रास्ता नीचे दिये मानचित्र में अंकित है ।
मिशीगन से ह्यूस्टन वापसी के रास्ते का नक्शा (साथ में जाने का रास्ता भी दिखाया गया है ):

संक्षेप में यात्रा के मुख्य बिन्दु:
१) आना और जाना मिलाकर हमने लगभग ३२०० मील की दूरी तय की ।
२) इस पूरी यात्रा में केवल एक बार पुलिस ने हमें (मुझे) तेज गाडी चलाते हुये पकडा । इसके लिये मुझे $१३० का जुर्माना देना पडा ।
३) रास्ते में दूसरे दिन का पडाव डेटन (Dayton, Ohio) शहर था । हवाईजहाज का आविष्कार करने वाले राइट बन्धु डेटन शहर के ही रहने वाले थे । हमने वहाँ रूक कर राइट बन्धुओं को समर्पित एक संग्रहालय में थोडा समय बिताया ।
३) हमारी मंजिल (मिडलैंड, मिशीगन) आशा से भी छोटा कस्बा (गाँव) निकला । वहाँ पर Dow Chemical के अलावा और कुछ भी नहीं था । ह्यूस्टन जैसे विराट शहर (अमेरिका के चौथे सबसे बडे नगर) में रहने के बाद इतने छोटे कस्बे को देखना अच्छा लगा ।
४) हमारी वापिसी की यात्रा के दौरान हम अमेरिका के मध्य-पश्चिमी इलाके से गुजरे । अमेरिका का ये इलाका बिल्कुल सपाट है और दूर दूर तक केवल मक्के के खेत नजर आते हैं । ये इलाका बाईबल बैल्ट के नाम से भी जाना जाता है ।
संक्षेप में सिर्फ़ इतना ही, कुछ दिनों में मौका लगा तो थोडा विस्तार में कुछ चटपटे अनुभवों को लिखूँगा । जब हम पिछली बार यात्रा पर गये थे तो उसी समय नारद पर बजार के एक चिट्ठे को लेकर बवाल हो गया था, इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ, अच्छी बात है :-)
वैसे आजकल ज्ञानदत्तजी वजन को लेकर काफ़ी हल्ला मचा रहे हैं । उन्हे ज्ञात रहे कि युवा अगरबत्ती संघ इस बात को लेकर मानहानि का दावा कर सकता है :-)
अन्त में एक संयोग वाली बात:
अपनी कार यात्रा के दौरान मैं "अजनबी शहर में अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे" को कार में बैठकर अपने लैपटाप पर सुन रहा था । वापिस लौटने पर पाया कि इसी गीत का जिक्र युनुसजी ने अपने चिट्ठे पर उसी दिन किया था । है न बिल्कुल संयोग की बात ?
उसी प्रविष्टी में युनुस जी ने एक और गाने का भी जिक्र किया था, "जिनसे हम छूट गये अब वो जहाँ कैसे हैं"
ये गीत अभी कुछ साल पहले "पैगाम-ए-मोहब्बत" नाम से जारी हुये एल्बम में था । इस एल्बम में भारत और पाकिस्तान के कलाकारों ने मिलकर गीत गाये थे । अपनी इस प्रविष्टी के अंत में मैं आपको इसी एल्बम की सबसे पहली नज्म सुनवा रहा हूँ :
गुलाम तुम भी थे यारों, गुलाम हम भी थे
नहा के खून में आयी थी फ़स्ले-आजादी ।
मजा तो तब था कि मिलकर इलाज-ए-जाँ करते,
खुद अपने हाथ से तामीर-ए-गुलसिताँ करते ।
हमारे दर्द में तुम और तुम्हारे दर्द में हम शरीक होते,
तो जश्ने आशियाँ करते ।
तुम आओ गुलशने लाहौर से चमन बरदोश,
हम आयें सुबह बनारस की रोशनी लेकर,
हिमालय की हवाओं की ताजगी लेकर,
और उसके बाद ये पूछें कौन दुश्मन है ?
१) हम जून में उसके साथ मिशीगन तक टैक्सी चालक की हैसियत से उसके साथ चलेंगे और उसके बाद वायुयान द्वारा वापिस ह्यूस्टन आ जायेगें ।
२) सितम्बर में हम वायुयान से दोबारा मिशीगन जायेंगे और पुन: टैक्सीगिरी करते हुये वापिस ह्यूस्टन आयेगें ।
३) इस यात्रा के दौरान हमें भोजन भत्ता और रात में विश्राम करने के लिये होटल भत्ता दिया जायेगा ।
४) इस दौरान हुयी किसी अप्रिय घटना के जिम्मेवार हम स्वयं होंगे (इसकी जानकारी आगे दी जायेगी) ।
ह्यूस्टन से मिशीगन के रास्ते का नक्शा:

वापिसी के समय सोच विचार कर दूसरा रास्ता चुना गया जिससे कि यात्रा का रोमांच बना रहे एवं कुछ नये प्रदेशों के दर्शन का मौका मिले । वापिसी का रास्ता नीचे दिये मानचित्र में अंकित है ।
मिशीगन से ह्यूस्टन वापसी के रास्ते का नक्शा (साथ में जाने का रास्ता भी दिखाया गया है ):

संक्षेप में यात्रा के मुख्य बिन्दु:
१) आना और जाना मिलाकर हमने लगभग ३२०० मील की दूरी तय की ।
२) इस पूरी यात्रा में केवल एक बार पुलिस ने हमें (मुझे) तेज गाडी चलाते हुये पकडा । इसके लिये मुझे $१३० का जुर्माना देना पडा ।
३) रास्ते में दूसरे दिन का पडाव डेटन (Dayton, Ohio) शहर था । हवाईजहाज का आविष्कार करने वाले राइट बन्धु डेटन शहर के ही रहने वाले थे । हमने वहाँ रूक कर राइट बन्धुओं को समर्पित एक संग्रहालय में थोडा समय बिताया ।
३) हमारी मंजिल (मिडलैंड, मिशीगन) आशा से भी छोटा कस्बा (गाँव) निकला । वहाँ पर Dow Chemical के अलावा और कुछ भी नहीं था । ह्यूस्टन जैसे विराट शहर (अमेरिका के चौथे सबसे बडे नगर) में रहने के बाद इतने छोटे कस्बे को देखना अच्छा लगा ।
४) हमारी वापिसी की यात्रा के दौरान हम अमेरिका के मध्य-पश्चिमी इलाके से गुजरे । अमेरिका का ये इलाका बिल्कुल सपाट है और दूर दूर तक केवल मक्के के खेत नजर आते हैं । ये इलाका बाईबल बैल्ट के नाम से भी जाना जाता है ।
संक्षेप में सिर्फ़ इतना ही, कुछ दिनों में मौका लगा तो थोडा विस्तार में कुछ चटपटे अनुभवों को लिखूँगा । जब हम पिछली बार यात्रा पर गये थे तो उसी समय नारद पर बजार के एक चिट्ठे को लेकर बवाल हो गया था, इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ, अच्छी बात है :-)
वैसे आजकल ज्ञानदत्तजी वजन को लेकर काफ़ी हल्ला मचा रहे हैं । उन्हे ज्ञात रहे कि युवा अगरबत्ती संघ इस बात को लेकर मानहानि का दावा कर सकता है :-)
अन्त में एक संयोग वाली बात:
अपनी कार यात्रा के दौरान मैं "अजनबी शहर में अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे" को कार में बैठकर अपने लैपटाप पर सुन रहा था । वापिस लौटने पर पाया कि इसी गीत का जिक्र युनुसजी ने अपने चिट्ठे पर उसी दिन किया था । है न बिल्कुल संयोग की बात ?
उसी प्रविष्टी में युनुस जी ने एक और गाने का भी जिक्र किया था, "जिनसे हम छूट गये अब वो जहाँ कैसे हैं"
ये गीत अभी कुछ साल पहले "पैगाम-ए-मोहब्बत" नाम से जारी हुये एल्बम में था । इस एल्बम में भारत और पाकिस्तान के कलाकारों ने मिलकर गीत गाये थे । अपनी इस प्रविष्टी के अंत में मैं आपको इसी एल्बम की सबसे पहली नज्म सुनवा रहा हूँ :
गुलाम तुम भी थे यारों, गुलाम हम भी थे
नहा के खून में आयी थी फ़स्ले-आजादी ।
मजा तो तब था कि मिलकर इलाज-ए-जाँ करते,
खुद अपने हाथ से तामीर-ए-गुलसिताँ करते ।
हमारे दर्द में तुम और तुम्हारे दर्द में हम शरीक होते,
तो जश्ने आशियाँ करते ।
तुम आओ गुलशने लाहौर से चमन बरदोश,
हम आयें सुबह बनारस की रोशनी लेकर,
हिमालय की हवाओं की ताजगी लेकर,
और उसके बाद ये पूछें कौन दुश्मन है ?
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गुरुवार, अगस्त 30, 2007
पानी की झोपड़ी, फूस का झरना और खोपडी में टिमटिमाता बल्ब !
हमारे कालेज में एक प्रतियोगिता होती थी "जस्ट ए मिनट"; बहुत सारे लोग शायद इसके बारे में पहले से जानते हों लेकिन पूर्णता के लिये हम इसके बारे में संक्षेप में बता रहे हैं । इस प्रतियोगिता में आपको एक अजीब से विषय पर बिना रुके काफ़ी तेजी से बोलना होता था (अटलजी के अंदाज में नहीं बोल सकते थे)। बीच में केवल सामान्य रूप से सांस ले सकते थे और सांस लेने में जरा भी देर लगाई तो विपक्षी को अंक मिलते थे और बोलने का मौका भी । हर तीसरे वाक्य में विषय फ़िर से आना चाहिये, आप विषय के इर्द गिर्द कोई लम्बी कहानी भी नहीं बुन सकते थे । आपका उच्चारण एकदम साफ़ होना चाहिये, व्याकरण सम्बन्धी अशुद्धि भी नहीं, और आपके बोलने की गति पूरे समय लगभग एक जैसी होनी चाहिये । कुल मिलाकर तर्क को पीछे छोडकर बस बेलगाम बोलते चले जाइये । छ: लोग एक साथ खेल खेलते थे और जितने सेकेण्ड्स आप बिना रूके बोलें उतने ही अंक और जिसके सबसे अधिक अंक वो विजेता ।
हमने दो बार इस प्रतियोगिता में रजत और एक बार स्वर्ण पदक हासिल किया था । मुझे एक बार "पानी की झोपड़ी, फूस का झरना और खोपडी में टिमटिमाता बल्ब" पर बोलना पडा था और इस विषय पर बोलने में काफी मज़ा आया था। आज उसी अंदाज में कुछ अलग अलग विषयों पर लिख रहा हूँ, आशा है आप तारतम्यता भंग होने पर अन्यथा नहीं लेंगे ।
१) अनूपजी ने अपने चिट्ठे पर शाहजहाँपुर के कई किस्से लिखे हैं । शाहजहाँपुर में हमारा परिवार १९८९ से १९९७ तक रहा था और हमने यहाँ कक्षा ४ से ११ तक की पढाई की थी (देख लीजिये बीच में हम फ़ेल नहीं हुये थे :-) ) । शाहजहाँपुर की यादें मेरे जेहन से कभी धुंधली नहीं होती, वहाँ की एक एक याद बडे सलीके से सहेज कर रखी है ।
जिन घटनाओं ने मुझे और मेरे परिवार को सबसे अधिक प्रभावित किया है उन्हे लिखने का फ़ैसला मैं अभी तक नहीं ले पाया हूँ क्योंकि वो इतनी व्यक्तिगत हैं कि उनको लिखना संभव न हो सकेगा ।
फ़िर भी कुछ घटनाओं का जिक्र करने का मन कर रहा है,
सरस्वती विद्या मंदिर:
इस विद्यालय में हमने कक्षा ६ से ९ तक शिक्षा प्राप्त की और हम इस विद्यालय के सबसे पहले बैच के विद्यार्थी थे । जब विद्यालय प्रारम्भ हआ तो हमारे पूरे विद्यालय के नाम पर ३० विद्यार्थी, ३ अध्यापक और केवल कक्षा ६ थी । अगले दो सालों में कक्षा ७ और ८ भी चालू हुयी । विद्यालय में काफ़ी अच्छी पढाई होती थी और बची खुची हमारे पिताजी घर पर निपटा देते थे । हम कक्षा में सदैव प्रथम या द्वितीय आते रहते थे तो अपनी भी विद्यालय में कुछ इज्जत थी, इसका चर्चा फ़िर करेंगे । श्री कमलेश कुमार जी जब प्रधानाचार्य बनकर आये तो उस समय हम कक्षा ७ में थे । वो हमें आंग्लभाषा और गणित पढाया करते थे । ये उस समय की बात है जब हमारे सभी अध्यापक अपने साथ एक डंडा या अरहर की संटी रखा करते थे । हमारे अंग्रेजी के गृहकार्य में कुछ बडी गडबड थी इसलिये हमें उनके चैंम्बर में बुलवाया गया । कुल मिलाकर दो-तीन संटियाँ पडी होंगी जो हमारे लिये अपवाद स्वरूप थी क्योंकि हम ठहरे विद्यालय के होनहार छात्र । हमें अब भी पूरा विश्वास है कि कोई और आचार्यजी होते तो हमें सिर्फ़ डाँटकर छोड दिया जाता लेकिन श्री कमलेशजी नये नये आये थे इसलिये उन्हे हमारे ट्रैक-रेकार्ड का पता नहीं था :-)
असली बात इसके बाद शुरू होती है । संटियाँ पडते पडते मध्यावकाश का घंटा बज चुका था और जब तक हम उनके चैम्बर से बाहर निकलते बाहर लाबी में खूब भीड हो चुकी थी । अब प्रधानाचार्य के कक्ष में उन दिनों जाने का सीधा अर्थ डांट खाने या मार खाने में से एक होता था । हम सोच रहे थे कि कैसे अपनी इज्जत बचायी जाये, इसीलिये उनके चैंबर से बाहर निकलते ही हमने अपने चेहरे पर हंसी के ऐसे भाव लाये कि कोई ताड न जाये । बस गलती ये हो गयी कि हमारे वो भाव प्रधानाचार्य जी ने भी देख लिये । उन्हे लगा कि ये तो निहायत ही ढीठ लडका है । वापिस बुलाकर बोले कि लगता है ये दंड तुम्हारे लिये पर्याप्त नहीं था और दो संटियाँ और लगा दीं । आप ही बताईये कि क्या उनको एक बार दंड देने के पश्चात मुझे दोबारा दंडित करने का नैतिक अधिकार था ? कुल मिलाकर शुरू के दिनों में हमारी उनके साथ नहीं जमी ।
अगले दो सालों में कमलेशजी हमारे सबसे प्रिय अध्यापक हो गये थे । कक्षा में विद्यार्थियों को दंड देने के बाद वो अक्सर बडे भावुक हो जाते थे और कई बार उन्होने अपनी संटी हमारे सामने तोडकर फ़ेंक दी थी । लेकिन नालायक विद्यार्थी सुधरते ही नहीं थे और फ़िर उन्हे एक नयी संटी लानी पडती थी । आगे जारी रहेगा...
२) बचपन से ही हमें गाने का बडा शौक था, अब भी है । लेकिन अब समझ में आ गया है कि हमारे अलावा कोई और हमारा गाना सुनना नहीं चाहता । इसीलिये अब हम तानसेन न होकर केवल "कानसेन" हैं । आज आपको अपनी कानसेनी यात्रा के बारे में बताते हैं ।
बचपन में वही संगीत सुना जो घर पर बजता था । मेरे पिताजी को कभी संगीत सुनने का शौक रहा होगा जिसके गवाह कुछ आडियो कैसेट्स हैं । पिताजी को जो भी थोडा बहुत संगीत सुनने का शौक रहा हो, उनकी पसन्द अच्छी थी; मुकेश/रफ़ी/लता/किशोर के सदाबहार नग्में, चन्दन दास/पंकज उदास की गजलें, और अनूप जलोटा/कवि प्रदीप के भजन । फ़िर घर में टी.वी. के माध्यम से "हवा हवाई/दीदी तेरा देवर दीवाना/चुरा के दिल मेरा गोरिया चली" टाईप के गाने भी सुने ।
कक्षा ११-१२ के दौरान मन लौटकर ७० के दशक के संगीत पर आया और साथ ही लकी अली और उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान का एलबम "संगम" सुना । कक्षा १२ में पहली बार जगजीत सिंह को "होठों से छू लो तुम" में सुना । फ़िर ए. आर. रहमान ने हमारे दिल पर "दिल से" राज किया । कुल मिलाकर संगीत में कुछ पसंद तो थी लेकिन ठीक से परिभाषित नहीं थी ।
फ़िर हम घर से बाहर पढाई करने चले गये और एकदम से बहुत सारा खाली टाईम हमें मिल गया । एक दिन दूरदर्शन पर "तलत महमूद" साहब का एक इंटरव्यू देखा और जीवन में पहली बार "जलते हैं जिसके लिये/तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती" सुना । एक बार सुना तो उनकी मखमली आवाज में डूबकर ही रह गये । तुरंत बाजार से तलत साहब के कुछ कैसेट्स खरीद लाये ।
फ़िर एक नयी समस्या उत्पन्न हुयी, मेरे रूममेट ने इतने पुराने गानों के रूम में बजने पर सख्त ऐतराज किया और बात लडाई तक आ पँहुची । जैसे तैसे कुछ समझौते किये गये (मसलन पुराने गानों के लिये समय तय किया गया ) । उसके बाद थोडी सनक सवार हुयी कि संगीत का अर्थ केवल गाने सुनना ही नहीं होता बल्कि उनके संगीतकार/गीतकार/फ़िल्म वगैरह की जानकारी भी होनी चाहिये ।
इसके कुछ दिनों बाद हमने अपना पहला कम्प्यूटर खरीदा और वो हमारे संगीत प्रेम की जीवन रेखा बन गया । उस दिन के बाद से ४०-५०-६० के दशकों के संगीत के खजाने को चखना शुरू किया । पुराने गानों की चाहत को एक नये मुकाम पर www.indianscreen.com ने पँहुचाया । उसके बाद तो ऐसा चस्का लगा कि अब कुछ नया सुनने की आदत ही नहीं रही ।
हमने दो बार इस प्रतियोगिता में रजत और एक बार स्वर्ण पदक हासिल किया था । मुझे एक बार "पानी की झोपड़ी, फूस का झरना और खोपडी में टिमटिमाता बल्ब" पर बोलना पडा था और इस विषय पर बोलने में काफी मज़ा आया था। आज उसी अंदाज में कुछ अलग अलग विषयों पर लिख रहा हूँ, आशा है आप तारतम्यता भंग होने पर अन्यथा नहीं लेंगे ।
१) अनूपजी ने अपने चिट्ठे पर शाहजहाँपुर के कई किस्से लिखे हैं । शाहजहाँपुर में हमारा परिवार १९८९ से १९९७ तक रहा था और हमने यहाँ कक्षा ४ से ११ तक की पढाई की थी (देख लीजिये बीच में हम फ़ेल नहीं हुये थे :-) ) । शाहजहाँपुर की यादें मेरे जेहन से कभी धुंधली नहीं होती, वहाँ की एक एक याद बडे सलीके से सहेज कर रखी है ।
जिन घटनाओं ने मुझे और मेरे परिवार को सबसे अधिक प्रभावित किया है उन्हे लिखने का फ़ैसला मैं अभी तक नहीं ले पाया हूँ क्योंकि वो इतनी व्यक्तिगत हैं कि उनको लिखना संभव न हो सकेगा ।
फ़िर भी कुछ घटनाओं का जिक्र करने का मन कर रहा है,
सरस्वती विद्या मंदिर:
इस विद्यालय में हमने कक्षा ६ से ९ तक शिक्षा प्राप्त की और हम इस विद्यालय के सबसे पहले बैच के विद्यार्थी थे । जब विद्यालय प्रारम्भ हआ तो हमारे पूरे विद्यालय के नाम पर ३० विद्यार्थी, ३ अध्यापक और केवल कक्षा ६ थी । अगले दो सालों में कक्षा ७ और ८ भी चालू हुयी । विद्यालय में काफ़ी अच्छी पढाई होती थी और बची खुची हमारे पिताजी घर पर निपटा देते थे । हम कक्षा में सदैव प्रथम या द्वितीय आते रहते थे तो अपनी भी विद्यालय में कुछ इज्जत थी, इसका चर्चा फ़िर करेंगे । श्री कमलेश कुमार जी जब प्रधानाचार्य बनकर आये तो उस समय हम कक्षा ७ में थे । वो हमें आंग्लभाषा और गणित पढाया करते थे । ये उस समय की बात है जब हमारे सभी अध्यापक अपने साथ एक डंडा या अरहर की संटी रखा करते थे । हमारे अंग्रेजी के गृहकार्य में कुछ बडी गडबड थी इसलिये हमें उनके चैंम्बर में बुलवाया गया । कुल मिलाकर दो-तीन संटियाँ पडी होंगी जो हमारे लिये अपवाद स्वरूप थी क्योंकि हम ठहरे विद्यालय के होनहार छात्र । हमें अब भी पूरा विश्वास है कि कोई और आचार्यजी होते तो हमें सिर्फ़ डाँटकर छोड दिया जाता लेकिन श्री कमलेशजी नये नये आये थे इसलिये उन्हे हमारे ट्रैक-रेकार्ड का पता नहीं था :-)
असली बात इसके बाद शुरू होती है । संटियाँ पडते पडते मध्यावकाश का घंटा बज चुका था और जब तक हम उनके चैम्बर से बाहर निकलते बाहर लाबी में खूब भीड हो चुकी थी । अब प्रधानाचार्य के कक्ष में उन दिनों जाने का सीधा अर्थ डांट खाने या मार खाने में से एक होता था । हम सोच रहे थे कि कैसे अपनी इज्जत बचायी जाये, इसीलिये उनके चैंबर से बाहर निकलते ही हमने अपने चेहरे पर हंसी के ऐसे भाव लाये कि कोई ताड न जाये । बस गलती ये हो गयी कि हमारे वो भाव प्रधानाचार्य जी ने भी देख लिये । उन्हे लगा कि ये तो निहायत ही ढीठ लडका है । वापिस बुलाकर बोले कि लगता है ये दंड तुम्हारे लिये पर्याप्त नहीं था और दो संटियाँ और लगा दीं । आप ही बताईये कि क्या उनको एक बार दंड देने के पश्चात मुझे दोबारा दंडित करने का नैतिक अधिकार था ? कुल मिलाकर शुरू के दिनों में हमारी उनके साथ नहीं जमी ।
अगले दो सालों में कमलेशजी हमारे सबसे प्रिय अध्यापक हो गये थे । कक्षा में विद्यार्थियों को दंड देने के बाद वो अक्सर बडे भावुक हो जाते थे और कई बार उन्होने अपनी संटी हमारे सामने तोडकर फ़ेंक दी थी । लेकिन नालायक विद्यार्थी सुधरते ही नहीं थे और फ़िर उन्हे एक नयी संटी लानी पडती थी । आगे जारी रहेगा...
२) बचपन से ही हमें गाने का बडा शौक था, अब भी है । लेकिन अब समझ में आ गया है कि हमारे अलावा कोई और हमारा गाना सुनना नहीं चाहता । इसीलिये अब हम तानसेन न होकर केवल "कानसेन" हैं । आज आपको अपनी कानसेनी यात्रा के बारे में बताते हैं ।
बचपन में वही संगीत सुना जो घर पर बजता था । मेरे पिताजी को कभी संगीत सुनने का शौक रहा होगा जिसके गवाह कुछ आडियो कैसेट्स हैं । पिताजी को जो भी थोडा बहुत संगीत सुनने का शौक रहा हो, उनकी पसन्द अच्छी थी; मुकेश/रफ़ी/लता/किशोर के सदाबहार नग्में, चन्दन दास/पंकज उदास की गजलें, और अनूप जलोटा/कवि प्रदीप के भजन । फ़िर घर में टी.वी. के माध्यम से "हवा हवाई/दीदी तेरा देवर दीवाना/चुरा के दिल मेरा गोरिया चली" टाईप के गाने भी सुने ।
कक्षा ११-१२ के दौरान मन लौटकर ७० के दशक के संगीत पर आया और साथ ही लकी अली और उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान का एलबम "संगम" सुना । कक्षा १२ में पहली बार जगजीत सिंह को "होठों से छू लो तुम" में सुना । फ़िर ए. आर. रहमान ने हमारे दिल पर "दिल से" राज किया । कुल मिलाकर संगीत में कुछ पसंद तो थी लेकिन ठीक से परिभाषित नहीं थी ।
फ़िर हम घर से बाहर पढाई करने चले गये और एकदम से बहुत सारा खाली टाईम हमें मिल गया । एक दिन दूरदर्शन पर "तलत महमूद" साहब का एक इंटरव्यू देखा और जीवन में पहली बार "जलते हैं जिसके लिये/तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती" सुना । एक बार सुना तो उनकी मखमली आवाज में डूबकर ही रह गये । तुरंत बाजार से तलत साहब के कुछ कैसेट्स खरीद लाये ।
फ़िर एक नयी समस्या उत्पन्न हुयी, मेरे रूममेट ने इतने पुराने गानों के रूम में बजने पर सख्त ऐतराज किया और बात लडाई तक आ पँहुची । जैसे तैसे कुछ समझौते किये गये (मसलन पुराने गानों के लिये समय तय किया गया ) । उसके बाद थोडी सनक सवार हुयी कि संगीत का अर्थ केवल गाने सुनना ही नहीं होता बल्कि उनके संगीतकार/गीतकार/फ़िल्म वगैरह की जानकारी भी होनी चाहिये ।
इसके कुछ दिनों बाद हमने अपना पहला कम्प्यूटर खरीदा और वो हमारे संगीत प्रेम की जीवन रेखा बन गया । उस दिन के बाद से ४०-५०-६० के दशकों के संगीत के खजाने को चखना शुरू किया । पुराने गानों की चाहत को एक नये मुकाम पर www.indianscreen.com ने पँहुचाया । उसके बाद तो ऐसा चस्का लगा कि अब कुछ नया सुनने की आदत ही नहीं रही ।
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल खावै।
'सूरदास' प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ।
सोमवार, अगस्त 27, 2007
शनिवार, अगस्त 25, 2007
कव्वाली: भाग २
कव्वाली पर मेरी पिछली प्रविष्टी को आप सभी ने पसन्द किया इसके लिये धन्यवाद । इस प्रविष्टी में हम हिन्दी फ़िल्म संगीत की कव्वालियों पर चर्चा करेंगे । संगीत निर्देशक "रोशन" ने अपनी फ़िल्मों में बेहतरीन कव्वालियों का प्रयोग किया । उन्होनें "बहू बेगम", "दिल ही तो है", "ताज महल" और "बरसात की एक रात" जैसी कई फ़िल्मों में दिलकश कव्वालियों का प्रयोग किया ।
इस पहली पोडकास्ट में उनकी चार कव्वालियों के कुछ अंश प्रस्तुत हैं ।
१) न तो कारवाँ की तलाश है, न हम सफ़र की तलाश है ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")
२) ये इश्क इश्क है ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")
३) वाकिफ़ हूँ खूब इश्क के तर्जे बयाँ से मैं ("बहू बेगम", संगीत निर्देशक: "रोशन")
४) ऐसे में तुझको ढूँढ के लाऊँ कहाँ से मैं ("बहू बेगम", संगीत निर्देशक: "रोशन")
इन कव्वालियों के अंशो को मिलाकर मैने लगभग १२:३० मिनट का एक पोड्कास्ट तैयार किया है । तो नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन चार कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।
दूसरी पोडकास्ट भी "रोशन" साहब के नाम पर है, इसमें आप सुनेंगे ।
१) चाँदी का बदन सोने की नजर ("ताज महल", संगीत निर्देशक: "रोशन")
२) जी चाहता है चूम लूँ अपनी नजर को मैं ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")
३) निगाहे नाज के मारों को हाल क्या होगा ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")
नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन तीन कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।
तीसरी पोडकास्ट में आप सुनेंगे:
१) चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में ("निकाह", संगीत निर्देशक: "रवि")
२) निगाहें मिलाने को जी चाहता है ("दिल ही तो है", संगीत निर्देशक: "रोशन")
३) पल दो पल का साथ हमारा पल दो पल के याराने हैं ("द बर्निंग ट्रेन", संगीत निर्देशक: "राहुल देव बर्मन")
4) अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में ("मेरे हमदम मेरे दोस्त", संगीत निर्देशक: "लक्ष्मीकांत प्यारेलाल")
नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।
और अंत में आपके लिये पेश हैं कव्वाल "इस्माईल आजाद" की दो प्रसिद्ध कव्वालियाँ:
१) हमें तो लूट लिया मिल के हुस्न वालों नें
२) झूम बराबर झूम शराबी, झूम बराबर झूम ।
नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।
हिन्दी फ़िल्म संगीत की कुछ अन्य प्रसिद्ध कव्वालियाँ इस प्रकार हैं ।
१) तेरी महफ़िल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे ("मुगले आजम", संगीत निर्देशक: "नौशाद", गायक :"लता मंगेशकर, शमशाद बेगम")
२) ये माना मेरी जाँ मोहब्बत सजा है मजा इसमें इतना मगर किसलिये है ("हँसते जख्म", संगीत निर्देशक: "मदन मोहन")
३) हाल क्या है दिलों का न पूछो सनम ("अनोखी अदा", संगीत निर्देशक: "नौशाद")
४) आज क्यों हमसे पर्दा है ("साधना", संगीत निर्देशक : "नारायण दत्ता")
५) यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिन्दगी ("जंजीर", संगीत निर्देशक : "कल्यानजी आनन्दजी")
६) मेरी तस्वीर लेकर क्या करोगे तुम ("काला समुन्दर, संगीत निर्देशक : "नारायण दत्ता")
७) है अगर दुश्मन दुश्मन जमाना गम नहीं ("हम किसी से कम नहीं", संगीत निर्देशक : "राहुल देव बर्मन")
८) परदा है परदा ("अमर अकबर एंथनी", संगीत निर्देशक : "लक्ष्मीकांत प्यारेलाल")
९) परदे में बैठा है कोई परदा करके ("दादा", संगीत निर्देशक : "ऊषा खन्ना")
१०)उनसे नजरे मिली और हिजाब आ गया ("गजल", संगीत निर्देशक : "मदन मोहन")
११) जाते जाते एक नजर भर देख लो, देख लो ("कव्वाली की रात", संगीत निर्देशक : "इकबाल कुरैशी")
फ़िलहाल बस इतने ही गीत याद आ रहे हैं । अगर आपकी भी कोई पसंदीदा कव्वाली है तो आप अपनी टिप्पणी के माध्यम से बता सकते हैं ।
इस पहली पोडकास्ट में उनकी चार कव्वालियों के कुछ अंश प्रस्तुत हैं ।
१) न तो कारवाँ की तलाश है, न हम सफ़र की तलाश है ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")
२) ये इश्क इश्क है ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")
३) वाकिफ़ हूँ खूब इश्क के तर्जे बयाँ से मैं ("बहू बेगम", संगीत निर्देशक: "रोशन")
४) ऐसे में तुझको ढूँढ के लाऊँ कहाँ से मैं ("बहू बेगम", संगीत निर्देशक: "रोशन")
इन कव्वालियों के अंशो को मिलाकर मैने लगभग १२:३० मिनट का एक पोड्कास्ट तैयार किया है । तो नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन चार कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।
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दूसरी पोडकास्ट भी "रोशन" साहब के नाम पर है, इसमें आप सुनेंगे ।
१) चाँदी का बदन सोने की नजर ("ताज महल", संगीत निर्देशक: "रोशन")
२) जी चाहता है चूम लूँ अपनी नजर को मैं ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")
३) निगाहे नाज के मारों को हाल क्या होगा ("बरसात की एक रात", संगीत निर्देशक: "रोशन")
नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन तीन कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।
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तीसरी पोडकास्ट में आप सुनेंगे:
१) चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में ("निकाह", संगीत निर्देशक: "रवि")
२) निगाहें मिलाने को जी चाहता है ("दिल ही तो है", संगीत निर्देशक: "रोशन")
३) पल दो पल का साथ हमारा पल दो पल के याराने हैं ("द बर्निंग ट्रेन", संगीत निर्देशक: "राहुल देव बर्मन")
4) अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में ("मेरे हमदम मेरे दोस्त", संगीत निर्देशक: "लक्ष्मीकांत प्यारेलाल")
नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।
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और अंत में आपके लिये पेश हैं कव्वाल "इस्माईल आजाद" की दो प्रसिद्ध कव्वालियाँ:
१) हमें तो लूट लिया मिल के हुस्न वालों नें
२) झूम बराबर झूम शराबी, झूम बराबर झूम ।
नीचे दिये "प्ले" बटन पर चटका लगाकर इन कव्वालियों का आनन्द लीजिये ।
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हिन्दी फ़िल्म संगीत की कुछ अन्य प्रसिद्ध कव्वालियाँ इस प्रकार हैं ।
१) तेरी महफ़िल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे ("मुगले आजम", संगीत निर्देशक: "नौशाद", गायक :"लता मंगेशकर, शमशाद बेगम")
२) ये माना मेरी जाँ मोहब्बत सजा है मजा इसमें इतना मगर किसलिये है ("हँसते जख्म", संगीत निर्देशक: "मदन मोहन")
३) हाल क्या है दिलों का न पूछो सनम ("अनोखी अदा", संगीत निर्देशक: "नौशाद")
४) आज क्यों हमसे पर्दा है ("साधना", संगीत निर्देशक : "नारायण दत्ता")
५) यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिन्दगी ("जंजीर", संगीत निर्देशक : "कल्यानजी आनन्दजी")
६) मेरी तस्वीर लेकर क्या करोगे तुम ("काला समुन्दर, संगीत निर्देशक : "नारायण दत्ता")
७) है अगर दुश्मन दुश्मन जमाना गम नहीं ("हम किसी से कम नहीं", संगीत निर्देशक : "राहुल देव बर्मन")
८) परदा है परदा ("अमर अकबर एंथनी", संगीत निर्देशक : "लक्ष्मीकांत प्यारेलाल")
९) परदे में बैठा है कोई परदा करके ("दादा", संगीत निर्देशक : "ऊषा खन्ना")
१०)उनसे नजरे मिली और हिजाब आ गया ("गजल", संगीत निर्देशक : "मदन मोहन")
११) जाते जाते एक नजर भर देख लो, देख लो ("कव्वाली की रात", संगीत निर्देशक : "इकबाल कुरैशी")
फ़िलहाल बस इतने ही गीत याद आ रहे हैं । अगर आपकी भी कोई पसंदीदा कव्वाली है तो आप अपनी टिप्पणी के माध्यम से बता सकते हैं ।
गुरुवार, अगस्त 23, 2007
एक वेबसाईट के बहाने अमीर खुसरो के बारे में जानकारी !!
सम्भवत: आप में से कुछ लोगों ने इस वेबसाईट का भ्रमण किया हो ।
http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/welcome.html
मैं पिछले कई महीनों से इस वेबसाईट को धीरे धीरे करके पढ रहा हूँ । भारत सरकार के द्वारा निस्संदेह यह एक सराहनीय प्रयास है । आज इस वेबसाईट को भ्रमण करते करते अमीर खुसरो पर तो जैसे ज्ञान का खजाना ही मिल गया । अमीर खुसरो का जिक्र मैने अपनी कव्वाली वाली पोस्ट में किया था । इस वेबसाईट पर अमीर खुसरो के बारे में जानकारी १९ पृष्ठों में उपलब्ध है । आसानी के लिये मैने इस जानकारी को एक फ़ाईल में समायोजित करने का प्रयास किया है । इस फ़ाईल को आप MS Word or PDF दोनों रूपों में प्राप्त कर सकते हैं ।
MS word format के लिये यहाँ चटका लगायें ।
PDF format के लिये यहाँ चटका लगायें ।
अमीर खुसरों पहेलियों के लिये बहुत प्रसिद्ध हैं | आज अनूपजी के अंदाज में मैं आपको अमीर खुसरो की कुछ पहेलियाँ पढवाता हूँ ।
मेरी पसंद :
(१) बूझ पहेली (अंतर्लापिका)
यह वो पहेलियाँ हैं जिनका उत्तर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप में पहेली में दिया होता है यानि जो पहेलियाँ पहले से ही बूझी गई हों। जैसे -
(क) गोल मटोल और छोटा-मोटा, हर दम वह तो जमीं पर लोटा।
खुसरो कहे नहीं है झूठा, जो न बूझे अकिल का खोटा।।
उत्तर - लोटा।
यहाँ पहली पंक्ति का आखिरी शब्द ही पहेली का उत्तर है जो पहेली में कहीं भी हो सकता है। इन पहेलियों का उत्तर पहेलियों में ही होता है। खुसरो की बूझ पहेलियों के भी दो वर्ग बनाए जा सकते हैं। कुछ में तो उत्तर एक ही शब्द में रहता है जैसा कि हम ऊपर देख चुके हैं। दूसरी पहेली में कभी-कभी उत्तर के लिए दो शब्दों को मिलाना पड़ता है। जैसे –
(ख) श्याम बरन और दाँत अनेक, लचकत जैसे नारी।
दोनों हाथ से खुसरो खींचे और कहे तू आ री।।
उत्तर - आरी। यहाँ दूसरी पंक्ति के आखिरी शब्द 'आ' और 'री' को मिलाने से उत्तर मिलता है।
(ग) हाड़ की देही उज् रंग, लिपटा रहे नारी के संग।
चोरी की ना खून किया वाका सर क्यों काट लिया।
उत्तर - नाखून।
(घ) बाला था जब सबको भाया, बड़ा हुआ कुछ काम न आया।
खुसरो कह दिया उसका नाव, अर्थ करो नहीं छोड़ो गाँव।।
उत्तर - दिया।
(ञ) नारी से तू नर भई और श्याम बरन भई सोय।
गली-गली कूकत फिरे कोइलो-कोइलो लोय।।
उत्तर - कोयल।
(च) एक नार तरवर से उतरी, सर पर वाके पांव
ऐसी नार कुनार को, मैं ना देखन जाँव।।
उत्तर - मैंना।
(छ) सावन भादों बहुत चलत है माघ पूस में थोरी।
अमीर खुसरो यूँ कहें तू बुझ पहेली मोरी।।
उत्तर - मोरी (नाली)
(२) बिन बूझ पहेली या बहिर्लापिका, इसका उत्तर पहेली से बाहर होता है। उदाहरण –
(क) एक नार कुँए में रहे, वाका नीर खेत में बहे।
जो कोई वाके नीर को चाखे, फिर जीवन की आस न राखे।।
उत्तर – तलवार
(ख) एक जानवर रंग रंगीला, बिना मारे वह रोवे।
उस के सिर पर तीन तिलाके, बिन बताए सोवे।।
उत्तर - मोर।
(ग) चाम मांस वाके नहीं नेक, हाड़ मास में वाके छेद।
मोहि अचंभो आवत ऐसे, वामे जीव बसत है कैसे।।
उत्तर - पिंजड़ा।
(घ) स्याम बरन की है एक नारी, माथे ऊपर लागै प्यारी।
जो मानुस इस अरथ को खोले, कुत्ते की वह बोली बोले।।
उत्तर - भौं (भौंए आँख के ऊपर होती हैं।)
(ञ) एक गुनी ने यह गुन कीना, हरियल पिंजरे में दे दीना।
देखा जादूगर का हाल, डाले हरा निकाले लाल।
उत्तर - पान।
(च) एक थाल मोतियों से भरा, सबके सर पर औंधा धरा।
चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।
उत्तर – आसमान
(३) दोहा पहेली
कुछ पहेलियाँ अमीर खुसरो ने ऐसी भी लिखीं जो साथ में आध्यात्मिक दोहे भी हैं।
उदाहरण -
(क) उज्जवल बरन अधीन तन, एक चित्त दो ध्यान।
देखत मैं तो साधु है, पर निपट पार की खान।।
उत्तर - बगुला (पक्षी)
(ख) एक नारी के हैं दो बालक, दोनों एकहि रंग।
एक फिर एक ठाढ़ा रहे, फिर भी दोनों संग।
उत्तर - चक्की।
(ग) आगे-आगे बहिना आई, पीछे-पीछे भइया।
दाँत निकाले बाबा आए, बुरका ओढ़े मइया।।
उत्तर – भुट्टा
(घ) चार अंगुल का पेड़, सवा मन का फ्ता।
फल लागे अलग अलग, पक जाए इकट्ठा।।
उत्तर - कुम्हार की चाक
(ञ) अचरज बंगला एक बनाया, बाँस न बल्ला बंधन धने।
ऊपर नींव तरे घर छाया, कहे खुसरो घर कैसे बने।।
उत्तर - बयाँ पंछी का घोंसला
(च) माटी रौदूँ चक धर्रूँ, फेर्रूँ बारम्बर।
चातुर हो तो जान ले मेरी जात गँवार।।
उत्तर – कुम्हार
(छ) गोरी सुन्दर पातली, केहर काले रंग।
ग्यारह देवर छोड़ कर चली जेठ के संग।।
उत्तर - अहरह की दाल।
(ज) ऊपर से एक रंग हो और भीतर चित्तीदार।
सो प्यारी बातें करे फिकर अनोखी नार।।
उत्तर – सुपारी
(झ) बाल नुचे कपड़े फटे मोती लिए उतार।
यह बिपदा कैसी बनी जो नंगी कर दई नार।।
उत्तर - भुट्टा (छल्ली)
अमीर खुसरो के बारे में दी गयी फ़ाईल को सहेजकर फ़ुरसत में पढना न भूलें । आपकी सेवा में एक बार फ़िर से लिंक प्रस्तुत हैं ।
MS word format के लिये यहाँ चटका लगायें ।
PDF format के लिये यहाँ चटका लगायें ।
इस पोस्ट पर अपनी राय आप अपनी टिप्पणी के माध्यम से दे सकते हैं ।
http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/welcome.html
मैं पिछले कई महीनों से इस वेबसाईट को धीरे धीरे करके पढ रहा हूँ । भारत सरकार के द्वारा निस्संदेह यह एक सराहनीय प्रयास है । आज इस वेबसाईट को भ्रमण करते करते अमीर खुसरो पर तो जैसे ज्ञान का खजाना ही मिल गया । अमीर खुसरो का जिक्र मैने अपनी कव्वाली वाली पोस्ट में किया था । इस वेबसाईट पर अमीर खुसरो के बारे में जानकारी १९ पृष्ठों में उपलब्ध है । आसानी के लिये मैने इस जानकारी को एक फ़ाईल में समायोजित करने का प्रयास किया है । इस फ़ाईल को आप MS Word or PDF दोनों रूपों में प्राप्त कर सकते हैं ।
MS word format के लिये यहाँ चटका लगायें ।
PDF format के लिये यहाँ चटका लगायें ।
अमीर खुसरों पहेलियों के लिये बहुत प्रसिद्ध हैं | आज अनूपजी के अंदाज में मैं आपको अमीर खुसरो की कुछ पहेलियाँ पढवाता हूँ ।
मेरी पसंद :
(१) बूझ पहेली (अंतर्लापिका)
यह वो पहेलियाँ हैं जिनका उत्तर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप में पहेली में दिया होता है यानि जो पहेलियाँ पहले से ही बूझी गई हों। जैसे -
(क) गोल मटोल और छोटा-मोटा, हर दम वह तो जमीं पर लोटा।
खुसरो कहे नहीं है झूठा, जो न बूझे अकिल का खोटा।।
उत्तर - लोटा।
यहाँ पहली पंक्ति का आखिरी शब्द ही पहेली का उत्तर है जो पहेली में कहीं भी हो सकता है। इन पहेलियों का उत्तर पहेलियों में ही होता है। खुसरो की बूझ पहेलियों के भी दो वर्ग बनाए जा सकते हैं। कुछ में तो उत्तर एक ही शब्द में रहता है जैसा कि हम ऊपर देख चुके हैं। दूसरी पहेली में कभी-कभी उत्तर के लिए दो शब्दों को मिलाना पड़ता है। जैसे –
(ख) श्याम बरन और दाँत अनेक, लचकत जैसे नारी।
दोनों हाथ से खुसरो खींचे और कहे तू आ री।।
उत्तर - आरी। यहाँ दूसरी पंक्ति के आखिरी शब्द 'आ' और 'री' को मिलाने से उत्तर मिलता है।
(ग) हाड़ की देही उज् रंग, लिपटा रहे नारी के संग।
चोरी की ना खून किया वाका सर क्यों काट लिया।
उत्तर - नाखून।
(घ) बाला था जब सबको भाया, बड़ा हुआ कुछ काम न आया।
खुसरो कह दिया उसका नाव, अर्थ करो नहीं छोड़ो गाँव।।
उत्तर - दिया।
(ञ) नारी से तू नर भई और श्याम बरन भई सोय।
गली-गली कूकत फिरे कोइलो-कोइलो लोय।।
उत्तर - कोयल।
(च) एक नार तरवर से उतरी, सर पर वाके पांव
ऐसी नार कुनार को, मैं ना देखन जाँव।।
उत्तर - मैंना।
(छ) सावन भादों बहुत चलत है माघ पूस में थोरी।
अमीर खुसरो यूँ कहें तू बुझ पहेली मोरी।।
उत्तर - मोरी (नाली)
(२) बिन बूझ पहेली या बहिर्लापिका, इसका उत्तर पहेली से बाहर होता है। उदाहरण –
(क) एक नार कुँए में रहे, वाका नीर खेत में बहे।
जो कोई वाके नीर को चाखे, फिर जीवन की आस न राखे।।
उत्तर – तलवार
(ख) एक जानवर रंग रंगीला, बिना मारे वह रोवे।
उस के सिर पर तीन तिलाके, बिन बताए सोवे।।
उत्तर - मोर।
(ग) चाम मांस वाके नहीं नेक, हाड़ मास में वाके छेद।
मोहि अचंभो आवत ऐसे, वामे जीव बसत है कैसे।।
उत्तर - पिंजड़ा।
(घ) स्याम बरन की है एक नारी, माथे ऊपर लागै प्यारी।
जो मानुस इस अरथ को खोले, कुत्ते की वह बोली बोले।।
उत्तर - भौं (भौंए आँख के ऊपर होती हैं।)
(ञ) एक गुनी ने यह गुन कीना, हरियल पिंजरे में दे दीना।
देखा जादूगर का हाल, डाले हरा निकाले लाल।
उत्तर - पान।
(च) एक थाल मोतियों से भरा, सबके सर पर औंधा धरा।
चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।
उत्तर – आसमान
(३) दोहा पहेली
कुछ पहेलियाँ अमीर खुसरो ने ऐसी भी लिखीं जो साथ में आध्यात्मिक दोहे भी हैं।
उदाहरण -
(क) उज्जवल बरन अधीन तन, एक चित्त दो ध्यान।
देखत मैं तो साधु है, पर निपट पार की खान।।
उत्तर - बगुला (पक्षी)
(ख) एक नारी के हैं दो बालक, दोनों एकहि रंग।
एक फिर एक ठाढ़ा रहे, फिर भी दोनों संग।
उत्तर - चक्की।
(ग) आगे-आगे बहिना आई, पीछे-पीछे भइया।
दाँत निकाले बाबा आए, बुरका ओढ़े मइया।।
उत्तर – भुट्टा
(घ) चार अंगुल का पेड़, सवा मन का फ्ता।
फल लागे अलग अलग, पक जाए इकट्ठा।।
उत्तर - कुम्हार की चाक
(ञ) अचरज बंगला एक बनाया, बाँस न बल्ला बंधन धने।
ऊपर नींव तरे घर छाया, कहे खुसरो घर कैसे बने।।
उत्तर - बयाँ पंछी का घोंसला
(च) माटी रौदूँ चक धर्रूँ, फेर्रूँ बारम्बर।
चातुर हो तो जान ले मेरी जात गँवार।।
उत्तर – कुम्हार
(छ) गोरी सुन्दर पातली, केहर काले रंग।
ग्यारह देवर छोड़ कर चली जेठ के संग।।
उत्तर - अहरह की दाल।
(ज) ऊपर से एक रंग हो और भीतर चित्तीदार।
सो प्यारी बातें करे फिकर अनोखी नार।।
उत्तर – सुपारी
(झ) बाल नुचे कपड़े फटे मोती लिए उतार।
यह बिपदा कैसी बनी जो नंगी कर दई नार।।
उत्तर - भुट्टा (छल्ली)
अमीर खुसरो के बारे में दी गयी फ़ाईल को सहेजकर फ़ुरसत में पढना न भूलें । आपकी सेवा में एक बार फ़िर से लिंक प्रस्तुत हैं ।
MS word format के लिये यहाँ चटका लगायें ।
PDF format के लिये यहाँ चटका लगायें ।
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सोमवार, अगस्त 20, 2007
कव्वाली : भाग १
इस प्रविष्टी को मैं पिछले एक महीने से थोडा थोडा करके लिख रहा था कल यूनुसजी के चिट्ठे पर कव्वाली के बारे में पढकर/सुनकर लगा कि अब और देर करना उचित नहीं है । समाँ बँधा हुआ है और इसीलिये आप सब के लिये पेश है कव्वाली पर एक विशेषांक । इसको हम दो भागों में प्रस्तुत करेंगे । पहले भाग में कव्वाली के इतिहास और कव्वाली की १३०० से अधिक वर्षों की यात्रा का जिक्र करेंगे । दूसरे भाग में हम हिन्दी फ़िल्म संगीत के पिटारे में से कुछ कव्वालियाँ लेकर हाजिर होंगे । इसी भाग में हम हिन्दी फ़िल्म संगीत में कव्वालियों के सरताज संगीत निर्देशक “रोशन” की बात करेंगे ।
१) कव्वाली: इतिहास एवं तकनीकी पक्ष की जानकारी
कव्वाली का आगाज मुस्लिम धर्म के सूफ़ी पीर/फ़कीरों ने किया था । इसकी शुरूआत ईरान में आठवीं और नवीं शताब्दी में हुयी । आठवीं और नवीं शताब्दियों में ईरान और अन्य मुस्लिम देशों में धार्मिक महफ़िलों का आयोजन किया जाता था जिसे “समाँ” कहा जाता था । “समाँ” का आयोजन धार्मिक विद्वानों (शेख) की देख-रेख में होता था । “समाँ” का उद्देश्य संगीत/कव्वाली के माध्यम से ईश्वर के साथ सम्बन्ध स्थापित करना होता था ।
ईरान से चलकर कव्वाली भारत में आयी और भारत के सूफ़ी संतो ने कव्वाली को लोकप्रिय बनाया । इसमें चिश्ती संत “ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती” (११४३-१२३४) और उनकी विचारधारा के सम्बद्ध सूफ़ी संत “शेख निजामुद्दीन औलिया”(१२३६-१३२५) का प्रमुख योगदान रहा । इसके बाद “अमीर खुसरो” (१२५३-१३२५) ने भारतीय संगीत और लोक भाषाओं का समायोजन करके कव्वाली को अपने समय की संगीत की एक विकसित और लोकप्रिय विधा के रूप में स्थापित किया । औरंगजेब के समय में कव्वाली गाने वालों को राजकीय संरक्षण समाप्त हो गया था और कई कव्वालों और संगीतकारों ने सांकेतिक रूप से अपना विरोध दिखाने के लिये अपने वाद्य-यंत्रों को जमीन में दफ़न कर दिया था । बहादुरशाह जफ़र के समय में कव्वाली फ़िर से उभरकर सामने आयी ।
प्रार्थना/भजन इत्यादि की तरह कव्वाली में भी शब्दों की मुख्य भूमिका होती है, लेकिन कव्वाली की विशेष संरचना के कारण शब्दों/वाक्यों को अलग अलग तरीके से निखारकर गाया जाता है और हर बार किसी विशेष स्थान पर ध्यान केंन्द्रित करने से अलग अलग भाव सामने आते हैं । लेकिन जैसे जैसे कव्वाल शब्दों को दोहराते रहते हैं शब्द बेमायने होते जाते हैं और सुनने वालों के लिये एक पुरसुकून एहसास बाकी रह जाता है जहाँ जाकर वो आध्यात्मिक समाधि (Spiritual Ecstasy) में खो जाते हैं। यही कव्वाली की सफ़लता की पराकाष्ठा होती है जब गाने और सभी सुननें वाले Trans State प्राप्त कर लेते हैं । कव्वाली को गाते समय कव्वाल को ध्यान रखना पडता है कि अगर कोई गाने वाला अथवा सुनने वालों मे से कोई आध्यात्मिक समाधि (Spiritual Ecstasy) में पंहुच जाये तो कव्वाल की जिम्मेदारी होती है कि वो बिना रूके हुये कुछ ही शब्दों को साथ में तब तक दोहराता रहे जब तक वो व्यक्ति वापस पूर्व अवस्था में नहीं आ जाता है ।
२) कव्वाली की संरचना: कव्वाली अन्य शास्त्रीय संगीत की महफ़िलों से भिन्न होती है । शास्त्रीय संगीत में जहाँ मुख्य आकर्षण गायक होता है कव्वाली में एक से अधिक गायक होते हैं और सभी महत्वपूर्ण होते हैं । कव्वाली को सुनने वाले भी कव्वाली का एक अभिन्न अंग होते हैं । कव्वाली गाने वालों में १-३ मुख्य कव्वाल, १-३ ढोलक, तबला और पखावज बजाने वाले, १-३ हारमोनियम बजाने वाले, १-२ सारंगी बजाने वाले और ४-६ ताली बजाने वाले होते हैं । सभी लोग अपनी वरिष्ठता के क्रम में बायें से दाँये बैठते हैं, अर्थात अगर आप सुननें वालो को देख रहे हैं तो सबसे वरिष्ठ कव्वाल सबसे दाहिनी ओर बैठे होंगे ।
• कव्वाली का प्रारम्भ केवल वाद्य यंत्र बजाकर किया जाता है । ये एक प्रकार से सूफ़ी संतों को निमन्त्रण होता है क्योंकि ऐसा विश्वास है कि सूफ़ी संत एक दुनिया से दूसरी दुनिया में भ्रमण करते रहते हैं ।
• इसके बाद मुख्य कव्वाल “आलाप” के साथ कव्वाली का पहला छन्द गाते हैं; ये या तो अल्लाह की शान में होता है अथवा सूफ़ी रहस्यमयता लिये होता है । इसको बिना किसी धुन (Rhythm) के गाया जाता है और इस समय वाद्य-यंत्रो का प्रयोग नहीं होता है । इस “आलाप” के माध्यम से कव्वाल एक माहौल तैयार करते हैं जो धीरे धीरे अपने चरम पर पँहुचता है ।
• आलाप के बाद बाकी सहायक गायक अपने अपने अंदाज में उसी छंद को गाते हैं । इसी समय हारमोनियम और Percussion Instruments (तबला, ढोलक और पखावज) साथ देना प्रारम्भ करते हैं ।
• इसके बाद कव्वाल मुख्य भाग को गाते हुये महफ़िल हो उसके चरम तक पँहुचाते हैं । कुछ कव्वाल (नुसरत फ़तेह अली खान) कव्वाली के मुख्य भाग को गाते समय किसी विशेष “राग” का प्रयोग करते हैं और बीच बीच में सरगम का प्रयोग करते हुये सुनने वालों को भी कव्वाली का एक अंग बना लेते हैं ।
• कव्वाली का अंत अचानक से होता है ।
कव्वाली गाते समय कव्वालों और साथियों के ऊपर पैसे उडाने की भी प्रथा है । आदर्श स्थिति में कव्वाल इससे बेखबर रहते हुये अपना गायन जारी रखते हैं लेकिन कभी कभी कव्वाल आँखों के माध्यम से अथवा सिर हिलाकर उनका अभिवादन भी करते हैं । इस प्रथा को बिल्कुल भी बुरा नहीं माना जाता है ।
पुराने समय में कव्वाली केवल आध्यात्मिक भावना से गायी जाती थी लेकिन आधुनिक काल में (पिछली कई शताब्दियों से) कव्वाली में अन्य भावनाये भी सम्मिलित हो गयी हैं । इनमें दो महत्वपूर्ण हैं; पहली “शराब की तारीफ़ में” और दूसरी “प्रियतम के बिछोह की स्थिति” । आम तौर पर एक कव्वाली की अवधि १२-३० मिनट की होती है । आजकल के दौर में कव्वाली की लम्बी अवधि उसकी लोकप्रियता घटने का मुख्य कारण है । इसी कारण बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में कव्वाली की लोकप्रियता घटी थी और “गजल” के लोकप्रियता अचानक बढी थी ।
अगर आप अभी तक मेरे साथ हैं तो आपसे एक प्रार्थना है । मैने खोजकर संगीत की दॄष्टि से समृद्ध दो कव्वालियाँ आपके लिये चुनी हैं । जब भी समय मिले इन दोनों कव्वालियों को अपने अंतर में अनुभव करने का प्रयास कीजियेगा ।
ये दोनों कव्वालियाँ लगभग ९ और १३ मिनट की अवधि की हैं इसीलिये इनको Buffer होने में थोडा समय लग सकता है ।
इसके दूसरे भाग में हम आपके लिये हिन्दी फ़िल्म संगीत के खजाने में से कुछ चुनिन्दा कव्वालियाँ लेकर आयेंगे । इस प्रविष्टी के बारे में आप अपने विचार टिप्पणी के माध्यम से हमें बता सकते हैं ।
१) कव्वाली: इतिहास एवं तकनीकी पक्ष की जानकारी
कव्वाली का आगाज मुस्लिम धर्म के सूफ़ी पीर/फ़कीरों ने किया था । इसकी शुरूआत ईरान में आठवीं और नवीं शताब्दी में हुयी । आठवीं और नवीं शताब्दियों में ईरान और अन्य मुस्लिम देशों में धार्मिक महफ़िलों का आयोजन किया जाता था जिसे “समाँ” कहा जाता था । “समाँ” का आयोजन धार्मिक विद्वानों (शेख) की देख-रेख में होता था । “समाँ” का उद्देश्य संगीत/कव्वाली के माध्यम से ईश्वर के साथ सम्बन्ध स्थापित करना होता था ।
ईरान से चलकर कव्वाली भारत में आयी और भारत के सूफ़ी संतो ने कव्वाली को लोकप्रिय बनाया । इसमें चिश्ती संत “ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती” (११४३-१२३४) और उनकी विचारधारा के सम्बद्ध सूफ़ी संत “शेख निजामुद्दीन औलिया”(१२३६-१३२५) का प्रमुख योगदान रहा । इसके बाद “अमीर खुसरो” (१२५३-१३२५) ने भारतीय संगीत और लोक भाषाओं का समायोजन करके कव्वाली को अपने समय की संगीत की एक विकसित और लोकप्रिय विधा के रूप में स्थापित किया । औरंगजेब के समय में कव्वाली गाने वालों को राजकीय संरक्षण समाप्त हो गया था और कई कव्वालों और संगीतकारों ने सांकेतिक रूप से अपना विरोध दिखाने के लिये अपने वाद्य-यंत्रों को जमीन में दफ़न कर दिया था । बहादुरशाह जफ़र के समय में कव्वाली फ़िर से उभरकर सामने आयी ।
प्रार्थना/भजन इत्यादि की तरह कव्वाली में भी शब्दों की मुख्य भूमिका होती है, लेकिन कव्वाली की विशेष संरचना के कारण शब्दों/वाक्यों को अलग अलग तरीके से निखारकर गाया जाता है और हर बार किसी विशेष स्थान पर ध्यान केंन्द्रित करने से अलग अलग भाव सामने आते हैं । लेकिन जैसे जैसे कव्वाल शब्दों को दोहराते रहते हैं शब्द बेमायने होते जाते हैं और सुनने वालों के लिये एक पुरसुकून एहसास बाकी रह जाता है जहाँ जाकर वो आध्यात्मिक समाधि (Spiritual Ecstasy) में खो जाते हैं। यही कव्वाली की सफ़लता की पराकाष्ठा होती है जब गाने और सभी सुननें वाले Trans State प्राप्त कर लेते हैं । कव्वाली को गाते समय कव्वाल को ध्यान रखना पडता है कि अगर कोई गाने वाला अथवा सुनने वालों मे से कोई आध्यात्मिक समाधि (Spiritual Ecstasy) में पंहुच जाये तो कव्वाल की जिम्मेदारी होती है कि वो बिना रूके हुये कुछ ही शब्दों को साथ में तब तक दोहराता रहे जब तक वो व्यक्ति वापस पूर्व अवस्था में नहीं आ जाता है ।
२) कव्वाली की संरचना: कव्वाली अन्य शास्त्रीय संगीत की महफ़िलों से भिन्न होती है । शास्त्रीय संगीत में जहाँ मुख्य आकर्षण गायक होता है कव्वाली में एक से अधिक गायक होते हैं और सभी महत्वपूर्ण होते हैं । कव्वाली को सुनने वाले भी कव्वाली का एक अभिन्न अंग होते हैं । कव्वाली गाने वालों में १-३ मुख्य कव्वाल, १-३ ढोलक, तबला और पखावज बजाने वाले, १-३ हारमोनियम बजाने वाले, १-२ सारंगी बजाने वाले और ४-६ ताली बजाने वाले होते हैं । सभी लोग अपनी वरिष्ठता के क्रम में बायें से दाँये बैठते हैं, अर्थात अगर आप सुननें वालो को देख रहे हैं तो सबसे वरिष्ठ कव्वाल सबसे दाहिनी ओर बैठे होंगे ।
• कव्वाली का प्रारम्भ केवल वाद्य यंत्र बजाकर किया जाता है । ये एक प्रकार से सूफ़ी संतों को निमन्त्रण होता है क्योंकि ऐसा विश्वास है कि सूफ़ी संत एक दुनिया से दूसरी दुनिया में भ्रमण करते रहते हैं ।
• इसके बाद मुख्य कव्वाल “आलाप” के साथ कव्वाली का पहला छन्द गाते हैं; ये या तो अल्लाह की शान में होता है अथवा सूफ़ी रहस्यमयता लिये होता है । इसको बिना किसी धुन (Rhythm) के गाया जाता है और इस समय वाद्य-यंत्रो का प्रयोग नहीं होता है । इस “आलाप” के माध्यम से कव्वाल एक माहौल तैयार करते हैं जो धीरे धीरे अपने चरम पर पँहुचता है ।
• आलाप के बाद बाकी सहायक गायक अपने अपने अंदाज में उसी छंद को गाते हैं । इसी समय हारमोनियम और Percussion Instruments (तबला, ढोलक और पखावज) साथ देना प्रारम्भ करते हैं ।
• इसके बाद कव्वाल मुख्य भाग को गाते हुये महफ़िल हो उसके चरम तक पँहुचाते हैं । कुछ कव्वाल (नुसरत फ़तेह अली खान) कव्वाली के मुख्य भाग को गाते समय किसी विशेष “राग” का प्रयोग करते हैं और बीच बीच में सरगम का प्रयोग करते हुये सुनने वालों को भी कव्वाली का एक अंग बना लेते हैं ।
• कव्वाली का अंत अचानक से होता है ।
कव्वाली गाते समय कव्वालों और साथियों के ऊपर पैसे उडाने की भी प्रथा है । आदर्श स्थिति में कव्वाल इससे बेखबर रहते हुये अपना गायन जारी रखते हैं लेकिन कभी कभी कव्वाल आँखों के माध्यम से अथवा सिर हिलाकर उनका अभिवादन भी करते हैं । इस प्रथा को बिल्कुल भी बुरा नहीं माना जाता है ।
पुराने समय में कव्वाली केवल आध्यात्मिक भावना से गायी जाती थी लेकिन आधुनिक काल में (पिछली कई शताब्दियों से) कव्वाली में अन्य भावनाये भी सम्मिलित हो गयी हैं । इनमें दो महत्वपूर्ण हैं; पहली “शराब की तारीफ़ में” और दूसरी “प्रियतम के बिछोह की स्थिति” । आम तौर पर एक कव्वाली की अवधि १२-३० मिनट की होती है । आजकल के दौर में कव्वाली की लम्बी अवधि उसकी लोकप्रियता घटने का मुख्य कारण है । इसी कारण बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में कव्वाली की लोकप्रियता घटी थी और “गजल” के लोकप्रियता अचानक बढी थी ।
अगर आप अभी तक मेरे साथ हैं तो आपसे एक प्रार्थना है । मैने खोजकर संगीत की दॄष्टि से समृद्ध दो कव्वालियाँ आपके लिये चुनी हैं । जब भी समय मिले इन दोनों कव्वालियों को अपने अंतर में अनुभव करने का प्रयास कीजियेगा ।
ये दोनों कव्वालियाँ लगभग ९ और १३ मिनट की अवधि की हैं इसीलिये इनको Buffer होने में थोडा समय लग सकता है ।
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इसके दूसरे भाग में हम आपके लिये हिन्दी फ़िल्म संगीत के खजाने में से कुछ चुनिन्दा कव्वालियाँ लेकर आयेंगे । इस प्रविष्टी के बारे में आप अपने विचार टिप्पणी के माध्यम से हमें बता सकते हैं ।
शनिवार, अगस्त 18, 2007
एक चमेली के मँडवे तले, दो बदन प्यार की आग में जल गये ।
नसीरूद्दीनजी ने अपने "दो आखर" पर जब "एक चमेली के मंडवे तले" का जिक्र किया तो फ़िर अहसास हुआ कि ब्लाग जगत पर अच्छी शायरी की आरजू करने वालों की कमी नहीं है । इसी बात पर मैं उसी नज्म को दो अलग अलग अंदाजों में पेश कर रहा हूँ ।
इस नज्म को बडी खूबसूरती से आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी जी ने फ़िलम "चा चा चा (१९६४)" में गाया था । संगीत निर्देशक इकबाल कुरैशी जी थे । इस गीत सबसे बडी खूबी है कि गीत के बहुत बडे हिस्से में आशा और रफ़ी की आवाजें साथ साथ चलती हैं और एक सच्चे युगल गीत का अहसास पैदा होता है । तो लीजिये जनाब सुनिये और खुद ही फ़ैसला कीजिये ।
सभी लोगों से माफ़ी चाहता हूँ, पता नहीं इस नज्म को अपलोड करने पर ये अपने आप "फ़ास्ट फ़ारवर्ड" Mode में चलने लगी है । इसको सुधारने का प्रयास कर रहा हूँ, तब तक कॄपया थोडा सब्र करें ।
समस्या तो हल हो गयी है लेकिन अब आप नीचे दिये लिंक पर चटखा लगायेंगे तो ये आपको दूसरे पेज पर ले जायेगा जहाँ आप इस नज्म को ठीक से सुन सकते हैं । इस कष्ट के लिये माफ़ी चाहता हूँ ।
इसी नज्म को जगजीत सिंह ने अपने ही अंदाज में गाया है । मेरी समझ में जगजीत सिंह के गाये हुये मधुरतम गीतों में से ये एक है । अब आप इसका भी लुत्फ़ उठायें ।
ये प्रस्तुति आपको कैसी लगी, अपनी टिप्पणी के माध्यम से जरूर बतायें ।
साभार,
इस नज्म को बडी खूबसूरती से आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी जी ने फ़िलम "चा चा चा (१९६४)" में गाया था । संगीत निर्देशक इकबाल कुरैशी जी थे । इस गीत सबसे बडी खूबी है कि गीत के बहुत बडे हिस्से में आशा और रफ़ी की आवाजें साथ साथ चलती हैं और एक सच्चे युगल गीत का अहसास पैदा होता है । तो लीजिये जनाब सुनिये और खुद ही फ़ैसला कीजिये ।
सभी लोगों से माफ़ी चाहता हूँ, पता नहीं इस नज्म को अपलोड करने पर ये अपने आप "फ़ास्ट फ़ारवर्ड" Mode में चलने लगी है । इसको सुधारने का प्रयास कर रहा हूँ, तब तक कॄपया थोडा सब्र करें ।
समस्या तो हल हो गयी है लेकिन अब आप नीचे दिये लिंक पर चटखा लगायेंगे तो ये आपको दूसरे पेज पर ले जायेगा जहाँ आप इस नज्म को ठीक से सुन सकते हैं । इस कष्ट के लिये माफ़ी चाहता हूँ ।
| DoBadanPyarKiAagMe... |
इसी नज्म को जगजीत सिंह ने अपने ही अंदाज में गाया है । मेरी समझ में जगजीत सिंह के गाये हुये मधुरतम गीतों में से ये एक है । अब आप इसका भी लुत्फ़ उठायें ।
| Ik Chamelii Ke Man... |
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साभार,
सोमवार, अगस्त 13, 2007
अब अक्सर चुप चुप से रहे हैं !!!
इयत्ताजी की साहिर लुधियानवीजी के बारे में आज की पोस्ट पढी तो सोचा क्यों न साहिरजी की ये गजल आपको सुनवायी जाये । लीजिये साहेबान, पेश-ए-खिदमत है जगजीत सिंह की नाजुक आवाज में ये गजल...
इसी के साथ अपनी जल्दी ही आने वाली कुछ पोस्टों (इसकी हिन्दी कौन सुझायेगा :-) ) की जानकारी,
१) सरदार अली जाफ़री के टी. वी. धारावाहिक कहकंशा के संगीत पक्ष पर कुछ जानकारी और कुछ अच्छी गजलें/नज्में
२) सूफ़ी कव्वाली के बारे में कुछ रोचक जानकारियाँ ।
अब चलते चलते, साहिरजी की एक और गजल सुनवाये बिना मन नहीं मानेगा । ये गजल है:
"किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फ़िर भी" । इस गजल के एक अशार को इयत्ता जी ने अपने चिट्ठे पर लिखा था, पेश-ए-खिदमत है जगजीत सिंह की आवाज में ये गजल...
अपनी टिप्पणियों के माध्यम से अपनी राय जरूर बताते रहें ।
| Ab_Aksar_Chup_Chup... |
इसी के साथ अपनी जल्दी ही आने वाली कुछ पोस्टों (इसकी हिन्दी कौन सुझायेगा :-) ) की जानकारी,
१) सरदार अली जाफ़री के टी. वी. धारावाहिक कहकंशा के संगीत पक्ष पर कुछ जानकारी और कुछ अच्छी गजलें/नज्में
२) सूफ़ी कव्वाली के बारे में कुछ रोचक जानकारियाँ ।
अब चलते चलते, साहिरजी की एक और गजल सुनवाये बिना मन नहीं मानेगा । ये गजल है:
"किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फ़िर भी" । इस गजल के एक अशार को इयत्ता जी ने अपने चिट्ठे पर लिखा था, पेश-ए-खिदमत है जगजीत सिंह की आवाज में ये गजल...
| Kisii_Kaa_Yun_To_H... |
अपनी टिप्पणियों के माध्यम से अपनी राय जरूर बताते रहें ।
परीक्षण पोस्ट (कॄपया अनदेखा करें) !!!
इस पोस्ट में मैं कुछ परीक्षण करना चाहूँगा जैसे कि mp3 फ़ाईल अपलोड करना इत्यादि । youtube.com का लिंक अपनी पोस्ट पर देना तो आ गया है । गूगल वीडीयो के लिये अभी थोडी मेहनत और करनी पडेगी । बिन्गो, लगता है गूगल वीडीयो भी फ़तेह हो ही गया है । अब फ़िनिश्ड प्रोडक्ट देखते हैं ।
साभार,
नीरज
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साभार,
नीरज
रविवार, अगस्त 05, 2007
यौन शिक्षा: दो टूक बातें !!!
डिस्क्लेमर: इस लेख में मैने जरा भी Politically Correct रहने का प्रयास नहीं किया है । अगर आपको मेरी भाषा से आपत्ति हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ ।
शास्त्रीजी ने अपने पिछले दो लेखों में अमेरिका में दी जा रही यौन शिक्षा का उदाहरण देकर विचार व्यक्त किया था कि जब यौन शिक्षा से अमेरिका की समस्यायें हल नहीं हुयी तो भारत की कैसे होंगी । मैं शास्त्रीजी के आँकडों से सहमत हूँ लेकिन उनके निष्कर्षों से पूरी तरह असहमत । भारत में यौन अपराधों का एक बडा हिस्सा कभी आँकडों में आता ही नहीं है, फ़िर आप दोनो आँकडों की तुलना कैसे कर सकते हैं ?
अमेरिका में यौन शिक्षा के बावजूद यौन अपराधों के बढने के कई अलग कारण हो सकते हैं, उसके आधार पर यौन शिक्षा को ही गलत ठहराना हास्यास्पद है । और भी बहुत लोगों के मुँह से इस प्रकार के वाक्य सुने हैं कि हमारे विद्यार्थियों को "भोग नहीं योग की शिक्षा की आवश्यकता है" । इस प्रकार के तर्क देने वालों को सबसे पहले यौन शिक्षा देनी चाहिये जिससे कि वो समझ सकें कि असल में यौन शिक्षा भोग की शिक्षा नहीं है ।
आज के वातावरण में भारत में यौन शिक्षा की आवश्यकता बहुत अधिक है । उन्मुक्त जी ने अपने चिट्ठे पर यौन शिक्षा के बारे में बहुत उपयोगी दो लेख लिखे हैं । मैं एक बार फ़िर से उन लिखों की कडी यहाँ दे रहा हूँ जिससे कि लोग फ़िर से उन्हे पढ सकें ।
पहला लेख
दूसरा लेख
हम अपने आप मान लेते हैं कि बडे होते युवा अपने आप यौन शिक्षा किसी न किसी माध्यम से प्राप्त कर लेते हैं । "फ़िर हमें भी तो किसी ने नहीं पढाया था..." जैसे तर्क देकर आप क्षणभर के लिये तो खुश हो सकते हैं लेकिन इससे समस्या का हल नहीं निकलता । यहाँ चिट्ठाकारों में से कितने ऐसे हैं जिन्हे किसी ने यौन शिक्षा दी थी या स्वयं जिन्होने अपने बच्चों के साथ इस विषय पर बात की है ? बडे होते युवा रंगीन पन्नों की किताबों से उल्टा सीधा ज्ञान प्राप्त करते हैं और उन्ही प्रकार की किताबों के "कासे कहूँ" जैसे पन्ने पढकर अपनी समस्याओं/सवालों के जवाब तलाश करते हैं । "हस्तमैथुन" जैसे विषय पर ही युवाओं को अधकचरी जानकारी उपलब्ध होती है और इस प्रकार की अधूरी जानकारी के कारण बहुत से युवा अपराधग्रस्त/Confused रहते हैं |
यौन शिक्षा के साथ सबसे बडी समस्या है कि लोग इसका अर्थ बडा ही सीमित समझते हैं । भारत और भारतवासियों के साथ सबसे बडी समस्या ये है कि हम आधी समस्याओं को नकार कर उनसे पीछा छुडाने की बात करते हैं । मुझे याद नहीं कि चिट्ठाकार कौन थे लेकिन उन्होने अपने चिट्ठे पर लिखा था कि इन्दौर भी अब एक बडा नगर बन गया है जहाँ अब विद्यार्थी M.M.S. क्लिप बनाने लगे हैं । सिर्फ़ इन्दौर ही क्या बहुत से छोटे बडे नगरों में M.M.S. स्कैण्डल्स की बाढ आयी हुयी है और इंटरनेट पर ये सुलभता से उपलब्ध हैं । जिन किसी को भी मेरी बात पर भरोसा न हो वो मुझसे व्यक्तिगत संपर्क करें और मैं उन्हे वेबसाईटों के पते देने तक को तैयार हूँ । ऐसे मामले बहुत हद तक स्वयं दूर हो जायेंगे जब लडके और लडकियों दोनो को यौन सम्बन्धों के बारे में जागरूक बनाया जा सकेगा ।
दूसरा हमारा सामाजिक ढाँचा ऐसा है कि इसमें हर कदम पर सेक्स/व्यक्तिगत संबन्धों के बारे में दोहराभास है । उदाहरण के तौर पर बहुत से युवा लडके किसी लडकी से प्रेम सम्बन्ध या फ़िर केवल प्रेमालाप करने के लिये सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है परन्तु उसके परिवार की कोई युवती ऐसा करे तो उसकी खैर नहीं । पडौस की किसी लडकी का किसी लडके के साथ चक्कर चल रहा हो तो ये मजा लेकर बात करने वाली बात है और हमारे खानदान में तो ऐसा हो ही नहीं सकता । कितने ऐसे So called पढे लिखे युवा हैं जो स्वीकार कर सकते हैं कि उनकी स्वयं की बहन का कोई प्रेमी हो सकता है ? कितने ऐसे हैं जो ये जानने के बाद दोस्तों के साथ उस लडके को पीटने नहीं चले जायेंगे ? इस प्रकार के सामाजिक ढाँचे के कारण बहुत से यौन अपराध घटित होते हैं । आधे मामलों में लडकी चाहकर शारीरिक सम्बन्धों के बारे में अपने प्रेमी को स्पष्ट जबाव नही दे पाती है क्योंकि उसके मन में भी कहीं अपराधबोध और आवाज उठाने पर स्वयं की बदनामी होने का डर होता है ।
मेरा घर मथुरा जैसे एक छोटे नगर में है और मेरा वहाँ साल/दो साल में महीने भर के लिये जाना होता है लेकिन मेरे उम्र के पडौस में रहने वाले लोग बडे प्रेम से अपने प्रेमालापों के किस्से सुनाते हैं, उनकी कौन सी लडकी कितने महीने के लिये उनकी प्रेमिका बनी । मैं ये भी जाँच चुका हूँ कि उनकी बाते कोरी गप्प नहीं है । अब प्रश्न उठता है कि क्या यौन शिक्षा इन समस्याओं को हल कर सकती है ?
यौन शिक्षा का अर्थ केवल सेक्स की शिक्षा देना ही नहीं है बल्कि ये भी है:
१) किसी जानकार अथवा अनजान व्यक्ति का किसी भी बहाने से उनके शरीर का अवांछनीय स्पर्श उनके विरूद्ध एक अपराध है ।
२) प्रेम सम्बन्ध होने के बावजूद भी किसी भी अवांछनीय कृत्य का विरोध करना आपका अधिकार है ।
३) किसी भी समय अपने आस पास के वातावरण में सजग रहकर आप स्वयं आधे यौन अपराधों को कम कर सकते हैं, लेकिन इसके लिये जागरूकता की आवश्यकता है ।
साभार,
शास्त्रीजी ने अपने पिछले दो लेखों में अमेरिका में दी जा रही यौन शिक्षा का उदाहरण देकर विचार व्यक्त किया था कि जब यौन शिक्षा से अमेरिका की समस्यायें हल नहीं हुयी तो भारत की कैसे होंगी । मैं शास्त्रीजी के आँकडों से सहमत हूँ लेकिन उनके निष्कर्षों से पूरी तरह असहमत । भारत में यौन अपराधों का एक बडा हिस्सा कभी आँकडों में आता ही नहीं है, फ़िर आप दोनो आँकडों की तुलना कैसे कर सकते हैं ?
अमेरिका में यौन शिक्षा के बावजूद यौन अपराधों के बढने के कई अलग कारण हो सकते हैं, उसके आधार पर यौन शिक्षा को ही गलत ठहराना हास्यास्पद है । और भी बहुत लोगों के मुँह से इस प्रकार के वाक्य सुने हैं कि हमारे विद्यार्थियों को "भोग नहीं योग की शिक्षा की आवश्यकता है" । इस प्रकार के तर्क देने वालों को सबसे पहले यौन शिक्षा देनी चाहिये जिससे कि वो समझ सकें कि असल में यौन शिक्षा भोग की शिक्षा नहीं है ।
आज के वातावरण में भारत में यौन शिक्षा की आवश्यकता बहुत अधिक है । उन्मुक्त जी ने अपने चिट्ठे पर यौन शिक्षा के बारे में बहुत उपयोगी दो लेख लिखे हैं । मैं एक बार फ़िर से उन लिखों की कडी यहाँ दे रहा हूँ जिससे कि लोग फ़िर से उन्हे पढ सकें ।
पहला लेख
दूसरा लेख
हम अपने आप मान लेते हैं कि बडे होते युवा अपने आप यौन शिक्षा किसी न किसी माध्यम से प्राप्त कर लेते हैं । "फ़िर हमें भी तो किसी ने नहीं पढाया था..." जैसे तर्क देकर आप क्षणभर के लिये तो खुश हो सकते हैं लेकिन इससे समस्या का हल नहीं निकलता । यहाँ चिट्ठाकारों में से कितने ऐसे हैं जिन्हे किसी ने यौन शिक्षा दी थी या स्वयं जिन्होने अपने बच्चों के साथ इस विषय पर बात की है ? बडे होते युवा रंगीन पन्नों की किताबों से उल्टा सीधा ज्ञान प्राप्त करते हैं और उन्ही प्रकार की किताबों के "कासे कहूँ" जैसे पन्ने पढकर अपनी समस्याओं/सवालों के जवाब तलाश करते हैं । "हस्तमैथुन" जैसे विषय पर ही युवाओं को अधकचरी जानकारी उपलब्ध होती है और इस प्रकार की अधूरी जानकारी के कारण बहुत से युवा अपराधग्रस्त/Confused रहते हैं |
यौन शिक्षा के साथ सबसे बडी समस्या है कि लोग इसका अर्थ बडा ही सीमित समझते हैं । भारत और भारतवासियों के साथ सबसे बडी समस्या ये है कि हम आधी समस्याओं को नकार कर उनसे पीछा छुडाने की बात करते हैं । मुझे याद नहीं कि चिट्ठाकार कौन थे लेकिन उन्होने अपने चिट्ठे पर लिखा था कि इन्दौर भी अब एक बडा नगर बन गया है जहाँ अब विद्यार्थी M.M.S. क्लिप बनाने लगे हैं । सिर्फ़ इन्दौर ही क्या बहुत से छोटे बडे नगरों में M.M.S. स्कैण्डल्स की बाढ आयी हुयी है और इंटरनेट पर ये सुलभता से उपलब्ध हैं । जिन किसी को भी मेरी बात पर भरोसा न हो वो मुझसे व्यक्तिगत संपर्क करें और मैं उन्हे वेबसाईटों के पते देने तक को तैयार हूँ । ऐसे मामले बहुत हद तक स्वयं दूर हो जायेंगे जब लडके और लडकियों दोनो को यौन सम्बन्धों के बारे में जागरूक बनाया जा सकेगा ।
दूसरा हमारा सामाजिक ढाँचा ऐसा है कि इसमें हर कदम पर सेक्स/व्यक्तिगत संबन्धों के बारे में दोहराभास है । उदाहरण के तौर पर बहुत से युवा लडके किसी लडकी से प्रेम सम्बन्ध या फ़िर केवल प्रेमालाप करने के लिये सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है परन्तु उसके परिवार की कोई युवती ऐसा करे तो उसकी खैर नहीं । पडौस की किसी लडकी का किसी लडके के साथ चक्कर चल रहा हो तो ये मजा लेकर बात करने वाली बात है और हमारे खानदान में तो ऐसा हो ही नहीं सकता । कितने ऐसे So called पढे लिखे युवा हैं जो स्वीकार कर सकते हैं कि उनकी स्वयं की बहन का कोई प्रेमी हो सकता है ? कितने ऐसे हैं जो ये जानने के बाद दोस्तों के साथ उस लडके को पीटने नहीं चले जायेंगे ? इस प्रकार के सामाजिक ढाँचे के कारण बहुत से यौन अपराध घटित होते हैं । आधे मामलों में लडकी चाहकर शारीरिक सम्बन्धों के बारे में अपने प्रेमी को स्पष्ट जबाव नही दे पाती है क्योंकि उसके मन में भी कहीं अपराधबोध और आवाज उठाने पर स्वयं की बदनामी होने का डर होता है ।
मेरा घर मथुरा जैसे एक छोटे नगर में है और मेरा वहाँ साल/दो साल में महीने भर के लिये जाना होता है लेकिन मेरे उम्र के पडौस में रहने वाले लोग बडे प्रेम से अपने प्रेमालापों के किस्से सुनाते हैं, उनकी कौन सी लडकी कितने महीने के लिये उनकी प्रेमिका बनी । मैं ये भी जाँच चुका हूँ कि उनकी बाते कोरी गप्प नहीं है । अब प्रश्न उठता है कि क्या यौन शिक्षा इन समस्याओं को हल कर सकती है ?
यौन शिक्षा का अर्थ केवल सेक्स की शिक्षा देना ही नहीं है बल्कि ये भी है:
१) किसी जानकार अथवा अनजान व्यक्ति का किसी भी बहाने से उनके शरीर का अवांछनीय स्पर्श उनके विरूद्ध एक अपराध है ।
२) प्रेम सम्बन्ध होने के बावजूद भी किसी भी अवांछनीय कृत्य का विरोध करना आपका अधिकार है ।
३) किसी भी समय अपने आस पास के वातावरण में सजग रहकर आप स्वयं आधे यौन अपराधों को कम कर सकते हैं, लेकिन इसके लिये जागरूकता की आवश्यकता है ।
साभार,
गुरुवार, अगस्त 02, 2007
सभी चिट्ठाकारों से HIV सम्बन्धी एक काल्पनिक प्रश्न
मुझे ठीक से याद नहीं है कि ये प्रश्न मेरे सामने कहाँ आया था । लेकिन चूँकि मुझे ये एक अच्छा मनोवैज्ञानिक प्रश्न लगा था इसीलिये आप सभी की राय पूछ रहा हूँ । दूसरा कारण है कि व्यस्तता के कारण कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ तो सोचा कि इस छोटी से पोस्ट के माध्यम से आप सब से बात की जाये । अब काम की बात अर्थात प्रश्न पर आते हैं ।
मान लीजिये कि आपकी सन्तान की आयु १६ से १९ वर्ष के बीच में है । आप उसके लिये कालेज का चुनाव कर रहे हैं । आपको पता चलता है कि जिस कालेज के बारे में आप सोच रहे हैं वहाँ:
१) कालेज में HIV संक्रमित विद्यार्थी (लडके और लडकियाँ) भी पढते हैं ।
२) कालेज प्रशासन उन विद्यार्थियों की संख्या अथवा पहचान गुप्त रखता है ।
३) स्थिति को और वास्तविक बनाने के लिये मान लीजिये कि कालेज में पढने वाले लडके और लडकियाँ के बीच शारीरिक सम्बन्धों की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता ।
आपसे प्रश्न है:
१) क्या आप इस जानकारी के बाद भी अपनी संतान का दाखिला उस कालेज में करायेंगे ?
२) क्या आप कालेज प्रशासन से HIV संक्रमित विद्यार्थियों की संख्या के बारे में बताने को कहेंगे ?
३) अब जिन चिट्ठाकारों की संतान/सम्बन्धी/जान-पहचान के लोग इस उम्र के विद्यार्थी हैं । क्या वो मानते हैं कि उनकी समझ में वे युवा विद्यार्थी HIV संक्रमण के बारे में इतनी जानकारी रखते हैं कि स्वयं को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में HIV संक्रमण से बचा सकें ?
आप अपनी राय टिप्पणी के माध्यम से बता सकते हैं ।
साभार,
नीरज रोहिल्ला
मान लीजिये कि आपकी सन्तान की आयु १६ से १९ वर्ष के बीच में है । आप उसके लिये कालेज का चुनाव कर रहे हैं । आपको पता चलता है कि जिस कालेज के बारे में आप सोच रहे हैं वहाँ:
१) कालेज में HIV संक्रमित विद्यार्थी (लडके और लडकियाँ) भी पढते हैं ।
२) कालेज प्रशासन उन विद्यार्थियों की संख्या अथवा पहचान गुप्त रखता है ।
३) स्थिति को और वास्तविक बनाने के लिये मान लीजिये कि कालेज में पढने वाले लडके और लडकियाँ के बीच शारीरिक सम्बन्धों की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता ।
आपसे प्रश्न है:
१) क्या आप इस जानकारी के बाद भी अपनी संतान का दाखिला उस कालेज में करायेंगे ?
२) क्या आप कालेज प्रशासन से HIV संक्रमित विद्यार्थियों की संख्या के बारे में बताने को कहेंगे ?
३) अब जिन चिट्ठाकारों की संतान/सम्बन्धी/जान-पहचान के लोग इस उम्र के विद्यार्थी हैं । क्या वो मानते हैं कि उनकी समझ में वे युवा विद्यार्थी HIV संक्रमण के बारे में इतनी जानकारी रखते हैं कि स्वयं को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में HIV संक्रमण से बचा सकें ?
आप अपनी राय टिप्पणी के माध्यम से बता सकते हैं ।
साभार,
नीरज रोहिल्ला
सोमवार, जुलाई 23, 2007
शेखर: एक जीवनी, के कुछ अंश
अज्ञेयजी कृत "शेखर: एक जीवनी" की भूमिका के कुछ अंश आपके लिये प्रस्तुत हैं ।
... क्या ये "जीवनी" आत्म-जीवनी है ? यह प्रश्न अवश्य पूछा जायेगा । बल्कि शायद पूछा भी नहीं जायेगा, क्योंकि पाठक पूर्व-धारणा बनाकर चलेगा । हिन्दी में जहाँ प्रत्येक कवि अपनी स्त्री को लक्ष्य करके लिखता है, जहाँ वियोग की कविता इतने भर से प्रमाणिक मान ली जाती है कि उसे अमुकजी ने अपनी पत्नी के देहान्त के बाद लिखा है, वहाँ ये आशा करना व्यर्थ है कि "शेखर" जो केवल एक जीवनी ही नहीं, एक व्यक्ति की अपने मुँह कही हुई जीवनी है, उसके लेखक की जीवनी नहीं मान ली जायेगी । मुझे याद है, तीन वर्ष पहले जब मेरी एक कविता "द्वितीया" छपी थी, तब उसके कई पाठकों ने मुझे सम्वेदना के पत्र लिखे थे और एक ने यहाँ तक लिखा था कि "मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है, क्योंकि स्वयं उसी परिस्थिति में होने के कारण मैं आपकी अवस्था बखूबी समझ सकता हूँ । पत्र के सम्पादक जी ने भी (यद्यपि कुछ मजाक में) पूछा था कि आपका पहला विवाह तो हुआ नहीं दूसरी पत्नी से यह झगडा कैसा?"
ऐसे व्यक्तियों को यदि प्रमाण मिल जाये कि मैने बिना एक भी विवाद हुये दूसरे विवाह की बात लिख दी है, तो वे समझेंगे कि उन्हें धोखा दिया गया है । यह कहते हुये खेद होता है- किन्तु बात है सच - कि आजकल का अधिकांश हिन्दी साहित्य और आलोचना एक भ्रान्त धारणा पर आश्रित है कि आत्म-घटित (आत्मानुभूत नहीं क्योंकि अनुभूति बिना घटित के भी हो सकती है ) का वर्णन ही सबसे बडी सफ़लता और सबसे बडी सच्चाई है । यह बात हिन्दी के कम लेखक समझते या मानते हैं कि कल्पना और अनुभूति-सामर्थ्य (sensibility) के सहारे दूसरे के घटित में प्रवेश कर सकना, और वैसा करते समय आत्मघटित की पूर्व-घटनाओं को स्थगित कर सकना - Objective हो सकना- ही लेखक की शक्ति का प्रमाण है ।
इसके विपरीत लेखकों में ऐसे अनेक मिल जायेंगे जो ऐसी अनुभूति (मैं फ़िर कहता हूँ कि आत्म-घटित ही आत्मानुभूत नहीं होता पर-घटित भी आत्मानुभूत हो सकता है यदि हममें सामर्थ्य है कि हम उसके प्रति खुले रह सकें,) को परकीय, सेकेण्ड हैण्ड, अतएव घटिया और असत्य कहेंगे । ऐसे व्यक्तियों के लिये टी. एस. इलियट की उस उक्ति का कोई अर्थ नहीं होगा जो वास्तव में इसका एक मात्र उत्तर है : "There is always a separation between the man who suffers and the artist who creates; and the greater the artist the greater the separation." (भोगनेवाले प्राणी और सृजन करने वाले कलाकार में सदा एक अन्तर रहता है; और जितना बडा कलाकार होता है उतना ही भारी यह अन्तर होता है ।)
..........
लेकिन यह एक लम्बा विषयान्तर हो गया है और मुझे मानना पडेगा कि इलियट के कथनानुसार मैं बहुत बडा आर्टिस्ट हो सका हूँ । शेखर का एक भी पात्र नहीं है जो न्यूनाधिक मात्रा में एक संश्लिष्त चरित्र Composite character नहीं है, तथापि मेरी अनुभूति और मेरी वेदना शेखर को अभिसिंचित कर रही है । और यह अभिसिंचन ऐसा है कि उससे यह कहकर छुटकारा नहीं पाया जा सकता कि अन्ततोगत्वा सभी गल्प-साहित्य आत्मकथा-मूलक है, अपने ही जीवन का चित्रण नहीं तो प्रक्षेपण (Projection) है, अपने स्यात की कहानी है । ‘शेखर’ में मेरापन कुछ अधिक है; इलियट का आदर्श (जिसकी महानता मैं मानता हूँ) मुझसे नहीं निभ सका है । शेखर निस्संदेह एक व्यक्ति का अभिन्नतम निजी दस्तावेज a record of personal suffering है, यद्यपि वह साथ ही उस व्यक्ति के युग-संघर्ष का प्रतिबिम्ब भी है । इतना और ऐसा निजी वह नहीं है कि उसके दावे को आप "एक आदमी की निजी बात" कहकर उडा सकें; मेरा आग्रह है कि उसमें मेरा समाज और मेरा युग बोलता है कि वह मेरे और शेखर के युग का प्रतीक है; लेकिन इतना सब होते हुये भी मैं जानता हूँ कि यदि इस उपन्यास का सूत्रपात दूसरी परिस्थिति में और दूसरे ढंग से (और शायद दूसरे अधिक समर्थ हाथों से !) हुआ होता तो उस भूमिका की आवश्यकता नहीं रहती...और न ही इसकी सम्पूर्ण उपेक्षा करते हुये पाठक के यह कहने की गुंजाइश रहती कि शेखर में घटनाओं की तो बात ही क्या स्थान भी लेखक के देशाटन की परिचर्चा से मेल खाते हैं । (यद्यपि यह कहने के लिये लेखक को मेरे सम्बन्ध में विशेष रूप से जानकार होना पडता ।)....
-------------------
"शेखर : एक जीवनी" के इन अंशों को लिखने का मेरा उद्देश्य ये कहना है कि दोहरी व्यक्तित्व/जीवन जीने का मौलिक अधिकार एक लेखक को भी है । किसी लेखक के व्यक्तिगत जीवन में घटित हुयी किसी घटना के आधार पर उसके स्रजित साहित्य की भर्तस्ना करना लेखक पर अत्याचार होगा और उसके लेखन के प्रति बेईमानी ।
असल में सुजाताजी की पोस्ट, (निजी कितना निजी है और कब तक) पर टिप्पणी करने के बाद सोचा कि अपने मन्तव्य को इस पोस्ट के माध्यम से स्पष्ट करूँ । यहाँ पर ये भी स्पष्ट कर दूँ कि इस संवाद में मेरी रूचि पूर्णतया सैद्धान्तिक (Theoretical) है । जिस विवाद के संदर्भ में सुजाता जी ने अपनी पोस्ट लिखी थी उस विवाद के संदर्भ में मेरी इस पोस्ट को न माना जाये । कुछ अनजाने में ही सही लेकिन एक सार्थक संवाद प्रारम्भ हुआ है । आपकी क्या राय है?
क्या किसी लेखक और लेखन को उसी प्रकार अलग किया जा सकता है जिस प्रकार हम अन्य व्यवसायों और व्यवसायी को अलग करके देखते हैं । किसी वैज्ञानिक के निजी विचार कि धरती केवल ६००० वर्ष पुरानी है अथवा जैव विकास का सिद्धांत (Theory of Evolution) असत्य है के बावजूद उसके शोधपत्रों को शंका की नजर से नहीं देखा जाता । फ़िर एक लेखक के साथ ऐसा बर्ताव क्यों जबकि वो दावा नहीं करता कि उसके विचार सत्य हैं , वो तो खुलेआम कहता है कि उसके विचार कल्पना की उडान हैं ।
नीरज रोहिल्ला,
२३ जुलाई, २००७
... क्या ये "जीवनी" आत्म-जीवनी है ? यह प्रश्न अवश्य पूछा जायेगा । बल्कि शायद पूछा भी नहीं जायेगा, क्योंकि पाठक पूर्व-धारणा बनाकर चलेगा । हिन्दी में जहाँ प्रत्येक कवि अपनी स्त्री को लक्ष्य करके लिखता है, जहाँ वियोग की कविता इतने भर से प्रमाणिक मान ली जाती है कि उसे अमुकजी ने अपनी पत्नी के देहान्त के बाद लिखा है, वहाँ ये आशा करना व्यर्थ है कि "शेखर" जो केवल एक जीवनी ही नहीं, एक व्यक्ति की अपने मुँह कही हुई जीवनी है, उसके लेखक की जीवनी नहीं मान ली जायेगी । मुझे याद है, तीन वर्ष पहले जब मेरी एक कविता "द्वितीया" छपी थी, तब उसके कई पाठकों ने मुझे सम्वेदना के पत्र लिखे थे और एक ने यहाँ तक लिखा था कि "मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है, क्योंकि स्वयं उसी परिस्थिति में होने के कारण मैं आपकी अवस्था बखूबी समझ सकता हूँ । पत्र के सम्पादक जी ने भी (यद्यपि कुछ मजाक में) पूछा था कि आपका पहला विवाह तो हुआ नहीं दूसरी पत्नी से यह झगडा कैसा?"
ऐसे व्यक्तियों को यदि प्रमाण मिल जाये कि मैने बिना एक भी विवाद हुये दूसरे विवाह की बात लिख दी है, तो वे समझेंगे कि उन्हें धोखा दिया गया है । यह कहते हुये खेद होता है- किन्तु बात है सच - कि आजकल का अधिकांश हिन्दी साहित्य और आलोचना एक भ्रान्त धारणा पर आश्रित है कि आत्म-घटित (आत्मानुभूत नहीं क्योंकि अनुभूति बिना घटित के भी हो सकती है ) का वर्णन ही सबसे बडी सफ़लता और सबसे बडी सच्चाई है । यह बात हिन्दी के कम लेखक समझते या मानते हैं कि कल्पना और अनुभूति-सामर्थ्य (sensibility) के सहारे दूसरे के घटित में प्रवेश कर सकना, और वैसा करते समय आत्मघटित की पूर्व-घटनाओं को स्थगित कर सकना - Objective हो सकना- ही लेखक की शक्ति का प्रमाण है ।
इसके विपरीत लेखकों में ऐसे अनेक मिल जायेंगे जो ऐसी अनुभूति (मैं फ़िर कहता हूँ कि आत्म-घटित ही आत्मानुभूत नहीं होता पर-घटित भी आत्मानुभूत हो सकता है यदि हममें सामर्थ्य है कि हम उसके प्रति खुले रह सकें,) को परकीय, सेकेण्ड हैण्ड, अतएव घटिया और असत्य कहेंगे । ऐसे व्यक्तियों के लिये टी. एस. इलियट की उस उक्ति का कोई अर्थ नहीं होगा जो वास्तव में इसका एक मात्र उत्तर है : "There is always a separation between the man who suffers and the artist who creates; and the greater the artist the greater the separation." (भोगनेवाले प्राणी और सृजन करने वाले कलाकार में सदा एक अन्तर रहता है; और जितना बडा कलाकार होता है उतना ही भारी यह अन्तर होता है ।)
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लेकिन यह एक लम्बा विषयान्तर हो गया है और मुझे मानना पडेगा कि इलियट के कथनानुसार मैं बहुत बडा आर्टिस्ट हो सका हूँ । शेखर का एक भी पात्र नहीं है जो न्यूनाधिक मात्रा में एक संश्लिष्त चरित्र Composite character नहीं है, तथापि मेरी अनुभूति और मेरी वेदना शेखर को अभिसिंचित कर रही है । और यह अभिसिंचन ऐसा है कि उससे यह कहकर छुटकारा नहीं पाया जा सकता कि अन्ततोगत्वा सभी गल्प-साहित्य आत्मकथा-मूलक है, अपने ही जीवन का चित्रण नहीं तो प्रक्षेपण (Projection) है, अपने स्यात की कहानी है । ‘शेखर’ में मेरापन कुछ अधिक है; इलियट का आदर्श (जिसकी महानता मैं मानता हूँ) मुझसे नहीं निभ सका है । शेखर निस्संदेह एक व्यक्ति का अभिन्नतम निजी दस्तावेज a record of personal suffering है, यद्यपि वह साथ ही उस व्यक्ति के युग-संघर्ष का प्रतिबिम्ब भी है । इतना और ऐसा निजी वह नहीं है कि उसके दावे को आप "एक आदमी की निजी बात" कहकर उडा सकें; मेरा आग्रह है कि उसमें मेरा समाज और मेरा युग बोलता है कि वह मेरे और शेखर के युग का प्रतीक है; लेकिन इतना सब होते हुये भी मैं जानता हूँ कि यदि इस उपन्यास का सूत्रपात दूसरी परिस्थिति में और दूसरे ढंग से (और शायद दूसरे अधिक समर्थ हाथों से !) हुआ होता तो उस भूमिका की आवश्यकता नहीं रहती...और न ही इसकी सम्पूर्ण उपेक्षा करते हुये पाठक के यह कहने की गुंजाइश रहती कि शेखर में घटनाओं की तो बात ही क्या स्थान भी लेखक के देशाटन की परिचर्चा से मेल खाते हैं । (यद्यपि यह कहने के लिये लेखक को मेरे सम्बन्ध में विशेष रूप से जानकार होना पडता ।)....
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"शेखर : एक जीवनी" के इन अंशों को लिखने का मेरा उद्देश्य ये कहना है कि दोहरी व्यक्तित्व/जीवन जीने का मौलिक अधिकार एक लेखक को भी है । किसी लेखक के व्यक्तिगत जीवन में घटित हुयी किसी घटना के आधार पर उसके स्रजित साहित्य की भर्तस्ना करना लेखक पर अत्याचार होगा और उसके लेखन के प्रति बेईमानी ।
असल में सुजाताजी की पोस्ट, (निजी कितना निजी है और कब तक) पर टिप्पणी करने के बाद सोचा कि अपने मन्तव्य को इस पोस्ट के माध्यम से स्पष्ट करूँ । यहाँ पर ये भी स्पष्ट कर दूँ कि इस संवाद में मेरी रूचि पूर्णतया सैद्धान्तिक (Theoretical) है । जिस विवाद के संदर्भ में सुजाता जी ने अपनी पोस्ट लिखी थी उस विवाद के संदर्भ में मेरी इस पोस्ट को न माना जाये । कुछ अनजाने में ही सही लेकिन एक सार्थक संवाद प्रारम्भ हुआ है । आपकी क्या राय है?
क्या किसी लेखक और लेखन को उसी प्रकार अलग किया जा सकता है जिस प्रकार हम अन्य व्यवसायों और व्यवसायी को अलग करके देखते हैं । किसी वैज्ञानिक के निजी विचार कि धरती केवल ६००० वर्ष पुरानी है अथवा जैव विकास का सिद्धांत (Theory of Evolution) असत्य है के बावजूद उसके शोधपत्रों को शंका की नजर से नहीं देखा जाता । फ़िर एक लेखक के साथ ऐसा बर्ताव क्यों जबकि वो दावा नहीं करता कि उसके विचार सत्य हैं , वो तो खुलेआम कहता है कि उसके विचार कल्पना की उडान हैं ।
नीरज रोहिल्ला,
२३ जुलाई, २००७
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