मेरी आज की पोस्ट आलोक पुराणिकजी की पोस्ट से प्रेरित है । उन्होनें अपनी पोस्ट में भारत के परिपेक्ष्य में तेल के बढते दामों की विवेचना की है (और ये व्यंग नहीं है ) ।
ये रहा उनकी पोस्ट का लिंक:कुछ समय पहले मैने ऊर्जा के सन्दर्भ में
एक पोस्ट ("तेल और भविष्य के उर्जा स्रोत: भाग १") लेखी थी । आज उस कडी का दूसरा भाग प्रस्तुत है ।
ये रही उस लेख की पहली कडी:ये लेख थोडा लम्बा अवश्य है लेकिन प्रयास करके इसे पूरा पढें और अपनी राय से अवगत करायें कि इसे आगे चालू रखा जाये कि नहीं जब मैने पहली कडी लिखी थी तब कच्चे तेल का दाम ~१२० डालर प्रति बैरल था और इस समय पोस्ट लिखते समय कच्चे तेल का दाम लगभग ~१३२ डालर प्रति बैरल है । इस सीधा मतलब है कि २२ दिनों में कच्चे तेल में १० प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है । आज इसकी कोई गारंटी नहीं ले सकता कि अगले २ महीने में इसका दाम १५० डालर प्रति बैरल नहीं पंहुच जायेगा । भारत में अगर मीडिया की बात मानी जाये तो पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि सम्भावित है । अमेरिका में इसका प्रभाव दिख ही रहा है । चुनाव समीप है और दोनो राजनैतिक पार्टियाँ तेल कम्पनियों को गरियाने पर तुली हैं । उनके कुछ तर्क ठीक हैं और कुछ तर्क कुछ उस प्रकार के कि अगर पानी में से बिजली निकाल ली तो किसानों के लिये क्या बचेगा...:)
एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि कच्चे तेल के दामों को कौन नियन्त्रित करता है ? क्या तेल कम्पनियाँ सीधे रूप से तेल के दामों को नियन्त्रित करती हैं? अगर तेल कम्पनियाँ नहीं तो फ़िर क्या बिचौलिये और दलाल तेल के दामों निर्धारित करते हैं । तेल की पिछले दो महीने की तेजी देखी जाये तो ये मूल रूप से आपूर्ति-खपत और बिचौलियों/ट्रेडर्स के व्यवहार से सम्बन्धित है । आपूर्ति की बात बाद में करेंगे, पहले बिचौलियों/ट्रेडर्स के व्यवहार पर ध्यान देते हैं ।
जिस प्रकार आप सोना, डालर, रूपया, शेयर बाजार आदि में पैसे का निवेश करते हैं, उसी प्रकार बहुत से ट्रेडर्स कच्चे तेल में पैसा निवेश करते हैं । कच्चे तेल में निवेश आम तौर पर शार्ट-टर्म (कम अवधि वाला) होता है । जब जब आपूर्ति में थोडी सी भी कमी महसूस की जाती है, ट्रेडर्स जानते हैं कि कच्चे तेल के दाम बढेंगे और वो फ़टाफ़ट तेल में निवेश आरम्भ कर देते हैं । ऐसा करने से बाजार में एक असुरक्षा का माहौल बनता है और तेल के दाम तेजी से चढते हैं । ऐसी स्थिति में अगर तेल कम्पनियाँ (ओपेक OPEC और अन्य प्राईवेट कम्पनियाँ Shell, Exxon Mobil, BP, Chevron, Connocco Phillips, PetroBras, PEMEX आदि) तेल की आपूर्ति बनाये रखती हैं तो बाजार संभला रहता है । परन्तु आपूर्ति में जरा सी भी कमी अथवा नाईजीरिया की तेल पाईप में विस्फ़ोट, OPEC वालों का ऊँचे लहजे में कोई संवाद आदि कोई भी घटक बाजार को गिरा सकते हैं ।
इस हफ़्ते हमने देखा कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने सऊदी अरब से उत्पादन बढाने की गुजारिश की जिसे सऊदी अरब ने तुरन्त ठुकरा दिया । इससे अमेरिका का खासी फ़जीहत भी हुयी और तेल के दाम भी नहीं गिरे । एक और नयी बात ये हुयी कि अमेरिका की संसद ने अमेरिकी न्यायिक विभाग (American Justice Department) को OPEC पर मुकदमा चलाने की ताकत प्रदान की है । महत्वपूर्ण बात है कि अभी साफ़ नहीं है कि ये मुकदमा किन स्थितियों में चलाया जा सकता है । इसके बारे में अन्य जानकारी का इन्तजार है, लेकिन फ़िलहाल ऐसा कोई मुकदमा दूर दूर तक नहीं देख रहा है लिहाजा ये मात्र एक कूटनीतिक कदम है । तेल की मंहगी कीमतों के बावजूद तेल कम्पनियों की रेकार्ड कमाई सभी की आंखो में किरकिरी बनी हुयी है । पिछले हफ़्ते वाशिंगटन में एक संसद समिति ने अमेरिका की छ: प्रमुख तेल कम्पनियों के अधिकारियों की खिंचाई की थी । Shell के प्रमुख ने कहा कि उनकी कम्पनी तेल के ६०-८० डालर के दाम पर भी मुनाफ़ा कमा सकती है । उन्होने ये भी कहा कि वो हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि तेल का दाम न बढे परन्तु जब तक स्वयं अमेरिका में तेल का उत्पादन नहीं बढाया जाता, तेल के दामों को नियन्त्रित करना बहुत कठिन है ।
अब आपूर्ति की बात करते हैं ।
पिछले लेख में हमने पढा था कि वैज्ञानिक अनुमानों से तेल की कमी नहीं है । परन्तु तेल के उपस्थित होने (In principle) और उसकी आपूर्ति दो अलग अलग बाते हैं । तेल कम्पनियाँ बहुत आक्रामक रूप से नये वैज्ञानिकों और इन्जीनियरों को भर्ती करने की फ़िराक में हैं लेकिन फ़िर भी हर कम्पनी अच्छे लोगों की कमी का रोना रो रही है । पुरानी तकनीक अब पुरानी पड रही है और नयी तकनीक विकसित होने में समय लेती है । अमेरिका के परिपेक्ष्य में बात की जाये तो अलास्का और कैलीफ़ोर्निया के तट पर तेल के उत्पादन पर रोक लगी हुयी है । पर्यावरणविद कहते हैं कि दोनों ही स्थानों पर तेल निकालने से पर्यावरण को भारी क्षति हो सकती है । लगभग ३०-३५ वर्ष पहले कैलीफ़ोर्निया के तट पर तेल उत्पादन का प्रयास हुआ था, लेकिन कुछ पर्यावरण समबन्धी समस्याओं के चलते वहाँ तेल उत्पादन पर ३० साल की पाबन्दी (Moratorium) लगा दी गयी थी । आज तेल कम्पनियों का दावा है कि वो बिना पर्यावरण को क्षति पँहुचाये वहाँ से तेल का उत्पादन कर सकते हैं लेकिन अमेरिका में नवन्बर में चुनाव आने वाले हैं और तब तक इस सम्बन्ध में कुछ भी तय हो पाना मुश्किल लगता है ।
अमेरिका में तेल का उत्पादन प्रारम्भ होने से भारत/चीन को अप्रत्यक्ष रूप से बहुत फ़ायदा होगा । तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिये अमेरिका में तेल का उत्पादन बढने अथवा गैर पारम्परिक स्रोतों पर अधिक ध्यान देने से तेल के दामों में काफ़ी कमी आ सकती है । ऐसा होने से भारत और चीन को इसका सीधा फ़ायदा मिलेगा ।
दूसरा पहलू: मुझे नहीं लगता कि तेल का दाम लान्ग-टर्म (Long-Term) में गिरने वाला है । मान लीजिये आपके घर में मिठाई बनाने का कारखाना है और आपके शहर में मिठाई की लत बढती जा रही है । ऐसे में रोज आपके घर के बाहर भीड लगती है और मिठाई दलालों के माध्यम से बाँटी जाती है । जैसे जैसे भीड बढती है आप मिठाई का दाम बढाते हैं । अगर आप एक साथ मिठाई का उत्पादन दो गुना कर दें तो लोग दो दिन की मिठाई एक साथ खरीद सकते हैं और अगले दिन भीड कम हो सकती है । लेकिन भीड कम होने से दलालों को मिठाई का दाम कम करना पड सकता है ।
ऐसे में दलाल आपसे कहते हैं कि तुम मिठाई का उत्पादन इस अनुपात में बढाओ कि झींगा-मुश्ती के बाद सबको मिठाई मिल जाये लेकिन आराम से न मिले । इससे लोग मिठाई भी खा लेंगे, तुमको भी खूब मुनाफ़ा होगा और हम भी ऐश करेंगे । लोग दाम बढने पर झल्लायेंगे, लेकिन फ़िर अपनी आदत से मजबूर होकर वापिस खरीदने आयेंगे।
मुझे लगता है कि तेल के साथ भी ऐसा हो रहा है । आपकी क्या राय है??? Technorati Tags
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