मंगलवार, अगस्त 19, 2008
सहजता,कहीं मोल मिलती है क्या?
कभी इस बात का दंभ कि मैं तो हिन्दी पढ़ रह हूँ डंके की चोट पर, जिसे गंवार कहना हो कह ले मुझे परवाह नहीं।
कहाँ मेरे स्कूल में चीनी विद्यार्थी की कमजोर अंग्रेजी के कारण एक साधारण सी बात को जरा तकलीफ़ से समझाने के बाद उसके चेहरे पर आयी सहज मुस्कान और कहाँ किसी अंग्रेजीदां नौजवान की दिल्ली के कैफ़े काफ़ी डे में अमेरिकन एक्सेंट में बातचीत के दौरान असहजता से "डैम इट" और "होली शिट" ।
कहाँ है इसके बीच में मेरा नायक जो सहजता से अपनी अंगरेजी कि किताब बंद करके स्टेशन पर उतरकर वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास खरीदकर उतनी ही सहजता से पढता है । न तो वो बात बात में काले फिरंगियों को गरियाता है और न ही उन्ही की भाषा में बात करता है ? आपने मेरे नायक को कहीं देखा है ?
मंगलवार, अगस्त 12, 2008
मेरे वालिद कहा करते थे कि बेटा इश्क करो !!!
मेरे वालिद रोजो शब खुदा की याद में रहते थे,
कभी मौज में आते तो फ़रमाते थे कि बेटा इश्क करो,
इश्क ही इस कारखाने में मुतस्सर्रिफ़ है,
अगर इश्क न होता तो नज्म-ए-गुल कायम नहीं रह सकता था ।
बेइश्क जिंदगी बवाल है,
इश्क में जी की बाजी लगा देना कमाल है,
इश्क बनाता है इश्क ही कुंदन कर देता है
दुनिया में जो कुछ है इश्क का जरूर है,
आग इश्क की सोजिश है पानी इश्क की रफ़्तार है,
खाक इश्क का करार है हवा उसका इस्तेरार है,
मौत इश्क की मस्ती और जिन्दगी उसकी हुश्यारी है,
रात इश्क का ख्वाब और दिन इश्क की बेदारी है,
नेकी इश्क का कुर्ब है गुनाह इश्क की दूरी है,
जन्नत इश्क का शौक है दोजख इश्क का जौक है ।
कौन मकसद को इश्क बिन पँहुचा,
आरजू इश्क, मुद्दआ है इश्क, सारे आलम में भर रहा है इश्क ।
- मीर तकी मीर
शुक्रवार, अगस्त 08, 2008
यूट्यूबीय विशुद्ध मौज वाली पोस्ट !!!!
स्लो इंटरनेट कनेक्शन वालों से क्षमायाचना सहित, केवल आडियो लगाने से मजा नहीं आयेगा :-)
मंगलवार, जुलाई 29, 2008
वारिस शाह की हीर: एक सुनहरा अंदाज !
आबिदा परवीन ने बड़े अच्छे अंदाज़ में हीर गाया है लेकिन पाकिस्तानी गायक "इनायत हुसैन भट्टी" साहब की आवाज में हीर सुनकर लगता है कि हीर की कहानी सिर्फ़ एक किस्सा ही नहीं हकीकत में सामने घट रही है |
लेकिन आज हम आपको एक नए अंदाज़ में हीर सुनवायेंगे | इन साहब के बारे में सिर्फ़ इतना पता है कि ये वारिस शाह के दरबार में बैठकर अपनी मौज में हीर गाते हैं | न नाम का पता है और न कोई और ठिकाना | लेकिन हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में ऐसे कलाकार हर शहर/कस्बे/गाँव में बिखरे पड़े हैं जो प्रसिद्धि नहीं पा पाते | आज हम सलाम करते हैं ऐसे ही कलाकारों को और उनकी याद में समर्पित है आज की ये पोस्ट !!!
जो यूट्यूब पर इन्टरनेट की धीमी रफ़्तार के कारण वीडियो न देख सकें उनके लिए आडियो और गायक की तस्वीर भी पेश है |
इस फ़कीर की गायिकी और हीर की आत्मा को महसूस करने के लिए पंजाबी भाषा का आना कोई जरूरी नहीं है | इस आडियो की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है लेकिन अगर आप हैड फोन लगाकर सुनेंगे अथवा वाल्यूम को बीच बीच में माडरेट करते रहेंगे तो बहुत आनंद आयेगा | सुनते समय आंख बंद कर सकें तो कहने ही क्या :-)
इस दूसरे वीडियो को भी देखने का कष्ट करें, मेरा दावा है कि आप निराश नहीं होंगे |
रविवार, जुलाई 27, 2008
एक दिन की मजदूरी का मजा !!!
इसके लिये जमीन पर पूरा ब्लू प्रिंट सरीखा बना हुआ था और लकडी के हर ढांचे पर उसका नंबर अंकित था । बस E1 को E1 के स्थान पर रखकर E2 और E3 से जोड मिलाते हुये कीलें ठोंककर अपने स्थान पर जमा दो । कील ठोंकने के तीन इन्तजाम थे । बडी कीलों (तकरीबन २.५ इंच लम्बी) के लिये Nail Gun थी । इस Nail Gun को आप एक स्टेपलर की तरह समझ लें जो लकडी में लम्बी लम्बी कीलों को एक झटके में लगा देती थी । दूसरी Nail Gun इससे भी खतरनाक थी, इसका काम लम्बी (तकरीबन ३.५ इंच लम्बी) कील को लकडी से होते हुये कंक्रीट के चबूतरे में फ़िक्स करना था । इसके क्रियाविधी एकदम बन्दूक के जैसी थी, इसमें बन्दूक की मैगजीन की तरह बारूद की एक मैगजीन लगती है । ट्रिगर दबाने से बारूद में विस्फ़ोट होता है और इससे उत्पन्न हुआ दवाब कील को लकडी से होती हुये कंक्रीट में पैबस्त कर देता है । इसके बाद वाला काम सबसे मेहनत का था जिसमें छोटी छोटी कीलों (१.५ इंच) को हाथ के हथौडे से नियत स्थान पर बैठाना था । जैसा कि आप ऊपर वाले चित्र में देख सकते हैं । आज मैने कम से कम १२०-१५० कीलों को अपने मजबूत हाथों से उनके स्थान पर लगाया :-)
आज ह्यूस्टन की गर्मी अपने चरम पर थी और तापमान लगभग ४० डिग्री और आद्रता (Humidity) ६० प्रतिशत थी । हम लोगों के लिये ठंडे पानी का बंदोबस्त था । आज ४ अलग अलग मकानों पर काम चल रहा था और विभिन्न समूहों के लगभग ८० लोग काम पर लगे हुये थे । कुछ लोग सपरिवार आये हुये थे जिनसे मिलकर बडा अच्छा लगा । ह्यूस्टन की एक बडी दुकान (Mattress Firm) के लगभग २५ लोग साथ में आये हुये थे जिसमें काफ़ी लडकियाँ भी थी जो कन्धे से कन्धे मिलाकर लकडी उठा रही थीं और कील पर बेरहमी से हथौडा पटक रही थीं :-)
हम लोगों ने खुली धूप में सुबह ७ बजे से दोपहर १२ बजे तक काम किया और फ़िर "हैबिटेट फ़ॉर ह्यूमैनिटी" वालों ने गर्मी के चलते काम बन्द करवा दिया । इसके बाद हम सब लोगों ने साथ बैठकर अपने सैंडविच खाये और फ़िर घर वापिस लौट गये । हमारे स्कूल के साथियों ने अगस्त में फ़िर से एक बार यहाँ आकर काम करने का फ़ैसला लिया और सभी ने इसे ध्वनिमत से स्वीकार किया । बाकी आप फ़ोटो देखकर खुद ही समझ जायेंगे ।
गुरुवार, जुलाई 17, 2008
दिल के लिये मुफ़ीद है दौडना !!!
दौडना दिल के लिये बडा मुफ़ीद होता है । दौडने से हृदय की मांसपेशियाँ विकसित होती हैं, हृदय के चैम्बर का आकार बडा होता है और हर स्ट्रोक में हृदय की रक्त भेजने की क्षमता बढती है । चूँकि आप हर स्ट्रोक में पहले से अधिक रक्त भेज सकते हैं इसलिये नियमित दौडने से सामान्य परिस्थितियों (जब आप दौड नहीं रहे हों) में आपके हृदय की प्रति मिनट धडकन कम हो जाती हैं । प्रति मिनट धडकन कम होने से आपके हृदय को आराम मिलता है और वो आपको दुआयें देता है । इससे आपके रक्तचाप में भी गिरावट आती है । पिछले १.५ वर्षों से नियमित दौडने के कारण सामान्य स्थिति में मेरा रक्तचाप ८०/१२० के स्थान पर ७०/११० तक आ गया है ।
दौडते समय शरीर की मांसपेशियों में आक्सीजन की नियमित खुराक पंहुचती रहे, इसके लिये आपका शरीर अपने आप ही ऊतकों में नयी शिराओं का निर्माण प्रारम्भ कर देता है । इससे हॄदय के अलावा अन्य मांसपेशियाँ भी स्वस्थ रहती हैं । तीसरा सबसे बडा फ़ायदा होता है कि आपके रक्त के हीमोग्लोबिन की आक्सीजन को ऊतकों तक पंहुचाने की क्षमता का भी क्रमश: विकास होता है ।
इसके अलावा बढा हुआ वजन पूर्व स्थान पर आ जाता है, आस पडौसी इज्जत की नजर से देखते हैं, चोर पर्स चुरा कर भागे तो आप उसे पकड सकते हैं । यदि आप युवा हैं तो अक्षय कुमार स्टाईल में किसी युवा लडकी का पर्स वापिस लाकर दे सकते हैं, और युवा नहीं हैं तो ऐसा करके पास खडे युवाओं को शर्मिन्दा कर सकते हैं :-)
ये सब तो आप सभी जानते हैं लेकिन न दौडने वालों की दो प्रमुख समस्यायें होती हैं । पहली कि जोश में आकर दो दिन दौडे और तीसरे दिन हाथ, पैर, कमर और हर जगह होने वाले दर्द के कारण फ़िर से न दौडने का निश्चय कर लेते हैं । दूसरी समस्या ज्यादा जोश के कारण होती है के वो एक हफ़्ते में ही अगली मैराथन दौड लेना चाहते हैं और इसके चलते चोटिल हो जाते हैं ।
इसलिये इसको थोडा वैज्ञानिक तरीके से समझते हैं ।
इसके अलावा दो अन्य नियमों का पालन करना न भूलें ।
१) हाईड्रेट, हाईड्रेट, हाईड्रेट: अर्थात पानी पियें, पानी पियें और पानी पिंयें ।
२) जरूरत से ज्यादा अपने को कष्ट न दें, दौडने को जीवन का अंग बनायें न कि जीवन को दौडने का ।
इतनी सब जानकारी के बावजूद मैं एक सामान्य सा नियम भूल गया और एक ही महीने में अपनी मैराथन ट्रेनिंग को बहुत आगे ले जाने की चाहत में चोटिल हो बैठा । आज लगभग बीस दिनों के बाद ११ किमी दौडा हूँ और बहुत अच्छा अहसास हुआ है । ऐसा लग रहा है कि चोट से उबर चुका हूँ और अपनी आगे की ट्रेनिंग जारी रख सकता हूँ । मेरी ट्रेनिंग के बारे में जानकारी इस लिंक को क्लिक करके प्राप्त की जा सकती है । लाल रंग से लिखे हुये आंकडे मेरे चोटिल होने के बारे में जानकारी देते हैं ।
नीरज रोहिल्ला ।
सोमवार, जुलाई 14, 2008
सीटी पर मदन मोहन का गीत यूँ हसरतों के दाग
इसी के साथ मेरी पसन्द का एक और गीत "पूछो न कैसे मैने रैन बिताई" भी राजेश जी की सीटी के माध्यम से सुनिये ।
इसके अलावा यू-ट्यूब पर राजेश जी के २५० अन्य गीतों को इस पेज पर देख सकते हैं ।
रविवार, जुलाई 13, 2008
एक महबूबा की याद और फ़िर उसका मर्सिया !!!
खैर दिन कटते रहे और एक दिन स्कूल में एक मोबाईल कम्पनी वालों ने अपना तम्बू लगाया और कहा कि हम १२५ डालर जमा करने पर फ़ोन दे देंगे । उन्होने ये भी कहा कि हमारी नीयत पर पूरा भरोसा है लेकिन ससुरे पेपर वर्क के चक्कर में १२५ ले रहे हैं और वो भी सूद समेत ६ महीने के बाद लौटा देंगे । हमारे दोस्त ने कहा अब सब्र भी करो और दे दो १२५ डालर । तो प्यारे साथियों जनवरी २००५ में पहली बार हमने भी मोबाईल ले लिया । इसी के साथ अमेरिका के मोबाईल के कुछ अलग ढंग भी पता चले । ध्वनि संदेश (व्याईस मेल) से पहली बार वास्ता पडा, फ़ोन मिलाओ और अगर बन्दा फ़ोन न उठाये तो उसके ध्वनि संदेश के बाद अपना संदेश रेकार्ड कर दो । हमने भी पहली बार अपनी आवाज में संदेश रेकार्ड किया (Hi, This is Neeraj. I am unable to take your call right now but if you will leave your name, number and a brief message I will get back to you as soon as possible). ये भी पता चला कि मोबाईल शिष्टाचार के मुताबिक अगर कोई आपको ध्वनि संदेश छोडे तो उसको वापिस काल करने की जिम्मेवारी आपकी होती है ।
मेरे पिताजी एक बार बडे नाराज हुये, उन्होने मेरी आवाज सुनी और सोचा फ़ोन लग गया है और मुझे डांटना शुरू कर दिया :-) बाद में पता चला तो खूब हंसे । ये भी पता चला कि यहाँ हर महीने एक नियत मिनट (मेरे वाले प्लान में ४०० मिनट) मिलते हैं । फ़ोन मिलाने और उठाने दोनो में मिनट कटते हैं लेकिन शाम को ७ बजे के बाद से सुबह ७ बजे तक और शनिवार और रविवार को मिनट नहीं कटते हैं । मेरे तो बमुश्किल १५० मिनट खर्च हो पाते थे और हर महीने २५० मिनट बेकार चले जाते थे । मेरे पास जो मोबाईल फ़ोन था वो बडा सी सादा सा था और पाषाणकालीन लगता था, उसमें फ़ोटो, इंटरनेट आदि की रंगबाजी भी नहीं थी । ये रहा उसका फ़ोटो:
अब जल्दी से तीन साल आगे बढाते हैं और अचानक से हमने एक धांसू और चांपू सा फ़ोन लेने का निश्चय कर लिया । हमने नया फ़ोन लिया मोटोरोला Q9C, इसका फ़ोटो भी हाजिर है । ये फ़ोन तो एकदम जादू का पिटारा था, फ़ोन के साथ साथ इंटरनेट का तेज रफ़्तार कनेक्शन, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS), लाईव सर्च, टाईप करने के लिये बढिया की बोर्ड । ये नहीं कि "S" टाईप करना हो तो एक ही बटन को ४ बार दबाओ । खाने खाने जाना हो, तो फ़ोन को आदेश करो कि मैक्सिकन रेस्तरां खोजो और ३ मील के अन्दर के सभी रेस्तरां हाजिर । फ़िर बोलो कि हम जहाँ खडे हैं वहाँ से इस जगह जाने का रास्ता बताओ तो GPS की मदद से टर्न बाई टर्न निर्देश मिल जाते थे । सबसे मस्त लगता था कि पार्किंग लाट से अपनी लैब तक आते आते मैं १५-२० चिट्ठे पढ डालता था । आऊटलुक से मेरी ईमेल पलक झपकते मिल जाती थी । कुल मिला कर ये फ़ोन मेरी महबूबा बन गया था ।
हमने २ दिन तक इन्तजार किया कि शायद कोई तरस खाकर फ़ोन वापिस कर दे लेकिन ऐसा नहीं हुआ । मन मसोसकर अपने कमरे के एक कोने के कबाडे में उपेक्षित से पडे पुराने नोकिया वाले फ़ोन को झाड पोंछकर चमकाया और चालू किया । जब तक नया फ़ोन खरीदने के पैसे इकट्ठे न हों जाये, पुराने फ़ोन को ही कलेजे से लगाये रखना पडेगा ।
सोमवार, जुलाई 07, 2008
सागर चन्द नाहर भाई जी को जन्मदिन की बधाइयां |
आज हम सब के मित्र और प्यारे सागर चन्द नाहर जी का जन्मदिवस है | सागर भाईजी के संगीत ज्ञान और उनके सरल स्वभाव के बारे में कुछ भी लिखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनके बारे में सब लोग जानते हैं | उनसे जो भी एक बार बात कर ले उनके सरल स्वभाव से प्रभावित हुये बिना नहीं रहता |
हम सब की ओर से सागर भाईसाहब को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें |
नीरज रोहिल्ला
बुधवार, जून 25, 2008
वडाली बंधुओं की आवाज में सुनिये तेरे इश्क ने नचाया
फिलहाल आपसे गुजारिश है अपने १० मिनट अलग निकाल कर पूरे मन से इस गीत को सुने और महसूस करें |
Technorati Tags वडाली,बन्धु,पंजाबी,संगीत
सोमवार, जून 02, 2008
राहुल देव बर्मन का घातक फ़िल्म का एक मधुर गीत और दो घातक डायलाग !!!
इस मधुर गीत को सुनने के बाद अपने सनी देओल की आवाज में घातक के दो घातक से डायलाग, पता नही जब मैं इन डायलाग को अपलोड कर रहा था को अपने भुवनेश शर्मा जी की याद आ रही थी । तो ये डायलाग खास भुवनेश जी के लिये :-)
रविवार, जून 01, 2008
राग दरबारी के एक प्रसंग का आडियो (पहला प्रयास) !!!
मैं श्रीलाल शुक्लजी की कालजयी रचना राग दरबारी के एक प्रसंग का आडियो प्रस्तुत कर रहा हूँ । अगले प्रयास में आडियो को और बेहतर बनाने का प्रयास करूँगा । लेकिन इस पाडकास्ट को बनाते बनाते अपने बचपन और कालेज के दिनों की याद आ गयी जब विभिन्न हिन्दी प्रतियोगिताओं में मैं खूब ईनाम जीता करता था ।
आपकी सेवा में प्रस्तुत है पाडकास्टिंग में मेरा पहला प्रयास :-)
शनिवार, मई 24, 2008
तेल और भविष्य के ऊर्जा स्रोत: भाग २
ये रहा उनकी पोस्ट का लिंक:
कुछ समय पहले मैने ऊर्जा के सन्दर्भ में एक पोस्ट ("तेल और भविष्य के उर्जा स्रोत: भाग १") लेखी थी । आज उस कडी का दूसरा भाग प्रस्तुत है ।
ये रही उस लेख की पहली कडी:
ये लेख थोडा लम्बा अवश्य है लेकिन प्रयास करके इसे पूरा पढें और अपनी राय से अवगत करायें कि इसे आगे चालू रखा जाये कि नहीं
जब मैने पहली कडी लिखी थी तब कच्चे तेल का दाम ~१२० डालर प्रति बैरल था और इस समय पोस्ट लिखते समय कच्चे तेल का दाम लगभग ~१३२ डालर प्रति बैरल है । इस सीधा मतलब है कि २२ दिनों में कच्चे तेल में १० प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है । आज इसकी कोई गारंटी नहीं ले सकता कि अगले २ महीने में इसका दाम १५० डालर प्रति बैरल नहीं पंहुच जायेगा । भारत में अगर मीडिया की बात मानी जाये तो पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि सम्भावित है । अमेरिका में इसका प्रभाव दिख ही रहा है । चुनाव समीप है और दोनो राजनैतिक पार्टियाँ तेल कम्पनियों को गरियाने पर तुली हैं । उनके कुछ तर्क ठीक हैं और कुछ तर्क कुछ उस प्रकार के कि अगर पानी में से बिजली निकाल ली तो किसानों के लिये क्या बचेगा...:)
एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि कच्चे तेल के दामों को कौन नियन्त्रित करता है ? क्या तेल कम्पनियाँ सीधे रूप से तेल के दामों को नियन्त्रित करती हैं? अगर तेल कम्पनियाँ नहीं तो फ़िर क्या बिचौलिये और दलाल तेल के दामों निर्धारित करते हैं । तेल की पिछले दो महीने की तेजी देखी जाये तो ये मूल रूप से आपूर्ति-खपत और बिचौलियों/ट्रेडर्स के व्यवहार से सम्बन्धित है । आपूर्ति की बात बाद में करेंगे, पहले बिचौलियों/ट्रेडर्स के व्यवहार पर ध्यान देते हैं ।
जिस प्रकार आप सोना, डालर, रूपया, शेयर बाजार आदि में पैसे का निवेश करते हैं, उसी प्रकार बहुत से ट्रेडर्स कच्चे तेल में पैसा निवेश करते हैं । कच्चे तेल में निवेश आम तौर पर शार्ट-टर्म (कम अवधि वाला) होता है । जब जब आपूर्ति में थोडी सी भी कमी महसूस की जाती है, ट्रेडर्स जानते हैं कि कच्चे तेल के दाम बढेंगे और वो फ़टाफ़ट तेल में निवेश आरम्भ कर देते हैं । ऐसा करने से बाजार में एक असुरक्षा का माहौल बनता है और तेल के दाम तेजी से चढते हैं । ऐसी स्थिति में अगर तेल कम्पनियाँ (ओपेक OPEC और अन्य प्राईवेट कम्पनियाँ Shell, Exxon Mobil, BP, Chevron, Connocco Phillips, PetroBras, PEMEX आदि) तेल की आपूर्ति बनाये रखती हैं तो बाजार संभला रहता है । परन्तु आपूर्ति में जरा सी भी कमी अथवा नाईजीरिया की तेल पाईप में विस्फ़ोट, OPEC वालों का ऊँचे लहजे में कोई संवाद आदि कोई भी घटक बाजार को गिरा सकते हैं ।
इस हफ़्ते हमने देखा कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने सऊदी अरब से उत्पादन बढाने की गुजारिश की जिसे सऊदी अरब ने तुरन्त ठुकरा दिया । इससे अमेरिका का खासी फ़जीहत भी हुयी और तेल के दाम भी नहीं गिरे । एक और नयी बात ये हुयी कि अमेरिका की संसद ने अमेरिकी न्यायिक विभाग (American Justice Department) को OPEC पर मुकदमा चलाने की ताकत प्रदान की है । महत्वपूर्ण बात है कि अभी साफ़ नहीं है कि ये मुकदमा किन स्थितियों में चलाया जा सकता है । इसके बारे में अन्य जानकारी का इन्तजार है, लेकिन फ़िलहाल ऐसा कोई मुकदमा दूर दूर तक नहीं देख रहा है लिहाजा ये मात्र एक कूटनीतिक कदम है । तेल की मंहगी कीमतों के बावजूद तेल कम्पनियों की रेकार्ड कमाई सभी की आंखो में किरकिरी बनी हुयी है । पिछले हफ़्ते वाशिंगटन में एक संसद समिति ने अमेरिका की छ: प्रमुख तेल कम्पनियों के अधिकारियों की खिंचाई की थी । Shell के प्रमुख ने कहा कि उनकी कम्पनी तेल के ६०-८० डालर के दाम पर भी मुनाफ़ा कमा सकती है । उन्होने ये भी कहा कि वो हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि तेल का दाम न बढे परन्तु जब तक स्वयं अमेरिका में तेल का उत्पादन नहीं बढाया जाता, तेल के दामों को नियन्त्रित करना बहुत कठिन है ।
अब आपूर्ति की बात करते हैं । पिछले लेख में हमने पढा था कि वैज्ञानिक अनुमानों से तेल की कमी नहीं है । परन्तु तेल के उपस्थित होने (In principle) और उसकी आपूर्ति दो अलग अलग बाते हैं । तेल कम्पनियाँ बहुत आक्रामक रूप से नये वैज्ञानिकों और इन्जीनियरों को भर्ती करने की फ़िराक में हैं लेकिन फ़िर भी हर कम्पनी अच्छे लोगों की कमी का रोना रो रही है । पुरानी तकनीक अब पुरानी पड रही है और नयी तकनीक विकसित होने में समय लेती है । अमेरिका के परिपेक्ष्य में बात की जाये तो अलास्का और कैलीफ़ोर्निया के तट पर तेल के उत्पादन पर रोक लगी हुयी है । पर्यावरणविद कहते हैं कि दोनों ही स्थानों पर तेल निकालने से पर्यावरण को भारी क्षति हो सकती है । लगभग ३०-३५ वर्ष पहले कैलीफ़ोर्निया के तट पर तेल उत्पादन का प्रयास हुआ था, लेकिन कुछ पर्यावरण समबन्धी समस्याओं के चलते वहाँ तेल उत्पादन पर ३० साल की पाबन्दी (Moratorium) लगा दी गयी थी । आज तेल कम्पनियों का दावा है कि वो बिना पर्यावरण को क्षति पँहुचाये वहाँ से तेल का उत्पादन कर सकते हैं लेकिन अमेरिका में नवन्बर में चुनाव आने वाले हैं और तब तक इस सम्बन्ध में कुछ भी तय हो पाना मुश्किल लगता है ।
अमेरिका में तेल का उत्पादन प्रारम्भ होने से भारत/चीन को अप्रत्यक्ष रूप से बहुत फ़ायदा होगा । तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिये अमेरिका में तेल का उत्पादन बढने अथवा गैर पारम्परिक स्रोतों पर अधिक ध्यान देने से तेल के दामों में काफ़ी कमी आ सकती है । ऐसा होने से भारत और चीन को इसका सीधा फ़ायदा मिलेगा ।
दूसरा पहलू: मुझे नहीं लगता कि तेल का दाम लान्ग-टर्म (Long-Term) में गिरने वाला है । मान लीजिये आपके घर में मिठाई बनाने का कारखाना है और आपके शहर में मिठाई की लत बढती जा रही है । ऐसे में रोज आपके घर के बाहर भीड लगती है और मिठाई दलालों के माध्यम से बाँटी जाती है । जैसे जैसे भीड बढती है आप मिठाई का दाम बढाते हैं । अगर आप एक साथ मिठाई का उत्पादन दो गुना कर दें तो लोग दो दिन की मिठाई एक साथ खरीद सकते हैं और अगले दिन भीड कम हो सकती है । लेकिन भीड कम होने से दलालों को मिठाई का दाम कम करना पड सकता है ।
ऐसे में दलाल आपसे कहते हैं कि तुम मिठाई का उत्पादन इस अनुपात में बढाओ कि झींगा-मुश्ती के बाद सबको मिठाई मिल जाये लेकिन आराम से न मिले । इससे लोग मिठाई भी खा लेंगे, तुमको भी खूब मुनाफ़ा होगा और हम भी ऐश करेंगे । लोग दाम बढने पर झल्लायेंगे, लेकिन फ़िर अपनी आदत से मजबूर होकर वापिस खरीदने आयेंगे। मुझे लगता है कि तेल के साथ भी ऐसा हो रहा है ।
आपकी क्या राय है???
Technorati Tags ऊर्जा,तेल,भविष्य
चित्रों द्वारा कांटिनेन्टल ड्रिफ़्ट की कहानी!!!
पहले मैं इस विषय पर केवल लेख लिखने के बारे में सोच रहा था लेकिन बाद में सोचा कि इस कहानी को चित्रों के माध्यम से सुनाया जाये तो अधिक रोचक रहेगी । Abraham Ortelius (1596), Francis Bacon (1620), Benjamin Franklin, Antonio Snider-Pellegrini (1858) नाम के विभिन्न विचारकों ने काफ़ी पहले सोचा था कि विभिन्न प्रायद्वीपों के एक साथ रखा जाये तो एक चित्र पहेली सी बनती है और ऐसी सम्भावना हो सकती है कि लाखों वर्ष पहले ये सभी प्रायद्वीप आपस में जुडे हुये हों ।
Alfred Wegener ने १९१२ में इस विषय पर गहन शोध किया और केवल द्वीपों की आकृति ही नहीं बल्कि विभिन्न चट्टानों और जीवाष्मों का अध्ययन करके Continental Drift का सिद्धान्त प्रस्तुत किया । वेगनर के अनुसार लगभग ३००० लाख वर्ष पहले सभी द्वीप आपस में जुडे हुये थे और धीरे धीरे ये द्वीप एक दूसरे से खिसकते चले गये । भारतीय द्वीप कुछ समय के लिये एक अलग द्वीप बना लेकिन कालान्तर में यूरेशिया द्वीप से टकरा गया और इस प्रकार महान हिमालय की पहाडों की रचना हुयी ।
वेगनर के सिद्धान्त को शुरूआत में वैज्ञानिकों ने अधिक महत्व नहीं दिया लेकिन इसके बावजूद वेगनर १९१०-१९३० तक अपने सिद्धान्त के पक्ष में तर्क एकत्र करते रहे । वेगनर अपने समकालीन वैज्ञानिकों को ये न समझा सके कि इतने विशालकाय द्वीप किस बल के कारण एक दूसरे से इतने दूर चले गये । वेगनर ने द्वीपों की गति के लिये दो विचार प्रस्तुत किये थे लेकिन ये दोनो ही विचार लगत थे । इसके कारण वेगनर के सिद्धान्त को लगभग १९५०-६० के आस पास ही वैज्ञानिकों की स्वीकृति मिल सकी ।
इसके बाद की कहानी आप चित्रों को देखें और खुद ही समझें :-)
चित्र १: अफ़्रीका और दक्षिणी अमेरिका एक दूसरे के साथ ऐसे फ़िट होते हैं
जैसे किसी चित्र पहेली का भाग हों । इसके अलावा गुलाबी रंग से दर्शायी हुयी
एक प्रकार की चट्टानों एवं भूसंरचना का अफ़्रीका और दक्षिणी अमेरिका में पाया
जाना इस थ्योरी को अधिक बल प्रदान करती है ।
चित्र २: विभिन्न प्रायद्वीपों की लाखों वर्ष पहले की स्थिति
चित्र ३: एक एनिमेशन जिसके द्वारा आप देख सकते हैं कि समय के साथ
विभिन्न प्रायद्वीप किस प्रकार अलग अलग हुये ।
इस चित्र में आप देख सकते हैं कि केवल चट्टाने ही नहीं बल्कि विभिन्न जीवों के जीवाश्म भी इस थ्योरी को बल प्रदान करते हैं ।
Technorati Tags भूगर्भ,शास्त्र,कांटिनेन्टल,ड्रिफ़्ट
बुधवार, मई 07, 2008
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विषय: किसी क्लास और एक्जाम की जरूरत नहीं
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कोई एडमीशन नहीं, कोई क्लास नहीं, कोई किताब नहीं और न ही कोई परीक्षा
आपकी पहचान भी गुप्त रखी जायेगी, जिससे आप डिप्लोमा से अपनी दुकान खोल सकें ।
तुरन्त काल करें और अपना डिप्लोमा २ हफ़्ते में प्राप्त करें ।
फ़ोन नंबर: १-५१२-८५३-९३८२
दो हफ़्ते में अपना पी.एच.डी. डिप्लोमा मंगाये, वो भी बिना क्लास और एक्जाम के । दुआ करते हैं कि पिताजी को ये खबर न हो जाये, वरना उनका शक कि बेटा एकदम नाकारा है विश्वास में बदल जायेगा ।
गया आज का दिन तो पानी में, इस मेल को भी सुबह सुबह ही आना था :-)
बू हू हू.....
कोई दर्द को और न बढा दे, इसीलिये अपनी टिप्पणियों में इन बातों का ख्याल रखें :-)
गुरुवार, मई 01, 2008
तेल और भविष्य के ऊर्जा स्रोत : भाग १
पिछले कुछ महीनो में शायद कोई ही हो जिसने कच्चे तेल की बढती कीमतों पर विचार न किया हो । कल कच्चे तेल का दाम ~ १२० डालर प्रति बैरल था; लेकिन आज से लगभग ४ वर्ष पहले ५० डालर प्रति बैरल का दाम असम्भावित सा लगता था । मैं अपनी रोजी रोटी तेल से सम्बन्धित शोध कार्य से कमाता हूँ इसलिये इस क्षेत्र की अधिक से अधिक जानकारी रखना मेरी मजबूरी है । इस विषय से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर देने के लिये मैं इस सीरीज को आरम्भ कर रहा हूँ और मुझे खुशी होगी अगर आपके प्रश्नों को इस सीरीज में शामिल किया जा सके ।
तेल से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
१) क्या अगले १०-२०-३० वर्षों में तेल समाप्त हो जायेगा ?
२) अगर नहीं तो तेल का दाम अगले वर्षों में क्या होगा ?
३) तेल के बाद का भविष्य क्या है ? क्या तेल के समाप्त होने के बाद हम आर्थिक स्पाईरल (Downwards) देखेंगे ?
४) तेल के आगे और जहाँ कौन कौन से हैं?
आज हमारे पास कितना तेल बचा है इसका अलग लोगों के पास अलग जवाब है । लेकिन उससे पहले कुछ तथ्य इस प्रकार हैं । आज तक कुल मिला कर हम सब ने लगभग १ ट्रिलियन बैरल तेल का उपयोग किया है ।
१ ट्रिलियन बैरल = १००० बिलियन बैरल = १०००,००० मिलियन बैरल = १०^(१२) बैरल
तेल के मामले में हबर्ट का सिद्धान्त बेहद प्रसिद्ध है । हबर्ट के अनुसार जब कच्चे तेल का उत्पादन अपने चरम पर होगा उस समय तक हमने अपने तेल का ५० प्रतिशत भाग प्रयोग कर लिया होगा । उसके बाद चाहकर भी हम तेल का उत्पादन एक निश्चित दर पर नहीं रख पायेंगे और तेल का उत्पादन गिरता रहेगा जब तक कि हम पूरा तेल प्रयोग नहीं कर लेते । हबर्ट ने अमेरिका के सन्दर्भ में कहा था कि तेल का उत्पादन १९६८ में अपने चरम पर होगा और १९७० में अमेरिका में तेल का उत्पादन अपने चरम पर था । १९७० के बाद अमेरिका में तेल का उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है । इस लिहाज से देखा जाये तो हबर्ट का सिद्धान्त अमेरिका के सन्दर्भ में लगभग सही सिद्ध सा होता दिखता है ।
अगला महत्वपूर्ण प्रश्न है, कि क्या ग्लोबल तेल उत्पादन में भी हबर्ट का सिद्धान्त लागू होता है । क्या ग्लोबल तेल उत्पादन भी अपने चरम पर आकर गिरना शुरू होगा ? अगर हाँ तो ये कब होगा, या फ़िर ग्लोबल तेल उत्पादन अपने चरम पर आ चुका है ? यदि ऐसा है तो क्या हमारे पास केवल अगले १०-२०-३० साल का तेल बाकी है ? अगले कुछ सालों में तेल के दाम बढने/घटने की क्या सम्भावना है ? भारत और चीन जैसे विकासशील देश ग्लोबल तेल की आपूर्ति और दामों पर क्या असर कर रहे हैं ?
इस सीरीज में हम ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे । इस सीरीज की पहली कडी को पूर्ण करने के लिये हम एक प्रश्न की तह में जाने का प्रयास करेंगे । बाकी महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर क्रमश: अगली कडियों में मिलेंगे ।
प्रश्न १: आखिर कुल कितना तेल बाकी है इस धरती पर ???
उत्तर: कच्चे तेल को दो प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है । पहला Conventional Oil और दूसरा Un-Conventional Oil । Conventional Oil का मतलब है कि ऐसा तेल स्रोत जिससे अभी तक तेल निकाला जाता रहा है । उदाहरण के तौर पर सऊदी अरब, मेक्सिको, लिबिया, नाईजिरिया और अन्य सभी सुने हुये स्रोत । Conventional Oil निकालने के लिये तरीका आसान है । पहले तेल का कुँआ खोदकर Pressure Depletion से जितना तेल निकले निकाल लो । उसके बाद पानी Inject करके और तेल निकालो । Conventional Oil लगभग ६ से ९ ट्रिलियन बैरल की मात्रा में उपलब्ध है ।
Un-conventional Oil के कई प्रकार हैं, कनाडा में उपलब्ध Tar sand, अमेरिका और अन्य स्थानों पर उपलब्ध Oil Shale और अन्य भारी तेल के स्रोत । इसके बारे में इतना समझ लें कि ये टेढी खीर है । इस प्रकार के तेल की श्यानता (Viscosity) इतनी अधिक होती है कि ये आसानी से बहता (Flow) नहीं करता है और इसके बारे में आजकल काफ़ी शोध चल रहा है । Un-Conventional Oil लगभग २ से ७ ट्रिलियन बैरल की मात्रा में उपलब्ध है ।
इसके अलावा महत्वपूर्ण है कि इसमें से Recovery Efficiency क्या है ? मान लीजिये १०० बैरल तेल मौजूद है तो इसमें से अगर आप ४० बैरल निकाल पायें तो आपकी Recovery Efficiency 40 % हुयी । आजकल ग्लोबली Recovery Efficiency लगभग ३०-३५ % है । Un-Conventional Oil के सन्दर्भ में Recovery Efficiency लगभग १०-२० % है ।
इस लिहाज से देखा जाये तो अभी भी लगभग ४-६ ट्रिलियन बैरल तेल अभी और निकाला जा सकता है । दूसरे शब्दों में अभी केवल एक चौथाई से भी कम तेल निकाला गया है । इस अंदाजे से अभी ग्लोबल हबर्ट पीक दूर की कौडी है । तेल मौजूद है बस निकालने वाले चाहिये । इसमें भी एक समस्या है, अगर तेल की माँग बढती गयी और इसी दर से तेल की आपूर्ति नहीं बढी तो निश्चित तौर पर तेल के दाम बढेंगे । जैसे जैसे तेल के दाम बढेंगे, तेल कम्पनियों का फ़ायदा बढेगा और तेल कम्पनियाँ Un-Conventional Oil/Alternate Energy में निवेश करके भविष्य के तेल/ऊर्जा की माँग के सन्दर्भ में आपूर्ति सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगी ।
बाटम लाईन: अभी चिंतित होने की जरूरत नहीं है । तेल है और अगले ३०-५०-६०-८०-१०० वर्षों तक रहेगा । लेकिन केवल तेल के रहने से समस्यायें हल नहीं होंगी, इसीलिये इस लेख की अगली कडी में हम अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करेंगे ।
यदि इस सन्दर्भ में आपके कोई प्रश्न हैं तो आप टिप्पणी के माध्यम से पूछ सकते हैं । हम उनके उत्तर देने का भरसक प्रयास करेंगे ।
मंगलवार, अप्रैल 29, 2008
एक ठुमरी और तीसरी कसम का गीत संवादों के साथ बोनस में !!!
पहला गीत: भैरवी राग (तीन ताल) में एक ठुमरी है जिसे पण्डित अजय पोहनकर ने गाया है । ठुमरी के बोल हैं, "कैसी ये भलाई"
दूसरा खास बोनस गीत फ़िल्म तीसरी कसम का है । इसकी खासियत है कि गीत के बीच बीच में राज कपूर साहब की आवाज में संवाद । मेरा दावा है कि इसे सुनकर आपको फ़िल्म की याद आ जायेगी ।
Technorati Tags भैरवीं,पं,अजय,पोहानकर,तीसरी,कसम
बुधवार, अप्रैल 23, 2008
दिल को छू लेने वाली कहानी !!!
ये कहानी थोडी लम्बी अवश्य है लेकिन आपके धैर्य का आपको भरपूर फ़ल मिलेगा, ऐसी मेरी आशा है ।
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आतिथ्य
प्रीतीश आचार्य
रूपांतर : आयुष्मान गोस्वामी
रसानंद बाबू को अपने पर गुस्सा आ रहा था। मिस्त्री की बात मान ली होती तो यह दुर्दशा नहीं होती। कल जब साइकिल में हवा भरवाने गये थे तब उसने कहा थाज्ञ् `जल्द ही टायर बदलवा दीजिए।' एक ही दिन में उसकी बात सच निकली, तेज़ आवाज़ के साथ ट्यूब फट गया। कम से कम सुबह घर से निकलते समय फटा होता तो साइकिल ठीक करके निकलते या फिर निकलते ही नहीं। अब क्या करें? उनकी नज़र कलाई पर बंधी घड़ी पर पड़ी, सोचने लगे ग्यारह बज रहे हैं, यहां से पदमपुर साइकिल से जाओ तो पूरा एक घंटा। पैदल चलो तो तीन घंटे से कम नहीं लगेंगे। ऊपर से साइकिल ठेलना होगा। जब विपदा उपस्थित होती है तो जाने क्यों धूप का प्रकोप बढ़ जाता है और दूरी भी। सारी स्थिति की कल्पना करते हुए रसानंद बाबू के पांव थम से गये। प्यास के मारे गला सूखने लगा।
रसानंद बाबू ने पीछे मुड़कर देखाज्ञ् एक औरत चली आ रही है। उसकी चाल से उन्हें लगा कि मानों वह उन तक पहुंचना चाहती हो। खेत से लौट रही है, पति के लिए नाश्ता लेकर गयी थी। वहीं कुछ देर पति के साथ काम किया होगा और अब लौट रही है। पति से पहले उसे घर पहुंचना होगा। भात भी बनाना है, बच्चे इंतजार कर रहे होंगे। औरत के सिर पर एक परात थी जिस पर पलाश के कुछ पत्ते, दो-चार खजूर के दातुन, साथ में मुट्ठी भर जलावन लकड़ी जो चूल्हा जलाने के काम आयेगी। उस औरत के साथ बिना कोई बात किये रसानंद बाबू ने यह सब अनुमान लगा लिया। अनुमान लगाते हुए उनके चेहरे पर एक क्षीण मुस्कराहट दौड़ गयी। मुस्कराहट ने उनका कष्ट कुछ कम कर दिया। जासूसी उपन्यास में इसी तरह जासूस कई बातें जान लेता है, बिना कुछ पूछे, पहली मुलाकात में ही, किसी ज्योतिषी की तरह। बचपन में उन्होंने बहुत सारे जासूसी उपन्यास पढ़े थे। मन में दबी हुई इच्छा भी थी जासूस बनने की। क्या पता मौका मिलता तो शायद बन भी गए होते। फोन पर फोन करते। हुक्म तामील करने के लिए हमेशा सहायक मौजूद रहते।
लेकिन पता नहीं, क्या सोचकर वे मलेरिया विभाग में घुस गए। धेले भर की आमदनी नहीं। महीने भर तनख्वाह का इंतज़ार करो, कर्ज चुकाओ। उस पर रोज़ दस-बीस मील की साइकिल यात्रा और रास्ता भी ऐसा कि साइकिल का एक पंचर बनवाने के लिए कोई मिस्त्री न मिले। इतना सब सोच चुके थे रसानंद बाबू कि वह औरत उनके बराबर में चलते दिखाई दी। `मां, तुम्हारे गांव में कोई साइकिल की दुकान तो नहीं है?' रसानंद बाबू को पता है, आस-पास कोई साइकिल की दुकान नहीं है। कुछ दिन पहले किसी ने बताया तो था, साइकिल का बालबेरिंग किसी ने अपनी स्वदेशी बुद्धि से ग्रीस के बदले लकड़ी का गुड़ लगाकर सेट किया था। सुनकर रसानंद बाबू भी खूब हंसे थे। आज उन्हें लग रहा था साइकिल का पंचर सुधारने का ऐसा ही कुछ स्वदेशी उपाय होता तो इस प्राणांतक धूप से छुटकारा मिल जाता। `न इस गांव में तो कोई नहीं है। सीधे पदमपुर जाना पड़ेगा।' कहते हुए उस औरत ने रसानंद बाबू का सपना तोड़ा और पूछाज्ञ् `तुम्हें कहां तक जाना है, काका!' उसकी बातों से लगा वह रसानंद बाबू की विपदा से दुखी है। कोई बीस-बाईस साल की उम्र होगी उस औरत की, रसानंद बाबू की छोटी बेटी के बराबर। शादी को चार-पांच साल हो गये होंगे, उसके एक-दो बच्चे भी हो चुके होंगे। `मां' के बदले बेटी संबोधित किया जाता तो शायद ज्यादा फबता। पर, एक लड़की अपने जन्म से मृत्यु तक मां ही तो रहती है। शादी से पहले मां-बाप-भाई की सेवा, शादी के बाद पति-पुत्र की सेवा और बुढ़ापे में नाती-नातिन की सेवा। बिना किसी प्रति-उपकार के सारा जीवन सेवा करना ही मानों उसका धर्म है। मां के अलावा कौन करेगा इतनी सेवा? बदले में उसे मिलता क्या है! बेचारी तरसती रहती है पूरी ज़िन्दगी दो टूक स्नेह और संबोधन के लिए। यहां मिलेगा। न, न यहां नहीं, वहां। या फिर और कहीं। इसी तरह के विचारों से रसानंद बाबू का मन करुणा से द्रवीभूत हो गया। वे आत्म-समीक्षा करने लगे। खुद उन्होनें भी क्या दिया है, वह स्नेह और श्रद्धा भरा संबोधन!
`काका! पदमपुर तक जाओगे?' पहले प्रश्न का जवाब न मिलने पर औरत ने एक बार फिर पूछा। `हां, मां!' इतना कहने के बाद सदानंद बाबू का मन आत्म-दया से भर गया। उन्हें लगा जैसे आंखों से आंसू निकल आएंगे। भरी धूप में साइकिल घसीटते-घसीटते वे अब पदमपुर तक जाएंगे। बचपन में शरीर पर कहीं चोट आने पर, मां के सहलाने के बाद जैसे वे रोया करते थे, आज न चाहते हुए भी उन्हें वैसे ही रोने का मन करने लगा। इतने में औरत पूछ बैठीज्ञ् `क्या तुम पदमपुर में नौकरी करते हो काका, तुम्हारा अपना घर कहां है?'
`बुटोमाल!' रसानंद बाबू ने कहा। `घेंसबुटोमाल'।
`हां'
`मेरी भाभी भी तो बुटोमाल की बेटी है। तुम जानते होगे। झांकट घर की। केतकी। उसकी और मेरी एक ही लगन में शादी हुई थी। इस आषाढ को चार साल हो जाएंगे।' लड़की जैसे संबंध जोड़ने के लिए उतावली हो रही थी। रसानंद बाबू को अपनी बेटी की उम्र में रखने के बाद वह औरत एक छोटी बच्ची से ज्यादा बड़ी नहीं लग रही थी। एक बातूनी, बार-बार सवाल करने वाली, जो जवाब न मिलने तक चुप न रहती हो। तीन-चार साल की छोटी-सी लड़की।
`अच्छा, अच्छा, कहीं तू समारू की बेटी की बात तो नहीं कर रही है? वह जो तालपाली में ब्याही है। चार लड़कों में एक लड़की। अच्छी लड़की है।' रसानंद बाबू ने कहा।
अब रसानंद बाबू और लड़की बराबर साथ-साथ चल रहे थे। दोनों में बातचीत का विषय थाज्ञ् केतकी और उसका बाप समारू। बाप के मरने के बाद पांचवी कक्षा में समारू की पढ़ाई छूट गई। रसानंद बाबू का यजमान है उसका परिवार। गांव छोड़ने के साथ-साथ रसानंद बाबू का यजमानी से भी नाता छूट गया। अब ये सब काम चाचा के लड़के देखते हैं। पर अपनी बेटी की शादी में समारू नहीं माना, `पंडित, चार बेटों में एक ही बिटिया है। तू जब तक पोथी नहीं पढ़ेगा, उसकी शादी नहीं होगी।' रसानंद बाबू शादी में पदमपुर से आये थे। जवांई देखने में लोहे के मूसल की तरह, सांवला, सख्त, मुंह एकदम गोल, शरीर काफी गढ़ा हुआ। इस सब का जाकर पत्नी से भी जिक्र किया था। उसी लड़के की बहन है यह लड़की।
`हमारी बेटी को ठीक तरह से रखा है न तुम्हारे दादा ने?' रसानंद बाबू ने इस आग उगलती धूप में थोड़ा मजाक किया। `लड़की' के साथ बातचीत करते हुए धूप का प्रकोप कुछ कम-सा लगा। अब आ गया है उसका गांव जहां वह रुक जाएगी। उसके बाद कष्ट झेलना होगा। रसानंद बाबू ने मन ही मन आशंका की।
`काका! जब मैं तुम्हारी बेटी जैसी हूं तो एक बात कहूंगी, तुम मना मत करना।' लड़की ने अपने गांव का रास्ता पकड़ने से पहले कहा।
`बोलो मां', रसानंद बाबू ने पूछा।
`तुम इस भरी धूप में मत जाओ। मेरे घर में दोपहर में रह जाओ। इतनी धूप है, क्या पता कुछ हो जाए तो?'
`न रे मां! घर पर तेरी काकी मेरा इंतजार कर रही होगी। फिर मुझे ऑफिस भी जाना होगा।' रसानंद बाबू के तर्क बनावटी नहीं हैं। गरमी में ज़रा सी देर हो जाने पर पत्नी घर से बाहर, बाहर से अन्दर होती रहती है। बेटियों की शादी के बाद बेचारी घर पर अकेली रह नहीं पाती है। सूना घर जैसे उसे खा जाता है। पर उससे भी बड़ी बात है कैसे वे किसी के यहां मेहमान हो जाएं। दो मिनट तो हुए इस परिचय को। दूसरी तरफ मन कर रहा था कुछ देर रुक जाने को। इन दिनों बूढ़ों के लिए लू से बड़ा यम कोई नहीं है। प्राण रहे तो सब ठीक है। एक ओर प्रचंड धूप का प्रकोप, दूसरी ओर लड़की का स्नेह भरा निमंत्रण।
`काका! हमें तुम छोटी जात का गरीब मानते हो तो बात अलग है। नहीं तो तुमको इस भरी दोपहर में जाना नहीं चाहिए। मेरी भाभी के तुम जब काका हो तो मेरे भी तो काका हुए। मैं तुम्हारी अपनी बेटी होती तो क्या तुम इस तरह चले जाते।' लड़की की बातों में आत्मीयता थी, साथ था कुछ अभिमान। पर उससे भी ज्यादा था मन में यह डर कि रास्ते में बूढ़े को लू लग जाए तो, आखिर पाप तो उसे ही लगेगा न। उपन्यास के जासूस की तरह रसानंद बाबू ने लड़की के मन की बातों को ताड़ लिया। सोचने लगेज्ञ् क्या उम्र है इसकी अभी! स्कूल का मुंह तो शायद इसने देखा भी नहीं होगा। पर, कितनी समझदारी है इसमें। कितनी चालाकी से इसने मुझे अपना कर लिया है। हो सकता है यह मेरे मन की बात को भी जान चुकी होगी। दोपहर की धूप में साइकिल ठेलते हुए बूढ़े में पदमपुर तक जाने की न ताकत है और न ही आग्रह।
`ना रे मां! मैं तो कुछ और सोच रहा था। एक तो तेरे सास-ससुर का घर और अब तू खेत से लौट रही है। घर पर कितने सारे काम पड़े होंगे। उसके ऊपर मेरा बोझ।' रसानंद बाबू ने कहा।
`क्या बात करते हो तुम काका। मेरे बाप-काका आते तो मैं क्या भगा देती। वैसे भी मेरे सास-ससुर अपनी बेटी के यहां गये हैं। कल लौटेंगे। तेरा जंवाई बेचारा कितना खुश होगा, तुम्हें देखकर और अगर तुम दो घड़ी रहोगे तो मुझे कौन-सा कष्ट है। तुम तो ठहरे बाम्हन जात। मैं चूल्हा जला दूंगी, तुम भात उतार लेना। मुझे कौन-सा काम करना पड़ेगा।
अंतत: रसानंद बाबू लड़की के घर गए। उन्हें लगा, जैसे दूसरे लोक से उनकी मां लौट आयी है। तेज़ धूप में बच्चे को किसी तरह बचाना है। पेट भर खिलाना-पिलाना है। लड़की का छोटा-सा घर, दो ही कमरे। आधी छत खपरैल की, बाकी घास-फूस की। आंगन में मिट्टी की हंडिया में पानी रखा है। रस्सी की एक चारपाई पड़ी है। चारपाई पर एक फटी-पुरानी गुदड़ी बिछी है। छोटे बच्चे के लिए कोमल शय्या। बच्चा सोया था शायद। बीच में जाग जाने पर पड़ोसी घर ले गये होंगे। घर में पहुंचते ही लड़की ने सिर से परात को उतारा। तुरन्त काका के लिए पानी ले आयी। खाट पर बिछी गुदड़ी को अंदर ले गयी। वहां बैठने को कहा। उसके बाद वह गई पड़ोसी के घर बच्चे को देखने। पल भर भी विश्राम नहीं। एकदम यंत्र की तरह।
रसानंद बाबू कुछ देर तक खाली खाट पर बैठे, फिर लेट गये। थोड़ी देर बाद सो भी गये। सिर के नीचे तकिया न था, घर पर शायद तकिया नहीं है या फिर है भी तो गंदा-पुराना। शायद इसीलिए लड़की ने काका को तकिया नहीं दिया हो।
रसानंद बाबू की पतली नींद लड़की और उसके पति की फुसर-फुसर बातचीत से टूटी। लड़की कह रही थीज्ञ् `मेरी भाभी के गांव का आदमी है, उनके घर का पुरोहित। पदमपुर में नौकरी करता है। इस गरमी में साइकिल ठेलते हुए जा रहा था। मैंने सोचा लू न लग जाए।' इस पर उसका पति बोलाज्ञ् `यह सब तो ठीक है पर क्या खिलाओगी इसे!' लड़की ने जवाब दियाज्ञ् `तुम क्या इतना मूर्ख समझते हो मुझे। एक बा्रह्मण को एक जून खिला नहीं पाऊंगी, बासी परवाल (भीगा कर रखा गया भात, इसे पांता भात भी कहा जाता है।) है, हम दोनों के लिए हो जाएगा। नुनकी के घर से पाव भर चावल लायी हूं। बूढ़े के लिए भात चढ़ा दिया है। बनबासी पंसेरी से आलू लाकर चावल में डाल दिया है, सीज जाएगा। दो कच्चे केले तोड़ लाई हूं बागान से। चूल्हे में रख दूंगी। चावल चढ़ा दिया है, पकने पर बूढ़े को जगा दूंगी, उतार लेगा। थक गया है। अभी सो लेने दो उसे एक नींद।'
लड़की की बातों पर पति को कोई असहमति नहीं है। पत्नी की सामर्थ्य पर उसे पूरा भरोसा है। तब भी उसने पूछाज्ञ् `बेटा क्या बासी परवाल खाएगा, हमारे साथ।' लड़की ने जवाब दियाज्ञ् `न, न, उसे क्यों बासी देने लगी। बूढ़ा आदमी क्या पाव भर चावल खा लेगा? बचेगा तो बेटे को खिला दूंगी। नुनकी के घर में कुछ खाया हुआ है, अभी खेल रहा है।' संतुष्ट होकर पति कहता हैज्ञ् `नुनकी के घर से वो कांसे की थाली मांग लेना। गिलट की थाली में खाना देना अच्छा नहीं लगेगा।' लड़की बोलीज्ञ् `अरे! तुमको पता नहीं, नुनकी के भाई की बीमारी में कांसे की थाली गिरवी चली गई, कहां निकाल पाये उसे? डूब गई वो तो।' `तो अब क्या करोगी?' उसके पति ने पूछा। शायद उसे नुनकी के घर की कांसे की थाली डूबने पर चिंता नहीं थी। चिंता थी तो इस बात की कि अब कहां से आयेगी कांसे की थाली। पर लड़की के उत्साह में कोई कमी नहीं है। उसने कहाज्ञ् `कांसे की थाली की क्या जरूरत है, खेत से मैं कच्चे पलाश के पत्ते ले आयी थी। पत्तल-दोना बना दूंगी।'
`थोड़ी-सी दाल होती तो अच्छा होता। सूखा भात बूढ़ा खाएगा भी तो कैसे खाएगा!' पति ने कहा।
ज्ञ् `क्यूं! अचार है। नमक पानी डालने से रस्सेदार तरकारी बन जाएगी।' लड़की के जवाब से लगा, हर सवाल का उत्तर देने की तैयारी उसने पहले से कर रखी है। अंतत: पति ने आश्वस्त भाव से कहाज्ञ् `और क्या? अपने घर पर जो है, वही तो खिला पाएंगे हम।'
इन सारे प्रसंग में रसानंद बाबू का मन कर रहा था, पति-पत्नी की बातों के बीच कहेंज्ञ् `मेरे लिए इतनी चिंता मत करो। कुछ भी होने से मेरा काम चल जाएगा। दोपहर को तुमने आश्रय दिया, ये क्या कम बात है!' पर वे उठ नहीं आये, गहरी नींद में सोने का अभिनय किये रहे। पति-पत्नी को मालूम नहीं होना चाहिए कि मैं उनकी बातों को सुन रहा था, यदि मालूम हो जाए तो बेचारे नंगे हो जाएंगे। शर्म से मुंह नहीं दिखा पाएंगे। पति-पत्नी के बीच प्रेम के अलावा और भी कई चीजें हैं जो तीसरे आदमी को पता नहीं चलनी चाहिए। उन्हें अपने घर की बात याद आई। महीने का वह आखिरी सप्ताह, जब बड़े समधी और समधन आ पहुंचे। दुर्भाग्य था जिस बनिए से उधार आता है, उसके बेटे की शादी होने के कारण दुकान भी बंद थी। वैसे में रसानंद बाबू की नज़र पड़ती है, पत्नी के हाथ खर्च की गोलक पर। मायके से लौटते हुए या फिर बाज़ार के हिसाब से बचाकर या फिर कैसे न कैसे करके पत्नी अपनी बचत को एक गोलक में रखती है। पचास-सौ रुपये निकले उसमें से। उसी से आधा किलो बासमती चावल, कुछ महंगी सब्जियां और साथ में मछली या मांस ले आये थे। केवल उनके लिए उन दिनों स्पेशल बनता है। एक बार तो समधी अड़ गए कि दोनों समधी एक साथ खाने पर बैठेंगे। रसानंद बाबू ने कहाज्ञ् `मैं तो नौ बजे भात खाकर ऑफिस जाने वाला प्राणी हूं। दोपहर को आपके साथ खाना खाऊं, एक तो तबीयत बिड़ेगी, दूसरे ऑफिस छोड़कर घर आने पर मेरी नौकरी चली जाएगी। समधी भी ज़िद पर अड़े थे, कहने लगेज्ञ् `तब तो नौ बजे मैं भी आपके साथ बैठूंगा।' अंतत: दाल में पानी डाला गया और तरकारी में चावल का चूरा। `सोमवार को मैं मांस नहीं खाता हूं। पूछना हो तो पूछ लीजिए अपनी समधन से।' यह कहते हुए रसानंद बाबू ने अपने लिए रास्ता बनाया। इसके बावजूद लगा, जैसे कोई बीच रास्ते में उनकी धोती चीर रहा हो। उनकी विनती कोई सुन नहीं रहा है।
`काका! उठोगे नहीं? भात पक गया है, उतार लो।' लड़की की आवाज़ ने रसानंद बाबू को जगा दिया। मुंह-हाथ धोकर वे भात उतारने लगे। मन कर रहा था बोलने काज्ञ् `बेटी! तूने जब सारे काम कर ही दिए तो भात भी उतार देती, मेरी कौन-सी जात चली जाती?' पर वे बोले नहीं। जात-कुजात के संस्कार की बात समझाने का यह समय नहीं है। हो सकता है लड़की समझेगी नहीं। उसके लिए जैसे सम्मान में काका बड़ा है, जात में ब्राह्मण भी ऊंचा है। फिर वे अपने आपसे पूछने लगे सचमुच मैं क्या संस्कारवादी दृष्टि से ये सब सोच रहा हूं। या आलस में कोई काम नहीं करना चाहता हूं। लड़की के हाथों सारे काम करवाना चाहता हूं।
खाने पर जब बैठे तो उसी पुराने दृश्य की पुनरावृत्ति हुई। रसानन्द बाबू ने सुझाव दिया, सब लोग एक साथ बैठ जाएं। जंवाई ने कहाज्ञ् `आप ठहरे बाहमन, गोस्वामी, मैं कैसे साथ बैठूंगा!' बेटा तो पहले से खा चुका है और रही लड़की तो उसकी बारी अंत में है। रसानंद बाबू समझ गए। उन्होंने जोर नहीं दिया। समधी की तरह नासमझ नहीं हैं।
खाना खाते समय एक बार फिर केतकी की बात आयी। `तुम कुछ भी कहो काका, मेरी भाभी के दुख का कोई अंत नहीं है। बचपन से मां नहीं है। अब बाप बीमार पड़ा तो बिस्तर में ही झा़डा-पेशाब सब कुछ। चार-चार बेटे, पर कोई नहीं पूछता। भाभी रोती रहती है। कहती है, काश भगवान ने मुझे लड़का बनाया होता तो मेरे बाप की यह दुर्दशा नहीं होती। मैं कहती हूं, भाभी! तू लड़का पैदा हुई होती तो अपने भाइयों से कोई अलग होती?' समग्र पुरुष समाज के नाम लड़की का अभियोग।
रसानंद बाबू को अब तक पता नहीं था कि समारू बिस्तर पकड़ चुका है। पिछले महीने तो वे गांव गये थे। किसी ने भी नहीं कहा। पर उन्होंने खुद भी तो कभी प्रयत्न नहीं किया, अपने बचपन के दोस्त के बारे में जानने का। आज किस मुंह से कहेंगे, समारू उसके बचपन का साथी है, पर गांव में उससे कभी मुलाकात तक नहीं होती। इतनी होशियार लड़की, उपन्यास के जासूस की तरह उनकी चालबाज़ी को पकड़ भी चुकी होगी। रसानंद बाबू के मन में भय सा पैदा हो गया।
`तुम लोग एक बार पदमपुर आओ बेटी! दो दिन रहकर जाओ। अच्छा लगेगा। तेरी काकी भी बहुत खुश होगी।' रसानंद बाबू के मन में अंदेशा हुआ, यह उनकी मन की बात नहीं है। समारू की चर्चा को टालने की मनसा से उन्होंने यह निमंत्रण दिया है। अपनी चालबाज़ी के लिए लड़की के आगे आत्म-समर्पण करने से पहले मानों वे उसके हाथों घूस थमा रहे थे।
शरीर में थकान थी, पेट में भूख। खाना भी खूब स्वादिष्ट था। गरम भात, आलू, केले का भर्ता (चोखा) अचार, झोल (शोरबा) और हरी मिर्च। देगची से भात निकालते हुए उन्हें डर लग रहा था, बच्चे के लिए कुछ बचेगा तो, या लोभवश सारा भात अकेले उंड़ेल लेंगे।
भोजन के बाद रसानंद बाबू फिर कुछ देर के लिए सो गए। जब तक उनकी नींद खुली, जंवाई वापस खेत पर जा चुका था। मेहमान की खातिरदारी के लिए उसके पास समय कहां है? मुंह-हाथ धोने के बाद रसानन्द बाबू भी निकल पड़े। निकलने से पहले लड़की को एक बार फिर परिवार सहित पदमपुर आने का निमंत्रण दिया। आने का दिन भी तय कर गये। निमंत्रण कोई बनावटी नहीं है, यह सिद्ध करने के लिए इससे ज्यादा और कह भी क्या सकते थे!
इस घटना के दो महीने बाद सचमुच अपना परिवार लिए लड़की पदमपुर पहुंची। घर में पहुंचते ही एक थैला लड़की ने काकी के हाथ थमा दिया। उसमें आठ-दस कच्चे केले, दो पाव मूढ़ी-धान (लाई), एक किलो के माफिक परवल और अलग से कुछ पुड़ियाआें में सुखुआ (सूखी) मादल (मछली)। अपने पति की ओर इशारा करते हुए उसने कहाज्ञ् `समझे, काका! तुम्हारे जंवाई के साथ मेरा खूब झगड़ा हुआ, कह रहे थे, ये सब क्या ले रही हो। शहर में क्या कोई ऐसी चीजें खाता है?' मैंने कहाज्ञ् `काका-काकी मेरे गांव के लोग हैं। शहर में रह रहे हैं तो क्या, गांव का खाना भूल जाएंगे। उनके घर में क्या पेड़े-रसगुल्ले की कमी है, जो हम यहां से लेकर जाएं।'
पहली मुलाकात में ही रसानंद बाबू की पत्नी ने लड़की और उसके परिवार को एकदम अपना लिया। बोलने लगीज्ञ् `तुम ठहरी बेटी, मां के घर जब बेटी आती है, तो क्या कभी कुछ लेकर आती है?' रसानंद बाबू ने कहाज्ञ् `परवल उनको बहुत पसंद है।' केले की उन्नत आकृति देखकर पत्नी ने आश्र्चर्य जताया। लड़की और उसके पति आश्वस्त हुए। साथ में `कुछ' नहीं लाने की ग्लानि उन्हें खा नहीं गयी। दो दिन में ही वे लोग रसानंद बाबू के परिवार के साथ घुल-मिल गये। पत्नी ने जिस आत्मीयता से उन लोगों के साथ बातचीत की, रसानंद बाबू आश्र्चर्यचकित रह गए। महिलाएं सचमुच बहुत ही बुद्धिमती होती हैं। परिस्थिति के साथ ताल मिलाकर चलने में वे हमेशा पुरुष से ज्यादा पारंगत मालूम पड़ती हैं। लगता है जैसे वर्षों से वह उन लोगों को जानती हो।
इस बीच दो बार लड़की ने घर में झाड़ू लगा दी। एक स्टूल पर चढ़कर लंबी झाड़ू से ऊपर का जाला भी साफ कर दिया। आंगन में मिट्टी का एक चूल्हा बनाने का उसने प्रस्ताव रखा यह कहकर कि कभी कभार काकी उस पर मूढ़ी (लाई) भूजेंगी। उसके लिए केवल उसे एक फावड़ा चाहिए। दूसरी ओर जवांई को भी फावड़ा चाहिए। बाहर एक गड्ढा खोद देगा, बची-खुची साग-सब्जी उसमें डालते जाओ, अच्छी खाद बन जाती है। अपनी बगिया में कुछ लगा लो, तो सरकारी खाद की जरूरत नहीं होती है। अपनी बगिया की सब्जी में जो मिठास है, बाज़ार की सब्जी में कहां?
पत्नी बीच-बीच में उन्हें रोक रही थी। `मां के घर पर कभी बेटी-जवांई काम करते हैं?' उसकी बातों को लड़की अनसुना कर देती थी। `यह भला कोई काम है? मां की मदद बेटी नहीं करेगी तो और कौन करेगा?' एक-दो बार रसानंद बाबू ने भी उन्हें रोका। पर, उनके रोकने में दम नहीं था। `मेरी अपनी बेटियां भी तो गरमी-दशहरे में जब आती हैं, अपनी बूढ़ी मां की मदद करती हैं।' पर, उन्हें अहसास हुआ कि ये तर्क वे लड़की को अपनी बेटी मानकर नहीं दे रहे थे, पत्नी का काम यथासंभव कम करने के स्वार्थ से दे रहे थे। अपने ओछेपन को वे पहचान पाये। फिर भी लड़की और उसके पति को काम करने से जोर देकर रोका नहीं, चुप रहे।
रात को लड़की और उसके पति में काफी देर तक फुसर-फुसर चली। रसानंद बाबू की पतली नींद। पास के कमरे में वे लेटे हुए थे। न चाहते हुए भी उन दोनों की बातें उनके कानों तक आ रही थीं। यहां मेहमान होकर आने के अलावा पदमपुर में उन लोगों का एक और बड़ा काम है। बाज़ार से कपड़े खरीदना। बात चल रही थी किसके लिए कपड़े खरीदे जाएं। बेटे के लिए पैंट-शर्ट या फिर `लड़की' के लिए साड़ी या पति के लिए धोती। लड़की का तर्क थाज्ञ् `मैं तो घर पर रहती हूं। तुमको कई बार आना होता है पदमपुर बाजार। सब्जी बेचने या फिर कुछ न हुआ तो साहू की बैलगाड़ी के साथ। हाट में काका के साथ इस फटी हुई धोती में भेंट हो जाए तो मेरी और क्या इज्जत रह जाएगी। घूम-घामकर बात भाभी के कानों में पड़ेगी।' सुनते ही उसका पति बिगड़ गयाज्ञ् `फालतू की बात मत कर, किसी की नज़र मुझ पर नहीं पड़ेगी। तू फटा पहनेगी तो लोग तुझ पर नहीं मुझ पर हंसेंगे।' लड़की ने कहाज्ञ् `मैं कह नहीं रही थी, गागर को गणेशिया के घर गिरवी रख देते हैं। पदमपुर जब जा ही रहे हैं, सबके लिए थोड़ा-बहुत कपड़ा ले आयेंगे। तुमने तो मना कर दिया। प्रधान के घर बर्तन मांजकर मैं दो महीने में गागार निकाल लाती।' जवांई ने कहाज्ञ् `छोड़ो भी, बेटे के इक्कीसवें पर उसके मामू ने जो पीतल की थाली दी थी, वह क्या निकल पायी! इसलिए मैं कहता हूं चीज़ें गिरवी रखने का कोई मतलब नहीं है। बेच दो तो कम से कम ठीक-ठाक दाम तो मिल जाएंगे।' लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। अंतत: तय हुआ बेटे के कपड़े अगली बार खरीदेंगे। लड़की के लिए आठ हाती (आठ हाथ का) एक थान कपड़ा लेंगे और जवऎंई के लिए एक गंड (मोटे कपड़े) चार हाती (चार हाथ का) गमछा बारिश के दिनों में जरूरत पड़ने पर पहना भी जा सकेगा। कपड़े खरीदने की बात तय होने के बाद लड़की ने प्रस्ताव रखा काका के साथ दुकान पर जाएंगे, तनिक सस्ता मिल जाएगा। जवांई को यह बात पसंद नहीं आयी। `बड़ी दुकान में जाने के लिए पैसे होने चाहिए। काका के आगे मोल-भाव करना भी अच्छा नहीं लगेगा।' आखिर में तय हुआ, काका के घर से निकल जाने पर वे लोग बाज़ार जाएंगे। खरीदारी के बाद वहां से सीधे घर चल देंगे। रिश्तेदारों के आगे खरीदारी करके आदमी को अपमानित नहीं होना चाहिए।
रसानंद बाबू सारी बातें सुनते रहे। पति-पत्नी की बातों में कोई अस्वाभाविकता दिखाई नहीं पड़ी। परिवार की पूरी आस रहती है, थोड़ी-सी खेती के ऊपर। कभी धान को बंगी कीड़े खा गये, तो कभी सूखे की चपेट में सारी खेती लुट गयी। छोटे किसान हैं ये लोग अनायास बेचारे मजदूरी के स्तर पर उतर आते हैं। पेट काटकर साग-सब्जी को बाज़ार में बेचेंगे। अपनी खेती का काम जल्द खत्म करते ही दूसरे के खेतों पर काम करेंगे। उसके बाद ही साल भर के लिए कपड़ा-लत्ता खरीदेंगे, शादी-ब्याह में शामिल होंगे। दशहरा और रथयात्रा के लिए चंदा देंगे। क्या धूप, क्या बरसात! चींटी की तरह एक-एक दाना जोड़ रहे होंगे। उसके बावजूद गिरवी रखा बरतन निकलता नहीं, डूब जाता है। छत की टूटी हुई खपरैल के बदले घास-फूस लगाते हैं। कभी किसी के बीमार पड़ जाने पर ज़मीन भी चली जाती है। सब कुछ सरल, स्वाभाविक छंदहीन है इनका संसार। जन्म, मृत्यु, बाढ़ और सूखे की तरह।
रसानंद बाबू को याद आया, दशहरे में देने के लिए दोनों बेटियों के लिए साड़ी खरीदकर रखी थी। छोटी बेटी के दादा ससुर चल बसे, बेटी आयी नहीं। श्राद्ध के बाद आएगी। उसकी साड़ी रखी हुई है। दुकान में लौटाई नहीं। उस साड़ी को इस लड़की को दे दें तो? पत्नी के आगे प्रस्ताव रखने का साहस नहीं हुआ, मना कर देगी तो? रहने दो, रसानंद बाबू ने करवट बदली। आजकल नींद नहीं आती आसानी से। कभी-कभी तो सारी रात कट जाती है। सब उम्र का ही दोष है। पत्नी के आगे प्रस्ताव न रखने के पीछे केवल पत्नी का डर ही क्या एकमात्र कारण है? या साथ में अपनी कंजूसी भी। छोड़ो भी, ये लोग खेत में काम करते हैं, मोटी साड़ी पहनते हैं। महंगी-पतली साड़ी से इनका काम नहीं बनेगा। रसानंद बाबू को याद आया। मजदूरों को नाश्ता बांटते हुए, मां ठीक इसी तरह के तर्क दिया करती थीज्ञ् महीन चावल के भात इनको हजम नहीं होते हैं, ये ठहरे मजदूर लोग, मोटे चावल का भात इन्हें अच्छा लगता है।
सुबह नाश्ते में पत्नी ने पूड़ियां बनाई थीं। साथ में रस्सेदार परवल की सब्जी। केवल खास मेहमानों के लिए पत्नी इस तरह का नाश्ता बनाती है। पत्नी के सम्मान-बोध से रसानंद बाबू बहुत प्रसन्न हुए।
आखिर लड़की और उसके परिवार के जाने का समय हुआ। पत्नी ने कब से थैले में वह साड़ी डाल रखी है। रसानंद बाबू को शायद इस बात का पता भी न लगता, यदि लड़की थैले को देखते ही चिल्ला न उठती। मानों कुछ अप्रत्याशित सा घट गया। `न, न, ये क्या कर रही हो काकी। मैं बिलकुल नहीं लूंगी। मेरे पास तो कई साड़ियां हैं। मैं क्या करूंगी साड़ी का?' लड़की ने कहा।
`क्या बात कर रही हो तुम, तुम्हारे पास क्यों साड़ी की कमी होने लगी! पर, मां के घर से क्या बेटी कभी खाली हाथ लौटती है? लोग क्या कहेंगे मुझे?' पत्नी ने कहा। रसानन्द बाबू को लगा, पत्नी ने भी सुनी है इन लोगों की बातें। डर से रसानंद बाबू के आगे साड़ी देने का प्रस्ताव रख न सकी। उनसे छिपाकर साड़ी दे देने को तय किया था। बाद में रसानंद बाबू नाराज होते तो चुपचाप सह जाती।
काकी का तर्क सुनकर लड़की एक बार चुप रही। शायद सोच रही थी प्रतितर्क क्या रखेगी। फिर बोलीज्ञ् `ठीक है काकी, तूने दिया है मैं क्या इंकार करूंगी। यह साड़ी मैं रख रही हूं। अब मैं दे रही हूं अपनी बहनों को, रख लो, रखने से तू मना नहीं कर सकती क्योंकि मैं तुम्हें नहीं दे रही हूंं। दशहरे में जब मेरी बहनें आएंगी तो किसी एक को मेरी तरफ से दे देना।' लड़की ने साड़ी को काकी के हाथ में जबरदस्ती थमा दिया। अपने थैले के मुंह को इस तरह पकड़े रखा जैसे साड़ी उसके अन्दर जबरदस्ती घुस न जाए।
इसके बाद वे लोग घर से निकल गये। रसानंद बाबू ने उन लोगों के साथ-साथ कुछ देर तक जाना चाहा। पर वे पीछे रह गये। जवांई ने बेटे को कंधों पर बिठा रखा था। वह कह रहा था, `मैं तो बीच में डर सा गया, तू लोभ संभाल नहीं पाएगी। साड़ी रख लेगी।' लड़की बोलीज्ञ् `क्या बात करते हो तुम? मैं क्या इतनी बेवकूफ हूं? साड़ी ले आती तो मेरी क्या इज्जत रह जाती? वे समझते भूखे लोग हैं। साड़ी वसूलने के लिए रिश्ते बनाते हैं। मुझे कोई दरकार नहीं इस पाट साड़ी की। मेरी फटी साड़ी ही मेरे लिए अच्छी है।
रसानंद बाबू तमाम प्रयासों के बावजूद उनसे ताल नहीं मिला सके, पीछे रह गये। क्रमश: रसानंद बाबू और उन लोगों में फासला बढ़ता गया। वे लोग जल्दी-जल्दी पांव बढ़ा रहे थे, आसन्न विपत्ति से मुक्ति पाने की खुशी में। मूल्यवान कुछ न गंवाने के आनन्द में। खरीदारी खत्म करने के बाद शाम होने से पहले उन्हें घर पहुंचना होगा।
रविवार, अप्रैल 20, 2008
अब्दुल रहीम फ़रीदी कव्वाल की पेशकश !!!
तो सुनिये, ख्वाजा की जोगनिया मैं बन जाऊँगी ...
बस एक ही टीस है कि ऐसे बेमिसाल कलाकार आज के बाजार की माँग के आगे कैसे चलेंगे । क्या आपको भी यही टीस उठती है कभी कभी ?
भाग एक:
इसी कव्वाली का दूसरा भाग:
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साप्ताहिक डिपार्टमेण्ट सेमिनार की बखिया के उधडे धागे !!!
पिछले लगभग ६ वर्षों से मैं हर सप्ताह रासायनिक अभियांत्रिकी से सम्बन्धित (जैव-रासायनिकी, नैनो टेक्नालाजी आदि) कम से कम एक सेमिनार में उपस्थिति दर्ज कराता रहा हूँ । इस लिहाज से देखा जाये तो १५०-२०० सेमिनार सुन चुका हूँ (छुट्टियाँ हटाकर) । इन सब सेमिनारों में से कम से कम ३५-५०% सेमिनार मैने ध्यान से सुने होंगे । उनमें से भी १०-१५ % सेमिनारों के अन्त में मैने कोई प्रश्न पूछा होगा ।
कल ज्ञानदत्तजी ने पूर्वाग्रह और जडता की बात की थी, इन सेमिनारों में भी यही पूर्वाग्रह और जडता दिखती है । अगर सेमिनार बायो से सम्बन्धित है तो फ़्लूड-मेकेनिक्स वाले ध्यान नहीं देंगे । सेमिनार के बाद बोलेंगे कि बायो का पाखण्ड आजकल बहुत बढ गया है । बायो वाले बोलेंगे पूरी एक स्लाईड पर कठिन सी दिखने वाली Equations दिखाकर क्या समझाना चाहते हो ? फ़ंडिग के लिये नैनो के पाखण्ड की चर्चा तो हर कहीं है । आमतौर पर केवल सेमिनार का टाईटल सुनकर ही बहुत से फ़ैसला कर लेते है कि उसको ध्यान से सुनना भी है या नहीं । फ़िर अगर ध्यान से सुनो भी तो कुछ १०% सेमिनार ही होंगे जिनके बाद १-२ से अधिक प्रश्न पूछे गये हों ।
एक व्यक्ति जो उस क्षेत्र में शोध नहीं कर रहा होता है, द्वारा पूछा गया प्रश्न सबसे दिलचस्प होता है । जिस प्रश्न के अंत में स्पीकर यह कहे कि "ये बहुत उत्तम प्रश्न है", पक्का जानिये कि उस प्रश्न का सीधा जवाब स्पीकर कभी (>९० % मौकों पर ) नहीं देगा । घुमा फ़िराकर कुछ बात कही जायेगी और पूछने वाला भी शान्त हो जायेगा ।
इसके अलावा एक श्रोता के हिसाब से मुझे सेमिनार में प्रश्न पूछना बडा कठिन होता है । कभी कभी ध्यान से सुनने के बाद भी जेहन में कोई सवाल नहीं आते हैं । कभी कभी आपका प्रश्न कोई दूसरा पूछ देता है । कभी कभी कोई भी प्रश्न नहीं होता है और बेचारा स्पीकर और प्रोफ़ेसर शर्मसार होने लगते हैं । फ़िर ऐसे में कोई १-२ प्रोफ़ेसर सवाल पूछ्ने का उपक्रम करते हैं । कुछ सवाल इतने लंबे होते हैं और पूछ्ने वाला इतनी धीमी आवाज में पूछता है कि प्रश्न और उसके उत्तर में कोई साम्य नहीं दिखता । "फ़िलासाफ़िकली स्पीकिंग", से शुरू होने वाले प्रश्नों के उत्तर अधिकतर लम्बे खिंचते हैं और उनका पूछे गये प्रश्न से ताल्लुख कुछ कम ही होता है ।
लेकिन बीच बीच में कुछ इतने अच्छे सेमिनार सुनने को मिलते हैं कि मन वाह वाह कर उठता है । एक अच्छे सेमिनार के लिये उस विषय पर अच्छे अधिकार के साथ ही अच्छे प्रेजेन्टेशन स्किल्स की भी आवश्यकता होती है । इस बारे में विस्तार में फ़िर कभी...
पीएचडी कामिक्स डाट काम वालों ने इस मौके पर एक मस्त स्ट्रिप निकाली थी, उसी को यहाँ पर साभार पेश कर रहा हूँ
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