आइक महोदय रात को हमारे घर तशरीफ़ लाये लेकिन आने से थोडी देर पहले उन्होंने हमारी बत्ती गुल कर दी | लिहाजा आइक और हमने मोमबत्ती में गुफ्तगू की, हमने आइक को हिन्दी में एक ब्लॉग खोलने को कहा जिस पर वो विचार कर रहे हैं :-)
रात को बारह बजे बत्ती गुल हो गयी थी जो अभी तक गुल है, शायद अगले कुछ घंटों में सब ठीक हो जाए | सुबह उठकर अपना रेनकोट पहनकर हम जब आस पड़ोस के हाल का जायजा लेने निकले तो पता चला की काफ़ी नुक्सान हुआ है | हमारी कार के बिल्कुल बगल में पेड़ का एक बड़ा हिस्सा टूट कर गिरा लेकिन हमारी कार बाल बाल बच गयी | हमारे अपार्टमेन्ट के सामने एक पेड़ जमीन पर लगभग समतल पडा था | और पेट्रोल पम्प की छत उड़ गयी थी और बाकी का हाल आप इन तस्वीरों से देख लें :-)
इस पोस्ट को मैं अपने मित्र के घर से लिख रहा हूँ जहाँ पता नहीं कैसे अभी तक बत्ती आ रही है :-) टेक्सास में लगभग ४० लाख लोगों के पास फिलहाल बिजली नहीं है लेकिन कल तक शायद सब ठीक हो जायेगा |
शनिवार, सितंबर 13, 2008
शुक्रवार, सितंबर 12, 2008
आशा भोंसले की आवाज में मदन मोहन के तीन अमर गीत !!!
जब जब मदन मोहन के संगीत का जिक्र होता है साथ में हमेशा लता मंगेशकरजी की बात होती है । ठीक उसी तरह ओ. पी. नैय्यर साहब के संगीत के साथ आशा भोसले का नाम अपने आप जुबां पर आ जाता है । लेकिन ये भी सत्य है कि आशा भोंसले ने भी मदन मोहन और गीता दत्त ने ओ. पी. नैय्यर के साथ अनेकों अनमोल नग्में गाये हैं ।
मदन मोहन जी के २० साल के संगीत के सफ़र में उनके साथ आशा भोंसले ने १९० और लता मंगेशकर ने २१० फ़िल्मी गीत गाये । कुछ दिन पहले आशा भोसले का जन्मदिन था लेकिन अपनी व्यस्तता के चलते मैं कुछ पोस्ट नहीं कर पाया । आशाजी और मदन मोहन के अनमोल नग्मों में से मेरे कुछ पसंदीदा गीत हैं ।
१) सबा से ये कह दो कि कलिया बिछायें (बैंक मैनेजर)
२) जमीं से हमें आसमा पर (अदालत)
३) अश्कों से तेरी हमने तस्वीर बनाई है (देख कबीरा रोया)
४) जाने क्या हाल हो कल शीशे का पैमाने का (मां का आंचल)
५) हमसफ़र साथ अपना छोड चले
६) कोई शिकवा भी नहीं, कोई शिकायत भी नहीं (नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे)
फ़िल्म "नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे" में तो मदनजी के सारे गीत आशाजी ने गाये और इस फ़िल्म का एक एक गीत अनमोल है । पहला नग्मा असल में एक गजल है, जाने क्या हाल हो कल शीशे का पैमाने का । इस गीत को सुनें और बस डूब के रह जायें ।
दूसरा गीत है, "सबा से ये कह दो कि कलियाँ बिछायें"
और तीसरा अनमोल नग्मा है, "कोई शिकवा भी नहीं"
आईक की हवायें बढती जा रही हैं और थोडी देर में शायद बिजली गुल हो जाये, इससे पहले इस पोस्ट को छाप देते हैं ।
मदन मोहन जी के २० साल के संगीत के सफ़र में उनके साथ आशा भोंसले ने १९० और लता मंगेशकर ने २१० फ़िल्मी गीत गाये । कुछ दिन पहले आशा भोसले का जन्मदिन था लेकिन अपनी व्यस्तता के चलते मैं कुछ पोस्ट नहीं कर पाया । आशाजी और मदन मोहन के अनमोल नग्मों में से मेरे कुछ पसंदीदा गीत हैं ।
१) सबा से ये कह दो कि कलिया बिछायें (बैंक मैनेजर)
२) जमीं से हमें आसमा पर (अदालत)
३) अश्कों से तेरी हमने तस्वीर बनाई है (देख कबीरा रोया)
४) जाने क्या हाल हो कल शीशे का पैमाने का (मां का आंचल)
५) हमसफ़र साथ अपना छोड चले
६) कोई शिकवा भी नहीं, कोई शिकायत भी नहीं (नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे)
फ़िल्म "नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे" में तो मदनजी के सारे गीत आशाजी ने गाये और इस फ़िल्म का एक एक गीत अनमोल है । पहला नग्मा असल में एक गजल है, जाने क्या हाल हो कल शीशे का पैमाने का । इस गीत को सुनें और बस डूब के रह जायें ।
दूसरा गीत है, "सबा से ये कह दो कि कलियाँ बिछायें"
और तीसरा अनमोल नग्मा है, "कोई शिकवा भी नहीं"
आईक की हवायें बढती जा रही हैं और थोडी देर में शायद बिजली गुल हो जाये, इससे पहले इस पोस्ट को छाप देते हैं ।
आईक, ह्य़ूस्टन में बिन बुलाये मेहमान !!!
अब लगभग निश्चित हो गया है कि आईक नामक बिना बुलाये मेहमान हमारे घर पर आने वाले हैं । लगभग ४ दिन पहले सी.एन.एन. ने घोषणा की थी कि आईक महाशय जो उस समय हैती (Haiti) और क्यूबा में डेरा डाले हुये थे, गैलवेस्टन और ह्यूस्टन पधार सकते हैं । उसके अगले ही दिन आईक के कार्यक्रम में बदलाव दिखा और वो दक्षिणी टेक्सास के शहर ब्राउन्सवेल/कार्पस की ओर जाते दिखे । लेकिन कल फ़िर आईक ने अपना मूड बदल लिया और शनिवार की सुबह १-२ बजे के आस पास आईक गैलवेस्टन के रास्ते टेक्सास में दाखिल होंगे । आईक का इरादा १२५-१३० मील प्रति घंटा (२००-२१० किमी प्रति घंटा) की हवाओं और काली घटाओं के गाजे बाजे के साथ टेक्सास में घुसने का है । गैलवेस्टन के निवासी तो आईक को मुँह चिढाते हुये घर बार छोडकर भाग गये हैं लेकिन ह्यूस्टन निवासी (समुद्र से लगभग ४० मील दूर) अर्थात मेरे जैसे लोग जो वीर और धीर हैं, आईक का स्वागत खुली बाहों से कर रहे हैं ।
अगर आप अब तक संशय में हैं कि ये आईक महोदय कौन हैं तो नीचे दिये हुये तीन चित्र देखें ।

(सोमवार को सी.एन.एन. का आईक के रास्ते का खुलासा करना, हमारा आशियाना ह्य़ूस्टन में है )

(गल्फ़ आफ़ मैक्सिको में आईक गोल गोल घूमकर कह रहे हैं, आओ ट्विस्ट करें ...)

(अब से कुछ घंटों बाद आईक हमारे मेहमान होंगे )
२००५ में रीटा नाम की आंटी भी बिना बुलाये ह्यूस्टन आने का विचार कर रहीं थी । रीटा आंटी से कुछ दिन पहले न्यू आर्लियन्स में कटरीना आंटी ने खूब तबाही मचायी थी । लोगों का बुरा हाल हो गया था और इससे डरकर वीर ह्य़ूस्टन वालों ने भी शहर से खिसकने की सोची थी । हम भी लोगों की बातों में आ गये और शहर से भागने लगे । लेकिन ४० लाख की आबादी वाले शहर के सब लोग भागने लगें तो सडके तो छोटी पड ही जायेंगी, वही हुआ । सब सडकों पर फ़ंसे रहे ।
हमने वीरता से १३ घंटे नान स्टाप अपने कार में केवल ५० किमी की दूरी तय की और सोचा इससे बेहतर है कि वापिस चलें । ५० किमी का वापिसी का सफ़र हमने केवल ३५ मिनट में पूरा कर लिया था क्योंकि वापिस जाने वाले पूरी सडक पर हम ही थे । उस समय लगा कि "जाने वाले जरा होशियार, यहाँ के हम हैं राजकुमार" :-)
आईक के आने पर कुछ चीजें निश्चित तौर पर होंगी । पहली की "ठंडी हवायें लहरा के आयें", फ़िर खिडकियों के शीशे जवानी के कच्चे दिल की तरह छन से टूट सकते हैं, तीसरी "उमड उमड के आयी रे घटा" और उसके साथ ही जोरदार बरसात ।
ये किसने अपनी जुल्फ़ से झटका पानी,
झूम के आया बादल टूट के बरसा पानी ।
इसके साथ ही आस पास के इलाकों के कुछ पेड उखडकर बिजली के तारों पर गिर जायेंगे और बत्ती गुल हो जायेगी । बत्ती गुल होने के साथ ही थोडी देर में पानी भी गुल जो जायेगा और उसके बाद खुदा खैर करे :-)
इस बार ह्य़ूस्टन के अधिकतर लोग शहर से भाग नहीं रहे हैं लेकिन थोडा अफ़रातफ़री का माहौल है । मैने ३-४ दिनों के लिये पानी खरीद कर रख लिया है, अपकी कार की टंकी पूरी भर ली है और थोडा बहुत खाने का सामान रख लिया है । मुझे पूरा विश्वास है कुछ खास नहीं होगा, आईक और हम बैठकर बालकनी में साथ में चाय पीयेंगे और उन्हें विदा कर देंगे । आईक को एक हिन्दी ब्लाग खोलने की सलाह भी दी जायेगी और विश्वास दिलाया जायेगा कि समीरजी उनको टिप्पणी अवश्य देंगे ।
इस बीच में आज स्कूल से छुट्टी हो गयी है और ब्लागिंग करने का मौका मिल गया है । एक ब्लागर को आईक से भला क्या शिकायत हो सकती है :-)

मौसम विभाग ने सैटेलाइट से ऊपर वाली तस्वीर उतारी है । जिस प्रकार से तस्वीर दिख रही है गैलवेस्टन की हालत अच्छी नहीं लग रही है । गैलवेस्टन के ९०% से अधिक लोग शहर छोड चुके हैं और जो लोग वहाँ रूके हुये हैं, ईश्वर उनकी सहायता करे ।
ताजा जानकारी के अनुसार लगभग १५०,००० घरों में बिजली जा चुकी है । ह्यूस्टन का पडौसी नगर गैलवेस्टन बडी गम्भीर समस्या से जूझ रहा है । वहाँ के काफ़ी घरों में पहले ही पानी घुस चुका है और अगले तीन-चार घंटो में वहाँ १५-२० ऊँची समुद्री लहरें शहर में घुस सकती हैं । मेरे शहर ह्यूस्टन में पानी मुख्य समस्या नहीं होगी लेकिन तेज हवायें काफ़ी नुकसान कर सकती हैं ।
अगर आप अब तक संशय में हैं कि ये आईक महोदय कौन हैं तो नीचे दिये हुये तीन चित्र देखें ।
(सोमवार को सी.एन.एन. का आईक के रास्ते का खुलासा करना, हमारा आशियाना ह्य़ूस्टन में है )
(गल्फ़ आफ़ मैक्सिको में आईक गोल गोल घूमकर कह रहे हैं, आओ ट्विस्ट करें ...)
(अब से कुछ घंटों बाद आईक हमारे मेहमान होंगे )
२००५ में रीटा नाम की आंटी भी बिना बुलाये ह्यूस्टन आने का विचार कर रहीं थी । रीटा आंटी से कुछ दिन पहले न्यू आर्लियन्स में कटरीना आंटी ने खूब तबाही मचायी थी । लोगों का बुरा हाल हो गया था और इससे डरकर वीर ह्य़ूस्टन वालों ने भी शहर से खिसकने की सोची थी । हम भी लोगों की बातों में आ गये और शहर से भागने लगे । लेकिन ४० लाख की आबादी वाले शहर के सब लोग भागने लगें तो सडके तो छोटी पड ही जायेंगी, वही हुआ । सब सडकों पर फ़ंसे रहे ।
हमने वीरता से १३ घंटे नान स्टाप अपने कार में केवल ५० किमी की दूरी तय की और सोचा इससे बेहतर है कि वापिस चलें । ५० किमी का वापिसी का सफ़र हमने केवल ३५ मिनट में पूरा कर लिया था क्योंकि वापिस जाने वाले पूरी सडक पर हम ही थे । उस समय लगा कि "जाने वाले जरा होशियार, यहाँ के हम हैं राजकुमार" :-)
आईक के आने पर कुछ चीजें निश्चित तौर पर होंगी । पहली की "ठंडी हवायें लहरा के आयें", फ़िर खिडकियों के शीशे जवानी के कच्चे दिल की तरह छन से टूट सकते हैं, तीसरी "उमड उमड के आयी रे घटा" और उसके साथ ही जोरदार बरसात ।
ये किसने अपनी जुल्फ़ से झटका पानी,
झूम के आया बादल टूट के बरसा पानी ।
इसके साथ ही आस पास के इलाकों के कुछ पेड उखडकर बिजली के तारों पर गिर जायेंगे और बत्ती गुल हो जायेगी । बत्ती गुल होने के साथ ही थोडी देर में पानी भी गुल जो जायेगा और उसके बाद खुदा खैर करे :-)
इस बार ह्य़ूस्टन के अधिकतर लोग शहर से भाग नहीं रहे हैं लेकिन थोडा अफ़रातफ़री का माहौल है । मैने ३-४ दिनों के लिये पानी खरीद कर रख लिया है, अपकी कार की टंकी पूरी भर ली है और थोडा बहुत खाने का सामान रख लिया है । मुझे पूरा विश्वास है कुछ खास नहीं होगा, आईक और हम बैठकर बालकनी में साथ में चाय पीयेंगे और उन्हें विदा कर देंगे । आईक को एक हिन्दी ब्लाग खोलने की सलाह भी दी जायेगी और विश्वास दिलाया जायेगा कि समीरजी उनको टिप्पणी अवश्य देंगे ।
इस बीच में आज स्कूल से छुट्टी हो गयी है और ब्लागिंग करने का मौका मिल गया है । एक ब्लागर को आईक से भला क्या शिकायत हो सकती है :-)

मौसम विभाग ने सैटेलाइट से ऊपर वाली तस्वीर उतारी है । जिस प्रकार से तस्वीर दिख रही है गैलवेस्टन की हालत अच्छी नहीं लग रही है । गैलवेस्टन के ९०% से अधिक लोग शहर छोड चुके हैं और जो लोग वहाँ रूके हुये हैं, ईश्वर उनकी सहायता करे ।
ताजा जानकारी के अनुसार लगभग १५०,००० घरों में बिजली जा चुकी है । ह्यूस्टन का पडौसी नगर गैलवेस्टन बडी गम्भीर समस्या से जूझ रहा है । वहाँ के काफ़ी घरों में पहले ही पानी घुस चुका है और अगले तीन-चार घंटो में वहाँ १५-२० ऊँची समुद्री लहरें शहर में घुस सकती हैं । मेरे शहर ह्यूस्टन में पानी मुख्य समस्या नहीं होगी लेकिन तेज हवायें काफ़ी नुकसान कर सकती हैं ।
मंगलवार, अगस्त 19, 2008
सहजता,कहीं मोल मिलती है क्या?
कभी ट्रेन के डिब्बे में अंग्रेजी किताब पढ़ने वाला इसलिए असहज कि लोग सोच रहे होंगे कि ये टशन मारने के लिए अंग्रेजी की किताब पढ़ रहा है जबकि मैं तो रोज ही अंग्रेजी की किताब पढता हूँ। कभी वो ये सोचकर असहज कि ये आम लोग कभी समझ नहीं पायेंगे कि इस अंग्रेजी की किताब में ऐसा क्या है जो में इसे पढ़ रहा हूँ। ट्रेन में हिन्दी कि किताब पढ़ने वाला इसलिए असहज कि कहीं लोग ये न सोच रहे हो कि मैं गंवार हूँ जबकि मेरी अंग्रेजी उतनी ही अच्छी है जितनी हिन्दी । कभी वो ये सोचकर असहज कि आजकल मेरे जैसे लोग हैं ही कहाँ जो हिन्दी कि किताबे पढ़ते हैं, सब मैकाले की औलादें हैं। मेरा बस चले तो सबकी अंग्रेजियत एक बार में निकाल दूं ।
कभी इस बात का दंभ कि मैं तो हिन्दी पढ़ रह हूँ डंके की चोट पर, जिसे गंवार कहना हो कह ले मुझे परवाह नहीं।
कहाँ मेरे स्कूल में चीनी विद्यार्थी की कमजोर अंग्रेजी के कारण एक साधारण सी बात को जरा तकलीफ़ से समझाने के बाद उसके चेहरे पर आयी सहज मुस्कान और कहाँ किसी अंग्रेजीदां नौजवान की दिल्ली के कैफ़े काफ़ी डे में अमेरिकन एक्सेंट में बातचीत के दौरान असहजता से "डैम इट" और "होली शिट" ।
कहाँ है इसके बीच में मेरा नायक जो सहजता से अपनी अंगरेजी कि किताब बंद करके स्टेशन पर उतरकर वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास खरीदकर उतनी ही सहजता से पढता है । न तो वो बात बात में काले फिरंगियों को गरियाता है और न ही उन्ही की भाषा में बात करता है ? आपने मेरे नायक को कहीं देखा है ?
कभी इस बात का दंभ कि मैं तो हिन्दी पढ़ रह हूँ डंके की चोट पर, जिसे गंवार कहना हो कह ले मुझे परवाह नहीं।
कहाँ मेरे स्कूल में चीनी विद्यार्थी की कमजोर अंग्रेजी के कारण एक साधारण सी बात को जरा तकलीफ़ से समझाने के बाद उसके चेहरे पर आयी सहज मुस्कान और कहाँ किसी अंग्रेजीदां नौजवान की दिल्ली के कैफ़े काफ़ी डे में अमेरिकन एक्सेंट में बातचीत के दौरान असहजता से "डैम इट" और "होली शिट" ।
कहाँ है इसके बीच में मेरा नायक जो सहजता से अपनी अंगरेजी कि किताब बंद करके स्टेशन पर उतरकर वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास खरीदकर उतनी ही सहजता से पढता है । न तो वो बात बात में काले फिरंगियों को गरियाता है और न ही उन्ही की भाषा में बात करता है ? आपने मेरे नायक को कहीं देखा है ?
मंगलवार, अगस्त 12, 2008
मेरे वालिद कहा करते थे कि बेटा इश्क करो !!!
आज "बज्म-ए-मीर" अल्बम से रूप कुमार राठौड की आवाज में एक नाजुक सी गजल पेश करता हूँ । गजल से पहले मीर की आत्मकथा "जिक्र-ए-मीर" के कुछ अंश सलीम आरिफ़ की आवाज में हैं जो मुझे बेहद पसन्द हैं ।
मेरे वालिद रोजो शब खुदा की याद में रहते थे,
कभी मौज में आते तो फ़रमाते थे कि बेटा इश्क करो,
इश्क ही इस कारखाने में मुतस्सर्रिफ़ है,
अगर इश्क न होता तो नज्म-ए-गुल कायम नहीं रह सकता था ।
बेइश्क जिंदगी बवाल है,
इश्क में जी की बाजी लगा देना कमाल है,
इश्क बनाता है इश्क ही कुंदन कर देता है
दुनिया में जो कुछ है इश्क का जरूर है,
आग इश्क की सोजिश है पानी इश्क की रफ़्तार है,
खाक इश्क का करार है हवा उसका इस्तेरार है,
मौत इश्क की मस्ती और जिन्दगी उसकी हुश्यारी है,
रात इश्क का ख्वाब और दिन इश्क की बेदारी है,
नेकी इश्क का कुर्ब है गुनाह इश्क की दूरी है,
जन्नत इश्क का शौक है दोजख इश्क का जौक है ।
कौन मकसद को इश्क बिन पँहुचा,
आरजू इश्क, मुद्दआ है इश्क, सारे आलम में भर रहा है इश्क ।
- मीर तकी मीर
मेरे वालिद रोजो शब खुदा की याद में रहते थे,
कभी मौज में आते तो फ़रमाते थे कि बेटा इश्क करो,
इश्क ही इस कारखाने में मुतस्सर्रिफ़ है,
अगर इश्क न होता तो नज्म-ए-गुल कायम नहीं रह सकता था ।
बेइश्क जिंदगी बवाल है,
इश्क में जी की बाजी लगा देना कमाल है,
इश्क बनाता है इश्क ही कुंदन कर देता है
दुनिया में जो कुछ है इश्क का जरूर है,
आग इश्क की सोजिश है पानी इश्क की रफ़्तार है,
खाक इश्क का करार है हवा उसका इस्तेरार है,
मौत इश्क की मस्ती और जिन्दगी उसकी हुश्यारी है,
रात इश्क का ख्वाब और दिन इश्क की बेदारी है,
नेकी इश्क का कुर्ब है गुनाह इश्क की दूरी है,
जन्नत इश्क का शौक है दोजख इश्क का जौक है ।
कौन मकसद को इश्क बिन पँहुचा,
आरजू इश्क, मुद्दआ है इश्क, सारे आलम में भर रहा है इश्क ।
- मीर तकी मीर
शुक्रवार, अगस्त 08, 2008
यूट्यूबीय विशुद्ध मौज वाली पोस्ट !!!!
ये वीडियो कुछ दिन पहले देखा लेकिन परम मस्त लगा ।
स्लो इंटरनेट कनेक्शन वालों से क्षमायाचना सहित, केवल आडियो लगाने से मजा नहीं आयेगा :-)
स्लो इंटरनेट कनेक्शन वालों से क्षमायाचना सहित, केवल आडियो लगाने से मजा नहीं आयेगा :-)
मंगलवार, जुलाई 29, 2008
वारिस शाह की हीर: एक सुनहरा अंदाज !
पिछली बार जब वारिस शाह को वडाली बंधुओं की आवाज में सुनवाया था तो काफ़ी लोगों ने "हीर" सुनने में भी दिलचस्पी दिखाई थी | वारिस शाह की हीर को लगभग हर पंजाबी गायक ने गाया है लेकिन कुछ ख़ास गायकी ही हीर की आत्मा और उसके दर्द को जिंदा कर पाती है |
आबिदा परवीन ने बड़े अच्छे अंदाज़ में हीर गाया है लेकिन पाकिस्तानी गायक "इनायत हुसैन भट्टी" साहब की आवाज में हीर सुनकर लगता है कि हीर की कहानी सिर्फ़ एक किस्सा ही नहीं हकीकत में सामने घट रही है |

लेकिन आज हम आपको एक नए अंदाज़ में हीर सुनवायेंगे | इन साहब के बारे में सिर्फ़ इतना पता है कि ये वारिस शाह के दरबार में बैठकर अपनी मौज में हीर गाते हैं | न नाम का पता है और न कोई और ठिकाना | लेकिन हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में ऐसे कलाकार हर शहर/कस्बे/गाँव में बिखरे पड़े हैं जो प्रसिद्धि नहीं पा पाते | आज हम सलाम करते हैं ऐसे ही कलाकारों को और उनकी याद में समर्पित है आज की ये पोस्ट !!!
जो यूट्यूब पर इन्टरनेट की धीमी रफ़्तार के कारण वीडियो न देख सकें उनके लिए आडियो और गायक की तस्वीर भी पेश है |
इस फ़कीर की गायिकी और हीर की आत्मा को महसूस करने के लिए पंजाबी भाषा का आना कोई जरूरी नहीं है | इस आडियो की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है लेकिन अगर आप हैड फोन लगाकर सुनेंगे अथवा वाल्यूम को बीच बीच में माडरेट करते रहेंगे तो बहुत आनंद आयेगा | सुनते समय आंख बंद कर सकें तो कहने ही क्या :-)
इस दूसरे वीडियो को भी देखने का कष्ट करें, मेरा दावा है कि आप निराश नहीं होंगे |
आबिदा परवीन ने बड़े अच्छे अंदाज़ में हीर गाया है लेकिन पाकिस्तानी गायक "इनायत हुसैन भट्टी" साहब की आवाज में हीर सुनकर लगता है कि हीर की कहानी सिर्फ़ एक किस्सा ही नहीं हकीकत में सामने घट रही है |
लेकिन आज हम आपको एक नए अंदाज़ में हीर सुनवायेंगे | इन साहब के बारे में सिर्फ़ इतना पता है कि ये वारिस शाह के दरबार में बैठकर अपनी मौज में हीर गाते हैं | न नाम का पता है और न कोई और ठिकाना | लेकिन हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में ऐसे कलाकार हर शहर/कस्बे/गाँव में बिखरे पड़े हैं जो प्रसिद्धि नहीं पा पाते | आज हम सलाम करते हैं ऐसे ही कलाकारों को और उनकी याद में समर्पित है आज की ये पोस्ट !!!
जो यूट्यूब पर इन्टरनेट की धीमी रफ़्तार के कारण वीडियो न देख सकें उनके लिए आडियो और गायक की तस्वीर भी पेश है |
इस फ़कीर की गायिकी और हीर की आत्मा को महसूस करने के लिए पंजाबी भाषा का आना कोई जरूरी नहीं है | इस आडियो की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है लेकिन अगर आप हैड फोन लगाकर सुनेंगे अथवा वाल्यूम को बीच बीच में माडरेट करते रहेंगे तो बहुत आनंद आयेगा | सुनते समय आंख बंद कर सकें तो कहने ही क्या :-)
इस दूसरे वीडियो को भी देखने का कष्ट करें, मेरा दावा है कि आप निराश नहीं होंगे |
रविवार, जुलाई 27, 2008
एक दिन की मजदूरी का मजा !!!
आज हमारे स्कूल के १४ विद्यार्थियों ने मिलकर "हैबिटेट फ़ॉर ह्यूमैनिटी" नामक एक संस्था के लिये एक दिन मजदूरी करने का बीडा उठाया । "हैबिटेट फ़ॉर ह्यूमैनिटी" अमेरिका के अनेक स्थानों पर कम भाग्यशाली और अपेक्षाकृत कम पैसे वाले परिवारों के लिये मकानों का निर्माण करती है । मकानों को बनाने का कच्चा सामान और औजार "हैबिटेट फ़ॉर ह्यूमैनिटी" खरीदती है और मकानों का निर्माण/रंगायी पुतायी आदि का काम स्वयंसेवक (Volunteers) करते हैं । हम सब लोग सुबह ७ बजे निश्चित स्थान पर पंहुच गये और वहाँ अपने समूह का पंजीकरण करवाने के बाद हमको १० मिनट की सुरक्षा सम्बन्धी सलाह दी गयी और उसके बाद काम चालू हो गया । हमारी टीम जिस मकान पर काम कर रही थी वो अपने निर्माण के पहले चरण में था । यहाँ पर मकानों के निर्माण में ईट/गारे/सीमेंट के स्थान पर लकडी का अधिकाधिक प्रयोग होता है । हमारा पहला काम था कि मकान की दीवारों के लिये लकडी के ढांचे खडे करना ।


इसके लिये जमीन पर पूरा ब्लू प्रिंट सरीखा बना हुआ था और लकडी के हर ढांचे पर उसका नंबर अंकित था । बस E1 को E1 के स्थान पर रखकर E2 और E3 से जोड मिलाते हुये कीलें ठोंककर अपने स्थान पर जमा दो । कील ठोंकने के तीन इन्तजाम थे । बडी कीलों (तकरीबन २.५ इंच लम्बी) के लिये Nail Gun थी । इस Nail Gun को आप एक स्टेपलर की तरह समझ लें जो लकडी में लम्बी लम्बी कीलों को एक झटके में लगा देती थी । दूसरी Nail Gun इससे भी खतरनाक थी, इसका काम लम्बी (तकरीबन ३.५ इंच लम्बी) कील को लकडी से होते हुये कंक्रीट के चबूतरे में फ़िक्स करना था । इसके क्रियाविधी एकदम बन्दूक के जैसी थी, इसमें बन्दूक की मैगजीन की तरह बारूद की एक मैगजीन लगती है । ट्रिगर दबाने से बारूद में विस्फ़ोट होता है और इससे उत्पन्न हुआ दवाब कील को लकडी से होती हुये कंक्रीट में पैबस्त कर देता है । इसके बाद वाला काम सबसे मेहनत का था जिसमें छोटी छोटी कीलों (१.५ इंच) को हाथ के हथौडे से नियत स्थान पर बैठाना था । जैसा कि आप ऊपर वाले चित्र में देख सकते हैं । आज मैने कम से कम १२०-१५० कीलों को अपने मजबूत हाथों से उनके स्थान पर लगाया :-)
आज ह्यूस्टन की गर्मी अपने चरम पर थी और तापमान लगभग ४० डिग्री और आद्रता (Humidity) ६० प्रतिशत थी । हम लोगों के लिये ठंडे पानी का बंदोबस्त था । आज ४ अलग अलग मकानों पर काम चल रहा था और विभिन्न समूहों के लगभग ८० लोग काम पर लगे हुये थे । कुछ लोग सपरिवार आये हुये थे जिनसे मिलकर बडा अच्छा लगा । ह्यूस्टन की एक बडी दुकान (Mattress Firm) के लगभग २५ लोग साथ में आये हुये थे जिसमें काफ़ी लडकियाँ भी थी जो कन्धे से कन्धे मिलाकर लकडी उठा रही थीं और कील पर बेरहमी से हथौडा पटक रही थीं :-)
हम लोगों ने खुली धूप में सुबह ७ बजे से दोपहर १२ बजे तक काम किया और फ़िर "हैबिटेट फ़ॉर ह्यूमैनिटी" वालों ने गर्मी के चलते काम बन्द करवा दिया । इसके बाद हम सब लोगों ने साथ बैठकर अपने सैंडविच खाये और फ़िर घर वापिस लौट गये । हमारे स्कूल के साथियों ने अगस्त में फ़िर से एक बार यहाँ आकर काम करने का फ़ैसला लिया और सभी ने इसे ध्वनिमत से स्वीकार किया । बाकी आप फ़ोटो देखकर खुद ही समझ जायेंगे ।



इसके लिये जमीन पर पूरा ब्लू प्रिंट सरीखा बना हुआ था और लकडी के हर ढांचे पर उसका नंबर अंकित था । बस E1 को E1 के स्थान पर रखकर E2 और E3 से जोड मिलाते हुये कीलें ठोंककर अपने स्थान पर जमा दो । कील ठोंकने के तीन इन्तजाम थे । बडी कीलों (तकरीबन २.५ इंच लम्बी) के लिये Nail Gun थी । इस Nail Gun को आप एक स्टेपलर की तरह समझ लें जो लकडी में लम्बी लम्बी कीलों को एक झटके में लगा देती थी । दूसरी Nail Gun इससे भी खतरनाक थी, इसका काम लम्बी (तकरीबन ३.५ इंच लम्बी) कील को लकडी से होते हुये कंक्रीट के चबूतरे में फ़िक्स करना था । इसके क्रियाविधी एकदम बन्दूक के जैसी थी, इसमें बन्दूक की मैगजीन की तरह बारूद की एक मैगजीन लगती है । ट्रिगर दबाने से बारूद में विस्फ़ोट होता है और इससे उत्पन्न हुआ दवाब कील को लकडी से होती हुये कंक्रीट में पैबस्त कर देता है । इसके बाद वाला काम सबसे मेहनत का था जिसमें छोटी छोटी कीलों (१.५ इंच) को हाथ के हथौडे से नियत स्थान पर बैठाना था । जैसा कि आप ऊपर वाले चित्र में देख सकते हैं । आज मैने कम से कम १२०-१५० कीलों को अपने मजबूत हाथों से उनके स्थान पर लगाया :-)
आज ह्यूस्टन की गर्मी अपने चरम पर थी और तापमान लगभग ४० डिग्री और आद्रता (Humidity) ६० प्रतिशत थी । हम लोगों के लिये ठंडे पानी का बंदोबस्त था । आज ४ अलग अलग मकानों पर काम चल रहा था और विभिन्न समूहों के लगभग ८० लोग काम पर लगे हुये थे । कुछ लोग सपरिवार आये हुये थे जिनसे मिलकर बडा अच्छा लगा । ह्यूस्टन की एक बडी दुकान (Mattress Firm) के लगभग २५ लोग साथ में आये हुये थे जिसमें काफ़ी लडकियाँ भी थी जो कन्धे से कन्धे मिलाकर लकडी उठा रही थीं और कील पर बेरहमी से हथौडा पटक रही थीं :-)
हम लोगों ने खुली धूप में सुबह ७ बजे से दोपहर १२ बजे तक काम किया और फ़िर "हैबिटेट फ़ॉर ह्यूमैनिटी" वालों ने गर्मी के चलते काम बन्द करवा दिया । इसके बाद हम सब लोगों ने साथ बैठकर अपने सैंडविच खाये और फ़िर घर वापिस लौट गये । हमारे स्कूल के साथियों ने अगस्त में फ़िर से एक बार यहाँ आकर काम करने का फ़ैसला लिया और सभी ने इसे ध्वनिमत से स्वीकार किया । बाकी आप फ़ोटो देखकर खुद ही समझ जायेंगे ।
जब ये मकान बनकर पूरी तरह तैयार हो जायेगा तो कुछ ऐसा दिखेगा ।
गुरुवार, जुलाई 17, 2008
दिल के लिये मुफ़ीद है दौडना !!!
किसी भी तरह का हल्का व्यायाम सेहत के लिये लाभदायक होता है । आज मैं अपने पसंदीदा व्यायाम अर्थात दौडने की बात करूंगा । दौडना का भिन्न भिन्न लोगों के लिये अर्थ भिन्न हो सकता है । लेकिन आज के लेख में दौडने से मेरा तात्पर्य किसी दौड का जीतने के उद्देश्य से दौडना नहीं बल्कि हल्के फ़ुल्के व्यायाम के रूप में दौडने से है । मान लीजिये आपने पिछले १० वर्षों में कभी दौड नहीं लगायी है (पत्नी के बेलन से बचने और ट्रेन को पकडने को छोडकर) तो भी आप इसको आसानी से नियमित रूप से अपना सकते हैं ।
दौडना दिल के लिये बडा मुफ़ीद होता है । दौडने से हृदय की मांसपेशियाँ विकसित होती हैं, हृदय के चैम्बर का आकार बडा होता है और हर स्ट्रोक में हृदय की रक्त भेजने की क्षमता बढती है । चूँकि आप हर स्ट्रोक में पहले से अधिक रक्त भेज सकते हैं इसलिये नियमित दौडने से सामान्य परिस्थितियों (जब आप दौड नहीं रहे हों) में आपके हृदय की प्रति मिनट धडकन कम हो जाती हैं । प्रति मिनट धडकन कम होने से आपके हृदय को आराम मिलता है और वो आपको दुआयें देता है । इससे आपके रक्तचाप में भी गिरावट आती है । पिछले १.५ वर्षों से नियमित दौडने के कारण सामान्य स्थिति में मेरा रक्तचाप ८०/१२० के स्थान पर ७०/११० तक आ गया है ।
दौडते समय शरीर की मांसपेशियों में आक्सीजन की नियमित खुराक पंहुचती रहे, इसके लिये आपका शरीर अपने आप ही ऊतकों में नयी शिराओं का निर्माण प्रारम्भ कर देता है । इससे हॄदय के अलावा अन्य मांसपेशियाँ भी स्वस्थ रहती हैं । तीसरा सबसे बडा फ़ायदा होता है कि आपके रक्त के हीमोग्लोबिन की आक्सीजन को ऊतकों तक पंहुचाने की क्षमता का भी क्रमश: विकास होता है ।
इसके अलावा बढा हुआ वजन पूर्व स्थान पर आ जाता है, आस पडौसी इज्जत की नजर से देखते हैं, चोर पर्स चुरा कर भागे तो आप उसे पकड सकते हैं । यदि आप युवा हैं तो अक्षय कुमार स्टाईल में किसी युवा लडकी का पर्स वापिस लाकर दे सकते हैं, और युवा नहीं हैं तो ऐसा करके पास खडे युवाओं को शर्मिन्दा कर सकते हैं :-)
ये सब तो आप सभी जानते हैं लेकिन न दौडने वालों की दो प्रमुख समस्यायें होती हैं । पहली कि जोश में आकर दो दिन दौडे और तीसरे दिन हाथ, पैर, कमर और हर जगह होने वाले दर्द के कारण फ़िर से न दौडने का निश्चय कर लेते हैं । दूसरी समस्या ज्यादा जोश के कारण होती है के वो एक हफ़्ते में ही अगली मैराथन दौड लेना चाहते हैं और इसके चलते चोटिल हो जाते हैं ।
इसलिये इसको थोडा वैज्ञानिक तरीके से समझते हैं ।


दौडना दिल के लिये बडा मुफ़ीद होता है । दौडने से हृदय की मांसपेशियाँ विकसित होती हैं, हृदय के चैम्बर का आकार बडा होता है और हर स्ट्रोक में हृदय की रक्त भेजने की क्षमता बढती है । चूँकि आप हर स्ट्रोक में पहले से अधिक रक्त भेज सकते हैं इसलिये नियमित दौडने से सामान्य परिस्थितियों (जब आप दौड नहीं रहे हों) में आपके हृदय की प्रति मिनट धडकन कम हो जाती हैं । प्रति मिनट धडकन कम होने से आपके हृदय को आराम मिलता है और वो आपको दुआयें देता है । इससे आपके रक्तचाप में भी गिरावट आती है । पिछले १.५ वर्षों से नियमित दौडने के कारण सामान्य स्थिति में मेरा रक्तचाप ८०/१२० के स्थान पर ७०/११० तक आ गया है ।
दौडते समय शरीर की मांसपेशियों में आक्सीजन की नियमित खुराक पंहुचती रहे, इसके लिये आपका शरीर अपने आप ही ऊतकों में नयी शिराओं का निर्माण प्रारम्भ कर देता है । इससे हॄदय के अलावा अन्य मांसपेशियाँ भी स्वस्थ रहती हैं । तीसरा सबसे बडा फ़ायदा होता है कि आपके रक्त के हीमोग्लोबिन की आक्सीजन को ऊतकों तक पंहुचाने की क्षमता का भी क्रमश: विकास होता है ।
इसके अलावा बढा हुआ वजन पूर्व स्थान पर आ जाता है, आस पडौसी इज्जत की नजर से देखते हैं, चोर पर्स चुरा कर भागे तो आप उसे पकड सकते हैं । यदि आप युवा हैं तो अक्षय कुमार स्टाईल में किसी युवा लडकी का पर्स वापिस लाकर दे सकते हैं, और युवा नहीं हैं तो ऐसा करके पास खडे युवाओं को शर्मिन्दा कर सकते हैं :-)
ये सब तो आप सभी जानते हैं लेकिन न दौडने वालों की दो प्रमुख समस्यायें होती हैं । पहली कि जोश में आकर दो दिन दौडे और तीसरे दिन हाथ, पैर, कमर और हर जगह होने वाले दर्द के कारण फ़िर से न दौडने का निश्चय कर लेते हैं । दूसरी समस्या ज्यादा जोश के कारण होती है के वो एक हफ़्ते में ही अगली मैराथन दौड लेना चाहते हैं और इसके चलते चोटिल हो जाते हैं ।
इसलिये इसको थोडा वैज्ञानिक तरीके से समझते हैं ।
आपका आज का फ़िटनेस कुछ भी हो, अगर आप छ: सप्ताह तक किसी भी नये व्यायाम को करेंगे तो वो ही आपका नया फ़िटनेस बन जायेगा बर्शते कि आप अपने आप को बहुत ज्यादा फ़ंतासी की दुनिया में न ले जाये । मान लीजिये कि आप आज दौडना प्रारम्भ करते हैं तो आज २ किमी ही दौडिये और १० मिनट प्रति किमी की रफ़्तार से दौडिये । आपको बीस मिनट लगेंगे २ किमी दौडने में और सम्भव है कि ४ दिनों के बाद आपको लगे कि ये तो बहुत आसान है और आज में ३ किमी दौड लेता हूँ । ऐसे विचारों से बचे और कम से कम छः सप्ताह तक इस रूटीन को जारी रखें । छ: सप्ताह के बाद आप आगे प्रयोग कर सकते हैं जैसे कि रफ़्तार बढाना अथवा दूरी बढाना । नये लोगों के लिये रफ़्तार कम मायने रखती है और उन्हें दूरी बढाने का प्रयास करना चाहिये ।
इसके अलावा किसी साथी के साथ दौडना प्रारम्भ करना बहुत फ़ायदेमन्द होता है क्योंकि आप दोनों एक दूसरे को दिशानिर्देश देते हुये ट्रैक पर रखते हैं ।
इसके अलावा दो अन्य नियमों का पालन करना न भूलें ।
१) हाईड्रेट, हाईड्रेट, हाईड्रेट: अर्थात पानी पियें, पानी पियें और पानी पिंयें ।
२) जरूरत से ज्यादा अपने को कष्ट न दें, दौडने को जीवन का अंग बनायें न कि जीवन को दौडने का ।
इतनी सब जानकारी के बावजूद मैं एक सामान्य सा नियम भूल गया और एक ही महीने में अपनी मैराथन ट्रेनिंग को बहुत आगे ले जाने की चाहत में चोटिल हो बैठा । आज लगभग बीस दिनों के बाद ११ किमी दौडा हूँ और बहुत अच्छा अहसास हुआ है । ऐसा लग रहा है कि चोट से उबर चुका हूँ और अपनी आगे की ट्रेनिंग जारी रख सकता हूँ । मेरी ट्रेनिंग के बारे में जानकारी इस लिंक को क्लिक करके प्राप्त की जा सकती है । लाल रंग से लिखे हुये आंकडे मेरे चोटिल होने के बारे में जानकारी देते हैं ।
नीरज रोहिल्ला ।
इसके अलावा दो अन्य नियमों का पालन करना न भूलें ।
१) हाईड्रेट, हाईड्रेट, हाईड्रेट: अर्थात पानी पियें, पानी पियें और पानी पिंयें ।
२) जरूरत से ज्यादा अपने को कष्ट न दें, दौडने को जीवन का अंग बनायें न कि जीवन को दौडने का ।
इतनी सब जानकारी के बावजूद मैं एक सामान्य सा नियम भूल गया और एक ही महीने में अपनी मैराथन ट्रेनिंग को बहुत आगे ले जाने की चाहत में चोटिल हो बैठा । आज लगभग बीस दिनों के बाद ११ किमी दौडा हूँ और बहुत अच्छा अहसास हुआ है । ऐसा लग रहा है कि चोट से उबर चुका हूँ और अपनी आगे की ट्रेनिंग जारी रख सकता हूँ । मेरी ट्रेनिंग के बारे में जानकारी इस लिंक को क्लिक करके प्राप्त की जा सकती है । लाल रंग से लिखे हुये आंकडे मेरे चोटिल होने के बारे में जानकारी देते हैं ।
नीरज रोहिल्ला ।
सोमवार, जुलाई 14, 2008
सीटी पर मदन मोहन का गीत यूँ हसरतों के दाग
आज ही संजय पटेलजी ने अपने चिट्ठे पर मदन मोहन की बरसी पर बांसुरी पर उनके कुछ गीत प्रस्तुत किये हैं । मदन मोहन जी को याद करते हुये "अदालत" फ़िल्म के गीत "यूँ हसरतों के दाग" को राजेश कोप्पिकर के अंदाज में पेश कर रहा हूँ । राजेश जी के गीत मैने केवल यूट्यूब पर ही सुने हैं लेकिन उनकी कलाकारी काबिल ए तारीफ़ है । इस गाने के उतार चढावों को उन्होने जिस बारीकी से अपनी सीटी में संजोया है उसे सुनकर मन वाह वाह कह उठता है । लीजिये, पेश-ए-खिदमत है "यूँ हसरतों के दाग" :
इसी के साथ मेरी पसन्द का एक और गीत "पूछो न कैसे मैने रैन बिताई" भी राजेश जी की सीटी के माध्यम से सुनिये ।
इसके अलावा यू-ट्यूब पर राजेश जी के २५० अन्य गीतों को इस पेज पर देख सकते हैं ।
इसी के साथ मेरी पसन्द का एक और गीत "पूछो न कैसे मैने रैन बिताई" भी राजेश जी की सीटी के माध्यम से सुनिये ।
इसके अलावा यू-ट्यूब पर राजेश जी के २५० अन्य गीतों को इस पेज पर देख सकते हैं ।
रविवार, जुलाई 13, 2008
एक महबूबा की याद और फ़िर उसका मर्सिया !!!
जब मैं भारत में था (जुलाई २००४ तक) तो कभी मोबाईल फ़ोन का इस्तेमाल नहीं किया था । कभी इसकी जरूरत ही महसूस नहीं हुयी और न ही जेब में इतने पैसे थे कि इसका खर्चा उठा सकते । उसके बाद अगस्त में ह्यूस्टन के राईस विश्वविद्यालय में आये तो भी घर में एक लैंड लाईन लगवाने के बाद काम चल ही रहा था लेकिन थोडी असुविधा जरूर थी । शुरू शुरू में एक दो फ़ोन कम्पनियों से कहा कि भैया एक ठो मोबाईल दे दो तो बोले तुम इस देश में नये नये आये हो और तुमने कभी यहाँ पर उधार नहीं लिया है इससे तुम्हारी नीयत का कोई भरोसा नहीं है । लिहाजा हम तुम्हे पोस्ट पेड फ़ोन तो तब ही देंगे जब ५०० डालर नकद जमा करोगे । प्रीपेड लेने से हमने इंकार कर दिया, चूँकि खुद इनकी सरकार ने हमपे भरोसा करके अपने शोध का जिम्मा हमें सौंपा और इन नालायकों को हमारी नीयत पर ही भरोसा नहीं ।
खैर दिन कटते रहे और एक दिन स्कूल में एक मोबाईल कम्पनी वालों ने अपना तम्बू लगाया और कहा कि हम १२५ डालर जमा करने पर फ़ोन दे देंगे । उन्होने ये भी कहा कि हमारी नीयत पर पूरा भरोसा है लेकिन ससुरे पेपर वर्क के चक्कर में १२५ ले रहे हैं और वो भी सूद समेत ६ महीने के बाद लौटा देंगे । हमारे दोस्त ने कहा अब सब्र भी करो और दे दो १२५ डालर । तो प्यारे साथियों जनवरी २००५ में पहली बार हमने भी मोबाईल ले लिया । इसी के साथ अमेरिका के मोबाईल के कुछ अलग ढंग भी पता चले । ध्वनि संदेश (व्याईस मेल) से पहली बार वास्ता पडा, फ़ोन मिलाओ और अगर बन्दा फ़ोन न उठाये तो उसके ध्वनि संदेश के बाद अपना संदेश रेकार्ड कर दो । हमने भी पहली बार अपनी आवाज में संदेश रेकार्ड किया (Hi, This is Neeraj. I am unable to take your call right now but if you will leave your name, number and a brief message I will get back to you as soon as possible). ये भी पता चला कि मोबाईल शिष्टाचार के मुताबिक अगर कोई आपको ध्वनि संदेश छोडे तो उसको वापिस काल करने की जिम्मेवारी आपकी होती है ।
मेरे पिताजी एक बार बडे नाराज हुये, उन्होने मेरी आवाज सुनी और सोचा फ़ोन लग गया है और मुझे डांटना शुरू कर दिया :-) बाद में पता चला तो खूब हंसे । ये भी पता चला कि यहाँ हर महीने एक नियत मिनट (मेरे वाले प्लान में ४०० मिनट) मिलते हैं । फ़ोन मिलाने और उठाने दोनो में मिनट कटते हैं लेकिन शाम को ७ बजे के बाद से सुबह ७ बजे तक और शनिवार और रविवार को मिनट नहीं कटते हैं । मेरे तो बमुश्किल १५० मिनट खर्च हो पाते थे और हर महीने २५० मिनट बेकार चले जाते थे । मेरे पास जो मोबाईल फ़ोन था वो बडा सी सादा सा था और पाषाणकालीन लगता था, उसमें फ़ोटो, इंटरनेट आदि की रंगबाजी भी नहीं थी । ये रहा उसका फ़ोटो:

अब जल्दी से तीन साल आगे बढाते हैं और अचानक से हमने एक धांसू और चांपू सा फ़ोन लेने का निश्चय कर लिया । हमने नया फ़ोन लिया मोटोरोला Q9C, इसका फ़ोटो भी हाजिर है । ये फ़ोन तो एकदम जादू का पिटारा था, फ़ोन के साथ साथ इंटरनेट का तेज रफ़्तार कनेक्शन, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS), लाईव सर्च, टाईप करने के लिये बढिया की बोर्ड । ये नहीं कि "S" टाईप करना हो तो एक ही बटन को ४ बार दबाओ । खाने खाने जाना हो, तो फ़ोन को आदेश करो कि मैक्सिकन रेस्तरां खोजो और ३ मील के अन्दर के सभी रेस्तरां हाजिर । फ़िर बोलो कि हम जहाँ खडे हैं वहाँ से इस जगह जाने का रास्ता बताओ तो GPS की मदद से टर्न बाई टर्न निर्देश मिल जाते थे । सबसे मस्त लगता था कि पार्किंग लाट से अपनी लैब तक आते आते मैं १५-२० चिट्ठे पढ डालता था । आऊटलुक से मेरी ईमेल पलक झपकते मिल जाती थी । कुल मिला कर ये फ़ोन मेरी महबूबा बन गया था ।

खैर दिन कटते रहे और एक दिन स्कूल में एक मोबाईल कम्पनी वालों ने अपना तम्बू लगाया और कहा कि हम १२५ डालर जमा करने पर फ़ोन दे देंगे । उन्होने ये भी कहा कि हमारी नीयत पर पूरा भरोसा है लेकिन ससुरे पेपर वर्क के चक्कर में १२५ ले रहे हैं और वो भी सूद समेत ६ महीने के बाद लौटा देंगे । हमारे दोस्त ने कहा अब सब्र भी करो और दे दो १२५ डालर । तो प्यारे साथियों जनवरी २००५ में पहली बार हमने भी मोबाईल ले लिया । इसी के साथ अमेरिका के मोबाईल के कुछ अलग ढंग भी पता चले । ध्वनि संदेश (व्याईस मेल) से पहली बार वास्ता पडा, फ़ोन मिलाओ और अगर बन्दा फ़ोन न उठाये तो उसके ध्वनि संदेश के बाद अपना संदेश रेकार्ड कर दो । हमने भी पहली बार अपनी आवाज में संदेश रेकार्ड किया (Hi, This is Neeraj. I am unable to take your call right now but if you will leave your name, number and a brief message I will get back to you as soon as possible). ये भी पता चला कि मोबाईल शिष्टाचार के मुताबिक अगर कोई आपको ध्वनि संदेश छोडे तो उसको वापिस काल करने की जिम्मेवारी आपकी होती है ।
मेरे पिताजी एक बार बडे नाराज हुये, उन्होने मेरी आवाज सुनी और सोचा फ़ोन लग गया है और मुझे डांटना शुरू कर दिया :-) बाद में पता चला तो खूब हंसे । ये भी पता चला कि यहाँ हर महीने एक नियत मिनट (मेरे वाले प्लान में ४०० मिनट) मिलते हैं । फ़ोन मिलाने और उठाने दोनो में मिनट कटते हैं लेकिन शाम को ७ बजे के बाद से सुबह ७ बजे तक और शनिवार और रविवार को मिनट नहीं कटते हैं । मेरे तो बमुश्किल १५० मिनट खर्च हो पाते थे और हर महीने २५० मिनट बेकार चले जाते थे । मेरे पास जो मोबाईल फ़ोन था वो बडा सी सादा सा था और पाषाणकालीन लगता था, उसमें फ़ोटो, इंटरनेट आदि की रंगबाजी भी नहीं थी । ये रहा उसका फ़ोटो:
अब जल्दी से तीन साल आगे बढाते हैं और अचानक से हमने एक धांसू और चांपू सा फ़ोन लेने का निश्चय कर लिया । हमने नया फ़ोन लिया मोटोरोला Q9C, इसका फ़ोटो भी हाजिर है । ये फ़ोन तो एकदम जादू का पिटारा था, फ़ोन के साथ साथ इंटरनेट का तेज रफ़्तार कनेक्शन, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS), लाईव सर्च, टाईप करने के लिये बढिया की बोर्ड । ये नहीं कि "S" टाईप करना हो तो एक ही बटन को ४ बार दबाओ । खाने खाने जाना हो, तो फ़ोन को आदेश करो कि मैक्सिकन रेस्तरां खोजो और ३ मील के अन्दर के सभी रेस्तरां हाजिर । फ़िर बोलो कि हम जहाँ खडे हैं वहाँ से इस जगह जाने का रास्ता बताओ तो GPS की मदद से टर्न बाई टर्न निर्देश मिल जाते थे । सबसे मस्त लगता था कि पार्किंग लाट से अपनी लैब तक आते आते मैं १५-२० चिट्ठे पढ डालता था । आऊटलुक से मेरी ईमेल पलक झपकते मिल जाती थी । कुल मिला कर ये फ़ोन मेरी महबूबा बन गया था ।
लेकिन हर खुशी की उम्र छोटी ही होती है । ९ जुलाई की रात को हमारे युनिवर्सिटी के स्टूडेंट पब में मित्र लोगों के साथ बैठकर बीयर की चुस्कियों के साथ शतरंज खेलते हुये अचानक फ़ोन पर बात करने के बाद मैने फ़ोन को जेब में रखने की बजाय मेज पर रख दिया और दस मिनट बाद उसकी सुध ली तो वो वहाँ से गायब था । बडा दुख हुआ, फ़ोन खोने से बडा दुख इस बात का हुआ कि स्टूडेंट पब से फ़ोन चोरी हुआ हांलाकि उसमें कभी कभी स्कूल से बाहर के लोग भी आते हैं । इससे हमने सोचा कि घोर कलयुग आ गया है । अब बताईये शराबियों का भरोसा नहीं कर सकते तो आप आम लोगों की बात तो छोड ही दीजिये ।
हमने २ दिन तक इन्तजार किया कि शायद कोई तरस खाकर फ़ोन वापिस कर दे लेकिन ऐसा नहीं हुआ । मन मसोसकर अपने कमरे के एक कोने के कबाडे में उपेक्षित से पडे पुराने नोकिया वाले फ़ोन को झाड पोंछकर चमकाया और चालू किया । जब तक नया फ़ोन खरीदने के पैसे इकट्ठे न हों जाये, पुराने फ़ोन को ही कलेजे से लगाये रखना पडेगा ।
हमने २ दिन तक इन्तजार किया कि शायद कोई तरस खाकर फ़ोन वापिस कर दे लेकिन ऐसा नहीं हुआ । मन मसोसकर अपने कमरे के एक कोने के कबाडे में उपेक्षित से पडे पुराने नोकिया वाले फ़ोन को झाड पोंछकर चमकाया और चालू किया । जब तक नया फ़ोन खरीदने के पैसे इकट्ठे न हों जाये, पुराने फ़ोन को ही कलेजे से लगाये रखना पडेगा ।
सोमवार, जुलाई 07, 2008
सागर चन्द नाहर भाई जी को जन्मदिन की बधाइयां |
आज हम सब के मित्र और प्यारे सागर चन्द नाहर जी का जन्मदिवस है | सागर भाईजी के संगीत ज्ञान और उनके सरल स्वभाव के बारे में कुछ भी लिखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनके बारे में सब लोग जानते हैं | उनसे जो भी एक बार बात कर ले उनके सरल स्वभाव से प्रभावित हुये बिना नहीं रहता |
हम सब की ओर से सागर भाईसाहब को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें |
नीरज रोहिल्ला
बुधवार, जून 25, 2008
वडाली बंधुओं की आवाज में सुनिये तेरे इश्क ने नचाया
आज आप सब "वडाली बंधुओं" की आवाज में "तेरे इश्क ने नचाया" सुनिये | पंजाबी संगीत की जब बात होती है तो आजकल केवल कमर मटकाते गीत ही सुनाई देते हैं लेकिन पंजाबी संगीत बहुत समृद्ध है | इसी पंजाबी संगीत में बुल्ले शाह की "हीर" भी है जिसे फ़िर कभी सुनवायेंगे |
फिलहाल आपसे गुजारिश है अपने १० मिनट अलग निकाल कर पूरे मन से इस गीत को सुने और महसूस करें |
Technorati Tags वडाली,बन्धु,पंजाबी,संगीत
फिलहाल आपसे गुजारिश है अपने १० मिनट अलग निकाल कर पूरे मन से इस गीत को सुने और महसूस करें |
Technorati Tags वडाली,बन्धु,पंजाबी,संगीत
सोमवार, जून 02, 2008
राहुल देव बर्मन का घातक फ़िल्म का एक मधुर गीत और दो घातक डायलाग !!!
राजकुमार संतोषी की फ़िल्म घातक १९९७ में आयी थी । इस फ़िल्म के दो मधुर गीतों का संगीत राहुल देव बर्मन ने दिया था और अन्य गीतों का चलताऊ गीतों का संगीत अपने अन्नु मलिक ने दिया था । आज आप सुनिये सुरेश वाडेकर और साधना सरगम की आवाज में एक बहुत प्यारा सा युगल गीत । ९० के दशक में ऐसा गीत सुनना अपने आप में बडा सुखद था (इससे साबित होता है कि लडकपन से ही हमें अच्छे संगीत की परख थी :-) ) । वो अलग गीत हुआ करते थे जो लगभग ६:३० मिनट लम्बे होते थे और चार अन्तरे होने के बाद भी उनकी मधुरता बनी रहती थी ।
इस मधुर गीत को सुनने के बाद अपने सनी देओल की आवाज में घातक के दो घातक से डायलाग, पता नही जब मैं इन डायलाग को अपलोड कर रहा था को अपने भुवनेश शर्मा जी की याद आ रही थी । तो ये डायलाग खास भुवनेश जी के लिये :-)
इस मधुर गीत को सुनने के बाद अपने सनी देओल की आवाज में घातक के दो घातक से डायलाग, पता नही जब मैं इन डायलाग को अपलोड कर रहा था को अपने भुवनेश शर्मा जी की याद आ रही थी । तो ये डायलाग खास भुवनेश जी के लिये :-)
रविवार, जून 01, 2008
राग दरबारी के एक प्रसंग का आडियो (पहला प्रयास) !!!
आज मैं पाडकास्टिंग के क्षेत्र में अपना पहला प्रयास कर रहा हूँ । मुझे एक बहुत ही बढिया वेबसाईट मिली है जिसके द्वारा पाडकास्ट बनाना बेहद आसान है । बस एक नम्बर पर फ़ोन कीजिये और नंबर मिलने का बाद अपना पाडकास्ट रेकार्ड करना शुरू कर दीजिये । पाडकास्ट पूरा होने के बाद उस वेबसाईट पर जाईये और अपने पाडकास्ट की mp3 फ़ाईल सहेज लीजिये । वेबसाईट का नाम है www.gcast.com | लेकिन वेबसाईट का नम्बर अमेरिका का है इसीलिये भारत से काल करके पाडकास्ट बनाना बेहद मंहगा होगा लेकिन अमेरिका/कनाडा में रहने वाले ब्लागर बंधु इसका खूब फ़ायदा उठा सकते हैं ।
मैं श्रीलाल शुक्लजी की कालजयी रचना राग दरबारी के एक प्रसंग का आडियो प्रस्तुत कर रहा हूँ । अगले प्रयास में आडियो को और बेहतर बनाने का प्रयास करूँगा । लेकिन इस पाडकास्ट को बनाते बनाते अपने बचपन और कालेज के दिनों की याद आ गयी जब विभिन्न हिन्दी प्रतियोगिताओं में मैं खूब ईनाम जीता करता था ।
आपकी सेवा में प्रस्तुत है पाडकास्टिंग में मेरा पहला प्रयास :-)
मैं श्रीलाल शुक्लजी की कालजयी रचना राग दरबारी के एक प्रसंग का आडियो प्रस्तुत कर रहा हूँ । अगले प्रयास में आडियो को और बेहतर बनाने का प्रयास करूँगा । लेकिन इस पाडकास्ट को बनाते बनाते अपने बचपन और कालेज के दिनों की याद आ गयी जब विभिन्न हिन्दी प्रतियोगिताओं में मैं खूब ईनाम जीता करता था ।
आपकी सेवा में प्रस्तुत है पाडकास्टिंग में मेरा पहला प्रयास :-)
शनिवार, मई 24, 2008
तेल और भविष्य के ऊर्जा स्रोत: भाग २
मेरी आज की पोस्ट आलोक पुराणिकजी की पोस्ट से प्रेरित है । उन्होनें अपनी पोस्ट में भारत के परिपेक्ष्य में तेल के बढते दामों की विवेचना की है (और ये व्यंग नहीं है ) ।
ये रहा उनकी पोस्ट का लिंक:
कुछ समय पहले मैने ऊर्जा के सन्दर्भ में एक पोस्ट ("तेल और भविष्य के उर्जा स्रोत: भाग १") लेखी थी । आज उस कडी का दूसरा भाग प्रस्तुत है ।
ये रही उस लेख की पहली कडी:
ये लेख थोडा लम्बा अवश्य है लेकिन प्रयास करके इसे पूरा पढें और अपनी राय से अवगत करायें कि इसे आगे चालू रखा जाये कि नहीं
जब मैने पहली कडी लिखी थी तब कच्चे तेल का दाम ~१२० डालर प्रति बैरल था और इस समय पोस्ट लिखते समय कच्चे तेल का दाम लगभग ~१३२ डालर प्रति बैरल है । इस सीधा मतलब है कि २२ दिनों में कच्चे तेल में १० प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है । आज इसकी कोई गारंटी नहीं ले सकता कि अगले २ महीने में इसका दाम १५० डालर प्रति बैरल नहीं पंहुच जायेगा । भारत में अगर मीडिया की बात मानी जाये तो पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि सम्भावित है । अमेरिका में इसका प्रभाव दिख ही रहा है । चुनाव समीप है और दोनो राजनैतिक पार्टियाँ तेल कम्पनियों को गरियाने पर तुली हैं । उनके कुछ तर्क ठीक हैं और कुछ तर्क कुछ उस प्रकार के कि अगर पानी में से बिजली निकाल ली तो किसानों के लिये क्या बचेगा...:)
एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि कच्चे तेल के दामों को कौन नियन्त्रित करता है ? क्या तेल कम्पनियाँ सीधे रूप से तेल के दामों को नियन्त्रित करती हैं? अगर तेल कम्पनियाँ नहीं तो फ़िर क्या बिचौलिये और दलाल तेल के दामों निर्धारित करते हैं । तेल की पिछले दो महीने की तेजी देखी जाये तो ये मूल रूप से आपूर्ति-खपत और बिचौलियों/ट्रेडर्स के व्यवहार से सम्बन्धित है । आपूर्ति की बात बाद में करेंगे, पहले बिचौलियों/ट्रेडर्स के व्यवहार पर ध्यान देते हैं ।
जिस प्रकार आप सोना, डालर, रूपया, शेयर बाजार आदि में पैसे का निवेश करते हैं, उसी प्रकार बहुत से ट्रेडर्स कच्चे तेल में पैसा निवेश करते हैं । कच्चे तेल में निवेश आम तौर पर शार्ट-टर्म (कम अवधि वाला) होता है । जब जब आपूर्ति में थोडी सी भी कमी महसूस की जाती है, ट्रेडर्स जानते हैं कि कच्चे तेल के दाम बढेंगे और वो फ़टाफ़ट तेल में निवेश आरम्भ कर देते हैं । ऐसा करने से बाजार में एक असुरक्षा का माहौल बनता है और तेल के दाम तेजी से चढते हैं । ऐसी स्थिति में अगर तेल कम्पनियाँ (ओपेक OPEC और अन्य प्राईवेट कम्पनियाँ Shell, Exxon Mobil, BP, Chevron, Connocco Phillips, PetroBras, PEMEX आदि) तेल की आपूर्ति बनाये रखती हैं तो बाजार संभला रहता है । परन्तु आपूर्ति में जरा सी भी कमी अथवा नाईजीरिया की तेल पाईप में विस्फ़ोट, OPEC वालों का ऊँचे लहजे में कोई संवाद आदि कोई भी घटक बाजार को गिरा सकते हैं ।
इस हफ़्ते हमने देखा कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने सऊदी अरब से उत्पादन बढाने की गुजारिश की जिसे सऊदी अरब ने तुरन्त ठुकरा दिया । इससे अमेरिका का खासी फ़जीहत भी हुयी और तेल के दाम भी नहीं गिरे । एक और नयी बात ये हुयी कि अमेरिका की संसद ने अमेरिकी न्यायिक विभाग (American Justice Department) को OPEC पर मुकदमा चलाने की ताकत प्रदान की है । महत्वपूर्ण बात है कि अभी साफ़ नहीं है कि ये मुकदमा किन स्थितियों में चलाया जा सकता है । इसके बारे में अन्य जानकारी का इन्तजार है, लेकिन फ़िलहाल ऐसा कोई मुकदमा दूर दूर तक नहीं देख रहा है लिहाजा ये मात्र एक कूटनीतिक कदम है । तेल की मंहगी कीमतों के बावजूद तेल कम्पनियों की रेकार्ड कमाई सभी की आंखो में किरकिरी बनी हुयी है । पिछले हफ़्ते वाशिंगटन में एक संसद समिति ने अमेरिका की छ: प्रमुख तेल कम्पनियों के अधिकारियों की खिंचाई की थी । Shell के प्रमुख ने कहा कि उनकी कम्पनी तेल के ६०-८० डालर के दाम पर भी मुनाफ़ा कमा सकती है । उन्होने ये भी कहा कि वो हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि तेल का दाम न बढे परन्तु जब तक स्वयं अमेरिका में तेल का उत्पादन नहीं बढाया जाता, तेल के दामों को नियन्त्रित करना बहुत कठिन है ।
अब आपूर्ति की बात करते हैं । पिछले लेख में हमने पढा था कि वैज्ञानिक अनुमानों से तेल की कमी नहीं है । परन्तु तेल के उपस्थित होने (In principle) और उसकी आपूर्ति दो अलग अलग बाते हैं । तेल कम्पनियाँ बहुत आक्रामक रूप से नये वैज्ञानिकों और इन्जीनियरों को भर्ती करने की फ़िराक में हैं लेकिन फ़िर भी हर कम्पनी अच्छे लोगों की कमी का रोना रो रही है । पुरानी तकनीक अब पुरानी पड रही है और नयी तकनीक विकसित होने में समय लेती है । अमेरिका के परिपेक्ष्य में बात की जाये तो अलास्का और कैलीफ़ोर्निया के तट पर तेल के उत्पादन पर रोक लगी हुयी है । पर्यावरणविद कहते हैं कि दोनों ही स्थानों पर तेल निकालने से पर्यावरण को भारी क्षति हो सकती है । लगभग ३०-३५ वर्ष पहले कैलीफ़ोर्निया के तट पर तेल उत्पादन का प्रयास हुआ था, लेकिन कुछ पर्यावरण समबन्धी समस्याओं के चलते वहाँ तेल उत्पादन पर ३० साल की पाबन्दी (Moratorium) लगा दी गयी थी । आज तेल कम्पनियों का दावा है कि वो बिना पर्यावरण को क्षति पँहुचाये वहाँ से तेल का उत्पादन कर सकते हैं लेकिन अमेरिका में नवन्बर में चुनाव आने वाले हैं और तब तक इस सम्बन्ध में कुछ भी तय हो पाना मुश्किल लगता है ।
अमेरिका में तेल का उत्पादन प्रारम्भ होने से भारत/चीन को अप्रत्यक्ष रूप से बहुत फ़ायदा होगा । तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिये अमेरिका में तेल का उत्पादन बढने अथवा गैर पारम्परिक स्रोतों पर अधिक ध्यान देने से तेल के दामों में काफ़ी कमी आ सकती है । ऐसा होने से भारत और चीन को इसका सीधा फ़ायदा मिलेगा ।
दूसरा पहलू: मुझे नहीं लगता कि तेल का दाम लान्ग-टर्म (Long-Term) में गिरने वाला है । मान लीजिये आपके घर में मिठाई बनाने का कारखाना है और आपके शहर में मिठाई की लत बढती जा रही है । ऐसे में रोज आपके घर के बाहर भीड लगती है और मिठाई दलालों के माध्यम से बाँटी जाती है । जैसे जैसे भीड बढती है आप मिठाई का दाम बढाते हैं । अगर आप एक साथ मिठाई का उत्पादन दो गुना कर दें तो लोग दो दिन की मिठाई एक साथ खरीद सकते हैं और अगले दिन भीड कम हो सकती है । लेकिन भीड कम होने से दलालों को मिठाई का दाम कम करना पड सकता है ।
ऐसे में दलाल आपसे कहते हैं कि तुम मिठाई का उत्पादन इस अनुपात में बढाओ कि झींगा-मुश्ती के बाद सबको मिठाई मिल जाये लेकिन आराम से न मिले । इससे लोग मिठाई भी खा लेंगे, तुमको भी खूब मुनाफ़ा होगा और हम भी ऐश करेंगे । लोग दाम बढने पर झल्लायेंगे, लेकिन फ़िर अपनी आदत से मजबूर होकर वापिस खरीदने आयेंगे। मुझे लगता है कि तेल के साथ भी ऐसा हो रहा है ।
आपकी क्या राय है???
Technorati Tags ऊर्जा,तेल,भविष्य
ये रहा उनकी पोस्ट का लिंक:
कुछ समय पहले मैने ऊर्जा के सन्दर्भ में एक पोस्ट ("तेल और भविष्य के उर्जा स्रोत: भाग १") लेखी थी । आज उस कडी का दूसरा भाग प्रस्तुत है ।
ये रही उस लेख की पहली कडी:
ये लेख थोडा लम्बा अवश्य है लेकिन प्रयास करके इसे पूरा पढें और अपनी राय से अवगत करायें कि इसे आगे चालू रखा जाये कि नहीं
जब मैने पहली कडी लिखी थी तब कच्चे तेल का दाम ~१२० डालर प्रति बैरल था और इस समय पोस्ट लिखते समय कच्चे तेल का दाम लगभग ~१३२ डालर प्रति बैरल है । इस सीधा मतलब है कि २२ दिनों में कच्चे तेल में १० प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है । आज इसकी कोई गारंटी नहीं ले सकता कि अगले २ महीने में इसका दाम १५० डालर प्रति बैरल नहीं पंहुच जायेगा । भारत में अगर मीडिया की बात मानी जाये तो पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि सम्भावित है । अमेरिका में इसका प्रभाव दिख ही रहा है । चुनाव समीप है और दोनो राजनैतिक पार्टियाँ तेल कम्पनियों को गरियाने पर तुली हैं । उनके कुछ तर्क ठीक हैं और कुछ तर्क कुछ उस प्रकार के कि अगर पानी में से बिजली निकाल ली तो किसानों के लिये क्या बचेगा...:)
एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि कच्चे तेल के दामों को कौन नियन्त्रित करता है ? क्या तेल कम्पनियाँ सीधे रूप से तेल के दामों को नियन्त्रित करती हैं? अगर तेल कम्पनियाँ नहीं तो फ़िर क्या बिचौलिये और दलाल तेल के दामों निर्धारित करते हैं । तेल की पिछले दो महीने की तेजी देखी जाये तो ये मूल रूप से आपूर्ति-खपत और बिचौलियों/ट्रेडर्स के व्यवहार से सम्बन्धित है । आपूर्ति की बात बाद में करेंगे, पहले बिचौलियों/ट्रेडर्स के व्यवहार पर ध्यान देते हैं ।
जिस प्रकार आप सोना, डालर, रूपया, शेयर बाजार आदि में पैसे का निवेश करते हैं, उसी प्रकार बहुत से ट्रेडर्स कच्चे तेल में पैसा निवेश करते हैं । कच्चे तेल में निवेश आम तौर पर शार्ट-टर्म (कम अवधि वाला) होता है । जब जब आपूर्ति में थोडी सी भी कमी महसूस की जाती है, ट्रेडर्स जानते हैं कि कच्चे तेल के दाम बढेंगे और वो फ़टाफ़ट तेल में निवेश आरम्भ कर देते हैं । ऐसा करने से बाजार में एक असुरक्षा का माहौल बनता है और तेल के दाम तेजी से चढते हैं । ऐसी स्थिति में अगर तेल कम्पनियाँ (ओपेक OPEC और अन्य प्राईवेट कम्पनियाँ Shell, Exxon Mobil, BP, Chevron, Connocco Phillips, PetroBras, PEMEX आदि) तेल की आपूर्ति बनाये रखती हैं तो बाजार संभला रहता है । परन्तु आपूर्ति में जरा सी भी कमी अथवा नाईजीरिया की तेल पाईप में विस्फ़ोट, OPEC वालों का ऊँचे लहजे में कोई संवाद आदि कोई भी घटक बाजार को गिरा सकते हैं ।
इस हफ़्ते हमने देखा कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने सऊदी अरब से उत्पादन बढाने की गुजारिश की जिसे सऊदी अरब ने तुरन्त ठुकरा दिया । इससे अमेरिका का खासी फ़जीहत भी हुयी और तेल के दाम भी नहीं गिरे । एक और नयी बात ये हुयी कि अमेरिका की संसद ने अमेरिकी न्यायिक विभाग (American Justice Department) को OPEC पर मुकदमा चलाने की ताकत प्रदान की है । महत्वपूर्ण बात है कि अभी साफ़ नहीं है कि ये मुकदमा किन स्थितियों में चलाया जा सकता है । इसके बारे में अन्य जानकारी का इन्तजार है, लेकिन फ़िलहाल ऐसा कोई मुकदमा दूर दूर तक नहीं देख रहा है लिहाजा ये मात्र एक कूटनीतिक कदम है । तेल की मंहगी कीमतों के बावजूद तेल कम्पनियों की रेकार्ड कमाई सभी की आंखो में किरकिरी बनी हुयी है । पिछले हफ़्ते वाशिंगटन में एक संसद समिति ने अमेरिका की छ: प्रमुख तेल कम्पनियों के अधिकारियों की खिंचाई की थी । Shell के प्रमुख ने कहा कि उनकी कम्पनी तेल के ६०-८० डालर के दाम पर भी मुनाफ़ा कमा सकती है । उन्होने ये भी कहा कि वो हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं कि तेल का दाम न बढे परन्तु जब तक स्वयं अमेरिका में तेल का उत्पादन नहीं बढाया जाता, तेल के दामों को नियन्त्रित करना बहुत कठिन है ।
अब आपूर्ति की बात करते हैं । पिछले लेख में हमने पढा था कि वैज्ञानिक अनुमानों से तेल की कमी नहीं है । परन्तु तेल के उपस्थित होने (In principle) और उसकी आपूर्ति दो अलग अलग बाते हैं । तेल कम्पनियाँ बहुत आक्रामक रूप से नये वैज्ञानिकों और इन्जीनियरों को भर्ती करने की फ़िराक में हैं लेकिन फ़िर भी हर कम्पनी अच्छे लोगों की कमी का रोना रो रही है । पुरानी तकनीक अब पुरानी पड रही है और नयी तकनीक विकसित होने में समय लेती है । अमेरिका के परिपेक्ष्य में बात की जाये तो अलास्का और कैलीफ़ोर्निया के तट पर तेल के उत्पादन पर रोक लगी हुयी है । पर्यावरणविद कहते हैं कि दोनों ही स्थानों पर तेल निकालने से पर्यावरण को भारी क्षति हो सकती है । लगभग ३०-३५ वर्ष पहले कैलीफ़ोर्निया के तट पर तेल उत्पादन का प्रयास हुआ था, लेकिन कुछ पर्यावरण समबन्धी समस्याओं के चलते वहाँ तेल उत्पादन पर ३० साल की पाबन्दी (Moratorium) लगा दी गयी थी । आज तेल कम्पनियों का दावा है कि वो बिना पर्यावरण को क्षति पँहुचाये वहाँ से तेल का उत्पादन कर सकते हैं लेकिन अमेरिका में नवन्बर में चुनाव आने वाले हैं और तब तक इस सम्बन्ध में कुछ भी तय हो पाना मुश्किल लगता है ।
अमेरिका में तेल का उत्पादन प्रारम्भ होने से भारत/चीन को अप्रत्यक्ष रूप से बहुत फ़ायदा होगा । तेल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिये अमेरिका में तेल का उत्पादन बढने अथवा गैर पारम्परिक स्रोतों पर अधिक ध्यान देने से तेल के दामों में काफ़ी कमी आ सकती है । ऐसा होने से भारत और चीन को इसका सीधा फ़ायदा मिलेगा ।
दूसरा पहलू: मुझे नहीं लगता कि तेल का दाम लान्ग-टर्म (Long-Term) में गिरने वाला है । मान लीजिये आपके घर में मिठाई बनाने का कारखाना है और आपके शहर में मिठाई की लत बढती जा रही है । ऐसे में रोज आपके घर के बाहर भीड लगती है और मिठाई दलालों के माध्यम से बाँटी जाती है । जैसे जैसे भीड बढती है आप मिठाई का दाम बढाते हैं । अगर आप एक साथ मिठाई का उत्पादन दो गुना कर दें तो लोग दो दिन की मिठाई एक साथ खरीद सकते हैं और अगले दिन भीड कम हो सकती है । लेकिन भीड कम होने से दलालों को मिठाई का दाम कम करना पड सकता है ।
ऐसे में दलाल आपसे कहते हैं कि तुम मिठाई का उत्पादन इस अनुपात में बढाओ कि झींगा-मुश्ती के बाद सबको मिठाई मिल जाये लेकिन आराम से न मिले । इससे लोग मिठाई भी खा लेंगे, तुमको भी खूब मुनाफ़ा होगा और हम भी ऐश करेंगे । लोग दाम बढने पर झल्लायेंगे, लेकिन फ़िर अपनी आदत से मजबूर होकर वापिस खरीदने आयेंगे। मुझे लगता है कि तेल के साथ भी ऐसा हो रहा है ।
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चित्रों द्वारा कांटिनेन्टल ड्रिफ़्ट की कहानी!!!
Geology अथवा भूविज्ञान विज्ञान की चमक्कृत कर देने वाली शाखा है । इस शाखा से सम्बन्धित आज की कडी में हम "कान्टिनेंटल ड्रिफ़्ट" के बारे में जानेंगे ।
पहले मैं इस विषय पर केवल लेख लिखने के बारे में सोच रहा था लेकिन बाद में सोचा कि इस कहानी को चित्रों के माध्यम से सुनाया जाये तो अधिक रोचक रहेगी । Abraham Ortelius (1596), Francis Bacon (1620), Benjamin Franklin, Antonio Snider-Pellegrini (1858) नाम के विभिन्न विचारकों ने काफ़ी पहले सोचा था कि विभिन्न प्रायद्वीपों के एक साथ रखा जाये तो एक चित्र पहेली सी बनती है और ऐसी सम्भावना हो सकती है कि लाखों वर्ष पहले ये सभी प्रायद्वीप आपस में जुडे हुये हों ।
Alfred Wegener ने १९१२ में इस विषय पर गहन शोध किया और केवल द्वीपों की आकृति ही नहीं बल्कि विभिन्न चट्टानों और जीवाष्मों का अध्ययन करके Continental Drift का सिद्धान्त प्रस्तुत किया । वेगनर के अनुसार लगभग ३००० लाख वर्ष पहले सभी द्वीप आपस में जुडे हुये थे और धीरे धीरे ये द्वीप एक दूसरे से खिसकते चले गये । भारतीय द्वीप कुछ समय के लिये एक अलग द्वीप बना लेकिन कालान्तर में यूरेशिया द्वीप से टकरा गया और इस प्रकार महान हिमालय की पहाडों की रचना हुयी ।
वेगनर के सिद्धान्त को शुरूआत में वैज्ञानिकों ने अधिक महत्व नहीं दिया लेकिन इसके बावजूद वेगनर १९१०-१९३० तक अपने सिद्धान्त के पक्ष में तर्क एकत्र करते रहे । वेगनर अपने समकालीन वैज्ञानिकों को ये न समझा सके कि इतने विशालकाय द्वीप किस बल के कारण एक दूसरे से इतने दूर चले गये । वेगनर ने द्वीपों की गति के लिये दो विचार प्रस्तुत किये थे लेकिन ये दोनो ही विचार लगत थे । इसके कारण वेगनर के सिद्धान्त को लगभग १९५०-६० के आस पास ही वैज्ञानिकों की स्वीकृति मिल सकी ।
इसके बाद की कहानी आप चित्रों को देखें और खुद ही समझें :-)

चित्र १: अफ़्रीका और दक्षिणी अमेरिका एक दूसरे के साथ ऐसे फ़िट होते हैं
जैसे किसी चित्र पहेली का भाग हों । इसके अलावा गुलाबी रंग से दर्शायी हुयी
एक प्रकार की चट्टानों एवं भूसंरचना का अफ़्रीका और दक्षिणी अमेरिका में पाया
जाना इस थ्योरी को अधिक बल प्रदान करती है ।

चित्र २: विभिन्न प्रायद्वीपों की लाखों वर्ष पहले की स्थिति

चित्र ३: एक एनिमेशन जिसके द्वारा आप देख सकते हैं कि समय के साथ
विभिन्न प्रायद्वीप किस प्रकार अलग अलग हुये ।

इस चित्र में आप देख सकते हैं कि केवल चट्टाने ही नहीं बल्कि विभिन्न जीवों के जीवाश्म भी इस थ्योरी को बल प्रदान करते हैं ।


Technorati Tags भूगर्भ,शास्त्र,कांटिनेन्टल,ड्रिफ़्ट
पहले मैं इस विषय पर केवल लेख लिखने के बारे में सोच रहा था लेकिन बाद में सोचा कि इस कहानी को चित्रों के माध्यम से सुनाया जाये तो अधिक रोचक रहेगी । Abraham Ortelius (1596), Francis Bacon (1620), Benjamin Franklin, Antonio Snider-Pellegrini (1858) नाम के विभिन्न विचारकों ने काफ़ी पहले सोचा था कि विभिन्न प्रायद्वीपों के एक साथ रखा जाये तो एक चित्र पहेली सी बनती है और ऐसी सम्भावना हो सकती है कि लाखों वर्ष पहले ये सभी प्रायद्वीप आपस में जुडे हुये हों ।
Alfred Wegener ने १९१२ में इस विषय पर गहन शोध किया और केवल द्वीपों की आकृति ही नहीं बल्कि विभिन्न चट्टानों और जीवाष्मों का अध्ययन करके Continental Drift का सिद्धान्त प्रस्तुत किया । वेगनर के अनुसार लगभग ३००० लाख वर्ष पहले सभी द्वीप आपस में जुडे हुये थे और धीरे धीरे ये द्वीप एक दूसरे से खिसकते चले गये । भारतीय द्वीप कुछ समय के लिये एक अलग द्वीप बना लेकिन कालान्तर में यूरेशिया द्वीप से टकरा गया और इस प्रकार महान हिमालय की पहाडों की रचना हुयी ।
वेगनर के सिद्धान्त को शुरूआत में वैज्ञानिकों ने अधिक महत्व नहीं दिया लेकिन इसके बावजूद वेगनर १९१०-१९३० तक अपने सिद्धान्त के पक्ष में तर्क एकत्र करते रहे । वेगनर अपने समकालीन वैज्ञानिकों को ये न समझा सके कि इतने विशालकाय द्वीप किस बल के कारण एक दूसरे से इतने दूर चले गये । वेगनर ने द्वीपों की गति के लिये दो विचार प्रस्तुत किये थे लेकिन ये दोनो ही विचार लगत थे । इसके कारण वेगनर के सिद्धान्त को लगभग १९५०-६० के आस पास ही वैज्ञानिकों की स्वीकृति मिल सकी ।
इसके बाद की कहानी आप चित्रों को देखें और खुद ही समझें :-)
चित्र १: अफ़्रीका और दक्षिणी अमेरिका एक दूसरे के साथ ऐसे फ़िट होते हैं
जैसे किसी चित्र पहेली का भाग हों । इसके अलावा गुलाबी रंग से दर्शायी हुयी
एक प्रकार की चट्टानों एवं भूसंरचना का अफ़्रीका और दक्षिणी अमेरिका में पाया
जाना इस थ्योरी को अधिक बल प्रदान करती है ।
चित्र २: विभिन्न प्रायद्वीपों की लाखों वर्ष पहले की स्थिति
चित्र ३: एक एनिमेशन जिसके द्वारा आप देख सकते हैं कि समय के साथ
विभिन्न प्रायद्वीप किस प्रकार अलग अलग हुये ।
इस चित्र में आप देख सकते हैं कि केवल चट्टाने ही नहीं बल्कि विभिन्न जीवों के जीवाश्म भी इस थ्योरी को बल प्रदान करते हैं ।
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बुधवार, मई 07, 2008
बिना मेहनत पी.एच.डी. करें, कोई क्लास एक्जाम भी नहीं!!!
आज तो हद ही हो गयी, रोज लगभग ५०-१०० ईमेल आती रहती थीं तरह तरह के आफ़रों के साथ, ऐसे आफ़र जो सडक पर चादर बिछाकर रंग बिरंगी शीशी में जादुई दवाई बेचने वालों को भी मात कर दें । लेकिन हमने कुछ नहीं कहा । आज तो सब्र का इम्तिहान हो गया । लीजिये पढिये इसको...
Sub: No Exam or Class required
Obtain a prosperous future, money-earning power and the prestige that comes with having the career position you've always dreamed of. Diplomas from prestigious non-accredited universities based on your present knowledge and life experience.
No required tests, classes, books or examinations.
Bachelors', Masters', MBA's, Doctorate & Ph.D. degrees available in your field.
Confidentiality Assured..
Call Now To Receive Your Diploma Within 2 Weeks
1-512-853-9382
हिन्दी अनुवाद:
विषय: किसी क्लास और एक्जाम की जरूरत नहीं
एक्दम जोरदार और झक्कास भविष्य बनायें । पैसा कमायें और साथ इज्जत भी । अपने बचपन के सपने को पूरा करें, हजारों कालेज, यूनिवर्सिटी से डिप्लोमा प्राप्त करें । एक डिग्री के साथ दूसरी एकदम मुफ़्त (चलो ये मैने जोड दिया है :-) )।
कोई एडमीशन नहीं, कोई क्लास नहीं, कोई किताब नहीं और न ही कोई परीक्षा
आपकी पहचान भी गुप्त रखी जायेगी, जिससे आप डिप्लोमा से अपनी दुकान खोल सकें ।
तुरन्त काल करें और अपना डिप्लोमा २ हफ़्ते में प्राप्त करें ।
फ़ोन नंबर: १-५१२-८५३-९३८२
दो हफ़्ते में अपना पी.एच.डी. डिप्लोमा मंगाये, वो भी बिना क्लास और एक्जाम के । दुआ करते हैं कि पिताजी को ये खबर न हो जाये, वरना उनका शक कि बेटा एकदम नाकारा है विश्वास में बदल जायेगा ।
गया आज का दिन तो पानी में, इस मेल को भी सुबह सुबह ही आना था :-)
बू हू हू.....
कोई दर्द को और न बढा दे, इसीलिये अपनी टिप्पणियों में इन बातों का ख्याल रखें :-)
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बू हू हू.....
कोई दर्द को और न बढा दे, इसीलिये अपनी टिप्पणियों में इन बातों का ख्याल रखें :-)
गुरुवार, मई 01, 2008
तेल और भविष्य के ऊर्जा स्रोत : भाग १
चिट्ठाजगत कभी कभी मुझे अचंभित कर देता है । आज ही मैने "Peak Oil Panel Discussion" में भागीदारी की और आज ही अपने ज्ञानदत्त पाण्डेयजी ने तेल पर एक लेख लिख डाला । मैं इस पैनल डिस्कशन के बाद ऊर्जा और तेल पर लेखों की एक सीरीज लिखने के बारे में सोच रहा था लेकिन पाण्डेय जी ने अपने लेख से उस सोच को मूर्त रूप दिया है । इसलिये पेश है इस सीरीज का पहला लेख:
पिछले कुछ महीनो में शायद कोई ही हो जिसने कच्चे तेल की बढती कीमतों पर विचार न किया हो । कल कच्चे तेल का दाम ~ १२० डालर प्रति बैरल था; लेकिन आज से लगभग ४ वर्ष पहले ५० डालर प्रति बैरल का दाम असम्भावित सा लगता था । मैं अपनी रोजी रोटी तेल से सम्बन्धित शोध कार्य से कमाता हूँ इसलिये इस क्षेत्र की अधिक से अधिक जानकारी रखना मेरी मजबूरी है । इस विषय से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर देने के लिये मैं इस सीरीज को आरम्भ कर रहा हूँ और मुझे खुशी होगी अगर आपके प्रश्नों को इस सीरीज में शामिल किया जा सके ।
तेल से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
१) क्या अगले १०-२०-३० वर्षों में तेल समाप्त हो जायेगा ?
२) अगर नहीं तो तेल का दाम अगले वर्षों में क्या होगा ?
३) तेल के बाद का भविष्य क्या है ? क्या तेल के समाप्त होने के बाद हम आर्थिक स्पाईरल (Downwards) देखेंगे ?
४) तेल के आगे और जहाँ कौन कौन से हैं?
आज हमारे पास कितना तेल बचा है इसका अलग लोगों के पास अलग जवाब है । लेकिन उससे पहले कुछ तथ्य इस प्रकार हैं । आज तक कुल मिला कर हम सब ने लगभग १ ट्रिलियन बैरल तेल का उपयोग किया है ।
१ ट्रिलियन बैरल = १००० बिलियन बैरल = १०००,००० मिलियन बैरल = १०^(१२) बैरल
तेल के मामले में हबर्ट का सिद्धान्त बेहद प्रसिद्ध है । हबर्ट के अनुसार जब कच्चे तेल का उत्पादन अपने चरम पर होगा उस समय तक हमने अपने तेल का ५० प्रतिशत भाग प्रयोग कर लिया होगा । उसके बाद चाहकर भी हम तेल का उत्पादन एक निश्चित दर पर नहीं रख पायेंगे और तेल का उत्पादन गिरता रहेगा जब तक कि हम पूरा तेल प्रयोग नहीं कर लेते । हबर्ट ने अमेरिका के सन्दर्भ में कहा था कि तेल का उत्पादन १९६८ में अपने चरम पर होगा और १९७० में अमेरिका में तेल का उत्पादन अपने चरम पर था । १९७० के बाद अमेरिका में तेल का उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है । इस लिहाज से देखा जाये तो हबर्ट का सिद्धान्त अमेरिका के सन्दर्भ में लगभग सही सिद्ध सा होता दिखता है ।
अगला महत्वपूर्ण प्रश्न है, कि क्या ग्लोबल तेल उत्पादन में भी हबर्ट का सिद्धान्त लागू होता है । क्या ग्लोबल तेल उत्पादन भी अपने चरम पर आकर गिरना शुरू होगा ? अगर हाँ तो ये कब होगा, या फ़िर ग्लोबल तेल उत्पादन अपने चरम पर आ चुका है ? यदि ऐसा है तो क्या हमारे पास केवल अगले १०-२०-३० साल का तेल बाकी है ? अगले कुछ सालों में तेल के दाम बढने/घटने की क्या सम्भावना है ? भारत और चीन जैसे विकासशील देश ग्लोबल तेल की आपूर्ति और दामों पर क्या असर कर रहे हैं ?
इस सीरीज में हम ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे । इस सीरीज की पहली कडी को पूर्ण करने के लिये हम एक प्रश्न की तह में जाने का प्रयास करेंगे । बाकी महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर क्रमश: अगली कडियों में मिलेंगे ।
प्रश्न १: आखिर कुल कितना तेल बाकी है इस धरती पर ???
उत्तर: कच्चे तेल को दो प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है । पहला Conventional Oil और दूसरा Un-Conventional Oil । Conventional Oil का मतलब है कि ऐसा तेल स्रोत जिससे अभी तक तेल निकाला जाता रहा है । उदाहरण के तौर पर सऊदी अरब, मेक्सिको, लिबिया, नाईजिरिया और अन्य सभी सुने हुये स्रोत । Conventional Oil निकालने के लिये तरीका आसान है । पहले तेल का कुँआ खोदकर Pressure Depletion से जितना तेल निकले निकाल लो । उसके बाद पानी Inject करके और तेल निकालो । Conventional Oil लगभग ६ से ९ ट्रिलियन बैरल की मात्रा में उपलब्ध है ।
Un-conventional Oil के कई प्रकार हैं, कनाडा में उपलब्ध Tar sand, अमेरिका और अन्य स्थानों पर उपलब्ध Oil Shale और अन्य भारी तेल के स्रोत । इसके बारे में इतना समझ लें कि ये टेढी खीर है । इस प्रकार के तेल की श्यानता (Viscosity) इतनी अधिक होती है कि ये आसानी से बहता (Flow) नहीं करता है और इसके बारे में आजकल काफ़ी शोध चल रहा है । Un-Conventional Oil लगभग २ से ७ ट्रिलियन बैरल की मात्रा में उपलब्ध है ।
इसके अलावा महत्वपूर्ण है कि इसमें से Recovery Efficiency क्या है ? मान लीजिये १०० बैरल तेल मौजूद है तो इसमें से अगर आप ४० बैरल निकाल पायें तो आपकी Recovery Efficiency 40 % हुयी । आजकल ग्लोबली Recovery Efficiency लगभग ३०-३५ % है । Un-Conventional Oil के सन्दर्भ में Recovery Efficiency लगभग १०-२० % है ।
इस लिहाज से देखा जाये तो अभी भी लगभग ४-६ ट्रिलियन बैरल तेल अभी और निकाला जा सकता है । दूसरे शब्दों में अभी केवल एक चौथाई से भी कम तेल निकाला गया है । इस अंदाजे से अभी ग्लोबल हबर्ट पीक दूर की कौडी है । तेल मौजूद है बस निकालने वाले चाहिये । इसमें भी एक समस्या है, अगर तेल की माँग बढती गयी और इसी दर से तेल की आपूर्ति नहीं बढी तो निश्चित तौर पर तेल के दाम बढेंगे । जैसे जैसे तेल के दाम बढेंगे, तेल कम्पनियों का फ़ायदा बढेगा और तेल कम्पनियाँ Un-Conventional Oil/Alternate Energy में निवेश करके भविष्य के तेल/ऊर्जा की माँग के सन्दर्भ में आपूर्ति सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगी ।
बाटम लाईन: अभी चिंतित होने की जरूरत नहीं है । तेल है और अगले ३०-५०-६०-८०-१०० वर्षों तक रहेगा । लेकिन केवल तेल के रहने से समस्यायें हल नहीं होंगी, इसीलिये इस लेख की अगली कडी में हम अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करेंगे ।
यदि इस सन्दर्भ में आपके कोई प्रश्न हैं तो आप टिप्पणी के माध्यम से पूछ सकते हैं । हम उनके उत्तर देने का भरसक प्रयास करेंगे ।
पिछले कुछ महीनो में शायद कोई ही हो जिसने कच्चे तेल की बढती कीमतों पर विचार न किया हो । कल कच्चे तेल का दाम ~ १२० डालर प्रति बैरल था; लेकिन आज से लगभग ४ वर्ष पहले ५० डालर प्रति बैरल का दाम असम्भावित सा लगता था । मैं अपनी रोजी रोटी तेल से सम्बन्धित शोध कार्य से कमाता हूँ इसलिये इस क्षेत्र की अधिक से अधिक जानकारी रखना मेरी मजबूरी है । इस विषय से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर देने के लिये मैं इस सीरीज को आरम्भ कर रहा हूँ और मुझे खुशी होगी अगर आपके प्रश्नों को इस सीरीज में शामिल किया जा सके ।
तेल से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
१) क्या अगले १०-२०-३० वर्षों में तेल समाप्त हो जायेगा ?
२) अगर नहीं तो तेल का दाम अगले वर्षों में क्या होगा ?
३) तेल के बाद का भविष्य क्या है ? क्या तेल के समाप्त होने के बाद हम आर्थिक स्पाईरल (Downwards) देखेंगे ?
४) तेल के आगे और जहाँ कौन कौन से हैं?
आज हमारे पास कितना तेल बचा है इसका अलग लोगों के पास अलग जवाब है । लेकिन उससे पहले कुछ तथ्य इस प्रकार हैं । आज तक कुल मिला कर हम सब ने लगभग १ ट्रिलियन बैरल तेल का उपयोग किया है ।
१ ट्रिलियन बैरल = १००० बिलियन बैरल = १०००,००० मिलियन बैरल = १०^(१२) बैरल
तेल के मामले में हबर्ट का सिद्धान्त बेहद प्रसिद्ध है । हबर्ट के अनुसार जब कच्चे तेल का उत्पादन अपने चरम पर होगा उस समय तक हमने अपने तेल का ५० प्रतिशत भाग प्रयोग कर लिया होगा । उसके बाद चाहकर भी हम तेल का उत्पादन एक निश्चित दर पर नहीं रख पायेंगे और तेल का उत्पादन गिरता रहेगा जब तक कि हम पूरा तेल प्रयोग नहीं कर लेते । हबर्ट ने अमेरिका के सन्दर्भ में कहा था कि तेल का उत्पादन १९६८ में अपने चरम पर होगा और १९७० में अमेरिका में तेल का उत्पादन अपने चरम पर था । १९७० के बाद अमेरिका में तेल का उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है । इस लिहाज से देखा जाये तो हबर्ट का सिद्धान्त अमेरिका के सन्दर्भ में लगभग सही सिद्ध सा होता दिखता है ।
अगला महत्वपूर्ण प्रश्न है, कि क्या ग्लोबल तेल उत्पादन में भी हबर्ट का सिद्धान्त लागू होता है । क्या ग्लोबल तेल उत्पादन भी अपने चरम पर आकर गिरना शुरू होगा ? अगर हाँ तो ये कब होगा, या फ़िर ग्लोबल तेल उत्पादन अपने चरम पर आ चुका है ? यदि ऐसा है तो क्या हमारे पास केवल अगले १०-२०-३० साल का तेल बाकी है ? अगले कुछ सालों में तेल के दाम बढने/घटने की क्या सम्भावना है ? भारत और चीन जैसे विकासशील देश ग्लोबल तेल की आपूर्ति और दामों पर क्या असर कर रहे हैं ?
इस सीरीज में हम ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे । इस सीरीज की पहली कडी को पूर्ण करने के लिये हम एक प्रश्न की तह में जाने का प्रयास करेंगे । बाकी महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर क्रमश: अगली कडियों में मिलेंगे ।
प्रश्न १: आखिर कुल कितना तेल बाकी है इस धरती पर ???
उत्तर: कच्चे तेल को दो प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है । पहला Conventional Oil और दूसरा Un-Conventional Oil । Conventional Oil का मतलब है कि ऐसा तेल स्रोत जिससे अभी तक तेल निकाला जाता रहा है । उदाहरण के तौर पर सऊदी अरब, मेक्सिको, लिबिया, नाईजिरिया और अन्य सभी सुने हुये स्रोत । Conventional Oil निकालने के लिये तरीका आसान है । पहले तेल का कुँआ खोदकर Pressure Depletion से जितना तेल निकले निकाल लो । उसके बाद पानी Inject करके और तेल निकालो । Conventional Oil लगभग ६ से ९ ट्रिलियन बैरल की मात्रा में उपलब्ध है ।
Un-conventional Oil के कई प्रकार हैं, कनाडा में उपलब्ध Tar sand, अमेरिका और अन्य स्थानों पर उपलब्ध Oil Shale और अन्य भारी तेल के स्रोत । इसके बारे में इतना समझ लें कि ये टेढी खीर है । इस प्रकार के तेल की श्यानता (Viscosity) इतनी अधिक होती है कि ये आसानी से बहता (Flow) नहीं करता है और इसके बारे में आजकल काफ़ी शोध चल रहा है । Un-Conventional Oil लगभग २ से ७ ट्रिलियन बैरल की मात्रा में उपलब्ध है ।
इसके अलावा महत्वपूर्ण है कि इसमें से Recovery Efficiency क्या है ? मान लीजिये १०० बैरल तेल मौजूद है तो इसमें से अगर आप ४० बैरल निकाल पायें तो आपकी Recovery Efficiency 40 % हुयी । आजकल ग्लोबली Recovery Efficiency लगभग ३०-३५ % है । Un-Conventional Oil के सन्दर्भ में Recovery Efficiency लगभग १०-२० % है ।
इस लिहाज से देखा जाये तो अभी भी लगभग ४-६ ट्रिलियन बैरल तेल अभी और निकाला जा सकता है । दूसरे शब्दों में अभी केवल एक चौथाई से भी कम तेल निकाला गया है । इस अंदाजे से अभी ग्लोबल हबर्ट पीक दूर की कौडी है । तेल मौजूद है बस निकालने वाले चाहिये । इसमें भी एक समस्या है, अगर तेल की माँग बढती गयी और इसी दर से तेल की आपूर्ति नहीं बढी तो निश्चित तौर पर तेल के दाम बढेंगे । जैसे जैसे तेल के दाम बढेंगे, तेल कम्पनियों का फ़ायदा बढेगा और तेल कम्पनियाँ Un-Conventional Oil/Alternate Energy में निवेश करके भविष्य के तेल/ऊर्जा की माँग के सन्दर्भ में आपूर्ति सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगी ।
बाटम लाईन: अभी चिंतित होने की जरूरत नहीं है । तेल है और अगले ३०-५०-६०-८०-१०० वर्षों तक रहेगा । लेकिन केवल तेल के रहने से समस्यायें हल नहीं होंगी, इसीलिये इस लेख की अगली कडी में हम अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करेंगे ।
यदि इस सन्दर्भ में आपके कोई प्रश्न हैं तो आप टिप्पणी के माध्यम से पूछ सकते हैं । हम उनके उत्तर देने का भरसक प्रयास करेंगे ।
मंगलवार, अप्रैल 29, 2008
एक ठुमरी और तीसरी कसम का गीत संवादों के साथ बोनस में !!!
आजकल समय कम होने के कारण संगीत पर पोस्ट ठेलना ज्यादा आसान लगता है । फ़टाफ़ट काम हो जाता है और आपकी शुभकामनायें मिलती हैं, वो अलग :-)
पहला गीत: भैरवी राग (तीन ताल) में एक ठुमरी है जिसे पण्डित अजय पोहनकर ने गाया है । ठुमरी के बोल हैं, "कैसी ये भलाई"
दूसरा खास बोनस गीत फ़िल्म तीसरी कसम का है । इसकी खासियत है कि गीत के बीच बीच में राज कपूर साहब की आवाज में संवाद । मेरा दावा है कि इसे सुनकर आपको फ़िल्म की याद आ जायेगी ।
Technorati Tags भैरवीं,पं,अजय,पोहानकर,तीसरी,कसम
पहला गीत: भैरवी राग (तीन ताल) में एक ठुमरी है जिसे पण्डित अजय पोहनकर ने गाया है । ठुमरी के बोल हैं, "कैसी ये भलाई"
दूसरा खास बोनस गीत फ़िल्म तीसरी कसम का है । इसकी खासियत है कि गीत के बीच बीच में राज कपूर साहब की आवाज में संवाद । मेरा दावा है कि इसे सुनकर आपको फ़िल्म की याद आ जायेगी ।
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