रविवार, जुलाई 22, 2007

सुख, सफ़लता और संतुष्टि के चक्रव्यूह में फ़ँसी दुनिया !!!

क्या आप अपने जीवन से संतुष्ट हैं ?
सफलता और संतुष्टि के बीच का संबंध क्या है ?
क्या संतुष्टि और सुख एक दूसरे के पूरक हैं ?

सुखिया
ये संसार है खावे अरू सोये, दुखिया दास कबीर है जागे अरू रोये

ऐसे कितने ही सवाल हमारे सामने प्रतिदिन आते हैं और हम अक्सर उन्हें टालकर अथवा बिना विचारे कोई दार्शनिक तर्क देकर आगे बढ जाते हैंलेकिन उसके बाद भी ये प्रश्न हमारा पीछा नहीं छोड़ते हैंमेरी समझ में सुख और संतुष्टि दोनो ही आपके "मन", "विचार" और "कर्मों" के आपसी संतुलन और साम्य पर निर्भर करती हैकम से कम मेरे जीवन में ये साम्य और संतुलन अभी स्थापित नहीं हो सका है; इस दिशा में प्रयासरत अवश्य हूँ देखिए कब मेहनत रंग लाती है

कथनी और करनी का अंतर, विचार और आचार की भिन्नता, स्वयं के व्यवहार पर खिन्नता और मन के अन्दर सदैव चलने वाला अंतर्कलह सब एक ही तो हैं बात बड़ी सरल सी लगती है और सरल बात इतनी आसानी से समझ नहीं आती

इस छोटे से जीवन में मुझे कुछ विलक्षण प्रतिभा के धनी महापुरुषों के साथ कुछ समय बिताने का सुअवसर मिला और उन सभी के व्यक्तित्व में मुझे एक बात समान लगी, उन सब के आचरण और व्यवहार में मुझे एक अजीब सी सहजता दिखीबहुत से लोग अपने व्यक्तित्व में इस सहजता को जबरन ठूँसने का प्रयास करते हैंलेकिन ये प्रयास उसी प्रकार असफल हो जाते हैं जैसे कि युवाओं में "कूल" दिखने के प्रयासकिसी ने कहा है कि अगर आप "कूल" हैं तो आपको "कूल" दिखने के किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं हैउसी प्रकार व्यवहार और आचरण की सहजता अपने आप ही आती हैआप इस प्रकार के आचरण का झूठा लबादा देर तक नहीं ओढ़ सकतेआपके मन और चरित्र की दुर्बलातायें उस ओढे हुये लबादे तो तार तार करने में देर नहीं लगाती

अब प्रश्न ये उठता है कि क्या इस प्रकार की व्यवहार की सहजता को प्रयास से अर्जित किया जा सकता है ? क्या निरन्तर प्रयास के द्वारा आप सच जैसा दिखने वाला झूठा लबादा ओढ सकते हैं ? इस प्रकार के प्रयासो का आपके व्यक्तित्व और मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड सकता है ? दूसरों को जताना कि आप बडे सहज हैं आसान है; लेकिन स्वयं के मस्तिष्क को इतना ट्रेन करना कि आप झूठा लबादा सहजता से ओढे रहें अलग बात है । मेरी राय में ऐसे प्रयासों का सफल होना मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं । इसके अलावा अगर आप इस प्रकार की झूठी सहजता को ओढने में सफ़ल हो भी जायें तो भी दोहरा जीवन जीने की विडम्बना के रूप में एक कीमत आपको देनी ही पडती है ।

"Ayn Rand" बड़ी ही प्रसिद्ध लेखिका हैं। "Atlas Shrugged" और "Fountainhead" उनके बडे प्रसिद्ध उपन्यास हैं । युवावस्था में जो भी उन्हें पढता है उनकी विचारधारा का मुरीद हो जाता हैमेरे साथ भी ऐसा ही हुआ लेकिन समय के साथ मेरे विचार बदल गयेआज मैं उन्हें केवल उन्हें एक सशक्त लेखिका के रूप में मानता हूँउनकी विचारधारा के प्रति आकर्षण के पीछे एक सशक्त लेखिका की चालबाजी हैकृपया "चालबाज" शब्द को अन्यथा लेंमेरा मंतव्य आगे चलकर स्पष्ट हो जायेगा

अपने लेखों और उपन्यासों में लेखिका दो प्रकार के किरदारों का निर्माण करती है । एक प्रकार के किरदार ऐसे होते हैं जो आपको उनकी ओर आकर्षित करते है, वो वे सभी कार्य करते हैं जो आप कभी करना चाहते थे/हैं । वो समाज में अपनी शर्तों पर जीते हैं, किसी की परवाह नहीं करते, अपने क्षेत्र में जीनियस हैं, वगैरह वगैरह... दूसरे प्रकार के किरदारों में आप अपनी झलक देखते हैं; कभी अपने मतलब के लिये जीने वाले, कभी गलत समझौते करने वाले, समाज के लिये कुछ और वास्तव में कुछ और...लेकिन इसके बाद भी अपने अन्तर्मन की आवाज उन्हे सदैव सताती रहती है । ऐसे में खुद के कॄत्यों के खिलाफ़ प्रतिरोध स्वयं जैसे किरदारों के प्रति घॄणा के रूप में स्फ़ुटित होता है ।

आप स्वयं एक प्रयोग कर सकते हैं, जिस व्यक्ति से आपको घृणा होती है उसके व्यक्तित्व की कोई ऐसी बात होती है जो आप स्वयं में भी पाते हैं (दूसरे लोग ये जानते हों जरूरी नहीं है ), और यही बात आपको कभी कभी बहुत परेशान करती है ।

अगर इस उपन्यास में केवल दूसरा किरदार (आपके जैसा) होता तो शायद आप उसे पसन्द भी करते, उसकी उपलब्धियों की अपनी उपलब्धियों से तुलना भी करते, "ये ही दुनिया है और जहाँ के कारखाने ऐसे ही चलते हैं" कहकर इतराते और सब कुछ मजे में रहता । लेकिन ये पहला वाला किरदार आपका चैन छीन लेता है । आप सोचते हैं कि ये बेवकूफ़ किरदार दुनिया से शिकायत भी तो नहीं करता । धीरे धीरे पहले किरदार के साथ हुआ हर छलावा आपको कचोटने लगता है । इच्छा होती है कि काश अगर घडी को उल्टा कर पाता तो मैं भी पहले किरदार की तरह जीवन बिताता । बस इसी क्षण लेखिका अपनी चालबाजी में सफ़ल हो जाती है । इसके बाद आप लेखिका की विचारधारा से प्रभावित नहीं होते बल्कि स्वयं की कमियाँ और एक काल्पनिक किरदार के तिलिस्म में कैद होकर रह जाते हैं ।

आगे भी जारी रहेगा......

शनिवार, जुलाई 21, 2007

वाद-विवादी भारतीय


आज आप लोगों से इंटरनेट पर अपने कुछ अनुभव आपके साथ बाँट रहा हूँ । पिछ्ले कुछ महीनों से मैं रेडिफ़ (www.rediff.com) पर लिखे जाने वाले लगभग सभी लेख और उनके नीचे लिखे पाठकों की टिप्पणियाँ पढ रहा हूँ । यही नहीं, और्कुट पर भी विभिन्न समूहों (Indian History, India, Hinduism, etc.) में होने वाले वाद-विवाद पर भी नजर रखता रहा हूँ । कुल मिलाकर मैं इस निष्कर्ष पर पँहुचा हूँ कि हम भारतीयों को वाद-विवाद में बडा सुख मिलता है । इस वाद-विवाद का उद्देश्य किसी आम सहमति अथवा परिणाम पर पँहुचना नहीं बल्कि केवल वाद-विवाद सुख होता है ।

तुमने ५ पंक्तियों का तर्क दिया है तो मेरा जवाब १० पंक्तियों का होगा । इंटरनेट पर वाद-विवाद में कुछ ट्रेंड भी देखने तो मिलते हैं । आम तौर पर ऐसा लगता है कि लगभग हर लेख पर वाद-विवाद की परिणति एक ही होती है । वाद-विवाद किसी एक तर्क से प्रारम्भ होकर आपस में गाली गलौज पर होते हुये इस स्तर पर उतर आता है कि बस पूछिये मत ।

पहले मैं आर्कुट पर भारतीय इतिहास नामक समूह में काफ़ी हद तक सक्रिय (पढने और लिखने दोनों) था । प्रारम्भ में वहाँ पर कुछ अच्छे विषयों पर विचार विमर्श हुआ परन्तु समय के साथ वहाँ पर भी वाद-विवाद का स्तर इतना गिर गया कि अब वहाँ जाने का मन भी नहीं करता । धीरे धीरे मुझे एहसास हुआ है कि इंटरनेट पर किसी विवाद में समय बिताने की अपेक्षा दोनों पक्षों से सम्बन्धित कुछ विश्वसनीय लेख अथवा पुस्तक पढना ज्यादा उपयोगी है । और अब मेरी भूमिका केवल एक तटस्थ दर्शक की रह गयी है । हाँलाकि बहुत से लोग "जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध" कहकर उकसाने का प्रयास करते हैं, लेकिन हम अपने आप को तटस्थ दर्शक बनाये हुये हैं ।

रेडिफ़ (Rediff) पर विभिन्न लेखों पर दी गयी टिप्पणियों को अगर आप लम्बे समय तक पढेगें तो आप अपने साथ एक खेल खेल सकते हैं । सुबह एक लेख पढिये और भविष्यवाणी कीजिये कि इस विषय पर टिप्पणियाँ क्या रंग दिखायेंगी । यकीन मानिये, ये काम बहुत मुश्किल नहीं है ।

मसलन, अगर किसी NRI से सम्बन्धित कोई खबर है तो वाद विवाद "भारतीयों में स्वयं के गौरव की कमी/सरकार की अमेरिका की चापलूसी/राजनीति में भ्रष्टाचार" जैसे मुद्दों को छुयेगी ।

क्रिकेट से सम्बन्धित खबर होने पर वाद विवाद "दक्षिण/ उत्तर/ बंगाल/ दिल्ली/ फ़िरंगी कोच/ क्रिकेट में पैसा/ हाकी की दुर्दशा" जैसे मुद्दों तक पँहुचेगा ।

साहित्य से संबन्धित किसी भी खबर पर मराठी/बंगाली/हिन्दी/तमिल के नाम पर जूतम पैजार होना आम बात है ।

इन सभी के बीच में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो वाद-विवाद को सही दिशा देने की कोशिश करते हैं लेकिन उनकी आवाज नक्कारखाने में दब कर रह जाती है । आप कह सकते हैं कि अगर ऐसे अधिक लोग हों तो सम्भवत: वाद-विवाद को संयत (Moderate) किया जा सकता है । परन्तु ऐसे वाद विवाद से क्या हासिल है ? मेरी राय में अपनी ऊर्जा को सहेज कर किसी अन्य दिशा में लगाना कहीं अधिक फ़ायदेमन्द होगा ।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी में एक गोलीय घोडे की परिकल्पना !!!

एक व्यक्ति का घोडा घुडदौड की प्रतियोगिताओं में लगातार हार रहा था । उसने सोचा कि क्यों न किसी वैज्ञानिक की सहायता ली जाये । सबसे पहले वो एक शोध संस्थान के सबसे पुराने सिविल अभियांत्रिकी विभाग में गया । वहाँ एक वैज्ञानिक ने सुझाया कि मैं एक ऐसा ट्रैक बनाऊँगा जहाँ केवल तुम्हारा घोडा ही प्रथम आयेगा । लेकिन प्रतियोगिता वाले ट्रैक पर कुछ भी सुधार संभव न था । फ़िर वो सबसे नये जैव प्रोद्योगिकी विभाग में गया तो एक महिला वैज्ञानिक ने कहा कि चिन्ता की कोई बात नहीं है, मैं तुम्हारे लिये घोडे की ऐसी नस्ल विकसित करूँगी जो दौडने में अव्वल आयेगा लेकिन इस काम में १५ वर्ष लगेंगे । अन्त में निराश होकर वापस लौटने से पहले उसने सोचा कि क्यों न भौतिकी विभाग में भी किसी से कोई राय ले ली जाये । एक बडी दाढी वाले वैज्ञानिक ने बहुत देर तक उसकी बातों को सुना, तमाम सवाल पूछे और एक कागज निकालकर कहा कि सबसे पहले इस समस्या के लिये पूर्वधारणायें (Assumptions) नोट कर लेते हैं । उसने लिखा:

१) एक गोलीय घोडे की परिकल्पना करते हैं (Let us assume a SPHERICAL horse) !!!

बताने की आवश्यकता नहीं कि बेचारा घोडा वाला अपने बाल नोंचता हुआ भाग गया ।

मैं पिछले लगभग चार वर्षों से (पहले भारतीय विज्ञान संस्थान और अभी राइस विश्वविद्यालय) शोधकार्य में संलग्न हूँ । मैने वास्तव में गोलीय घोडों जैसी अवधारणायें मानकर महत्वपूर्ण विषयों पर शोधकार्य होते देखा है । कई बार ऐसी हास्यास्पद परिकल्पनायें वास्तविक जीवन की समस्याओं (Real World Problems) को सुलझाने में सक्षम होती हैं । Pure Science के क्षेत्र में भले ही आपको ऐसी अवधारणाओं की आवश्यकता न पडे लेकिन व्यवहारिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी (Applied Science and Technology) के क्षेत्र में लगभग रोज ही ऐसी अवधारणाओं पर शोधकार्य किया जा रहा है ।

इसके दो कारण हैं । पहला तो शोधकार्य करने के लिये समय और संसाधनों का दवाब जिसके चलते आपको जल्दी जल्दी शोधपत्र लिखने पडते हैं । बजाय इसके कि आप अपनी परिकल्पना की हर पहलू से जाँच परख कर सकें, आप हर छोटे मोटे परिणामों को छापते रहते हैं । दूसरा कारण है कि गोलीय घोडे की अवधारणा के बावजूद अगर आपका विचार मौलिक है तो इसे छापना बहुत महत्वपूर्ण है । आपके शोधपत्र के छपते ही देश/विदेश में बैठे अन्य वैज्ञानिक आपकी अवधारणा में अन्य जरूरी तत्वों का समाधान करके नयी परिकल्पना प्रस्तुत करेंगे । इससे समस्या का समाधान अपने आप ही निखरता रहता है ।

अभी कुछ दिन पहले ज्ञानदत्तजी ने विष्णुकांत शास्त्रीजी के बारे में लिखते हुये कहा था कि शास्त्रीजी के अनुसार,

१) “मैं जितना लिख सकता था. उतना लिख नहीं पाया.... इसका बाहरी कारण मेरा बहुधन्धीपन रहा....इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि अल्प महत्व के तात्कालिक प्रयोजन वाले कार्य ही अधिकांश समय चाट जाते रहे और स्थायी महत्व के दीर्घकालिक प्रकल्प टलते रहे. लेखन भी इन्ही प्रकल्पों के अंतर्गत आता है.

२) “इससे भी अधिक गुरुतर कारण मेरा भीतरी प्रतिरोध रहा है. मेरी पूर्णता ग्रंथि ने मुझे बहुत सताया है. गंभीर विवेचनात्मक लेख लिखते समय मेरा अंतर्मन मुझे कुरेद-कुरेद कर कहता रहा है कि इस विषय पर लिखने के पहले तुम्हे जितना जानना चाहिये, उतना तुम नहीं जानते, थोड़ा और पढ़ लो, इस विषय के विशेषज्ञों से थोड़ा विचार विमर्श कर लो, तब लिखो......


एक वैज्ञानिक की मानसिक स्थिति को इससे बेहतर तरीके से व्यक्त करना असम्भव है । अपने लिये जहाँ एक तरफ़ उसे एक दीर्घकालीन शोधकार्य की दिशा निर्धारित करनी पडती है । वहीं दूसरी ओर अल्पावधि में महत्वपूर्ण शोध समस्याओं पर भी ध्यान केंद्रित करना पडता है । इसके अतिरिक्त यदि आप किसी विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं तो प्रशासनिक (administrative) जिम्मेदारियों के साथ साथ अपने विद्यार्थी शोधार्थियों की सहायता के लिये समय अलग से निकालना पडता है ।

किसी भी विषय पर शोधकार्य करने के लिये उस विषय पर पहले से किये गये शोधकार्य की जाँच पडताल करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है । अब तो लगभग हर शोध प्रकाशन आनलाईन उपलब्ध है, लेकिन पहले ये कार्य अत्यधिक मेहनत वाला होता था । मेरी व्यक्तिगत राय है कि आज प्रोद्योगिकी के युग में बहुत से लोग Literature Survey को उतना समय नहीं देते जितना उसे देना चाहिये । केवल आनलाईन खोज करके आप अपने Literature Survey की इतिश्री नहीं मान सकते क्योंकि इसके लिये आपको शोधपत्रों का बारीकी से अध्ययन करके Cross Referencing करनी पडती है ।

इसमें भी एक समस्या है । जिस गति से शोधपत्र छप रहे हैं उसके लिहाज से आप कभी भी विषय पर पूरी जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते । आपको कहीं न कहीं रेखा खींचनी पडेगी और अपना मौलिक कार्य प्रारम्भ करना पडेगा । एक अच्छे वैज्ञानिक को क्या करना चाहिये इसके बारे में वैज्ञानिकों में आपस में भी मतभेद हैं । कोई कहता है बिना समय व्यर्थ किये गोलीय घोडे की अवधारणा लेकर कार्य प्रारम्भ करना चाहिये और बीच बीच में अपनी अवधारणा को परिष्कॄत करना चाहिये । दूसरे लोग कहते हैं कि प्रारम्भ में पढने और Literature Survey में पर्याप्त समय लगाकर आप अपने लिये अच्छे दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं ।

ये लेख जरूरत से लम्बा न हो जाये इसके लिये मैं एक वैज्ञानिक लुडविग बोल्ट्ज्मैन (Ludwig Boltmann) का उदाहरण देता हूँ । Boltzmann जब अपने "गैसों के गति सम्बन्धी सिद्धान्त (Kinetic Theory of Gases)" पर कार्य कर रहे थे तो उस समय के वैज्ञानिकों ने उनके कार्य को गम्भीरता से नहीं लिया । Boltzmann ने एक जगह लिखा था :

I am now convinced that these attacks are based completely on misconceptions and that the role of the kinetic theory in science is far from being played out ... In my opinion it would be a loss to science if the kinetic theory were to fall into temporary oblivion because of the present, dominantly hostile mood, as, for example, the wave theory did because of NEWTON'S authority.

I am conscious of how powerless the individual is against the currents of the times. But in order to contribute whatever is within my powers so that when the kinetic theory is taken up once again, not too much will have to be rediscovered.

सच में किसी भी मूलभूत खोज के लिये ऐसे ही दॄढ निश्चय और विज्ञान के प्रति जुनून की हद तक समर्पण की आवश्यकता होती है । ये विडम्बना ही थी कि ऐसे जुझारू Boltzmann नें १९०६ में अवसाद की स्थिति में आत्महत्या कर ली थी ।



नीरज रोहिल्ला
२१ जुलाई, २००७

रविवार, जुलाई 15, 2007

निरपेक्ष सोच/मत प्रचार और आम आदमी !!!

अधिकांश लोग मानते हैं कि मनुष्य में निरपेक्ष रूप से सोचने समझने की शक्ति है और प्रयास करके वो नीर-क्षीर करने में सक्षम है । इस कल्पना के केन्द्र में पूर्वधारणा (assumption) है कि किसी भी विषय पर ज्ञान/जानकारी मुक्त रूप से उपलब्ध है । मुक्त रूप से मेरा तात्पर्य है कि विषय के पक्ष और विपक्ष दोनों के लिये जानकारी बिना किसी भेदभाव के उपलब्ध है । यह एक आदर्श स्थिति है और ऐसी विषयवस्तु की केवल कल्पना ही की जा सकती है । जैसे ही इस आदर्श स्थिति से भटकाव प्रारम्भ होता है व्यक्ति की नीर-क्षीर करने की प्रवत्ति और क्षमता पर बाहरी कारकों का प्रभाव महत्वपूर्ण हो जाता है ।

किसी भी विषय पर मत प्रचार (प्रोपागेंडा) करने के लिये इन कारकों का शोषण करना पडता है । शोषण अर्थात जन सम्पर्क के माध्यमों पर अपना एकाधिकार बनाने का प्रयास करना जिससे कि दूसरी विचारधारा का गला घोंटा जा सके । मत प्रचार भी कई चरणों में किया जाता है । पहले चरण में विषयसामग्री बनायी जाती है । प्रोपागेंडा फ़ैलाने का सबसे महत्वपूर्ण नियम है कि विषयसामग्री विस्तारपूर्ण हो और अधिक से अधिक विचारबिन्दु दे । विचारबिन्दु विषय के बारे में कम और पढने वाले की मानसिकता/सोच और सांस्कृतिक विचारों को ध्यान में रखकर लिखे जाते हैं । प्रत्येक विचारबिन्दु अपने आप में अधूरा होता है, परन्तु यदि पढते समय आपके मन में संदेह न हो तो ऊपरी तौर पर आप इससे सहमत होते दिखते हैं । विचारबिन्दु आपस में असम्बद्ध (डिसकनेक्टेड) और मूल विषय से विसंगति लिये होते हैं । विषयसामग्री का विस्तार इसलिये आवश्यक है जिससे कि जागरूक पाठक प्रस्तुत किये तर्कों को सत्यापित करने का प्रयास न करे । पाठक को विश्वास में लेने के लिये अक्सर सर्कुलर रेफ़रेंसिग का प्रयोग किया जाता है । सर्कुलर रेफ़रेंसिग से आशय है कि बीस लेख अगर एक दूसरे का रेफ़रेंस दें तो हर लेख में कम से कम बीस रेफ़रेंस होंगे ।

एक बार मसौदा पूरा हो गया तब दूसरे चरण में इसको वितरित करने का कार्य किया जाता है, इसमें कार्यकर्ताओं/धन इत्यादि कि सबसे अधिक आवश्यकता होती है । इंटरनेट की क्रान्ति आने से ये कार्य थोडा आसान हो गया है । जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ आज हर कोई अपने को किसी भी विषय का विशेषज्ञ बता सकता है, अपना लिखा अगर आप peer reviewed जनरल/पत्रिकाओं में प्रकाशित नहीं कर सकते तो एक वेबसाईट खोलिये, अपनी पूरी सामग्री वहाँ पर रखिये और प्रचार प्रारम्भ कर दीजिये ।

प्रोपागेंडा फ़ैलाने के दूरगामी प्रभाव होते हैं । एक बार अगर आप अपनी बात फ़ैलाने में सफ़ल हो गये तो लोग जी जान लगा लें जन मानस से उसको निकालना बडा कठिन होता है । यही कारण है कि सैक्षिक/सैद्धांतिक अथवा व्यवसायिक, लगभग हर क्षेत्र में आपको प्रोपागेंडा दिखायी दे जायेगा (अगर आप देखना चाहें तो ) ।

ऐसे लेखों से बचने के उपाय:

१) अगर किसी विषय पर आपकी जानकारी कम है तो सन्तुलित/परिमित (Conservative) दिशा लेनी चाहिये । अर्थात अच्छे प्रकाशन की पुस्तक को किसी व्यक्तिगत लेख से ज्यादा तरजीह देनी चाहिये ।

२) अच्छी जानकारी जुटाने के लिये आलस्य न करें, किसी विषय पर शोध करने के लिये विश्वविद्यालयों के पुस्तकालय इंटरनेट पर की गयी सर्च से ज्यादा मुफ़ीद स्थान हैं ।

३) आइन्स्टीन के भौतिकी के अतिरिक्त किसी अन्य विषय पर लिखे लेखों को आँख मूंदकर सत्य मान लेना आत्महत्या जैसा होगा । अक्सर किसी एक विषय के प्रकाण्ड विद्वान दूसरे विषय में पक्षपाती (Prejudiced) हो सकते हैं इसीलिये अपने विवेक का प्रयोग करें ।

४) बहुत से लोग इतिहास/दर्शन/साहित्य/कला पर अपनी खुद को सोच को शोध का रूप देनें का प्रयास करते हैं । इन विषयों पर भी शोध करने के लिये विषय की पृष्ठभूमि और शोध कौशल की उतनी ही आवश्यकता होती है जितनी कि भौतिकी अथवा गणित में शोध करने के लिये होती है।

इस लेख पर आप अपने विचार अपनी टिप्पणियों के माध्यम से बता सकते हैं ।

नीरज रोहिल्ला
१५ जुलाई, २००७

सोमवार, जुलाई 09, 2007

स्तरीय साहित्य से नयी पीढी को अवगत करायें !!!

मैं इस पोस्ट के माध्यम से सभी हिन्दी ब्लागर बंधुओं से एक निवेदन कर रहा हूँ । आशा है आप सभी यथासंभव सहायता करेंगे ।

हिन्दी साहित्य में मेरी जो भी रूचि है वो कक्षा ६ से लेकर १२ तक पढी हुयी (खूब रस लेकर पढी हुयी) पाठ्यक्रम की हिन्दी पुस्तकों की देन है । उन पुस्तकों के माध्यम से नामी हिन्दी लेखकों के नाम सुने, उनकी कालजयी रचनाओं के कुछ अंश पढे । अधिकांश नाम धीरे धीरे भूल गये लेकिन थोडा बहुत कुछ याद रह गया और साथ में जिन्दा रही स्तरीय हिन्दी रचनाओं को पढने के बाद के सुख की अनुभूति । उसके बाद तो हिन्दी साहित्य पढने का मौका बस ढूँढते ही रह गये और कुल चार-छ: पुस्तकें (मधुशाला, मुझे चाँद चाहिये, मॄत्युंजय आदि) ही पढ पाये ।

हिन्दी चिट्ठाजगत में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिन्होने उत्तम हिन्दी साहित्य का रसास्वादन किया है । अनूपजी ने राग दरबारी से अवगत कराया । उन्होनें उसके कुछ अंश एक चिट्ठे पर डाले और पढकर इतना अच्छा लगा कि आनलाइन सरकारी पुस्तकालय की साईट से उसको पूरा पढे बिना चैन न आया । हिन्दी विकीपीडिया पर भी काफ़ी समय बिताया और कुछ नये/पुराने लेखकों की रचनाओं का पता चला ।

अब मैं मुद्दे की बात पर आता हूँ और बताता हूँ कि मेरी आपसे क्या आकांक्षायें हैं ।

१) हमें अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर हिन्दी के कवि/लेखक/आलोचक इत्यादि की ऐसी सूची बनानी है कि जिसका प्रिंट लेकर व्यक्ति पुरानी दिल्ली की नयी सडक और चुनिन्दा जगह जाये तो हिन्दी किताबों के ढेर में से उस सूची की मदद से अच्छे साहित्य की खोज कर सके ।

२) हिन्दी लेखकों की वर्तमान पीढी की साहित्यिक गतिविधियों के बारे में जानकारी बतायी जाये । आखिर पता तो चले के वर्तमान पीढी के लेखक कौन हैं और वो कैसा साहित्य रच रहें हैं ।

३) आप अपनी पसन्द के लेखक/कवियों की सूची और उनकी कालजयी रचनाओं के बारे में अपना ज्ञान सभी से बाँटे ।

इस प्रकार की जानकारी को प्रकाशित करके यदि अक्षरग्राम सर्वज्ञ अथवा हिन्दी विकिपीडिया पर रखा जाये तो काफ़ी लोग इससे लाभान्वित हो सकते हैं ।

मैने अपनी बात को कम शब्दों में कहा है लेकिन आशा है आप मेरा अभिप्राय समझ गये होंगे । तो फ़िर देर किस बात की है, चालू हो जाइये अपने चिट्ठे पर या कहीं और भी अपनी पसन्द के साहित्यकारों के बारे में जानकारी बाँटने के लिये ।

ताज को वोट न देकर क्या बडा तीर मार लिया !!!

कोई कह रहा था कि प्रेम से ताज महल के लिये फ़टाफ़ट वोट करें;
किसी ने कहा कि ये ताज पर वोटिंग भी एक मुद्दा ही है;
कोई बोला नहीं देते ताज को वोट, का कल लोगे?
किसी को चिन्ता कि ताज के नाम पर देश लुटा जा रहा है;
कोई बोला कि मैं तो भोलेपन में ताज को वोट करके लुट गया;
किसी ने वोट न देने पर बधाईयाँ बाँटी;
और आखिर में किसी ने पूछा कि क्या वाकई ताज नंबर वन है?

हो सकता है एक-दो पोस्ट छूट गयी हो लेकिन हमारे ब्लागजगत में ये "ताजमहल की वोटिंग" भी एक मुद्दा ही था । मैं भी आज तक इसे एक मुद्दा ही समझ रहा था लेकिन अपने लैब से कालेज की पार्किंग लाट की ओर टहलते हुये सहसा लगा कि किसी ने हमें पुकारा । पलटकर देखा तो कोई नहीं था, हम फ़िर आगे बढे ही थे कि फ़िर आवाज आयी, "मूर्खराज, कहाँ जा रहे हो?" आजू-बाजू देखा तो कोई नहीं था फ़िर गौर से सुना कि आवाज अंदर से ही आ रही थी । क्या मेरा अन्तर्मन स्वयं को मूर्खराज कह रहा था ? जी हाँ, सत्य तो यही था कि मैं स्वयं को मूर्खराज महसूस कर रहा था ।


आप सोच रहे होंगे, कि पक्का मैने भी ताज को वोट दिया होगा और इसका अफ़सोस अब हो रहा होगा कि मैं इत्ता बडा मूर्ख कैसे बन गया । बिल्कुल गलत । मैने ताज को वोट नहीं दिया और इस कारण मैं स्वयं को बेवकूफ़ समझ रहा था । चलिये थोडा विस्तार में समझाते हैं ।

मान लीजिये कि हमें ताज को वोट करना होता तो हम क्या करते । एक झटके में वोटिंग वाली वेबसाईट खोलते, दूसरे झटके में रजिस्टर होते, और तीसरे झटके में वोट डाल देते । जेब से आठ आने भी खर्च न होते (भाई, स्कूल में मुफ़्त का इंटरनेट है और घर वाले इंटरनेट के लिये हर महीने पैसे दे ही रहे हैं), कौन सी बडी बात हो जाती । मन खुश रहता थोडी देर, और जब भी वोटिंग की बात चलती हम टुन्नाकर कहते भईया हम तो पहले ही वोट डाल चुके हैं । आते जाते चार लोगों को और बता देते कि तुम भी वोट डाल आओ ।

हमने वोट न डाला, उससे क्या हुआ ? एक तो मन में जिद (थोडा गुस्सा भी) थी कि वोट करेंगे तो बिना रजिस्टर किये और अपने ईमेल पते से किसी को कमाई न करने देंगे । इस जिद में थोडा खून जला क्योंकि मन तो कर ही रहा था वोट करने का । फ़िर जब जब वोट करने के लिये फ़ारवर्ड ईमेल के जरिये संदेश आये, थोडा खून फ़िर जला कि कैसे बेवकूफ़ लोग हैं जरा भी नहीं समझते कि कोई इन्हे उल्लू बना रहा है । फ़िर अगर किसी ने गलती से टोक दिया कि भईया वोट डाला कि नहीं तो हमारे शरीर में काटो तो खून नहीं ।


ध्यान दीजिये कि दिन में कम से कम ६०-८० ईमेल आती हैं, कम से कम (नहीं बतायेंगे कि कितना समय) इंटरनेट पर फ़िजूल बिताते हैं । बीसियों स्पाम ईमेल आती हैं, इसका मतलब मेरा ईमेल पहले ही नीलाम हो चुका है । अब ऐसे में जब अठन्नी भी खर्च न होनी थी, तो वोट न करके मैने और कुछ और लोगों ने कौन सा तीर मार लिया ?

मान लीजिये कि ताज को वोट करने में देशवासियों के ४-६ रूपये खर्च भी हो जाते तो क्या होता ? जो पहले से जेब में ५०००-१५००० का मोबाइल धरे घूम रहा है, ४-६ रूपये अगले नुक्कड पर गुटखे में खर्च कर देता या कोक/पेप्सी पी लेता तो उसका स्वास्थ्य भी तो खराब होता । होता कि नहीं? वो तो तब भी बेवकूफ़ बनता है जब १० रूपये की काफ़ी कैफ़े डे में २०० रूपये में पीता है । क्या तब वो बेवकूफ़ नहीं बनता जब वो दिन भर घर पर स्कूल से भागकर क्रिकेट देखता है ?

जब हम दिन में हजार बार बेवकूफ़ बन ही रहे हैं तो हमने मुफ़्त में या ४-६ रूपये खर्च करके अपना आत्मसम्मान बढाने या फ़िर फ़ील गुड करने का एक मौका खो दिया । वो तो अच्छा हुआ कि मेरे वोट के बिना भी ताजमहल सात अजूबों में शामिल हो गया वरना पता नहीं कितने दिनों ये दुख कलेजा दुखाता रहता ।

किसी ने सही ही कहा है, फ़ालतू कि बात में ज्यादा दिमाग न लगाना चाहिये ।

आप कैसा महसूस कर रहे हैं, क्या आपने वोट दिया था ?
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जो लोग अब भी आधारभूत सिद्धान्तों, व्यक्तिगत सोच, वैचारिक तर्क और ब्ला, ब्ला, ईटा, बीटा, न्यू, गामा आदि तर्क देकर खुश हो रहे हों, उन्हे साधुवाद । आप बहुत बडा दुख झेलने से बच गये । वरना मेरे लिये आज की रात तो बस बोतल का ही सहारा है :-)

रविवार, जुलाई 08, 2007

चल के दो कदम जो निकला बस्ती से बाहर !

गुस्ताखी माफ़, आज बहुत दिनों के बाद फ़िर से काव्य का रूख किया है । यूँ ही बेतरतीब लफ़्जों को छापते में थोडी शर्म भी हो रही है ।

चल के दो कदम जो निकला बस्ती से बाहर,
मुर्दा बदन को किसी ने छू लिया हो जैसे ।
सुरमई सूरज से महकती मिट्टी की सौंधी खुशबू,
बारिश से धुली शाखों पर दमकते पत्ते,
और उन पत्तों पर जिन्दादिल चिडियों का शोर ।

मेरी लाचारी को रुक कर ताकती दो गिलहरियाँ,
फ़िर भागकर गुम होती शाखों की हरियाली में ।
मानो नन्हें हाथों से मुझे ही बुला रही हों,
कि आओ कुछ बात करें, कुछ बात करें ।

बोलने की ख्वाहिश में गले तक उमडे गूंगे जज्बात,
सीने में अटकी सांसो में जाने क्यों खो जाते हैं ?
कभी बोलना इतना भी दुश्वार नहीं था ।

आँखो की जुबान होती है, मैने तो नहीं सुनी,
बन्द बोझिल थकी आँखे भी कुछ बोलती हैं क्या?
जज्बातों को भी आवाज की बैसाखी चाहिये ।

ये खामोशी, ये सच्चाई अब बर्दाश्त न होगी,
झूठ छुप नहीं पाता, तार तार हो जाता है,
बेहतर है फ़िर से बस्ती का ही रूख करें ।

नीरज रोहिल्ला,
८ जुलाई, २००७

बुधवार, जुलाई 04, 2007

रसोई: कुछ अनुभव, भ्रम/भ्राँतियाँ, वास्तविकता/छल

भारतीय परिवारों में रसोई महिलाओं का अधिकार क्षेत्र माना जाता रहा है । और महिलाओं ने भी अपने इस अधिकार क्षेत्र की सुरक्षा के लिये कोई कसर नहीं उठा रखी है । खाना बनाने को एक बडी ही कठिन कला समझा जाता रहा है और महिलाओं ने भी इस गलतफ़हमी को दूर करने की कभी कोई चेष्टा नहीं की । और करें भी क्यों जब कोई हमसे कहता है कि पी.एच.डी. करना बडा कठिन है तो हम भी बस मुस्कुरा देते हैं और प्रार्थना करते हैं कि कहीं पोल न खुल जाये । बहुत सारे सरकारी अफ़सरों की अफ़सरी इसी में चलती है कि बस लोगों तो लगता रहे बडा तनावपूर्ण काम है और अगर कार्य थोडा धीमी गति से हो रहे हैं तो इसका कारण है कि उन मुद्दों पर व्यापक सोच विचार चल रहा है ।

जब तक हम भारत में रहे हमारा रसोई में प्रवेश निषिद्ध रहा । हमारा रसोई में घुसते ही माताजी का कहना कि "अरे फ़िर चप्पल पहनकर आ गये !" और कुछ छूने से पहले हाथ धोने का आग्रह हमें रसोई से दूर करता गया । विद्यालयों में पढाई के दौरान "छात्रावास मैस" के भोजन के अनुभवों ने ये मानने पर बाध्य कर दिया कि शायद खाना पकाना बडा ही दुष्कर कार्य है और संभवत: पुरूष ये काम नहीं कर सकते ।

अपने घर और देश से दूर जाते समय हमारी माताजी ने भी कहा था, "हाय राम! इस लडके को तो पानी उबालना भी नहीं आता, इसका क्या होगा ।" पिताजी ने सान्त्वना दी कि बहुत लडके घर से बाहर रहते हैं, कुछ न कुछ सीख ही जायेगा । उस बात को कई साल बीत गये हैं और आज रसोई पर मेरे विचार कुछ भिन्न हैं ।

इससे पहले कि हम रसोई पुराण के कच्चे चिट्ठे खोलें और आपके रसोई सम्बन्धी कुछ भ्रम दूर करें, एक नजर डालते हैं कुछ चित्रों पर; मैने कल १२ लोगों के लिये भोजन पकाया था और ये सभी भोजन ३ घंटे के रेकार्ड समय में तैयार किया गया था । इस भोजन में किसी भी शार्ट कट का प्रयोग नहीं किया गया था और आलू/प्याज/टमाटर/सब्जी सब अपने इन्ही दोनों हाथों से काटी/छाँटी गयी थी ।

(मटर पनीर)

(राजमा)


(आलू टमाटर मटर)

(वैजी बिरयानी, सादा चावल)


(और किसी शक/शुबहे की गुंजाइश न बचे, इसलिये सारे व्यंजन एक साथ )

मेहरबान, कदरदान, साहेबान दिल थाम कर बैठिये क्योंकि आज हम रसोई पर किये अपने शोध के परिणाम आपके सामने रख रहे हैं । इस शोधपत्र द्वारा हम जनसामान्य के मानसपटल पर अंकित कुछ भ्राँतियों को दूर करने का प्रयास भी करेंगे ।

महिलाओं का किसी भी व्यंजन की रैसिपी को छुपा कर रखना, ये न बताना कि धनिया/मिर्च/जीरा/हल्दी आदि कितनी मात्रा में पडता है बल्कि ये कहना कि ये तो अंदाज से डाला जाता है और ये अंदाज वर्षों की मेहनत/परीक्षण का फ़ल है ।
ये कथन पूर्णतया असत्य है । चाहे तो २४ के फ़ान्ट में बोल्ड करके रसोई में चिपका लें । भारतीय मसालेदार भोजन में पडने वाले मसालों की एरर एनालिसिस (Error Analysis) के परिणाम और हर मसाले की एररबार (Errorbar) इस प्रकार हैं ।

अ) धनिया : इसकी मात्रा कुछ खास फ़र्क नहीं डालती है, १ चम्मच की जगह अगर तीन भी डाल दें तो फ़िनिश्ड प्रोडक्ट पर इसका असर बताना नामुमकिन है ।

ब) हल्दी : इसकी मात्रा में ५० प्रतिशत तक फ़ेरबदल किया जा सकता है । कम हल्दी डालेंगे तो रंग अच्छा नहीं आयेगा और ज्यादा डाल दी तो उसको थोडा पक जाने दें । फ़िनिश्ड प्रोडक्ट पर कोई प्रभाव नहीं पडेगा ।

स ) मिर्च : इसमें थोडा संयम की जरूरत है लेकिन जिस प्रकार कैमिस्ट्री के टाइट्रेशन वाले प्रयोग में पिपेट से धोरे धीरे रसायन छोडा जाता है, यहाँ पर भी उसी विधि का प्रयोग करें ।

द) गरम-मसाला: २० से ३० प्रतिशत तक घोटाला यहाँ भी आराम से चल सकता है ।

न) नमक : इसके बारे में तो आप स्वयं जानते हैं, स्वाद-अनुसार

च ) जीरा : १०० प्रतिशत तक फ़ेरबदल कर सकते हैं, जरा ध्यान दें कि जीरा जलकर कडवा न हो जाये ।

छ ) अमचूर/खटाई : नमक की मात्रा में फ़ेरबदल करके इसमें भी ५० प्रतिशत तक का घोटाला किसी को पता नहीं चलेगा ।

लगभग हर सब्जी/दाल/राजमा की सार्वत्रिक "नीरज विधि":

१) तेल गरम करके उसमें जीरा डाल दें ।

२) बारीक कटी हुयी प्याज धीमी आंच पर तलें ।

३) अगर सब्जी में शिमला मिर्च/गोभी/बैंगन आदि हैं तो इस समय डाल सकते हैं । (दाल/राजमा) बनाने के लिये इस चरण को स्किप करें ।
नोट : आलू बहुत जल्दी पक जाते हैं इसलिये थोडी देर से डालें ।

३) सभी मसाले अपने स्वाद अनुसार डालकर थोडी देर पक जाने दें ।

४) बारीक कटे हुये टमाटर डाल कर थोडी देर पकने दें ।
नोट: टमाटर को धीमी आंच पर पकने दें और इनका पकना महत्वपूर्ण है । अगर टमाटर कच्चे रह गये तो फ़िनिश्ड प्रोडक्ट में वो मजा नहीं आयेगा ।

५) दाल/राजमा बनाने के लिये इस समय पहले से उबली हुयी दाल राजमा (पानी समेत) इस मिश्रण में डाल दें ।

६) आंच को बिल्कुल ही धीमा कर दें और थोडी ही देर में आपके व्यंजन तैयार हैं ।

नोट: इस पूरी विधि को परफ़ेक्ट करने के लिये केवल दो-तीन बार के अनुभव की आवश्यकता है ।


आपदाकालीन टिप्स/ट्रिक्स:

१) अगर नमक ज्यादा पड गया है तो चिन्ता की जरूरत नहीं है । आहिस्ता से सब्जी का मसालेदार पानी निकालकर गर्म सादा पानी मिला दें, मसालों के नुकसान की पूर्ति के लिये एक अलग पात्र में गर्म तेल में मसाले पकाकर पुरानी सब्जी में मिला दें ।

२) सब्जी बनाते समय पात्र के मुंह को खोलकर रखें और जैसे जैसे पानी कम होता रहे पानी मिलाते रहें । इस विधि में समय थोडा अधिक लगता है लेकिन सब्जी खराब होने की प्रायिकता लगभग समाप्त हो जाती है ।

३) भिंडी बनाते समय प्याज बारीक न काटकर लम्बी काटें; सब्जी अधिक प्रभावी दिखेगी ।


चलिये, हमें जितना कहना था हम कह चुके । इस पोस्ट पर आपकी टिप्पणियों की सबसे ज्यादा जरूरत है और आप ही नहीं आपकी श्रीमती जी (जो श्री विवाहित हैं :-) ) की इस पोस्ट पर क्या राय है हम ये भी जाननें के इच्छुक रहेंगे ।

इस पोस्ट के लिखने में महिलाओं के अधिकार क्षेत्र में अगर गलती से थोडा ज्यादा अतिक्रमण कर दिया हो तो इसके लिये क्षमाप्रार्थी हूँ ।

साभार,
नीरज रोहिल्ला

शुक्रवार, जून 29, 2007

इंटरनेट/ब्लागजगत की आचारसंहिता के कुछ विचारबिन्दु

मैने सबसे पहले १९९९ के आस पास इंटरनेट का प्रयोग प्रारम्भ किया था । उसके कुछ महीनों बाद ही मेरे किसी मित्र ने मुझे एक पुस्तक की पी.डी.एफ़. फ़ाईल दी थी जो एक तरीके से इंटरनेट की आचारसंहिता थी । उस पुस्तक को पढने में मुझे मुश्किल से १ घंटा लगा था लेकिन उसके दिशानिर्देशों को मैं आज भी उपयोग में लाता हूँ ।

इंटरनेट पर आपका आचरण काफ़ी हद तक आपके व्यक्तित्व और सोच को दर्शाता है । कारपोरेट जगत में तो ये और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इंटरनेट पर की गयी एक जरा सी गलती कभी कभी आपके पूरे कैरियर को चौपट कर सकती है । अमेरिका में न्याय-विभाग अभी तक ईमेल सम्बन्धी प्रकरण से उबरा नहीं है जहाँ उन्होने गलती से अथवा जानबूझ कर कुछ महत्वपूर्ण ईमेल डिलीट कर दी थीं ।

ईमेल फ़ारवर्ड करना आमतौर पर सभी लोग बुरा मानते हैं (कुछ अपवादों को छोडकर) लेकिन इसमें भी कई प्रकार के वर्गीकरण हैं ।

१) कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मौका लगते ही आपको कुछ भी फ़ारवर्ड कर देंगे; फ़ूलों का गुलदस्ता, यूरोप के फ़ोटो, प्यार जताने के १०० तरीके, दुनिया के १० अजूबे और बाकी सभी कु्छ ।

२) आपको कुछ लोग ऐसे मिल जायेंगे जो फ़ूलों का गुलदस्ता तो फ़ारवर्ड नहीं करेंगे लेकिन "सिद्धिविनायक मन्दिर का फ़ोटो"/"साईं बाबा का दुर्लभ फ़ोटो"/"तुम और हम दोनों आई. पाड जीते"/"मुफ़्त में पैसा कमायें" तुरन्त फ़ारवर्ड कर देंगे ।

३) इसके अगले पायदान पर जो लोग होते हैं जो बाकी कुछ तो नहीं पर कुछ विशेष चीजें जरूर फ़ारवर्ड करते हैं । उनको लगता है ये चीजें वास्तव में महत्वपूर्ण हैं और इनको फ़ारवर्ड करना कुछ गलत नहीं है । उदाहरण के लिये, "फ़ैक्ट्स टू मेक यू प्राउड अबाउट इंडिया"/ "किसी कारगिल/अक्षरधाम आपरेशन में शहीद हुये वीर के बारे में जानकारी"/ "सीमेन्स बैंगलौर में काम करने वाली किसी काल्पनिक महिला के बच्चे के लिये अस्थिमज्जा दान करने की अपील"/ " बिल गेट्स इस शेयरिंग हिज वैल्थ" आदि आदि ।

४) ये पायदान सबसे अलग होता है, और इस पायदान के लोग केवल "आनलाईन पिटीशन"/"हस्ताक्षर अभियान"/"ताजमहल को वोट दें" फ़ारवर्ड करते हैं ।

५) (इस पायदान में मैं भी आता हूँ) कुछ लोग किसी अन्य विषय से सम्बन्धित जानकारी (संगीत/इतिहास/कला/विज्ञान आदि) से सम्बन्धित "सत्य/रोचक" जानकारी अपने कुछ ऐसे मित्रों को फ़ारवर्ड करते हैं जो उनके हिसाब से इस जानकारी को रोचक/ज्ञानपद्र समझेंगे । चूँकि इस श्रेणी में मैं भी आता हूँ, इस श्रेणी के कुछ अलिखित नियमों (मेरे हिसाब से) की बात करते हैं ।

क) ऐसी ईमेल केवल उन्ही को भेजे जिनको आप व्यक्तिगत तौर पर जानते हों । अंगूठे का नियम हो सकता है कि आपने सम्बन्धित विषय पर उनसे पिछले दो महीने में कम से कम एक बार बात की हो । आपके पास उनका पता और फ़ोन नंबर हो ।

ख) दो-तीन बार ईमेल भेजने के बाद कभी बात होने पर उस ईमेल का जिक्र करें । अगर आपको दो या उससे अधिक बार ये सुनने को मिलता है कि "यार, मेल दिखी थी लेकिन इतना व्यस्त था कि पढ नहीं सका", तो इसे आप सभ्य भाषा में ये समझें कि उनको आपकी भेजी हुयी जानकारी में कोई रूचि नहीं है । आपको उन्हे दोबारा ऐसी ईमेल नहीं करनी चाहिये ।

ग) ऐसी ईमेल एक सप्ताह में दो बार से अधिक न करें ।

घ) अगर आपकी भेजी गयी जानकारी आपकी ईमेल के पाठकों को रोचक लगी होगी तो उनमें से कुछ निश्चित ही वापस ईमेल करके आपको धन्यवाद देंगे ।

ड) कभी भी धन्यवाद करते समय सभी लोगों को ईमेल न भेंजे, केवल सम्बन्धित व्यक्ति को ही प्रेषित करें ।
आप इन पाँचो पायदानों में से किस पायदान पर खडे हैं ? चाहे तो अपनी टिप्पणी के माध्यम से मुझे बता सकते हैं ।

मैने जब आचारसंहिता वाली पुस्तक पढी थी तो उसमें ब्लाग से सम्बन्धित कोई जानकारी नहीं थी । मैं अपने विचार से ब्लाग सम्बन्धी कुछ "अंगूठे के नियम" बता रहा हूँ । मेरी राय में इन्हे अपनाकर फ़ालतू के विवाद से आसानी से बचा जा सकता है ।

१) आपके ब्लाग पर टिप्प्णी भले ही दिखाई सबको दे, लेकिन एक प्रकार से वो आपके साथ व्यक्तिगत संवाद है । आप टिप्पणी के जवाब ईमेल से दे सकते हैं, लेकिन आम तौर पर टिप्पणी का जवाब आपके खुद के ब्लाग पर आपकी टिप्पणी से दिया जा सकता है । आप पर हुयी किसी व्यक्तिगत टिप्पणी/आक्षेप की जवाबदेही सिर्फ़ आपकी है । आपके मित्र अपनी टिप्पणी के माध्यम से उसका जवाब दे सकते हैं लेकिन इससे सदैव बचने का प्रयास करना चाहिये, वरना आपके मित्रों पर भी आक्षेप लगने की सम्भावना रहती है और फ़िर वो एक संवाद न रहकर व्यक्तिगत झगडा बन जाता है । आप पर लगाये गये किसी आक्षेप पर अपने किसी मित्र/अन्य पाठक द्वारा किसी जवाब की आकांक्षा नैतिक तौर पर गलत है । इस पचडे में पडना या न पडना उनका व्यक्तिगत मामला और आप इसे अपने सम्बन्धों की कसौटी न ही बनायें तो अच्छा है ।

२) किसी भी ब्लाग पर की गयी टिप्पणी को ब्लाग पर स्थान देने का फ़ैसला ब्लाग के मालिक के अधिकारक्षेत्र में आता है । हिन्दी ब्लागजगत में जहाँ टिप्पणियों का काफ़ी मोल है मेरी समझ से कोई भी ऐसा नहीं करेगा लेकिन अगर ऐसा हो तो आपकी नाराजगी नितांत अनुचित है । निश्चित रूप से पुन: टिप्पणी न करने अथवा उस ब्लाग को न पढने के लिये आप स्व्तन्त्र हैं, लेकिन इस मुद्दे का जवाब एक पोस्ट के माध्यम से सबको सुनाकर देना मेरी समझ से अनुचित व्यवहार होगा ।

३) ठीक इसी प्रकार, किसी टिप्पणीकर्ता की टिप्पणी के जवाब में लिखी गयी पोस्ट में टिप्पणीकर्ता का नाम बार बार लेना और अत्यधिक भावुक होना भी गलत है । ऐसे संवाद/जवाब के लिये व्यक्तिगत ईमेल कहीं बेहतर है । संवाद की समाप्ति के बाद आप एक पोस्ट में अपने वार्तालाप के मुख्य बिंदुओं को संक्षेप में लिख सकते हैं (दूसरे संवादी से उस संवाद को छापने की अनुमति के बाद) ।

४) जैसा कि रवि रतलामीजी ने बताया था कि इंटरनेट पर आपका लिखा हुआ कुछ भी लम्बे समय तक बना रह सकता है इसलिये अपने गुस्से को सदैव काबू में रखें । एक आदर्श नियम हो सकता है कि आप लिखते समय संयम रखे और पढते समय दिल को एकदम खुला रखें और अपने विवेक का प्रयोग करत हुये यथासंभव छोटी बातों को नजरअन्दाज करें ।

ये कुछ ऐसे विचारबिन्दु हैं जो मैं पिछले काफ़ी समय से आप सबके सम्मुख रखना चाह रहा था । आप अपनी प्रतिक्रिया टिप्पणी के माध्यम से दे सकते हैं ।

साभार,
नीरज रोहिल्ला

मंगलवार, जून 26, 2007

हमारे दौडने-भागने के किस्से

मित्रों आज आपको अपने पुराने दिनों की कुछ बातें बताते हैं । ये बात तब की है जब हम रासायनिक अभियांत्रिकी पढ रहे थे (अभी भी वही पढ रहे हैं) । लेकिन ये बात आज से लगभग सवा आठ साल पुरानी है, हम अपने कालेज में प्रथम वर्ष में थे और वार्षिक खेल कूद प्रतियोगिता आयोजित हो रही थी । इस प्रतियोगिता में अभियांत्रिकी की सभी शाखायें आपस में संघर्ष करती थी और उनमें से एक विजेता घोषित होती थी । जाहिर है हर साल "मैकेनिकल" वाले ही विजेता बनते थे क्योंकि वो संख्या में ज्यादा थे और हथौडा भी ढंग से चलाने में माहिर थे :-)

जब विभिन्न ट्रैक प्रतियोगिताओं के लिये नाम लिखा जा रहा था तो हम भी पँहुच गये और १०० मीटर, २०० मीटर, ११० हर्डल रेस, ४०० मीटर, ४ * १०० मीटर रिले, ४ * ४०० रिले और १५०० मीटर में अपना नाम लिखा आये । नाम लिखने वाले ने एक बार सूची की ओर देखा और फ़िर हमारी ओर एक नजर डाली । हमने कहा कि हाँ अपना ही नाम लिखा रहे हैं परेशान न हो ।

खैर वहाँ बैठे सब लोग हँस दिये और हमारे ब्राँच कैप्टन ने हमारे कन्धे पर हाथ रखकर कहा कि जीतना ही सब कुछ नहीं होता, प्रतियोगिता में भाग लेना ज्यादा जरूरी है । हमें बडा अफ़सोस हुआ कि और तो और हमारा ब्राँच कैप्टन ही हम पर भरोसा नहीं कर रहा है ।

पहले दिन सब दौडों के प्रतिभागियों की छंटनी होकर हर दौड में लगभग ६-८ प्रतिभागी बचने थे । पहली रेस १०० मीटर, समय के हिसाब से हमारा नंबर चौथा; दूसरी रेस २०० मीटर हमारा नंबर तीसरा; तीसरी रेस १०० मीटर हर्डल और उसमें भी हमारा नंबर तीसरा । उसके तुरन्त बाद हमारा ब्राँच कैप्टन दौडता हुआ आया और बोला गुरू कहाँ छुपे हुये थे अब तक । उन्होने कहा कि बस अपनी ब्राँच की इज्जत अब तुम्हारे हाथ में है पिछली बार पीछे से प्रथम आये थे इस बार कुछ करके थोडा तो आगे बढाओ ।

उसके बाद बाकी लोग भी बधाईयाँ देने आ गये और हम भी अपनी ब्राँच में थोडा सेलिब्रिटी जैसे बन गये । पहले दिन की शाम को ११० मीटर हर्डल रेस का फ़ाइनल मुकाबला था और अपनी किस्मत दगा दे गयी । रेस के बीच में एक बाधा को कूदकर जैसे ही पैर नीचे पडा हम अपना सन्तुलन खो बैठे थे और पैर में अच्छी खासी मोच आ गयी थी । ब्राँच कैप्टन ने एक बार फ़िर कन्धे पर हाथ रखा और कहा कि "बैटर लक नेक्स्ट टाइम" ।

मोच के कारण दूसरे दिन हम दौडने के बिल्कुल भी काबिल नहीं थे । सारी प्रतियोगितायें हमारी आँखो के सामने होती रहीं और हम मन मसोस के रह गये । १०० मीटर रेस का फ़ाइनल तीसरे दिन की शाम को प्रतियोगिता के समापन से ठीक पहले मुख्य अतिथि के सामने होना था । हमने अपने टूटे पैर की खूब सेवा की, गरम पानी में नमक डालकर सिंकाई की, मूव/आयोडेक्स की पूरी डिबिया पैर पर उडेल दी और रेस से तुरन्त पहले हम "दर्द निवारक गोली" खाकर ट्रैक पर खडे थे । एक बार फ़िर हमारे ब्राँच कैप्टन ने हमें "बैस्ट आफ़ लक" कहा । ६ लोगों की दौड में हमारा नंबर रहा "चौथा", अपने जख्मी पैर के बावजूद ।

कोई ईनाम भले ही न मिला हो लेकिन अपनी ब्राँच वालों ने हमारे प्रयास की खूब सराहना की और हमें भी अच्छा लगा । उसके बाद अगले तीन सालों तक हमने अपनी ब्राँच के लिये विभिन्न दौडों में कई पदक बटोरे ।

अब जब बात चली ही है तो मैं अपनी सबसे पसंदीदा दो दौडों का किस्सा सुनाता हूँ । पहली थी ४ * ४०० रिले रेस; इसमें मैं आखिरी में दौडने वाला था और जब मुझे बैटन मिला तो हम तीसरे स्थान पर थे लेकिन हमने भी वो दौड लगायी कि चक्कर पूरा होने से पहले प्रथम स्थान पर आ गये थे । इस दौड के समाप्त होने पर मेरे कई मित्रों ने (जो दूसरी ब्राँच में थे ) मुझे कन्धे पर उठाकर मैदान में खूब घुमाया ।

दूसरी दौड ४०० मीटर रेस थी, इस रेस में मैने अपने निकटतम प्रतिद्वन्दी को लगभग १५ मीटर की लीड से परास्त करके अपने कालेज का रेकार्ड (५४ सेकेण्ड्स ) सेट किया था ।


समय बीतता गया और पहले आई. आई. एस. सी., बँगलौर और फ़िर चावल विश्वविद्यालय (राइस यूनिवर्सिटी) में अध्ययन के दौरान ट्रैक से वास्ता बिल्कुल छूट गया । कभी कभी यूँ ही राइस के कैम्पस के चारों ओर (४.८ किमी) दौड लिया करते थे फ़िर वो भी छूट गया ।


अभी दो महीने पहले मैं एक ऐसे समूह के संपर्क में आया जो हर बुधवार को १० किमी दौडते हैं और फ़िर कालेज पब (वलहाला) में बैठकर बीयर पीते हैं । उनमें से अधिकतर लोग कई मैराथन (४० किमी ) दौड चुके हैं । उनमें से एक व्यक्ति के उकसाने पर मैने भी फ़िर से दौडना प्रारम्भ कर दिया है ।

अभी मैं हफ़्ते में केवल २० किमी दौड रहा हूँ (बुधवार को १० और सोमवार और शुक्रवार को ५ ) । ह्यूस्टन में मैराथन दौड जनवरी में होती है, अगर सब कुछ ठीक रहा तो इस बार कम से कम आधी मैराथन तो अवश्य दौडूँगा । फ़िलहाल तो दौडने में बहुत ही मजा आ रहा है, बस दुआ कीजिये कि सब कुछ ऐसे ही चलता रहे ।

इस बीच मेरा वजन जो १५ मिलीग्राम बढ गया था, दौडने के कारण फ़िर से बराबर हो गया है :-)

शनिवार, जून 23, 2007

एक कविता खोजने का प्रयास!!!

बचपन में (शायद कक्षा ६ में) एक कविता पढी थी । आज उसकी केवल कुछ पंक्तियाँ ही याद हैं । आशा करता हूँ कि ब्लाग जगत में शायद किसी के पास ये पूरी कविता हो, अगर आपके पास इस कविता के बाकी अंश हैं तो अपनी टिप्प्णी अथवा ईमेल से सूचित करें ।

कुटिल कंकडों की कर्कश रज,
घिस घिस कर सारे तन में,
किस निर्मम निर्दय ने मुझको,
बाँधा है इस बंधन में ।

फ़ाँसी सी है पडी गले में,
नीचे गिरता जाता हूँ,
बार बार इस महाकूप में,
इधर उधर टकराता हूँ ।

सोमवार, जून 18, 2007

यायावरी की बाद चिट्ठा बाँचन: हाय हम क्यों न हुये मशहूर

हम वैद्यजी की शैली में कह रहे हैं, "ईश्वर से हमारा विश्वास उठता जा रहा है" । आप पूछेंगे क्यों ? तो लीजिये एक पूरी लम्बी पोस्ट लिखकर समझा रहे हैं ।


सबसे पहला तो ये कि हमने हिन्दी ब्लागजगत में अवतरण करने में थोडी देरी करके अपना बडा नुकसान कर लिया था । ब्लागस्पाट पर दाखिला तो बहुत पहले ले लिया था लेकिन ये सोचते थे कि "यूँ ही ऐं वें लिखकर क्या करेंगें ?" हम "ऐं वें लेखन" के चक्कर में पडे रहे और लोग "ऐं वें" लिखकर चिट्ठाजगत के "ताऊ और भीष्म पितामह" बन गये। सबका "ऐं वें लेखन" हम पढ तो बराबर रहे ही थे; और कुछ कविताओं वाले चिट्ठों ने तो नींद छीन ली फ़िर भी हम टिपियाये कि "मन के भावों को क्या खूबसूरती से उकेरा है" । ध्यान दीजियेगा कि ये वही समय था जब हिन्दी चिट्ठाकार "तुम मुझे मुल्ला कहो, मैं तुम्हे हाजी कहूँगा" वाला खेल चला रहे थे । अरे अभी भी नहीं समझे क्या? वही "पाँच प्रश्नों वाला खेल"


हमने सोचा कि चलो अभी भी बहुत देर नहीं हुयी है, हमहु थोडा नाम कमा लें । चहकते हुये इधर उधर टिपियाते रहे, दो तीन पोस्ट भी चाँप दी । लेकिन किसी की नजर भी नहीं पडी, एक बार तो यहाँ तक सोचा कि खुद ही पाँच सवालों के जवाब दाग देते हैं किसे याद होगा कि इससे किसी ने पूछा कि नहीं । लेकिन नहीं, ईमानदारी मार गयी हमें, हम चुपचाप प्रतीक्षा करते रहे कि आज की टिप्पणी पढकर कोई तो कुछ पूछेगा लेकिन नतीजा वही "सिफ़र" । हद तो तब हो गयी कि कुछ लोग बेहद आलसी निकले । उनसे किसी ने पाँच सवाल पूछे और इस सिलसिले को बढाने के बदले उन्होने ये कहकर हमारे अरमानों का गला घोंट दिया कि अब सभी चिट्ठाकार लपेटे जा चुके हैं और अब ये सिलसिला बन्द कर दिया जाये । ऐसे लोगों तो हम कैसे समझायें कि अगर सब मेल फ़ारवर्डिंग करने वाले ऐसा ही सोचने लगें तो चल लिया मेल फ़ारवर्डिंग का व्यापार । हम क्या समझायें कि क्या गुजरी हमारे नाजुक दिल पर ....


समय बीतता गया और हमने इस दुख को अपने सीने में जब्त कर लिया । लेकिन भगवान हमारे साथ एक खेल और खेल गया । हम राजा बबुआ बनकर १६५० मील लम्बी कारयात्रा पर क्या निकले लोगों ने मौका ठांसकर कारसेवा पूरी कर दी । किसी ने थोडा बवाल मचाया, किसी ने विचारों की अभिव्यक्ति की हवा फ़ूँकी और किसी ने "जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध" कहकर बवाल को हवा देकर पूरा आग का गोला बना दिया । हम उहाँ गाडी चलाते रहे और लोग यहाँ रातोरात मशहूर हो गये । हमें तो मौका ही नहीं मिला बताने का कि हम किस तरफ़ हैं या फ़िर हम तीसरा मोर्चा बनाने की सोच रहे हैं ।

यात्रा पर निकलने से पहले हम सोच रहे थे, जितने समय में हम वापिस आयेंगे मुद्दा सुलगकर तैयार हो चुका होगा और हम एक धकापेल लम्बी सी पोस्ट छापकर इतिहास में अपनी जगह सुरक्षित कर लेंगे । पर हाय तकदीर को ये मंजूर न था, जब तक लौट के आये हैं आग के शोले जल चुके हैं । जिनको धरना देना था बोरिया समेटकर जा चुके हैं । इस्तीफ़े तो अब जेब में छत्तीस लोग लेकर घूम रहे हैं । अब इस मुद्दे पर कुछ भी लिखा तो नाम तो नहीं होगा उल्टा लोग कहेंगे भईया जित्ता बोलना था बोल चुके अब ज्यादा चिल्ल पों न मचाओ और घर जाओ ।


ईश्वर ने ये मौका भी हमारे हाथ से छीन लिया । सोचा था कि पहले नारद वाले मुद्दे पर थोडा यश बटोरेंगे और फ़िर यायावरी के नाम पर दो तीन पोस्ट छापकर कम से कम दो महीने की ब्लागिंग का मसाला तो मिल ही जायेगा । और फ़िर बाजार में एक बार साख बन गयी तो टिप्पणियाँ तो आती ही रहेंगी । पर हाय री किस्मत ऐसे नसीब कहाँ हमारे ।


अब तो घुटनों पर जोर डालकर मुद्दे निकालनें पडेंगे और लोगों को जबरदस्ती पढवाना पडेगा । चलो तकदीर में यही लिखा है तो यही सही....



गुरुवार, जून 14, 2007

वाह रे पी. एन. ओक के "तेजोमहालय"

आज सुरेश जी की "ताज महल" और "तेजो महालय" वाली पोस्ट पढी और अपने आपको इस पोस्ट को लिखने से रोक नहीं सका ।

सबसे पहले उस विवादित पुस्तक के लेखक के बारे में बात करते हैं । पुरूषोत्तम नारायण ओक (पी. एन. ओक) अपने आपको एक इतिहासविद कहते अवश्य हैं लेकिन वो इतिहास विषय पर अपने शोध के लिये कम और "कांस्पिरेसी थ्योरीज" के लिये ज्यादा जाने जाते हैं । ये भी बात विचारणीय है कि पी. एन. ओक ने अभी तक किसी भी "peer reviewed journal" में अपना कोई खास शोधकार्य नहीं छापा है ।

तेजो महालय थ्योरी के अलावा भी उनके कुछ निम्न विचार हैं ।

क्रिस्चिनियटी (Christianity) = कॄष्ण स्तुति
मेक्सिको = माल्यावर्त
मक्का में काबा वास्तव में एक शिव मंदिर है ।
७८६ को अगर आप अरबी में लिखें तो उल्टी तरफ़ से पढने पर कुछ विद्वान(ओक और वर्तक सरीखे) उसमें "ओम" की झलक देख सकते हैं ।

तेजोमहालय थ्योरी पर मेरे कुछ विचार इस प्रकार हैं ।

१) मान लीजिये आपने कभी "ताज महल" का नाम नहीं सुना, अब मैं आपको एक भव्य इमारत का नाम "तेजो महालय"/"तेजो महलया" बताता हूँ । क्या आप इस नाम को सुनकर ये कह सकते हैं कि ये किसी मन्दिर का नाम है ? क्या मन्दिरों के नाम ऐसे होते हैं ? क्या ऐसा कोई और उदाहरण है ? क्या इस नाम से पता चलता है कि ये एक प्राचीन शिव मंदिर है ?

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि "तेजो महालय", "ताज महल" को अपभ्रंश करके किसी भी तरीके से एक संस्कॄतनिष्ठ शब्द बनाने का प्रयास है ?

२) यदि आपने पी. एन. ओक की पूरी किताब पढी हो तो आप पायेंगे कि खुद पी. एन. ओक अपने तथ्यों में उलझ कर रह जाते हैं । कभी वो इसे एक शिव मंदिर तो कभी एक "राजपूती महल" बताते हैं ।

३) बाबर ने "राम मंदिर" का विध्वंस करके "बाबरी मस्जिद" का निर्माण किया था । ये बात अयोध्या के आस पास की किवदंतियों में खूब प्रचलित है और ये बात तत्कालीन एतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है । ऐसा कैसे हो सकता है कि उसके सैकडों वर्षों बाद हुयी इस घटना को वहाँ (आगरा/मथुरा) की जनता और इतिहास दोनों बडी आसानी से भूल गये । आगरा/मथुरा की लोककथाओं में इस प्रकार की किसी भी घटना का उल्लेख नहीं है । इतने भव्य मंदिर का इतने भव्य मकबरें में बदलाव की एतिहासिक घटना को लोग यूँ ही नहीं भूल सकते ।

४) ताजमहल से बिल्कुल सटा हुआ "ताज संग्रहालय" है । यदि आप वहाँ जायेगें तो आपको ताज महल के निर्माण सम्बन्धी कई दस्तावेज देखने का अवसर मिलेगा जो ताज महल की जमीन से लेकर पत्थरों की खरीद और मजदूरों के वेतन सम्बन्धी बातों का उल्लेख करते हैं ।

५) अगर शाहजहाँ ने एक मंदिर को तोडकर ताज महल बनवाया भी तो क्या वो इतना बडा बेवकूफ़ होगा कि मूर्तियों को एक कमरे में बंद करके छोड देगा जिससे बाद में कभी भी वो निकाली जा सकें ? एक बादशाह के लिये मूर्तियों को किसी अन्य जगह भेजना निश्चित ही बडा मुश्किल कार्य रहा होगा ।

"कांस्पिरेसी थ्योरिस्ट" आमतौर पर इस प्रकार के तर्क ज्यादा देते हैं जिनकी सामान्यत: पुष्टि न हो सके । तर्क का एक बडा सरल सा सिद्धान्त होता है; अगर आप आम राय के खिलाफ़ तर्क कर रहे हैं तो उसकी पुष्टि की जिम्मेवारी खुद आपकी होती है । उदाहरण के तौर पर क्या मैं ऐसा कह सकता हूँ कि "चाँद मक्खन का बना हुआ है, और अगर आप नहीं मानते तो साबित करिये कि चाँद मक्खन का बना हुआ नहीं है" ।


आज के लिये बस इतना ही, अगली बार बात करेंगे "राम सेतु" की और जानेंगे कि कैसे कुछ स्वयं स्थापित इतिहासविद बनकर लोगों को इस बात पर गलत तर्क परोस रहे हैं ।

साभार,
नीरज


चलते चलते: कल सुबह मैं अपने एक मित्र के साथ १४०० मील की कार यात्रा पर निकल रहा हूँ, इसलिये शायद दो दिनों के लिये संजाल पर आना संभव न हो सके । आप सभी लोगों के चिट्ठे पढने की पढास बहुत कष्ट देगी । यात्रा के बाद उसके विवरण पर भी एक पोस्ट अवश्य लिखी जायेगी ।