हम बदलते हैं, तो समाज बदलता है। बहुत सी बाते जो आज समाज में मान्य नहीं है समय के साथ स्वीकार्य हो जायेगीं। और बहुत सी बातें जो भले ही दूसरों को दुख देती हों, उन्हें हम आज डंके की चोट पर सिर्फ़ इसलिए कह पाते हैं क्योंकि वो क्षम्य हैं, स्वीकार्य हैं।
समय आज ही बडी तेजी से नहीं बदल रहा है बल्कि हमेशा से ऐसा ही रहा है। सोचना आपको है कि आपको इस बदलाव को किस रूप में स्वीकार करना है। बदलाव केवल अच्छे ही नहीं होगें और न ही आप केवल उन बदलावों को चुन सकते हैं जो आपको पसन्द हों। समय के बदलाव एक पैकेज्ड डील की तरह होते हैं और उन्हे उसी रूप में स्वीकार करना चाहिये।
आभार,
नीरज रोहिल्ला